शोध आलेख : भोजपुरी लोकगीतों में स्त्री जीवन की बहुआयामी अभिव्यक्ति / राज कुमार एवं विवेक त्रिपाठी

भोजपुरी लोकगीतों में स्त्री जीवन की बहुआयामी अभिव्यक्ति
- राज कुमार एवं विवेक त्रिपाठी


शोध सार : भोजपुरी लोकगीत स्त्री जीवन की बहुआयामी अभिव्यक्ति के अनूठे दस्तावेज हैं। इन गीतों में नारी ने अपने जीवन के हर पहलू को ; जन्म से मृत्यु तक, खुशी से दुःख तक, प्रेम से विरह तक, आस्था से प्रतिरोध तक स्वर प्रदान किया है। ये गीत न केवल मनोरंजन के साधन हैं, बल्कि सांस्कृतिक संचरण, सामाजिक दस्तावेजीकरण और मानसिक संतुलन के भी महत्वपूर्ण उपकरण हैं। पारंपरिक रूप से, ये गीत उनकी पीड़ा, त्याग और पितृसत्तात्मक बंधनों को दर्शाते थे, जहाँ बाल-विवाह, दहेज, बांझपन और पति-विरह जैसी कुरीतियाँ मुखर थीं। इन गीतों ने स्त्रियों को अपनी दुःखमय गाथा को मुखर होकर अभिव्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम प्रदान किया, भले ही समाज में उन्हें सीधे विरोध की अनुमति न हो। हालांकि, समकालीन संदर्भ में, शिक्षा, मीडिया और सामाजिक आंदोलनों के प्रभाव से स्त्री चेतना में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है। लोकगीतों में अब प्रतिरोध, स्वावलंबन और आत्म-सम्मान के स्वर मुखर हुए हैं। स्त्री अब केवल एक पीड़ित पात्र या त्यागमयी छवि में नहीं दिखती, बल्कि वह परिवर्तन की वाहिका और निर्णय लेने वाली इकाई के रूप में उभर रही है। वह पारंपरिक भूमिकाओं को चुनौती दे रही है और शिक्षा व स्वावलंबन को प्राथमिकता दे रही है। लोकगीत केवल सांस्कृतिक पहचान के वाहक नहीं हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के संकेतक और उत्प्रेरक भी बन गए हैं। वे समाज में व्याप्त लैंगिक असमानताओं और कुरीतियों पर तीखी चोट करते हैं और न्यायपूर्ण तथा समतावादी समाज की आकांक्षा को जन्म देते हैं। अश्लील व्यावसायिक संगीत की बढ़ती प्रवृत्ति के बावजूद जो स्त्री देह का वस्तुकरण करता है; उसके विपरीत वास्तविक लोक परंपरा अपनी जड़ों को मजबूत करते हुए स्त्री सशक्तिकरण की दिशा में आगे बढ़ रही है। महिलाओं द्वारा ऐसे अश्लील गानों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है कि लोकगीतों का मूल मिजाज प्रेम और विद्रोह का रहा है, न कि अश्लीलता का। इस शोध आलेख में भोजपुरी लोकगीतों के माध्यम से स्त्री जीवन का पारंपरिक और समकालीन संदर्भों में गहन विश्लेषण किया गया है। यह आलेख पारंपरिक गीतों में दहेज, बाल विवाह, बांझपन, पति-विरह और पितृसत्तात्मक संरचनाओं के भीतर स्त्री की दयनीय स्थिति का चित्रण करते हुए, समकालीन संदर्भ में डिजिटल मीडिया, शिक्षा और सामाजिक आंदोलनों के प्रभाव से स्त्री चेतना में आए महत्त्वपूर्ण बदलावों को रेखांकित करता है। आधुनिक भोजपुरी संगीत में व्यावसायिक अश्लीलता और वस्तुकरण के विपरीत, वास्तविक लोकगीत स्त्री को सशक्तिकरण, स्वावलंबन और सामाजिक परिवर्तन के वाहक के रूप में चित्रित कर रहे हैं।

बीज शब्द : भोजपुरी लोकगीत, स्त्री जीवन, नारी संवेदना, बहुआयामी अभिव्यक्ति, विरह गीत, सोहर, कजरी, विदेसिया, जतसार, रोपनी गीत, झूमर, मातृत्व, पारिवारिक संबंध, सामाजिक यथार्थ, लोक संस्कृति, श्रम गीत, संस्कार गीत, पितृसत्ता, स्त्री प्रतिरोध, सामाजिक कुरीतियाँ, समकालीन स्त्री चेतना, स्त्री सशक्तिकरण, स्त्री विमर्श।

मूल आलेख : भोजपुरी लोकगीत भारतीय लोक साहित्य की समृद्ध परंपरा के अनिवार्य अंग हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी बिहार, झारखंड के कुछ भागों तथा नेपाल के तराई क्षेत्र में प्रचलित ये लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं, अपितु भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आर्थिक संरचना के प्रामाणिक दस्तावेज हैं। लोकगीत किसी भी समाज की आत्मा होते हैं जो उसकी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक चेतना और भावनात्मक अनुभवों को संजोते हैं। वे केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति और संप्रेषण के सशक्त उपकरण हैं।1 पश्चिमी समाजों में जहाँ लिखित साहित्य का प्रभुत्व रहा है, वहीं भारत में मौखिक और लिखित परंपराएँ लगभग समान रूप से सशक्त रही हैं। यह उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल में जहाँ बंगाल और मिथिला के ब्राह्मणों ने अपनी मातृभाषा को साहित्यिक रचना के लिए अपनाया, वहीं भोजपुरी पंडितों ने केवल संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन पर बल दिया। इस प्रकार, जब औपचारिक लिखित साहित्य का अभाव था या वह अभिजात वर्ग तक सीमित था, तो लोकगीत आम जनजीवन, विशेषकर स्त्रियों के लिए अपनी भावनाओं, अनुभवों और समाज की वास्तविकताओं को व्यक्त करने का एक अनौपचारिक, लेकिन शक्तिशाली माध्यम बन गए। लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीतों के अध्ययन से नारी जीवन पर जितना प्रकाश पड़ता है, उतना अन्य किसी विधा से नहीं। नारी ही इन गीतों की मुख्य रचयिता, गायिका और संरक्षिका रही है। जन्म से लेकर मृत्यु तक, प्रत्येक संस्कार और ऋतु में, खेत-खलिहान से लेकर आँगन-चौबारे तक, नारी ने अपने भावों को गीतों में ढाला है। भोजपुरी संस्कृति में महिलाओं का स्वर सदैव मूल आधार रहा है। चाहे सुख-दुःख की घड़ी हो, तीज-त्योहार का अवसर हो या खेत-खरिहान का काम, हर जगह भोजपुरी नारी ने अपनी भावनाओं को गीतों के रूप में प्रकट किया है।

लोकगीत संकलन और स्त्री जीवन का महत्व (ऐतिहासिक पृष्ठभूमि) :

भोजपुरी लोकगीतों का संकलन उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अंग्रेज शासकों के ध्यान से शुरू हुआ, जिसमें बिहार (भोजपुर) के स्वतंत्रता सेनानी वीर बाबू कुंवर सिंह का योगदान भी ध्यान आकर्षण का केंद्र बना। डॉ. जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने इन गीतों के महत्व का आकलन करते हुए लिखा था कि "ये भोजपुरी लोक गीत उस खान के समान हैं जिसके खोदने का कार्य अभी आरंभ ही नहीं हुआ है। इन गीतों की प्रत्येक बात में ऐसी विशेषता है, जिससे भाषा और इतिहास संबंधी उसकी अनेक समस्याएँ हल की जा सकती हैं।"2 डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय ने सर्वप्रथम सन् 1943 में ‘भोजपुरी लोकगीत भाग-1’ के नाम से अपना पहला संग्रह प्रकाशित किया, जिसमें 271 गीत संकलित थे। उनके अनुसार भोजपुरी लोकगीतों को मुख्यतः पाँच श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है -

1. संस्कार और रीति-रिवाज से जुड़े गीत, 
2. पर्व-त्योहार संबंधी गीत, 
3. ऋतु और मौसम के अनुसार गाए जाने वाले गीत, 
4. जाति-समुदाय विशेष के गीत
5. दैनिक जीवन के विविध कार्यों से जुड़े गीत।

3 लोकगीतों में स्त्री की भूमिका दोहरी रही है : वे इन गीतों की रचयिता, गायिका और संरक्षिका रही हैं, और उनके अनुभव, संघर्ष और संवेदनाएँ इन गीतों के मूल स्वर को आकार देती रही हैं। लोकगीतों का संग्रह औपनिवेशिक काल में शुरू हुआ, जो दर्शाता है कि बाहरी पर्यवेक्षकों ने भी इनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्य को पहचाना। यह इस बात का प्रमाण है कि लोकगीत केवल मनोरंजन के साधन नहीं थे, बल्कि वे एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और समाज के आंतरिक जीवन का विश्वसनीय दस्तावेज़ थे।

भोजपुरी लोकगीतों में स्त्री जीवन के पारंपरिक आयाम :

विभिन्न संबंधों एवं संस्कार गीतों में स्त्री के बहुआयामी भूमिकाओं का चित्रण : भोजपुरी लोकगीतों में स्त्री जीवन की एक गहरी और विस्तृत तस्वीर मिलती है जो समाज में उसकी विभिन्न भूमिकाओं, अपेक्षाओं और संघर्षों को दर्शाती है। ये गीत अशिक्षित और असंस्कृत भोजपुरी समाज का यथार्थवादी चित्रण प्रस्तुत करते हैं, साथ ही भारतीय संस्कृति के आदर्शात्मक उल्लेख भी इनमें मिलते हैं।
पुत्री : परायेपन और विदाई की वेदना –

पारंपरिक भोजपुरी समाज में पुत्री के जन्म को अक्सर अशुभ माना जाता था। माताएँ पुत्री के जन्म से मुक्ति पाने की इच्छा रखती थी और पिता दहेज की चिंता के कारण पुत्री के प्रति उपेक्षा का भाव रखते थे। विदाई के गीतों में बेटी के परायेपन और पिता के आंगन में उसके अस्थायी स्थान की पीड़ा मुखर होती है। एक गीत में बेटी अपने बाबुल से कहती है –

"निमिया के पेड़ जनि कटिहs ए बाबा निमिया बसेरा चिरईया,
बेटी से उरेठ बोली* जनि बोलिहs बाबा बिटिया त जइसन चिरईया।
उड़ि-उड़ी जइहें सबेरे चिरईया रहि जाई निमिया अकेला,
बिटिया जइहें जे अनका के घरवा सून होइ अंगना-दुअरवा।।”4 कठोर वचन*

यह गीत बेटी के घर से बिछड़ने की गहरी वेदना को दर्शाता है। बेटी को बाबुल के आंगन में नीम के पेड़ पर चहकने वाली चिड़िया से तुलना की जाती है और उसके जाते ही आंगन सूना हो जाता है। इसी प्रकार लोकोन्मुख भोजपुरी गीतों (सृजित साहित्य - विवाह से पूर्व ही विवाह के उपरांत ससुराल में होने वाली दशा एवं स्थितियों का वर्णन) में भी माता-पिता की चिंता व्यक्त होती है –

"चिरई बोलेले भिनुसहरा दुलरुई धिया अलसाय,
माई के देहियाँ प भिरिया क परबत रोजे अरराय,
सबका ले पहिले बा उठहीं के बबुनी, सबका ले बाद में नीन,
सबगुन आगर रहलो प बेटी माई क अँचरा बा खीन,
आल्हर बछिया न सकिहें ससुरवा मन घबड़ाय।।5

पत्नी : पतिव्रता धर्म और दयनीय दशा – भोजपुरी स्त्रियों का प्रधान गुण उनका पातिव्रत धर्म माना गया है; वे मन-वचन और कर्म से पति-परायणा होती हैं। वे पति के सुख-दुःख को ही अपना मानती हैं। पति व्यापार हेतु विदेश जाने को तैयार है तथा मार्ग के अनेक कष्टों का वर्णन करता है, इस पर उसकी स्त्री भी साथ चलने का आग्रह करती है –

"भूख मैं सहबों पियास मैं सहबों, पान डारबि बिसराई।
तोहरे साथ पिया जोगिन होइबै, ना संग बाप ना भाई ।।"6

लोकगीतों में उनकी दयनीय दशा का भी मार्मिक उल्लेख मिलता है, जहाँ उन्हें सास-ननद के दुर्व्यवहार और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है –

“सासु मारे हुदुका, ननदिया मारे गारी हो।
ए चदरिया के ऊलोतवा हो, देवरवा हमरो ना।।”7

माता : मातृत्व का गौरव और पुत्र मोह – मातृत्व को नारी का सबसे बड़ा गुण माना गया है। पुत्र के बिना स्त्री की गोद सूनी मानी जाती है, जिससे उसे सामाजिक तिरस्कार झेलना पड़ता है। संतानहीन और पुत्रहीन नारी के प्रति परिवारजनों का व्यवहार बहुत ही अमानवीय वर्णित है और वह सास व पति से मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित होती है। सोहर गीतों में पुत्र-जन्म पर विशेष उल्लास व्यक्त होता है –

"पुत्र जनम मनभावन, मंगल हम गाइब हो।
ललना जुग-जुग जीए मोर ललनवा, निरखि सुख पाइब हो।।"8

परंपरागत रूप से सोहर गीत केवल पुत्र जन्म पर ही गाए जाते थे जो पितृसत्तात्मक समाज की संकीर्ण सोच को दर्शाता है। यह कहावत प्रचलित थी कि पुत्री के जन्म होते ही पृथ्वी तीन बित्ता नीचे दब जाती है।9 उस समय के लोक गीतों में पुत्री के अनादर का स्वरुप देखिये –

“जाहु हम जनती धियवा कोखी रे जनमिहें, पिहितों मैं मरिच झराई रे।
मरिच के झाके-झुके धियवा मरि रे जइति, छुटि जइते गरुवा संताप रे।।”10

किंतु आधुनिक समय में कुछ प्रगतिशील प्रयासों के माध्यम से कन्या जन्म पर भी सोहर गाने की परंपरा विकसित हो रही है। भोजपुरी के लोकगायक प्रभाकर पाण्डेय द्वारा प्रस्तुत एक गीत देखिये –

“बाबू-माई के आँखि बनी अइली ह, कि कुल के सिंगार बनिहे हो।
ए बबुनी रोशन करीहें दू दू गो महलिया, कि जग उजियार करीहें हो।”11

बहू, विधवा और अन्य भूमिकाएँ : सास और ननद द्वारा बहू की भूमिका को नियंत्रित करने का प्रयास पितृसत्तात्मक मूल्यबोध का परिणाम है। बहू को अक्सर पति-समागम से वंचित रखा जाता है और उसे घर के भीतर तमाम बातों और प्रताड़नाओं को सहन करना पड़ता है, जबकि पति अनभिज्ञ रहता है। लोकगीतों में एक स्थान पर ‘सास’ के भाव देखिये –

“लाते हम मरबों पाराते देबों गारी।
काँच ही निनिये हम जगइबो पूत बहुआ री।।” 12

इसी प्रकार पति की मृत्यु के बाद विधवा स्त्री को समाज में उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है। उसका मुख देखना भी पाप समझा जाता है, किसी मंगल-कार्य अथवा शुभ उत्सव में भाग लेना वर्जित है और उसके लिए श्रृंगार करना निषिद्ध माना जाता है। विधवा स्त्री को 'राँड़' की संज्ञा दी जाती है और उसे घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। लोकगीत में एक विधवा स्त्री अपनी व्यथा अपने पिता और भाई से कहती है –

“बाबा सिर मोरा रोवेला सेंदुर बिनु, नयना काजलवा बिनु ए राम।” 13
……………..
“के मोरा छइहें राँड़ के मड़ैया, के मोर बितइहें दिनवा-रतिया हो राम।।” 14

श्रम गीतों में स्त्री जीवन का चित्रण : रोपनी-सोहनी गीत : खेतों में स्त्री श्रम अर्थात् रोपनी और सोहनी गीत मुख्यतः खेत-मजदूर स्त्रियों के गीत हैं। महिलाएँ खेत में धान की रोपाई करते समय सामूहिक रूप से ये गीत गाती हैं। इन गीतों में पारिवारिक नोक-झोक के साथ-साथ अपने प्रिय से बिछुड़ने की पीड़ा भी व्यक्त होती है -

"आधी-आधी राति पिया लादेलs बरधिया कि छतिया कुहुकेला मोर,
चुटुकी काटि छोटी ननदी जगावे, भइया बनिजिया कइ जाय।।" 15

इस गीत में नायिका पति के परदेश गमन से दुःखी है । जीवन के इन प्रतिकूल स्थितियों में वह असहाय और व्याकुल होकर कहती है, “जिसका लक्ष्य बड़ा होता है तथा जिसकी पत्नी कुलवती हो उसे व्यापार हेतु विदेश जाने की आवश्यकता नहीं अर्थात् कुटिर उद्योग से ही लाभ प्राप्त होगा” –

“जेकरि ऊँच नजरिया रे नयका ओ कुलवन्ती जोय,
ते कइसे जइहे बनिज बिदेसवा घरहीं सवाई होय।।” 16

रोपनी-सोहनी गीतों में श्रम की थकान को कम करने के साथ-साथ महिलाओं में एकजुटता और बहनापे की भावना का विकास होता है।​

जँतसार गीत अर्थात् चक्की पर श्रम का संगीत : जतसार गीत महिलाएँ पत्थर की चक्की पर अनाज पीसते समय गाती हैं। ये गीत उनके दैनिक जीवन की कठिनाइयों, विरह वेदना और सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति करते हैं। इन गीतों में स्त्री के श्रम और उसकी भावनाओं का सुंदर समन्वय मिलता है। एक गीत में कुलवती स्त्री अपने पति को नैतिक पाठ पढ़ाते हुए कहती है :

“घरहीं में कुइँया खनावs मोरे सँइया, घरहीं में गंगा-नहान,
बाप-मतारी के धोतिया पखारहुँ, उहे हउएँ गंगा तहार।” 17

ऋतु गीतों में स्त्री भावनाएँ :

कजरी : सावन की फुहार और विरह की पीड़ा : कजरी गीत सावन-भादों के महीनों में गाए जाते हैं, जिसका वर्ण्य विषय ‘पति-पत्नी का प्रेम’ होता है। इन गीतों में प्रेम, विरह, श्रृंगार और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम मिलता है। सावन के महीने में जब प्रकृति नई हरियाली से भर जाती है तब कोई भी विवाहित स्त्री अपने पति से दूर नहीं रहना चाहती :

"बोलु बोलु कगवा रे सुलछन बोलिया,
घेरि-घेरि आयो रे बदरवा, घटा कारी-कारी ना।
बरसे-बरसे रे बदरवा, बिजुरी चमके ना,
काली-काली रे अँधेरिया, हरि ना अइले ना।।" 18

कजरी गीतों में यौन इच्छा की अभिव्यक्ति भी मिलती है, जो स्त्री की दैहिक और भावनात्मक आवश्यकताओं को स्वीकार करती है –

"घिरी आइलि रे बदरिया सावन की,
बादर बरसे बिजुली तड़पे, धीरज मोर नसावन की।" 19

इन गीतों में प्रकृति के प्रतीकों जैसे - बारिश, बिजली, काली घटा, झूला आदि का प्रयोग स्त्री की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए किया जाता है।

चैता और फगुआ अर्थात् बसंत का उल्लास : चैत और फागुन महीने के गीतों में बसंत ऋतु का उल्लास और होली का रंग भरा होता है। इन गीतों में भी प्रेम और विरह के भाव प्रमुखता से मिलते हैं। स्त्रियाँ इन गीतों के माध्यम से अपनी खुशी और उत्साह को व्यक्त करती हैं। होरी गीत में स्त्री का भाव देखिये –

“मोरा हजारों का चीरा* हो, कोई रंग न डारे।
तनवा भिंजावेले कारी बदरिया, मनवा भिंजावे पिया मोरा हो, कोई रंग न डारे।।” 20 *वस्त्र

इसी प्रकार एक चैती गीत में स्त्री अपने पति के (थकान के उपरांत) नींद की सुरक्षा दास्य भाव से करती है तथा कोयल को सौत के भाव में कोसते हुए कहती है –

“सूतल सँइया के जगावे हो रामा, तोरी मीठी बोलिया।
अबले त रहू कोइली बन के कोइलिया,
अब तुहूँ भइलू सवतिनिया हो रामा, तोरी मीठी बोलिया।।” 21

विरह और विदेसिया गीत अर्थात् प्रवासन की पीड़ा : भोजपुरी लोकगीतों में विरह गीतों की बहुतायत है। यह भोजपुरी क्षेत्र से बड़े पैमाने पर हुए श्रम-प्रवासन का प्रत्यक्ष परिणाम है। महान लोकनाट्य कलाकार भिखारी ठाकुर के 'विदेसिया' में भी पत्नी की विरह वेदना का मार्मिक चित्रण है। विदेसिया गीतों में स्त्री अपने पति को परदेश न जाने की विनती करती है, उसके वियोग में अपनी व्यथा व्यक्त करती है –

"पिया मोर मति जा हो पुरुबवा,
पुरुब देस में टोना बेसी बा, पानी बहुत कमजोर,
एक नाथ बिनु मन अनाथ रही, घुसी महल में चोर।।" 22

विरह गीतों में यौन निराशा और भावनात्मक एकाकीपन का भी चित्रण मिलता है। ये गीत स्त्री की दैहिक और मानसिक आवश्यकताओं को खुलकर व्यक्त करते हैं जो पितृसत्तात्मक समाज में एक साहसिक कदम है।
पीड़ा, विरह, संघर्ष और सामाजिक कुरीतियों की अभिव्यक्ति :

लोकगीत स्त्री जीवन की गहरी पीड़ाओं और सामाजिक अन्याय के खिलाफ एक मूक गवाही के रूप में कार्य करते हैं। ‘गवना गीत’ में एक स्थान पर अपनी बहन की पालकी रोके हुए भाई से बहन कहती है (अंतर्वेदना) कि पालकी छोड़ दो, तुम सात नौकरानियों का भार उठा सकते हो किंतु एक मेरा नहीं –

“छोड़ु छोड़ु भइया डंड़ियावा, घरे जाये रे देउ।
सातो उड़िया के भारवा एगो हमरो नाहीं।” 23

बाँझपन के आरोप सहन न कर पाने वाली नारी शीतला माता से गोद भरने की पुकार करती है –

मँगलीं-मँगलीं वरदान देवी मंदिरवा बिचवा ना,
मँगलीं सात-पाँच पुतवा, पुतवा धियवा अकेल।।”24

किन्तु माता, बंध्या का जीवन अपवित्र होने के कारण (आत्मचिंतन) पूजा स्वीकार नहीं करती हैं –

“राजा मोरा गोदिया ना जनमल बालकवा, अहक कइसे पूजिहई हो।” 25

दहेज प्रथा पर भी भोजपुरी गीतों में चोट की गई है जहाँ एक बेटी दहेज के कारण विवाह न होने पर आत्महत्या का विचार करती है। भ्रूण-हत्या जैसे गंभीर विषय पर भी गीत मिलते हैं जहाँ अजन्मी बेटी अपनी माँ से पूछती है कि उसे गर्भ में क्यों मार दिया गया। इसी प्रकार ‘सती प्रथा’ में स्त्री के आदर्श सतीत्व का स्वरुप पितृसत्तात्मक समाज को अचंभित करने वाला है :

“ जो रउरा होई सामी सत के बिअहुता,
अँचरा अगिनिया उपजाई मोरे राम , अँचरा भभकि उठल सतिया भसम भइली।”26

लोकगीतों में व्यक्त स्त्री की पीड़ा और संघर्ष केवल व्यक्तिगत दुख नहीं हैं, बल्कि ये समाज में व्याप्त गहरी संरचनात्मक असमानताओं (पितृसत्ता, दहेज प्रथा, पुत्र मोह) के परिणाम हैं।

समकालीन संदर्भ में स्त्री चेतना का विकास और प्रतिरोध के स्वर :

आधुनिकता, शिक्षा, मीडिया और सामाजिक आंदोलनों का प्रभाव : पिछले एक दशक में भोजपुरी के लोकोन्मुख गीतों में नारी चेतना में महत्त्वपूर्ण बदलाव आया है। यह परिवर्तन आधुनिकता, शिक्षा, मीडिया और सामाजिक आंदोलनों के गहरे प्रभावों का परिणाम है जिसने लोकगीतों की परंपरा को एक नई दिशा दी है। बलात्कार, दहेज हत्या और बाल विवाह के खिलाफ सामाजिक आंदोलनों ने ग्रामीण इलाकों में भी जागरूकता बढ़ाई है। इस परिवर्तन से स्त्रियों की मौन आकांक्षाओं को भी अभिव्यक्ति मिल रही है।

स्त्री की बदलती भूमिकाएँ : स्वावलंबन, निर्णय क्षमता, आत्म-सम्मान और सशक्तिकरण : जहाँ पहले लोकगीतों में स्त्री केवल पीड़ित या त्यागमयी छवि में दिखती थी, अब वह प्रतिरोध, आत्म-सम्मान, निर्णय और स्वतंत्रता की आवाज़ के रूप में प्रकट हो रही है। आधुनिक गीत पारंपरिक भूमिकाओं को चुनौती देते हैं। लोकोन्मुख चेतना की कवयित्री 'आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ की एक रचना देखें :

"पढ़ ललमुनिया तोरा पढ़ले, घोर अन्हारे दीप जरी,
बढ़ ललमुनिया तोरा बढ़ले, एक दुनिया के डेग बढ़ी।।"27

यह गीत स्पष्ट रूप से पारंपरिक भूमिका और आधुनिक आकांक्षा के बीच संघर्ष को दिखाता है, लेकिन स्वर दबा हुआ नहीं है, बल्कि आत्मविश्वासी है। प्रगतिशील विचारधारा की स्त्रियाँ शिक्षा और स्वावलंबन को प्राथमिकता दे रही हैं, कवयित्री ‘संध्या सिन्हा’ बुर्जुआ के प्रति अपने भाव को प्रस्तुत करते हुए कहती हैं :

"मत भूलs कि - हमहीं कुछ कर सकींले,
कुछ नया, बहुत बड़ आ खूब सुन्दर!
हमहीं लड़ सकींले, जर सकींले, जूझ सकींले,
भोग सकींले, अतने ना - मर सकींले।" 28

यह दृष्टिकोण एक पीढ़ीगत बदलाव की ओर इशारा करता है, जहाँ एक स्त्री आर्थिक संरचना में पूर्व स्थापित बुर्जुआ अथवा पूंजीपति वर्ग की ओर विरोध का भाव प्रकट कर रही है।

अश्लीलता और वस्तुकरण के विरुद्ध प्रतिरोध और नारीवादी दृष्टिकोण :

आधुनिक भोजपुरी सिनेमा और डीजे संस्कृति में स्त्री देह का वस्तुकरण और अश्लीलता का प्रचलन बढ़ा है। यह अश्लीलता ग्रामीण शांति को भंग करती है और अक्सर विवादों व हिंसा को जन्म देती है साथ ही यह अश्लीलता का प्रसार एक ‘विपरीत धारा’ का प्रतिनिधित्व करता है, जहाँ एक ओर वास्तविक लोकगीत स्त्री सशक्तिकरण की ओर बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर व्यावसायिक माध्यम स्त्री को वस्तु के रूप में प्रस्तुत कर पितृसत्तात्मक सोच को मजबूत कर रहे हैं। यह बाजारवाद और सामाजिक मूल्यों के बीच एक गहरा संघर्ष दर्शाता है, जहाँ आर्थिक लाभ सांस्कृतिक मूल्यों पर हावी हो रहा है। शंकर मुनिराय का एक गीत देखें :

“ना तन में लुगरी-गुदरी तब, का हम आई के चीर चोराईं,
नाचति जो द्रौपदी अपने मन, का केहू आई के लाज बचाई।।” 29

निष्कर्ष : भोजपुरी लोकगीत एक गतिशील सांस्कृतिक रूप है जो समाज के साथ विकासशील है। लोकगीतों की परंपरा समय के साथ न तो समाप्त होती है और न स्थिर रहती है; वह बदलती है, रूपांतरित होती है और अपने समय की आवाज बनती है। ये गीत स्त्री विमर्श के लिए एक शक्तिशाली उपकरण बने हुए हैं जो उन्हें अपनी आवाज़ उठाने और सामाजिक परिवर्तन को बढ़ावा देने का अवसर प्रदान करते हैं, भले ही उन्हें अकादमिक मान्यता कम मिली हो। अपनी मौखिक और अनौपचारिक प्रकृति के कारण, लोकगीत अकादमिक या ‘शिष्ट साहित्य’ की तुलना में सामाजिक परिवर्तनों को अधिक तेज़ी से आत्मसात कर सकते हैं और उन्हें अभिव्यक्त कर सकते हैं। वे जमीनी स्तर पर स्त्री चेतना को आकार देने और उसे प्रसारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन लोकगीतों का अध्ययन न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि समाजशास्त्रीय, मानवशास्त्रीय और नारीवादी अध्ययन के लिए भी अपरिहार्य है। ये गीत हमें बताते हैं कि भोजपुरी स्त्री का जीवन कितना जटिल और बहुआयामी है और उसने किस प्रकार अपनी अस्मिता और अभिव्यक्ति की जगह बनाई है। वर्तमान समय में जब वैश्वीकरण और आधुनिकीकरण के कारण पारंपरिक लोक संस्कृति खतरे में है तब इन लोकगीतों का संरक्षण और अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। ये गीत न केवल भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक विरासत हैं, बल्कि स्त्री की सामूहिक स्मृति और संघर्ष के भी साक्ष्य हैं। इनके माध्यम से हम समझ सकते हैं कि किस प्रकार स्त्रियों ने सीमित संसाधनों और प्रतिबंधों के बावजूद अपनी अभिव्यक्ति के रास्ते खोजे हैं। अतः लोकगीतों का भविष्य केवल संरक्षण में नहीं, बल्कि संवाद, पुनर्पाठ और रचनात्मक हस्तक्षेप में निहित है। ये गीत स्त्री विमर्श की नई, सार्थक, समकालीन और सशक्त संभावनाएँ प्रस्तुत करते रहेंगे जिससे समाज में सकारात्मक बदलाव आएगा। भोजपुरी लोकगीतों में स्त्री जीवन की बहुआयामी अभिव्यक्ति भारतीय लोक संस्कृति की अमूल्य धरोहर है। इन गीतों का संरक्षण, संग्रह और अध्ययन न केवल भोजपुरी समाज के लिए, बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये गीत मानवीय भावनाओं, संघर्षों और आकांक्षाओं के सार्वभौमिक दस्तावेज हैं।

संदर्भ :
  1. उपाध्याय, कृष्णदेव (1972), लोक साहित्य की भूमिका, साहित्य भवन, इलाहाबाद, पृ० 7
  2. ग्रियर्सन, जॉर्ज अब्राहम (1886), सम भोजपुरी फोक-सोंग्स, जर्नल ऑफ द रॉयल एशियाटिक सोसाइटी ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड आयरलैंड, पृ० 207–267
  3. उपाध्याय, कृष्णदेव (1990) भोजपुरी लोक-गीत (भाग 1), हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, पृ० 24
  4. दीपाली सहाय, (2025, 1 जून). निमिया के पेड़, भोजपुरी क्लासिक्स चैनल, यूट्यूब लिंक – https://youtu.be/PKkzPoaHtzA
  5. द्विवेदी, अशोक (2004), फूटल किरिन हजार, पाती प्रकाशन, बलिया, पृ० 19
  6. उपाध्याय, कृष्णदेव (1990), भोजपुरी लोक-गीत (भाग 1), हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, पृ० 402
  7. उपाध्याय, कृष्णदेव (2000), भोजपुरी ग्राम गीत – भाग 1, हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग, पृ० 216
  8. बलियाटिक, विजय (1974), भोजपुरी संस्कार-गीत, भोजपुरी संसद, वाराणसी, पृ० 11
  9. उपाध्याय, कृष्णदेव (2022), भोजपुरी लोक साहित्य, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, पृ० 206
  10. उपाध्याय, कृष्णदेव (2000), भोजपुरी ग्राम गीत – भाग 2, हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग, 2000 पृ० 131
  11. प्रभाकर पाण्डेय, दादरा म्यूजिक स्टेज शो (2024, 3 सितंबर), जग उजियार करीहे हो – बेटी पर सोहर गीत, यूट्यूब लिंक - https://youtu.be/Wqta09HNVNk
  12. उपाध्याय, कृष्णदेव (2000), भोजपुरी ग्राम गीत – भाग 1, हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग, पृ० 190
  13. वही पृ० 211
  14. उपाध्याय, कृष्णदेव (1990), भोजपुरी लोकगीत – भाग 1, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, पृ० 103
  15. मिश्र, विद्यानिवास (2018), वाचिक कविता : भोजपुरी, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृ० 68
  16. वही पृ० 69
  17. वही पृ० 68
  18. उपाध्याय, कृष्णदेव (1990), भोजपुरी लोकगीत – भाग 1, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, पृ० 427
  19. वही पृ० 428
  20. मिश्र, विद्यानिवास (2018), वाचिक कविता : भोजपुरी, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृ० 49
  21. वही पृ० 51
  22. ठाकुर शीलानाथ व गौरीशंकर ठाकुर (1979), भिखारी ठाकुर ग्रंथवाली – भाग 1, लोक कलाकार भिखारी ठाकुर आश्रम, पटना, पृ० 21
  23. उपाध्याय, कृष्णदेव (2000), भोजपुरी ग्राम गीत – भाग 1, हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग, पृ० 164
  24. मिश्र, विद्यानिवास (2018), वाचिक कविता : भोजपुरी, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृ० 26
  25. उपाध्याय, कृष्णदेव (2000), भोजपुरी ग्राम गीत – भाग 1, हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग, पृ० 272
  26. पृ० 133
  27. नीरन, अरुणेश (2025), प्रतिनिधि कविता : भोजपुरी, सर्व भाषा ट्रस्ट प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ० 113
  28. वही पृ० 252
  29. वही पृ० 242

राज कुमार 
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, डी. ए. वी.  कॉलेज, कानपुर (उ. प्र.)

विवेक त्रिपाठी 
शोधार्थी, हिंदी विभाग, डी. ए. वी. कॉलेज, कानपुर (उ. प्र.)
हिंदी विभाग, डी. ए. वी. पी. जी. कॉलेज, कानपुर सम्बद्ध छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक  माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक  विष्णु कुमार शर्मा

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