‘हम सुख़न-फ़हम हैं 'ग़ालिब' के तरफ़-दार नहीं’
“इस समय युद्ध का दौर शुरू होने
वाला है। अमेरीका ने घोषणा कर दी है। इस युद्ध का साइड इफेक्ट हम पर भी पड़ेगा। सरकार
को आपातकाल की घोषणा करने का मौका मिलेगा। भारत और पाकिस्तान की सरकारों में अमेरीका
के लिए लाल कालीन बिछाने की होड़ लगी हुई है। दूसरी ओर भारत में लोग ग़रीबी, भूखमरी और
बेरोजगारी के कारण आत्महत्याएं कर रहे हैं। ऐसे में केवल सहित्यकारों से काम नहीं चलेगा।
इस विमर्श में समाज के सभी तबकों को शामिल करना होगा।” नामवर सिंह
(आलोचना और विचारधारा, पृ. 2)
यह बातें नामवर सिंह ने आज से पच्चीस साल पहले ‘आज की चुनौतियाँ
और साहित्य’ विषय पर विचार करते हुए कही थीं। आज का सच अधिक भयावह और कड़वा है। तब भी
अमरीका ही कटघरे में था और आज भी वही कटघरे में है। कारण? उसकी साम्राज्यवादी सोच!
ईरान पर हमले को लेकर ट्रम्प ने स्पष्ट कर दिया है कि हमें वहां का तेल चाहिए। ऊर्जा-स्रोतों
पर अमरीका का एकछत्र स्थापित होता साम्राज्य दुनिया के लिए ख़तरे की घंटी है।
नामवर सिंह समसामयिक सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक गतिविधियों को लेकर बहुत सजग थे। उस पर उनकी पैनी नज़र थी।
वह साहित्य और राजनीति को अलग करके देखने के हामी नहीं थे। साहित्य को वह राजनीति से
ऊपर ही रखते थे। इस मामले में प्रेमचंद के अनुगामी थे, ‘साहित्य राजनीति के पीछे
चलने वाली सचाई नहीं बल्कि राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है।’ उनकी नज़र में साहित्यकार
का समाज-निर्माण में बड़ा दायित्व है। वह समाज को राजनीति के हवाले छोड़ने के विरुद्ध
थे। समाज में प्रभावी होती धार्मिक-सांप्रदायिक राजनीति से क्षरित मूल्यों के ख़तरे
को वह समझते थे इसलिए उनका जोर कमज़ोर होती धर्मनिरपेक्षता और समाज को संप्रदायीकरण
से बचाने पर था – “सेक्युलरिज्म’ की लड़ाई केवल राजनीतिक लड़ाई नहीं है, न ही संवैधानिक और कानूनी दाँव-पेच और कचहरियों में पटवारियों जैसी बहस करके यह
लड़ाई जीती जा सकती है। कारण कि केवल राज्य के सेक्युलर होने से हमारा काम नहीं चल सकता,
समाज को सेक्युलर होना पड़ेगा।...अब तो हालत यह है कि ईसाइयों, पारसियों और आदिवासी समुदायों
में भी साम्प्रदायिकता की हवा फ़ैल रही है। हिटलर और मुसोलिनी के फ़ासीवाद का खतरा कम
था क्योंकि वहां सिर्फ़ राज्य फासीवादी हुआ था। आज तो पूरे समाज को फासीवादी बनाने का
प्रयास हो रहा है। यह ठीक है कि साहित्य में सेक्युलरिज्म बचा हुआ है पर समाज में सेक्युलरिज्म
होना चाहिए।” (वही, पृ. 6) नामवर सिंह आसन्न संकट को लेकर किसी भ्रम में नहीं थे।
उन्हें आभास था कि समाज का संप्रदायीकरण ‘प्रोपेगंडा’ और ‘प्रचार तंत्र’ के बिना संभव
नहीं होगा। आज मुख्यधारा के ‘कार्पोरेटी मीडिया’ का चरित्र हमारे सामने है।
आज दुनिया जिस मुहाने पर खड़ी है ऐसे में नामवर सिंह को याद करना
सिर्फ़ एक साहित्यालोचक को याद करना-भर नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसे शख्स को याद करना
भी है जिसके चिंतन में साम्राज्यवाद-विरोध की लौ है। आज हम नामवर सिंह को एक ऐसे समय
में याद कर रहे हैं जब दुनिया में एक बार फिर से अमेरिकी साम्राज्यवाद अपना सिर
उठा रहा है। दुनिया को लोकतंत्र का ‘पाठ पढ़ाने’ का दंभ भरने वाला अमेरीका ‘महाबली’
बनने की आकांक्षा में इतना मतवाला हो चुका है कि लोकतंत्र का खुलेआम अपहरण कर रहा है!
वेनेजुएला के एक चुने हुए नेता को रातोंरात उठा लिया गया और दुनिया मूकदर्शक बनी रही।
अब वहां अपना ‘पपेट’ बैठाने की क़वायद चल रही है। यही हथकंडा ईरान में भी अपनाने की
कोशिश की गयी। मादुरो और अयातुल्लाह खामनेई ने जिस साहस का परिचय दिया वह बाकियों के
लिए नज़ीर है। जहाँ वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो ने अमेरिकी ‘बन्दर घुड़की’ के आगे
घुटने नहीं टेके। वही ईरान के सुप्रीम धार्मिक नेता अयातुल्लाह खामनेई ने अपना सर्वोच्च
बलिदान देकर साम्राज्यवादी ताकतों को यह सन्देश देने में कामयाब रहे कि स्वतंत्रता
के लिए मरना कुबूल है, पराधीनता नहीं! इससे बौखलाये युद्धोन्मादी शक्तियों ने निर्दोष
बच्चियों तक को नहीं छोड़ा! बच्चियों के स्कूल पर बमबारी कर (जिसमें डेढ़ सौ से अधिक
बच्चियों की मौत हुई) युद्ध की न्यूनतम नैतिकता को तार-तार कर दिया। इस बर्बरता के
बावज़ूद ईरान के लोगों का मनोबल नहीं टूटा। हम कुछ कर पाने में असमर्थ ही दिखे। युद्ध-विरोधी
एक निन्दा प्रस्ताव भी नहीं पास कर पाए। इतिहास और ‘स्मृतिहीन’ देश के एकतरफा प्यार
में पड़ने का ही असर है कि हम भी बहुत ज़ल्दी ‘स्मृतिहीनता’ की ओर बढ़ते जा रहे। देश में
हिन्दी प्रदेशों का तो और बुरा हाल है, “हिन्दी क्षेत्र में इतनी तेज़ी से स्मृतिलोप
हो रहा है कि इसका फ़ायदा वे लोग उठा रहे हैं, जो सचमुच चाहते हैं कि लोग सही चीज़ भूल
जाएँ और वही याद रखें, जो वे आज बता रहे हैं।” (वही पृ.03)
हम बड़ी ज़ल्दी भूल गए कि आये दिन यही अमरीका हमारे देश का अपमान
करता रहता है। हम भूल गए कि कुछ दिन पहले ही उसने हमारे देश के नागरिकों को हथकड़ी पहना
कर वापस भेजा था। यह देश की गरिमा को तार-तार करने वाला क़दम था। हम भूल गए कि जब-जब
हमारे देश पर संकट के बादल मंडराते दिखे, तब-तब अमरीका भारत विरोधी ताकतों के साथ हमेशा
खड़ा दिखा। हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हम एक संप्रभु देश हैं। अब तो नौबत यहाँ तक
आ पहुंची है कि हमारा किस देश से कैसा सम्बन्ध होगा, हम किससे व्यापार करेंगे, किससे नहीं, क्या लेंगे, क्या देंगे- तय करना कितना मुश्किल होता जा रहा है। ये कैसी दोस्ती
है – ‘ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह’, जबकि दोस्ती में उम्मीद की जाती
है कि, ‘कोई चारासाज़ होता कोई ग़म-गुसार होता’!
हम नामवर सिंह को एक ऐसे समय में याद कर रहे हैं जब संस्थाओं
के पास न्यूनतम स्वायतत्ता का तकाज़ा है! फण्ड कट के कारण आर्थिक तंगी से बुरी तरह प्रभावित
शैक्षणिक संस्थाएं पहले से जूझ ही रही थीं कि बड़े-बड़े संस्थानों में ‘हेफा’ से लोन
लेने की सलाह या फीस में बढ़ोत्तरी कोढ़ में खाज की तरह उभरकर सामने आया है। ग़रीबों को
शिक्षा से दूर करने का यह एक और क़दम है। जिन संस्थाओं को नामवर सिंह जैसों ने अपना
जीवन देकर खड़ा किया, वैश्विक छवि-निर्माण किया, उन संस्थाओं की सार्वजनिक छवि ‘देश-विरोधी’
संस्था के रूप में गढ़ने की भरपूर कोशिश की गयी। कहना न होगा कि ये सब विशुद्ध ‘राजनीतिक
वितंडा’ के अलावा कुछ नहीं था! यहाँ देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जेएनयू में घटित
एक घटना का ज़िक्र करना ज़रूरी है। बात सन् 2019 - 2020 की है। आर्थिक संकट से जूझ रहे
विश्वविद्यालयों को यूजीसी ने ‘हेफा’ से क़र्ज़ लेने का निर्देश दिया। इस फैसले का प्रभाव
देशभर के सरकारी विश्वविद्यालयों पर पड़ना था। वह पड़ा। ज़्यादातर विश्वविद्यालयों ने बड़ी मात्रा में फीस में बढ़ोत्तरी की। जेएनयू प्रशासन ने भी फीस वृद्धि का फ़ैसला
किया। इस फैसले के खिलाफ़ जेएनयू छात्रसंघ ने जेएनयू समेत देशभर में लोकतांत्रिक ढंग
से लम्बा आन्दोलन चलाया। आन्दोलन को छात्रों का पुरजोर समर्थन मिला। आन्दोलन सफल होता
दिखाई दे रहा था। तभी एक दिन जेएनयू में एक घटना हुई। हुआ यह कि कुछ ‘तथाकथित’ कुछ
प्रोफेसर और विद्यार्थी आए और जेएनयू प्रशासन के विरोध में धरने पर बैठे विद्यार्थियों
(जिनमें छात्राएँ भी बड़ी संख्या में थीं) को मारना-पीटना शुरू कर दिया! धरने पर
बैठे विद्यार्थियों को अपमानजनक भद्दी-भद्दी गालियाँ दी गयीं। ये सब जेएनयू जैसे संवेदनशील
जगह पर बिलकुल नयी बात थी। यह सब बेहद दुखद था।
नामवर सिंह को एक ऐसे दौर में याद कर रहे हैं जब पूँजी आधारित
व्यवस्था में लगातार असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है। थॉमस पिकेटी और उनके साथियों
ने वैश्विक असमानता का जो आँकड़ा तैयार किया है, वह भयावह है। वैश्विक असमानता रिपोर्ट 2026 के अनुसार, “दुनिया की सबसे अमीर 10% आबादी उतनी आय कमाती है जितनी बाकी 90% लोगों की कुल आय
मिलाकर भी नहीं होती। इसके अलावा, पूरी दुनिया में केवल 60,000 लोगों के पास आधी वैश्विक आबादी यानी करीब 4.1 अरब लोगों की संपत्ति से तीन गुना ज़्यादा धन है। दुनिया की कुल आबादी लगभग 8.2 अरब है।”(द वायर)
भारत में आय की असमानता की स्थिति बहुत चिंताजनक है। आधी से
अधिक आबादी सरकार द्वारा वितरित 5 किलो गेहूं और चावल पर जिंदा है। रिपोर्ट में बताया
गया है कि, “भारत में शीर्ष 10% लोग कुल राष्ट्रीय
आय का 58% कमाते हैं, जबकि नीचे के 50% लोगों को केवल 15% आय मिलती है। संपत्ति में असमानता और भी अधिक है.. सबसे अमीर
10% के पास कुल संपत्ति का 65% और शीर्ष 1% के पास लगभग 40% हिस्सा है।”(वही)
ऐसा नहीं है कि ये स्थितियां बदली नहीं जा सकतीं बशर्ते दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति की
ज़रूरत है।
नामवर सिंह : संक्षित परिचर्चा
हिन्दी के चर्चित आलोचक नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई, सन् 1926 ई० को तत्कालीन बनारस (अब चन्दौली) जिले के एक सुदूरवर्ती गाँव जीयनपुर
में हुआ था। माँ कामकाजी घरेलू महिला थीं और पिता अध्यापक। तीन भाइयों में नामवर सिंह
सबसे बड़े थे। नामवर जी की आरंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। हाई स्कूल से पी-एच.डी. तक
की पढ़ाई-लिखाई बनारस में पूरी हुई। नामवर सिंह के आलोचकीय व्यक्तिव का निर्माण बनारस
में ही हुआ। प्रसिद्ध साहित्यकार-आलोचक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी उनके गुरु हुए।
नामवर सिंह के ‘नामवर’ होने के पीछे लम्बा संघर्ष है! तुलसीराम जी के संस्मरण में नामवर
सिंह के संघर्षों की झलक का संकेत आपको मिलेगा। नामवर सिंह के जीवन में बनारस, दिल्ली, सागर, जोधपुर पुनः दिल्ली के बीच बहुत
राजनीतिक और अकादमिक उठापटक है – दाँव-पेच है। केदारनाथ सिंह ने उनके बारे में ठीक
ही लिखा ‘प्रतिभा का कोई विकल्प नहीं।’ नामवर सिंह में वह प्रतिभा थी, जिसके कारण वह
जहाँ भी रहे, उनकी उपस्थिति का एहसास लोगों को होता रहा। उन्हें नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन
था। हिन्दी साहित्यालोचना परम्परा में वह चौथे महत्त्वपूर्ण आलोचक हुए। नामवर सिंह
का निधन 19 फ़रवरी, 2019 को हुआ।
नामवर सिंह की चेतना में स्वतंत्रता आन्दोलन की महती भूमिका
है। उन्होंने जब होश संभाला तब यूरोपीय साम्राज्यवाद के खिलाफ़ भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन
उत्कर्ष पर था। यूरोपीय साम्राज्यवाद के खिलाफ़ देशभर में आन्दोलन चल रहा था। इसका प्रभाव
नामवर सिंह के चिंतन पर पड़ा। स्वभावतः नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद
के विरोध में विकसित हुई। नामवर सिंह साम्राज्यवाद विरोधी आलोचक हैं। इसकी एक बानगी
छायावाद की व्याख्या के संदर्भ में देख सकते हैं, जिसे वह ‘राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति’ के रूप में व्याख्यायित करते
हैं।
हिन्दी साहित्य का अध्येता होने के नाते मुझे नामवर सिंह का
व्यक्तित्त्व आकर्षित करता रहा है। उनकी औपचारिक कक्षाओं में कभी पढ़ने का अवसर नहीं
मिला लेकिन सभा-संगोष्ठियों में खूब सुना। भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू में जब मैं विद्यार्थी
होकर पहुंचा, उससे दो दशक पहले नामवर जी अवकाशप्राप्त कर जा चुके थे। हालाँकि, विश्वविद्यालय
ने उनके अकादमिक योगदान को देखते हुए उन्हें ‘प्रोफेसर एमरिट्स’ बना दिया था, जिसके
चलते वह केंद्र की सभा-संगोष्ठियों, अपने शोधार्थियों के कार्यालयी
कार्य हेतु आते-जाते रहते थे। उनसे पहला परिचय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातक
की कक्षाओं में हिन्दी साहित्य पढ़ते हुए हो गया था। पहली बार उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
में एक संगोष्ठी में देखने- सुनने का अवसर मिला। तब मैं स्नातक अंतिम वर्ष का छात्र
था। उनके लिखित और वाचिक साहित्य में, विशेषकर भाषा की दृष्टि से, भेद
न के बराबर है। जैसा लिखते हैं, वैसा ही बोलते हैं या जैसा बोलते हैं, वैसा ही लिखते
हैं। इस कला को उन्होंने बखूबी आत्मसात किया है।
मुझे नामवर सिंह की आलोचनात्मक कृतियों को पढ़ना पसंद है। उनको
पढ़ते हुए किसी ‘क्लासिक’ सुख-का-सा आनंद प्राप्त होता है – ‘ज्यों गूंगे मीठे फल कौ
रस, अंतरगत ही भावै’! नामवर सिंह के इस पक्ष को परसाई जी ने बख़ूबी
उभारा है, “नामवर सिंह की समीक्षा तथा सैद्धान्तिक व्याख्या में रचनात्मक साहित्य जैसा
लालित्य है। लगता है कोई ललित गद्य पढ़ रहे हैं। आमतौर पर समीक्षा की भाषा शुष्क और
उबाऊ होती है। पर नामवर जी की भाषा और शैली बहुत प्रभावी है। सहज ढलान है उनके लेखन
में। सीढियाँ चढ़ना या उतरना नहीं पड़ता। वे मुहावरों का अच्छा प्रयोग करते हैं। संबोधन
पद्धति से तर्क को जीवंत बनाते हैं। उनकी भाषा में विलक्षण ‘लुसीडिटी’ है। कटाक्ष है, व्यंग्योक्ति है, वक्रोक्ति है, व्याज स्तुति और व्याज निन्दा
है और ‘विट’ है।”
अकदामिक जगत को नामवर सिंह का योगदान बहुत बड़ा है। वह सिर्फ़
हिन्दी साहित्य के आलोचक नहीं बल्कि विश्व साहित्य के आलोचक थे। वह जिस अधिकार से स्वयम्भू
पर बात कर सकते थे उसी गम्भीरता से उत्तर-आधुनिक चिंतकों पर। नामवर जी जीते जी हिन्दी
में एक मिथक के रूप में स्थापित हो गए थे। वह इस स्थिति को प्राप्त हो गए थे कि उनके
कहे, अनकहे या चुप्प रहने पर भी विवाद होता था। इस बारे में
उन्होंने कहा, “मेरे बारे में बात करते समय हर कोई एक शब्द का प्रयोग ज़रूर करता है, वह है – ‘विवादास्पद’। जब मैं कुछ लिखता हूँ तो विवाद, जब मैं कुछ बोलता हूँ तो विवाद और यहाँ तक कि जब मैं ख़ामोश रहता हूँ तब भी विवाद
होता रहता है।” (वही, पृ. 2) इन सब के बावजूद वह एक मनुष्य थे, उनमें भी वह मानवीय
कमजोरियां थीं, जो सबमें होती हैं। जाति और अस्मिता-विमर्शों को लेकर उनकी अपनी सीमाएँ
और पूर्वग्रह थे, जिनपर उनकी बहुत कटु आलोचना भी हुई। प्रस्तुत विशेषांक में युवा
आलोचक अमिष वर्मा और प्रियंका सोनकर ने प्रकाश डाला है। स्त्री-विषयक उनके चिंतन
की सीमाओं को आलोचक कमलेश वर्मा और प्रोमिला ने बख़ूबी विचार-विमर्श किया है जो
गौरतलब है। उनकी मार्क्सवादी आलोचना पद्धति की विशेषताओं को आलोचक वैभव सिंह ने
सूक्ष्मता से चिन्हित किया है। उनके हिंदीतर अनुशासनों में आवागमन और महत्त्व पर
अपने संस्मरणात्म्क लेख में प्रसिद्ध साहित्य और समाजशास्त्री चिन्तक तुलसीराम एवं
आनंद कुमार ने प्रकाश डाला है। नामवर सिंह की आलोचना-भाषा की सूक्ष्मता से पड़ताल
कर रहे हैं अभय कुमार एवं शशि भूषण मिश्र। नामवर जी के साहित्येतिहास एवं आलोचना-दृष्टि
पर प्रकाश डाल रहे हैं युवा साहित्येतिहास समीक्षक शुभनीत कौशिक, दलपत सिंह
राजपुरोहित, प्रभाकर सिंह और नामवर जी की छात्रा रहीं स्तुति राय।
निष्कर्षतः हमारा प्रयास है कि नामवर सिंह के वृहद् रचना
संसार को समग्रता में देख सकें। इस क्रम में हमने उनके लिखे और कहे (प्रकाशित व्याख्यान)
को आधार बनाया है। इसी आधार पर पुनर्पाठ प्रस्तुत कर उनकी आलोचना-परम्परा को आगे
बढ़ाने का प्रयास है, –
‘हम सुख़न-फ़हम हैं
'ग़ालिब' के तरफ़-दार नहीं
देखें इस सेहरे से
कह दे कोई बढ़ कर सेहरा’
ग़ालिब
‘अपनी माटी’ का यह नामवर सिंह
जन्मशताब्दी विशेषांक क्यों?
नामवर सिंह पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और आगे भी बहुत कुछ
लिखा जायेगा। ‘अपनी माटी’ के लिए नामवर सिंह जन्मशताब्दी विशेषांक की योजना अचानक बनी!
पत्रिका-संपादक और मित्र माणिक जी से जब मैंने अपने विचार साझा किये तो वह सहर्ष राज़ी
ही नहीं हुए, बल्कि साथ भी हो लिए। मुझ अकेले को जैसे सहारा मिल गया। संपादन सहयोग
के लिए दोस्तों से आग्रह किया तो उन्होंने सहर्ष उत्साहवर्धन किया। विशेषांक के लिए
सम्मानित लेखक मित्रों से लेख के लिए आग्रह किया तो उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी हुंकारी भरी।
फिर क्या था! मज़रूह साहब के शब्दों में कहें तो, ‘मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल
मगर/लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया’।
इस विशेषांक का उद्देश्य नामवर सिंह को न तो साहित्य के मंदिर
का देवता बनाना है और न ही उनके अवदान को कमतर दिखाना! इस विशेषांक का उद्देश्य नामवर
सिंह के ही शब्दों में ‘वाद-विवाद एवं संवाद’ की जनतांत्रिक आलोचना परम्परा को आगे
बढ़ाना एवं उनके आलोचनाकर्म का पुनर्पाठ-भर प्रस्तुत करना है। हमारा शुरू से स्पष्ट
मत था कि नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि के उन पक्षों पर बातचीत हो, जो चर्चा का केंद्र
नहीं बन पाई। भरसक प्रयास रहा है कि पिष्ट-पेषण से बचा जाए। यही कारण है कि यह विशेषांक
अपने स्वरुप में थोड़ा अलग है। अपने उद्देश्य में हम कितना सफल हो पाए हैं इसका फ़ैसला
तो पाठक ही करेंगे। विशेषांक में और भी बहुत कुछ होना था, कुछ लेख, कुछ साक्षात्कार और जुड़ने थे लेकिन व्यस्तता एवं समयाभाव के कारण न हो सका – ‘वो
कहाँ होना था, जो हम समझे थे’।
हिन्दी साहित्य की दुनिया में नामवर सिंह के पाठकों की तादाद
बहुत बड़ी है। इसका आभास तब हुआ जब हमने प्राप्त लेखों को समीक्षार्थ दृष्टि से
देखना शुरू किया। नामवर सिंह के प्रति लोगों के भावों को पढ़ते हुए मुज्तर खैराबादी
साहब बार-बार याद आये ‘दिल क्या करे जो राज़ मोहब्बत का खुल गया / मैं क्या करूँ कि
इश्क़ ही इक नामवर से है’।
हम सभी अपनी सीमाओं में जीने और काम करने वाले लोग हैं। जिन
लेखकों को इस विशेषांक में जगह नहीं मिल पाई इसका कतई यह अर्थ नहीं है कि वह किसी से
कमतर हैं। हम चाहकर भी उनको यहाँ जगह नहीं दे पाए, यह हमारी सीमा और असमर्थता है। ऐसे
‘नामवरी’ साहित्यप्रेमियों से हम करबद्ध क्षमा याचना करते हैं।
इस अंक में जो कुछ काम का बन पाया है उसका श्रेय मेरे ऊर्जावान
संपादन सहयोगियों – डॉ. स्तुति राय, अनुजवत संजय साव और हर बार मुझे लड़खड़ाता देख मौके
पर सँभालने वाली जीवन साथी डॉ. कंचन लता यादव, को है। आप सभी के प्रति आभार! युवा
शोधार्थी संजय साव को थोड़ा अधिक हमने कष्ट दिया इसलिए उन्हें विशेषरूप से धन्यवाद।
यहाँ डॉ. रामानुज को भी उपस्थित होना था लेकिन जीवन की आपाधापी और व्यस्तताओं के चलते
हमारे बंधन से वे बीच में ही मुक्त हो लिए परन्तु उनके द्वारा किया गया
उत्साहवर्धन एवं सहयोग मिलता रहा, सो उनके प्रति भी आभार। अंतिम समय में गुरुवर प्रो.
रामबक्ष जाट का आशीर्वाद और सहयोग न मिलता तो कुछ नयी सामग्री हम न दे पाते! यहाँ रामबक्ष
जाट जी द्वारा संपादित और संकलित किताब ‘मेरे लिए नामवर जी’ से हम प्रो. मैनेजर पाण्डेय, प्रो. तुलसीराम, प्रो. आनंद कुमार और प्रो. रामबक्ष जी के संस्मरणात्मक लेख दे
रहे हैं, जो नामवर जी के जीवन और कार्यशैली को समझने की दृष्टि से बहुत
महत्त्वपूर्ण हैं। इस महती सामग्री के उपयोग हेतु अनुमति प्रदान करने के लिए हम प्रो.
रामबक्ष जाट के प्रति आभारी हैं। प्रकाशन की ज़िम्मेदारी गुणवंत और अर्जुन भाई ने
दिन-रात एक कर निभाई, उनके प्रति आत्मिक कृतज्ञता। आवरण डिजाइन के लिए युवा साथी
योगेश कुमार शर्मा और चेतन प्रकाशन के रामरतन कुमावत का भी
शुक्रिया जिन्होंने इसे
हार्ड प्रिंट में लाने में मदद की है। इस अंक में जाने-अनजाने जिस किसी का साथ मिला उन सबका हृदय से धन्यवाद।
बृजेश कुमार यादव
विशेषांक में साथी बृजेश और उनकी टीम ने बहुत मेहनत की है। मेरी
तरफ से हल्की आवाजाही रही है। एक तो बृजेश खुद चंदौली से आते हैं, दूसरे वे जे. एन.
यू. में सालों तक पढ़े हैं। शोध किया है। उनका अध्ययन विस्तार वाला है। मैं केवल निमित्त
मात्र हूँ। चित्तौड़गढ़ में बहुत पहले नामवर जी, ‘बनासजन’ के सम्पादक पल्लव भैया, के सहयोग से दुर्ग चित्तौड़ देखने आए थे- यही स्मृति है।
धोती-कुर्ता पहने हुए और पान चबाते हुए दूर से उन्हें देखने की एक याद है। बाद के वर्षों में पल्लव भैया के माध्यम से ही काशीनाथ
सिंह जी भी इस शहर में आए। बीते दिनों उनके पत्र-संग्रह ‘तुम्हारा नानू’ पढ़ने का मौका
मिला। अद्भुत रूप से मार्मिक और स्नेहसिक्त पत्र हैं। पुस्तक की भूमिका में उनके जीवन
के बेहद अछूते पक्षों पर समीक्षा ठाकुर ने प्रकाश डाला है। बाकी तो नौकरी की तैयारी
में उनकी लिखी कुछ पुस्तकें पढ़ी ही थी। वे सभी किस्मत वालें हैं जिन्होंने उनसे कक्षाओं
में पढ़ा है।
इस बीच साहित्य जगत थोड़ा और रीत गया! सुप्रसिद्ध साहित्यकार
विनोद कुमार शुक्ल हमारे बीच नहीं रहे लेकिन ‘हताशा’ से बैठे व्यक्ति के लिए उनका हाथ
बढ़ाकर दिया गया सहारा हमेशा साथ रहेगा। हिंदी के प्रतिबद्ध मार्क्सवादी आलोचक, प्रेमचंद
और रेणु साहित्य के अप्रतिम अध्येता श्री वीरेन्द्र यादव का हृदयाघात से अचानक चले
जाना जनतांत्रिक आन्दोलनों के लिए एक बड़ा आघात है! प्रो. राजेन्द्र कुमार की सादगी
और समाज के प्रति उनकी निश्छल प्रतिबद्धता अंतिम समय तक बनी रही। जाते हुए भी वे समाज
को वैज्ञानिक चेतना से संपन्न ‘देहदान’ का सन्देश दे गए। साहित्य में प्रतिबद्धता
की अलख ‘पहल’ के माध्यम से जगाये हुए थे। ज्ञानरंजन जी की स्मृति हमें संबल प्रदान
करती रहेगी। सभी को ‘अपनी माटी’ परिवार की ओर से भावांजलि।
माणिक



यह सम्पादकीय अपने समय की जटिलताओं को जिस निर्भीकता और वैचारिक प्रखरता के साथ उद्घाटित करता है, वह न केवल प्रशंसनीय है, बल्कि आज के बौद्धिक परिदृश्य में अत्यंत आवश्यक भी प्रतीत होता है। ‘हम सुख़न-फ़हम हैं ‘ग़ालिब’ के तरफ़-दार नहीं’ शीर्षक अपने आप में एक आलोचनात्मक निष्पक्षता का उद्घोष है—यह स्पष्ट करता है कि यहाँ अंध-समर्थन नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण मूल्यांकन की परम्परा को आगे बढ़ाया जा रहा है।
जवाब देंहटाएंसम्पादकीय का सबसे सशक्त पक्ष यह है कि यह साहित्य को सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ से जोड़ते हुए उसकी प्रासंगिकता को पुनः स्थापित करता है। नामवर सिंह के विचारों के माध्यम से यह रेखांकित किया गया है कि साहित्य केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं, बल्कि प्रतिरोध और चेतना का उपकरण भी है। यह दृष्टि भारतीय आलोचना परम्परा की उस धारा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसमें साहित्य समाज से विमुख नहीं, बल्कि उसके संघर्षों का सहयात्री होता है।
सम्पादकीय में वैश्विक संदर्भों—विशेषकर अमेरिका की साम्राज्यवादी नीतियों—का उल्लेख करते हुए जिस प्रकार वर्तमान विश्व-राजनीति की आलोचना की गई है, वह इसे केवल साहित्यिक विमर्श तक सीमित नहीं रहने देता, बल्कि इसे एक व्यापक वैचारिक दस्तावेज़ बना देता है। उदाहरण के लिए, ईरान और वेनेजुएला की परिस्थितियों का हवाला देकर यह दिखाया गया है कि सत्ता-केन्द्रित राजनीति किस प्रकार लोकतांत्रिक मूल्यों को क्षति पहुँचा रही है।
इसी क्रम में, थॉमस पिकेटी के आँकड़ों के माध्यम से वैश्विक और भारतीय असमानता की जो भयावह तस्वीर प्रस्तुत की गई है, वह सम्पादकीय को ठोस प्रमाणिकता प्रदान करती है। यह तथ्य कि दुनिया की शीर्ष 10% आबादी शेष 90% के बराबर आय अर्जित करती है, अपने आप में उस आर्थिक विषमता का प्रमाण है, जिसके विरुद्ध साहित्यिक और बौद्धिक प्रतिरोध आवश्यक हो जाता है।
सम्पादकीय का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि यह शिक्षा और संस्थानों के संकट को भी गंभीरता से उठाता है। जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में घटित घटनाओं का संदर्भ देकर यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार ज्ञान के केन्द्रों को भी राजनीतिक षड्यंत्रों का शिकार बनाया जा रहा है। यह दृष्टिकोण न केवल यथार्थपरक है, बल्कि चेतावनी भी देता है कि यदि बौद्धिक स्वायत्तता पर आघात जारी रहा, तो समाज की प्रगतिशील चेतना भी क्षीण हो जाएगी।
साहित्यिक दृष्टि से देखें तो यह सम्पादकीय भाषा, शैली और संवेदना—तीनों स्तरों पर अत्यंत प्रभावशाली है। इसमें उद्धृत शेर—“हम सुख़न-फ़हम हैं…”—के माध्यम से जो संतुलित आलोचना का आग्रह किया गया है, वह मिर्ज़ा ग़ालिब की परम्परा का जीवंत पुनर्स्मरण है। साथ ही, मजऱूह सुल्तानपुरी के प्रसिद्ध शेर के माध्यम से सामूहिकता और वैचारिक एकजुटता का जो भाव व्यक्त किया गया है, वह सम्पादकीय को भावनात्मक ऊँचाई प्रदान करता है।
अंततः, यह सम्पादकीय केवल नामवर सिंह को श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि उनके आलोचनात्मक विवेक, प्रतिरोध की चेतना और जनतांत्रिक संवाद की परम्परा को आगे बढ़ाने का एक गंभीर प्रयास है। यह पाठक को न केवल सोचने पर विवश करता है, बल्कि उसे अपने समय के प्रति सजग और उत्तरदायी बनने की प्रेरणा भी देता है।
निष्कर्षतः, यह सम्पादकीय साहित्य, समाज और राजनीति के अंतर्संबंधों को समझने का एक सशक्त दस्तावेज़ है, जो अपने समय के सच को बेबाकी से सामने रखता है और पाठकों को वैचारिक रूप से समृद्ध करता है। ऐसे प्रयास न केवल सराहनीय हैं, बल्कि समकालीन समाज के लिए अनिवार्य भी हैं।
- विमलेश यादव
धन्यवाद विमलेश जी
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