महादेवी वर्मा के सन्दर्भ में ‘तृप्ति’ और ‘अतृप्ति’
- कमलेश वर्मा
नामवर सिंह ने ‘छायावाद’ पुस्तक के अध्याय ‘जिसके आगे राह नहीं’ में महादेवी वर्मा के बारे में जो कुछ लिखा है उससे ध्वनित होता है कि महादेवी का एकाकी जीवन ‘अतृप्ति’ से भरा था। बाहरी जीवन से कटी हुई महादेवी का जीवन ‘साँसों की समाधि न हो जाए तो क्या हो?’ वे लिखते हैं, “पहले जहाँ ‘अतृप्ति’ की प्रधानता थी, बाद में तृप्ति का काल्पनिक आनन्द अनुभव किया जाने लगा.”[i] नामवर सिंह ने महादेवी की कविताओं के माध्यम से उनकी प्रेम-भावना के इर्द-गिर्द जिस तरह की बातें लिखी हैं उन पर ठहरकर बात करने की ज़रूरत है। नामवर सिंह का ध्यान उनके एकाकी जीवन पर है। उस जीवन में न तो पति की उपस्थिति है और न ही किसी प्रेमी की! और न ही दूर-दूर तक उनकी कोई प्रक्षिप्त प्रेम-कथा मिलती है। आलोचक को लगता है कि ऐसी स्त्री का जीवन तो ‘अतृप्ति’ से भरा होगा! वह स्त्री अपनी कविता में प्रेम की ‘तृप्ति का काल्पनिक आनंद’ उठाती होगी!
फिर भी महादेवी की कविताएँ प्रेम की भावना से ओत-प्रोत हैं। उनके हृदय में कोई है, ‘कौन तुम मेरे हृदय में?’ उनका दावा है कि वे अपने प्रिय को अच्छी तरह से जानती हैं, ‘जो न प्रिय पहचान पाती!’ महादेवी की कविताओं में ‘अतृप्ति’ की तलाश ज़रूर की जानी चाहिए। उसके बाद यह भी देखा जाना चाहिए कि वे अपनी कविताओं में ‘तृप्ति का काल्पनिक आनंद’ किस तरह से उठाती हैं। उन पंक्तियों को ज़रूर रेखांकित किया जाना चाहिए जहाँ उनकी ‘अतृप्ति’ दिखती हो और ‘तृप्ति का काल्पनिक आनंद’ दिखता हो! इन बातों पर गौर करते समय यह भी देखा जा सकता है कि शेष तीनों छायावादी कवियों की स्थिति इन मामलों में किस तरह की है?
‘छायावादी काव्य-कोश’ को तैयार करने के क्रम में शब्दों पर ध्यान बार-बार गया। पद और पदबंध अपने भीतर से काव्य-भाषा की प्रकृति को संजीवनी प्रदान करते हैं। वाक्यों को अर्थ की गरिमा शब्द-प्रयोगों से मिलती है। शब्दों की छानबीन कविता की अर्थवत्ता की पड़ताल है। देखा जाना चाहिए कि छायावादी कवियों के शब्द-प्रयोग आलोचकों की धारणाओं को पुष्ट करते हैं या नहीं? महादेवी की कविताएँ ‘तृप्ति’ और ‘अतृप्ति’ के मामले में नामवर सिंह की धारणाओं को पुष्ट करती है या अपुष्ट करती हैं? इससे संबंधित कुछ शब्दों पर एक-एक कर उदाहरण-सहित बात करके आलोचक की धारणाओं की जाँच की जा सकती है।
[1]
सबसे पहले ‘अतृप्ति’ और ‘तृप्ति’ पर बात की जाए। ये दोनों शब्द छायावादी कविताओं में बड़ी संख्या में प्रयुक्त हुए हैं। कहा जा सकता है कि ये दोनों शब्द छायावादी काव्यभाषा के स्वभाव के अनुकूल हैं। यदि ‘अतृप्ति’ शब्द को ध्यान में रखा जाए तो इसका सर्वाधिक प्रयोग प्रसाद ने किया है। महादेवी ने केवल दो-तीन बार इसका उपयोग किया है। ‘तृप्ति’ शब्द भी प्रसाद में ही सर्वाधिक है और महादेवी में बहुत कम! पहले ‘अतृप्ति’ शब्द के प्रयोग को देखा जाए। ‘रश्मि’ की दो कविताओं में यह शब्द मिलता है। पहली पंक्ति में भाव है – अतृप्ति को जीवन मानना और तृष्णा में जीवन का मिट जाना। दूसरी कविता की पंक्ति में कहा गया है कि यह जीवन व्यथा के घन में तृप्ति की आग की तरह है। बादलों में बिजली की चमक का रूपक लिया गया है। महादेवी की कविताएँ जीवन की बनावट पर दार्शनिक स्तर की बातें करती हैं। इन दोनों पंक्तियों में उस बनावट के बारे में बात करते हुए ‘अतृप्ति’ शब्द का प्रयोग किया गया है,
यह चिर अतृप्ति हो जीवन/चिर तृष्णा हो मिट जाना : म.सा.-1/111 चिर तृप्ति कामनाओं का/रश्मि
सुधा का मधु हाला का राग/व्यथा के घन अतृप्ति की आग : म.सा.-1/115, तुहिन के पुलिनों पर छबिमान/रश्मि
निराला में एक प्रयोग इस तरह मिलता है,
वह अतृप्त-आग्रह से सिञ्चित : नि.र.-1/121, यमुना के प्रति
विश्लेषण की ज़रूरत प्रसाद की कविताओं में है। ‘अतृप्ति’ शब्द अपनी भरपूर अर्थवत्ता के साथ वहाँ प्रयुक्त हुआ है। कुछ उदाहरण देखिए,
तिर रही अतृप्ति जलधि में/नीलम की नाव निराली : प्र.ग्रं.-2/11, आँसू
यह अतृप्ति अधीर मन की क्षोभयुत उन्माद : प्र.ग्रं.-2/117, वासना/कामायनी
बन आवर्जना-मूर्ति दीना अपनी अतृप्ति-सी संचित हो : प्र.ग्रं.-2/127, लज्जा/कामायनी
चिर अतृप्ति जीवन यदि था तो तुम उसमें संतोष बनी : प्र.ग्रं.-2/227, निर्वेद/कामायनी
मनु के मस्तक की चिर-अतृप्ति, तुम उत्तेजित चंचला शक्ति!’ : प्र.ग्रं.-2/236, दर्शन/कामायनी
‘अतृप्ति जलधि’ में प्रसाद डूबे हैं! ‘अतृप्ति अधीर मन की’ प्रसाद के पास है! ‘रति की प्रतिकृति लज्जा’ आवर्जना की मूर्ति बनकर ‘अतृप्ति-सी संचित’ है! ‘चिर अतृप्ति’ जीवन में भी और ‘मनु के मस्तक’ में भी! प्रसाद ‘अतृप्ति’ के कई रूपों से भरे पड़े हैं! ऊपर के उदाहरण बताते हैं कि काम-चेतना की अतृप्ति की बेचैनी प्रसाद में दिखती है न कि महादेवी में! एक-दो को छोड़कर निराला और पन्त ने ‘अतृप्ति’ शब्द का प्रयोग प्रायः नहीं किया है.
अब ‘तृप्ति’ शब्द को देखते हैं.
एक करुण अभाव में चिर/तृप्ति का संसार संचित’ म.सा.-1/173 कौन तुम मेरे हृदय में?/नीरजा
एक करुण अभाव में चिर तृप्ति को महसूस करना दूसरे ढंग का भाव-बोध है। इसे एकाकी जीवन और व्यक्तिगत प्रेम-संबंध के अभाव से जोड़कर देखना ठीक नहीं है। इसकी अगली पंक्ति इस बात को थोड़ा और स्पष्ट करती है,
‘एक लघु क्षण दे रहा/निर्वाण के वरदान शत शत;’
‘रश्मि’ की इस पंक्ति में भी ‘तृप्ति’ का संबंध जीवन-दर्शन से है न कि व्यक्तिगत काम-चेतना से,
चिर तृप्ति कामनाओं का/कर जाती निष्फल जीवन : म.सा.-1/109 चिर तृप्ति कामनाओं का/रश्मि
इसे भी स्पष्टता के लिए अगली पंक्ति से जोड़कर पढ़ सकते हैं,
‘बुझते ही प्यास हमारी/पल में विरक्ति जाती बन’
‘रश्मि’ की दो पंक्तियाँ और मिलती हैं जहाँ ‘तृप्ति’ शब्द आया है। इनमें भी भाव-बोध उसी ढंग का है,
तू अकिंचन भिक्षुक है मधु का/अलि तृप्ति कहाँ जब प्रीति नहीं : म.सा.-1/129 इन आँखों ने देखी न राह कहीं/रश्मि
तृप्ति-प्याले में तुम्हीं ने साध का मधु घोल : म.सा.-1/124 स्मित तुम्हारी से छलक.../रश्मि
‘तृप्ति’ शब्द का सर्वाधिक प्रयोग करते हैं जयशंकर प्रसाद। ‘झरना’, ‘लहर’ और ‘कामायनी’ से कुछ पंक्तियाँ रखी जा रही हैं। ‘तृप्ति’ के अर्थ की दिशा को स्पष्ट रूप से समझने के लिए इन कविताओं को या प्रसंगों को आगे-पीछे मिलाकर पढ़ना होगा। प्रसाद के प्रेमी पाठक ‘कर्म’ सर्ग की उस पंक्ति को ख़ूब याद करते हैं, ‘और एक फिर व्याकुल चुम्बन रक्त खौलता जिससे’ इसी की अगली पंक्ति नीचे दी गयी है, जिसमें ‘तृप्ति’ शब्द आया है,‘शीतल प्राण धधक उठता है तृषा-तृप्ति के मिस से’। यहाँ मनु-श्रद्धा का चुम्बन-प्रसंग है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि प्रसाद की ‘तृप्ति’ और ‘अतृप्ति’ में काम-चेतना का मुखर रूप व्यक्त हुआ है। नीचे उद्धृत काव्य-पंक्तियों को प्रसंग के साथ पढ़ा-समझा जाए तो इस बात को मानने में कोई असुविधा नहीं होगी कि प्रसाद का मन-मिजाज इन दोनों शब्दों के अर्थ-परिसर को काम-भावना से निर्मित करता है,
जहाँ सुख मिला न उससे तृप्ति, स्वप्न सी आशा मिली सुषुप्ति : प्र.ग्रं.-1/244 असन्तोष/झरना
तृप्ति में आशा बढ़ती थी, चन्द्रिका में बढ़ता था ध्वान्त : प्र.ग्रं.-1/266 झील में/झरना
चिर तृषित कंठ से तृप्ति विधुर : प्र.ग्रं.-1/318 मुझको न मिला रे कभी प्यार/लहर
हम भूख-प्यास से जाग उठे,/आकांक्षा-तृप्ति समन्वय में; : प्र.ग्रं.-2/105,काम/कामायनी
जहाँ हृदय की तृप्ति विलासिनी मधुर-मधुर कुछ गावे : प्र.ग्रं.-2/149,कर्म/कामायनी
शीतल प्राण धधक उठता है तृषा-तृप्ति के मिस से : प्र.ग्रं.-2/154, कर्म/कामायनी
तुम्हें तृप्ति-कर सुख के साधन सकल बताया : प्र.ग्रं.-2/206, संघर्ष/कामायनी
जिज्ञासा हो सकती है कि निराला और पन्त की कविताओं में ‘तृप्ति’ शब्द के प्रयोग का दायरा किस प्रकार का है! पन्त में इस शब्द का प्रयोग एक जगह मिला,
कभी तृप्ति-सी हो फिर पीन : पं.ग्रं.-1/206, छाया/पल्लव
निराला के ज्यादातर प्रयोगों में भी इस शब्द के अर्थ की त्वरा काम-भावना से प्रेरित है। नीचे के प्रयोगों में केवल ‘पंचवटी प्रसंग’ की पंक्ति में ‘माता की तृप्ति’ का संबंध वात्सल्य भाव से है अन्यथा शेष प्रयोग एक-जैसी दिशा में ही हैं,
माता की तृप्ति मेरे लिए अष्ट सिद्धियाँ : नि.र.-1/54, पंचवटी प्रसंग:2
तृप्तिहीन तृष्णा से : नि.र.-1/93, यहीं
तृप्ति वह तृष्णा की अविकृत : नि.र.-1/141, स्मृति
हृदय की तृप्ति, प्यास,/दोनों एक साथ ही/ उड़तीं वातास में- : नि.र.-1/204, कवि
हृदय-कम्प के जलद-मन्द्र स्वर/मेरी तृष्णा के, करुणाकर/ तृप्ति-प्रेम-सर हे : नि.र.-1/218, नयनों में हेर प्रिये
[2]
‘प्यास’ शब्द का प्रयोग काम-चेतना को प्रकट करने के लिए किया जाता रहा है। इसका प्रयोग महादेवी और प्रसाद ने ज्यादा बार किया है, निराला ने कम ही बार किया है और पन्त में यह प्रायः नहीं मिलता है। महादेवी के प्रयोग का दायरा अपने उसी अज्ञात-अनंत को लेकर है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि यही एक शब्द है जहाँ महादेवी का अर्थ-बोध आंशिक रूप से काम-चेतना को छूता हुआ मालूम पड़ता है। अन्यथा उनकी कविताएँ अपने अर्थ-गौरव में इस पक्ष से सदैव परहेज करती हैं। यह बात खुलकर नहीं कही जा सकती है कि महादेवी का आशय काम-वासना से जुड़ा है। ‘प्यास’ शब्द का प्रयोग उन्होंने अपने पाँचों संग्रहों में किया है। महादेवी के प्रयोगों को इन पंक्तियों में पढ़ा जा सकता है। सन्दर्भ को स्पष्ट रूप से समझने के लिए उन कविताओं को पढ़ा जा सकता है जहाँ ‘प्यास’ शब्द के प्रयोग मिलते हैं,
बुझते ही प्यास हमारी/पल में विरक्ति जाती बन : म.सा.-1/109 चिर तृप्ति कामनाओं का/रश्मि
व्यथा मीठी ले प्यारी प्यास/सो गया बेसुध अंतर्नाद : म.सा.-1/36, ढुलकते आँसू सा सुकुमार/नीहार
अगणित युगों की प्यास का/अब नयन अंजन सार ले! : म.सा.- म.सा.-1/172 शृंगार कर ले री सजनि!/नीरजा
हँस डुबा देगा युगों की प्यास का संसार भर तू : म.सा.-1/262 रे पपीहे पी कहाँ?/सांध्य गीत
दौड़ती क्यों प्रति शिरा में प्यास विद्युत-सी तरल बन? : म.सा.-1/341 जो न प्रिय पहिचान पाती!/दीप-शिखा
नयन-पथ से स्वप्न में मिल,/प्यास में घुल साध में खिल : म.सा.-1/353 अलि कहाँ सन्देश भेजूँ!/दीप-शिखा
प्यास वह पानी हुई इस पुलक में उन्मेष में! : म.सा.-1/343 आँसुओं के देश में/दीप-शिखा
बनता है इतिहास मिलन का/प्यास भरे अभिसार अकथ में! : म.सा.-1/375 मैं पलकों में पाल रही हूँ/दीप-शिखा
प्रसाद ने ‘आँसू’, ‘लहर’, ‘कामायनी’ से लेकर नाटकों के गीतों में ‘प्यास’ शब्द का प्रयोग प्रायः काम-चेतना के सन्दर्भ में किया है। प्रसाद के प्रयोगों में स्पष्टता है कि यह शब्द प्रेम, वियोग, प्रिय-मिलन आदि से जुड़ा है,
लहरों में प्यास भरी है/ है भँवर पात्र भी खाली : प्र.ग्रं.-2/14, आँसू
अधर में वह अधरों की प्यास : प्र.ग्रं.-1/305, आह रे, वह अधीर यौवन/लहर
द्विधा-रहित अपलक नयनों की/भूख भरी दर्शन की प्यास : प्र.ग्रं.-2 /58, चिंता/कामायनी
इड़ा ढालती थी वह आसव, जिसकी बुझती प्यास नहीं : प्र.ग्रं.-2/191, स्वप्न/कामायनी
बुद्धि, विभूति सकल सिकता-सी प्यास लगी है ओस चाटती : प्र.ग्रं.-2/261, रहस्य/कामायनी
हम भूख-प्यास से जाग उठे,/आकांक्षा-तृप्ति समन्वय में, : प्र.ग्रं.- 2/105, काम/कामायनी
है वहाँ महानद निर्मल जो मन की प्यास बुझाता : प्र.ग्रं.-2/270, आनन्द/कामायनी
है वहाँ महाह्रद निर्मल जो मन की प्यास बुझाता : प्र.ग्रं.-2/270, आनन्द/कामायनी
रस-निधि में जीवन रहा, मिटी न फिर भी प्यास : प्र.ग्रं.-4/129, पंचम अंक/स्कन्दगुप्त
‘प्यास’ का अर्थ देनेवाला एक शब्द है ‘तृषा’। इससे बने हुए कुछ शब्दों के प्रयोग छायावादी कविता में मिलते हैं, जैसे – तृषित, तृष्णा, तृषातुर, तृष्णाकुल, तृष्णापर, तृष्णोद्धत, तृष्णार्त, तृष्णाशा, तृष्णा-जनित, तृषा-तृप्ति। इनमें से केवल ‘तृषित’ शब्द महादेवी की ‘नीरजा’ में आया है। शेष शब्द शेष तीनों छायावादियों के पास हैं और इसके सर्वाधिक रूपों के प्रयोग निराला से सधे हैं। सब के उदाहरण यहाँ दिए जा रहे हैं ताकि प्रमाण बने रहें,
महादेवी :
नयन में जिसके जलद वह तृषित चातक हूँ : म.सा.-1/177 बीन भी हूँ मैं तुम्हारी/नीरजा
पी गया उसको अपरिचित/तृषित दरका पंक का उर : म.सा.-1/218 क्या नई मेरी कहानी!/नीरजा
निराला :
कहाँ यहाँ अस्थिर तृष्णा का : नि.र.-1/124, यमुना के प्रति
किस विनोद की तृषित गोद में : नि.र.-1/115, यमुना के प्रति
तपन-ताप-सन्तप्त तृषातुर : नि.र.-1/65, जलद के प्रति
तृष्णाकुल होंगे प्रिय, जाओ : नि.र.-1/222,स्नेह की सरिता के तट पर
होंगे भारत पर इस प्रकार तृष्णापर : नि.र.-1/288, तुलसीदास
तृष्णोद्धत, स्पर्धागत, सगर्व/क्षत्रिय रक्षा से रहित सर्व : नि.र.-1/287, तुलसीदास
दूर हो दुरित, जो जग/जागा तृष्णार्त ज्ञान! : नि.र.-1/267, फूटो फिर
बुझे तृष्णाशा- विषानल झरे भाषा अमृत-निर्झर : नि.र.-1/245, बुझे तृष्णाशा-विषानल झरे
वह स्वरूप-मध्याह्न-तृषा का : नि.र.-1/123, यमुना के प्रति
पन्त :
गिरकर प्रबल तृषा के भार : पं.ग्रं.-1/194, अनंग/पल्लव
तृषा तुम, यदि मैं चातक पाँति : पं.ग्रं.-1/95, बताऊँ मैं कैसे सुन्दर!/वीणा
तृषित चातक को तरसता देखकर : पं.ग्रं.-1/130, ग्रन्थि
मिली तृषा सरिता की गति में : पं.ग्रं.-1/193, अनंग/पल्लव
स्वाति तृषा सीखी चातक ने : पं.ग्रं.-1/193, अनंग/पल्लव
प्रसाद :
चिर तृषित कंठ से तृप्ति विधुर : प्र.ग्रं.-1/318 मुझको न मिला रे कभी प्यार/लहर
तप में संयम का संचित बल/तृषित और व्याकुल था आज; : प्र.ग्रं.-2/77, आशा/कामायनी
तृष्णा वह अनलशिखा बन – : प्र.ग्रं.-1/329 अशोक की चिंता/लहर
नियति चलाती कर्म-चक्र यह तृष्णा-जनित ममत्व-वासना : प्र.ग्रं.-2/258, रहस्य/कामायनी
बस इतना ही भाग तुम्हारा तृषा ! मृषा, वंचित होने दो : प्र.ग्रं.-2/262,रहस्य/कामायनी
मथ डाला किस तृष्णा से/तल में बड़वानल जलता : प्र.ग्रं.-2/21आँसू
शीतल प्राण धधक उठता है तृषा-तृप्ति के मिस से : प्र.ग्रं.-2/154, कर्म/कामायनी
[3]
इस प्रसंग में ‘वासना’ से ज्यादा अच्छा शब्द भला क्या होगा! ‘वासना’ भी प्रसाद में सबसे अधिक है। उनसे आधी मात्रा में निराला के पास है और पंत में काम चलाने भर! महादेवी ‘वासना’ से मुक्त हैं। पन्त के इस प्रयोग में भी उस तरह की वासना की गंध नहीं है,
विपुल वासना विकच विश्व का मानस शतदल : पं.ग्रं.-1/225, परिवर्तन/पल्लव
निराला का सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रयोग है ‘यामिनी जागी’ की पंक्ति,
वासना की मुक्ति, मुक्ता/त्याग में तागी : नि.र.-1/253, (प्रिय) यामिनी जागा
वासनाएँ समल निर्मल— /कर्दममय राशि-राशि : नि.र.-1/183, जागरण
वासना-प्रेयसी बार-बार/श्रुति-मधुर मन्द स्वर से पुकार : नि.र.-1/196, प्रभाती
वासना-मंजु साधनासीन/आओ मर्म पर, मनोज्ञ भ्रमर! : नि.र.-1/228, आओ मेरे आतुर उर पर
सुवासना उठी प्रिया/आनत-नयना : नि.र.-1/277, देकर अन्तिम कर
‘वासना’ शब्द को उसके सघनतम अर्थ में दुहराते हैं प्रसाद। अलग से कहने की ज़रूरत नहीं है कि छायावादियों में प्रसाद की काम-चेतना सर्वाधिक मुखरित और सघन है। इन प्रयोगों को देखा जा सकता है। इन सब में ‘वासना’ शब्द के अर्थ और आयाम को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है,
उसी वासना की उपासना,/वह तेरा प्रत्यावर्तन : प्र.ग्रं.-2/54, चिंता/कामायनी
गूँजते सब मदिर घन में वासना के गीत : प्र.ग्रं.-2/116, वासना/कामायनी
जाग उठी थी तरल वासना मिला रही मादकता : प्र.ग्रं.-2/145, कर्म/कामायनी
जीवन के दोनों कूलों में बहे वासना धारा : प्र.ग्रं.-2/147, कर्म/कामायनी
जो आकर्षण बन हँसती थी/रति थी अनादि वासना वही : प्र.ग्रं.-2/104, काम/कामायनी
नव हो जगी अनादि वासना/मधुर प्राकृतिक भूख समान : प्र.ग्रं.-2/76, आशा/कामायनी
नियति चलाती कर्म-चक्र यह तृष्णा-जनित ममत्व-वासना : प्र.ग्रं.-2/258, रहस्य/कामायनी
प्रणय विहीन एक वासना की छाया में, : प्र.ग्रं.-1/335 शेरसिंह का शस्त्र-समर्पण/लहर
भरी वासना-सरिता का वह/कैसा था मदमत्त प्रवाह : प्र.ग्रं.-2/56, चिंता/कामायनी
यह सब क्यों फिर? दृप्त-वासना लगी गरजने ऐंठी : प्र.ग्रं.-2/138, कर्म/कामायनी
वासना की मधुर छाया, स्वास्थ्य बल विश्राम : प्र.ग्रं.-2/115, वासना/कामायनी
वासना भरी उन आँखों पर आवरण डाल दे कांतिमान : प्र.ग्रं.-2/166, ईर्ष्या/कामायनी
विकल वासना के प्रतिनिधि वे/सब मुरझाये चले गये; : प्र.ग्रं.-2/58, चिंता/कामायनी
हाँ जलन वासना को जीवन भ्रम तम में पहला स्थान दिया : प्र.ग्रं.-2/175, इड़ा/कामायनी
[4]
इस क्रम में ‘काम’ की आवृत्ति को देखा जाए। यह भी प्रसाद में ही अधिकतम है और उसका आधा निराला में! यह रोचक है कि ‘काम’ और ‘वासना’ की मात्रा प्रसाद में निराला की अपेक्षा दोगुनी है। ‘वासना’ की तरह ही ‘काम’ शब्द महादेवी की कविता में आया ही नहीं है। महादेवी की एक पंक्ति में आया है दुस्तर काम – मुझे क्यों देते हो अभिराम/थाह पाने का दुस्तर काम’ : म.सा.-1/128 किसी नक्षत्रलोक से टूट/रश्मि – यहाँ ‘काम’ शब्द का प्रयोग ‘कार्य’ के अर्थ में हुआ है। वैसे ‘काम’ पंत में भी नहीं है। जाहिर सी बात है कि पंत ‘कामदेव’ का भी जिक्र नहीं करते, हालाँकि ‘पल्लव’ में उनकी एक कविता ही है – ‘अनंग’। बेचारा कामदेव सांगोपांग न आकर ‘अनंग’ ही रहा पंत की कविता में! तीनों पुरुषों ने समान रुचि लेकर ‘रति’ को सराहा है, मगर महादेवी ने ‘रति’ को अपनी कविताओं में आने ही नहीं दिया है और ‘कामदेव’ तो बाहर है ही! उन्हें ‘अनंग’ से भी कुछ लेना-देना नहीं है.
‘काम’ से बने हुए कुछ शब्द यहाँ प्रयुक्त हुए हैं – प्रकाम, कामिनी, कामायनी, सकाम, अकाम, काम-कला-कोविद, कामातुर, पूर्णकाम, कामरूप, रति-काम, काम के सूत, काम-प्रेरणा, काम-बीज.
पन्त :
इसी से सुख अति सरस, प्रकाम : पं.ग्रं.-1/230, परिवर्तन/पल्लव
केशर शर भर दिये सकाम : पं.ग्रं.-1/192, अनंग/पल्लव
कौन हो तुम अकलंक, अकाम : पं.ग्रं.-1/207, शिशु/पल्लव
भू पर कामरूप नभचर : पं.ग्रं.-1/113, प्रथम रश्मि का आना रंगिणि!/वीणा
रूप-तारा तुम पूर्ण प्रकाम : पं.ग्रं.-1/259, रूप-तारा तुम पूर्ण प्रकाम/गुंजन
निराला :
और मैं कान्त-कामिनी-कविता : नि.र.-1/49, तुम और मैं
तबसे सदा नचाया नाच काम की कलित कलाही ने : नि.र.-1/45, बाबा और नाती
तू काम-कला-कोविद : नि.र.-1/63, पंचवटी प्रसंग:5
दूसरे कामातुर किसी/लोलुप प्रतिद्वन्द्वी को? : नि.र.-1/163, महाराज शिवाजी का पत्र
प्रसाद :
काम मंगल से मंडित श्रेय/सर्ग, इच्छा का है परिणाम; : प्र.ग्रं.-2/89, श्रद्धा/कामायनी
काम से झिझक रहे हो आज,/भविष्यत् से बनकर अनजान : प्र.ग्रं.-2/88, श्रद्धा/कामायनी
कामायनि ! तू हृदय कड़ा कर धीरे-धीरे सब सह ले : प्र.ग्रं.-2/186, स्वप्न/कामायनी
कामायनी जगी थी कुछ-कुछ खोकर सब चेतनता : प्र.ग्रं.-2/146, कर्म/कामायनी
कामायनी देख पायी कुछ पहुँची उस तक डग भरती : प्र.ग्रं.-2/219, निर्वेद/कामायनी
कामायनी पड़ी थी अपना कोमल चर्म बिछा के : प्र.ग्रं.-2/140, कर्म/कामायनी
कामायनी मौन बैठी सी अपने में ही उलझ रही : प्र.ग्रं.-2/230, निर्वेद/कामायनी
कामायनी सकल अपना सुख स्वप्न बना-सा देख रही : प्र.ग्रं.-2/189, स्वप्न/कामायनी
कामायनी-कुसुम वसुधा पर पडी, न वह मकरंद रहा : प्र.ग्रं.-2/185, स्वप्न/कामायनी
जन्म संगिनि एक थी जो काम बाला, नाम – : प्र.ग्रं.-2/118, वासना/कामायनी
परम प्रकाश हो, स्वयं ही पूर्णकाम हो : प्र.ग्रं.-1/261 तुम/झरना
पूर्ण काम के मानस में बस, शान्ति-सरोरुह खिलता है : प्र.ग्रं.-3/206 द्वितीय अंक/विशाख
फिर क्यों न हुआ मैं पूर्ण-काम : प्र.ग्रं.-2/175, इड़ा/कामायनी
मैं काम रहा सहचर उनका,/उनके विनोद का साधन था : प्र.ग्रं.-2/103, काम/कामायनी
यह कौन? अरे फिर वही काम! : प्र.ग्रं.-2/175, इड़ा/कामायनी
रति-काम बने उस रचना में/जो रही नित्य यौवन वय में : प्र.ग्रं.-2/105, काम/कामायनी
राम के नहीं, काम के सूत कहलाये! : नि.र.-1/303, तुलसीदास
वह कामायनी विहँसती अग जग था मुखरित होता : प्र.ग्रं.-2/277, आनन्द/कामायनी
श्रद्धा के उत्साह वचन, फिर काम-प्रेरणा मिल के : प्र.ग्रं.-2/134, कर्म/कामायनी
सृष्टि के कारण वे,/कविता के काम-बीज : नि.र.-1/174, रेखा ‘क’
हुए चपल मृगनैन मोह-वश बजी विपंची काम की : प्र.ग्रं.-4/283 चतुर्थ अंक/चन्द्रगुप्त
हुए चपल मृगनैन मोह-वश बजी विपंची काम की : प्र.ग्रं.-4/283 चतुर्थ अंक/चन्द्रगुप्त
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कुछ और शब्द ऐसे हैं जिनके प्रयोग पर बात करना इस लेख के सन्दर्भ में प्रासंगिक होगा। कवि की ‘तृप्ति’, ‘अतृप्ति’ या काम-चेतना को देखने-परखने में प्रयुक्त शब्दों के बारे में बात करना एक सार्थक रास्ता है। शब्दों के बारे में बात करने पर कई बार यह सुनने को मिला कि आप भाव को देखिए। शब्दों के प्रयोग और आवृत्ति को महत्त्व देने के बजाय भाव पर ध्यान दिया जाना चाहिए। पूछा जा सकता है कि भाव को आधार कहाँ से प्राप्त होता है? यह बहस पुरानी हो चुकी है कि कविता शब्द से बनती है या वाक्य से? कविता वाक्य से बने या भाव को प्रधानता दी जाए तब भी शब्द की भूमिका से इंकार कैसे किया जा सकता है। इन सब को व्यक्त करने में शब्द की अकाट्य भूमिका है। छायावादी काव्य-भाषा को ध्यान में रखते हुए काम-चेतना से जुड़े शब्दों पर यहाँ विचार किया जा रहा है। इसी से जुड़े शब्द हैं ‘प्रेम’, ‘प्रणय’, ‘प्रीति’ और ‘अनुराग’। इन शब्दों के प्रयोग चारों छायावादियों में हैं मगर महादेवी में कुल मिलाकर बहुत कम। इन चार शब्दों को प्रसाद, निराला और पन्त में देखा जाए तो लगभग डेढ़ सौ प्रयोग मिलते हैं। यह सब देखते हुए कहा जा सकता है कि महादेवी का रुझान इन शब्दों के प्रति कम है। इन चारों शब्दों को महादेवी की काव्य-पंक्तियों में बोल्ड अक्षरों में रखा जा रहा है ताकि इनके प्रयोगों को सन्दर्भ के साथ पढ़ा जा सके। यहाँ महादेवी की लगभग एक दर्जन काव्य-पंक्तियाँ रखी जा रही हैं। चार शब्दों के केवल इतने ही प्रयोग! हो सकता है कि कुछ पंक्तियाँ मुझसे छूट गयी हों, मगर उनकी संख्या दो-चार से ज्यादा नहीं होगी!
किस प्रेममय दुख से हृदय में/अश्रु में मिश्री घुली?’ : म.सा.-1/265 पंकज-कली!/सांध्य गीत
हमारा वह सोने का स्वप्न/प्रेम की चमकीली आकर’ : म.सा.-1/71 स्वर्ग का था नीरव उच्छ्वास/नीहार
प्रथम प्रणय की सुषमा सा/यह कलियों की चितवन में कौन?’ : म.सा.-1/94 प्रथम प्रणय की सुषमा सा/नीहार
मूक प्रणय से, मधुर व्यथा से,/स्वप्नलोक के से आह्वान’ : म.सा.-1/30 रजत करों की मृदुल तूलिका/नीहार
तू अकिंचन भिक्षुक है मधु का/अलि तृप्ति कहाँ जब प्रीति नहीं’ : म.सा.-1/129 इन आँखों ने देखी न राह कहीं/रश्मि
अंगार-खिलौनों का था मन अनुरागी’ : म.सा.-1/339 तू धूल-भरा ही आया! /दीप-शिखा
अनुराग भरा उन्माद राग/आँसू लेते वे पद पखार’ : म.सा.-1/95 जो तुम आ जाते एक बार/नीहार
आती भर मदिरा से गगरी/संध्या अनुराग सुहागभरी’ : म.सा.-1/199 कैसे संदेश प्रिय पहुँचाती! /नीरजा
तुम हो सुधाधारा सदा/सूखे हुए अनुराग को’ : म.सा.-1/85 विस्मृति तिमिर में दीप हो/नीहार
प्रिय के अनंत अनुराग भरी!’ : म.सा.-1/304 सखि मैं हूँ अमर सुहाग भरी! / सांध्य गीत
बह रहे आराध्य चिन्मय/मृण्मयी अनुरागिनी मैं!’ : म.सा.-1/283 प्रिय चिरंतन है सजनि/सांध्य गीत
वह उर जिसका अनुराग-कंज/मुँदकर न हुआ मधुहीन दीन’ : म.सा.-1/161 बीते वसंत की चिर-समाधि! / रश्मि
हँसता अनुराग का इंदु सदा’ : म.सा.-1/130 इन आँखों ने देखी न राह कहीं/रश्मि
महादेवी के इन प्रयोगों को अर्थ की दृष्टि से देखा-परखा जाए तो उनमें ‘तृप्ति’ या ‘अतृप्ति’ जैसी कोई बात दिखायी नहीं पड़ती है। इस मामले में प्रसाद और निराला की चेतना काम-भावना की अनेक भंगिमाओं को प्रकट करने में सक्षम है।
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काम-चेतना एक ऐसा विषय है जिसमें स्त्री और पुरुष की उपस्थिति किसी न किसी रूप में आवश्यक है। उस उपस्थिति का रूप भले ही दूसरों से भिन्न हो, मगर उनका होना जरूरी है। छायावादी कविता अपने स्वभाव में स्त्रीवाची है। इस काव्यधारा ने प्रकृति को प्रायः स्त्री-रूप में देखा है। तीनों छायावादी पुरुष कवियों की कविताओं में स्त्री अनेक रूपों में उपस्थित है। महादेवी स्वयं स्त्री हैं और वे स्वयं अपनी ज्यादातर कविताओं में उपस्थित हैं। उनकी उपस्थिति निःसंदेह स्त्री के रूप में ही है। महादेवी का ‘प्रिय’ है तो पुलिंगवाची मगर उसके पुरुष-रूप का कोई विवरण वहाँ नहीं मिलता है। उदाहरण के लिए ‘जो न प्रिय पहिचान पाती!’ कविता पर विचार कर सकते हैं। इसमें महादेवी का दावा है कि वे अपने ‘प्रिय’ को अच्छी तरह से पहचानती हैं। मगर वे अपने ‘प्रिय’ (पुलिंगवाची) के रूप या स्वरूप के बारे में कुछ भी नहीं बताती हैं, बल्कि उसके प्रभाव से महादेवी में जो अनुभाव उत्पन्न हो रहे हैं उन सबके बारे में बात करती हैं। उनकी शिरा या रोम या साँस की कैसी स्थिति है; वे बताती हैं,
जो न प्रिय पहिचान पाती।
दौड़ती क्यों प्रति शिरा में प्यास विद्युत-सी तरल बन
क्यों अचेतन रोम पाते चिर व्यथामय सजग जीवन?
किसलिये हर साँस तम में
सजल दीपक राग गाती?
मगर वे अपने स्त्री-रूप को स्पष्ट रूप से प्रकट करती हैं। उदाहरण के लिए ‘जाने किस जीवन की सुधि ले’ कविता पर बात करें! इस कविता में वे बताती हैं कि अशोक की लाली से उनके चरण रँगे जाएँगे, रजनीगंधा के पराग से उनका शृंगार होगा, यूथी की कलियों से उनकी चोटी सजायी जाएगी,
जाने किस जीवन की सुधि ले
लहराती आती मधु-बयार!
रंजित कर दे यह शिथिल चरण, ले नव अशोक का अरुण राग,
मेरे मण्डन को आज मधुर, ला रजनीगन्धा का पराग;
यूथी की मीलित कलियों से
अलि, दे मेरी कबरी सँवार।
नामवर सिंह की पुस्तक ‘छायावाद’ में एक अध्याय है ‘देवि माँ सहचरि प्राण’ (हालाँकि पन्त की पंक्ति है – ‘देवि! मा! सहचरि! प्राण!’)। इसमें उन्होंने छायावाद में स्त्री की स्थिति पर विचार किया है। उन सामाजिक पक्षों पर भी बात की है जिनमें स्त्री पराधीनता से मुक्त हो रही है और नये युग का निर्माण कर रही है। तीनों पुरुष कवियों की कविताओं से कई उदाहरण लिए गए हैं और यह बताने के प्रयास हुए हैं कि छायावादी कविता स्त्री मुक्ति का पक्ष ले रही थी। इस अध्याय में महादेवी वर्मा का जिक्र एक बार भी नहीं हुआ है। जाहिर-सी बात है कि उनकी कविता की भी चर्चा नहीं हुई है। विचारणीय है कि स्त्री मुक्ति के प्रश्न पर या स्त्री-पक्ष पर छायावादी कविता की चर्चा करते हुए क्या महादेवी को एक सिरे से छोड़ दिया जा सकता है? सीधा उत्तर होगा, एकदम नहीं। मगर नामवर सिंह की यह किताब ऐसा करती है।
पुनः विचार करते हैं ‘तृप्ति’ और ‘अतृप्ति’ के प्रश्न पर। फिर से शब्दों की पड़ताल करते हैं। ‘पुरुष’ और ‘नारी’ शब्द के विवरण को यहाँ देखना प्रासंगिक होगा। महादेवी की कविताओं में न तो ‘पुरुष’ है और न ही ‘नारी’, जबकि तीनों पुरुष कवियों में ‘पुरुष’ भी है और ‘नारी’ भी। ‘पुरुष’ और ‘नारी’ के प्रयोग में भी कमायानीकार सबसे आगे है; और केवल उसी की कविता में ‘पौरुष’ और ‘पुरुषत्व’ मिलता है। ‘नारी’ से चोट खाए ‘तुलसीदास’ में निराला ने केवल एक बार इस शब्द का प्रयोग किया है और पंत अपनी एक कविता का शीर्षक-भर दे पाए – ‘नारी रूप’। इसी कविता की अमर पंक्ति है – ‘देवि! मा! सहचरि! प्राण!’ पूरी कविता में केवल एक बार आया है ‘नारि’ –
‘तुम्हारे रोम-रोम से, नारि!
मुझे है स्नेह अपार;’
‘स्नेह अपार’ के दावे के बावजूद पंत की कविता में ‘नारी’ नहीं आयी। ‘स्त्री’ शब्द का प्रयोग चारों में से किसी नहीं किया है!
‘पुरुष’ शब्द को तीनों पुरुष छायावादियों में देखिए,
पन्त :
पुरुष-प्रकृति पिता-मात : पं.ग्रं.-1/348, चार/ज्योत्स्ना
मत्त गज-से पुरुष को जिसने नहीं : पं.ग्रं.-1/131, ग्रन्थि
निराला :
अपने वश में कर पुरुष-देश/है उड़ा रहा ध्वज- मुक्तकेश; : नि.र.-1/295, तुलसीदास
आशीर्वाद पुरुष-पुरातन का : नि.र.-1/81, खँडहर के प्रति
पुरुषकार उपहार में है संयोग से/जिन्हें मिला — : नि.र.-1/159, महाराज शिवाजी का पत्र
बरसो आशीस, हे पुरुष-पुराण : नि.र.-1/81, खँडहर के प्रति
प्रसाद :
चिर मुक्त पुरुष वह कब इतने अवरुद्ध श्वास लेगा निरीह : प्र.ग्रं.-2/161, ईर्ष्या/कामायनी
तुम भूल गये पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की : प्र.ग्रं.-2/174, इड़ा/कामायनी
मनु, वह क्रतुमय पुरुष! वही मुख सन्ध्या की लालिमा पिये : प्र.ग्रं.-2/191, स्वप्न/कामायनी
रचना-मूलक सृष्टि-यज्ञ यह यज्ञ-पुरुष का जो है : प्र.ग्रं.-2/151, कर्म/कामायनी
लद गयी पाकर पुरुष का नर्ममय उपचार : प्र.ग्रं.-2/119, वासना/कामायनी
वह चन्द्र किरीट रजत नग स्पन्दित-सा पुरुष पुरातन : प्र.ग्रं.-2/280, आनन्द/कामायनी
वह रजत गौर, उज्ज्वल जीवन, आलोक पुरुष ! मंगल चेतन ! : प्र.ग्रं.-2/246, दर्शन/कामायनी
इसी तरह ‘नारी’ शब्द को तीनों पुरुष छायावादियों में देखिए,
तुम्हारे रोम-रोम से, नारि! मुझे है स्नेह अपार; – पन्त
निराला :
लाज का आज भूषण, अक्लम, नारी का; : नि.र.-1/301, तुलसीदास
प्रसाद :
और वह नारीत्व का जो मूल मधु अनुभाव : प्र.ग्रं.-2/119, वासना/कामायनी
जिसमें इतराई फिरती/नारी निसर्ग सुन्दरता; : प्र.ग्रं.-2/34, आँसू
तुम भूल गये पुरुषत्व मोह में कुछ सत्ता है नारी की : प्र.ग्रं.-2/174, इड़ा/कामायनी
नारी का वह हृदय ! हृदय में सुधा-सिंधु लहरें लेता : प्र.ग्रं.-2/215, निर्वेद/कामायनी
नारी के नयन ! त्रिगुणात्मक ये सन्निपात : प्र.ग्रं.-1/343 प्रलय की छाया/लहर
नारी जीवन का चित्र यही क्या?विकल रंग भर देती हो : प्र.ग्रं.-2/129, लज्जा/कामायनी
नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में : प्र.ग्रं.-2/130, लज्जा/कामायनी
बनेगा चिर-बंध नारी हृदय हेतु सदैव : प्र.ग्रं.-2/119, वासना/कामायनी
मैं भूला हूँ तुमको निहार, नारी सा ही ! वह लघु विचार : प्र.ग्रं.-2/244, दर्शन/कामायनी
यह आज समझ तो पायी हूँ मैं दुर्बलता में नारी हूँ : प्र.ग्रं.-2/128, लज्जा/कामायनी
रूप-चंद्रिका में उज्ज्वल थी आज निशा-सी नारी : प्र.ग्रं.-2/145, कर्म/कामायनी
वह अतिचारी, दुर्बल नारी परित्राण-पथ नाप उठी! : प्र.ग्रं.-2/192, स्वप्न/कामायनी
विश्व रानी ! सुंदरी नारी ! जगत की मान ! : प्र. ग्रं.-2/119, वासना/कामायनी
इस तरह ‘तृप्ति’ हो या ‘अतृप्ति’, ‘प्यास’ हो या ‘तृषा’, ‘काम’ हो या ‘वासना’, ‘प्रेम’ हो या ‘प्रणय’, ‘पुरुष’ हो या ‘नारी’ – प्रसाद छायावादियों में सबसे आगे हैं और महादेवी इन सबसे सर्वाधिक मुक्त।
शब्दों के उपर्युक्त चयन से भी इन कवियों की प्रवृत्तियों की पुष्टि की जा सकती है। महादेवी का ‘प्रिय’ तो है जिससे वे पूछती हैं – ‘कौन तुम मेरे हृदय में ?’, मगर वह ‘पुरुष’ या ‘नारी’ के रूप में चिह्नित नहीं है। उससे महादेवी का जो रिश्ता है उसमें ‘प्रेममय दुख’ तो है मगर ‘काम’ या ‘वासना’ के लिए जगह नहीं है। पंत की प्रेम भावना में पुरुष-नारी हैं जरूर, मगर उनमें ‘अनंग-भाव’ की प्रधानता है! निराला का ‘प्रेम’ सांसारिक के साथ-साथ दार्शनिक भी है। इस मामले में शीर्ष पर हैं जयशंकर प्रसाद। ‘प्रेम’ के जितने भी पक्ष इन शब्दों के माध्यम से खुल सकते हैं वे सब उनकी कविताओं में खूबसूरती से व्यक्त हुए हैं।
नामवर सिंह की उस पंक्ति को एक बार फिर से सामने रखकर विचार किया जाए कि “पहले जहाँ ‘अतृप्ति’ की प्रधानता थी, बाद में तृप्ति का काल्पनिक आनन्द अनुभव किया जाने लगा.” महादेवी की ‘अतृप्ति’ का क्या अर्थ निकाला जाए? इसके बाद ‘तृप्ति का काल्पनिक आनन्द’ को ध्यान में रखकर सोचा जाए कि तृप्ति का ‘वास्तविक’ आनन्द क्या होता है? एक अविवाहित या दाम्पत्य-रहित स्त्री ‘अतृप्त’ मान ली गयी। उसकी कविता में संतुष्टि का भाव यदि प्रकट हो गया तो उसे ‘तृप्ति का काल्पनिक आनन्द’ मान लिया गया। ‘वास्तविक’ तब माना जाता जब वह विवाहित होती या उसके पुरुष-साथी के बारे में आलोचक को ठीक-ठीक पता होता या भनक ही मिली होती!
नामवर सिंह की पुस्तक ‘छायावाद’ एक ऐसी कृति है जिसका कोई जोड़ आज तक पैदा नहीं हो सका। यह किताब आज भी अपने विषय के लिए सर्वोत्तम है। मगर महादेवी की कविताओं के साथ यह किताब ठीक से न्याय नहीं कर पाती है!
संदर्भ : सभी संदर्भ निम्नलिखित ग्रंथावलियों से लिए गए हैं -
- प्र.ग्रं। – जयशंकर प्रसाद ग्रन्थावली (कुल 7 खंड), संपादक : ओमप्रकाश सिंह, प्रकाशन संस्थान, दरियागंज, नयी दिल्ली, 2014 (इस लेख में खंड संख्या 1 एवं 2 का उपयोग किया गया है)
- नि.र। – निराला रचनावली (कुल 8 खंड), सम्पादक : नन्दकिशोर नवल, राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली, 1998 (इस लेख में खंड संख्या 1 का उपयोग किया गया है)
- पं.ग्रं। – सुमित्रानंदन पंत ग्रन्थावली (कुल 7 खंड), राजकमल प्रकाशन, दरियागंज, नयी दिल्ली, 2011 (इस लेख में खंड संख्या 1 एवं 2 का उपयोग किया गया है)
- म.सा। – महादेवी साहित्य (कुल 4 खंड), सम्पादक : निर्मला जैन, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2007 (इस लेख में खंड संख्या 1 का उपयोग किया गया है)
- [i] छायावाद – नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 1993, पृ। – 146
कमलेश वर्मा
A-20, सन्धिनी, त्रिदेव कॉलोनी, चाँदपुर, वाराणसी - 221106
09415256226, kamleshvermajnu@gmail.com
सम्प्रति : प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष – हिन्दी विभाग
राजकीय महिला महाविद्यालय, सेवापुरी, वाराणसी -221403
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
अतिथि सम्पादक : बृजेश कुमार यादव सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव

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