हिंदी साहित्य के विकास में पत्रिकाओं का विशेष योगदान रहा है। हिंदी के विकास की पूरी प्रक्रिया उसके विभिन्न विधात्मक रूपों में देखी जा सकती है। जिस प्रकार से साहित्य के विकास में पत्रिकाओं का योगदान विशिष्ट होता है उसी प्रकार पत्रिका के विकास में संपादक का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है। नामवर सिंह का योगदान हिंदी आलोचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय है। साथ-ही-साथ हम देखते हैं कि ‘आलोचना’ पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने सम्पादकीय और पत्रकारिता को एक नए शीर्ष पर स्थापित करने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। नामवर सिंह ने हिंदी में कितने ही नए प्रतिमान गढ़े हैं, उसी में से एक विशेष रूप संपादक के रूप में स्थापित ‘नामवर’ का भी है। नामवर सिंह ने आलोचना पत्रिका को एक ऐसा रूप दिया जो सीधे सामाजिक सरोकारों से जुड़ता है। उसी का परिणाम है कि ‘आलोचना पत्रिका’ समकालीन समय में भी मुख्यधारा की पत्रिका के रूप में प्रतिष्ठित है।
हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं की परंपरा में रचनात्मक साहित्य और विविध विधाओं पर केंद्रित पत्रिकाओं की कोई कमी नहीं रही है, किन्तु शुद्ध आलोचना पर केंद्रित पत्रिकाओं का अभाव रहा है। इस अभाव की पूर्ति सन् 1951 ई. में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका ‘आलोचना’ से हुई।‘आलोचना’ का प्रकाशन ‘राजकमल प्रकाशन’ नई दिल्ली से होता है। ‘आलोचना’ का प्रवेशांक अक्टूबर सन् 1951 ई. में शिवदान सिंह चौहान के संपादन मे प्रकाशित हुआ। इस अंक में शिवदान सिंह चौहान ने अपने संपादकीय में स्पष्ट रूप से प्रश्न किया है कि ‘आलोचना’ क्यों?। इनके संपादन में छः अंक निकलने के उपरांत ही ‘आलोचना’ का संपादन ‘धर्मवीर भारती’, ‘विजयदेवनारायण साही’, ‘रघुवंश’, ‘ब्रजेश्वर वर्मा’ की संपादन समिति के द्वारा होने लगा। शिवदान सिंह चौहान के द्वारा अप्रैल-जून,सन् 1953 ई. से जनवरी-मार्च,सन् 1956 ई. तक आलोचना के ग्यारह अंकों का संपादन किया गया। इनके उपरांत अप्रैल, सन् 1956 ई. से अप्रैल-जून, सन् 1959 ई. तक का संपादन नंददुलारे वाजपेयी ने किया। इन तीन वर्षों मे केवल नौ अंक ही निकले। इसके पश्चात ‘आलोचना’
का
प्रकाशन
तीन-
चार
वर्षों
के
लिए
बंद
रहा।
जुलाई,
सन्
1963 ई.
से
आलोचना
का
पुनः
प्रकाशन
शिवदान
सिंह
चौहान
द्वारा
हुआ।
उपर्युक्त
बातों
से
स्पष्ट
है
कि
‘आलोचना’
का
प्रकाशन-संपादन अत्यंत व्यवधान, उतार-चढ़ाव एवं फेरबदल से होकर गुजरा है। अप्रैल-जून, सन् 1967 ई. से इसका सम्पादन डॉ. नामवर सिंह के द्वारा किया जाने लगा। नामवर जी द्वारा संपादन का भार ग्रहण करने के साथ ही ‘आलोचना’ को स्थायित्व मिला और इन्होंने अप्रैल-जून, सन् 1990ई. तक इसके संपादक के रूप मे अपना कर्तव्य निभाया। नामवर सिंह द्वारा इतने लंबे समय तक आलोचना का सम्पादन करना स्वयं उनकी कुशल संपादकीय क्षमता का बोध कराता है। छोटाराम कुम्हार के शब्दों में- “‘आलोचना’ डॉ. नामवर सिंह के लिए और ‘आलोचना’ के लिए डॉ. नामवर सिंह दोनों एक दूसरे के लिए सौभाग्य का विषय कहे जा सकते हैं।"(1)
डॉ. नामवर
सिंह
के
सम्पादन
में
प्रकाशित
‘आलोचना’
के
प्रारम्भिक
अंक
अत्यधिक
महत्त्व
रखते
हैं।
एक
ओर
तो
वह
भारत
के
युवा
लेखकों
के
अंदर
मौजूद
विरोध,असहमति आदि को आमंत्रित करते हैं तो वहीं दूसरी ओर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण चुनाव के बाद के भारत पर आधारित विचारों को साझा करने को महत्व देते हैं। ‘चुनाव के बाद भारत’ संवाद में वह लिखते हैं कि “स्वाधीनता प्राप्ति के बाद पहली बार हमारे राजनीतिक जीवन में परिवर्तन का आभास हुआ है और लोग सोचने लगे है कि परिवर्तन संभव है। जो स्थिति अब तक अपरिवर्तनीय नियति प्रतीत हो रही थी वह अब अपने सामर्थ्य के अधीन अनुभव हो रही है और इस प्रकार बीस वर्षों के बाद रूढ़ असंतोष को एक दिशा मिली है। राजकीय सत्ता के ढाँचे में एकाधिकार के टूटने से पहली बार स्पष्ट विकल्प दृष्टिगोचर हुए हैं और जनतंत्र की संभावनाएं उद्घाटित हुई हैं। केंद्र चुनाव के बाद घटनाएँ जिस तिर्यक गति से घटित हो रही है, उससे स्पष्ट है कि यह केवल भावविभोर होने का समय नहीं है, बल्कि अनेक जटिल प्रश्नों से संकुल संक्रमण की ऐतिहासिक घड़ी है, जिसके लिए कही अधिक बौद्धिक सार्थकता की अपेक्षा है।”(2) ‘आलोचना’ के संपादक के रूप मे डॉ. नामवर सिंह ने युवा लेखन को अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया। ‘आलोचना’ के युवा लेखन केंद्रित अंक में उन्होंने युवा लेखकों को साहित्यिक परिदृश्य में सम्मिलित करने की कोशिश की। इसी काल के दौरान मौजूदा पीढ़ी के ‘रघुवीर सहाय’ और अगली पीढ़ी के ‘धूमिल’ की कविताएँ व्यवस्था के प्रति एक ही तरह की छटपटाहट प्रकट करती थी। इसी समय ‘आलोचना’ का एक विशेषांक स्वर्गीय मुक्तिबोध को समर्पित किया गया था। इस अंक के संवाद का आधार विषय ‘कविता और राजनीति’ थी। यह विषय मुख्यतः बहस करने वाली कविता की रूपरेखा स्पष्ट करने के लिए ही चुना गया था।
नामवर जी के संपादन काल में ‘आलोचना’ में भारतेन्दु, मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद, आचार्य शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा, बाबा नागार्जुन, धूमिल तथा मुक्तिबोध पर विशिष्ट अंक केंद्रित किए गए। इन अंकों के जरिए हिन्दी साहित्य इतिहास का एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक रूप प्रस्तुत किया गया। डॉ.रामविलास शर्मा द्वारा सन् 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को ‘हिन्दी नवजागरण’ की पहली मंज़िल बताते हुए उसकी परंपरा छायावाद तक सुनिश्चित कर दी गई थी। इस पर असहमति प्रकट करते हुए नामवर जी ने भारतेन्दु तथा मैथिलीशरण गुप्त पर पत्रिका का संपादकीय ‘हिन्दी नवजागरण की समस्याएं’ लिखा। नामवर
जी
के
अनुसार “हिन्दी
नवजागरण
के
अग्रदूत
भारतेन्दु
बंगाल
नवजागरण
से
प्रेरणा
प्राप्त
कर
रहे
थे
और
उसके
समर्थ
सार्थवाह
महावीर
प्रसाद
द्विवेदी
की
निष्पलक
दृष्टि
मराठी
नवजागरण
के
अन्तर्गत
चलने
वाले ‘संशोधन’ पर थी, तो हिन्दी प्रदेश के नवजागरण की अपनी विशिष्टता का निरूपण नवजागरण के अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य में ही समीचीन है। इन तथ्यों को देखते हुए हिन्दी नवजागरण की विशिष्टता बतलाने के लिए सन् सत्तावन की राज्यक्रान्ति को उसका बीज मानना कठिन है। भारतेंदु तथा उनके मण्डल के लेखक सन् सत्तावन की राज्यक्रान्ति की अपेक्षा बंगाल के उस नवजागरण से प्रेरणा प्राप्त कर रहे थे जो उससे पहले ही शुरू हो चुका था। कारण यह है कि भारतेंदु और उसके मण्डल के लेखकों की दृष्टि में अंग्रेज़ी राज्य को चुनौती राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक थी और इस सांस्कृतिक संघर्ष में बंगाल नवजागरण से अस्त्र-शस्त्र मिलने की संभावना अधिक थी।”(3)
सन् 1857 ई. की क्रांति को हिन्दू नवजागरण का स्त्रोत मानने में कई समस्याएं हैं। डॉ नामवर सिंह की मुख्य चिंता यह है कि “हिंदी प्रदेश के नवजागरण के सम्मुख यह बहुत गम्भीर प्रश्न है कि यहाँ का नवजागरण हिन्दू और मुस्लिम दो धाराओं में क्यों विभक्त हो गया? यह प्रश्न इसलिए भी गम्भीर है कि बंगाल और महाराष्ट्र का नवजागरण इस प्रकार विभक्त नहीं हुआ।”(4) यहाँ नामवर सिंह का इशारा इस तरफ है कि स्वत्व रक्षा के प्रयास मे जो प्रेम जगा वही आगे चलकर हानिकारक सिद्ध हुआ आज जो लोग ‘भारतीय अस्मिता’ की चिंता सबसे अधिक करते हैं वही इस अस्मिता को धुंधला करने का भी काम कर रहे हैं।
हिंदी नवजागरण संबंधी संपादकीय समस्याएँ लिखने के तीन वर्ष पहले नामवर जी
ने लेखक चंद्रधर शर्मा गुलेरी की जन्मशती पर ‘आलोचना’ का संपादकीय ‘चंद्रधर शर्मा गुलेरी और हिंदी नवजागरण’ लिखा। इस लेख से यह देखने की कोशिश की गई थी कि गुलेरी जी कैसे आधुनिक दृष्टि से अपनी परंपरा का अनुशीलन कर रहे थे तथा नई शैली, नए गद्य और धर्म के रहस्य को सब देखने समझने की चीज समझ रहे थे। नामवर जी की दृष्टि में वे उन पंडितों में से नहीं थे जो शास्त्र पढ़कर शास्त्र के गुलाम हो गए थे बल्कि वे अपने विवेक से अंधविश्वास और रहस्यवाद को चुनौती दे रहे थे। गुलेरी जी का शास्त्र लोक की ओर उन्मुख था। इसी लोकान्मुख शास्त्र की परंपरा में नामवर जी हजारीप्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन, नागार्जुन और मनोहर श्याम जोशी को स्थान देते हैं।
‘आलोचना’ में भारतीय भाषाओं के साथ अन्य भाषा के लेखकों को भी समान महत्व दिया गया। साथ ही इन लेखकों पर आधारित बहसों का अपना समकालीन महत्त्व है। ‘आलोचना’ में जब नेरुदा पर संपादित विशिष्ट अंक छपा उस समय हिंदी में आधुनिकतावाद और यथार्थवाद के बीच संघर्ष चल रहा था। डॉ. नामवर सिंह ने नेरुदा के प्रति अपनी दृष्टि प्रकट करते हुए लिखा कि “नेरूदा
का
काव्य
वस्तुतः
पश्चिम
की
आधुनिकतावादी
काव्यधारा
के
लिए
वज्रघात
है।
जिनके
लिए
आधुनिक
कविता
फ्रांसीसी
प्रतीकवादियों
से
चलकर
इसलिए
पाउंड
में
विशेष
हो
जाती
है।
पाब्लो
का
काव्य
संसार
उनके
सम्मुख
एक
नए
आधुनिक
विश्व
का
उद्घाटन
करता
है
।”(5)
इसके
साथ
ही
एक
अंक
में
हंगरी
के
आलोचक
जॉर्ज
लुकाच
पर
लेख,
साक्षात्कार
और
लुकाच
के
लेख
का
अनुवाद
भी
प्रकाशित
किया
गया।
हिंदी
साहित्य
के
पाठकों
के
लिए
ऐसी
विशेष
एवं
महत्वपूर्ण
सामग्री
उपलब्ध
कराने
के
पीछे
नामवर
जी
का
उद्देश्य
साहित्य-शिक्षा के उन्नयन के साथ ही मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र की समस्या को उद्घाटित करने की भी कोशिश थी। लुकाच के अंतर्विरोधों को नामवर जी जिस प्रकार का सम्मान देते थे वह उनकी आलोचनात्मक दृष्टि को दर्शाता है। लुकाच के लेखन का महत्त्व मानते हुए उन्होंने उपन्यास में प्रकृतिवाद का खंडन करते हुए यथार्थवाद की स्थापना की और साहित्य में संप्रभुता की स्थापना की। इसके साथ ही नामवर जी ने यह भी स्वीकार किया कि लुकाच की अपनी सीमाएं एवं रूचियाँ थी। काफ्का, ब्रेख्त आदि उनकी मुश्किल बढ़ाते रहें। इस वक्तव्य के अंत में नामवर जी लिखते है कि “आज लुकाच के आलोचना सिद्धान्त भले ही आग्रह प्रतीत हो परन्तु उनकी जन्मदृष्टि का युग-युगान्तर-व्यापी प्रसार आज भी स्पृहणीय है। उनमें सांस्कृतिक कृतियों को परखने के लिए विराट अवधारणाओं के निर्माण की ऐसी क्षमता थी जो अत्यन्त दुर्लभ है। 'संप्रभुता' और वस्तुनिष्ठता के प्रति लूकाच का जो आग्रह था वह आज भी प्रेरणादायक है। लूकाच के व्यक्तित्व से
स्पष्ट
है
कि
एक
अपूर्ण
एवं
सदोष
मार्क्सवादी
भी
मार्क्सवादियों से कही अधिक महान हो सकता है ।”(6) इससे
यह
समझना चाहिए कि
मार्क्सवाद
के
समर्थक
नामवरजी मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र का निरंतर परीक्षण करते
रहते
थे।
गोल्डमान के निधन पर आलोचना के अंक-20 के संपादकीय में डॉ. नामवर सिंह ने गोल्डमान और लुकाच की मान्यताओं के आधारभूत अंतर को उद्घाटित किया है। एक अंतर यह है कि गोल्डमान ने लुकाच की ‘समग्रता’ की अवधारणा को साहित्यिक समाजशास्त्र के क्षेत्र में ‘संरचना’ के रूप में स्थापित किया। नामवर जी के दृष्टि में “गोल्डमान की आस्था सामान्यत समाजवाद और मानववाद में है किन्तु उनकी दृष्टि नवपूँजीवाद के भ्रमों से इतनी मुक्त नहीं है कि उन्हें मार्क्सवादी माना जाए।”(7)
आलोचना के अंक-31 में डॉ० नामवर सिंह ने रेमंड विलियम्स का निबन्ध ‘संस्कृति के मार्कसीय सिद्धान्त में आधार और ऊपरी ढाँचे की सार्थकता’ शीर्षक से प्रकाशित किया और उसके प्रति विशेष रूप से पाठकों का ध्यान आकृष्ट करते हुए लिखा “काव्य-कृति अथवा कलाकृति की स्वायत्त या स्वत पूर्व मानकर उसके विश्लेषण आस्वाद पर केन्द्रित रूपवादी आलोचना की कमजोरियों की ओर ध्यान तो औरों ने भी आकृष्ट किया है। किन्तु रेमण्ड विलियम्स सम्भवतः पहले आलोचक है जिन्होंने इसके सामाजिक आधार का उद्घाटन करते हुए स्पष्ट कहा है कि इसका सम्बन्ध उपभोगग्रस्त पूँजीवादी कला या काव्य को भी वस्तु में बदलने का प्रयास कर रही है।”(8)
भारतीय साहित्य चिंतन से संबंधित महत्वपूर्ण लेख भी ‘आलोचना’ में प्रकाशित होते रहे हैं ।आलोचना के अंक-92 का संपादकीय ‘रस जस का तस या बस’ में नामवर जी ने यह दिखाने की कोशिश की है कि समय-समय पर मूल रस सिद्धांत का विस्तार और विकास करने के नाम पर समीक्षकों ने किस तरह अपना हित साधने की कोशिश की है । नामवर जी की टिप्पणी है- “इस प्रकार क्या 'रस' का दर्शन शक्ति का प्रदर्शन नहीं लगता? आजकल जिसे 'आइडियोलॉजी' कहते हैं वह और क्या होती है? कथा-रस-सिद्धान्त ने शुरू से ही 'आइडियोलॉजी' अथवा 'चिह्न’ की भूमिका नहीं निभाई है। फिर भी जैसा कि वाल्टर बेन्जामिन ने 'इतिहास और दर्शन' की सातवी 'थीसिस' में कहा है, सभ्यता का ऐसा भी दस्तावेज न हो। रस-सिद्धान्त इसका अपवाद नहीं है ।”(9)
प्रगतिशील लेखक संघ के स्वर्णजयंती पर ‘आलोचना’ का विशेष अंक प्रकाशित हुआ, इस अंक के जरिए नामवर जी ने प्रगतिशील लेखक संघ का मूल्यांकन प्रस्तुत किया था। इस अंक के द्वारा लंबे समय के आलोचनात्मक संघर्ष के अंतर्विरोध सामने आए। इस अंक में सज्ज़ाद ज़हीर की आपबीती ‘रोशनाई’ का अंश प्रकाशित हुआ, जो ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। साथ में ही प्रगतिशील विचारधारा और आंदोलन से संबंधित कई महत्वपूर्ण लेख भी शामिल किए गए थे। इस अंक के अंतिम लेख से डॉ. नामवर सिंह के अपने आलोचनात्मक संघर्ष की झलक देखने को मिलती है- “बहरहाल प्रश्न साहित्य को जनता के निकट ले जाने का है। देखने में समस्या व्यवहार की मालूम होती है लेकिन इसका सम्बन्ध मूलतः रूपक से है। समय सपाट है तो सुपरिचित सरलता के सौन्दर्यशास्त्र का निर्माण और जनकाव्य के नाम पर लोक काव्य की पैरोडी होगी, जैसा कि हुआ भी ।”(10)
उपर्युक्त विशेषांक से पहले भी समय-समय पर प्रगतिशील आंदोलन और विचारधारा पर केंद्रित अंक प्रकाशित होते रहे। उस समय बांदा में आयोजित एक प्रगतिशील लेखक सम्मेलन में उपस्थित लेखकों एवं सदस्यों के बीच व्याप्त अंतर्विरोधों एवं संकीर्णताओं के बारे में आलोचना के संपादकीय में अपने विचार प्रकट करते हुए नामवर सिंह ने लिखा है कि “वस्तुतः साहित्य में राजनीति मतभेदों को अनावश्यक तूल देने वाले वामपंथी लेखक यह छोटी-सी बात भूल जाते है कि मार्क्सवाद केवल एक राजनीतिक सिद्धान्त नहीं बल्कि एक विश्वदृष्टि है जो लेखक को अपने समय की, वास्तविकता को उसकी समग्र जटिलता के साथ समझने में सहायक होती है ।”(11)
नामवर
जी
इस
बात
को
लेकर
चिंतित
हैं
कि
अधिकांश
वामपंथी
लेखक
अपनी
राजनीति
को
साहित्यिक
रूप
देने
में
असमर्थ
हैं
या
उन्हें
इस
बात
का
भान
नहीं
है
।
‘आलोचना’ में ‘प्रासंगिकता का प्रसाद’ नाम से छपा नामवर सिंह का संपादकीय प्रगतिशीलता के लिए संघर्ष करने वालों के समक्ष उपस्थित चुनौती की ओर इशारा करता है। प्रासांगिकता के प्रसाद को लेकर नामवर सिंह इसलिए चिंतित हैं क्योंकि अतीत के किसी बड़े लेखक को प्रासंगिक बताकर समकालीन बनाने की परंपरा चल पड़ी है। इस कारण अतीत की अतीतता के साथ-साथ वर्तमान की विशिष्टता भी मिट रही है। अतीत एवं वर्तमान का अंतर खत्म होता जा रहा है और समकालीन समस्याओं से बच निकलने का रास्ता बनता जा रहा है। ब्रेख़्त के अलगाव-प्रभाव( एलीयनेशन इफेक्ट) सिद्धांत को आलोचना में लागू करने को प्रस्तावित करते हुए नामवर सिंह लिखते हैं कि “अतीत की कृतियों को आज के लिए प्रासंगिक बनाने का सबसे वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ ढंग यह है कि अपने और उनके बीच की दूरी को सुरक्षित रखा जाए और इस प्रकार पाठकों में इस आलोचनात्मक विवेक को जाग्रत रखा जाए जिससे वे अतीत में महान से महान कृति के अपने अन्तर्विरोध के प्रति सजग रहे ।”(12)
सन् 1902 ई. में प्रकाशित इतिहासाचार्य विश्वनाथ काशीनाथ राजवाले का मूल रूप से मराठी में लिखित ‘कादंबरी’ निबंध का हिंदी अनुवाद ‘आलोचना’ में ‘उपन्यास’ शीर्षक से छपा। करीब 8 दशकों बाद छपे इस निबंध का महत्त्व इसलिए है क्योंकि इसमें उपन्यास को सामाजिक ऐतिहासिक संदर्भ में दर्शाया गया है और यथार्थवाद के स्थान पर फंतासी को महत्व दिया गया है। स्वयं नामवर सिंह की टिप्पणी है कि “ ‘आलोचना’ के लिए हमने विशेष रूप से अनुवाद कराया है। यह निबंध आज से छियासी वर्ष पहले 1902 में प्रकाशित हुआ था, फिर भी आज कितना प्रासंगिक है। हिंदी जगत तो खैर इससे एकदम अपरिचित है ही, मराठी में भी आज इससे कम लोग ही अवगत हैं। जहाँ तक अपनी जानकारी है, व्यापक सामाजिक, ऐतिहासिक परिदृश्य में 'उपन्यास' के उदय पर किसी भारतीय भाषा में लिखित यह पहला गंभीर निबंध है।”(13) गोविन्द पुरुषोत्तम देशपांडे ने अपनी टिप्पणी में इस निबन्ध को महत्त्वपूर्ण बताया है कि यह फैन्टेसी की साहित्यिक सार्थकता की ओर ध्यान आकृष्ट करता है और समाजवादी यथार्थ को पर्याप्त न मानकर तत्त्व का पक्ष लेता है जिसे आगे के चिन्तक 'जादुई यथार्थ’ कहना चाहें तो कह सकते हैं। “किताबी यथार्थवाद देखने की ज़रूरत नहीं है। यथार्थवाद का सम्बन्ध सीधा जिन्दगी से है। जिन्दगी किसी स्थान की, किसी समय की, अपने कमियों की, अपने परिवेश के उनके संदर्भों एव समस्याओं की होती है। यह बुनियादी समस्या है और यह मार्क्सवादी दृष्टि ही है। मार्क्सवाद इसके विरोध में नहीं जाता। वह मानता है कि निश्चित संदर्भ में ही यथार्थ रहता है। अर्थात् यथार्थ कोई हवाई अमूर्त चीज नहीं है। यथार्थ किसी देशकाल से परे नहीं होता। इसलिए देशकाल और कालबद्ध यथार्थ के बारे में जो लिखता है, वही सच्चे अर्थों में यथार्थवादी माना जाता है। यही मार्क्सवादी दृष्टि है। यदि गैर मार्क्सवादी दृष्टि हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता। भारतीय दृष्टि भी यही कहती है। इसमें किताबों से कोई सहारा या सहायता नहीं मिलेगी।”(14)
कन्नड़ साहित्यकार यू. आर. अनंतमूर्ति का लेख ‘ब्राह्मण और शूद्र’ ‘आलोचना’ के ‘कन्नड़’ संबंधित अंक में छपा। इस लेख की स्थापनाएँ समकालीन संदर्भ में प्रासंगिक है। श्रीकांत वर्मा के अवसान पर प्रकाशित अंक-78 में उनके पत्र, संस्मरण, डायरी के पन्ने उन्हें समझने की नई दृष्टि प्रदान करते हैं। नागार्जुन पर केंद्रित विशिष्ट अंक में प्रकाशित कृष्णा सोबती से नागार्जुन का संवाद हिंदी साहित्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि है।
परंपरा के मूल्यांकन के संदर्भ में अन्य परंपराओं के महत्त्व को स्वीकार करने का कार्य भी ‘आलोचना’ के माध्यम से ही हुआ। डॉ. नामवर सिंह के सम्पादकीय में ही ‘दूसरी परंपरा की खोज’ का प्रश्न प्रमुखता से उठाया गया। नामवर सिंह ने अपने संपादकीय द्वारा यह धारणा प्रस्तुत की कि प्रभुत्त्वशाली परंपरा की मुख्य एवं प्रधान प्रवृतियों द्वारा अन्य लघु परम्पराएँ एवं धाराएँ दब जाती है या उनको दरकिनार कर दिया जाता है। ‘आलोचना’ उन हाशिए में डाल दी गई परंपराओं की खोज का माध्यम बनती है । डॉ. नामवर सिंह ‘परंपरा के मूल्यांकन’ का अर्थ स्पष्ट करते हुए अपने एक साक्षात्कार में कहते हैं कि “अपनी अस्मिता और अपनी जड़ों की खोज करते हुए परंपरा के प्रति आलोचनात्मक रुख़ से परिचित होना चाहिए।”(15)
आलोचना को मुख्यतः सार्थक वाद-विवाद केंद्रित करने की कोशिश डॉ. नामवर सिंह के आलोचनात्मक संघर्ष से भिन्न नहीं है। डॉ. नामवर सिंह के संपादन में आलोचना को गहरे अर्थों में समकालीन सार्थकता प्राप्त हुई। मूल्यों से परिपूर्ण विचारों की निरंतर उपस्थिति के साथ रचनाओं से निकट एवं हस्तक्षेपरहित संबंध था। यह आलोचना का आदर्श और चरित्र के साथ-साथ रणनीति भी थी।
इतिहास की चुनौती का डट के सामना करते हुए विचारधारा के संघर्षों के प्रति जागरूक रहना नामवर सिंह के साथ-साथ ‘आलोचना’ के लिए भी अत्यंत आवश्यक था। नामवर सिंह का अपने संघर्षों से ‘आलोचना’ पत्रिका के संघर्ष को अलग कर पाना कठिन है।
नामवर
सिंह
के
लिए
‘आलोचना’ का संपादन अखंड अवधारणाओं पर प्रश्न करने, उन पर संदेह करने और टकराने का अनुभव था। प्रगतिशीलता भी उन्हें अखंड अवधारणा के रूप में स्वीकार न थी, ना आधुनिकता और न ही यथार्थवाद। इसके साथ ही
उन्होनें उत्तर संरचनावाद और उत्तर आधुनिकता पर विचार करते हुए धर्म जैसी संकल्पना को हमारे सामने पुनर्विचार के रूप में प्रस्तुत किया। तीन महत्त्वपूर्ण दशकों के रचना कर्म पर ‘आलोचना’ का महत्त्वपूर्ण दबाव रहा है। स्वीकृति और सहमति ही नहीं, अपितु अस्वीकृति एवं असहमति के रूप में भी।
नामवर
जी
की
असहमतियाँ
जब
भी
हावी
हुई
हैं
तब-तब
उन्हें
विरोध
का
सामना
करना
पड़ा।
इसी
संदर्भ
में
वह
केदारनाथ
सिंह
को
दिए
हुए
अपने
साक्षात्कार
में
कहते
हैं
कि,
“मेरे
इस
दुहरे
संघर्ष
में
अंतर्विरोध
उन्हें
ही
दिखायी
पड़ता
है
जो
साहित्य
में
या
तो
शुद्ध
कलावादी
हैं
या
फिर
अतिवामपंथी।
इस
संबंध
में
मुक्तिबोध
का
जिक्र
करूँ
तो
उनका
भी
संघर्ष
इसी
तरह
दुहरा
था।
एक
ओर
नयी
कविता
के
अंदर
बढ़नेवाली
जड़ीभूत
सौंदर्यानुभूति
का
विरोध
और
दूसरी
ओर
मार्क्सवादी
आलोचना
में
प्रक्षिप्त
स्थूल
समाजशास्त्रीयता
विरोध।
मुझे
ऐसा
लगा
है
कि
एक
से
लड़ने
के
लिए
दूसरे
से
लड़ना
जरूरी
है।
दरअसल
यह
एक
ही
संघर्ष
के
दो
पहलू
हैं।
यह
जरूर
है
कि
हमेशा
यह
दुहरा
संघर्ष
साथ-साथ
नहीं
चल
सकता।
मसलन
‘इतिहास
और
आलोचना’ के लेखों में
रूपवाद
या
कलावाद
का
विरोध
ज्यादा
है, क्योंकि उस दौर
की
ऐतिहासिक
आवश्यकता
यही
थी।
आगे
चलकर
यदि
उसकी
उपेक्षा
की
गयी
और
अति
वामपंथी
प्रवृत्ति
की
आलोचना
की
ओर
विशेष
ध्यान
दिया
गया
तो
स्पष्ट
है
मेरी
नजर
में
साहित्यिक
वातावरण
बदल
चुका
था।
‘आलोचना’ का जो अंक
मैंने
प्रगतिशील
लेखन
पर
विस्तृत
परिचर्चा
के
साथ
निकाला
था
उसमें
मैंने
इसी
दृष्टि
से
अंधलोकवाद
की
कड़ी
आलोचना
की
क्योंकि
मुझे
इधर
की
मार्क्सवादी
आलोचना
में
यह
प्रवृत्ति
बढ़ती
हुई
दिखायी
पड़ी।
अब
इधर
महसूस
कर
रहा
हूँ
कि
पिटा
हुआ
कलावाद
हिंदी
में
फिर
सिर
उठा
रहा
है
और
नये
तेवर
के
साथ
सामने
आ
रहा
है।
निश्चय
ही
देर
सबेर
इससे
निपटना
होगा।”(16)
निष्कर्ष : निष्कर्षत डॉ. नामवर सिंह द्वारा संपादित ‘आलोचना’ की यह विशेषता है कि वह एक साहित्यिक प्रतिमान या मॉडल पर निर्भर नहीं रहती। इसके बजाय, वह प्रासंगिकता और संदर्भ के आधार पर विभिन्न कृतियों के महत्व को स्वीकार करते हैं। नामवर सिंह के काल में संपादित ‘आलोचना’ का महत्व केवल ऐतिहासिक नहीं है। उसके अंकों की स्मृतियाँ आज हमारे आलोचनात्मक संघर्ष के बीच मौजूद हैं। नामवर सिंह के संपादकीय विवेक का ही अवदान है जिससे हिंदी आलोचना के कई आयाम हमारे समक्ष आए हैं। उन्होंने आलोचना पत्रिका के संपादन के माध्यम से आलोचना को केवल साहित्यिक न रखकर उसे व्यापक सांस्कृतिक क्षेत्र से जोड़ा। उसे सभ्यता समीक्षा का रूप दिया। ‘आलोचना पत्रिका’ के माध्यम से हम उस समय के तमाम बौद्धिक विचारों और परिचर्चाओं से अवगत होते हैं। ऐसे
बौद्धिक वातावरण का निर्माण हुआ जिसके द्वारा समस्त साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को आलोचनात्मक रूप
में
देखा
जा
सके। इस प्रकार नामवर सिंह का आलोचनात्मक विवेक और संपादक-व्यक्तित्व की यह महत्त्वपूर्ण देन है कि
इसके
द्वारा
कितने
ही
आलोचकों-पाठकों का
आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित
हुआ
। ‘आलोचना’ न केवल हिंदी की प्रमुख पत्रिका बनी बल्कि उसने भारतीय साहित्य को सम्यक रूप से देखने का विवेक भी जागृत किया। आज हिंदी में जितने बड़े आलोचक-चिंतक दिखाई पड़ते हैं, उनका संबंध किसी-न-किसी रूप में 'आलोचना' पत्रिका से अवश्य रहा है।
संदर्भ
:
- छोटाराम कुम्हार, आलोचना संदर्भ कोश: आलोचना पत्रिका का सर्वेक्षण और मूल्यांकन, राजस्थानी
ग्रंथगार, जोधपुर,1999, पृ. सं.11।
- डॉ. नामवर सिंह (संपा.), आलोचना, अंक- अक्तूबर- दिसम्बर, 1973, पृ. सं. 13।
- डॉ. नामवर सिंह (संपा.), आलोचना, अंक- 79, - अक्तूबर- दिसम्बर, 1986 संपादकीय।
- वही।
- डॉ. नामवर सिंह (संपा.), आलोचना, अंक- अक्तूबर- दिसम्बर, 1971, संपादकीय।
- डॉ. नामवर सिंह (संपा.), आलोचना, अंक- जुलाई- सितंबर, 1971, संपादकीय।
- डॉ. नामवर सिंह (संपा.), आलोचना, अंक- जनवरी-मार्च,1972, संपादकीय।
- डॉ. नामवर सिंह(संपा.), आलोचना, अंक- अक्तूबर- दिसम्बर, 1974, संपादकीय।
- डॉ. नामवर सिंह (संपा.), आलोचना, अंक- 82, संपादकीय।
- डॉ. नामवर सिंह (संपा.), आलोचना, अंक- 77, संपादकीय।
- डॉ. नामवर सिंह (संपा.), आलोचना, अंक- अप्रैल- जून, 1974, संपादकीय।
- डॉ. नामवर सिंह (संपा.), आलोचना, अंक- अक्तूबर- दिसम्बर, 1983, संपादकीय।
- डॉ. नामवर सिंह (संपा.), आलोचना, अंक- जनवरी-मार्च,1988, संपादकीय।
- अजब सिंह, यथार्थवाद पुनर्मूल्यांकन,
विश्ववविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 1998, प्राक्कथन।
- https://www.apnimaati.com/2024/03/blog-post_64.html?m=1
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शोधार्थी, हिंदी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग,लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ
sy315512@gmail.com, 8115405395, 9889405395

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