शोध आलेख : नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि और नई कविता का मूल्यांकन: योगेश कुमार और कमलेश कुमारी

नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि और नई कविता का मूल्यांकन
- योगेश कुमार एवं कमलेश कुमारी

शोध सार : नई कविता छायावाद और प्रगतिवाद से अलग हटकर यथार्थपरक और अस्तित्ववादी दृष्टिकोण को लेकर आगे बढ़ी। इस कविता आंदोलन के प्रमुख आलोचकों का मूल्यांकन करें तो नामवर सिंह का नाम सर्वोपरि है। इन्होंने कविता को केवल सौन्दर्यशास्त्र की दृष्टि से नहीं देखा वरन् उसे मानवीय अनुभव, वैचारिक प्रतिबद्धता और सामाजिक संदर्भ से जोड़ा। नामवर सिंह ने हिंदी की साहित्यिक प्रवृत्तियों को आँख मूंदकर स्वीकार नहीं किया वरन् हमेशा संदेह और प्रश्न खड़े करने की दृष्टि से देखा। जब नई कविता में प्रवृत्तियाँ नयी थीं तो उस कविता के मूल्यांकन के लिए पुराने मानदंड न अपनाकर नामवर सिंह ने नए प्रतिमानों की बात कीं। इन्होंने हिंदी आलोचना को केवल रसगत आलोचना से बाहर निकालकर इसे बौद्धिक और सामाजिक विमर्श का रूप प्रदान किया। हम कह सकते हैं कि नई कविता का मूल्यांकन नामवर सिंह के बिना अधूरा है।

बीज शब्द : आलोचना, नई कविता, नए प्रतिमान, मुक्तिबोध, मार्क्सवादी दृष्टि, संवेदना, द्वंद्व, शमशेर

मूल आलेख आधुनिक हिंदी कविता अनेक पड़ावों से गुजरते हुए यहाँ तक पहुंची है। भारतेन्दु युग की नवजागरण चेतना, द्विवेदी युग का उपदेशात्मक और सुधारवादी दृष्टिकोण, छायावाद की कोमल भावुकता और सांस्कृतिक समन्वय, प्रगतिवाद की जनवादी और यथार्थवादी दृष्टि, प्रयोगवाद की नवीनता से होते हुए नई कविता व्यक्ति और समाज की संवेदनाओं को जोड़ते हुए आगे आई; जिसमें केवल भावुकता और नारेबाज़ी नहीं थी अपितु जीवन के संघर्ष और अस्तित्व के प्रश्न थे।

नई कविता केवल साहित्यिक परंपरा भर नहीं है अपितु वह तत्कालीन सामाजिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों से भी गहराई से जुड़ी हुई है। दूसरे विश्व युद्ध, स्वतंत्रता के बाद की अस्थिर परिस्थितियों और भारत विभाजन की त्रासदी ने मनुष्य को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। नई कविता में व्यक्ति और समाज दोनों के बीच समन्वय देखने को मिलता है। इसमें आत्म-अवलोकन के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन और बौद्धिक चेतना को माध्यम बनाया गया है। नई कविता ने सामाजिक विडंबनाओं, जीवन के यथार्थबोध और व्यक्ति की अस्तित्वगत बेचैनी को स्वर देने का कार्य किया। इस कविता आंदोलन ने 50 के दशक से शुरू होकर समूची हिन्दी कविता जगत को प्रभावित किया। इसमें न तो सौन्दर्य का पलायनवादी दृष्टिकोण था और न ही कल्पना तथा क्रांतिकारी नारों की सतही ऊष्मा अपितु इसमें व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा तथा सामाजिक जटिलता का वास्तविक चित्रण दिखलाई पड़ता है।

नई कविता की आलोचना को आधार और गहराई देने में नामवर सिंह ने केंद्रीय भूमिका निभाई। इनकी आलोचना पद्धति ने नई कविता के साथ-साथ सम्पूर्ण हिंदी साहित्यिक विमर्श को प्रभावित किया। इनकी आलोचना ने कविता को मात्र साहित्यिक परिघटना न मानकर सामाजिक-राजनीतिक चेतना का हिस्सा भी बनाया। नामवर सिंह के प्रमुख चहेते कवियों में से एक नई कविता के प्रमुख कवि ‘मुक्तिबोध’ थे तथा उनकी प्रतिनिधि कविता ‘अँधेरे में’ थी। नई कविता के द्वंद्व पर टिप्पणी करते हुए नामवर सिंह लिखते हैं कि “नई कविता यदि द्वन्द्व से पैदा हुई है तो मुक्तिबोध इस ऐतिहासिक द्वन्द्व के प्रतिनिधि कवि है।”[1]

नामवर सिंह ने माना कि मुक्तिबोध की बेचैनी व्यक्तिगत नहीं है बल्कि वह पूरे समाज की बेचैनी है। मुक्तिबोध के यहाँ वैचारिक और संवेदना का द्वंद्व, सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज और अस्तित्वगत संकट की झलक भी मिलती है। इनके बिंब-विधान पर नामवर सिंह लिखते हैं, “किसी कवि की वस्तुस्थिति के ज्ञान का पता उसके बिंबों के कोष से लगाया जाता है। इस दृष्टि से नए कवियों में मुक्तिबोध का बिंब-कोष सबसे समृद्ध कहा जा सकता है। यही नहीं बल्कि उनके बिंब विज्ञान युग की वास्तविकता से लिये जाने के कारण आधुनिक भी हैं। परन्तु नौसिखिए कवियों की तरह उन्होंने वैज्ञानिक बिम्बों का प्रयोग असमंजस या अनगढ़ रूप में कहीं नहीं किया है। ज्यामिति, गणित, ज्योतिष, रसायन-शास्त्र, भूगर्भ-शास्त्र आदि की स्थापनाओं द्वारा उन्होंने कविता में संवेदनों की अभिव्यक्ति का विस्तार किया है।”[2]

‘कविता के नए प्रतिमान’ पुस्तक नई कविता की आलोचना के लिए आधार स्तंभ है। नामवर सिंह पहले रचना को उसके भाविक संवेदना और आंतरिक संरचना के स्तर पर विश्लेषित करके फिर उसे सामाजिक संदर्भों से जोड़ते थे। इनकी आलोचना की भाषा सहज होती थी। इनके लिए कविता कल का पर्याय मात्र नहीं थी अपितु समाज की जरूरतों और समस्याओं का ज्वलंत दस्तावेज़ होती है। इनकी आलोचना पढ़ने से ऐसा महसूस होता है जैसे पाठक और आलोचक के बीच संवाद स्थापित होता है। मनोज पाण्डेय नई कविता पर नामवर सिंह की टिप्पणी को रेखांकित करते हुए लिखते हैं, “यद्यपि इस कविता पर अस्तित्ववाद तथा रहस्यवाद का मार्क्सवाद के साथ तालमेल करने का आरोप भी लगाया गया है, पर नामवर जी उसको खारिज करते हैं। और इसे नयी कविता की परम उपलब्धि बतलाते हैं।”[3]

शमशेर और मुक्तिबोध के बिंबों में अंतर बतलाते हुए नामवर सिंह लिखते हैं, “मुक्तिबोध के बिंब जहां ठेठ भाषा के वाक्य-विन्यास में बंधकर शृंखलाबद्ध हैं, वहाँ शमशेर के बिंब आपाततः विशृंखल हैं- वस्तुतः विशृंखल नहीं हैं। इन दोनों कवियों को समझने के लिए इनसे बढ़कर परस्पर-विरोधी युग्मक मिलना कठिन है। एक ही इकाई के जैसे ये दो विरोधी तत्त्व हों और वह इकाई स्वयं बिंब-विधान है।”[4] हालांकि देखा जाए तो नामवर सिंह मुक्तिबोध को विभिन्न आयामों में आधुनिक कवि मानते हैं लेकिन शमशेर को ‘हिंदी का एकमात्र बिंबवादी कवि’ कहते हैं। शमशेर के यहाँ कविता में बार-बार आईना शब्द आता है जो यह दर्शाता है कि उनकी कविता में यथार्थपरकता अधिक है। इन्होंने शमशेर बहादुर सिंह को कला और जीवन का सेतु बताकर उनकी चित्रात्मकता और संवेदनशीलता को गहराई से रेखांकित किया है। नामवर सिंह नई कविता का सूत्रपात बिंब से मानते हुए शमशेर के लिए लिखते हैं, “सच तो यह है कि नई कविता का सूत्रपात उसी बिंबवाद से हुआ है, जिसके प्रवर्तकों में शमशेर मुख्य हैं। . . . वस्तुतः अंग्रेजी कविता की तरह हिन्दी की नई कविता का आरंभ भी बिंबवाद से हुआ है और इसका श्रेय अधिकांशतः शमशेर का है।”[5]

नामवर सिंह कविता के नए प्रतिमान खोजने की बात करते हुए लिखते हैं, “नई कविता को जाँचने के लिए ‘कविता’ का प्रश्न उठाना गलत नहीं है, गलत है ‘कविता’ संबंधी बुनियादी सवाल की ओट में किसी पुराने सिद्धांत का सहारा लेना। और निश्चय ही ऐसी चुनौती का जवाब श्री लक्ष्मीकांत वर्मा की तरह नई कविता के प्रतिमान बनाकर नहीं दिया जा सकताः बल्कि जैसा कि साही ने कहा है, “समूची नई कविता को ठीक-ठीक देखने के लिए नई कविता के प्रतिमान की जरूरत नहीं है, बल्कि कविता के नए प्रतिमान की जरूरत है।”[6] इस प्रकार, नामवर सिंह ने अपनी आलोचना के माध्यम से यह स्थापित किया कि कविता का मूल्यांकन केवल प्रगतिवादी मानकों या पारंपरिक रस-सिद्धान्तों से नहीं किया जा सकता है। हम पाते हैं कि नामवर सिंह ने नई कविता ही नहीं बल्कि हिंदी कविता को आलोचना की एक नवीन दृष्टि प्रदान कीं।

नई कविता में व्यक्ति की सामाजिक विषमताएँ, यथार्थ, मोहभंग और अस्तित्वगत पीड़ा का चित्रण देखा जा सकता है। नामवर सिंह ने अपनी आलोचनात्मक पद्धति वर्णनात्मक न रखकर नई कविता की प्रासंगिकता, निहितार्थ और सीमाओं को उजागर करने का कार्य किया है। नई कविता को विभिन्न आधारों जैसे शीतयुद्ध, विभाजन, स्वतंत्रता प्राप्ति, राजनीतिक परिवर्तनों को आधार बनाकर विश्लेषित किया गया है। नामवर सिंह केवल ऊपरी-ऊपरी भाषा को देखकर अपनी बात नहीं रखते हैं वरन् अंदर के व्यंग्यार्थ तक जाते हैं। वे ‘गीतफ़रोश’ कविता के लिए लिखते हैं, “तारीफ तो उसकी बहुतों ने की है लेकिन ज़्यादातर उसके व्यंग्य-विनोद और भाषा में फेरीवाले के लहजे के लिए। लेकिन उसका महत्व और अधिक गहरे जाने पर मालूम होता है। कविता पढ़ते-पढ़ते हमारे सामने फेरीवाले का रूप खड़ा हो जाता है, फिर हम देखते हैं कि यह कोई मामूली फेरीवाला नहीं, बल्कि गीत बेचने वाला है। व्यंग्य की ओर ध्यान सबसे अन्त में जाता है। बाजारू समाज के कवि और कविता की बेबसी अपनी पूरी मार्मिकता के साथ ध्वनित हो उठती है।”[7]

नामवर सिंह की पुस्तक ‘कविता के नए प्रतिमान’ न केवल नई कविता की आलोचना पुस्तक है बल्कि हिंदी कविता की आलोचना में मील की पत्थर साबित हुई। इस पुस्तक में नई कविता को समझने के लिए उपयुक्त मानदंड बताने के साथ-साथ आलोचना की परंपरागत धारणाओं को भी चुनौती दी। प्रत्येक कालखंड को समझने के लिए विभिन्न मानदंड होते हैं। ये मानदंड तात्कालिक परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। ‘नए प्रतिमान’ से नामवर सिंह का आशय यह था कि जो प्रतिमान इससे पहले वाली कविताओं के लिए हम काम में ले रहे थे वह यहाँ नहीं ले सकते हैं क्योंकि उस समय का परिवेश अलग था। नामवर सिंह लिखते हैं, “डॉ. जगदीश गुप्त परंपरा के नाम पर छायावाद से नई कविता को जोड़ना चाहते हैं और डॉ. नगेंद्र उसे छायावाद में समेटना चाहते हैं; फिर विवाद कैसा ? इस खींचतान को देखकर यदि श्री लक्ष्मीकांत वर्मा यह कहते हैं तो क्या गलत कहते हैं कि “नई कविता और छायावाद के बीच जो अर्धचेतन मन में समझौता प्रयोगवाद के रूप में हुआ था, वह सब-का-सब अब उलटकर आ पड़ा है।”[8]

नामवर सिंह नई कविता का अंत किन्हीं बाह्य आलोचक या प्रतिरोध से न मानकर उसके अंदर की ‘आत्मप्रवंचना’ से हुई मानते हुए लिखते हैं, “बाहरी विरोध से ज्यादा नई कविता भित्री ‘आत्मप्रवंचना’ से जर्जर हुई है। दरअसल ‘नई कविता’ के नाम पर ‘वंचना का दुर्ग’ खड़ा करने की कोशिश हुई है। इससे और नुकसान जो भी हों, कविता को कविता की तरह पढ़ने-समझने और ग्रहण करने की, युगों से चली आती हुई, रही-सही प्रवृत्ति भी कुंठित हो गई। नई कविता जितनी दुरूह नहीं थी उससे ज्यादा दुरूह कही गई और वह भी दुरूह भाषा में।”[9]

हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना ऐतिहासिक और रसात्मक आलोचना रही, हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक थी, रामविलास शर्मा की आलोचना प्रगतिवादी थी लेकिन नामवर सिंह ने अपनी आलोचना में संतुलित दृष्टिकोण रखते हुए उसमें न केवल राजनीतिक विचारधारा के पीछे भागे और न केवल सौन्दर्य की खोज तक सीमित रहे। “नामवर सिंह को शिकायत उन तमाम प्रतिमानों से है जो ‘वैयक्तिक और आत्मपरक छायावादी संस्कारों से गढ़े गए हैं।’ इसलिए उन्होंने आत्मपरक कविता के सीमित दायरे से बाहर निकलकर काव्य के प्रतिमान निर्मित करने की उस आवश्यकता को पूरा करने का प्रयास किया जिसकी कमी मुक्तिबोध भी महसूस कर रहे थे।”[10]

नामवर सिंह आधुनिक हिंदी कविता के पड़ावों और नई कविता के लिए नवीन परिस्थितियों के बारे में बताते हुए लिखते हैं, “मुकुटधर पांडेय ने भी अपनी समझ से ‘जीवन’ की ही कविता लिखी और बाद में आने वाले छायावादी कवियों ने भी; बच्चन-नरेंद्र आदि की पीढ़ी के तथाकथित छायावादोत्तर कविता ने भी नवीन-दिनकर आदि राष्ट्रीयतावादी कवियों ने भी। इस प्रकार लगभग बीस साल बीत गए और चौथे दशक में महसूस किया गया कि कविता तो अभी तक जीवन से दूर थी। इसलिए यथार्थ जीवन का नारा लेकर प्रगतिवाद आया, लेकिन फिर लगा कि जीवन का यथार्थ पूरा-का-पूरा कविता में नहीं आ रहा है और प्रयोगवाद शुरू हुआ; प्रतीकों-बिम्बों आदि के नए प्रयोगों से जीवन के अधिक-से-अधिक ‘सत्य’ को व्यक्त करने की कोशिश की गई लेकिन कुछ दिनों के बाद इन प्रयत्नों की भी सीमा प्रकट होने लगी।”[11]

नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि बहुआयामी थी जिसमें गंभीरता, संतुलन और संवादपरकता के तत्त्व दिखलाई पड़ते हैं। किसी रचना को समझने के लिए उसी कृति के भीतर झांकना होता है न कि बाहर से कोई भी विचारधारा थोपकर उसका विश्लेषण करना चाहिए। नामवर सिंह की आलोचना में रचनाकार केंद्र में नहीं होकर उसकी कृति रहा करती थी।

निष्कर्ष : नई कविता में केवल भावनाएँ ही नहीं है वरन चिंतन, अनुभव और यथार्थ का समन्वय स्पष्ट दिखाई देता है। इस समय की कविता ने निजी जीवन से बाहर निकलकर सामाजिक और राजनीतिक धरातल को आधार बनाया। इस बदलती हुई कविता का मूल्यांकन करने के लिए भी एक नवीन दृष्टि की आवश्यकता थी जो नामवर सिंह ने पूरी की। नई कविता की पृष्ठभूमि, उसके स्वरूप और विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए उसका समग्र विश्लेषण करने का कार्य नामवर सिंह ने किया। इन्होंने साहित्य को केवल सौन्दर्य या विचारधारा की कसौटी पर उतारकर नहीं देखा अपितु उसके सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों के सहारे मूल्यांकन करने का प्रयास किया। नामवर सिंह की आलोचना सामाजिक, सौंदर्यपरक, वैचारिक और दार्शनिक जैसे बिन्दुओं का सहारा लेती है। जिससे इनकी आलोचना केवल साहित्य से बंधी नहीं रहती अपितु व्यापक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य से भी जुड़ती है।

संदर्भ :
1. त्रिपाठी, आशीष(सं.); कविता की जमीन और जमीन की कविता; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली; दूसरा संस्करण: 2023; पृ.150
2. वही; पृ. 153
3. पाण्डेय, मनोज; हिन्दी आलोचना: दृष्टि और प्रवृत्तियाँ; लोकभारती प्रकाशन, नयी दिल्ली; प्रथम संस्करण: 2018; पृ. 116.
4. त्रिपाठी, आशीष(सं.); कविता की जमीन और जमीन की कविता; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली; दूसरा संस्करण: 2023; पृ. 161
5. वही
6. सिंह, नामवर; कविता के नए प्रतिमान; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली; बाइसवाँ संस्करण: 2023; पृ. 27
7. त्रिपाठी, आशीष(सं.); कविता की जमीन और जमीन की कविता; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली; दूसरा संस्करण: 2023; पृ. 105
8. सिंह, नामवर; कविता के नए प्रतिमान; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली; बाइसवाँ संस्करण: 2023; पृ. 20
9. त्रिपाठी, आशीष(सं.); कविता की जमीन और जमीन की कविता; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली; दूसरा संस्करण: 2023; पृ. 113
10. जैन, निर्मला; हिन्दी आलोचना का दूसरा पाठ; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली; तीसरा संस्करण: 2023; पृ. 100
11. त्रिपाठी, आशीष(सं.); कविता की जमीन और जमीन की कविता; राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली; दूसरा संस्करण: 2023; पृ. 122

योगेश कुमार
शोधार्थी, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़

कमलेश कुमारी
आचार्य, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़
kamlesh@cuh.ac.in, 7015405750

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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