संस्मरण : नामवर सिंह जीवन के कुछ प्रसंग / महेन्द्रपाल शर्मा

नामवर सिंह जीवन के कुछ प्रसंग
- महेन्द्रपाल शर्मा

मैंने जब जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में एम.ए. हिंदी में प्रवेश लिया तब तक नामवर सिंह का नाम तो अपने अध्यापकों से सुना था, पर उनको देखा कभी नहीं था। जेएनयू आने से पहले मैं मेरठ विश्वविद्यालय का छात्र था। वहां का शैक्षिक वातावरण उतना जीवंत नहीं था जितना दिल्ली के विश्वविद्यालयों का, और उसमें भी जेएनयू का शैक्षिक परिवेश। जेएनयू के अकादमिक वातावरण का तो कहना ही क्या था! एक ही कैम्पस में छात्र-छात्राएं और अध्यापक तथा कर्मचारी साथ-साथ रहते थे। आरंभ में जेएनयू के दो कैम्पस होते थे। एक ‘अप कैम्पस’ कहलाता और दूसरा ‘डाउन कैम्पस’। इनको ‘ओल्ड कैम्पस’ और ‘न्यू कैम्पस’ भी कहते थे। दोनों कैम्पसों के बीच डीटीसी की बसें चला करती थीं। पर अधिकतर छात्र पैदल ही आते और जाते थे। बस का नंबर था 612 जो ‘गोदावरी’ हॉस्टल से बेरसराय तक आती और फिर वापस जाती थी। हमारे बैच की सन 1976 के जुलाई के महीने में एम।ए। की पहली कक्षा आदरणीय नामवर जी के कक्ष में ही हुई थी। हम संभवतः कुल मिलाकर 13 विद्यार्थी रहे होंगे।

क्या शानदार पढ़ाते थे गुरुदेव। उनकी कक्षा में इतना आनंद आता था कि उसे छोड़ने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। ऐसा लगता था कि उनकी कक्षा कभी समाप्त ही न हो। वे पढ़ाते रहते और हम उनको सुनते रहते। यही लालच था कि जब भी वे दिल्ली में कहीं किसी सेमिनार में भी बोलने के लिए जाते तो भारतीय भाषा केंद्र के हम अनेक विद्यार्थी उनको सुनने वहां पहुँच जाते। कई बार तो जे.एन.यू. की लाल-सफ़ेद रंग की शानदार बस को बुक करके ले जाते। लाजपतराय कॉलेज, गाज़ियाबाद में हुए प्रगतिशील लेखक संघ के अनेक कार्यक्रमों में हम नामवर सिंह जी के साथ उसी सुन्दर बस से जाते और वापस आते थे। भारतीय भाषा केंद्र के कई अन्य शिक्षक भी साथ-साथ जाते थे। भारतीय भाषा केंद्र उस वक़्त एक बड़े परिवार की भांति था। चेयरमेन उसके मुखिया होते। हिंदी और उर्दू के प्रोफ़ेसर बारी-बारी से भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष हुआ करते थे। विभाग में किसी प्रकार का मतभेद कभी नहीं था। कोई मतभेद रहा भी होगा तो कभी बाहर नहीं आया, शायद आज भी न हो। हम नामवर सिंह जी के कमरे के बाहर कक्षा ख़त्म होने का इंतजार करते। नामवर सिंह के कमरे के सामने ही दूसरे कमरे में विभाग का कार्यालय हुआ करता था। करीब पांच या दस मिनट के बाद नामवर सिंह कार्यालय को फोन करते और उनके कार्यालय से हमको कमरे में जाने का संकेत मिलता। जब अन्दर से उनका संकेत मिलता तो दरवाज़ा खोलकर सभी जल्दी-जल्दी उनकी मेज के सामने की कुर्सियों पर जाकर बैठ जाते। शुरू में ऐसा कुछ तय नहीं था कि कौन किधर बैठेगा पर बाद में धीरे-धीरे लगभग तय-सा हो गया। हम लोगों और विशेषकर मेरे लिए वह एक नयी तरह का अनुभव था। मेरे अनुभव के आधार पर हमसब छात्र कक्षा में बैठे हुए रहते थे और बाद में शिक्षक आते थे। यहाँ कक्षाएं अध्यापकों के कमरों में ही होती थीं। मैं सदैव उनकी मेज के और उसपर भी उनके बिलकुल सामने ही बैठता था। जब हम कक्षा के लिए उनके कमरे में प्रवेश करते तो गुरुदेव कोई न कोई पुस्तक या अपने नोट्सनुमा एक डायरी-सी पढ़ रहे होते। मुंह में पान दबा होता और बिलकुल शांत भाव से ध्यानस्थ रहते। हमसे पहले कोई संभवतः एक और भी कक्षा होती थी और उसके तुरंत बाद हमारी। पहली और हमारी कक्षा के बीच लगभग दस मिनट का समय होता। थोड़ी देर में ही गुरुदेव हमसब पर एक नज़र डालते और अपनी कुर्सी से उठकर खिड़की का लोहे का हैंडिल लगा शीशे का दरवाजा खोलते तथा अपने मुंह से पान की पीक को बाहर की ओर को मारते। फिर वापस आकर कुर्सी पर बैठ जाते और तब पढ़ाना आरंभ करते। उनके पढ़ाने का ढंग बिलकुल अलग होता था। कभी-कभी वे कोई कोटेशन बोलते और बोलकर उसे लिखवाते फिर उसकी व्याख्या करते हुए कक्षा आरम्भ करते। उनके पढ़ाने का अंदाज़ हमारे तबतक के अन्य शिक्षकों से बिलकुल निराला था। कभी-कभी अपनी कक्षा वे उर्दू के किसी शेर या मध्यकालीन किसी कवि के दोहे की व्याख्या से करते। उर्दू के प्रसिद्ध शायर फैज़ अहमद फैज़ की मशहूर नज़्म ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मिरी महबूब ना मांग’ मैंने सबसे पहले नामवर सिंह जी से ही सुनी थी। नयी समीक्षा के सन्दर्भ में ‘एम्बिगुइटी’ की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने उस नज़्म का उपयोग किया था। कक्षा समाप्त होने के बाद गुरुदेव वे एक पान पुनः खाते। उनकी आवाज और पढ़ाने का तरीका बड़े ही प्रभावशाली थे। वे इतना सावधानी से बोलते थे कि एक भी शब्द उनके वक्तव्य अथवा भाषण में अतिरिक्त नहीं होता था और न ही किसी किस्म का दोहराव ही होता था। लेकिन पिछले दिनों जब मैं उनसे मिलने गया था तो उनकी आवाज़ बिलकुल बदली हुई थी। हालाँकि अंदाज़ वही था, गर्वीला। आत्मविश्वास से पूर्णतः भरा हुआ था। आदरणीय नामवर जी का क़द और व्यक्तित्व इतना विशाल था कि उनसे बात करने की हिम्मत हममें से बहुत कम लोगों की हो पाती थी। हमारे बैच में एक से एक प्रतिभावान साथी थे। सब के सब बड़े ही जिज्ञासु! खैर!

लगभग पांच साल पहले की बात रही होगी कि जामिया के अकादमिक स्टाफ कॉलेज में मैंने एक रिफ्रेशर कोर्स करवाया था। नामवर जी को उसका समापन-भाषण देने के लिए आमंत्रित किया जाना था। सभी प्रतिभागियों की भी उत्कट इच्छा थी कि प्रो. नामवर जी के दर्शन हों। उसी कार्यक्रम में मैंने विषय-विशेषज्ञ के रूप में जयपुर से अपने एक बहुत पुराने और वरिष्ठ साथी डॉ. मोहन श्रोत्रिय जी को भी आमंत्रित किया था, उनको ‘रिफ्रेशर कोर्स’ में दो व्याख्यान करने थे। वे मेरे साथ ही ठहरे हुए थे। शाम की बात रही होगी कि मेरा मन हुआ कि आज नामवर जी से मिला जाय और सोचा कि उनके घर ही जाकर उनको आमंत्रित भी कर लिया जाय। मैंने जैसे ही श्री मोहन श्रोत्रिय जी से चर्चा की तो वे तुरंत तैयार हो गए। हम दोनों 32 शिवालिक उनके आवास पर पहुंचे। द्वितीय तल पर मैंने उनके घर के दरवाज़े की घंटी बजाई। आश्चर्य हुआ कि स्वयं गुरुदेव ने ही घर का दरवाज़ा खोला। उस समय घर पर उनके अलावा अन्य कोई नहीं था। गर्मियों के दिन थे और गुरुवर संभवतः सोकर उठे होंगे, क्योंकि उन्होंने धोती और बनियान पहनी हुई थी। दरवाज़ा खोलने के बाद वे सोफे पर उसी जगह जाकर बैठ गए जहाँ हमेशा बैठा करते थे। कारण क्या था यह तो याद नहीं लेकिन इस बीच उनसे नियमित नहीं मिल सका था। बहुत दिनों बाद गया था उनसे मिलने। मैंने अपने ipad से उनकी दो तस्वीरें खींची। अकेली। गुरुदेव तुरंत सम्भले और बोले कि बनियान में फोटो मत लो। अच्छा नहीं लगेगा। ठहरो। कुर्ता पहन कर आता हूँ। साथ ही कहने लगे कि ‘तुम भी बनियान में मेरी ये तस्वीरें किसी को दिखाना मत।’ मैंने उनको आश्वस्त किया और कहा कि ‘किसी को भी नहीं दिखाऊंगा’ और आज तक वे तस्वीरें मेरे पास हैं पर किसी अन्य ने नहीं देखीं। उनका संकेत पाकर मैं और श्रोत्रिय जी उनके साथ वाले सोफे पर बैठ गए। नामवर जी थोड़ी हिचक और सकुचाहट के साथ कहने लगे कि इस समय घर पर कोई नहीं है। आधे घंटे में काम करने वाली आ जाएगी। फिर न जाने क्या सोचकर बीच में ही वे वहां से उठे और अपने कमरे की ओर चल दिए। उनका सोने का कमरा बराबर में ही था। साथ में किचिन और बाथरूम भी। पहले वे द्वितीय तल के कमरे में सोते थे। घर जब लिया तो ड्रा में ही निकला था। उसके साथ एक और विकल्प था कि कार गैरेज और सर्वेंट क्वार्टर भी लिया जा साकता था। डाक्टर साहब को कार गैरेज पसंद नहीं था इसलिये उन्होंने सर्वेंट क्वार्टर का विकल्प चुना। जब घर और सर्वेंट रूम डीडीए के ड्रा में निकल आये तो डुप्लेक्स होने के कारण वह द्वितीय तल पर निकला। गुरूजी अपने अकादमिक कार्यों में व्यस्त थे तो पूर्ण भुगतान करने के बाद भी फ्लेट और सर्वेंट रूम का कब्ज़ा लेने समय पर नहीं पहुंचे। हालाँकि बहुत देर नहीं हुई थी पर इस बीच जो सर्वेंट रूम उनके घर के बिलकुल करीब था उसको उनके ही एक पड़ौसी ने अपने सर्वेंट रूम से बदलवा लिया। वस्तुतः नामवर जी का ‘एसक्यू’ उनके फ्लेट के निकट था और उनके पड़ौसी का दूर। उसकी संभवतः डीडीए में कुछ जान-पहचान अवश्य थी। इसलिए काम आसान हो गया। मैं क्योंकि उस फ्लेट को देखने गुरुदेव के साथ ही एक दो बार गया था तो मुझे वहां पहुंचकर काम करने वाले एक इंजीनियर ने पूरी कहानी बतायी। अलॉटमेंट लेटर में जो नंबर दिया गया था उस कमरे में कोई पहले से रह रहा था। वहां जाने पर पूरी कहानी मालूम हुई। उस इंजीनियर ने यह भी बताया कि यदि डॉक्टर साहब शिकायत कर दें तो वह उनके मूल ‘एसक्यू’ को पुनः दिलवा सकता है। अब गुरुदेव तो ठहरे आखिर गुरु ही। कहने लगे कि ‘हमारा काम किसी की शिकायत करना नहीं है। अब उसने ले लिया, लेने दो। मुझे कोई भी मिल जाय, क्या अंतर पड़ता है? हैं तो सब एक ही जैसे। क्यों जी?’ उन्होंने क्योंजी कहकर मेरी तरफ देखा और मैंने उस शरीफ इंजीनियर को। फिर दोनों ने एक दूसरे को। अंततः हम दोनों गुरूजी की ओर मुखातिब हो गए। गुरूजी शांत होकर खड़े थे जैसे कि कुछ हुआ ही न हो। खैर, हम बैठे थे तभी गुरुदेव उठे और अपने कमरे की ओर चल दिए। मैंने सोचा कि कुछ सामान या कोई किताब अथवा पत्रिका लाने उठे होंगे। हो सकता है कुछ दिखाना चाहते हों। लेकिन मैंने देखा कि वे कमरे की ओर न जाकर किचिन की ओर गए। तभी मुझे न जाने क्या विचार आया कि उनके पीछे-पीछे मैं भी रसोई की ओर पहुंचा। वहां पहुंचकर हतप्रभ रह गया कि गुरुदेव फ्रिज में से पानी की एक बोतल निकालकर हमारे पीने के लिए गिलासों में स्वयं ही पानी डाल रहे थे। श्रोत्रिय जी ने भी उस स्थिति को देखा और देखकर हम दोनों लोगों को बहुत ही संकोच हुआ। मैंने तुरंत उनके हाथ से पानी की बोतल ली और कहा कि ‘आपको ऐसा करने की क्या आवश्कता थी’। कहने लगे कि ‘इस समय कोई है नहीं। आपलोग गर्मीं में चलकर आये हैं। पानी तो मिलना ही चाहिए’। मुझे लगभग छत्तीस वर्ष पहले के नामवर जी याद आये। जो अपने घर में आये मेहमान से चाय तो क्या। पानी भी शायद ही कभी पूछते होंगे। अनेक लोग तो भारतीय भाषा केंद्र के उनके कमरे से खड़े-खड़े बात करके ही वापस चले आते थे। ऐसा कोई सदाचार उन दिनों गुरुदेव की शैली में नहीं था और न ही कोई उनसे ऐसी अपेक्षा ही करता था। फिर मैं तो उनका शिष्य ठहरा। मुझे बहुत दुःख हुआ। मैंने कहा कि ‘आपको इस समय कुछ चाहिए तो मैं किचिन से लाकर दे देता हूँ। चाय की आवश्यकता है तो वह भी बना दूंगा। उन्होंने इनकार में सिर हिला दिया। बोले कुछ नहीं। हम लोगों के आने से बहुत खुश दिखे। मोहन क्षोत्रिय जी से उनका हालचाल जानने के बाद मुझसे हमेशा की तरह कहने वाला वाक्य दोहराया। ‘का हो माहेन्द्रपाल शर्मा। कैसे हो?’ मैंने कहा ‘ठीक हूँ।’ मुझसे उनके बात करने के तरीके में केवल एक बदलाव आया था। वह था मेरा नाम पुकारने का ढंग। पहले वे केवल ‘महेन्द्रपाल’ कहते थे और अब महेंद्र पाल शर्मा’। यानी मेरा पूरा नाम। इसका कारण संभवतः यह था कि मिलना-जुलना भी मेरा उनसे उतना नहीं रह गया था जितना जेएनयू में रहने के समय था। दूर भी रहता था, परिवार की अलग से जिम्मेदारियां। ज़्यादातर तो फोन से ही गुरूजी बात कर लिया करते थे। जब भी कोई आवश्यक काम होता तो स्वयं बुला भी लेते। इसलिए नियमित मिलना कम हो गया था। अभी बातचीत चल ही रही थी कि उनके यहाँ काम करनेवाली आ गयी। उसको गुरुदेव ने हमलोगों के मना करने पर भी चाय बनाने के लिए कहा। मैंने और मोहन श्रोत्रिय जी ने नामवर जी के साथ कुछ तस्वीरें खिंचवाई। उनको बाद में मैंने फेसबुक पर भी शेयर किया था। उनके कहने के कारण बनियान वाली तस्वीर नहीं डाली।

नामवर सिंह के लिए किसी उपाधि या विशेषण लगाने की आवश्यकता नहीं है। उनकी पहचान के लिए उनका नाम यानी नामवर सिंह कहना ही पर्याप्त था, रहा है और सदैव रहेगा। मैं यह तो दावा नहीं करता कि मैंने ही नामवर जी को बहुत निकट से देखा था पर मैं इतना अवश्य कह सकता हूँ कि मुझे गुरुवर का भरपूर स्नेह मिला और मैं उनका विश्वास पा सका। जहाँ तक मेरा विश्वास है गुरुदेव ऊपर से देखने पर भले ही लोगों को बहुत ही कठोर लगते थे लेकिन अन्दर से वे बहुत ही भावुक और सहृदय थे। बहुत कम लोग जानते होंगे कि वे वस्तुतः नारियल की तरह थे। किसी का दुःख देखकर बहुत दुखी और कष्ट सुनकर वे उसके कष्ट के प्रति बहुत संवेदनशील हो जाते थे। इसके अनेक उदाहरण हैं। मुझे 1983 में हुए जेएनयू के छात्र आन्दोलन की याद आ रही है। विश्वविद्यालय के इतिहास में यह अपने तरह की पहली घटना थी। इस घटना के लिए छात्र, अध्यापकों को उत्तरदायी मानते थे और अध्यापक छात्रों को। परिणामतः छात्र और अध्यापकों के बीच मतवैविध्य की खाई बहुत चौड़ी हो गयी थी। मेरा हॉस्टल सतलज, जिसमें मैं रहता था, कुलपति-निवास के बहुत करीब था।

उस समय जे. एन. यू. के ही एक प्रोफेसर कुलपति थे और उनका निवास नामवर जी के घर के बिलकुल पीछे था। इतना निकट था कि उनके ड्राइंग रूम से कुलपति के ड्राइंग रूम में हो रही घटनाएं यदि पर्दा न लगा हो तो रात के समय भी आसानी से देखी-सुनी जा सकती थीं। कुलपति निवास के ड्राइंग रूम में ही विद्यार्थी उनका घेराव किये हुए थे। दिन-रात वहां छात्र-छात्राओं की भीड़ लगी रहती थी। छात्र आन्दोलन में मेरी रूचि होने के कारण मैं भी वहां जाता और उसके पश्चात् नामवर जी के यहां नियमित जाता। मैं अक्सर उनसे मिलता। नामवर सिंह जी मुझसे आन्दोलन के बारे में पूछते और अपनी राय भी देते। हालाँकि उनका उस समय के छात्र-आन्दोलन से सीधा या उल्टा कोई सम्बन्ध मुझे नहीं दिखाई पड़ता था लेकिन वे आन्दोलन के बारे में जिज्ञासु अवश्य थे और आन्दोलन के कारण, उसके स्वरुप तथा उस पूरे प्रकरण को लेकर चिंतित अवश्य रहते थे। इसका कारण एक तो यह था कि वे प्रो। पीएन श्रीवास्तव के पूर्व परिचित और मित्र थे। संभवतः बहुत निकट भी थे और उनके पड़ोसी तो थे ही। मैंने स्वयं भी प्रो। श्रीवास्तव को उनके पास कई बार बैठे देखा था। इस कारण मैं भी तत्कालीन कुलपति को व्यक्तिगत रूप से जान गया था और उनकी सोच को भी। वे बातचीत में बड़े सज्जन व्यक्ति थे। उनमें कठोर निर्णय लेने की क्षमता भी थी तथा साथ ही प्रशासनिक गुण भी उनमें भरपूर विद्यमान थे।

खैर, यह तो स्पष्ट था कि छात्रों से सहानुभूति होने के बावजूद नामवर सिंह जी छात्र-आन्दोलन को बहुत पसंद नहीं कर पा रहे थे। यद्यपि वे स्वयं साम्यवादी विचारधारा के थे और सर्वत्र प्रसिद्ध मार्क्सवादी साहित्यकार-विचारक के रूप में ही जाने जाते हैं पर कोई अन्य कारण भी अवश्य रहा होगा कि वे ही नहीं जेएनयू के सभी कम्युनिष्ट प्राध्यापक उस समय के छात्र आन्दोलन के विरोधी हो गए थे। गुरुदेव भी मुझे एक-दो बार संकेत में स्पष्ट कर चुके थे बल्कि आगाह कर चुके थे कि ‘कुलपति इस बार विद्यार्थियों की मांगों को नहीं मानेंगे।’ मैं उनसे कहता कि ‘ऐसा क्यों?’ तो वे कहते कि ‘आप लोगों की मांगें उचित नहीं लगती हैं’। उनका शिष्य होने के नाते मुझे उनकी बात ठीक लगती और छात्र होने के कारण मन ही मन असहमत रहते हुए भी उनसे कुछ कह न पाता। खैर, आन्दोलन लम्बा चला। इसकी किसी को भी आशा नहीं थी। पहले तो यही होता था कि एक-दो दिन की छात्र हड़ताल के बाद प्रशासन द्वारा छात्रों की अधिकतर मांगों को मान लिया जाता था। पर इस बार बात कुछ अधिक ही बिगड़ गयी। प्रशासन, छात्र और अध्यापकों में मतभेद बहुत बढ़ गया था। जब किसी तरह बात नहीं बनी तो एक दिन अचानक पुलिस भारी संख्या में कैम्पस के अन्दर आ गयी।

मैं अपने हॉस्टल की छत पर अन्य कुछ छात्रों के साथ खड़ा था। नीचे हो रही गतिविधियों को देख रहा था कि तभी न जाने क्या हुआ कि नीचे से पुलिस वाले ने एक पत्थर फेंका जो ठीक मेरी नाक पर लगा और उसके कारण मेरी नाक में क्रेक आ गया। खून बहने लगा। नाक पर पट्टी लग गयी। गनीमत रही कि आँख बच गयी। मैं चुपचाप जाकर अपने कमरे में लेट गया। अगले दिन हॉस्टल खाली करने का आदेश आ गया। छात्रावास का मेस यानी भोजनालय तो पहले से ही बंद था। खाना नहीं मिलता था। मैं चिंतित था कि क्या करूँ। नाक पर पट्टी बंधी हुई लेकर गाँव जाऊँगा तो घरवाले न जाने क्या-क्या सोचेंगे। वे पहले से ही जेएनयू की राजनीति की बातें सुन-सुनकर असंतुष्ट रहते थे। गाँव में तो सभी यही सोचते थे कि दसवीं या बारहवीं तक पढ़ाई कर ली तो शादी कर दो और खेती या नौकरी करो। मैं गाँव से बहुत दूर था यानी घरवालों की पहुँच से बहुत बाहर, इसलिए अबतक बचा हुआ था। शहर में था इसलिए दोनों ही स्थितियों से बचा हुआ था। हॉस्टल के कमरे में पड़ा-पड़ा सोचने लगा कि यदि जबरन हॉस्टल खाली कराया ही गया तो दिल्ली में ही कहीं किसी दोस्त के घर पर चला जाउंगा और यदि ऐसा भी न हो पाया तो कहीं एक कमरा ले लूंगा। पर कुछ दिनों की मोहलत विद्यार्थियों को दी गयी थी इसलिए संतुष्ट था। लेकिन भावी दिनों के लिए योजना बना रहा था। डर के मारे गुरुदेव से भी नहीं मिला था। सोचता था की टूटी नाक देखकर न जाने वे क्या कहें। उनका व्यक्तित्व सचमुच छात्रों को ही नहीं अध्यापकों को भी बहुत डराता था। शुरू-शुरू में तो तुरंत उनसे बात करने की कौन कहे दुआ-सलाम तक करने की हिम्मत किसी की नहीं हो पाती थी। उनकी ओर देखकर कक्षा में हम सवाल तक नहीं पूछ पाते थे। वैसे भी हर किसी से वे मिलते भी कहाँ थे। या तो प्रायः कक्षाओं में रहते थे अथवा बाहर रहते थे बैठकों, समितियों अथवा संगोष्ठियों में। जब घर पर होते थे तो अपना अधिकांश समय वे अध्ययन में ही निकालते थे। शुरू में तो नहीं लेकिन मैंने उनके साथ रहकर देखा कि वे बहुत रिज़र्व थे। जे एन यू में उस समय कुल मिलाकर छ: हॉस्टल थे – तीन उत्तराखंड में और तीन दक्षिणापुरम में। उत्तराखंड के 109 नंबर के फ्लैट में नामवर सिंह रहते थे। वह सबसे बड़े मकानों में से एक था जिसमें चार बड़े-बड़े कमरे और एल शेप का एक बहुत बड़ा-सा ड्राइंग था। यह डुप्लेक्स मकान था जिसमें दो कमरे नीचे के तल पर थे और दो प्रथम तल पर। एक बड़ी-सी बालकनी थी और नीचे लॉन। उसमें वे नीचे के एक कमरे में नामवर जी रहते थे। उनके अपने कमरे और अन्य कमरों में पुस्तकों के अलावा उनके घर में और कुछ नहीं था। लेकिन ड्राइंग रूम में वे पुस्तकें नहीं रखते थे। हालाँकि अवकाश प्राप्ति के पश्चात् जब अलकनंदा के डीडीए फ्लैट में आये तो यहाँ उनका ड्राइंग रूम भी पुस्तकों और प्रतीक-चिन्हों से अटा पड़ा रहता था। कुछ दिनों के लिए तो उनकी डाइनिंग टेबिल भी लगभग तीन फिट की उंचाई तक किताबों से भरी हुई थी। मुझे याद आ रहा है कि जब एक दिन मैं उनसे मिलने गया तो अपने साथ मिठाई का एक पैकेट लेता गया था। हालाँकि वे मिठाई नहीं खाते थे। खाते भी थे तो बहुत ही कम और कभी-कभी। लेकिन कोई इस तरह की चीज़ लाये तो बहुत पसंद करते थे। उनके अपने कमरे में पलंग के आसपास तीन ओर लगभग चार-चार फिट की छोटी-छोटी आलमारियां लगी रहती थीं जिनमें पुस्तकें रखी थीं। नामवर जी के कमरे में किसी को भी जाने की अनुमति नहीं थी। उनके कमरे में केवल उनका नौकर अथवा सफाई करने वाली ही जा सकती थी। मैं भी उनके व्यक्तिगत कक्ष में एकाध बार तब जाता था जब कभी उनकी तबियत ख़राब हो जाती या पुस्तकों को पुनर्व्यवस्थित करवाते। वर्ष में एकाध बार तो ऐसा अवसर अवश्य आ जाता। वे स्वयं भी पुस्तकों को छांटकर इधर-उधर रखते और मुझे और मेरे किसी अन्य साथी को भी वैसा करने का तरीका समझाते। जब पुस्तकों को साफ़ करके उन्हें फिर से व्यवस्थित किया जाता तो गुरुदेव उनमें से अपने लिए कुछ कम उपयोगी पुस्तकों को निकाल कर अलग कर देते। उनके पास लगभग हर सप्ताह ही प्रकाशकों और लेखकों द्वारा भेजी गयी पुस्तकें आया करतीं थी। मुझे आश्चर्य होता था जब जब उन्हें नयी आई किताबों को बिना समय गंवाए खोलकर उलटते-पुलटते और किसी-किसी को तुरंत पढ़ते हुए देखता।

खैर, मैं उस समय अपने कमरे में लेटा सोचता था कि उनकी डांट से बचा हुआ हूँ लेकिन गुरुदेव को तो किसी न किसी से पता चल ही गया। वैसे भी ऐसी बातें तो छिपाने की नहीं होतीं बल्कि उन्हें जिज्ञासुओं द्वारा घूम-घूमकर बताया जाता है। आनंद लिया जाता है। नामवर जी को जैसे ही पता चला तो उन्होंने घर काम करने वाले अपने नौकर श्री रामदुलारे को भेजकर सतलज हॉस्टल से मुझे बुलवाया। मैं पहले तो बहुत डरा। सोचा कि जाऊं अथवा न जाऊं। मैं डरा हुआ था इसलिए कि जैसे ही गुरुदेव मुझे देखेंगे उनकी नज़र मेरी पट्टी लगी नाक की चोट पर ज़रूर जाएगी। छुपा मैं सकता नहीं। हाथ होता तो किसी तरह उनकी दृष्टि पड़ने से बचा भी सकता था। नाक को तो वे देखते ही सब समझ जायेंगे। अवश्य सोचेंगे कि हो न हो मैं पुलिस पर पत्थर फेंक रहा होऊंगा जिसके कारण मुझे भी पुलिसवाले ने पत्थर मारकर घायल कर दिया। उनसे इतना जुड़ा हुआ था और डर भी था कि उनके बुलाने पर मिलने जाने से इनकार करने की सोच भी नहीं सकता था। संकोच करते हुए उनके पास अपराधी की भांति मिलने पहुंच ही गया। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि वे मेरी चोट देखते ही डांटने की बजाय वे बहुत दुखी हो गए। देखते ही गुरुदेव ने कहा कि ‘हॉस्टल तो बंद किये जा रहे हैं। अब तुम कहाँ जाओगे। ऐसा करो कि तुम अपना सामान लेकर यहाँ आ जाओ। और जब तक ठीक न हो जाओ यहीं रहो। ऊपर वाले किसी कमरे में।’ उनकी बात सुनकर सच कहूं तो पहले मुझे विश्वास ही नहीं हुआ। वे तो अपने साथ किसी गेस्ट को भी रखना पसंद नहीं करते थे और मैं तो किसी तरह भी स्वयं को उस योग्य नहीं समझता था। छात्र जो था। हाँ, गुरुदेव के साथ मेरा रिश्ता सच्चे शिष्य का था और और वे मुझे बहुत मानते थे। उनके यहाँ मेरा आना-जाना भी लगभग नियमित था। लेकिन सब के बावजूद इतना नहीं सोच सकता था कि नामवर जी मुझे अपने घर रहने के लिए कहेंगे और वह भी अपने साथ। अध्यापक अवकाश के दिनों में अथवा किसी आवश्यक कार्य से अपने घर या कहीं बाहर जाते हैं तो अपने किसी विद्यार्थी को घर में सुरक्षा हेतु छोड़ जाते हैं। ऐसा प्रायः सब जगह होता रहता है। लेकिन गुरुदेव के साथ उनके घर में मुझे रहने का मौका मिलेगा यह मेरे लिए कल्पनातीत था। ऐसा तो मैं अपने किसी निकट सम्बन्धी अथवा रिश्तेदार के बारे में भी नहीं सोच सकता था।

मैं गुरुदेव के साथ उनके अपने घर में रहने की बात से ही बहुत डर गया पर उनका आदेश न टाल सका। डरते-डरते नयी चुनौती का सामना करने के लिए दृढ सकल्प होकर अगले दिन उनके घर पहुँच गया। सामान मेरे पास बहुत था नहीं। किताबें ही अधिक थीं। कुछ गमले थे। एक ट्रंक था जिसमें कुछ कपडे थे। डनलप का एक मोटा-सा गद्दा था। मैंने किताबें तथा अन्य सामान हॉस्टल में ही नियत स्थान पर रख दिए। एक अटैची में कुछ कपड़े और ज़रूरी पुस्तकें आदि लेकर गुरुदेव के घर पहुँच गया। वे घर पर नहीं थे। मुझे बहुत दिन तो उनके पास रहना नहीं था। उनके आदेश का पालन भर करना था। सोचा कि एक दो दिन के बाद जब चोट ठीक हो जाएगी तो कहीं चला जाऊँगा। अतः अपना संकुचित सा सामान एक कमरे में लगी किताबों के बराबर में रख दिया। सामान रखकर मैं वापस अपने होटल चला आया। सोचता रहा कि क्या करूं? गुरुदेव के घर पुनः जाने में संकोच हो रहा था। कशमकश में था कि जाऊं या न जाऊं। तभी रामदुलारे मुझे खोजता हुआ हॉस्टल में आ धमका। उसे देखते ही मेरा दिल बैठ गया। रामदुलारे ने ताव के साथ कहा कि ‘चलिए, डा। साहब आपको बुला रहे हैं। अभी आये थे तो उन्होंने आते ही पूछा कि महेन्द्रपाल, कहाँ हैं?’ दरअसल गुरुदेव मेरा पूरा नाम नहीं लेते थे। वे मुझे ‘महेन्द्रपाल’ ही हमेशा कहा करते। जब मेरी किसी बात से दुखी हो जाते यानी कि मैं उनसे बहुत दिनों के बाद मिलता या उनके बताये किसी काम को समय से न कर पाता तो मुझसे अनमने-से हो जाते। तब वे मेरा पूरा नाम लेकर किंचित व्यंग्य के साथ पुकारते। तब कहते ‘का हो डा। महेन्द्रपाल शार्मा। कहाँ थे अब तक?’ मैं उनके मंतव्य को समझ जाता। हालाँकि ऐसा एक दो बार ही हुआ होगा जब उनका कोई आदेश मैंने न माना हो। मुझे उनसे मिलना और बातें करना हमेशा बहुत ही अच्छा लगता था। वे साहित्य, साहित्यकारों और साहित्य-जगत की ही चर्चा प्रायः किया करते थे। लोगों की आलोचना और उनके गुण-दोषों में उनकी रूचि कम ही होती थी। हालाँकि किसी की शिकायतों को बड़े ध्यान से सुनते थे। दुनियाभर की बातें सुनाते थे। अनुभवों का भंडार था उनके पास। उनको सुनना मेरे लिए सदैव प्रेरणादायक रहता। वैसे भी उनके पास समय कम ही रहता था। इसलिए मैं कोई मौका न छोड़ता उनके साथ कहीं जाने का। लेकिन यह स्थिति अलग थी। इस ऊहापोह की हालत में मैं राम दुलारे को देखता रहा। मेरी असमंजस कि स्थिति को भांपकर राम दुलारे बोला कि ‘चलिए न अब? रहिये कुछ दिन। आप भाग्यशाली हैं जिसको उन्होंने यह मौका दिया है। वे तो अपने मित्रों तक को अपने पास नहीं ठहरने देते।’ राम दुलारे की वह बात सुनकर मैं गर्व से भर गया। माथा ऊँचा हो गया। रामदुलारे के साथ मैं गुरुदेव के घर के लिए चल दिया। दुलारे मुझे घर के पहली मंजिल वाले कमरे में ले गया। बोला कि ‘डा। साहब ने इसमें रहने के लिए कहा है।’ मैं लगभग एक महीने उनके घर में रहा। इस बीच पूरी सावधानी बरतता कि उनको मेरे वहां रहने से किसी तरह कि परेशानी न हो। उनके रोजाना के शिड्यूल में किसी तरह का व्यवधान न पहुंचे। गुरूजी का दैनिक जीवन बहुत ही नियमित रहता था। वे नाश्ता, दोपहर का खाना और डिनर निश्चित समय पर करते थे। सुबह और शाम कभी भी टहलना न छोड़ते। मैं उनके नाश्ता करने के बाद ही कमरे से निकलता। मैं हालाँकि रह तो उन्हीं के घर में रहा था पर कुछ इस तरह जैसे दांतों के बीच जीभ। उनके सो जाने के बाद घर पहुँचता और या तो सुबह-सुबह निकल जाता या उनके नाश्ता कर लेने के बाद बाहर जाता। गुरूजी नाश्ता करने के बाद थोड़ी देर ड्राइंग रूम में बैठकर अखबार पढ़ते और उसके बाद अपने कमरे में चले जाते। उन दिनों विश्वविद्यालय बंद था। हड़ताल ख़त्म हो गयी थी तथा गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी थीं। मैं घर में तो रहता था पर ऐसे चलता जैसे कि मेरे पैरों में मेंहदी लगी हो। बिना आवाज़। जब अन्दर आता तो चुपचाप सीढ़ियों पर चलता ऊपर के कमरे में चला जाता। धीरे से दरवाज़ा बंद करता। वे उस समय अपने अध्ययन में व्यस्त रहते। उनको मेरे आने और जाने का पता ही नहीं चलता होगा। गुरुदेव के घर में रहते हुए भी जब तीन दिनों तक उन्होंने मुझे नहीं देखा तो रामदुलारे से मेरे बारे में पूछा। दुलारे ने ही मुझे बताया कि ‘डा। साहब पूछ रहे थे आपके बारे में। कह रहे थे कि महेन्द्रपाल यहीं रहते हैं कि कहीं चले गए?। आप उनसे मिल लीजिये। नाराज़ हो रहे थे कि वह नाश्ता और खाना यहाँ क्यों नहीं खाता? मैंने दुलारे से कहा कि तुमने उनको बताया ही क्यों कि मैं खाना घर में नहीं खाता।?’ दुलारे कहने लगे कि ‘वे आपको देखते नहीं हैं क्या? आप जब से आये हैं, उनसे मिले ही कब? कह रहे थे कि उससे कहो कि मेरे साथ नाश्ता किया करे। कहना कि उससे कुछ बात भी करनी है।’ मैं रामदुलारे की बात सुनकर डर गया। सोचा कि न जाने क्या कहेंगे? अगले दिन जल्दी तैयार होकर नीचे ड्राइंग रूम में पहले ही पहुँच गया। डाक्टर साहब जब आये मैं पहले से ही सोफे के दूसरी तरफ रखी कुर्सिओं में से एक पर बैठा हुआ था। उन्होंने आते ही खाने की टेबिल पर बैठते हुए मुझसे कहा। ‘तुम अपना नाश्ता यहाँ क्यों नहीं करते? संकोच करते हो क्या? समय पर उठा करो। युवा हो। तुमको नियमित घूमने जाना चाहिए। जीवन में समय की पाबन्दी ज़रूरी है। अनुशासन आवश्यक है। पढ़ने-लिखने का भी समय निश्चित होना चाहिए। दिनभर भटकते रहते हो। आज से मेरे साथ ही नाश्ता किया करो।’ गुरूजी का लम्बा सुझावों से भरा व्याख्यान सुनकर मेरा तन और मन दोनों भर गए। पेट भर गया। खाना क्या खाता? वैसे भी वे बहुत सादा भोजन करते थे। बाहर तो खाने में परहेज नहीं कर पाते थे पर घर पर बहुत कम घी-तेल और कम मसाले का खाना खाया करते थे। नाश्ते में दो ब्रेड-टोस्ट, एक गिलास दूध, दलिया या कॉर्नफ्लेक्स या एक अंडा। बस। उनके नाश्ते में ब्रेड, दलिया अथवा कॉर्नफ्लेक्स अवश्य होता था। दलिया बहुत पतला और बहुत ही कम चीनी वाला होता था। लंच के समय मैं बाहर ही रहता था। रात का भोजन भी उनका बहुत सादा होता था। मैं हॉस्टल में खाना खता था जो बहुत मसालेदार होता था, इसलिए मुझे गुरूजी के घर का भोजन बहुत सादा लगता था। एक तो उनके साथ उनके घर में खाने की मेज पर बैठकर खाना ही कड़ी चुनौती भरा था और उस पर भी करेले की सब्जी, जिसमें करेला बिना मसाले का तथा लगभग उबला हुआ। बहुत पतली-सी प्रायः अरहर या मूंग की दाल। साथ में बिना घी लगी रोटियां। गुरूजी का प्रेम मेरे लिए उस एक महीने में बहुत ही चुनौतीपूर्ण था। लेकिन मैंने उनके एक नए पक्ष को भी देखा। वे मीठी वस्तुएं खाने से बचते थे हालाँकि उस प्रकार की कोई बीमारी उनको नहीं थी। हाँ, सावधानी अवश्य बरतते थे। वे प्रतिदिन जब भी मिलते अनेक विषयों पर चर्चा करते। जीवन-जगत के बहुत से अनछुए पक्षों के बारे में उन्होंने मुझे बताया। एक दिन उन्होंने मेरे परिवार के बारे में पूछा और खेतीबाड़ी की चर्चा की। मेरी बात सुनकर वे अपने गाँव के बारे में बात करने लगे। उन्होंने कहा कि ‘गाँव की हमारी ज़मीन आयताकार थी यानी चौड़ाई में कम और लम्बाई में ज्यादा। उन्हीं दिनों खेतों की सिचाई के लिए पानी एक नाला हमारे गाँव से होकर निकला। इत्तेफाक से वह हमारे खेतों के बीच से निकला। परिणामस्वरूप लम्बाई में होने के कारण हमारी बहुत सारी खेती की ज़मीन उस नाले में चली गयी। मना कर नहीं सकते थे सरकारी आदेश जो ठहरा। अतः रातों-रात दो तिहाई हमारी ज़मीन हमारे हाथ से निकल गई।’ इतना कहकर गुरूजी हंसने लगे। मैंने उनके साथ रहकर जाना कि वे देखने में बहुत सख्त पर अन्दर से बहुत ही विनोदी प्रकृति के भी थे। मुझे जहाँ तक मालूम है कि वे कभी किसी विद्यार्थी से काम लेने से परहेज करते थे और कभी ऐसी कोई इच्छा ज़ाहिर नहीं करते थे। बहुत ही रिजर्व स्वभाव वाले थे। उनको किसी कार्य के लिए ‘ना’ सुनना पसंद नहीं था। आरंभ में तो कोई सिफारिश भी किसी से नहीं करते थे पर यदि करते भी तो केवल उसी सूरत में जब उनको विश्वास होता कि सिफारिश सुनने वाला उनकी बात का मान रखेगा। भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् की ओर से 1998 में जब मेरा चयन वॉरसॉ विश्वविद्यालय, पोलेंड में हिंदी अध्यापन के लिए हुआ तो मैं जाते समय उनका आशीर्वाद लेने उनके घर गया। वे बहुत खुश हुए और उन्होंने वहां के निदेशक प्रोफेसर मारिया क्रिश्तोफ़ ब्रिस्की के नाम एक पत्र लिखा। मुझे बिना दिखाए ही पत्र को एक लिफाफे में उन्होंने बंद भी कर दिया और मुझे थमा दिया। कहने लगे कि ‘प्रो। ब्रिस्की मेरे पुराने मित्र हैं। वे तुम्हारी वहां मदद करेंगे।’ मैं समझ गया कि गुरूवर ने मेरी प्रशंसा में ही पत्र लिखा होगा। पोलेंड जाने पर जब मैं ब्रिस्की साहब से मिला तो मैंने वह बंद लिफाफा प्रो। ब्रिस्की साहब को थमा दिया। पत्र पढ़ते ही प्रो। ब्रिस्की का चेहरा खिल उठा। कहने लगे कि ‘प्रो। नामवर सिंह जैसा व्यक्ति मुझे पत्र लिख रहा है, यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है। वे लिख रहे हैं कि मैं आपका अभिवावक बनूँ। मुझे आश्चर्य है कि उन्होंने मुझे इस लायक समझा।’ मैं तो पूरे प्रसंग के बारे में कुछ समझ ही नहीं पाया, पर पता चला कि ‘अभिवावक’ शब्द प्रो. ब्रिस्की के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। मुझसे कहने लगे कि ‘कहिये मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?’

महत्त्वपूर्ण है कि मेरे वॉरसॉ प्रवास के दौरान प्रो. ब्रिस्की ने मेरी हर समस्या का समाधान निकाला। जब भी मिलते मुझसे उसी भाव से मिलते कि वे मेरे अभिवावक हैं। वस्तुतः प्रो. ब्रिस्की बनारस में पढ़ चुके थे। भारत में पांच वर्ष तक पोलेंड के राजदूत भी रहे थे। वे बनारस से ही प्रो। नामवर सिंह को जानते थे और उनको बहुत मानते थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि देश में ही नहीं विदेश में भी हम जैसे छात्रों को नामवर सिंह के नाम का लाभ मिलता है। एम्स में इलाज के लिए भर्ती के दौरान उनसे मिलने नहीं बल्कि उनको देखने जाता था। अस्पताल में रहते हुए उनकी हालत प्रायः गंभीर ही बनी रही। जिन दिनों उनकी स्थिति में किंचित सुधार हुआ तो एक शाम मैं उनसे आईसीयू में उनको देखने गया। अन्दर उनके बेड के समीप कान पर धीरे से उनको ‘नमस्ते सर’ कहा तो उत्तर केवल हल्की-सी ‘हूँ’ में मिला। आशय स्पष्ट नहीं था। कितना पहचाना कह नहीं सकता। वापस लौटने पर अजीब-सी अनुभूति हुई। फिर…

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
अतिथि सम्पादक : बृजेश कुमार यादव  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

Post a Comment

और नया पुराने