इतिहासबोध और ‘दूसरी परम्परा’ : नामवर सिंह की इतिहासदृष्टि
- शुभनीत कौशिक
इतिहासकार ई.एच. कार ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘इतिहास क्या है’ में इतिहास के बारे में राय देते हुए लिखा है कि ‘इतिहास, इतिहासकार और उसके तथ्यों की क्रिया-प्रतिक्रिया की एक अनवरत प्रक्रिया है, अतीत और वर्तमान के बीच एक अंतहीन संवाद है।’[1] दिवंगत आलोचक नामवर सिंह के विचारोत्तेजक कृतित्व से गुजरते हुए हम ऐतिहासिक तथ्यों, विचार-प्रणालियों और इतिहासबोध के बीच क्रिया-प्रतिक्रिया की इस प्रक्रिया के साथ-साथ अतीत और वर्तमान के बीच संवादों से भी रू-ब-रू होते हैं। हिन्दी साहित्य, समकालीन राजनीति व समाज, इतिहास के तमाम पक्षों पर नामवर सिंह के लेख, भाषण, वक्तव्य आदि उनकी संवादप्रियता की बानगी देते हैं। अकारण नहीं कि उनके निबंधों के एक संकलन का शीर्षक ही है ‘वाद विवाद संवाद’। इसी संकलन की ‘अनभै साँचा’ शीर्षक वाली भूमिका में वाद विवाद संवाद को नामवरजी ने आलोचना का ‘स्वधर्म’ कहा है। वे लिखते हैं, ‘आलोचना-कर्म वाद विवाद संवाद नहीं तो और क्या है? लेखक-आलोचक के बीच। आलोचक-आलोचक के बीच। मौखिक हो या कि लिखित।’[2]
नामवर सिंह के प्रिय साहित्यकार और आलोचक मुक्तिबोध ने भी साहित्य के मूल्यांकन की कसौटियों की चर्चा करते हुए इतिहासबोध की महत्ता को रेखांकित किया है। 1955 में ‘नई दिशा’ में प्रकाशित एक लेख में मुक्तिबोध ने ज़ोर देकर लिखा कि ‘किसी भी साहित्य का ठीक-ठीक विश्लेषण तब तक नहीं हो सकता जब तक हम उस युग की मूल गतिमान शक्तियों से बनने वाले सांस्कृतिक इतिहास को ठीक-ठीक न जान लें।’ ‘मध्ययुगीन भक्ति आंदोलन का एक पहलू’ शीर्षक वाले इस लेख में मुक्तिबोध ने आगे यह भी लिखा कि ‘किसी भी साहित्य को हमें तीन दृष्टियों से देखना चाहिए। एक तो यह कि वह किन सामाजिक और मनोवैज्ञानिक शक्तियों से उत्पन्न है, अर्थात वह किन शक्तियों के कार्यों का परिणाम है, किन सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रियाओं का अंग है? दूसरे यह कि उसका अंतःस्वरूप क्या है, किन प्रेरणाओं और भावनाओं ने उसके आंतरिक तत्त्व रूपायित किए हैं? तीसरे उसके प्रभाव क्या हैं, किन सामाजिक शक्तियों ने उसका उपयोग या दुरुपयोग किया है और क्यों? साधारण जन के किन मानसिक तत्त्वों को उसने विकसित या नष्ट किया है?’[3]
कहना न होगा कि मूल गतिमान शक्तियों से निर्मित होने वाले सांस्कृतिक इतिहास की गहरी समझ हमें ‘छायावाद’ से लेकर ‘दूसरी परम्परा की खोज’ तक नामवर सिंह की कालजयी कृतियों में देखने को मिलती है। वे चाहे हिन्दी नवजागरण पर लिख रहे हों, या सांस्कृतिक उपनिवेशवाद पर या राष्ट्रवाद व उपन्यास के अंतरसंबंधों पर, नामवर सिंह की दृष्टि लगातार सामाजिक-मनोवैज्ञानिक शक्तियों, सांस्कृतिक प्रक्रियाओं और राजनीतिक आयामों पर बनी रहती है। इस लेख में उपनिवेशवाद और प्रति-उपनिवेशीकरण, प्राच्यवाद, उपन्यास और राष्ट्र, हिन्दी नवजागरण संबंधी उनके विचारों के विश्लेषण किया जाएगा।
सांस्कृतिक उपनिवेशवाद के विरुद्ध -
बीसवीं शती के अंतिम दशक में भारतीय साहित्य की दिशा व दशा पर विचार करते हुए उसके सम्मुख प्रस्तुत चुनौतियों की गहन चर्चा नामवर सिंह ने ‘सांस्कृतिक उपनिवेशवाद के खिलाफ़’ शीर्षक वाले अपने लेख में की है। यह वही समय है जब भारत में आर्थिक उदारीकरण की मुहिम ने ज़ोर पकड़ा। इसी समय भारत की आर्थिक समस्याओं के रामबाण के रूप में वैश्वीकरण और निजीकरण की नीति भी उदारीकरण के साथ प्रस्तुत की गई। बाद के दशकों के अनुभव इसके विपरीत ही रहे। उदारीकरण की इस प्रक्रिया से विकास दर और सेंसेक्स में भले ही तेजी आई हो, लेकिन आर्थिक विषमता और गरीबी की समस्या ने पहले से कहीं अधिक व्यापक रूप ले लिया। विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर भारत जैसे देशों की निर्भरता भी इन वर्षों में पहले से कहीं अधिक बढ़ गई।
साहित्य और मानविकी की दुनिया भी इन विश्वव्यापी बदलावों से अछूती नहीं रही। इन्हीं बदलावों का जायजा नामवर सिंह अपने लेख में लेते हैं। इस क्रम में वे ‘कॉमनवेल्थ लिटरेचर’, ‘पोस्ट-कॉलोनियल लिटरेचर’ जैसी सैद्धान्तिक संकल्पनाओं का ज़िक्र करते हुए ‘तृतीय विश्व साहित्य’ (थर्ड वर्ल्ड लिटरेचर) का उल्लेख करते हैं। इस संकल्पना को गेटे के ‘विश्व साहित्य’ की परिकल्पना का नवीन रूपांतर बताते हुए भी वे आगाह करते हैं कि ‘एक तरह से यह प्रथम विश्व साहित्य का वर्चस्व क़ायम रखने की एक नई चाल है और ध्यान से देखें तो ‘तृतीय विश्व साहित्य’ की संकल्पना उपनिवेशोत्तर युग का नया प्राच्यवाद है।’[4] उल्लेखनीय है कि 1978 में प्रकाशित अपनी चर्चित कृति ‘ओरिएंटलिज़्म’ में एडवर्ड सईद औपनिवेशिक युग के प्राच्यवाद की सीमाओं और उपनिवेशों पर अपना वर्चस्व क़ायम रखने हेतु औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा प्राच्यवाद के इस्तेमाल की गहन पड़ताल कर चुके थे।
इस किताब में एडवर्ड सईद उस ऐतिहासिक परिघटना का विश्लेषण करते हैं, जिसके अंतर्गत पश्चिमी दुनिया ने अपनी आत्म-छवि, विचारों, धारणाओं, व्यक्तित्व और अनुभवों के ठीक उलट प्राच्य (ओरिएंट) की छवि गढ़ी। इस छवि निर्माण में आरंभ से ही ‘हम’ और ‘वे’ (दूसरे शब्दों में, ‘स्व’ तथा ‘अन्य’) का भाव निहित था। ‘ओरिएंटलिज़्म’ से एडवर्ड सईद का अभिप्राय कई बातों से है : मसलन, एक तो ‘ओरिएंटलिज़्म’ वह अकादमिक क्षेत्र है, जहाँ ओरिएंट (प्राच्य) से संबन्धित क्षेत्रों पर शोध हो रहे हैं, जो इतिहास, समाजशास्त्र, भाषाविज्ञान से जुड़े हो सकते हैं। दूसरे, ‘ओरिएंटलिज़्म’ वह विचारशैली है, जो प्राच्य व पाश्चात्य के बीच सत्ता व ज्ञान के स्तरों पर होने वाले विभेद से जुड़ी है। तीसरे, ‘ओरिएंटलिज़्म’ पश्चिमी दुनिया द्वारा प्राच्य देशों पर वर्चस्व स्थापित करने, विचारों के स्तर पर उनकी पुनर्रचना करने और उन पर प्राधिकार का दावा करने से जुड़ा है। अपनी इस किताब में एडवर्ड सईद ब्रिटेन, फ्रांस व अमेरिका में पनपी ज्ञान की उस प्रभावशाली विचारधारा का आलोचनात्मक विश्लेषण करते हैं, जिसने ‘ओरिएंटलिज़्म’ की अवधारणा को समय-समय पर गढ़ने का काम किया। सईद के अनुसार, प्राच्य व पाश्चात्य देशों के बीच का यह संबंध दरअसल सत्ता-सम्बन्धों, वर्चस्व और राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रभुत्व (हेजेमनी) का परिचायक है।[5]
फ्लाबेयर, दे सासी, विलियम जोन्स, अर्न्स्ट रेनन, रिचर्ड बर्टन सरीखे लेखकों की कृतियों की गहराई से समीक्षा करते हुए सईद कुछ बेहद प्रासंगिक सवालों के जवाब देते हैं। मसलन, ‘ओरिएंटलिज़्म’ सरीखी साम्राज्यवादी विचारधाराओं के निर्माण में कौन-सी बौद्धिक, सौंदर्यशास्त्रीय व सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ सक्रिय थीं। भाषाविज्ञान, शब्दकोश, इतिहास, जीवविज्ञान, राजनीतिक व आर्थिक सिद्धांत, उपन्यास, कविता जैसी ज्ञान-विज्ञान की तमाम विधाएँ कैसे ‘ओरिएंटलिज़्म’ की साम्राज्यवादी परियोजना का हिस्सा बन जाती हैं? ‘ओरिएंटलिज़्म’ में समय-समय पर क्या बदलाव, परिष्कार, संशोधन होते रहे हैं और किस तरह ‘ओरिएंटलिज़्म’ ख़ुद को एक कालखंड से दूसरे कालखंड के बीच रूपांतरित करता है? इस संदर्भ में एडवर्ड सईद ने राजनीति व संस्कृति के बीच होने वाली अंतःक्रिया को समझने पर भी ज़ोर दिया। आकस्मिक नहीं कि एडवर्ड सईद की एक अन्य किताब ‘कल्चर एंड इंपीरियलिज़्म’ इन्हीं अंतरसंबंधों की पड़ताल करती है।
साम्राज्यवाद और नए प्राच्यवाद के संदर्भ में ही नामवरजी ने प्रति-उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया पर ज़ोर दिया है। उनके अनुसार, ‘मुद्दा चाहे परम्परा और आधुनिकता का हो, चाहे क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अस्मिता का, रूपगत नए प्रयोगों का हो अथवा लोकधर्मी रूपों के आत्मसात का - इन सबका समाधान प्रति-उपनिवेशीकरण के ही परिप्रेक्ष्य में संभव है।’[6] इस संदर्भ में राष्ट्रवाद की सीमाओं और ख़तरों से अवगत होते हुए भी वे इसकी आवश्यकता पर बल देते हुए कहते हैं कि ‘किसी न किसी रूप में साम्राज्यवाद जब तक जीवित है, राष्ट्रवाद की आवश्यकता बनी रहेगी।’
दूसरी परम्परा की खोज -
वर्ष 1982 में नामवर सिंह की चर्चित कृति ‘दूसरी परम्परा की खोज’ प्रकाशित हुई। वैसे तो यह किताब आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के चिंतन और सृजन में विद्यमान मौलिकता को रेखांकित करने के उद्देश्य से लिखी गई, लेकिन यह किताब अपने समग्र रूप में उस मौलिक इतिहास-दृष्टि की खोज भी है, जो हजारीप्रसाद द्विवेदी की रचनाओं में परिलक्षित होती है। द्विवेदी जी ने अपनी पुस्तक ‘कबीर’ में लिखा है कि ‘जातिगत, कुलगत, धर्मगत, संस्कारगत, विश्वासगत, शास्त्रगत, संप्रदायगत, बहुतेरी विशेषताओं के जाल को छिन्न करके ही वह आसन तैयार किया जा सकता है जहाँ एक मनुष्य दूसरे से मनुष्य की हैसियत से ही मिलें।’ ‘सार-संग्रह’ और ‘समन्वय’ के दृष्टिकोण से सर्वथा अलग इस क्रांतिकारी दृष्टिकोण को ही नामवर सिंह ने ‘दूसरी परम्परा’ का दर्जा दिया है। उनके अनुसार, ‘भारतीय साहित्य की यह दूसरी परम्परा है, जो काल प्रवाह में भले ही गौण हो किन्तु क्रांतिकारी परम्परा यही है; और द्विवेदीजी ने ‘कबीर’ के माध्यम से उस क्रांतिकारी परम्परा को पुनः उद्भासित करके ऐतिहासिक कार्य किया है।’[7] दूसरी परम्परा यानी ‘जाति-धर्म-निरपेक्ष मानव की प्रतिष्ठा की परम्परा’।
‘दूसरी परम्परा की खोज’ पुस्तक के आरंभ में ही नामवर सिंह शांतिनिकेतन में घटित हजारीप्रसाद द्विवेदी के एक जीवन-प्रसंग का उल्लेख करते हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा भारतीय परम्परा के संदर्भ में उत्तर पक्ष के बरक्स पूर्वपक्ष की प्रासंगिकता के प्रश्न ने द्विवेदीजी के मन में यह सवाल उठाया कि ‘परम्परा क्या उत्तरपक्ष ही है? पूर्वपक्ष नहीं?’ और तब उन्हें लगा कि परम्पराएँ और भी हो सकती है। नामवर सिंह के शब्दों में कहें तो ‘एक तरह से यह इतिहास-बोध का उदय था।’ द्विवेदीजी के चिंतन पर रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों की स्पष्ट छाप रही है। मसलन, गुरुदेव द्वारा अपने प्रसिद्ध निबंध ‘भारतवर्ष में इतिहास की धारा’ में भारतीय इतिहास में ‘अनार्य’ जातियों के योगदान की विस्तृत चर्चा, जिसका प्रभाव द्विवेदीजी ने अनेक रचनाओं में देखने को मिलता है। जिनमें उन्होंने आर्येतर जातियों के कलात्मक अवदान की खोज की।
‘युगविशेष की मूल गतिमान शक्तियों के सांस्कृतिक इतिहास’ के आलोक में साहित्यिक मूल्यांकन की प्रवृत्ति नामवर सिंह की कृतियों में स्पष्ट देखने को मिलती है। मसलन, वर्ष 1942 में प्रकाशित हुई आचार्य द्विवेदी की किताब ‘कबीर’ के समकालीन परिवेश का विवरण देते हुए नामवरजी लिखते हैं : ‘इतिहासकारों के अनुसार यह काल घोर उथल-पुथल और मंथन का काल था। गांधी-युग के आदर्शवाद का ढांचा जीवन के हर क्षेत्र में चरमरा उठा था। अनेक राजनीतिक और नैतिक आदर्श संदिग्ध हो उठे थे। यह वही काल है, जब मार्क्स और फ्रायड दोनों के विचार एक साथ भारत के शिक्षित मध्यवर्ग को प्रभावित और आंदोलित कर रहे थे। दूसरे महायुद्ध के कारण सामान्य जीवन के आर्थिक पक्ष पर जो प्रभाव पड़ा था उससे असुरक्षा की भावना और ज्यादा बढ़ी थी। हिन्दू-मुस्लिम एकता की समस्या भी स्वाधीनता संग्राम के संदर्भ में अत्यंत उग्र हो उठी थी।’ (पृ. 54)
‘दूसरी परम्परा की खोज’ से ही एक अन्य उदाहरण लें। जहाँ भारतीय समाज पर तुर्कों व मुग़लों के प्रभाव का विश्लेषण करते हुए नामवर सिंह इतिहासकार इरफ़ान हबीब के लेख ‘प्रौद्योगिकीय परिवर्तन और समाज’ में दिए गए निष्कर्षों को उद्धृत करते हैं। और लिखते हैं कि ‘यदि प्रोफेसर हबीब के निष्कर्ष सही हैं तो स्पष्ट है कि 13वीं-14वीं सदी में तुर्कों के कारण भारतीय समाज के सामंती ढाँचे के अंदर व्यापारी पूंजीवाद के विकास की दिशा में अवश्य ही कुछ उल्लेखनीय परिवर्तन हुए होंगे, जो देर-सबेर सामाजिक सम्बन्धों को प्रभावित करते हुए सांस्कृतिक-साहित्यिक परिवर्तन के लिए भी पृष्ठभूमि तैयार कर सके होंगे।’ (पृ. 76)
इस संदर्भ में इतिहासकार इरफ़ान हबीब के उस लेख का भी ज़िक्र कर देना प्रासंगिक होगा, जिसमें उन्होंने मुग़लकालीन भारत की अर्थव्यवस्था में पूंजीवादी विकास की संभावनाओं को लक्षित किया है। इरफ़ान हबीब का निष्कर्ष है कि कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उत्पादन के बावजूद मुग़लकालीन अर्थव्यवस्था के पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में तब्दील न हो पाने के लिए कई कारक ज़िम्मेवार थे। मसलन, मुग़लकालीन भारत में पूंजी का मूल स्वरूप वणिक पूंजी का ही बना रहा। साथ ही, अर्थव्यवस्था के पर्याप्त मुद्रीकरण के बावजूद घरेलू उद्योग प्रभावशाली बना रहा। इरफ़ान हबीब लिखते हैं कि ‘हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए क्या मुग़लकालीन अर्थव्यवस्था का पूरा ढाँचा ही एक ऐसी परजीवी व्यवस्था की तरह नहीं था, जो सीधे तौर पर एक छोटे शासक शासक वर्ग द्वारा कृषिजनित संसाधनों के शोषण पर आधारित थी।’ वे यह भी याद दिलाते हैं कि इस व्यवस्था में शहरी उत्पादों के लिए देहातों में कोई बाजार नहीं बन सका। और गांवों का मुद्रीकरण भी आखिरकार गाँव से अधिशेष कृषि उत्पाद के शहर तक पहुँचने भर तक ही सीमित होकर रह गया।[8] ये निष्कर्ष बतलाते है कि आखिर क्यों मुग़लकालीन भारत में पूंजीवाद अर्थव्यवस्था के विकास की संभावना साकार रूप न ले सकी।
भारत में तुर्कों के आगमन के सांस्कृतिक प्रभावों के संबंध में हजारीप्रसाद द्विवेदी की मान्यताओं की चर्चा करते हुए नामवर सिंह याद दिलाते हैं कि ‘उनके (तुर्कों के) पास एक व्यस्थित ‘विचारधारा’ भी थी और वे अपने राजनीतिक प्रभुत्व के साथ उस ‘विचारधारा’ के प्रभुत्व की स्थापना के लिए प्रयत्नशील थे। भारतीय समाज पर इस ‘विचारधारात्मक’ अथवा ‘सांस्कृतिक’ प्रभुत्व-स्थापन का क्या प्रभाव पड़ा, इसकी चर्चा भी जरूरी है।’ (पृ. 76) उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ वर्षों में भारतीय इतिहासकारों सांस्कृतिक अथवा विचारधारात्मक प्रभुत्व-स्थापन के इन प्रयासों, तुर्कों व मुग़लों के राजत्व संबंधी सिद्धांतों के सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भों की गहन पड़ताल की है। मसलन, इतिहासकार मुज़फ्फ़र आलम ने अपनी पुस्तक ‘लैंगवेजेज़ ऑफ पॉलिटिकल इस्लाम’ में मध्यकाल में राजनीतिक व्यवहार और राजनीतिक संस्कृति से संबन्धित ग्रन्थों (अख़लाक़ और अदब) का गहन विश्लेषण करते हुए तत्कालीन राजनीतिक विचारधारा, राजत्व की धारणा का विस्तृत विवरण दिया है। भारत में इस्लाम के आगमन से लेकर मुस्लिम शासक वर्ग के पतन होने के बीच इस्लाम द्वारा भारतीय परम्पराओं के साथ समायोजन करने के प्रयासों का भी उन्होंने ब्यौरा इस पुस्तक में दिया है। इस क्रम में वे फख्र-ए मुदब्बिर (अदब अल-हर्ब), ज़ियाउद्दीन बरनी (फतवा-ए जहाँदारी), मीर सैयद अली हमदानी (ज़खीरात अल-मुलुक) के ग्रन्थों के हवाले से राजनीतिक इस्लाम के भारतीय अनुभवों और दुनिया के अन्य देशों में राजनीतिक इस्लाम के अनुभवों के बीच समानता और अंतर को भी बख़ूबी रेखांकित करते हैं।[9]
अतीत के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष की चर्चा करते हुए नामवर सिंह ‘दूसरी परम्परा की खोज’ में शास्त्र और लोक के बीच द्वंद्वात्मक प्रक्रिया का भी ज़िक्र करते हैं। इसी संदर्भ में वे हजारीप्रसाद द्विवेदी के इस मत को भी उद्धृत करते हैं कि ‘लोक के दबाव में शास्त्र ने कभी-कभी अपने आपको लचीला बनाकर लोक की बहुत-सी विशेषताओं को अंतर्भुक्त कर लिया।’ इसी प्रक्रिया का दूसरा पहलू यह है कि ‘शास्त्र-वंचित लोक भी अपने अनुभव-संचित विचार-खण्डों को सुसंगत और समृद्ध बनाने के लिए ‘शास्त्र’ का सहारा लेता रहा है।’ (पृ. 79) शास्त्र और लोक के बीच के अन्योन्याश्रित संबंध की यह धारणा कमोबेश मिखाइल बाख्तिन की ‘सर्कुलरिटी’ की अवधारणा से मिलती है, जिसके अनुसार औद्योगिक काल से पूर्व के यूरोपीय समाज में वर्चस्वशाली और अधीनस्थ वर्गों की संस्कृतियों के बीच अन्योन्याश्रित संबंध था और वे एक-दूसरे पर प्रभाव डालती थीं। ।
‘लोकधर्म’ के अध्ययन को आवश्यक बतलाते हुए नामवर सिंह ने अंतोनियो ग्राम्शी के उस मत को भी उद्धृत किया है, जहाँ ग्राम्शी ने किसान और कारीगर वर्गों की वैचारिक आवश्यकता की ओर ध्यान देने का आग्रह किया है। बक़ौल ग्राम्शी, ‘सामान्य जनों के प्रचलित विचार अपेक्षाकृत सरल और अल्पसंघटित होते हैं, अक्सर वे परस्पर-विरोधी और उलझे हुए भी होते हैं और उनमें लोकवार्ताओं, मिथकों और रोज़मर्रा के लोकप्रचलित अनुभवों का पंचमेल होता है; फिर भी उन विचारों का बहुत महत्त्व है क्योंकि व्यापक जन-आंदोलन के लिए यही कारगर होते हैं।’ (पृ. 81 पर उद्धृत)
हिन्दी नवजागरण, भारतीय उपन्यास और राष्ट्रवाद -
हिन्दी नवजागरण, भारतीय उपन्यासों और राष्ट्रवाद की अवधारणा पर भी नामवर सिंह ने अपने लेखों, व्याख्यानों में गहराई से विचार किया है। ‘हिन्दी नवजागरण की समस्याएँ’ शीर्षक वाले लेख में नामवरजी ने हिन्दी नवजागरण के साथ-साथ भारतीय नवजागरण के तमाम पक्षों पर अपने मत प्रकट किए हैं। उनके अनुसार ‘भारतीय नवजागरण की मूल समस्या है भारतेन्दु के शब्दों में ‘स्वत्व निज भारत गहै।’ यह ‘स्वत्व वही है जिसे आजकल ‘अस्मिता’ कहते हैं। राजनीतिक स्वाधीनता इस स्वत्व प्राप्ति की पहली शर्त है।’ लेकिन जब नवजागरण के सूत्रधारों ने इस कटु यथार्थ का अनुभव किया कि अँग्रेजी राज में राजनीतिक मुक्ति की राह अवरुद्ध है, तो उन्होंने अपना स्वत्व बचाने को संघर्ष हेतु सांस्कृतिक मोर्चे को चुना। औपनिवेशिक मानसिकता और दिमागी गुलामी से जूझना भी इस प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बन गया।
औपनिवेशिक मानसिकता के विरुद्ध होने वाले इस संघर्ष में इतिहासलेखन की महत्त्वपूर्ण भूमिका को बंकिम चंद्र सरीखे लेखक पहले ही पहचान चुके थे। बंकिम का कहना था कि कोई राष्ट्र अपने इतिहास में ही अस्तित्व ग्रहण करता है। नवजागरण के सूत्रधारों द्वारा इतिहास को केंद्रीय भूमिका में रखने और उसके गहरे निहितार्थों के बारे में नामवर सिंह ने बिलकुल ठीक लिखा है कि ‘नवजागरण की एक बहुत बड़ी देन संभवतः वह इतिहासदृष्टि है जिससे अपने अतीत को शत्रु से मुक्त करके उसके विरुद्ध वर्तमान में इस्तेमाल करने की कला आती है और भविष्य के लिए एक स्वप्नदृष्टि भी मिलती है।’[10]
इसी क्रम में नामवर सिंह अतीत के वर्तमान केन्द्रित पाठ को लेकर आगाह भी करते हैं। उनके अनुसार यह समझ कि ‘वर्तमान की सभी समस्याओं के लिए उन्नीसवीं सदी का नवजागरण का जिम्मेदार है’, मूलतः एक भ्रामक और तथ्यहीन धारणा है। इसलिए यह आवश्यक है कि इस अनैतिहासिक प्रवृत्ति से बचा जाए। इतिहास की भविष्योन्मुखी दृष्टि पर ज़ोर देते हुए ‘हिन्दी साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार’ शीर्षक वाले लेख में नामवरजी ने लिखा है कि ‘जहाँ दृष्टि अतीतोन्मुखी हो वहाँ इतिहास नहीं है, क्योंकि इतिहास में दृष्टि भविष्योन्मुखी होती है और इतिहास की चिंता का केंद्र-बिन्दु ठेठ समसामयिक होता है।’ यह वक्तव्य इतालवी दार्शनिक क्रोचे (1866-1952) की उस उक्ति की याद भी दिलाता है, जिसके अनुसार ‘सारा इतिहास समकालीन इतिहास होता है।’
निश्चय ही, भारतीय नवजागरण भावबोध और विचारबोध दोनों ही स्तरों पर एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया थी। यह प्रक्रिया न तो इकहरी थी और न ही अंतर्विरोधों से मुक्त। ख़ुद नामवरजी के शब्दों में, ‘अंतर्विरोध इस नवजागरण की प्रक्रिया में भी थे और कहने की आवश्यकता नहीं कि यह अनिवार्यतः नवजागरण की दुर्बलता नहीं बल्कि उसकी समृद्धि का सूचक है।’ (पृ. 157) यह बात पूरी तरह से हिन्दी नवजागरण पर भी लागू होती है। साथ ही, विडंबनापूर्ण होते हुए भी यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि हिन्दी प्रदेश में नवजागरण खंडित होकर विकसित हुआ। इस संदर्भ में नामवरजी की सारगर्भित टिप्पणी है कि ‘हिन्दी प्रदेश का नवजागरण धर्म, इतिहास, भाषा सभी स्तरों पर दो टुकड़े हो गया। स्वत्व रक्षा के प्रयास धर्म तथा संप्रदाय की ज़मीन से किए गए।’
नामवरजी की यह सटीक इतिहासदृष्टि भारतेन्दु के बलिया वाले व्याख्यान और मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध कृति ‘भारत भारती’ के उनके विश्लेषण में भी देखने को मिलती है। ‘भारत भारती और राष्ट्रीय नवजागरण’ शीर्षक वाले व्याख्यान में नामवर सिंह मैथिलीशरण गुप्त के पत्रों के हवाले से उस पृष्ठभूमि का ब्यौरा देते हैं, जिससे गुजरकर ‘भारत भारती’ की रचना संभव हुई। इस क्रम में, नामवरजी उन पूर्ववर्ती और समकालीन विचारकों का भी ज़िक्र करते हैं, जिन्होंने गुप्तजी की विचारधारा और उनके मानस पर गहरा प्रभाव डाला था। ‘भारत भारती’ का गहन विश्लेषण करते हुए वे मैथिलीशरण गुप्त की इतिहासदृष्टि, भारत और भारतीयता की उनकी संकल्पनाओं की भी पड़ताल करते हैं। ‘हम कौन थे, क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी’ में ‘हम’ कौन है, इसकी व्याख्या करते हुए नामवरजी इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ‘भारत भारती का ‘हम’ सिर्फ़ हिंदुओं तक ही सीमित है और भारत भी मुख्यतः ‘हिन्दू भारत’ है।’ यहाँ तक कि इस ‘हिन्दू भारत’ में न तो दक्षिण भारत शामिल है और न ही बौद्ध धर्म के अनुयायी। नामवर सिंह आगे यह भी जोड़ते हैं कि ‘भारत भारती का ‘हम’ सिकुड़कर सनातन धर्म तक सीमित रह गया और सनातन धर्म भी शुद्ध वर्णाश्रम-आधारित।’ (पृ. 188)
‘भारत भारती’ के हवाले से ‘स्व’ को गढ़े जाने की इस प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए नामवर सिंह उस प्रवृत्ति के प्रति भी सचेत करते हैं, जिसके अंतर्गत आज एकाश्म हिन्दू धर्म के निरूपण का प्रयास चल रहा है। नामवर सिंह ने अपना यह व्याख्यान अप्रैल 1987 में दिया था। उल्लेखनीय है कि इससे दो वर्ष पूर्व 1985 में अपने एक चर्चित लेख में रोमिला थापर ने उस प्रक्रिया का ऐतिहासिक ब्यौरा दिया है, जिसके अंतर्गत हिंदुत्व के पैरोकारों द्वारा हिन्दू धर्म की समूची वैविध्यता को इकहरा (एकाश्मी) बनाने की कोशिश की जा रही है। और इस क्रम सामी धर्मों के तर्ज पर हिन्दू धर्म को भी “एक धर्म, एक ईश्वर, एक पवित्र पुस्तक” के साँचे में ढालने की भरपूर कोशिश हो रही है।[11] अपनी प्रासंगिकता और महत्ता के चलते रोमिला थापर का यह लेख बाद के वर्षों में भी ‘सिंडिकेटेड हिन्दूइज़्म’ शीर्षक से ‘फ्रंटलाइन’ समेत अनेक पत्रिकाओं में प्रकाशित किया गया।
‘भारत भारती’ के संदर्भ में अस्मिता की खोज और ‘जातीय आत्म-गौरव के एहसास’ की जो चर्चा पड़ताल नामवर सिंह ने की है, वह ‘अँग्रेजी ढंग का नॉवेल और भारतीय उपन्यास’ शीर्षक वाले उनके लेख में और स्पष्ट होकर सामने आती है। फ़्रेडरिक जेमसन का हवाला देते हुए नामवरजी उपन्यास को ‘राष्ट्रीय रूपक’ (नेशनल एलेगरी) के रूप में देखते हैं। उपन्यास और राष्ट्र दोनों में अंतर्निहित कल्पना के तत्त्व को उद्घाटित करते हुए वे लिखते हैं कि ‘कल्पसृष्टि कल्प-सृजन से ही संभव है। उपन्यास यही कल्प-सृजन है। गल्प से गल्प की सृष्टि। एक गल्प उपन्यास, दूसरा गल्प राष्ट्र। यह दूसरा ‘गल्प’ गले से जल्दी नहीं उतरता। पर विचार करें तो राष्ट्र भी एक गल्प ही है। कुल मिलाकर राष्ट्र एक प्रतिमा ही तो है। इसके निर्माण में अतीत की कितनी पुरागाथाएँ, मिथक, किंवदंतियाँ, लोककथाएँ, स्मृतियाँ, इतिहास-पुराण आदि का योग होता है।’[12] आगे वे बेनेडिक्ट एंडरसन द्वारा राष्ट्र को कल्पित जनसमुदाय (इमेजिंड कम्युनिटी) के रूप में देखने का भी ज़िक्र करते हैं।
ख़ुद बेनेडिक्ट एंडरसन ने ‘कल्पित जनसमुदाय’ की धारणा की व्याख्या करते हुए लिखा है कि राष्ट्रवाद के अंतर्गत एक-दूसरे से सर्वथा अपरिचित लोग उस राष्ट्र के प्रति जुड़ाव का अनुभव करते हैं, जिसके वे सदस्य होते हैं। दूसरे शब्दों में, लोग ख़ुद को जिस राष्ट्र का सदस्य मानते हैं, उसके सभी सदस्यों को देखे-जाने बगैर भी वे राष्ट्र के प्रति जुड़ाव का अनुभव करते हैं। एंडरसन के अनुसार चेतना, आख्यान और राष्ट्र-निर्माण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पत्रकारिता, समाचार-पत्र, साहित्य, स्कूली-शिक्षा और पाठ्यक्रम ये सभी मिलकर राष्ट्रवाद के विकास में उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं। इसी तरह जनगणनाएं, मानचित्र और संग्रहालय भी राष्ट्रवाद के निर्माण में उत्तरदाई होते हैं।[13]
राष्ट्र समुदाय के बनने की प्रक्रिया में उपन्यास जैसी साहित्यिक विधाओं की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। राष्ट्र-निर्माण और उपन्यास के बीच के द्वन्द्वात्मक संबंध के बारे में नामवर सिंह ने लिखा है कि ‘उपन्यास ने यदि राष्ट्र का रूप निर्मित किया तो राष्ट्रीय कल्पना ने उपन्यास के रूप-निर्माण में भी नियामक भूमिका अदा की।’ उल्लेखनीय है कि साहित्य की एक आधुनिक विधा के रूप में उपन्यास का आरंभ इंग्लैंड और फ्रांस में सत्रहवीं-अठारहवीं सदी में हुआ। उन्नीसवीं सदी के मध्य में चार्ल्स डिकेंस सरीखे उपन्यासकारों ने उपन्यास को आम लोगों की जीवनगाथा का रूप दे दिया, जिसमें उनके रोज़मर्रा के जीवन और दैनंदिन संघर्षों की झलक मिलती है। उपन्यासों ने विविधता से भरे हुए राष्ट्र के बाशिंदों के जीवन में साझेपन की भावना का भी सूत्रपात किया। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में औपनिवेशिक भारत में बांग्ला, मराठी, मलयालम, हिन्दी समेत अनेक भारतीय भाषाओं में उपन्यास-रचना की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। इनमें ऐतिहासिक विषयों, घटनाओं और चरित्रों को आधार बनाकर लिखे गए उपन्यास भी शामिल थे। बंकिम चंद्र और रमेश चंद्र दत्त के उपन्यास इसी कोटि के है।
जहाँ बंकिम ने आनंद मठ और दुर्गेश नंदिनी सरीखे उपन्यास लिखे, वहीं रमेश चंद्र दत्त ने बंग विजेता, माधवी कंकण, महाराष्ट्र जीवन-प्रभात, राजपूत जीवन-संध्या जैसे उपन्यासों की रचना की। साहित्य और वास्तविक जीवन दोनों में ही इतिहास की महत्ता रेखांकित करते हुए नामवरजी ‘हिन्दी-साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार’ शीर्षक वाले लेख में लिखते हैं कि ‘इतिहास लिखने की ओर कोई जाति तभी प्रवृत्ति होती है जब उसका ध्यान अपने इतिहास के निर्माण की ओर जाता है। यह बात साहित्य के बारे में उतनी ही सच है जितनी जीवन के।’ स्पष्ट है कि अस्मिता रचने और राष्ट्र-समुदाय के निर्माण का लक्ष्य इन ऐतिहासिक उपन्यासों के केंद्र में था। लेकिन उन्नीसवीं सदी में लिखे जा रहे इन ऐतिहासिक उपन्यासों की सीमाएँ भी थीं। मसलन, इतिहासकार सुधीर चंद्र के अनुसार रमेश चंद्र दत्त के उपन्यासों में हिंदुओं को पुनः जाग्रत कराने का प्रयत्न है। वे आगे जोड़ते हैं, ‘इन उपन्यासों में हिन्दू को राष्ट्र से जोड़ने की प्रवृत्ति स्पष्ट लक्षित होती है। दत्त के बाद के दो उपन्यास सामाजिक हैं और इनमें मुसलमानों की बात परोक्ष रूप से ही हुई है। किन्तु हिन्दुओं/भारतीयों की प्राचीन महानता का सविस्तार उल्लेख यहाँ भी होता है।’[14]
इन भारतीय उपन्यासों में भारतीय अस्मिता की तलाश के साथ-साथ आधुनिकता व परम्परा के बीच द्वंद्व देखने को भी मिलता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर के गोरा जैसे उपन्यासों में भारतीय अस्मिता की खोज और अधिक उभरकर सामने आती है, जिसके बारे में नामवरजी लिखते हैं कि ‘रवीन्द्रनाथ भारतीय होना चाहते थे ज़रूर लेकिन अपनी नज़र में। पश्चिम की नज़र में नहीं।’[15] इस संदर्भ में गोरा उपन्यास के नायक गौरमोहन का यह वक्तव्य भी ध्यान देने योग्य है, ‘मैं दिन-रात जो होना चाह रहा था, पर हो नहीं पा रहा था, आज मैं वही हो गया हूँ। आज मैं सारे भारतवर्ष का हूँ। मेरे भीतर हिन्दू, मुसलमान, ख्रिस्तान किसी समाज के प्रति कोई विरोध नहीं है। आज इस भारतवर्ष में सबकी जात मेरी जात है। सबका अन्न मेरा अन्न है।’
स्पष्ट है कि नामवरजी का गहरा इतिहासबोध और उनकी इतिहासदृष्टि उनके लेखों, निबंधों और साक्षात्कारों में प्रकट होती है। वे जहाँ सांस्कृतिक उपनिवेशवाद के खतरों से हमें आगाह करते हैं, वहीं इसके विरुद्ध संघर्ष में सांस्कृतिक मोर्चे और प्रति-उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया के महत्त्व को भी रेखांकित करते हैं। वे अतीतोन्मुखी इतिहासदृष्टि की जगह भविष्योन्मुखी इतिहासदृष्टि के पैरोकार हैं। वे इतिहास की संप्रदायवादी दृष्टि के प्रति भी न केवल सजग हैं, बल्कि उसका मुखर विरोध भी करते हैं। संवाद का आमंत्रण देती उनकी रचनाएँ अपने पाठक से न सिर्फ़ लेखक-आलोचक के सरोकारों को साझा करती चलती है, बल्कि उन्हें संवाद की प्रक्रिया में भी बराबर का हिस्सेदार बना लेती है। ये कृतियाँ आलोचना के ‘स्वधर्म’ यानी वाद विवाद संवाद की बानगी तो हैं ही, साथ ही ये आलोचक के आत्मसंघर्ष की साक्षी भी हैं। मुक्तिबोध की कृति ‘एक साहित्यिक की डायरी’ की समीक्षा करते हुए नामवरजी ने लिखा है, ‘कुछ लोग दुनिया से बहस करते हैं तो कुछ सिर्फ़ अपने से, किन्तु कुछ थोड़े-से लोग ऐसे भी होते हैं जो दुनिया से बहस करने की प्रक्रिया में अपने-आप से भी बहस चालू रखते हैं।’[16] कहना न होगा कि नामवर सिंह उन्हीं थोड़े-से लोगों में से एक थे।
सन्दर्भ :
[1] ई.एच. कार, इतिहास क्या है, (मैकमिलन, 2012), पृ. 21.
[2] नामवर सिंह, वाद विवाद संवाद, (राजकमल प्रकाशन, 1989).
[3] चंद्रकांत देवताले (संपा.), डबरे पर सूरज का बिंब (मुक्तिबोध की गद्य रचनाएँ), (नेशनल बुक ट्रस्ट, 2002), पृ. 23.
[4] नामवर सिंह, नामवर सिंह संकलित निबंध, (नेशनल बुक ट्रस्ट, 2010), पृ. 125.
[5] एडवर्ड सईद, ओरिएंटलिज़्म, (विंटेज बुक्स, 1979).
[6] नामवर सिंह संकलित निबंध, पृ. 126.
[7] नामवर सिंह, दूसरी परम्परा की खोज, (राजकमल प्रकाशन, 1997), पृ. 55.
[8] देखें, इरफ़ान हबीब, ‘पोटेन्शियलिटीज़ ऑफ कैपिटलिस्टिक डिवेलपमेंट इन द इकॉनमी ऑफ मुग़ल इंडिया’, द जर्नल ऑफ इकनॉमिक हिस्ट्री, खंड 29, सं. 1, (मार्च 1969), पृ. 32-78.
[9] मुज़फ्फ़र आलम, द लैंगवेजेज़ ऑफ पॉलिटिकल इस्लाम, 1200-1800, (परमानेंट ब्लैक, 2004); साथ ही देखें, ए. अज़फ़र मोइन, द मिलेनियल सॉवरिन : सेक्रेड किंगशिप एंड सेंटहुड इन इंडिया, (कोलम्बिया यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012).
[10] नामवर सिंह संकलित निबंध, पृ. 153.
[11] रोमिला थापर, ‘सिंडिकेटेड मोक्ष’, सेमिनार, सितंबर 1985, सं. 313.
[12] नामवर सिंह संकलित निबंध, पृ. 142-143.
[13] बेनेडिक्ट एंडरसन, इमेजिंड कम्युनिटीज़ : रिफ्लेकशंस ऑन द ऑरिजिन एंड स्प्रेड ऑफ नैशनलिज़्म, (वर्सो, 1983).
[14] सुधीर चंद्र, हिन्दू, हिन्दुत्व, हिंदुस्तान, (राजकमल प्रकाशन, 2003), पृ. 144.
[15] नामवर सिंह संकलित निबंध, पृ. 128.
[16] नामवर सिंह, वाद विवाद संवाद, पृ. 11.
शुभनीत कौशिक
असिस्टेंट प्रोफेसर, इतिहास विभाग, सतीश चंद्र कॉलेज, बलिया (उत्तर प्रदेश)
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
अतिथि सम्पादक : बृजेश कुमार यादव सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव

एक टिप्पणी भेजें