मुक्तिबोध बंधुओं का काव्य चिंतन : एक आलोचनात्मक अध्ययन
- मनोहर गंगाधरराव चपळे
शोध सार : आधुनिक भारतीय काव्यधारा के दो महत्त्वपूर्ण कवि गजानन माधव मुक्तिबोध और शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध की काव्य-चेतना और साहित्यिक मान्यताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। दोनों कविबंधु भिन्न भाषिक परंपराओं से संबद्ध होने के साथ-साथ मार्क्सवादी विचारधारा से गहराई से प्रभावित हैं और अपने साहित्य में सामाजिक यथार्थ, वर्ग-संघर्ष तथा मानवीय मुक्ति की आकांक्षा को केंद्र में रखते हैं। गजानन माधव मुक्तिबोध हिंदी ‘नई कविता’ के प्रतिनिधि कवि हैं, जिनका काव्य मध्यवर्गीय जीवन की विसंगतियों, आत्मसंघर्ष, बौद्धिक जटिलता और सामाजिक प्रतिबद्धता का सशक्त दस्तावेज़ है। उनकी साहित्य-दृष्टि वैज्ञानिक, बहुआयामी और जीवन-केंद्रित है, जिसमें साहित्य को समाज की उपज और जनमुक्ति का साधन माना गया है। दूसरी ओर शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध ‘मराठी नवकविता’ आंदोलन के प्रमुख कवि हैं, जिन्होंने कविता को प्रयोगशील, प्रतिमाप्रधान और मुक्तछंदात्मकता के साथ नवीनता का रूप प्रदान किया। उनकी कविता में शोषित वर्ग के प्रति संवेदना, क्रांतिकारी चेतना और आशावाद स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है। उभय मुक्तिबोध बंधु अपने-अपने भाषायी साहित्य में आधुनिक चेतना, सामाजिक सरोकार और मार्क्सवादी दृष्टिकोण के सशक्त प्रतिनिधि हैं। जहाँ हिंदी के गजानन माधव मुक्तिबोध काव्य को बौद्धिक, चिंतनात्मक गहराई प्रदान करते हैं, वहीं मराठी साहित्यकार शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध नवकविता को सामाजिक यथार्थ और कलात्मक प्रयोग की नई दिशा देते हैं।बीज शब्द : आधुनिकता, मार्क्सवाद, यथार्थ, वर्गसंघर्ष, प्रतिबद्धता, आत्मसंघर्ष, प्रतीकात्मकता, फैंटेसी, बौद्धिकता, चेतना, जनपक्षधरता, प्रतिमाधर्मी, प्रक्षोभ रस, प्रतिबद्धता, सामाजिक उत्तरदायित्व।
मूल आलेख : आधुनिक भारतीय काव्यधारा के विकास में गजानन माधव मुक्तिबोध और शरतचंद्र मुक्तिबोध का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उभय कवि बंधु भिन्न भाषिक परंपराओं हिंदी और मराठी से संबंधित होने के बावजूद वैचारिक स्तर पर एक साझा आधार रखते हैं। उनकी काव्यचेतना पर मार्क्सवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव है, जिसके कारण उनका साहित्य सामाजिक विषमता, वर्गसंघर्ष और मानव मुक्ति की आकांक्षा से अनुप्राणित दिखाई देता है। गजानन माधव मुक्तिबोध हिंदी की नई कविता के प्रतिनिधि और वैचारिक रूप से सबसे सशक्त कवियों में गिने जाते हैं। उनका काव्य मध्यवर्गीय व्यक्ति के भीतर चल रहे आत्म-संघर्ष, नैतिक-द्वंद्व और सामाजिक-विसंगतियों की जटिल पड़ताल करता है। वे केवल बाह्य यथार्थ को चित्रित नहीं करते, बल्कि व्यक्ति के अंतर्मन में उपस्थित भय, अपराधबोध, असुरक्षा और बौद्धिक बेचैनी को भी उजागर करते हैं। उनकी कविताओं में प्रतीक, बिंब, मिथक और फैंटेसी का गहन प्रयोग मिलता है, जिससे उनकी काव्य-भाषा दुरूह किंतु अत्यंत प्रभावशाली बन जाती है।
गजानन माधव मुक्तिबोधका साहित्यिक लेखन विविध आयामी है, उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना के क्षेत्र में लेखन किया और वे कविता और आलोचना के क्षेत्र में सिद्धहस्त लेखक रहे। मुक्तिबोध को हिंदी पाठकगण कवि और आलोचक के रूप में जानते हैं। उनकी कविताएँ मार्क्सवादी वैचारिक चेतना से ओतप्रोत हैं और सर्वहारा तथा मध्यवर्ग के जीवन का दर्शन उनकी कविता में निहित है। साहित्य के बारे में विचार करते हुए वे लिखते हैं- “अपने अस्तित्व के औचित्य के लिए साहित्य एक औचित्य समर्थ मात्र है। आखिर कुछ भ्रम ज़रूरी है और इसलिए उसे वास्तविक और गहन होना चाहिए। अगर मेरे लिए साहित्य भ्रांति है तो मैं उसकी परवाह नहीं करता।”1 उनके अनुसार साहित्य को अपने अस्तित्व के लिए किसी बाहरी औचित्य की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि उसका औचित्य उसी में निहित है। वे मानते हैं कि साहित्य एक प्रकार का भ्रम रचता है, लेकिन यह भ्रम सतही नहीं बल्कि यथार्थ को गहराई से समझने वाला होना चाहिए। यदि साहित्य भ्रांति भी है, तो वह ऐसी रचनात्मक भ्रांति है जो चेतना को विकसित करती है और जीवन-सत्य की खोज में सहायक होती है। इसलिए गजानन माधव मुक्तिबोध के लिए साहित्य का मूल्य उसकी सत्य-अन्वेषण क्षमता और वैचारिक गहनता में निहित है।
गजानन माधव मुक्तिबोध की साहित्यिक धारणाओं के बारे में डॉ. श्यामराव लिखते हैं “मुक्तिबोध ने अपने साहित्य संबंधी सिद्धांतों का निर्माण मार्क्सवादी समीक्षा के आधार पर किया है। उन्होंने वास्तविक साहित्य और जीवन के अध्ययन, विश्लेषण को आधार रूप में ग्रहण किया है। इसलिए उनके साहित्य सिद्धांतों में वैज्ञानिकता एवं वस्तुनिष्ठता है। वे सिद्धांत निर्माण के पहले जीवन पर दृष्टि डालते हैं और जीवन के ठोस अनुभवों के आधार पर साहित्य का अध्ययन, विश्लेषण और मूल्यांकन करने का आग्रह करते हैं। मार्क्सवादी दृष्टि से तादात्म्य होकर मुक्तिबोध ने जीवन को समस्त चिन्तन के केन्द्र में प्रस्थापित किया है। उनके अनुसार साहित्य की कसौटी के भीतर अनेक कसौटियाँ होती हैं।”2 मुक्तिबोध का साहित्य-चिन्तन जीवन-सत्य, सामाजिक यथार्थ और बहुआयामी मूल्यांकन पर आधारित एक समग्र और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। इस संदर्भ में ग. मा. मुक्तिबोध का मंतव्य है- “साहित्य को हमें विविधपक्षीय दृष्टियों से देखना आवश्यक है और वस्तुतः साहित्य की कसौटी एक नहीं अनेक हैं। अनेक अदृश्य इकाइयाँ हैं। इसलिए यह कह देना कि साहित्य में प्रकट जीवन-मूल्य उसके साहित्यिक गुणों की कसौटी नहीं, मात्र एक अस्थायी कार्यकारी मान्यता के रूप में ही ग्रहण किया जाना चाहिए।”3 ग. मा. मुक्तिबोध के अनुसार साहित्य को किसी एक ही दृष्टि या एकमात्र कसौटी के आधार पर नहीं परखा जा सकता, क्योंकि साहित्य एक जटिल और बहुआयामी रचना है। उसमें जीवन, समाज, विचार, संवेदना, शिल्प और भाषा जैसी अनेक अदृश्य इकाइयाँ सक्रिय रहती हैं, जो मिलकर उसकी कलात्मक और वैचारिक संरचना निर्मित करती हैं। इसलिए साहित्य का मूल्यांकन एकांगी नहीं, बल्कि विविध पक्षीय दृष्टि से किया जाना चाहिए।
गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन आर्थिक अभाव, अस्थिरता और मानसिक संघर्षों से घिरा रहा। यही जीवनानुभव उनकी कविता को गहरी सामाजिक प्रतिबद्धता और वैचारिक गंभीरता प्रदान करता है। वे साहित्य को महज़ सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति न मानकर उसे सामाजिक चेतना और जनमुक्ति का माध्यम स्वीकार करते हैं। उनकी दृष्टि में कवि का दायित्व है कि वह समाज की अंतर्निहित सच्चाइयों को उजागर करें और शोषणकारी व्यवस्था के विरुद्ध वैचारिक प्रतिरोध खड़ा करें। इस कारण उनका काव्य बौद्धिक, दार्शनिक और आत्मविश्लेषणात्मक स्वरूप ग्रहण कर लेता है। दूसरी ओर शरतचंद्र मुक्तिबोध मराठी नवकविता आंदोलन के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उन्होंने मराठी कविता को पारंपरिक छंद, अलंकार और भावुकता से मुक्त कर उसे प्रयोगशीलता, प्रतिमा-प्रधानता और मुक्तछंद की ओर अग्रसर किया। उनकी कविता में सामाजिक यथार्थ अधिक प्रत्यक्ष और सहज रूप में सामने आता है। उभय कविबंधु शोषित, वंचित और श्रमिक वर्ग के जीवन-संघर्ष को संवेदनशीलता और करुणा के साथ प्रस्तुत करते हैं।
गजानन माधव मुक्तिबोध के अनुसार साहित्य सामाजिक परिवेश तथा व्यक्ति-रचनाकार के अनुभवों का उत्पादन है, वह समाज की उपज है। उनके अनुसार “हम जिस समाज, संस्कृति, परंपरा, युग और ऐतिहासिक आवर्त में रह रहे हैं उन सबका प्रभाव हमारे हृदय का संस्कार करता है। हमारी आत्मा में जो कुछ है वह समाज प्रदत्त है, चाहे वह निष्कलुष अनिंद्य सौंदर्य का आदर्श ही क्यों न हो। हमारा सामाजिक व्यक्तित्व हमारी आत्मा है। आत्मा का सारा-सारतत्त्व प्रकृत रूप से सामाजिक है।”4 गजानन माधव मुक्तिबोध यहाँ ‘व्यक्ति और समाज’ के संबंध को द्वंद्वात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार मनुष्य किसी निर्वात में नहीं जीता; वह जिस समाज, संस्कृति, परंपरा, युग और ऐतिहासिक परिस्थितियों में रहता है, वही उसके हृदय, चेतना और संवेदना का संस्कार करती हैं। व्यक्ति की आत्मा कोई शुद्ध, निरपेक्ष या समाज से अलग सत्ता नहीं है, बल्कि वह सामाजिक अनुभवों से निर्मित होती है। गजानन माधव मुक्तिबोध इस धारणा को स्पष्ट रूप से खंडित करते हैं कि आत्मा या सौंदर्यबोध पूर्णतः व्यक्तिगत या दैवी है। उनके अनुसार आत्मा में विद्यमान तथाकथित निष्कलुष और अनिंद्य सौंदर्य का आदर्श भी समाज द्वारा प्रदत्त होता है। मनुष्य के विचार, मूल्य, नैतिकता और सौंदर्यबोध सामाजिक संरचना और ऐतिहासिक चेतना की उपज हैं। इसी कारण वे कहते हैं कि ‘हमारा सामाजिक व्यक्तित्व ही हमारी वास्तविक आत्मा है’।
गजानन माधव मुक्तिबोध साहित्य की सार्थकता उसके परिवेश के चित्रण में मानते हैं तथा युग और साहित्य के सम्बन्ध को रेखांकित करते हुए लिखते हैं “प्रत्येक युग अपनी सामाजिक, ऐतिहासिक स्थिति की अनुभूत आवश्यकता के अनुसार साहित्य निर्माण करता है। युग ही साहित्यिक विषय का संकलन करता है। ये विषय विभिन्न वर्गों की विभिन्न स्थितियों तथा विविध मानव संबंधों से निर्धारित होते हैं। ये विविध विषय अपने को अभिव्यक्त करने के लिए उस वर्ग के हृदय में अकुलाते रहते हैं, जो उस काल में साहित्यिक सांस्कृतिक क्षेत्र के भीतर निर्णायक रूप से प्रभावशाली हो उठते हैं।”5 क्योंकि “कोई भी लेखक अपने व्यक्तित्व से अपने ही इतिहास से अर्थात अपने देशकाल से स्वतंत्र नहीं है”6 गजानन माधव मुक्तिबोध ने साहित्य पर विचार करते हुए 'जनता का साहित्य किसे कहते हैं' निबन्ध में साहित्य की परिभाषा इस प्रकार दी है “जनता के साहित्य का अर्थ है, ऐसा साहित्य जो जनता के जीवन मूल्यों को, जनता के जीवनादर्शों को प्रतिष्ठापित करता है उसे अपने मुक्तिपथ पर अग्रसर करता हो। इस मुक्ति पथ का अर्थ राजनीतिक मुक्ति से लेकर अज्ञान से मुक्ति तक है। अतः इसमें प्रत्येक प्रकार का साहित्य सम्मिलित है शर्त है कि वह सचमुच उसे मुक्त पथ पर अग्रसर करें”।7 गजानन माधव मुक्तिबोध ‘कला के तीन क्षण’ मानते हैं। कला क्या है, उसका स्वरूप और कला की रचना प्रक्रिया पर उन्होंने व्यापक विचार किया है। कला के संदर्भ में गजानन माधव मुक्तिबोध की धारणा है “कलाकृति स्वानुभूति जीवन की कल्पना द्वारा पुनर्रचना है यथार्थवादी शिल्प के अन्तर्गत कलाकृति यथार्थ के अंतर्नियमों के अनुसार यथार्थ के बिंबों की क्रमिक रचना प्रस्तुत करती है।”8 गजानन मुक्तिबोध के अनुसार कला-कृति केवल जीवन की नकल नहीं होती, बल्कि कलाकार की स्वानुभूति के माध्यम से जीवन की कल्पनात्मक पुनर्रचना होती है। कलाकार अपने अनुभवों, संवेदनाओं और चेतना के सहारे जीवन-यथार्थ को आत्मसात करता है और फिर उसे रचनात्मक कल्पना के द्वारा नए रूप में प्रस्तुत करता है। इस प्रक्रिया में कल्पना यथार्थ से पलायन नहीं करती, बल्कि उसे अधिक गहराई और अर्थवत्ता प्रदान करती है।
साहित्य, कला के स्वरूप पर व्यापक विचार करते हुए गजानन माधव मुक्तिबोध ने कविता के ‘कथ्य और शिल्प’ पर भी व्यापक विचार किया है। काव्य वस्तु, कथ्य के साथ शिल्प के महत्त्व को कवि के नाते गजानन माधव मुक्तिबोध ने गहराई से विचार किया। मुक्तिबोध की कविता के कथ्य और शिल्प के बारे में विचार करते हुए डॉ. श्याम राव लिखते हैं “मुक्तिबोध के लिए कविता का प्रश्न जीवन के प्रश्न से जुड़ा हुआ है। इसलिए कविता उनके लिए मस्तिष्क का आवेश न होकर जीवन के जटिलतम विचारों और संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम थी। कविता और जीवन के यथार्थ को एक दूसरे के निकट लाने के लिए जिस जीवन दृष्टिकोण की आवश्यकता थी वह मुक्तिबोध को मार्क्सवाद से मिला।”9 मार्क्सवादी विचारधारा का प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर था जो कि कृति में निश्चित ही झलकता हुआ दिखाई देता है।
गजानन माधव मुक्तिबोध के अनुसार काव्य एब्स्ट्रेट कला है। वे लिखते हैं “काव्य या साहित्य पर्याप्त अमूर्त एब्स्ट्रेक्ट कला है, उसकी मूर्तिमानता उसकी बुनियादी विलगीकरण क्रिया पर आधारित है। विलगीकरण क्रिया ही एब्स्ट्रक्शन है।”10 गजानन माधव मुक्तिबोध के अनुसार काव्य या साहित्य मूलतः एक अमूर्त(एब्स्ट्रेक्ट) कला है, क्योंकि वह यथार्थ को उसके प्रत्यक्ष, ठोस रूप में नहीं, बल्कि चयन, संक्षेप और रूपांतरण के माध्यम से प्रस्तुत करता है। साहित्य वास्तविक जीवन की हूबहू नकल नहीं करता, बल्कि उसमें से आवश्यक तत्त्वों को अलग कर उन्हें कलात्मक संरचना में ढालता है। मुक्तिबोध की काव्यकला की फैंटसी के बारे में मान्यता है “भाववादी कला में कल्पना वास्तविकता के यथार्थ बिम्बों में न उलझकर उस वास्तविकता को मात्र प्रतीकों द्वारा समष्टि चित्रों और उपमा दृश्यों द्वारा सूचित भर कर देती है। फैंटसी के अंतर्गत भाव पक्ष प्रधान होकर विभाव पक्ष मात्र सूचित होता है, मात्र ध्वनित होता है अथवा केवल प्रतीकों में प्रकट होता है।”11 उपर्युक्त विवेचन के आधार पर हम नई कविता के प्रतिनिधि कवि मुक्तिबोध के जीवन संघर्ष तथा काव्य विषयक मान्यताओं से परिचित होते हैं, उनकी काव्य विषयक मान्यताएँ अत्यंत व्यापक एवं वैचारिक धरातल पर बनी हैं यह स्पष्ट होता है।
मराठी कवि शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध की कविता में क्रांतिकारी चेतना, सामाजिक परिवर्तन की आकांक्षा और भविष्य के प्रति आशावाद स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उनकी काव्य-भाषा अपेक्षाकृत सरल है, किंतु उसमें निहित प्रतिमाएँ और प्रतीक गहरे अर्थ-संकेत करते हैं। वे ‘कला और विचार’ के संतुलन को बनाए रखते हुए कविता को जन सरोकारों से जोड़ते हैं, जिससे उनकी रचनाएँ पाठक से सीधा संवाद स्थापित करती हैं। यदि दोनों कवियों की तुलना की जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सामाजिक विषमता के प्रति विद्रोह और जनसामान्य के प्रति प्रतिबद्धता दोनों में समान रूप से विद्यमान है। किंतु उनकी अभिव्यक्ति-शैली और काव्य-रचना की पद्धति में भिन्नता है। गजानन माधव मुक्तिबोध का काव्य अधिक जटिल, आत्म विश्लेषणात्मक और दार्शनिक है, जिसमें चेतना के अनेक स्तर एक साथ सक्रिय रहते हैं। इसके विपरीत शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध का काव्य अपेक्षाकृत सरल, प्रयोगशील और प्रतिमा-प्रधान है, जो सामाजिक यथार्थ को अधिक प्रत्यक्षता से अभिव्यक्त करता है।
आधुनिक मराठी कविता की धारा में श्री शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध का महत्त्वपूर्ण स्थान है। नव कविता आन्दोलन में शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध ने विपुल लेखन के साथ उसकी सार्थक आलोचना की। उन्होंने अपनी आलोचना और स्वयं के काव्य संकलनों की प्रस्तावना में अपनी काव्य विषयक मान्यताओं को स्पष्ट किया है। मराठी ‘नव कविता’ के उद्भव के मूल में वे तद्युगीन सामाजिक, राजनीतिक स्थितियों को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उनके अनुसार “मानव जीवन के विनाश के मूल में मानव की मूल प्रवृत्ति, स्वभाव को ज़िम्मेदार न ठहराकर समाज व्यवस्था को ज़िम्मेदार ठहराना चाहिए।”12 अर्थात शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध के अनुसार मानव की सामाजिक स्थिति, मूल प्रवृत्ति आदि उसको प्रभावित करती हैं। अर्थात समाज मन से मानव मन प्रभावित होता है और उससे कवि, लेखक लेखन करता है।
शरतचंद्र मुक्तिबोध ने अपनी रचना 'नवीमळवाट' में युगीन काव्य की सम्यक प्रवृत्तिवादी समीक्षा करते हुए वे लिखते हैं- “आज के पूर्ववर्ती साहित्य परंपरा और युगीन कविता पर विचार करते हुए अपनी धारणाएँ स्पष्ट काव्य का प्रमुख लक्षण उसका प्रयोगवादी होना है।”13 इसे स्पष्ट करते हुए वे कवि करंदीकर का उदाहरण देते हुए लिखते हैं “मुक्तसुनित से तालचित्र तक की इनकी महत्त्वपूर्ण यात्रा है। शब्द एवं शब्दक्रम के बजाय प्रतिमा एवं प्रतिमा क्रम ने ही इनके काव्य में महत्त्वपूर्ण स्थान पाया, करंदीकर के ‘मृदगंध’ की सामाजिक भावना धीरे-धीरे क्षीण होती गई और उनकी प्रतिभा विविध आकृति विषयक प्रयोग करने में ही रमने लगी, प्रतिमा उनके काव्य का मुख्य साधन है, शारीरिक संवेदनात्मकता उनके काव्यानुभव का महत्त्वपूर्ण गुण। संवेदी प्रतिभा की विवक्षित रचना से वे स्वानुभव को प्रकट करते।”14
मराठी नवकविता के स्वरूप और विशेषताओं पर विचार करते हुए शरतचंद्र मुक्तिबोध लिखते हैं- “आज के काव्य का और एक महत्त्वपूर्ण गुण है उसका प्रतिमाप्रधान तथा अमूर्त स्वरूप का होना।”15 नव कविता के सौंदर्यवाद पर विचार करते हुए वे मानते हैं कि “आज का सौंदर्यवाद रूप सौंदर्य को महत्व देने वाला है, आज का सौंदर्यवाद मूल्य-मूल्यविरहित वृद्धि से विश्व की ओर इंद्रियाल्हादक रचना प्रबंध निर्माण करने का साधन है। प्रबंध विलक्षणता आज के सौंदर्यवाद का विशेष लक्षण है।”16 शरतचंद्रअपनी काव्यविषयक मान्यताओं में ‘मुक्त छंद’ की आवश्यकता पर विचार करते हुए वे लिखते हैं- “एक भावात्मक स्थिति की समस्या से अनेक अनुभवों के किनारों को जाते हुए, भिन्न-भिन्न भावनाओं के मोड़ लेते हुए एक व्यापकतर सम्यक संवेदना की सुदीर्घ यात्रा कविता में मैंने अभिव्यक्त की है। मुक्त छंद की सच्ची आवश्यकता इस प्रकार के काव्य के लिए आवश्यक है। मुक्त छंद में भावात्मक अनुभवों की तथा चिंतन की एक समान स्वैरता महसूस होती है। इसलिए मुक्त छंद आज के काव्य का स्वाभाविक अंग है ।”17
शरतचंद्र मुक्तिबोध मूलतः मार्क्सवादी साहित्यधारा के कवि हैं, उनकी विचारधारा पर उसका स्वाभाविक प्रभाव दिखाई देता है। उनका काव्य दीन-हीन, दुःखी व्यक्ति की आत्मा और मध्यमवर्गीय जीवन की विसंगतियों को अभिव्यक्त करता है। मुक्तिबोध साहित्य और समाज की प्रतिबद्धता पर बल देते हैं, उनके अनुसार- “जो साहित्य पीड़ित आत्मा को आवाज़ दे, वही सच्चा साहित्य है।”18 अपनी काव्य रचना ‘यात्रिक’ में ‘कविता और विचार’ पर चर्चा करते हुए शरतचंद्र मुक्तिबोध लिखते हैं “कविता में जीवितता महत्त्वपूर्ण है। किन्तु उसे पहले समग्रता से समझ लेना आवश्यक है। कवि के दृष्टिकोण से कुछ काव्य पंक्तियों का उल्लेख करना काव्य चर्चा नहीं है। कविता में वैचारिक गुण रहता है, यह निश्चित है। किंतु मूल में वैचारिक स्वतंत्र और सत्यदर्शक अमूर्त संकल्पनाओं की तर्कशुद्ध रचना होती है। कवि का ‘मानुष दर्शन’ उसकी स्वयं की कमाई और जीवन के प्रत्यक्ष संपर्क से निर्मित होता है, उसकी खोज करनी हो तो काव्यांतर्गत अनुभव एवं उसकी विविध-विशिष्ट व्यवस्थाओं को जानना पड़ता है।”19 शरतचंद्र मुक्तिबोध का मानना है कि कवि का व्यक्तित्व उसकी सामाजिक स्थिति से बनता है और कविता में उसके विचार अभिव्यक्त होते हैं। साहित्य के रस, रूप के आधार पर ललित कला के संदर्भ में विचार करते हुए वे लिखते हैं- “भाषा के ललित सामर्थ्य के आधार पर विकसित हुआ एवं उससे भिन्न न रहने वाला ‘अनुभव’ ही ललित कृति का माध्यम है।”20 शरतचंद्र मुक्तिबोध की कविता पर विचार करते हुए मराठी कवि समीक्षक यशवंत मनोहर लिखते हैं “मुक्तिबोध के काव्य विश्व में सामाजिक संवेदना की कविताओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मुक्तिबोध की कविता का शोषित और आज के युग का जागृत क्रांतिकारी समाज ही बहुजन समाज है।”21 शरतचंद्र मुक्तिबोध की काव्यचेतना पर विचार करते हुए स.रा. गाडगीळ लिखते हैं- “कवि मुक्तिबोध ने भीषण दीनता और पेट पालने के लिए की जाने वाली देह विक्रय इन भयावह घटनाओं का चित्रण कर शोषितों की अस्मिता को स्पर्श किया है। एक से एक अधिक अर्थपूर्ण प्रतिमाओं से कविता की परिणामकारकता का सामर्थ्य व्यक्त करना इनके ज्वलंत काव्य की विशेषता है ।”22
शरतचंद्र मुक्तिबोध की कविता पर विचार करते हुए मराठी समीक्षक श्री रा. अ. काळेले लिखते है-“मराठी में नव कविता का उद्गम कवि ‘अनिल’ से हुआ ऐसा मुक्तिबोध(शरतचंद्र) मानते हैं और स्वयं को अनिल का अनुगामी मानते हैं। वे अपनी कविता को प्रगतिशील मानते हैं, उनका कहना है कि ‘प्रगतिशील कवि संकटकालीन परिस्थिति का केवल चित्रण नहीं करता वरन् उसका सम्यक निदान कर उसके निवारण का उपाय खोजता है’। प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रगतिशील कवि निराश नहीं होता, वह आशावादी होकर आगे बढ़ता है। मुक्तिबोध के विचार और कविता पर कवि अनिल की छाया है कवि अनिल द्वारा प्रणीत ‘नया प्रक्षोभ’ रस ही मुक्तिबोध की नव कविता का प्रमुख ‘रस’ है।”23 यह चिंतन शोषण आधारित समाज में शोषण के विरुद्ध संघर्ष का है जिससे लेखक का प्रक्षोभ साहित्य में प्रतिफलीत हुआ है। इस विचार के आलोक में कह सकते है कि हिंदी साहित्य में गजानन माधव मुक्तिबोध नई कविता को वैचारिक दृढ़ता, बौद्धिक गहनता और सामाजिक उत्तरदायित्व प्रदान करते हैं, वहीं मराठी साहित्य में शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध नवकविता को सामाजिक संवेदना और कलात्मक प्रयोगों की नई दिशा देते हैं। इस प्रकार दोनों बंधु(गजानन माधव मुक्तिबोध, शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध) अपने-अपने भाषायी साहित्य में आधुनिक चेतना, मार्क्सवादी दृष्टिकोण और सामाजिक सरोकारों के अत्यंत महत्त्वपूर्ण विचार, संवेदना के वाहक प्रतिनिधि कवि सिद्ध होते हैं।
सारांशतः शरतचंद्र मुक्तिबोध की कविता और उनकी समीक्षा पर विचार करने से हम कह सकते हैं कि शरतचंद्र मुक्तिबोध मराठी नव कविता के प्रमुख कवियों में से एक संवेदनशील कवि रहे हैं। उनकी काव्य-चेतना और काव्य विचारों पर मार्क्सवादी विचारों का एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का गहरा प्रभाव है और वे उन्हीं मानदंडों के आधार पर काव्य-विचार अभिव्यक्त करते हैं। उनके अनुसार साहित्य का आधार समाज है, कविता को समाज से संलग्न रहना चाहिए और सामाजिक स्थितियों की अभिव्यक्ति करनी चाहिए। कवि का व्यक्तित्व उसकी सामाजिक स्थिति से बनता है। शरतचंद्र मुक्तिबोध के काव्य विषय का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है और आधुनिक मानव से मानवोचित गुणों के मानव की अभिव्यक्ति की संकल्पना दीन-हीन शोषितों के प्रति आस्था और शोषकों के प्रति विद्रोह क्रांति की प्रज्वलित अग्नि उनके काव्य में दिखाई देती है।
निष्कर्ष : आधुनिक भारतीय काव्यधारा में गजानन माधव मुक्तिबोध और शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भिन्न भाषिक परंपराओं (हिंदी–मराठी) से जुड़े होते हुए भी दोनों में समान मार्क्सवादी चेतना, सामाजिक विषमता के विरुद्ध प्रतिरोध और मानवीय मुक्ति की आकांक्षा दिखाई देती है। गजानन माधव मुक्तिबोध ने हिंदी नई कविता को वैचारिक गहराई और आत्मविश्लेषण का आधार दिया, जबकि शरतचंद्र माधव मुक्तिबोध ने मराठी नव कविता को प्रयोगशीलता और जनवादी दृष्टि प्रदान की। दोनों का साहित्य सामाजिक यथार्थ का सशक्त चित्रण करते हुए परिवर्तनकारी चेतना का मार्ग प्रशस्त करता है।
संदर्भ :
1. मुक्तिबोध:जीवन-संघर्ष बनाम काव्य संघर्ष, डॉ. श्याम राव, मिलिंद प्रकाशन हैदराबाद प्र.सं.2008, पृ.54
2. मुक्तिबोध:जीवन-संघर्ष बनाम काव्य संघर्ष, डॉ. श्याम राव, मिलिंद प्रकाशन हैदराबाद प्र.सं.2008, पृ.54-55
3. एक साहित्यिक की डायरी, गजानन माधव मुक्तिबोध, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन नई दिल्ली प्र.सं.1976 पृ.123
4. नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबन्ध, गजानन माधव मुक्तिबोध, विश्वभारती प्रकाशन,नागपूर प्र.सं.-1977 पृ.57-58
5. नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, गजानन माधव मुक्तिबोध, राधाकृष्ण प्रकाशन नई दिल्ली, प्र. सं. -1971,पृ.120,121
6. नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, गजानन माधव मुक्तिबोध, राधाकृष्ण प्रकाशन नई दिल्ली, प्र.सं. -1971,पृ.83
7. मुक्तिबोध रचनावली भाग-5, सं. नेमिचंद्र जैन, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, प्र.सं.-1985 पृ.60
8. मुक्तिबोध रचनावली, सं. नेमिचंद्र जैन,राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, प्र.सं. -1985 पृ.217
9. मुक्तिबोध : जीवन संघर्ष बनाम काव्य संघर्ष, डॉ. श्याम राव,मिलिंद प्रकाशन हैदराबाद प्र.सं.-2008पृ.63
10. नई कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबन्ध, गजानन माधव मुक्तिबोध ,विश्वभारती प्रकाशन,नागपूर प्र.सं.-1977 पृ.17
11. कामायणी : एक पुनर्विचार,हिमांशु प्रकाशन,जबलपुर, प्र.सं.1961पृ.3
12. नवीमळवाट, श.मा. मुक्तिबोध, मौज प्रकाशन गृह,मुंबई-04, चतुर्थ संस्करण 1997 पृ.9
13. नवीमळवाट, श.मा. मुक्तिबोध,मौज प्रकाशन गृह,मुंबई-04, चतुर्थ संस्करण 1997पृ.12
14. नवीमळवाट, श.मा. मुक्तिबोध, मौज प्रकाशन गृह,मुंबई-04, चतुर्थ संस्करण 1997 पृ.13
15. नवीमळवाट, श.मा. मुक्तिबोध, मौज प्रकाशन गृह,मुंबई-04, चतुर्थ संस्करण 1997 पृ.14
16. नवीमळवाट, श.मा. मुक्तिबोध, मौज प्रकाशन गृह,मुंबई-04, चतुर्थ संस्करण 1997 पृ.15
17. नवीमळवाट, श.मा. मुक्तिबोध,मौज प्रकाशन गृह,मुंबई-04, चतुर्थ संस्करण 1997 पृ.49
18. नवीमळवाट, श.मा. मुक्तिबोध, मौज प्रकाशन गृह,मुंबई-04, चतुर्थ संस्करण 1997 पृ.116
19. यात्रिक, श. मा. मुक्तिबोध,मौज प्रकाशन गृह,मुंबई-04,प्र.सं.-1957- प्रस्तावना
20. मुक्तिबोधांचे साहित्य, रा.भा. पाटणकर, मौज प्रकाशन गृह,मुंबई-04,प्र.सं.-1986 पृ.201
21. मुक्तिबोधांचीनिवडक कविता, यशवंत मनोहर, साहित्य अकादमी,नई दिल्ली,प्र.सं.-1993 पृ.18
22. मराठी काव्याचे मानदंड भाग-2, डॉ. स.रा. गाडगीळ,पद्मगंधा प्रकाशन,पुणे,प्र.सं.-2005पृ.190
23. नव कवितेचे एक तप: रा.अ. काळेले,मनोहर ग्रंथमाला,पुणे, प्र.सं. -1960, पृ.57
मनोहर गंगाधरराव चपळे
अध्यक्ष एवं सहयोगी प्राध्यापक, हिंदी विभाग, महात्मा बसवेश्वर महाविद्यालय, लातूर-413512
mbannalikar@gmail.com, 9404895886
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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