शोध आलेख : भारतीय औपन्यासिक परिदृश्य और नामवर सिंह / पवन साव

भारतीय औपन्यासिक परिदृश्य और नामवर सिंह
- पवन साव

नामवर सिंह एक साहित्यकार होने के साथ साथ एक पब्लिक इंटेलेक्चुअल के रूप में भी जाने जाते हैं। अपने जीवन के उत्तरार्ध में उन्होंने देश- विदेश के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों पर अपना पक्ष रखा। उनसे अक्सर यह शिकायत की जाती रही है कि उन्होंने पुस्तकों की रचना कम की। बावजूद इसके उन्होंने हिंदी आलोचना को प्रभावित किया और उसका वर्तमान स्वरूप निर्धारित किया। उनकी आलोचना की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे साहित्य को वृहत्तर सामाजिक संबद्धता के परिप्रेक्ष्य में देखते थे। लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि उन्होंने साहित्यिक आलोचना की अनदेखी की। वे मूलतः अनुशासनों के मध्य संवाद के पक्षधर थे। उनके पूरे लेखन में हम संवाद देखते हैं। चाहे वो परंपरा का अनधुनिकता से हो, पूर्व का पश्चिम से हो या भारत के साथ विश्व का, उन्होंने विरोधों से ज़्यादा संवाद पर ज़ोर दिया। और इस तरह ‘आलोचना के लोकतंत्र’ का निर्माण किया। उनकी सबसे चर्चित पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ वाद-विवाद-संवाद शैली के लिए ही प्रसिद्ध हुई। उन्होंने जो पुस्तकें लिखीं हैं उनके अलावा भी नामवर सिंह के नाम से कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। जिनमें नामवर जी के आलेखों, व्याख्यानों, साक्षात्कारों के लिप्यंतरित पाठ एवं सामूहिक परिसंवाद का संपादन किया गया है। यद्यपि नामवर सिंह की ख्याति कविता के आलोचक के रूप में ज़्यादा रही, पर उनका बौद्धिक चिंतन कविता तक सीमित नहीं है। उन्होंने गद्य के विकास ख़ास कर उपन्यास पर जो विचार रखे उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

नामवर सिंह ने भारतीय उपन्यास की अवधारणा प्रस्तुत की और ‘भारतीय उपन्यास की अवधारणा’, ‘अंग्रेजी ढंग का नॉवेल और भारतीय उपन्यास’ शीर्षक लेख लिखा। इसके अलावा उनके कुछ व्याख्यान हैं जैसे ‘बीसवीं शताब्दी का भारतीय साहित्य : नई चुनौतियाँ’, ‘भारत के आरंभिक उपन्यास: देश और उपन्यास का साथ- साथ जन्म’ आदि जिनमें उनके उपन्यास संबंधी चिंतन को देखा जा सकता है। ये सारे लेख और व्याख्यान ‘आधुनिक विश्व साहित्य और सिद्धान्त’1 शीर्षक पुस्तक में संग्रहीत हैं जिसका संपादन आशीष त्रिपाठी ने किया है। नामवर सिंह के इस चिंतन को वि- औपनिवेशिक विमर्श के विस्तार के रूप में देखा जा सकता है, जिसे नामवर सिंह ने प्रति- उपनिवेशीकरण कहा है। नामवर सिंह बात तो भारतीय उपन्यास की करते हैं लेकिन उनका चिंतन भारत तक सीमित नहीं है, वे तीसरी दुनिया के देशों को एक साथ अपने चिंतन में जोड़ते हैं। वि – औपनिवेशिक विमर्श का आरंभ फ़्रांट्ज़ फ़ैनन, ऐमे सेसियर, न्युगी वा थ्योंगों और डबल्यू.ई.बी डु बोइस जैसे विचारकों की स्थापनाओं से हुआ जिसमें तीसरी दुनिया के देशों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया और उपनिवेशवाद के कारणों और उसके प्रभाव पर पुनः चिंतन आरम्भ किया। साहित्य और इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है क्योंकि वि उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया ने साहित्य में यूरोप और अमेरिका के वर्चस्व को समाप्त कर दिया और उनकी जगह केंद्र में लैटिन अमेरिका, अफ़्रीका और एशिया के देश आए।

कहने को उपनिवेशवाद समाप्त हो गया है लेकिन विद्वान इस विचार पर एकमत हैं कि सांस्कृतिक उपनिवेशीकरण चाहे जितना सीमित और सतही हो, लेकिन प्रभुत्व की स्थिति में वही है।2 नामवर सिंह कहते हैं कि “उपनिवेशीकरण के नए हमले का मुकाबला कैसे करें? अपनी परंपरा से? लेकिन कौन सी परंपरा से? परंपरा स्वयं ही एक पूर्णिर्मिति है। वर्तमान द्वारा अतीत का मनोवांछित पुनराविष्कार। कल के उपनिवेशवादी और आज के साम्राज्यवादी हमारे अतीत का एक रूप प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आदिम है और बहुत कुछ हमारे पिछड़ेपन का सूचक। स्वयं हमारे घर के हिंदू सम्प्रदायवादी परंपरा के रूप में कुछ और पेश कर रहे हैं जो बेहद इकहरा है- इकहरा और संकुचित।”3 वे यह भी लिखते हैं कि “मुद्दा चाहे परंपरा और आधुनिकता का हो, चाहे क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अस्मिता के रूपगत नए प्रयोगों का हो अथवा लोकधर्मी रूपों के आत्मसात का- इन सबका समाधान प्रति- उपनिवेशीकरण के ही परिप्रेक्ष्य में संभव है।”4 लेकिन बीसवीं शताब्दी के अंत तक आते आते जहाँ दूसरे उपनिवेशवाद का शिकार रहे देशों में वि- उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया तेज हो रही थी वहीं भारत में इसका स्वर मंद हो रहा था। नामवर सिंह इससे चिंतित थे- “कभी कभी लगता है कि पिछली पीढ़ी के लेखक इस मामले में हमसे कहीं अधिक सजग और आत्मसजग थे। शायद इसलिए स्वाधीनता प्राप्त के बाद भारतीय लेखक कुछ- कुछ उपनिवेशवाद के प्रति नरम पद गए हैं। रूख में एक प्रकार का दुचित्तापन आ गया है। इस दुचित्तेपन को प्रायः आधुनिकता को आधुनिकता का लक्षण भी मान लिया जाता है। यह सिर्फ़ भद्रलोक की सामान्य शिष्टता ही नहीं, बल्कि आधुनिक साहित्यशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र का एक स्पृहणीय मूल्य भी माने जाने लगा है। भाषा तक में एक प्रकार का दुचित्तापन आ चला है।”5

नामवर सिंह जिस दुचित्तापन की बात करते हैं उसे समझना आवश्यक है। इसे समझने के लिए 19वीं शताब्दी की ओर रूख करना पड़ेगा। उपनिवेशवादी दौर में एडवर्ड सईद ने ‘ओरिएंटलिज्म’ के द्वारा भारतीयता को परिभाषित किया, जिसपर काफ़ी चर्चा हुई और हर लेखक ने भारतीयता को अपने अपने ढंग से समझने का प्रयास किया। और अब उत्तर उपनिवेशवादी काल में वही ‘न्यू ओरिएंटलिज्म’ के नाम से प्रचलित है। आज भी साम्राज्यवादी ताकतें पश्चिमी कैनन से भारत के साहित्य को देखने की कोशिश कर रही हैं लेकिन 19वीं शताब्दी की अपेक्षा आज का साहित्यकार इससे समझौता करने को तैयार है। नामवर सिंह कठोर शब्दों में कहते हैं कि “आज बहुत से भारतीय लेखक विदेशी अदालत में न्याय के लिए खड़े होना सम्मान की बात समझते हैं, और पश्चिमी आलोचकों के सामने अपनी ‘भारतीयता’ प्रमाणित करने में गौरव की बात समझते हैं।”6 जबकि 19वीं शताब्दी के लेखकों ने साहित्य पर उपनिवेशवाद के प्रभाव को समझा और उसका विरोध किया। इसी परिप्रेक्ष्य में नामवर जी आरम्भिक उपन्यासों को देखते हैं और भारतीय उपन्यास के उद्भव और विकास को भारतीय कैनन से समझने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं कि एक विधा के रूप में उपन्यास की हमारी समझ बुनियादी रूप से एक औपनिवेशिक समझ है। ये समझ उसी चिंतन का परिणाम है जिसमें अंग्रेजी विद्वानों को लगता था कि भारत के उपन्यास पश्चिमी उपन्यासों की सीधी नकल हैं। इसलिए अंग्रेजी ढंग के ‘नॉवेल’ का तिरस्कार वस्तुतः उपनिवेशवाद का तिरस्कार है।

पश्चिम में जहाँ उपन्यास का जन्म औद्योगीकरण और मध्यवर्ग के विकास के साथ जुड़ा है वहीं भारत में उपन्यास का जन्म राष्ट्रीय और बौद्धिक चेतना के विकास के साथ हुआ। हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं में उपन्यास ने राष्ट्र निर्माण की आकांक्षा को व्यक्त किया। “उपन्यास ने यदि राष्ट्र का रूप निर्मित किया तो राष्ट्रीय कल्पना ने उपन्यास के रूप- निर्माण में भी नियामक भूमिका अदा की। इस प्रकार राष्ट्र- निर्माण और उपन्यास के बीच द्वंद्वात्मक सम्बन्ध है। इस द्वंद्व के ही कारण उन्नीसवीं शताब्दी के के अधिकांश भारतीय उपन्यास राजनीतिक हैं।”7 लेकिन यह राष्ट्र कैसा होता है? नामवर सिंह रूसी चिंतक बाख्तीन के हवाले बताते हैं कि उपन्यास अपनी प्रकृति से ही ‘संवादधर्मी’ है, ‘बहुभाषी’ है। उपन्यास के ढांचे में समाज के विभिन्न स्तरों के चरित्र आपस में मिलते हैं और अपनी अपनी बोली- बानी में एक दूसरे से बात करते हैं- इस प्रक्रिया में उपन्यास का संसार सहज ही एक ऐसे राष्ट्र के रूप में सामने आता है जिसमें सभी सदस्यों की भागीदारी एक समान नागरिक सी प्रतीत होती है। भारत में छापेखाने के साथ साथ जिस प्रिंट कम्युनिटी का विकास हुआ उसने उपन्यास के माध्यम से ही राष्ट्र के आख्यान को ग्रहण किया। इसलिए फ्रेडरिक जेम्सन ने भारत सहित तीसरी दुनिया के उपन्यासों को ‘नेशनल एलीगरी’ (राष्ट्रीय रूपक) कहा। नामवर सिंह अपने लेखों और व्याख्यानों में बार बार जेम्सन को याद करते हैं और कहते हैं कि उपन्यास के पठन पाठन में जिसे ‘अंग्रेजी ढंग का नॉवेल’ न मानकर रोमांस कहकर छोड़ दिया गया वही वास्तव में महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन्हीं रोमांसों से भारतीय उपन्यास का सही स्वरूप निर्मित हुआ। इनके ही माध्यम से भारत की कल्पना एक राष्ट्र रूप में की गई और मुक्ति की आकांक्षा व्यक्त की गई। ऐसे उदाहरण दूसरे देशों में भी मिल जाएँगे। जैसे ‘स्कार्लेट लेटर’ और ‘मोबी डिक’ ऐसे रोमांस हैं जिन्हें अमेरिका मुक्ति के आख्यान रूप में ‘राष्ट्रीय रूपक’ कहकर ग्रहण किया जाता है।

भारत में कथा की अपनी परंपरा रही है। और नामवर सिंह की मान्यता रही है कि “भारत में उपनिवेशवादी दौर में उपन्यास का विकास यूरोपियन उपन्यास के रास्ते नहीं हुआ, बल्कि अपनी प्राचीन परंपरा के रास्ते हुआ- जिन्हें हम रोमांस कहते हैं, जिन्हें हम फैंटेसी कहते हैं, जिन्हें हम स्वप्न लोक की अद्भुत कथा कहते हैं. उन अद्भुत कथाओं के द्वारा राष्ट्र की चेतना का उदय हुआ।”8 लेकिन जिसे आधुनिक उपन्यास कहा गया उनमें भारतीय आख्यानों को रोमांस कहकर ख़ारिज कर दिया गया। पर नामवर सिंह इन्हीं रोमांस कथाओं को महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि रोमांस कहे जाने वाले आरंभिक उपन्यासों में रोमांस के साथ राष्ट्रीय चेतना अन्तर्निहित थी। ये केवल प्रेम कथाएँ या रहस्य कथाएँ नहीं थीं, बल्कि उनमें रूपक के माध्यम से बलिदान की भावना व्यक्त की गई थी। इन कथाओं में प्रेमी का आत्मबलिदान राष्ट्र के लिए बलिदान प्रतीत होता है। इसे समझाने के लिए नामवर सिंह ने बंकिमचन्द्र का उदाहरण दिया है। ‘राजसिंह’(1882) उपन्यास में बंकिम स्पष्ट स्वीकार करते हैं कि ‘हिंदुओं का बाहुबल ही मेरा प्रतिपाद्य है’ क्योंकि ‘अंग्रेज़ साम्राज्य में हिन्दुओं का बाहुबल लुप्त हो गया है।’ इसी तरह ‘मृणालिनी’(1869) में अंग्रेज़ों के बंगाल विजय का आभास मिलता है। ‘दुर्गेशनंदिनी’ प्रेमकथा है जिसका अंत दुखांत है। प्रेम सफल नहीं होता फिर भी नायिका का बलिदान मन को झकझोर देता है। राष्ट्रीय रूपक का सबसे अच्छा उदाहरण है ‘कपालकुंडला’। यह एक शुद्ध रोमांस है। इसका ढाँचा कादम्बरी के ज़्यादा क़रीब है। इसकी कथा काफ़ी कुछ दुर्गेशनंदिनी जैसी ही है। उपन्यास के अंत में उपन्यास की नायिका समुद्र में कूद जाती है और उसे बचाने के लिए नायक भी जल समाधि लेता है। नामवर सिंह प्रश्न उठाते हैं, “गोया कपालकुण्डला स्वयं ही वह हरहराता सागर है। एक हहराते समुद्र सी युवती! पुरुष की काम्या! उस वार में निमज्जित होता पुरुष! क्या यह सब रूपक प्रतीत नहीं होता?”9 फ्रेडरिक जेमसन कहते भी हैं कि राष्ट्रीय रूपकों में अक्सर नायिका एक उत्पीड़ित स्त्री के रूप में प्रकट होती है।

हिंदी में देखें तो रामचन्द्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास में लाला श्रीनिवासदास कृत ‘परीक्षा गुरु’(1885) को हिंदी में अंग्रेजी ढंग का लिखा पहला मौलिक उपन्यास माना। लेकिन उससे पहले लिखे गए जगमोहन सिंह के ‘श्यामा स्वप्न’(1885) को उपन्यास का दर्जा नहीं दिया क्योंकि इसमें यथार्थवाद का अभाव है और यह उपन्यास से ज़्यादा कादम्बरी शैली में है। लेकिन शुक्ल जी ने यह भी स्वीकार किया है कि ‘श्यामा स्वप्न’ हिंदी का पहला आख्यान है जिसमें मातृभूमि के विजन और स्वप्न को अचूक धन से चित्रित किया गया है। यह अनायास ही नहीं कि जब भारत में उपन्यास का उद्भव हुआ तब स्त्री मुक्ति का प्रश्न केंद्र में आ गया। केरल विश्वविद्यालय में दिए गए अपने भाषण में नामवर सिंह कहते भी हैं- “परीक्षा गुरु जैसी रचनाएँ, तो तद्ययुगीन वास्तविकता का प्रत्यक्ष चित्रण करती हैं, पर उस युग की सबसे महत्वपूर्ण रचनाएं नहीं हैं। सबसे महत्वपूर्ण उस युग के वे पाठ हैं, जिनमें सच्चाई और भ्रम का सहसंचरण होता है, जिसमें वास्तविकता और आकांक्षाएं घुलमिल जाती हैं, जैसा कभी कभी सपनों में होता है। यह सबसे अधिक प्रेमकथाओं में दीखता है। वे कल्पना से रची गई कथा- सृष्टियाँ हैं, वास्तविक की कोरी नकल नहीं, न वैसा दूसरा नमूना।”10 कहने का तात्पर्य यह है कि 19वीं शताब्दी में जिन आख्यानों की रचना हुई या जिन्हें रोमांस कहा गया वह लोकरंजन तक ही सीमित नहीं था बल्कि उसमें राष्ट्रीय भावना अंतर्निहित थी।

ऐसी कथाओं से भारत का पाठक कहीं अधिक परिचित था। जबकि अंग्रजी नॉवेल के अनुकरण से जिस कथा का निर्माण हुआ वह अनुकरण ही रहा। नामवर जी लिखते हैं कि “अंग्रेजी ढंग के नॉवेल चाहे जितने यथार्थवादी दिखाई पड़े, अंततः अनुकरणधर्मा थे: रुबंध में एक परायी विधा के अनुकरणकर्ता और अंतर्वस्तु में प्रदत्त यथार्थ के पीछे चलने वाले; क्योंकि उसके पास यथार्थ में हस्तक्षेप करनेवाली ‘कल्पना’ ही नहीं थी। अधिक से अधिक वे पुरानी नीति-कथाओं के समान अंत में नीरस उपदेश देकर ही संतुष्ट हो सकते थे; जैसे ‘परीक्षागुरु’। औसत अंग्रेजी उपन्यासों की तरह उस जमाने से ज्यादातर भारतीय सामाजिक उपन्यास बहुत कुछ ‘घरेलू उपन्यास’ बनकर रह गए।”11 इन उपन्यासों को इतिहासकार विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े ने अपने लेख ‘कादम्बरी’(1902) में ‘सोसायटी नॉवेल’ की संज्ञा दी और यह बताया कि ‘सोसायटी नावेल’ का परिचय भारतीय उपन्यासों के लिए हानिकर सिद्ध हुआ क्योंकि इन उपन्यासों का यथार्थ आयातित था। उसमें भारतीयता का अभाव था। नामवर सिंह ज़ोर देकर कहते हैं कि “भारतीय उपन्यास में सच्चे यथार्थवाद का विकास इन घरेलू उपन्यासों के द्वारा नहीं, बल्कि बंकिमचंद्र जैसे ‘रोमांसकारों’ के उपन्यासों से ही हुआ।”12 इसका सबसे अच्छा उदाहरण है ‘आनन्दमठ’। ‘आनंदमठ’(रचनाकाल 1876) बंगाल के संन्यासी- विद्रोह पर लिखा गया उपन्यास है। जिसका मूल संदेश है ‘वंदे मातरम्’। इस उपन्यास में बंगाल के गांवों की दुर्दशा का यथार्थ चित्रण मिलता है। कालांतर इस यथार्थ बोध का प्रसार हुआ और आगे चलकर इसी गांव को लेकर फ़क़ीर मोहन सेनापति ने ‘छ माण आठ गुंठ’ उपन्यास लिखा जिसे 19 वीं शताब्दी में भारतीय बोध और यथार्थ की अंतिम परिणति माना जा सकता है।

ध्यान देने वाली बात है कि उपनिवेशवाद ने नगरों को जितना प्रभावित नहीं किया उससे कहीं अधिक भारतीय गांवों को प्रभावित किया। किसान को उसकी ज़मीन से अलग कर ज़मीदारी प्रथा का उपनिवेशिक मॉडल लागू किया गया जिसकी वजह से किसान ऋण और कर के ऐसे जाल में फँस गए जिसने उसकी कमर तोड़ दी। ‘छ माण आठ गुंठ’ में इसी किसान का जीवन है। इस उपन्यास में एक प्रकार से प्रेमचंद के उपन्यासों का पूर्वाभास मिलता है। जमींदार द्वारा किसान का शोषण, किसान के खेत का हड़प लिया जाना, अंग्रजी न्याय का क्षद्म, मुकदमा और किसान का प्रतिशोध। उपन्यास के अंत में मंगराज का प्रलाप और प्राणत्याग जैसे पूरे किसान समाज का प्रलाप है। नामवर सिंह कहते हैं कि मंगराज का प्रलाप अमिट छाप छोड़ जाता है। यथार्थ और फैंटेसी एक साथ। यह उपन्यास भी अंततः राष्ट्रीय रूपक है। किसी एक व्यक्ति की व्यथा कथा यह नहीं है, बल्कि जैसे पूरे समूह की, देश की आत्मा की चीत्कार है! ‘छ माण आठ गुंठ’ पूरा भारत है। फिर भी यह अंग्रेजी ढंग का नॉवेल नहीं है। इसे सही मायनों में भारतीय उपन्यास कहा जा सकता है जिसकी अस्मिता का निर्माण उपनिवेशवाद के विरोध से हुआ।

हिंदी में प्रेमचंद को सब महत्वपूर्ण उपन्यासकार मानते हैं। वे महत्वपूर्ण इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने भारत के किसान और दलित की पीड़ा तथा संघर्ष को लिखा। उन्होंने होरी और सूरदास जैसा पात्र रचा जिसमें होरी औपनिवेशिक व्यवस्था का अंग बनता है और अपनी छोटी सी आकांक्षा तक को पूरा नहीं कर पाता, वहीं सूरदास मात्र अपनी जमीन बचाने के लिए नहीं लड़ता बल्कि नामवर जी उसे गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ का भाष्य मानते हैं जो भारत को आधुनिक – औद्योगिक विकृतियों से मुक्त कराना चाहता है। उड़िया में गोपीनाथ मोहंती, बंगाली में ताराशंकर बंधोपाध्याय और हिंदी में फणीश्वरनाथ रेणु, आगे चलकर भारतीय उपन्यास का प्रतिनिधित्व करते हैं। जो लोग उपन्यास का अर्थ अंग्रेजी ढंग का नॉवेल लगाते हैं उनके लिए शायद बंकिम या ऐसे दूसरे रचनाकारों की आरम्भिक रचनाएँ विफल होंगी पर नामवर सिंह की दृष्टि में इन्हीं रोमांसों में भारतीय उपन्यास की सार्थकता निहित है। भारतीय उपन्यास के मूलाधार उन्नीसवीं शताब्दी के ये ‘रोमांस’ ही हैं, न कि तथाकथित अंग्रेजी ढंग के उपन्यास! उन्नीसवीं शताब्दी के भारतीय मानस का सही प्रतिनिधित्व ‘कपालकुंडला’ करती है, ‘परीक्षा गुरु’ नहीं। ‘परीक्षा गुरु’ का महत्व अधिक से अधिक ऐतिहासिक है और वह भी सिर्फ़ हिंदी के लिए, जबकि ‘कपालकुंडला’ अपने जमाने की अत्यधिक लोकप्रिय कृति होने के साथ ही स्थायी कृति की हकदार है। तथाकथित ‘अंग्रेजी ढंग के नॉवेल’ का तिरस्कार करके ही बंकिमचंद्र के रोमांसधर्मी उपन्यासों ने भारतीय राष्ट्र के भारतीय उपन्यास की अपनी पहचान बनाने की पहल की।

नामवर सिंह ने भारतीय उपन्यास पर जो कुछ लिखा या व्याख्यान दिया उससे मूलतः उन्होंने कुछ सूत्र छोड़े हैं जिनपर और भी चिंतन की संभावना है. वे किसी सैद्धांतिकी का निर्माण नहीं करते जैसा कि वे अपने बारे में कहते भी हैं कि ‘जो सुलझ जाती है गुत्थी, फिर से उलझाता हूँ मैं।’

संदर्भ:
  1. नामवर सिंह, आधुनिक विश्व और सिद्धांत, संपादक- आशीष त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024
  2. सुदीप्त कविराज, ‘ऑन डिकॉलोनाइज़िंग थियरी’, काइरोस: अ जरनल ऑफ़ क्रिटिकल सिम्पोज़ियम, खंड 6 अंक एक, पृष्ठ- 11-47
  3. साहित्य अकादेमी द्वारा 2024-25 फ़रवरी, 1991 को दिल्ली में आयोजित ‘भारतीय साहित्य : शती समाप्ति मूल्यांकन’ विषयक संगोष्ठी के मुख्य व्याख्यान के लिए लिखित निबंध. प्रकाशन की सूचना उपलब्ध नहीं. देखें नामवर सिंह, बीसवीं शताब्दी का भारतीय साहित्य : नई चुनौतियां, आधुनिक विश्व और सिद्धांत, संपादक- आशीष त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024, पृष्ठ- 416- 427
  4. वही
  5. वही
  6. वही
  7. नामवर सिंह, ‘अंग्रेजी ढंग का नॉवेल’ और भारतीय उपन्यास, साखी: अक्टूबर- दिसंबर, 1992. देखें नामवर सिंह, ‘अंग्रेजी ढंग का नॉवेल’ और भारतीय उपन्यास, आधुनिक विश्व और सिद्धांत, संपादक- आशीष त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024, पृष्ठ- 432-438
  8. नामवर सिंह, भारतीय उपन्यास की अवधारणा, आधुनिक विश्व और सिद्धांत, संपादक- आशीष त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024, पृष्ठ- 450-54
  9. नामवर सिंह, ‘अंग्रेजी ढंग का नॉवेल’ और भारतीय उपन्यास, आधुनिक विश्व और सिद्धांत, संपादक- आशीष त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024, पृष्ठ- 432-438
  10. साहित्य अकादेमी द्वारा मार्च, 2000 में केरल विश्वविद्यालय के तुलनात्मक साहित्य केंद्र के साथ तिरुवन्नतपुरम में ‘भारत के आरंभिक उपन्यास’ विषय पर आयोजित सेमिनार का उद्घाटन भाषण। साहित्य अकादमी द्वारा इसी शीर्षक से प्रकाशित। हिंदी में पहली बार अनूदित होकर ‘अभिनव भारती’ के ‘उपन्यास और प्रतिरोध’ शीर्षक अंक में ‘प्रश्नों का पुनर्सूत्रीकरण’ शीर्षक से प्रकाशित। देखें नामवर सिंह, भारत के आरंभिक उपन्यास : देश और उपन्यास का साथ- साथ जन्म, आधुनिक विश्व और सिद्धांत, संपादक- आशीष त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024, पृष्ठ- 428-431
  11. नामवर सिंह, ‘अंग्रेजी ढंग का नॉवेल’ और भारतीय उपन्यास, आधुनिक विश्व और सिद्धांत, संपादक- आशीष त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2024, पृष्ठ- 432-438
  12. वही

पवन साव
शोधार्थी(हिंदी), भारतीय भाषा केंद्र, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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