शोध आलेख : प्रेमचंद के साहित्य का समाजशास्त्र, जाति का सवाल और नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि / अमिष वर्मा

प्रेमचंद के साहित्य का समाजशास्त्र, जाति का सवाल और नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि
- अमिष वर्मा

नामवर सिंह ने प्रेमचंद संबंधी अपने एक लेख ‘विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता’ में श्री पूरन चंद्र जोशी के एक कथन को उद्धृत किया है- “प्रेमचंद का मूल्यांकन उनके प्रशंसकों एवं उनके आलोचकों- दोनों के प्रयत्नों द्वारा गौण, निर्जीव और अनैतिहासिक प्रश्नों की भूलभुलैया में ऐसा पथभ्रष्ट या मार्गच्युत हो गया है कि न वह भारतीय जीवन में प्रेमचंद के ऐतिहासिक महत्त्व को समझ पा रहा है, न महान कला और कलाकार के सामाजिक उद्गम स्रोतों को।”[1] बहुत साफ है कि श्री पूरन चंद्र जोशी प्रेमचंद का मूल्यांकन भारतीय जीवन के संदर्भ में करने की बात कर रहे हैं और साथ ही उनके साहित्य के सामाजिक उद्गम की शिनाख्त करने पर ज़ोर दे रहे हैं। भारतीय सामाजिक जीवन के वे कौन-कौन से पहलू हैं, जिनसे प्रेमचंद के साहित्य का गहरा संबंध है? क्या भारतीय सामाजिक जीवन के उन पक्षों के साथ जोड़कर प्रेमचंद के साहित्य का मूल्यांकन किया गया है? जाति भारतीय सामाजिक जीवन का सबसे बड़ा और सबसे जटिल यथार्थ है। प्रेमचंद के साहित्य का बहुत गहरा संबंध भारतीय समाज के इस जाति-यथार्थ से है। लेकिन हिन्दी आलोचना (दलित विमर्श को छोड़कर) ने जाति के सवाल को प्रायः अनदेखा ही किया है। क्या नामवर सिंह प्रेमचंद के साहित्य में मौजूद जाति के सवाल पर विचार करते हैं और अगर करते हैं तो किस प्रकार? प्रस्तुत लेख में इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द नामवर जी की प्रेमचंद संबंधी आलोचना का मूल्यांकन करने का प्रयास किया गया है।

मार्च 1981 के अपने एक भाषण में नामवर जी स्वयं कहते हैं कि “भारत की अपनी स्वकीय उपन्यास परंपरा मूलतः ग्रामीण ही है। स्वभावतः इस ठेठ भारतीय उपन्यास का उदय पहले-पहल भारत के उस भूभाग में संभव न था, जहाँ पश्चिम के सर्वप्रथम संपर्क के कारण मध्यवर्ग विकसित हो चुका हो। उसके उदय के लिए अपेक्षाकृत पिछड़े हुए इलाके ज़्यादा उपयुक्त हो सकते हैं...।”[2] भारतीय उपन्यासों के उदय को नामवर जी जिन पिछड़े हुए ग्रामीण इलाकों से जोड़ते हैं और स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन इलाकों में मध्यवर्ग विकसित नहीं हुआ था, स्वाभाविक है कि वे ग्रामीण इलाके जातियों में विभाजित समाज ही रहे होंगे। लेकिन वही नामवर जी जब ‘हिन्दी के पिछड़े इलाके में विकसित’ प्रेमचंद के साहित्य का विश्लेषण करते हैं तब वे प्रेमचंद की दृष्टि की ‘अचूक वर्ग चेतना’[3](!) की प्रशंसा करते हैं, प्रेमचंद के पूरे साहित्य में मौजूद ग्रामीण भारतीय समाज की गहरी ‘जाति चेतना’ तक नामवर जी की दृष्टि नहीं पहुँचती! नामवर जी कहते हैं कि “प्रेमचंद को यह वर्ग-चेतना किसी पुस्तक से नहीं, बल्कि स्वयं अपने जीवन के अनुभवों से प्राप्त हुई थी।”[4] प्रेमचंद जिस समाज के नागरिक थे वहाँ जाति बड़ी सच्चाई रही है या वर्ग? क्या प्रेमचंद के जीवनानुभव में जाति का अनुभव शामिल नहीं है? ऐसा भी नहीं है कि नामवर जी का ध्यान प्रेमचंद के साहित्य में अभिव्यक्त हो रहे जाति के यथार्थ की तरफ नहीं गया है। स्वयं नामवर जी 23 फरवरी, 1980 के बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के एक समारोह में दिए गए व्याख्यान में प्रेमचंद की ’30 से लेकर ’36 तक की कहानियों के बारे में कहते हैं कि “गाँव वगैरह की कहानियों में पचास फीसदी कहानियाँ छोटी जाति को लेकर लिखी गयी हैं अथवा पिछड़ी जाति को लेकर लिखी गयी हैं।”[5] फिर भी, दिलचस्प है कि उसी व्याख्यान में नामवर जी कहते हैं कि “उनके (प्रेमचंद के) उपन्यासों का समूचा सार वर्ग-संघर्षों की गाथा कहता है, वर्ग-संघर्ष के स्वर को गुंजित करता है...।”[6] इस मामले में नामवर जी रामविलास शर्मा के प्रेमचंद संबंधी उस भ्रामक निष्कर्ष की ही पुष्टि करते हैं, जिसमें रामविलास जी ने लिखा है कि “ऊँच-नीच के भेदभाव के प्रति प्रेमचंद से अधिक सचेत और कोई हिन्दी लेखक नहीं था। पर उनके कथा साहित्य में वर्ग-संघर्ष है, जमींदारों, महाजनों, अंग्रेजी राज के हाकिमों के विरुद्ध संघर्ष है, अगड़ी-पिछड़ी जातियों के बीच संघर्ष नहीं है।”[7] ‘ठाकुर का कुआँ’ कहानी की गंगी, ‘मंदिर’ कहानी की सुखिया, ‘सवा सेर गेहूँ’ कहानी का शंकर, ‘घासवाली’ कहानी की मुलिया और ऐसे कई पात्र जो प्रेमचंद के साहित्य में आए हैं, उनका संघर्ष पिछड़ी या दलित जाति के व्यक्ति का ऊँची जाति वालों से संघर्ष है या वर्ग-संघर्ष? ‘सद्गति’ कहानी में चमारों द्वारा दुखी चमार की लाश को हटाने से इनकार कर देना दलित जाति का ऊँची जाति वालों से संघर्ष है या वर्ग-संघर्ष? लेकिन रामविलास जी अपने मार्क्सवादी उत्साह में इन प्रसंगों की ओर से आँखें फेर लेते हैं और वर्ग-चेतना के चश्मे से प्रेमचंद के पूरे साहित्य को देखते हैं। लिहाजा उनको प्रेमचंद के साहित्य में वर्ग-संघर्ष और वर्ग-विभाजन तो बहुत साफ दिखाई पड़ता है, मगर कहीं भी भारतीय समाज का जाति-संघर्ष और जाति-यथार्थ दिखाई नहीं पड़ता। नामवर जी रामविलास शर्मा से थोड़ा आगे ज़रूर बढ़ते हैं, मगर घूमकर वापस वहीं पहुँच जाते हैं। अगस्त 1996 में दिए गए ‘दलित साहित्य और प्रेमचंद’ विषयक अपने एक भाषण में नामवर सिंह प्रेमचंद की कहानियों ‘सद्गति’ और ‘ठाकुर का कुआँ’ को एक साथ पढ़ने की सलाह देते हुए कहते हैं- “‘सद्गति’ एक पुरोहित के अत्याचार की कहानी कहती है और ‘ठाकुर का कुआँ’ एक राजपूत जमींदार के अत्याचार की कहानी कहती है। ये दोनों पूरक हैं। शताब्दियों तक इस देश में धर्माध्यक्ष ब्राह्मणों और राज्य करने वाले क्षत्रियों ने मिलकर बाकी वर्गों को लूटने की कोशिश की। प्रेमचंद की इन दोनों कहानियों को साथ रखकर देखने से ये परिदृश्य (सिनेरियो) हमारे सामने आता है।”[8] नामवर जी प्रेमचंद के साहित्य में शताब्दियों के जातिवादी शोषण के पूरे परिदृश्य की ठीक-ठीक पहचान करते हैं और साथ ही ब्राह्मणों-ठाकुरों के जातिवादी शोषक रूप को भी रेखांकित करते हैं, मगर वहाँ भी ‘वर्ग’ का तड़का लगा देते हैं- ‘धर्माध्यक्ष ब्राह्मणों और राज्य करने वाले क्षत्रियों ने मिलकर बाकी वर्गों को लूटने की कोशिश की’! नामवर जी या कहना चाहिए हिन्दी की पूरी मार्क्सवादी आलोचना साहित्य के समाजशास्त्र पर बात करते हुए सायास तरीके से जाति के सवाल पर बात करने से बचती रही है। मज़ेदार बात तो यह है कि खुद नामवर जी भी जाति के सवाल पर चुप्पी साधने के लिए भारतीय वामपंथ की आलोचना करते हैं। 2001 के अपने एक साक्षात्कार में नामवर जी जाति के प्रश्न पर वामपंथ की स्थिति की आलोचना करते हुए कहते हैं- “वह (जाति) आज और भी मजबूत होती दिखाई पड़ रही है।...इसलिए कि वामपंथ आपके यहाँ कमजोर है। और वामपंथ ऐसे प्रश्नों को महज सांस्कृतिक (मेयरली कल्चरल) समझता है। वह आर्थिक लड़ाई लड़ता रहा है। तो यह अर्थवाद ले बीता। सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं पर इनका ध्यान ही नहीं जाता।”[9] 2001 में नामवर जी जो बात भारतीय वामपंथ के संदर्भ में कह रहे हैं क्या वही बात हिन्दी आलोचना और स्वयं नामवर जी पर लागू नहीं होती?

नामवर जी के प्रेमचंद संबंधी आलोचनात्मक लेखन और उनके भाषणों से गुजरते हुए जो एक बात बार-बार खटकती है वह है नामवर जी द्वारा दसों बार ‘रंगभूमि’ के सूरदास को किसान और उसके संघर्ष को किसान के संघर्ष के तौर पर प्रस्तुत करना। ऐसा अगर एकाध बार हुआ होता तो इसे भूल-चूक मानकर अनदेखा किया जा सकता था, लेकिन नामवर जी इस बात को अलग-अलग मौकों पर इतनी बार दुहराते हैं कि उससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि यह नामवर जी की चूक नहीं बल्कि उनकी दृढ़ धारणा थी कि ‘रंगभूमि’ का सूरदास किसान है।

मार्च 1981 में साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में नामवर जी कहते हैं कि “औपनिवेशिक प्रश्न तत्वतः किसान प्रश्न है और औपनिवेशिक दासता के सभी रूपों से किसान की मुक्ति में ही भारत की मुक्ति है, यह बोध राष्ट्रीय चेतना में एक गुणात्मक छलाँग का संकेत है। प्रेमचंद का संपूर्ण प्रौढ़ लेखन इसी बोध का सर्जनात्मक विकास है, जिसकी मुख्य उपलब्धियाँ ‘रंगभूमि’ (1925) और ‘गोदान’ (1936) है।”[10] इस उद्धरण में देखा जा सकता है कि नामवर सिंह ‘गोदान’ की तरह ‘रंगभूमि’ में भी किसान प्रश्न और किसान मुक्ति की तलाश करते हैं। इसी भाषण में आगे नामवर जी कहते हैं- “‘रंगभूमि’ सामंतवाद से पूँजीवाद में संक्रमण की कथा नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दमन की त्रासदी है, जिसमें पाँच बीघे जमीन के मालिक सूरदास का हीरोइक विरोध अपने पूरे गौरव के साथ प्रकट होता है। ‘रंगभूमि’ भारतीयता की ऐसी तेजस्वी प्रतिमा प्रस्तुत करता है जिसमें शारीरिक दुर्बलता के बीच भी अलौकिक बल है, परहित के लिए आत्मत्याग की भावना है, निष्काम संघर्ष की नैतिकता है, और है भारतीय किसान की आश्चर्यजनक दृढ़ता।”[11] भारतीयता के आदर्श और उसकी तेजस्विता को भारतीय किसान से जोड़ने के उत्साह और ‘रंगभूमि’ के अंधे, दलित, भिखारी सूरदास में उन आदर्शों को साक्षात पाकर नामवर जी सूरदास को किसान समझ लेने की भूल करते हैं। इस भूल की एक वजह सूरदास का ‘पाँच बीघे जमीन का मालिक’ होना भी है। हालाँकि नामवर जी यहाँ भी एक तथ्यात्मक भूल करते हैं। सूरदास के पास पाँच बीघे नहीं, बल्कि दस बीघे जमीन है।[12]

अगस्त, 1996 में ‘दलित साहित्य और प्रेमचंद’ विषयक भाषण में नामवर जी कहते हैं- “रंगभूमि की विषयवस्तु अछूतों की समस्या नहीं है, सूरदास उसमें एक किसान की हैसियत से आता है। यद्यपि वह जाति का चमार है, लेकिन उसके पास काफी जमीन है।”[13] नामवर जी बिल्कुल ठीक कहते हैं कि ‘रंगभूमि’ की समस्या अछूतों की समस्या नहीं है, मगर नामवर जी की यह बात बिल्कुल गलत है कि सूरदास उसमें एक किसान की हैसियत से आता है। पूरे उपन्यास में कहीं पर भी सूरदास का चित्रण प्रेमचंद ने किसान की तरह नहीं किया है, एक भी प्रसंग पूरे उपन्यास में ऐसा नहीं है, जिसमें सूरदास खेती करता हुआ या कम-से-कम खेती की चिंता करता हुआ दिखायी पड़ता हो। खेती सूरदास की आजीविका का साधन नहीं है। सूरदास की जमीन पर कोई खेती नहीं होती, वह परती पड़ी हुई जमीन है, जो गाँव के मवेशियों का चारागाह है। असल में नामवर जी की दृष्टि सूरदास की जमीन पर अटक गयी है। अलग-अलग व्याख्यानों और लेखों में नामवर जी द्वारा अनेक बार सूरदास को किसान कहने के पीछे का कारण संभवतः उसके पास दस बीघे जमीन का होना ही है। भारतीय सामाजिक-आर्थिक संरचना ऐसी है जिसमें दलित प्रायः भूमिहीन मजदूर हैं। नामवर जी इस बात को जानते हैं, और इसलिए वह कहते हैं कि ‘यद्यपि वह जाति का चमार है, लेकिन उसके पास काफी जमीन है।’ लेकिन इसके बाद नामवर जी बस जमीन को पकड़ लेते हैं और सूरदास को जबरन किसान बना देते हैं। प्रेमचंद के पूरे साहित्य को खंगाल लेने पर भी एक भी किसान न तो किसी दलित जाति का मिलता है और न ऊँची जातियों का। प्रेमचंद के यहाँ किसान होरी है, मनोहर है, शंकर है, हल्कू है, और ये सब-के-सब पिछड़ी जाति के किसान हैं। क्या यह महज एक संयोग है? भारतीय किसान की सामाजिक पहचान प्रेमचंद के साहित्य में बहुत स्पष्ट है।[14] स्वयं नामवर जी भारतीय उपन्यास के आरंभ को मध्यवर्ग की जगह किसानों से जोड़ते हुए उड़िया के महान लेखक फकीर मोहन सेनापति के जिस प्रसिद्ध उपन्यास ‘छह बीघा जमीन’ का हवाला एकाधिक बार देते हैं, उस उपन्यास में भी किसानों और जमींदारों की सामाजिक-जातिगत हैसियत बहुत साफ है। उस उपन्यास का शोषित किसान पात्र भगिया भी पिछड़ी जाति (ताँती) का है।

असल में भारतीय किसान, मजदूर और जमींदारों की सामाजिक अवस्थिति को लेकर नामवर जी की दृष्टि साफ और सुलझी हुई नहीं है। और अपनी उलझी हुई दृष्टि के कारण वे प्रेमचंद की बेहद साफ दृष्टि को भी उलझा देते हैं। नामवर जी ‘दलित साहित्य और प्रेमचंद’ विषयक अपने एक भाषण में कहते हैं- “प्रेमचंद बहुत पहले से दलितों को या तो मजदूर के रूप में देखते थे या तो किसान के रूप में देखते थे। ‘कायाकल्प’ में उन्होंने स्वयं दलितों को मजदूर कहा है।”[15] प्रेमचंद दलितों को मजदूर के रूप में देखते थे यह बात सही है, लेकिन वे दलितों को किसान के रूप में कहीं नहीं दिखाते। नामवर जी अपने भाषण में केवल यह बता कर रुक जाते हैं कि ‘कायाकल्प’ में प्रेमचंद ने स्वयं दलितों को मजदूर कहा है, लेकिन यह नहीं बताते कि उन्होंने दलितों को किसान कहाँ कहा है। असल में प्रेमचंद के दलित मजदूरों को जबरन किसान बनाने का काम नामवर जी करते हैं। प्रेमचंद के साहित्य में भारतीय किसान की केन्द्रीय उपस्थिति से नामवर जी इतने प्रभावित हैं कि एक सिरे से उनके सारे महत्त्वपूर्ण किरदारों को किसान बना देते हैं! वे ‘रंगभूमि’ के दलित सूरदास को ही किसान नहीं बनाते, बल्कि ‘कफ़न’ कहानी के घीसू-माधव का भी कृषक-संस्कार कर देते हैं! फरवरी, 1980 के ‘राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और प्रेमचंद’ विषयक अपने व्याख्यान में पूरे जोश के साथ नामवर जी कहते हैं- “’कफ़न’ कहानी को ही लीजिए। इसे निराशा और पस्ती की कहानी के रूप में नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह कहानी ‘प्रोटेस्ट’ और ‘विद्रोह’ की कहानी है, जो गाँव की जमींदारी व्यवस्था के विरुद्ध अपनी नाकामी ज़ाहिर करनेवाले किसान व्यक्त करते हैं।”[16] मतलब घीसू और माधव किसान हैं जो गाँव की जमींदारी के खिलाफ प्रोटेस्ट करते हैं! नामवर जी प्रेमचंद के साहित्य का अद्भुत समाजशास्त्रीय विश्लेषण करते हैं!

‘दलित साहित्य और प्रेमचंद’ विषयक भाषण में नामवर जी एक प्रसंग में कहते हैं- “प्रेमचंद एक अरसे से धर्म के नाम पर हिन्दू धर्म में जो पाखंड आ गया था, उसके विरुद्ध थे। उस पाखंड के रक्षक पुरोहित वर्ग के लोग थे। इस पाखंड के रक्षक जमींदार लोग थे। जो संयोग से जाति में या तो राजपूत होते थे या कुछ साहूकार, बनिया होते थे।”[17] क्या जमींदार लोग संयोग से जाति में राजपूत या साहूकार, बनिया होते थे? क्या नामवर सिंह का स्वयं का सामाजिक अनुभव सचमुच ऐसा था कि जमींदारों का राजपूत या बनिया या तथाकथित ऊँची जाति का होना उन्हें महज संयोग मालूम पड़े? ‘इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ खुदा...’! प्रेमचंद के पूरे साहित्य के समाजशास्त्र को, भारतीय समाज के जाति आधारित अर्थशास्त्र की उनकी गहरी समझ को नामवर जी महज संयोग में डायल्यूट कर देते हैं।

केवल पास में कुछ बीघे जमीन होने से कोई किसान नहीं हो जाता। किसान होने की शर्त है खेती करना। ‘गोदान’ के होरी के पास ‘रंगभूमि’ के सूरदास से कम जमीन है, केवल पाँच बीघे। लेकिन होरी किसान है, सूरदास किसान नहीं है। प्रेमचंद के किसान अपने पूरे परिवार के साथ अपने खेतों में स्वयं खेती करते हैं। उनके खेत में अगर कोई दलित मजदूर मजदूरी करता है तो वे स्वयं आराम से बैठकर उसे आदेश नहीं देते, बल्कि उसके साथ खुद भी पसीना बहाते हैं। दूसरी तरफ प्रेमचंद के साहित्य में पंडित दातादीन जैसा पात्र भी है, जिसके पास दस बीघे जमीन है, लेकिन वह अपने खेतों में कभी काम नहीं करता, धन्ना चमार और सिलिया उसके खेतों में काम करते हैं। खेती दातादीन की आजीविका का साधन भी नहीं है। उसकी जमींदारी तो जजमानी है। कहने का आशय बस इतना है कि प्रेमचंद के साहित्य में भारतीय किसान, मजदूर और भूमिपति जमींदारों की जातिगत पहचान बहुत ही स्पष्ट है। बल्कि केवल प्रेमचंद ही नहीं, उन्नीसवीं सदी के अंत में उड़िया के महान लेखक फकीर मोहन सेनापति से लेकर इक्कीसवीं सदी में शिवमूर्ति (अगम बहै दरियाव) तक के साहित्य में भारतीय समाज में किसान, मजदूर, जमींदार जैसे वर्गों की जातिगत पहचान बहुत ही स्पष्ट है, जहाँ किसान पिछड़ी जाति के हैं, मजदूर प्रायः दलित हैं और जमींदार प्रायः ऊँची जातियों के हैं। बावजूद इसके ‘रंगभूमि’ के सूरदास को नामवर जी बार-बार न केवल किसान के रूप में प्रस्तुत करते हैं, बल्कि उसे किसान बनाकर कई महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष भी निकाल लेते हैं। स्वाभाविक है कि ऐसे निष्कर्ष भ्रामक होंगे। इसका एक उदाहरण देखिए। ‘रंगभूमि’ में साम्राज्यवाद और सामंतवाद के गठबंधन के सशक्त विरोध की पहचान करते हुए नामवर जी लिखते हैं- “इस विरोध का नायक है- ‘सूरदास’, अंधा, भिखारी, जाति का चमार... प्रेमचंद ने अपने इस उपन्यास-नायक में भारत के अजेय किसान को मूर्तिमान किया है।”[18] अब देखिए कि सूरदास के संघर्ष को किसान का संघर्ष बता देने से कितना भ्रामक निष्कर्ष सामने आता है कि प्रेमचंद के किसान अजेय हैं, जबकि प्रेमचंद के पूरे साहित्य में एक भी किसान सूरदास की तरह साहसी और अजेय नहीं है। प्रेमाश्रम के किसानों के संघर्षों को छोड़ दें तो प्रेमचंद का किसान कदम-कदम पर समझौते करता है, दबता है, झगड़ा-झंझट से सौ कोस दूर भागता है। उसे पता है कि उसकी गर्दन किसी के पाँव के नीचे दबी है और वह उसे सहलाना ही बेहतर समझता है। शायद यही कारण है कि प्रेमचंद ने रंगभूमि का नायक किसी किसान को नहीं बनाया। लेकिन नामवर जी रंगभूमि के नायक को जबरन न केवल किसान बना देते हैं, बल्कि ‘अजेय किसान’ बना देते हैं!

इसी तरह एक और प्रसंग में नामवर जी सूरदास को किसान मानकर ‘गोदान’ के होरी से उसकी तुलना करते हुए दोनों की परिस्थितियों की ऐतिहासिक व्याख्या करने लगते हैं- “मसलन ‘रंगभूमि’ में भिखारी सूरदास तनकर खड़ा होता है।...यह समय 1924 का है, जहाँ प्रेमचंद एक किसान को लड़ता हुआ दिखाते हैं। वही प्रेमचंद 1936 में ‘गोदान’ में एक ऐसा किसान दिखाते हैं, जिसके पास जमीन है, दुनिया भर की चीज़ें हैं और वह बिल्कुल नहीं लड़ता है, हारता चला जाता है, हारता चला जाता है, दबता रहता है। इसकी व्याख्या हम कैसे करेंगे?”[19] सूरदास के चरित्र को सही सामाजिक संदर्भ में न समझने के कारण ही नामवर जी सूरदास और होरी की ऐसी तुलना करते हैं, जबकि सूरदास का संघर्ष एक किसान का संघर्ष है ही नहीं।

नामवर जी के विचारों का उलझाव प्रेमचंद के किसानों के ‘मरजाद’ के संदर्भ में भी उभर कर सामने आता है। नामवर जी ‘मरजाद’ के सवाल को अनावश्यक रूप से दलितों से जोड़ देते हैं। वे मरजाद की बात शुरू तो करते हैं होरी के प्रसंग में, लेकिन उसे जबर्दस्ती दलितों की पाँच हजार साल की गुलामी से जोड़ देते हैं। 2005 में दिए गए अपने एक भाषण में नामवर जी कहते हैं- “यदि पाँच हजार साल तक ये दलित गुलाम रहे हैं तो बाहरी बंधन से ज्यादा खुद उनके अपने जो संस्कार थे जिसको उन लोगों ने आभ्यंतरीकृत कर लिया था। प्रेमचंद कह रहे थे कि जब तक ये मरजाद की परिकल्पना रहेगी वे उससे मुक्त नहीं हो पाएँगे। क्योंकि उन्हें उस मरजाद ने बाँध रखा था।”[20] मज़ेदार है कि अपनी स्थापनाओं को भी नामवर जी ‘प्रेमचंद कह रहे थे’ बता रहे हैं! पहली बात तो यह कि अपने पूरे साहित्य में प्रेमचंद कहीं भी मरजाद को दलितों के साथ नहीं जोड़ते। मरजाद प्रेमचंद के पूरे साहित्य में किसानों (पिछड़ी जाति) के साथ जुड़ा हुआ है और बहुत ही सकारात्मक संदर्भ में जुड़ा है। जिस कृषक संस्कृति के प्रति प्रेमचंद की आस्था थी, संयुक्त परिवार के प्रति प्रेमचंद का जो लगाव था, जिसे नामवर जी भी रेखांकित करते हैं, उन सब का संबंध दरअसल इस मरजाद से है। यह मरजाद वास्तव में प्रेमचंद के किसानों का नैतिक बल है। ध्यान में रखना होगा कि यह तथाकथित मर्यादा से सर्वथा भिन्न है। मरजाद की चिंता प्रेमचंद के किसान करते हैं, जो पिछड़ी जातियों के हैं। दलितों के संदर्भ में प्रेमचंद ने न तो कहीं मरजाद शब्द का प्रयोग किया है और न वे इसे दलितों की पाँच हजार साल की गुलामी से जोड़ते हैं। दलितों की गुलामी और शोषण की जड़ें वस्तुतः भारतीय समाज की जातिवादी-ब्राह्मणवादी संरचना में हैं और इसे अपने साहित्य में प्रेमचंद ने खूब बारीकी से चित्रित किया है। बस ज़रूरत इस बात की है कि प्रेमचंद के साहित्य में वर्ग-चेतना, वर्ग-शोषण और वर्ग-संघर्ष के साथ-साथ भारतीय समाज की जाति-संरचना, जाति-चेतना, जातिवादी शोषण और जाति-संघर्षों की अभिव्यक्तियों पर भी बात की जाए। प्रेमचंद के साहित्य में, नामवर जी से ही शब्द उधार लेकर कहें तो ‘वह जो दिन के उजाले की तरह है’ उस जाति के सामाजिक यथार्थ की बारीक अभिव्यक्ति पर तो बात करनी ही पड़ेगी। इसके बिना न तो ‘भारतीय जीवन में प्रेमचंद के ऐतिहासिक महत्त्व’ को समझा जा सकता है और न ही प्रेमचंद के साहित्य के ‘सामाजिक उद्गम स्रोतों’ को।

संदर्भ:
[1] उद्धृत, नामवर सिंह, प्रेमचंद और भारतीय समाज, संपा.- आशीष त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, 2010, पृ. 31
[2] वही, पृ. 72
[3] वही, पृ. 27
[4] वही
[5] वही, पृ. 127
[6] वही, पृ. 126
[7] रामविलास शर्मा, प्रेमचंद, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1994, पृ. 29
[8] नामवर सिंह, प्रेमचंद और भारतीय समाज, पृ. 183-184
[9] नामवर सिंह, बात बात में बात, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, 2006, पृ. 292
[10] नामवर सिंह, प्रेमचंद और भारतीय समाज, पृ. 68
[11] वही, पृ. 69-70
[12] देखें- प्रेमचंद, रंगभूमि, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली, पृ. 47
[13] नामवर सिंह, प्रेमचंद और भारतीय समाज, पृ. 179
[14] विस्तार के लिए देखें- अमिष वर्मा, ‘प्रेमचंद के किसान: जातिगत सामाजिक पहचान और मरजाद का सवाल’ (लेख), लमही (पत्रिका), वर्ष-14, अंक- 2, अक्टूबर-दिसंबर, 2021, पृ. 22-26
[15] नामवर सिंह, प्रेमचंद और भारतीय समाज, पृ. 181
[16] वही, पृ. 130
[17] वही, पृ. 181-182
[18] वही, पृ. 26
[19] वही, पृ. 162
[20] वही, पृ. 154

अमिष वर्मा
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल
9436334432, amishjnu@gmail.com

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( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
अतिथि सम्पादक : बृजेश कुमार यादव  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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