शोध आलेख : हिंदी आलोचना, मार्क्सवाद और नामवर सिंह / वैभव सिंह

हिंदी आलोचना, मार्क्सवाद और नामवर सिंह
- वैभव सिंह

 

नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि में ऐसा मार्क्सवाद निहित है जो स्वयं तक सीमित नहीं है बल्कि संसार की समस्त बौद्धिक संपदा के प्रति स्वस्थ जिज्ञासा प्रकट करते हुए स्वयं को सार्थक बनाता है। उन्होंने मार्क्सवाद का सर्वाधिक सफल रचनात्मक उपयोग किया और उसी मार्क्सवाद की ऐतिहासिक-वैज्ञानिक अंतर्दृष्टियों की शक्ति से अपनी चिंतन शक्ति को निरंतर विकसित करते रहे हैं। इस कारण उनकी आलोचना दृष्टि के बारे में लिखना स्वयं किसी लेखक की अपनी चिंतन-शक्ति को भी ऐतिहासिक-वैज्ञानिक मार्क्सवादी दृष्टिकोण से निर्मम परीक्षण के लिए प्रस्तुत करने का जोखिम भरा कार्य है। ऐसा लगता है कि अपनी ही वैचारिक क्षमता तथा विश्लेणात्मक बुद्धि को किसी इम्तिहान में बैठा दिया गया है। कवियों की भाषा में कहें तो विशाल पर्वत मालाओं जिसमें गहरी घाटियों से लेकर गगनचुंबी शिखर तक हैं, उसे किसी के द्वारा कैसे संपूर्ण रूप से व्यक्त किया जा सकता है! यह भय हमेशा बना रहेगा कि जितना समझा या कहा जाएगा, वह बहुत अधूरा ही साबित होगा। नामवर जी ने रामचंद्र शुक्ल के संदर्भ में कहा था कि वे सह्रदय थे, समीक्षक भी। यह बात उनपर भी लागू होती है और हम कह सकते हैं कि वे समीक्षक थे, सह्रदय भी। उन्होंने जीवनसंघर्षों से अलग रहकर केवल अकादमिक दुनिया में रहकर नीरस रूखा ज्ञान नहीं परोसा है बल्कि साहित्य के जीवनमूल्यों की चिंता करने के साथ-साथ आलोचना में साहित्य से प्रेम साहित्य बोध उत्पन्न करने वाली भाषा का भी प्रयोग किया है। अपने जीवनसंघर्ष को सामान्य लोगों के जीवनसंघर्ष का अंग समझकर ही संघर्ष, द्वंद्व और प्रतिरोध के भावों का सही सैद्धांतिक प्रयोग किया। उनके समस्त बौद्धिक मानस का निर्माण गत पचास-साठ के दशक में हो रहा था जब साम्यवाद की गूंज दुनिया के अधिकांश बुद्धिजीवियों के लेखन में थी। नामवर सिंह की आलोचनापद्धति में भी दो युगों के मध्य के टकराव, संक्रमण परिवर्तन के संधि बिंदु से उपजे बौद्धिक तनाव को प्रमुख आधार बनाया गया है। उदाहरण के लिए हंगरी के मार्क्सवादी आलोचक जार्ज लुकाच की बेचैनियों बारे में नामवर सिंह ने लिखा था- इस बेचैनी के मूल में सामान्य रूप से मध्य यूरोप और विशेष रूप से हंगरी की राजनीतिक-सामाजिक परिस्थिति थी जिसमें अर्धविकसित पूंजीवाद और ढहते सामंती अवशेषों के बीच घुटते हुए प्रबुद्ध बुद्धिजीवी परिवर्तन की अस्पष्ट आकांक्षाओं को लेकर तड़प रहे थे। नामवर सिंह के बारे में भी शायद यह कहा जा सकता है कि उनके बौद्धिक-आलोचकीय व्यक्तित्व का निर्माण बीसवीं सदी के लगभग मध्य में उस सामाजिक परिवेश में हुआ था जिसमें सामंती संरचनाएँ प्रश्नांकित हो रही थीं और समाज में कोई पूंजीवादी परिवर्तन नहीं घटित हो रहा था। ऐसे ही समाज में उन्होंने विकल्प के रूप में साम्यवादी वैचारिकी को अपने बौद्धिक कर्म के लिए सर्वाधिक उपयोगी पाया, उसके सैद्धांतिक रूपों के साथ ही व्यवहारिक राजनीति के लिए उसका प्रयोग किया।

नामवर सिंह की आलोचनात्मक सक्रियता के पूरे कालखंड में यानी बीसवीं सदी के आरंभ से अंत तक आत्माभिव्यक्ति के नए रूपों तथा नई शैलियों का विकास हो रहा था और आलोचक को भी आत्माभिव्यक्ति के इन नए रूपों की समीक्षा बीसवीं सदी के वैचारिक विकास के आलोक में ही करनी थी। जो आलोचक आत्माभिव्यक्ति के इन नए रूपों की समीक्षा पुराने जड़ प्रतिमानों से, या वैचारिक पूर्वग्रहों से कर रहे थे वे आलोचना के दायित्व से पीछे हट रहे थे। नामवर सिंह ने अपनी पुस्तकों जैसे छायावाद, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, इतिहास और आलोचना, कविता के नये प्रतिमान तथा दूसरी परंपरा की खोज आदि में रचनाकारों की आत्माभिव्यक्ति के विविध नये-नये रूपों की विश्लेषणात्मक व्याख्या की है और कहने की बात नहीं है कि विश्लेषण के वे समस्त प्रतिमान बीसवीं सदी के विचारधारात्मक संघर्षों की देन हैं जो राजनीति से लेकर कला-साहित्य संस्कृति तक चल रहे थे। सचेत वर्ग-दृष्टि, जनसंस्कृति तथा द्वंद्वात्मक भौतिकवाद आदि जिन अवधारणाओं पर मार्क्सवाद आधारित था, साहित्य में उसका उदार रचनात्मक प्रयोग करने की जिम्मेदारी कोई मामूली नहीं थी तथा नामवर सिंह का लेखन इस उत्तरदायित्व को कुशलतापूर्वक निभाने के रूप में सामने आया। नामवर सिंह वे प्रमुख कार्य यह भी किया कि उन्होंने नयेपन की पहचान की तथा उसका विवेचन-विश्लेषण किया। उनकी कहानी: नई कहानी पुस्तक में उन्होंने कथानक की नई धारणा के विकसित होने पर ध्यान दिया जिसमें पाठक को भी कथा के पुराने तथा अतिपरिचित स्थूल उपकरणों से बहला लेना संभव नहीं रह गया। कहानियों के सारगर्भी विचार मे बदल जाने और इस प्रकार जीवन के बड़े अंतर्विरोधों को व्यक्त करने की रचना-प्रक्रिया को समझने के लिए जैसी सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता थी, वह नामवर सिंह के लेखन में व्याप्त है। जीवन के लघु प्रसंगों को निरर्थक समझकर उसमें सार्थकता की खोज करने वाली कहानी को उन्होंने विशेष महत्त्व प्रदान किया और इस प्रकार कहानी पर किसी चमत्कारिक घटना या मनोरंजक संयोग थोपने की जो प्रवृत्ति थी, उससे कहानी की मुक्ति का स्वागत किया। उन्हीं के शब्दों में- लोगों की यह धारणा गलत है कि कहानी जीवन के एक टुकड़े को लेकर चलती है, इसलिए उसमें कोई बड़ी बात नहीं कही जा सकती। कहानी जीवन के टुकड़े में निहित अंतर्विरोध, द्वंद्व, संक्रांति अथवा क्राइसिस को पकड़ने की कोशिश करती है और ठीक ढंग से पकड़े में जाने पर यह खंडगत अंतर्विरोध ही वृहद अंतर्विरोध के किसी किसी पहलू का आभास दे जाता है।अपने दौर के अंतर्विरोध क्राइसिस को कहानी में खोजना भी उनकी गहरी मार्क्सवादी दृष्टि का परिणाम था। उनकी छायावाद पुस्तक भी ऐसा ही विश्लेषण करती है जिसमें वे प्रकृति, नारी संबंधी दृष्टिकोण, चेतना की स्वाधीनता, कल्पनाशीलता आदि के विषयों पर भक्तिकाल-रीतिकाल से उत्पन्न भिन्न दृष्टियों की चर्चा करते हैं जो छायावादी कवियों की विशेषता है। यह दृष्टि अधिक मानवीय हो जाती है तथा सभी की स्वतंत्रता की कामना में प्रकृति को भी साहित्य में स्वतंत्र सत्ता की तरह स्थापित करती है। प्रकृति के प्रति बदली हुई सौंदर्य-दृष्टि की चर्चा करते हुए उन्होंने प्रकृति को स्वतंत्र सत्ता के रूप में स्थापित करने की छायावादी चेष्टा का विश्लेषण किया। उन्हीं के शब्दों में- मध्ययुग के कवियों ने अधिक से अधिक प्राकृतिक वस्तुओं का नाम गिनाकर ही संतोष किया है। और उन प्राकृतिक वस्तुओं की सूची भी बहुत लंबी नहीं है-यही कोकिल, चातक, मोर, दादुर-जैसे प्राणी तथा आम्र-मंजरी, पलाश, बेला, चमेली, गुलाब आदि कुछ फूल और छह ऋतुओं के अनुसार काले बादल, शरत्, राका,वसंतश्री आदि। छायावाद युग ने प्रकृति को इतना महत्त्व दिया कि किसी अपरिचित और नन्हें से फूल को भी स्वतंत्र रूप से कविता का विषय बनाया। अकेली एक ओर की बूंद पर भी पूरी की पूरी कविता लिखी जा सकती है, जिसमें और किसी चीज का दखल हो।  यानी वे परंपरा को बीसवीं सदी के दृष्टिकोण से समझते हैं कि परंपरा की दृष्टि से बीसवीं सदी को। अपने समय को अतीत का विस्तार या उसका बंधक समझना तथा उसकी विशिष्टता की पहचान भी आलोचक का दायित्व होता है। इस रूप में वे आधुनिक पर प्राचीन को आरोपित नहीं करते, बल्कि प्राचीन मध्यकाल के नए-नए अर्थों को आधुनिक दृष्टियों से अन्वेषित करने का प्रयत्न करते हैं।

किसी भी समर्थ साहित्यालोचक की पहचान इससे भी होती है कि वह अपने युग के राजनीतिक प्रश्नों के दलदल में फंसकर नहीं रह जाए, बल्कि उसके साहित्यिक-सांस्कृतिक आयामों पर विचार करने में अपनी मानसिक ऊर्जा का स्वतंत्र इस्तेमाल करे। नामवर सिंह की साहित्य-आलोचना में सांस्कृतिक संघर्ष की भी चिंता है और उन्होंने साहित्य को कला के मोर्चे पर लड़े जाने वाले संघर्ष की तरह देखा। साहित्य को केवल राजनीतिक-सामाजिक दस्तावेज में सीमित करने का प्रयास नहीं किया, बल्कि जहाँ आवश्यक अनुभव हुआ साहित्य की स्वायत्तता की रक्षा की। इस नामवर-स्थिति के पीछे उनके अपने साहित्य-संस्कारों का भी प्रभाव था। उन्होंने गांव में रहकर ब्रज भाषा में कविता लिखनी आरंभ की। काशी आकर खड़ी बोली में लिखी। फिर बीएचयू में केशवप्रसाद मिश्र, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र तथा हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे शिक्षकों की संगत की। ऐसे शिक्षक मिलते रहे जिन्होंने साहित्य का गहन शिक्षण किसी भी विचार या विचारधारा के शिक्षण से पहले किया। फिर मार्क्सवादी विचारधारा की दीक्षा मिली साहित्य-संगोष्ठियों में, खासकर प्रलेस की गोष्ठियों में। उन्होंने लिखा है- मेरा रूपांतरण किया प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों ने। उनकी गोष्ठियों में जो बहस होती थी, पढ़ी गई रचनाओं पर जो वैचारिक चर्चा होती थी और जो लेख पढ़े जाते थे, उन सबने मेरी दृष्टि बदल दी। संयोग की बात है कि उन्हीं दिनों बांस फाटक पर एक मार्क्सवादी किताबों की दुकान थी, उसने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाही। जिस तीसरी चीज असर डाला, वह थी उस जमाने की हंस पत्रिका। शिवदान सिंह चौहान जेल चले गए थे तो हंस के तीन-चार अंको का संपादन रामविलास जी ने किया। उन्होंने तीन अंक प्रगतिवाद पर निकाले। उपर्युक्त तीन चीजों ने मेरी दिशा बदल दी। यहां नामवर सिंह का दिशा बदलने से तात्पर्य है कि कविताओं के क्षेत्र से निकलकर आलोचना में आना। प्रगतिशील लेखक संघ के संपर्क को उन्होंने खास अहमियत प्रदान की। बहुत ही स्पष्ट कहामैं यदि प्रगतिशील लेखक संघ के संपर्क में आया होता तो आलोचक होता। कहने का अर्थ है कि नामवर सिंह की आलोचना संबंधी चेतना के निर्माण में बनारस की स्कूली विश्वविद्यालीन शिक्षा तथा प्रलेस-प्रगतिवाद का प्रभाव प्रमुख था।  नामवर सिंह की आलोचना में अंत तक तो साहित्य की साहित्यिकता की अवहेलना है, साहित्य की रक्षा का बहाना बनाकर विचारधारा को छोड़ने की अतिरिक्त कोशिश। इस अर्थ में वे गत सदी के उन दुर्लभ विचारकों में थे जिन्होंने केवल विचारधारा के उदात्त नैतिक-मानवीय पक्ष की शक्ति से साहित्य को अधिक प्रासंगिक तथा लोकप्रिय बनाया। इस प्रकार समकालीन रचनाशीलता के विकास के लिए भी एक अनुकूल बौद्धिक वातावरण तैयार करने में योगदान दिया। नामवर सिंह यह पहचान रहे थे कि युग के मुख्य प्रश्न राजनीतिक ही नहीं थे बल्कि कला-संस्कृति-साहित्य के क्षेत्र में भाषा तथा रूप-शिल्प के स्तर पर भी नए मोर्चे बने और नए पुराने के बीच संघर्ष तेज होते चले गए। संक्रमण और परिवर्तन के लक्षण शिल्प भाषा में परिवर्तनों के आधार पर भी इतिहास में दर्ज हुए और नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि इनके प्रति एक पाखंडपूर्ण दिखावे की नहीं बल्कि सच्ची विचारधारात्मक सजगता का परिचय देती रही। उन्होंने साहित्य के कथ्य के साथ उसके रूप भाषा के प्रश्नों को भी आलोचना के लिए महत्वपूर्ण माना था। कविता के नये प्रतिमान में नई कविता के अंतःसंघर्षों का इतिहास दर्ज किया है जिसमें यथार्थ को जीवंत रूपों में प्रकट करने के लिए भाषिक संरचनाओं पर गहन विचार किया जा रहा था। बिंब बनाम सपाटबयानी जैसे संघर्ष भी थे, जिसमें नामवर सिंह ने सपाटबयानी को नई संवेदनाओं के अनूकल माना। समूची कविता पर ध्यान देने के स्थान पर कुछ चमकते बिंबों पर ध्यान देने की आलोचकों की प्रवृति पर हैरानी प्रकट की। बिंबों की प्रमुखता बढ़ने से कविता में सामाजिक जीवन के चित्रों के दुर्लभ हो जाने पर भी चिंता प्रकट की। नामवर सिंह के शब्दों में- बिंबों के कारण कविता बोलचाल की भाषा से अक्सर दूर हटी है, बोलचाल की लय खंडित हुई है, वाक्यविन्यास की शक्ति को धक्का लगा, भाषा के अंतर्गत क्रियाएँ उपेक्षित हुई हैं, विशेषणों का अनावश्यक भार बढ़ा है और काव्य-कथ्य की ताकत कम हुई है। इन कमजोरियों को दूर करने के लिए कविता में सपाटबयानी अपनाई जा रही है जिसमें फिलहाल काफी संभावनाएं दिखाई पड़ती हैं। इस तरह उन्होंने संघर्ष और अभिव्यक्ति की भाषा को केंद्र में लाने का काम किया और मुक्तिबोध की भाषा तक के बारे में कहा कि भाषा के अनगढ़ होने से यह नहीं सिद्ध होता कि वो काव्यात्मक नहीं है या उसकी व्यंजकता असिद्ध है। इस प्रकार उन्होंने सबसे परिवर्तनकामी संवेदना जिस सपाट, उलझी तथी गैरकाव्यात्मक प्रतीत होती भाषा का सहारा ले रही थी, उस भाषा की साहित्यिकता का भी उल्लेख किया।

आलोचना में नामवर सिंह की उपस्थिति तथा उनकी मार्क्सवादी दृष्टि का एक व्यापक प्रभाव यह भी रहा कि लोगों ने पश्चिमी साहित्य-सिद्धांतों उनसे जुड़े विद्वानों को भी पढ़ना आवश्यक समझा। पश्चिम में जो भी वैचारिक बहसें, विवाद थे, नामवर जी के माध्यम से उन्हें समझा जा सकता था। स्वयं नामवर सिंह के लेखन में जार्ज लुकाच, रेमंड विलियम्स, लुसिये गोल्डमान से लेकर डोनाल्ड डेवी, टीएस इलियट तथा एफआर लीविस तक के व्यापक संदर्भ मौजूद रहे हैं। इन पश्चिमी विद्धानों पर उन्होंने कहीं स्वतंत्र रूप से लिखा तो कहीं उनकी मान्यताओं के उल्लेख किये हैं। कहने का अर्थ है कि नामवर सिंह ने आलोचना के बौद्धिक फलक को वैश्विक फलक में रूपांतरित किया। उन्होंने यदि भारतीय काव्य परंपरा के सबसे मूल्यवान पक्षों पर काशी की ज्ञान परंपरा से खांटी आचार्यों की तरह विचार किया तो दूसरी ओर वैश्विक दृष्टि अपनाते हुए एक वैश्विक धरातल प्रदान किया। जातीयता, स्थानीयता वैश्विकता में इतनी आसानी से विचरण करने की उनकी प्रतिभा चमत्कृत करती है। लेकिन सौभाग्य से विचारधाराओं की वैश्विक समझ के बल पर उन्होंने केवल हिंदी साहित्य को वैश्विक दृष्टि से समझा ही नहीं बल्कि विदेशी विचारों को बलपूर्वक रचनाकारों पर लागू करने की प्रवृत्ति को भी प्रश्नांकित किया, वह भी बहुत साहस के साथ। जैसे कि क्रोंचे के अभिव्यंजनावाद को जबरन छायावाद पर थोपने की आचार्य शुक्ल की प्रवृत्ति को उन्होंने प्रश्नांकित किया। उन्होंने कहा है- कलावाद का कोई बड़ा प्रभाव हिंदी के बड़े कवियों पर, खासतौर पर छायावाद के कवियों पर नहीं था। शुक्ल जी की असली लड़ाई अलंकारवाद से थी लेकिन उन्होंने यूरोपीय कलावाद का भोंपू बजाना आरंभ कर दिया। नामवर सिंह के शब्दों में- मुझे ऐसा लगता है कि समीक्षा को छोड़कर हिंदी के अन्य क्षेत्रों में उस समय यूरोपीय कलावाद आया ही नहीं। आचार्य ने केवल आसमान में मुक्का मारा था। इसके अलावा पश्चिमी अस्तित्ववाद को हिंदी के लेखकों पर जबरन आरोपित करने की प्रवृत्ति को उन्होंने प्रश्नांकित किया। रामविलास शर्मा द्वारा जब मुक्तिबोध की कविताओं खासकर - मुझे पुकारती हुई पुकार, कल जो हमने चर्चा की थी, एक स्वप्न-कथा, अंधेरे में तथा चंबल की घाटी में - पर अस्तित्ववाद को दिखाया जा रहा था तब नामवर सिंह ने लिखा कि- इस तरह तो अस्तित्ववादी तंबू के नीचे दुनिया का बहुत सारा साहित्य जाएगा। उन्होंने मुक्तिबोध की कविताओं में आत्मभर्त्सना के स्वर को स्वीकार किया जिसके आधार पर मुक्तिबोध की आत्मभर्त्सना को अस्तित्ववादी लक्षणों से जुड़ा बताया गया पर यह भी कहा कि मुक्तिबोध ने अपनी रचनाओं में मैं के द्वारा अपने पूरे मध्यवर्ग की आत्मभर्त्सना को व्यक्त किया है। इसलिए इस अपराधबोध को अस्तित्ववादी व्यक्ति की अपराध स्वीकृति समझना भूल है। नामवर सिंह ने अंधेरे में जैसी कविता को वैज्ञानिक विश्वदृष्टि तथा मानव-आस्था से जुड़ी कविता बताया है। मार्क्सवाद की मूल दृष्टि यह है कि ज्ञान संपूर्ण नहीं है, तथा निरंतर विकासमान है। ज्ञान के प्रति इस मार्क्सवादी एप्रोच से ही नामवर सिंह मुक्तिबोध को भी ऊंचा उठाते हैं और लिखते हैं- मुक्तिबोध का आत्म-संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि उन्हें उसी ज्ञान की तलाश थी जो विकासमान हो। मार्क्सवाद पूर्ण ज्ञान का दावा नहीं करता, इस बात का एहसास मुक्तिबोध को उन लोगों से कहीं ज्यादा था जो तोतारटंत इस वाक्य को दुहराते रहने के बावजूद व्यवहार में मार्क्सवाद के लिए पूर्ण ज्ञान का दावा नहीं करते हैं बल्कि मार्क्सवाद के बारे में भी अपने पूर्ण ज्ञान का दावा करते हैं। ये पंक्तियाँ सीधे रामविलास शर्मा को संबोधित थीं जो मानते थे कि मुक्तिबोध की कविता में रहस्यवाद तथा अस्तित्वाद के तत्व अधिक हैं और वे मार्क्सवादी कवि नहीं हैं। ऐसे में मुक्तिबोध की कविता के उन तत्वों को सामने लाना जिनमें कथ्य की आंच में सारे रहस्यवादी प्रतीकों का पिघलकर नितांत लौकिक सामयिक अर्थ प्रदीप्त करना मुक्तिबोध के मार्क्सवाद को कविता में प्रतिष्ठित करने का साहसिक प्रयास था।

हम सब जानते हैं कि  नामवर सिंह जिस बीसवीं सदी में लिख रहे थे, वह सदी यदि नए आंदोलनों की सदी थी, तो विश्वव्यापी हिंसा की भी सदी थी। हाब्सबाम ने उसे मोस्ट मारडरस सेंचुरीयानी अब तक के मानव इतिहास की सर्वाधिक हत्यारी सदी कहा है। शीतयुद्ध, रूस-चीन की क्रांतियाँ तथा समाजवादी ब्लाक्स की स्थापना और विऔपनिवेशवीकरण इस दौर की प्रमुख ऐतिहासिक घटनाएँ थीं और इनमें भी बहुत सारी हिंसा निहित थीं। भारत जैसे समाजों में राष्ट्रीय-राजनीतिक हिंसा के साथ परंपरागत हिंसा का भी एक गहरा तालमेल रहा है। ऐसे देशकाल समय में एक आलोचक का परंपरा के प्रति दृष्टिकोण महत्त्व रखता है क्योंकि ट्रेडिशन्स (परंपरा) के प्रति गलत दृष्टिकोण यदि सामाजिक हिंसा को बढ़ा सकता है तो परंपरा के वैज्ञानिक मानवीय दृष्टिकोण उस हिंसा को रोक सकता है। नामवर सिंह ने परंपरा को समझकर परंपरा के विरोध की आवश्यकता को रेखांकित किया है। अडोर्नो का यह वाक्य उनके ध्यान में रहता ही था- One must have tradition in oneself to hate it properly.  परंपरा के अत्यधिक ज्ञान ही नहीं बल्कि उसकी अनभिज्ञता तथा अज्ञान के कारण भी भारत जैसे देश लगातार हिंसा की आग में झुलसते रहते हैं और निराधारा पारंपरिक पहचानों का निर्माण होता है। ऐसे में नामवर सिंह ने दूसरी परंपरा की बात की थी जो एक प्रकार से परंपराओं की गणना नहीं बल्कि परंपराओं की वैकल्पिकता की बात करही थी। ऐसा प्रतीत होता है कि वे दूसरी परंपरा के मुहावरे बोध का अपने विद्यार्थी जीवन से ही ग्रहण कर रहे थे। उन्होंने अपने आत्मकथन में बताया भी है कि एमए प्रथम वर्ष की पढ़ाई के दौरान उनके शिक्षक केशवप्रसाद मिश्र अपने शिक्षण में रामचंद्र शुक्ल की परंपरा से अलग रहकर तुलसी को देखने की दृष्टि प्रदान करते थे। कालिदास और भवभूति की परंपरा में भी अंतर बता सकते थे जिसमें पंत-प्रसाद अगर कालिदास की परंपरा में आते थे तो निराला आते थे भवभूति की परंपरा में। नामवर सिंह ने साक्षात्कार में बताया भी है- तभी से मेरे मन में संस्कार बना कि दूसरी परंपरा भी है। केशव जी में खास बात यह थी कि वे दोनों परंपराओं को समान आदर देते थे। दोनों के अंतर को समझना है, दोनों को अलग करना है, अंतर करते हुए दोनों को सम्मान देना मैंने केशव जी से सीखा। दो परंपराओं के भेद के बारे में ज्ञान आगे चलकर अधिक परिपक्व तब हुआ जब उन्हें इतिहास की मार्क्सवादी दृष्टि भी प्राप्त हुई। तब उन्हें ऐसी दूसरी परंपरा का भी प्रत्यक्षिज्ञान हुआ जिसमें मनुष्य शास्त्र-शस्त्र, वर्णव्यवस्था, धार्मिक वर्चस्व सत्ता की हिंसा का भी विरोध कर रहा है और एक अधिक न्यायपूर्ण परंपरा का निर्माण कर रहा है। आवश्यकता पड़ी तो परंपरा के आतंक को शिवधनुष के समान खंड-खंड भी कर सकता था। यानी, एक परंपरा-बोध अगर परंपरा के प्रति श्रद्धा से पैदा होता है, तो दूसरा परंपरा-बोध परंपराओं के प्रति आलोचनात्मक नजरिये से पैदा होता है और कहने की बात नहीं है कि नामवर सिंह ने परंपराओं के प्रति एक सजग आलोचना दृष्टि के साथ परंपरा बोध की हिमायत की। उन्होंने अपनी मार्क्सवादी दृष्टि से मेहनतकश वर्ग की, दमित-दलित वर्ग की तथा पीड़ित समुदायों की परंपरा का पक्ष लेने को ही लोकतंत्र के लिए जारी संघर्ष में हिस्सेदारी माना। हजारी प्रसाद द्विवेदी के कबीर संबंधी मतों को केवल विद्वानों के बीच बहस या शास्त्रार्थ का प्रतीक नहीं माना बल्कि उसे हिंदी साहित्य के इतिहास का मानचित्र बदल देने वाली घटना माना। उन्होंने दूसरी परंपरा की खोज में लिखा- इस प्रकार एक नये इतिहास के साथ आलोचना का एक नया मान भी दृष्टिगोचर होता है। कबीर के साथ इतिहास की एक भिन्न परंपरा ही नहीं आती, साहित्य को जांचने परखने का एक नया मान भी प्रस्तुत होता है। उन्होंने विद्रोही कबीर परंपरा के साथ ही सूर में गोपियों के प्रेम-सद्भाव की परंपरा के बारे में भी सजग किया और प्रेम में लोकमर्यादा के अतिक्रमण को दोष नहीं बल्कि गुण बताते वाली हजारी प्रसाद दिवेदी के तर्क पर मुहर लगा दी। द्विवेदी जी के उपन्यासों निबंधों का जो पुनःपाठ किया, उसमें भी दमित वर्गों के प्रति करुणा, प्रश्नवाचकता का सम्मान तथा अत्याचार से संघर्ष का रेखांकन किया जो मार्क्सवाद के विराट मानवतावादी पक्ष का एक सजल-उदार रूप है। उन्होंने परंपरा का अर्थ यह माना कि केवल स्थापित सत्ताओं की परंपरा नहीं होती बल्कि परंपरा का विरोध करने वालों की परंपरा होती है जो अधिक उदार, सहिष्णु बराबरी के समाज की रचना करते हैं। इस प्रकार परंपरा इतिहास के प्रति उन्होंने एक विमर्श तब निर्मित किया जब देश में राजनीतिक अस्थिरता थी। 1980 में दोहरी सदस्यता के कारण जनता पार्टी की सरकार का पतन हो चुका था और देश में इतिहास को विकृति करने, धर्मनिरपेक्षता को प्रश्नांकित करने सांप्रदायिकीकरण के प्रयासों के काले बादल तेजी से मंडरा रहे थे। नामवर सिंह उस खतरे को भांप रहे थे जिसमें धर्म के इतिहास से समाज की व्याख्या की जाती थी। वे वैज्ञानिक दृष्टि से धर्म की व्याख्या कर रहे थे और फिर समाज की व्याख्या कर रहे थे। इसी प्रकार वे राजसत्ता, राजा की धार्मिक निष्ठा या राजवंश के आधार पर इतिहास लेखन की पद्धति के विपरीत आम जन, सामाजिक संस्थाओं, आविष्कारों, कृषि-उद्योग में परिवर्तन आदि से जुड़ी जिस इतिहास दृष्टि का उदय हो रहा था, साहित्यालोचन के मोर्चे पर डटकर उसके पक्ष में खड़े थे। प्रोफेशन इतिहासकार भी इसी का पक्ष ले रहे थे तथा सब्जेक्टिव ढंग से इतिहास लिखने का विरोध करते थे। हरबंस मुखिया ने मध्यकालीन इतिहास लेखन की समस्याओं का उल्लेख करते हुए बताया है कि वे इतिहासकार विभिन्न घटनाओं का कारण मानवीय स्वभाव इच्छा में देखते थे। अच्छी बुरी शक्तियों के टकराव का नैरेटिव ही गढ़ा जाता था, जिससे इतिहास के सुसंबद्ध विकास को समझने में कठिनाई पैदा होती थी। नामवर सिंह स्वयं भी मध्यकाल में साहित्य के समाजशास्त्र का नाम लिये बगैर साहित्य के समाजशास्त्र को निर्मित कर रहे थे। वे साहित्य और राजसत्ता के संबंधों पर जो विचार बीसवीं सदी में हो रहा था, उसे हूबहू भक्तिसाहित्य पर लागू करने की चेष्टाओं के प्रति सतर्क कर रहे थे, साथ ही साहित्य समाज के द्वंद्व के बारे में बीसवीं सदी में जो विचारधाराएं विकसित हुई थीं, उनका संतुलित प्रयोग इतिहास के ज्ञान के लिए कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने राजसत्ता को चुनौती देने के आधुनिक विचार को तुलसी या कबीर के साहित्य पर आरोपित करने की वैचारिकी से असहमति प्रकट की और लिखा- साधारण जनता के जिन दुखों से भक्त कवि दुखी थे, उनका सीधा संबंध आगरा या दिल्ली के तख्त पर बैठे बादशाह से उतना था जितना अपने गांव से उस समाज से जिनका नियमन जातिधर्म के परंपरागत नियमों से होता था। ग्रामीण व्यवस्था में जहां परंपरागत जातिधर्म जीवन के समस्त क्रियाकलापों का नियामक था, सरकार की हैसियत एक लुटेरे से अधिक नहीं थी। चूंकि यह जातिव्यवस्था धार्मिक विधि विधानों के रूप में समाज का नियमन करती रही, इसलिए दलित जातियों का असंतोष और आक्रोश भी प्राय धर्म के रूप में प्रकट होता रहा।

रामविलास शर्मा से भी उनकी वैचारिक असहमतियों ने नामवर सिंह की केवल आलोचना दृष्टि के महत्त्व को नहीं बल्कि मार्क्सवादी वाद-विवाद की संस्कृति को विकसित करने में भूमिका निभाई है। मार्क्सवादियों का मार्क्सवादियों से ही असहमत होना, उनकी मान्यताओं की तीखी आलोचना करना तथा उन्हें अपनी मान्यताओं पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करना वह वैचारिक संस्कृति है जिसने मार्क्सवाद को अपनी सीमाओं में कैद होने से बचाया है। इसी परिवेशगत विशेषता के कारण नामवर सिंह खुद भी जार्ज लुकाच जैसे विश्वविख्यात मार्क्सवादी के मार्क्सवाद पर प्रश्न उठा सके और उनकी भयंकर भूलों का उन्होंने सोदाहरण उल्लेख किया। यह वैचारिक संस्कृति जब क्षीण पड़ने लगी और मार्क्सवादी विचारों की परंपरा पर संगठन-पदाधिकारियों की संकीर्णताएं कट्टरताएं हावी होने लगीं तो मार्क्सवादियों का समाज को वैचारिक चुनौती देने का साहस भी कमजोर पड़ गया। मार्क्सवादियों के बीच आपसी असहमति वाद-विवाद ने उन्हें व्यापक समाज के साथ वैचारिक टकराव के लिए आवश्यक प्रेरणाएं तथा बौद्धिक अस्त्र-शस्त्र भी उपलब्ध कराए हैं। यह वैचारिक संस्कृति कैसे स्वतंत्रता के बाद से लेकर नब्बे के दशक तक सारे संकटों के बावजूद फलफूल रही थी, इसे रामविलास शर्मा और नामवर सिंह के परस्पर टकराव से समझा जा सकता है। आर्य वेद की महानता को लेकर हिंदी साहित्य में भी बहस वाद-विवाद होते रहे हैं। आर्यसमाज के महत्त्व को स्वीकार करने वाले ऐसे लेखक भी रहे हैं जो आर्यसमाज के दार्शनिक प्रभाव को भी ग्रहण कर लेते हैं। रामविलास जी ने भी अपने बाद के लेखन में आर्य वेद को आधार बनाकर कई विवादग्रस्त मान्यताएँ रखी थीं। स्वामी दयानंद की तरह आर्यो को भारत का मूल निवासी मानने तथा दयानंद की तरह ही वेद के भारत की प्राचीनतम सभ्यता होने का दावा किया था जिसपर नामवर सिंह ने इतिहास की शवसाधना नाम प्रसिद्ध लेख में प्रश्नचिह्न लगाये हैं और लिखा- इस मामले में दयानंद और रामविलास जी की स्थिति में फर्क यह है कि दयानंद के जीते-जी हड़प्पा की खुदाई नहीं हुई थी इसलिए उनका वैदिक सभ्यता को सबसे पुरानी कहने का अर्थ समझ में आता है। लेकिन रामविलास जी हड़प्पा सभ्यता के बारे में इतने अनुसंधानों के बाद भी वहीं अड़े हैं जहाँ सौ साल पहले दयानंद खड़े थे। साहित्य की दृष्टि से अप्रासंगिक प्रतीत होते हुए भी इतिहास के विवादों में रुचि लेना, तथा वर्तमान आलोचना की प्रामाणिकता तथा वैचारिक स्पष्टता की रक्षा करना आलोचनात्मक विवेक के विकास के लिए अनिवार्य है जिसके लिए नामवर सिंह दृढ़ता के साथ प्रयत्न करते दिखते हैं। 

नामवर सिंह के अनुसार साहित्य का सह्रदय पाठक होना आलोचना की पहली शर्त है। पर सह्रदयता के साथ-साथ इस सत्य को भी स्वीकारना है कि लेखक का सामना नए युग में नए आक्रामक पूंजीवाद से होता है। बहुत सारे मानव नियति संबंधी प्रश्न को वह पूंजीवाद की समस्या समझकर केवल नियति अजनबीपन के सहारे परिभाषित करने का प्रयास करता है। उन्हीं के शब्दों में- आज ज्यादातर हिंदी लेखक अपनी वर्ग स्थिति दूसरों से तो क्या स्वयं अपने आप से ही छिपाने की विडंबना का शिकार है। नामवर सिंह की साहित्य-दृष्टि ने हिंदी आलोचना को एक सुदृढ़ वैचारिक आधार उपलब्ध कराया, भले ही नामवर जी के प्रशंसकों आलोचकों की उनसे लाख असहमतियां रही हों। हिंदी में जिस प्रकार से अध्यात्म, भावुकता, लिजलिजी आस्था, रहस्यवाद, कल्पनाविलास, उलझन, दुविधा आदि का बोझ रहा है, उस बोझ से हिंदी को मुक्त करने में मार्क्सवादी आलोचना की ऐतिहासिक भूमिका रही है और नामवर सिंह उस भूमिका को निभाने वाले आलोचक रहे हैं। उन्होंने वर्ग-संघर्ष, इतिहास-दर्शन तथा समाज में साहित्य की भूमिका के प्रश्नों पर निरंतर विचार किया और कहा- दरअसल वर्ग-संघर्ष जिस प्रकार मार्क्स के इतिहास-दर्शन के मूल में है, साहित्य उसी प्रकार वर्ग-संघर्ष की संचालक है, वेगशक्ति है। भाव और बोध दोनों के द्वारा साहित्य उस वर्ग-संघर्ष में योग देता है जिसे मार्क्स ने इतिहास का लोकोमेटिव कहा था। (आलोचक के मुख से, पृ-29)     

प्रत्येक सदी और उसमें मौजूद टाइम (समय) अपने क्रिटीक यानी आलोचक भी पैदा करती है जो उस सदी में निहित संघर्षों के बारे में हमें सजग कर सकें तथा जो उस समय समाज के आंतरिक द्वंद्वों को मनुष्यता के पक्ष में प्रयोग करने का सैद्धांतिक आधार भी उपलब्ध करा सकें। लेकिन केवल सदी में किसी विचारक या बुद्धिजीवी को कैद करके रखना या उसी के समय में उसे बांधने के अपने खतरे हैं। कबीर, तुलसी, भारतेंदु, प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन आदि को केवल उनके शताब्दी समय में नहीं रखा जाता है। इसलिए हमें दोनों अतियों के बीच कहीं रहना है। एक ओर नामवर सिंह को बीसवीं सदी के प्रतिमानों संघर्षों के संदर्भ में समझना विश्लेषित करना है, तो दूसरी ओर उनके लेखन के उन बौद्धिक सूत्रों स्थापनाओं का भी उल्लेख करना है जिनका महत्त्व, वैधता प्रासंगिकता इक्कीसवीं सदी में भी बनी रहने वाली है।


वैभव सिंह

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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