मध्यकालीन भक्ति काव्य में सत्ता विमर्श : कुछ संकेत
- अजय कुमार साव
शोध सार : मध्यकालीन भारतीय समाज अपनी राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विविधताओं और जटिलताओं के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इस काल में भक्ति आंदोलन ने न केवल धार्मिक आस्थाओं को प्रभावित किया, बल्कि सामाजिक-राजनैतिक परिवेश में भी गहरा प्रभाव डाला। भक्ति साहित्य में तत्कालीन सत्ता - राजसत्ता, धर्मसत्ता और अर्थसत्ता का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो उस समय के सामाजिक ताने-बाने और वर्ग संघर्ष को दर्शाता है। भक्ति आंदोलन ने निम्न वर्गों, विशेषकर स्त्रियों और दलितों की आवाज़ को मुखरता दी, जिन्होंने अपनी व्यथा, विरोध और सामाजिक समानता की मांग को काव्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया। वहीं, तुलसीदास जैसे कवि ब्राह्मण वर्चस्व और वर्ण व्यवस्था के पक्षधर थे, जबकि कबीर जैसे संत समाज में समता और सामाजिक सुधार के पक्षधर थे। भक्ति आंदोलन ने धर्म और भक्ति को सामाजिक समानता और न्याय के जन-आंदोलन के रूप में परिवर्तित किया जो सामंती व्यवस्था और जातिवाद के विरोध में एक क्रांतिकारी प्रयास था। इस आंदोलन ने लोक भाषाओं को सांस्कृतिक और साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया, जिससे आम जनता की भागीदारी सुनिश्चित हुई। भक्ति साहित्य में तार्किकता, विवेक और सामाजिक चेतना की भी झलक मिलती है जिसने सामाजिक सुधार और परिवर्तन को दिशा दी। हालांकि, समय के साथ इस आंदोलन की क्रांतिकारी ऊर्जा कम होती गई और इसे सत्ता द्वारा आत्मसात कर लिया गया, जिससे इसके विरोधी स्वर दब गए। वर्तमान युग में भक्ति आंदोलन की सामंती और पुरोहितवादी शक्तियों के विरोध का संदेश हमें ग्लोबलाइजेशन और पूंजीवादी प्रभुत्व के खिलाफ संघर्ष में प्रेरणा देता है। अतः भक्ति आंदोलन केवल धार्मिक आंदोलन नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक क्रांति थी, जिसने भारतीय समाज और साहित्य को नई दिशा दी। यह आंदोलन समानता, न्याय और मानवता के लिए एक स्थायी आदर्श प्रस्तुत करता है।
बीज शब्द : मध्यकालीन काव्य, भक्ति, भक्ति काव्य, भक्ति आंदोलन, सत्ता, शक्ति, राजसत्ता, अर्थसत्ता, धर्मसत्ता, बाज़ार, ब्राह्मणवाद, सामंतवाद, समाज, संस्कृति, भाषा, साहित्य, पूंजीवाद, वर्चस्व, कबीर, तुलसी, वर्ण व्यवस्था, वर्ग, जाति, समानता।
मूल आलेख : मध्यकालीन भारतीय समाज राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक स्तर पर अत्यंत विविध तथा जटिल रहा है। हम जानते हैं कि समाज संस्कृतियों का मिलन स्थल होता है। यदि संस्कृति में समावेशिता शक्ति है तो वह अन्य संस्कृतियों से होड़ लेने की बजाय सह-संबंध के रिश्ते के साथ समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसी सांस्कृतिक विकास का प्रतिबिंबन साहित्य में होता है। चूंकि साहित्य, संस्कृति का ही एक अंग होता है, इसलिए तत्कालीन इतिहास की सांस्कृतिक गतिशीलता का अवलोकन तत्कालीन साहित्य द्वारा ही संभव हो सकता है। मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने समूचे भारत को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। भक्ति काव्य न केवल धार्मिक आस्थाओं व भावनाओं की अभिव्यक्ति था, बल्कि वह समाज में धर्म, राजनीति और अर्थव्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता था। मध्यकालीन भक्ति साहित्य का विवेचन सत्ता विमर्श पर विचार किए बिना संभव नहीं हो सकता है। मध्यकाल में मुख्यतः तीन प्रकार की वर्चस्वशाली सत्ताएं (यथा राजसत्ता, अर्थसत्ता और धर्मसत्ता) अस्तित्व में थीं। कमोबेश आज भी (21वीं सदी) यही वर्चस्वशाली शक्तियां है जो समाज का संचालन कर रही हैं। मध्यकालीन इतिहास के अवलोकन से हम पाते हैं कि तत्कालीन समाज, साहित्य और संस्कृति को तत्कालीन सत्ताएं किस प्रकार प्रभावित करती थी और वर्तमान समय में इन सत्ताओं के वर्चस्व में किस प्रकार के परिवर्तन आये हैं? इतिहास में हम देखते हैं कि गैर-दरबारी वैष्णव संस्कृति का दरबारी वैष्णव संस्कृति में जो उत्तरोत्तर रूपांतरण हुआ उसकी पृष्ठभूमि में वर्चस्वशाली सत्ताएं ही थी। हम यह भी देखते हैं कि किस प्रकार भक्ति काल के वैष्णव तथा गैर-वैष्णव भक्त कवियों के यहां सत्ता विमर्श प्रतिफलित हुआ? किस संप्रदाय का संबंध सत्ता के किस अंग से और किस रूप में रहा है? यूं तो मध्यकालीन भक्ति साहित्य में सत्ता के प्रति उदासीनता ही दिखती है, किंतु यह उदासीनता कहीं-कहीं प्रत्यक्ष विरोध तथा परोक्ष समर्थन के रूप में अभिव्यक्त होती है। हम देखते हैं कि कबीरादि संत कवि जहां सत्ता के प्रति सीधे विद्रोह भाव में खड़े नज़र आते हैं, वहीं सूफी कवि अच्छे-बुरे शासक के मध्य फर्क करते हैं; तुलसी भी प्रजा हितैषी राजा के पक्ष में हैं। वैष्णवों में पांथिक भक्त कवि सत्ता से संरक्षण की आशा में समर्थन करते नजर आते हैं। यथा संप्रदायों से जुड़े हुए कृष्ण भक्त कवि। पुष्टिमार्गी संप्रदाय द्वारा स्वयं को एक प्रतिष्ठान के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए किए गए कार्यों पर प्रो• बजरंग बिहारी तिवारी प्रकाश डालते हुए कहते हैं, “स्वयं को एक मजबूत सत्ता प्रतिष्ठान के रूप में बदलने को आतुर पुष्टिमार्ग के लिए यह आवश्यक था कि वह अपने आराध्य को श्रेष्ठ बताने के साथ दूसरे देवों को कम महत्व का साबित करें, अपने प्रवर्तक आचार्य को सर्वोच्च ही न बताए बल्कि दूसरे संप्रदायों के आचार्यों को हर मामले में उन्नीस ही स्वीकार करे; और अनुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिए सभी संभव तरीके अपनाएं। दूसरे के भावनाओं के आहत होने की कोई चिंता न करे।”1
यह भी देखने में आता है कि भक्ति आंदोलन किस प्रकार से निम्न वर्ग तथा वर्ण के स्त्री-पुरुष भक्त कवियों के स्वर को मुखरता प्रदान करता है। स्त्रियां सीधे यहां अपनी व्यथा और विद्रोह को दर्ज करती नजर आती हैं। अंदाल, अक्क महादेवी, ललद्यद, मीराबाई, सहजोबाई, दयाबाई, जनाबाई आदि स्त्री भक्त कवि इसके उदाहरण हैं। मीराबाई तो सीधे तौर पर तत्कालीन शासन को चुनौती देती हैं, ‘नहि सुख भावै थारो देसलड़ो रंगरूड़ो थारे देहांत में राणा साध नहीं है, लोग बसै सब कूड़ो।’2 यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि सगुण भक्त कवियों द्वारा पुरुष को स्त्रियों का त्राणकर्ता (राम और कृष्ण के रूप में) सिद्ध करना, उनकी पितृसत्तात्मक दृष्टि को दर्शाता है।
तत्कालीन समय में राजसत्ता ने समाज पर नियंत्रण के लिए धर्मसत्ता तथा अर्थसत्ता का खूब प्रयोग किया। तब धर्मसत्ता ने भी अपने वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए राजसत्ता का पूरा साथ दिया। ब्राह्मण सत्ता और पितृसत्ता इसी धर्मसत्ता की उपज है और वर्ण व्यवस्था इस ब्राह्मण सत्ता की देन है। दोनों का धर्म से नाभिनाल संबंध है। इस गठजोड़ ने सामाजिक ताने-बाने को नख-शिख तक प्रभावित किया। जनता केवल निरीह फरियादी बनी रही। श्रमिक जातियों के आर्थिक उत्थान से बौखलाए धार्मिक वर्चस्वशाली वर्ग ने उनके दमन के लिए राजसत्ता का सहारा लिया। एक बात स्पष्ट कर देनी आवश्यक है कि सामान्यतः भारत के बड़े हिस्से में धर्मसत्ता, राजसत्ता और अर्थसत्ता, क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ग के हाथ में था। शूद्र (व्यापक स्तर पर दलित, अवर्ण स्त्री सहित) हर स्तर पर तीनों वर्गों से कमजोर होने के कारण (कमजोरी का कारण ऐतिहासिक और राजनीतिक भी है) अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इनकी सेवा करने को विवश थे। ब्राह्मण श्रेष्ठता पर तुलसीदास लिखते हैं, “सुन मम बचन सत्य अब भाई, हरितोषण व्रत द्विज सेवकाई / अब जनि करहि बिप्र अपमाना, जानेसु संत अनंत समाना।।”3 रांगेय राघव तुलसीदास की ब्राह्मण श्रेष्ठता पर लिखते हैं, "तुलसी ने वर्णाश्रम का प्रचार किया। ज्ञान और भक्ति का समन्वय किया। वेद विरोधी संप्रदायों पर गहरी चोट की। समाज में जो निम्न वर्गों का आंदोलन ब्राह्मण सर्वाधिकार के विरुद्ध चल रहा था; उसे गहरी चोट दिया, बल्कि वह आंदोलन ही नष्ट कर दिया। केवट इत्यादि के रूप में तुलसी ने जो निम्न जातियों का महत्व बढ़ाया वह इसलिए कि वे राम के प्रति वफादार थे।"4 मध्यकालीन भक्ति काव्य में जो द्वंद्व है उसे हम कबीर और तुलसी के सहारे आसानी से समझ सकते हैं। कबीर के यहां प्रेम और समतामूलक समाज महत्वपूर्ण है, जबकि तुलसी के आदर्श समाज में वर्णाश्रम की प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण है; कबीर के यहां विचार और संवेदना में साम्यता है, जबकि तुलसी के विचार और संवेदना में विरोधाभास है; कबीर का आदर्श समाज अमरदेस है और तुलसी का रामराज्य; कबीर जिन शास्त्रों की आलोचना करते हैं, तुलसी उन्हीं शास्त्रों के सहारे अपने वर्गीय धर्म को पुनर्स्थापित करने का प्रयास करते हैं। कबीर और तुलसी का वैचारिक द्वंद्व केवल दो व्यक्तियों के विचारों का द्वंद्व नहीं, बल्कि वह दो वर्गों अथवा समाजों का द्वंद्व भी है। हम देखते हैं कि तुलसी जहां एक उच्च वर्ग (Elite Class) के प्रतिनिधि प्रतीत होते हैं, वहीं कबीर श्रम साध्य साधारण जनता के प्रतिनिधि। श्रम की महता की स्थापना मध्यकालीन भक्ति काव्य की महत्वपूर्ण देन है।
हिंदी के अकादमिक और गैर-अकादमिक जगत में तुलसीदास की जितनी आलोचना होती है संभवतः उतनी और किसी मध्यकालीन कवि की नहीं। साथ ही, एक वर्ग के लिए तुलसी के समीप का कवि कोई और भी नहीं है। किंतु तुलसी की आलोचनाओं का कारण तुलसी की वैचारिकी ही हैं। तुलसी जिस विचारधारा के साथ खड़े थे, वह शोषित की पक्षकार और परिवर्तन की विचारधारा नहीं थी। इसी का परिणाम है कि वर्तमान समय में सांप्रदायिक शक्तियां तुलसी का सहजता से प्रयोग कर रही हैं। मैनेजर पांडेय साहित्यकार के लिए विचारधारा के चयन पर कहते हैं, “गलत विचारधारा महान से महान लेखकों को भी किसी न किसी रूप में कमजोर करती है। टॉल्स्टॉय और प्रेमचंद की अनेक रचनाएं ऐसे प्रभावों से नहीं बच पाई हैं।”5
वर्तमान समय में बस इतना परिवर्तन आया है कि अर्थसत्ता गौण से प्रमुख हो गई है। अब अर्थसत्ता (पूंजीवाद) ने राजसत्ता तथा धर्मसत्ता से गठजोड़ कर समाज को अपने पंजे में कस लिया है। युवा कवयित्री जसिंता केरकेट्टा के काव्य में वर्तमान राजसत्ता, अर्थसत्ता और धर्मसत्ता की तिकड़ी गठजोड़ द्वारा किए जा रहे विध्वंस की गूंज सुनी जा सकती है। मध्यकालीन भक्ति काव्य के जिन कवियों के यहां हम राजसत्ता, अर्थसत्ता और धर्मसत्ता के गठजोड़ की पहचान कर सकते हैं, उनमें प्रमुख हैं – कबीर, रैदास, दादू दयाल, मुल्ला दाऊद, जायसी, मंझन, नानकदेव, सुंदरदास, रज्जब, मीराबाई, कुंभनदास, सूरदास, तुलसीदास, नंददास, कृष्णदास, परमानंददास, प्राणनाथ, पलटू साहब, पीपा साहब, सहजोबाई, बुल्लेशाह इत्यादि। इन्हीं भक्त कवियों ने अपनी वाणी में समाज के यथार्थ और स्वप्न को अभिव्यक्ति दी है। मध्यकाल में भक्ति केवल ईश्वर के समक्ष आत्मसमर्पण करते हुए मोक्ष की प्राप्ति करना नहीं है, बल्कि वहां भक्ति जीव-जीवन को व्याख्यायित करती हुई आंदोलन का रूप धारण करती है। मध्यकालीन प्रवृत्तियों में ‘धर्म’ और ‘भक्ति’ केंद्र में है। धर्म मनुष्य के जीवन का आवश्यक अंग रहा है एवं आध्यात्मिक खोज उसकी शाश्वत आकांक्षा हमेशा रही है। धीरे-धीरे धर्म रूढ़ियों-कर्मकांडों से जकड़ता चला गया जिसका असर भक्ति पर भी पड़ा। भक्ति आंदोलन में पहली बार भक्ति धार्मिक सीमाओं से बाहर निकलकर धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक समानता के जन-आंदोलन में परिणत हो गई। भक्त कवियों के नेतृत्व में यह आंदोलन अपने शिखर पर जा पहुंचा। भक्ति आंदोलन को भले ही धार्मिक आंदोलन के रूप में जाना जाता हो, लेकिन उसकी वास्तविक पहचान एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन के कारण ही है। भक्ति आंदोलन के संदर्भ में मैनेजर पांडेय लिखते हैं, “भक्ति आंदोलन के साथ भारतीय समाज, संस्कृति और साहित्य के विकास की नई अवस्था का आरम्भ होता है। भक्ति आंदोलन व्यापक सांस्कृतिक आंदोलन है, जिसकी अभिव्यक्ति दर्शन, धर्म, कला, साहित्य, भाषा और संस्कृति के दूसरे रूपों में दिखाई देती है। वास्तव में वह सामंती संस्कृति के विरुद्ध जनसंस्कृति के उत्थान का अखिल भारतीय आंदोलन है।”6 वर्तमान समय में ग्लोबलाइजेशन के नाम पर पूंजीवाद ने जिस तरह से पैर पसारे हैं, उससे लड़ने की सीख हम भक्ति काव्य से ग्रहण कर सकते हैं। आज से पांच-छह सौ साल पहले का भक्ति आंदोलन किस प्रकार अपनी स्थानीयता को संरक्षित किए था और आंतरिक और बाह्य सांस्कृतिक आक्रमणों से खुद को बचाए हुए था, इसपर नामवर सिंह लिखते हैं, “भक्ति काव्य ही वह पहला साहित्य है जिसमें भारतीय समाज अपनी पूरी विविधता और देशजता के साथ पूरेपन से मौजूद है। स्थानीय समाज और संस्कृति से गहरी संबद्धता भक्ति कविता को भारत की पहली प्रतिनिधि कविता बनाती है। भक्ति कविता बहुजातीय भारत की बहुजातीयता को सोखती और संरक्षित करती है।”7
भक्ति आंदोलन मूलतः एक नई विचारधारा थी जो पुरानी परंपराओं से पूर्णतः भिन्न नहीं फिर भी अलग थी। इसके धार्मिक विचार भी नए प्रकार के थे। यह पूरी जीवन पद्धति को नए ढंग से देखना चाहती थी। इसने समानता के आधार पर समाज का निर्माण करने का उद्देश्य अपने सामने रखा और एक नए नैतिक-आध्यात्मिक ढांचे के निर्माण की कोशिश की। भक्ति आंदोलन के संदर्भ में के. दामोदरन लिखते हैं, “यह शुद्धतः एक धार्मिक आंदोलन नहीं था। वैष्णवों के सिद्धांत मूलतः उस समय व्याप्त सामाजिक-आर्थिक यथार्थ की आदर्शवादी अभिव्यक्ति थे। सांस्कृतिक क्षेत्र में उन्होंने राष्ट्रीय जागरण का रूप धारण किया; सामाजिक विषयवस्तु में वे जाति प्रथा के आधिपत्य और अन्यायों के विरुद्ध अत्यन्त महत्वपूर्ण विद्रोह के द्योतक थे। इस आंदोलन ने भारत में विभिन्न राष्ट्रीय इकाइयों के उदय को नया बल प्रदान किया, साथ ही राष्ट्रीय भाषाओं और उनके साहित्य की अभिवृद्धि का मार्ग भी प्रशस्त किया। व्यापारी और दस्तकार, सामंती शोषण का मुकाबला करने के लिए इस आंदोलन से प्रेरणा प्राप्त करते थे। यह सिद्धांत की ईश्वर के सामने सभी मनुष्य फिर वे ऊंची जाति के हो अथवा नीची जाति के समान हैं, इस आंदोलन का ऐसा केंद्र बिंदु बन गया जिसने पुरोहित वर्ग और जाति प्रथा के आतंक के विरुद्ध संघर्ष करने वाले आम जनता के व्यापक हिस्सों को अपने चारों ओर एकजुट किया। इस प्रकार मध्ययुग के इस महान आंदोलन ने न केवल विभिन्न भाषाओं और विभिन्न धर्मों वाले जनसमुदायों की एक सुसंबद्ध भारतीय संस्कृति के विकास में मदद की, बल्कि सामंती दमन और उत्पीड़न के विरुद्ध संयुक्त संघर्ष चलाने का मार्ग भी प्रशस्त किया।”8
सल्तनत काल के दौरान उत्तरी और पूर्वी भारत तथा महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन का स्वरूप उभरकर सामने आया। इन आंदोलनों ने भक्ति और धार्मिक सत्ता पर जोर दिया। इस धार्मिक सत्ता के नतीजतन जो तत्कालीन परिस्थितियां उभरी, उस पर एंगेल्स का एक कथन सटीक लगता है, “मध्ययुग ने धर्म दर्शन के साथ विचारधारा के अन्य सभी रूपों दर्शन, राजनीति, विधि शास्त्र को जोड़ दिया और इन्हें धर्म की उपशाखाएं बना दिया। इस तरह उसने हर सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन को धार्मिक जामा पहनने के लिए विवश किया। आम जनता की भावनाओं को धर्म का चारा देकर और सब चीजों से अलग रखा गया। इसलिए कोई भी प्रभावशाली आंदोलन आरंभ करने के लिए अपने हितों को धार्मिक जामे में पेश करना आवश्यक था।”9
मध्यकालीन सत्ता तंत्र ने धार्मिकता की आड़ में वैज्ञानिक चेतना को किस प्रकार कुंद किया, इसका उदाहरण हमें ‘आईने अकबरी’ में देखने को मिलता है - “... पारंपरिकता के तेज झोंको का चलना तथा बुद्धिमत्ता के चिराग का मद्धिम पड़ते जाना। ‘क्यों’ और ‘कैसे’ का दरवाजा बंद हो चुका है। सवाल करना और जिज्ञासु होना निरर्थक समझा जाने लगा है तथा यह कुफ्र माना जाता है। पिता से, गुरु से, सगे-संबंधियों से, दोस्तों से और पड़ोसियों से जो कुछ मिले, उसे खुदा की मेहरबानी माना हुआ और उनसे विपरीत राय रखने वालों को अधर्मी और अपवित्र होने का आरोप झेलना पड़ा। यद्यपि प्रबुद्धों में से कुछ ने अपना रास्ता अलग करने की लगन दिखाई, लेकिन वे भी अपने अमल के (सही) रास्ते पर प्रायः आधे से अधिक दूरी नहीं तय कर सकें।”10 अगस्त कोंत (Auguste Comte) ने कहा था, ‘तार्किकता को मनुष्य की बौद्धिक और सामाजिक प्रगति का चरम बिंदु मानना चाहिए।’11 यह तथ्य भक्तिकाल पर लागू होता है। अधिकांश भक्त कवि बौद्धिकता, तार्किकता और विवेक पर बल देते हैं। कबीर कहते हैं, ‘संतों भाई आई ज्ञान की आंधी’, तुलसी कहते हैं, ‘संग्रह त्याग विवेक बिनु नाहिं’; संभवतः संतों की इसी तार्किक सोच और विवेक सम्मतता के कारण डॉ• अंबेडकर ने कबीर को अपना गुरु माना और बौद्धिकता को मानव विकास का अंतिम लक्ष्य स्वीकार किया। हम सभी जानते हैं कि भक्त कवियों ने अपने तत्कालीन समाज में सुधार और परिवर्तन के उद्देश्य से तार्किक उपदेश दिए, क्योंकि उनके लिए सामाजिकता ही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य था। नैतिकता, धर्म और संस्कृति सभी इसी लक्ष्य के आयाम होते हैं। समाज ही ईश्वर, नैतिकता, संस्कृति, सबकुछ है और यही एकमात्र सत्य है। मध्यकालीन भक्त कवियों के लिए सामाजिक जीवन ही निष्काम साधना थी, यज्ञ था, जिसका साध्य शाश्वत जीवन था। यहां शाश्वत जीवन से तात्पर्य है मृत्यु का अतिक्रमण कर अपने कृतित्व द्वारा समाज में स्मरणीय हो जाना है। साथ ही, नामवर सिंह भक्ति का गहरा संबंध भाषाई क्रांति12 से जोड़ते हैं। ध्यातव्य है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी कबीर को भाषा का डिक्टेटर कहते हैं, वे यूं ही नहीं कहते; जब कबीर यह घोषणा करते हैं कि ‘संस्कृत है खूब जल, भाखा बहता नीर’; तब वे शास्त्रीय भाषाओं के ऊपर देशज भाषाओं को तवज्जों देते हैं। तुलसी भी संस्कृत के बजाय देशज भाषा अवधी और ब्रज में रचनाएं करते हैं। देशज भाषा का प्रयोग प्रत्यक्ष रूप से राजसत्ता और अर्थसत्ता (बाज़ार) को चुनौती पेश करता है। भक्ति काव्य ने पूरे सौंदर्यशास्त्र को बदल कर रख दिया। इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आज भी लोक के कंठ में कबीर, रैदास, सूर, मीरा, तुलसी, रहीम, रसखान आदि बसे हुए हैं। नामवर सिंह ने इस बदलाव और भक्ति काव्य के सत्ता विरोधी लौ के मद्धम पड़ते जाने के कारणों पर विचार किया है, “भक्तों के साथ एक नया काव्यशास्त्र और एक नया सौंदर्यशास्त्र आया है। बाद में उसे एप्रोपिएट भी किया गया। ‘एप्रोपिएशन’ की राजनीति को व्याख्यायित करने की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है। इसका गहरा संबंध सामंतवादी-धर्मतंत्रवादी-पितृसत्तावादी समाज की सामाजिक रणनीतियों से है। आत्मसातीकरण पिछले हजार वर्षों की सतत चलने वाली प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया आज भी किन्हीं रूपों में चल रही है। हमारे समय में फासीवादी, सांप्रदायिक और संकुचित राष्ट्रवादी सामाजिक-राजनीतिक शक्तियों ने भक्ति पंथों को प्रतिक्रियावादी राजनीति में बखूबी इस्तेमाल किया है।”13 इस एप्रोपिएशन में मुक्तिबोध के सवालों का जवाब भी छिपा हुआ है।
बहरहाल, हम देखते हैं कि दक्षिण भारत की पुरानी भक्ति परंपरा और सल्तनत तथा मुग़ल काल में पनपे उत्तर भारत के भक्ति आंदोलन में कुछ महत्वपूर्ण समानताएं थी। यदि हम कबीर, रैदास, नानक और अन्य श्रमिक जातियों के संतों के एकेश्वरवादी आंदोलन को अलग कर दें, तो दोनों आंदोलनों में कई सामान्य विशेषताएं एक जैसी थी। जैसे, दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन में समतावादी धर्म की वकालत तो की गई, पर जाति व्यवस्था को कभी नकारा नहीं गया; ब्राह्मण ग्रंथों व ब्राह्मण विशेषाधिकारों को कभी चुनौती नहीं दी गई। परिणामस्वरूप, दक्षिण भारतीय भक्ति आंदोलनों के समान उत्तर भारत के अधिकांश वैष्णव आंदोलन अंततः ब्राह्मण धर्म में विलीन हो गए। इस भक्ति आंदोलन को एक दूसरे से जोड़ने वाला सूत्र भक्ति और धार्मिक समता का सिद्धांत था। इन सभी आंदोलनों की अपनी क्षेत्रीय पहचान थी और उनका अपना सामाजिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधार था। एकेश्वरवाद पर आधारित भक्ति आंदोलन विभिन्न वैष्णव आंदोलनों से भिन्न था। कबीर की भक्ति की अवधारणा और शंकरदेव, चैतन्य व मीराबाई जैसे मध्यकालीन वैष्णव संतों की भक्ति की अवधारणा में आधारभूत अंतर था। महाराष्ट्र का भक्ति आंदोलन बंगाल और असम के भक्ति आंदोलन से भिन्न था। इसी प्रकार उत्तर भारत के रामानंद, वल्लभ, सूर और तुलसी आदि के भक्ति आंदोलन का अपना एक अलग स्वरूप था।
भक्ति आंदोलन का पूरा चरित्र सामंतवाद तथा पुरोहितवाद का विरोधी रहा है। कबीरदास का पद, ‘धन संचते राजा मुए... वेद पढ़े पढ़े पंडित मुए’, कुम्भनदास का पद, ‘संतन को कहां सीकरी सो काम’ और तुलसीदास का पद, ‘तुलसी अब का होंहिगे नर के मनसबदार’ इत्यादि प्रशस्ति परंपरा का विरोध करता है। ये पद गहरे अर्थों में चारण-भाट-सामंत पूजा का तिरस्कार करते हैं। भक्ति आंदोलन भक्ति के माध्यम से ईश्वर के समक्ष समानता का प्रतिपादन करता है जहां केवल धार्मिक या आध्यात्मिक समानता की बात नहीं है, बल्कि वे रचनाकार जानते हैं कि सामाजिक समानता के बगैर इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। उनकी रचनाओं में गहन मानवीय मूल्य बोध दिखाई पड़ता है जो जाति, क्षेत्र और संप्रदाय की सीमाओं का अतिक्रमण करता है। भक्ति काव्य के इसी जनवादी तेवर को अभिव्यक्त करते हुए लल्लन राय लिखते हैं, “उपेक्षित-उत्पीड़ित जनता की मुक्ति के लिए निर्गुण संतों ने सुलह समझौतों से रहित एक संघर्षधर्मी सुधार का मार्ग अपनाया था। वर्णाश्रम एवं तमाम सारी शास्त्र सम्मत मर्यादाओं की खुलेआम निंदा करते हुए निर्गुणोपासक संतों ने हिंदू और मुसलमान दोनों के उत्पीड़ित तबके के लिए भक्ति का एक समान मार्ग प्रस्तुत किया। यह मार्ग था - निर्गुण-निराकार की उपासना। तत्कालीन परिवर्तित धार्मिक-सामाजिक परिस्थितियों में एक निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए उत्तर भारत की यह एक ऐतिहासिक अनिवार्यता थी। यह उद्देश्य शास्त्रनिष्ठ सगुण वैष्णव भक्ति के द्वारा पूरा नहीं हो सकता था। कबीर ने निर्गुण-निराकार की उपासना के माध्यम से दीन-हीन और असहाय समझी जाने वाली जातियों के लिए भक्ति का द्वार खोल दिया। निर्गुण भक्ति आंदोलन द्वारा निम्नजातीय धार्मिक जनवाद की घोषणा अपने समय का एक ऐसा क्रांतिकारी संदेश था, जो उपेक्षित जनता की आध्यात्मिक मुक्ति से लेकर उसकी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक मुक्ति से भी जुड़ गया था।”14
अब तक के अध्ययन से प्रायः यही देखने को मिला है कि भक्ति साहित्य पर जो अकादमिक और गैर-अकादमिक शोध या आलोचनाएं लिखी गई हैं, उसमें एक विशिष्ट वर्ग की अपनी मानसिकता या पॉलिटिक्स झलकती है। मुक्तिबोध कहते हैं कि ‘पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है?’ तो अब तक भक्ति साहित्य की व्याख्या उसी एकांगी पॉलिटिक्स के तहत की गई -सी लगती है। संभवतः प्रगतिशील नजरिया भी इसी पॉलिटिक्स से अब तक आबद्ध रहा है। इसलिए अब तक भक्ति साहित्य का सम्यक मूल्यांकन हमारे पास मौजूद नहीं और अस्पष्टता अधिक है। अब तक की अधिकांशतः प्रमुख आलोचनाओं में भक्ति साहित्य को धर्म, संप्रदाय और अध्यात्म तक ही सीमित कर दिया गया है। इसके ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धर्म सत्तात्मक व राजसत्तात्मक परिप्रेक्ष्यों की उपेक्षा की गई है। ऐसा लगता है कि सगुण-निर्गुण के द्वंद्व पर आलोचकों की तटस्थ दृष्टि नहीं बन पाई है। अधिकांश आलोचकों का रुझान सगुण भक्त कवियों की ओर अधिक रहा है। एक सामान्य अध्येता के मन में यह प्रश्न बार-बार आता होगा कि क्या निर्गुण कवियों ने शास्त्र का विरोध करके कोई अपराध कर दिया था, जो उनकी इतनी उपेक्षा की गई अथवा आलोचकों की नज़र उनपर स्थिर न हो पाई? हिंदी के अधिकांश प्रगतिशील बुद्धिजीवी आलोचक तुलसी-सूर करते नहीं थके। इनके सूर-तुलसी के शोर ने इनका ध्यान वैष्णव संप्रदायों के खूनी संघर्षों की ओर जाने ही नहीं दिया। इनका इस ओर कभी ध्यान ही नहीं गया कि दक्षिण से केवल वैष्णव परंपरा ही उत्तर में क्यों आई, शैव परंपरा कहां छूट गई? इनका ध्यान भक्तिकाल पर मुक्तिबोध द्वारा उठाए गए प्रश्नों के मुकम्मल जवाब अब तक अनुत्तरित हैं। हाशिए की आवाज़ बनकर आने वाले आलोचकों की दृष्टियों को उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। सगुण रुझानवादी बुद्धिजीवियों ने सगुण भक्ति काव्य और कवियों की अलौकिकता तथा रहस्यात्मकता के पीछे इतना समय नष्ट किया कि वे कबीर तथा अन्य निर्गुण कवियों की ढंग से व्याख्या न कर पाएं और उनपर धार्मिक जामा डाल कर छोड़ दिया। कथित प्रगतिशील आलोचकों द्वारा संत कवियों की अनैतिहासिक व्याख्या अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों के लिए आत्मघाती सिद्ध हो रही है। यदि यह कहा जाए कि आज का घोर सांप्रदायिक समय कथित प्रगतिशील साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों के आपसी विरोधाभासों के कारण उत्पन्न हुआ है तो यह अतिश्योक्ति न होगी। मध्यकाल का निर्गुण आंदोलन नवजागरण क्रांति की मशाल थी जिसे बुझाने का प्रयास संभवतः सगुण आंदोलन जैसी प्रतिक्रांति से किया गया।
निष्कर्ष : अंततः हम देखते हैं कि भक्ति काव्य एक ही जल में रहने वाले ‘जलज’ और ‘जोंक’ रूपी मूल्यों के द्वंद्व का काव्य है। भक्तिकाल पर शोध कर रहे शोधार्थियों को तत्कालीन गतिशील परिस्थितियों का वस्तुनिष्ठता से अध्ययन करना चाहिए, ताकि किसी प्रकार की गलती अथवा भटकाव की कोई गुंजाइश न रहे। प्रायः मध्यकालीन भक्ति काव्य पर हुए अब तक की आलोचना में भक्त कवियों के मूल्यांकन के लिए धार्मिक-सांस्कृतिक-दार्शनिक दृष्टिकोण का सहारा अधिक लिया गया है, जिससे उनके काव्य की व्याख्याओं को अलौकिकता में ही समेट कर छोड़ दिया गया है। नए शोधकर्ताओं से यह आशा है कि वे पुराणपंथी दृष्टियों की सम्यक समालोचना के साथ लौकिक दृष्टियों के सहारे नई व्याख्याएं प्रस्तुत करेंगे। प्रस्तुत शोध के लक्ष्यों को प्रसिद्ध आलोचक कंवल भारती के शब्दों में कहा जाये तो “भक्ति आंदोलन की सात मुख्य उपलब्धियां हैं - एक, उसने संस्कृत के विरुद्ध लोक भाषा को अपनाया; दो, उसने ब्राह्मण की विशिष्टता खत्म की; तीन, उसने लैंगिक भेदभाव खत्म किया; चार, मंदिर की अनिवार्यता खत्म की; पांच, पशुओं के प्रति अहिंसा भाव पैदा किया, जिनकी वैष्णव धर्म में क्रूरता से बलि दी जाती थी; छह, पोथी-पत्रों में विश्वास खत्म किया; और सात, परलोक का खंडन किया और लोक पर जोर दिया।”15
संदर्भ :
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- सं•, नीलकांत, (2015), इतिहास लेखन की समस्याएं, विभा प्रकाशन, इलाहाबाद, पृष्ठ 85
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- सिंह, नामवर, (2023), भक्ति काव्य परंपरा और कबीर, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 21
- वही, पृष्ठ 21
- सक्सेना, सं. प्रदीप, (2017), नवजागरण की इतिहास चेतना, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 214
- भारती, कंवल, (2024), भक्ति आंदोलन और निर्गुण-क्रांति, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 18
अजय कुमार साव
शोधार्थी, हिंदी विभाग, तेजपुर विश्वविद्यालय, असम – 784028,
hip24101@tezu.ac.in
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

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