वीरेन्द्र यादव : जोखिम भरे समय में एक जनबुद्धिजीवी का जाना
- विभु प्रकाश सिंह
मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन में सही और शुभचिंतक व्यक्ति की पहचान के लिए रहीमदास ने थोड़े दिन रहने वाली मुसीबत, विपरीत परिस्थिति को भला बताया है। सामाजिक - राजनीतिक जीवन में यह अवधि थोड़ी लम्बी होनी चाहिए। तब वैचारिक रूप से खरे और दृढ़ बुद्धिजीवी की पहचान हो पाती है। दक्षिणपंथ की लम्बी अवधि के वर्तमान शासन में बहुतों ने अपने स्वर बदले, आवाज़ मंद की या स्वयं को पूरी तरह सेंसर कर लिया। वीरेन्द्र यादव इस दौर में भी अपनी वैचारिक निर्मिति और दृढ़ता में जरा भी परिवर्तित नहीं हुए बल्कि और अधिक प्रखर और मुखर होते गए। इस दौर में उनके जैसे बुद्धिजीवियों की और अधिक आवश्यकता थी। अभी ‘कार-ए-जहाँ दराज़’ था, मुत्यु को जरा और इंतजार करना था।
वीरेन्द्र यादव के अवसान से महीने भर पूर्व कैफ़ी आज़मी अकादमी लखनऊ के सभागार में कथाकार भालचंद्र जोशी को 'कथाक्रम ' सम्मान प्रदान किया गया। लखनऊ के प्रत्येक बड़े साहित्यिक कार्यक्रम की तरह इस कार्यक्रम में भी वे मंच पर उपस्थित थे। तब सभागार में उपस्थित किसी को भी यह एहसास न था कि वह अपने प्रिय आलोचक को अंतिम बार सुन रहा है। हम हमेशा की तरह करीने से संवरे बालों में अपनी गुरु-गम्भीर आवाज के साथ पूर्ण स्वस्थ वीरेन्द्र यादव को अपने विपुल अध्ययन के आधार पर अपनी बात पूरी ठसक के साथ रखते हुए देख-सुन रहे थे। बीमारी तो दूर की बात है सामान्य अस्वस्थता का भी कहीं कोई लक्षण नहीं दिखा।
वीरेन्द्र यादव 5 मार्च 1950 को उत्तर प्रदेश के जनपद जौनपुर में पैदा हुए । बहुत कम उम्र में ही वह लखनऊ आ गए और यहीं के होकर रह गए। लखनऊ में ही शिक्षा ग्रहण की और यहीं पर अपने विचारों को वामपंथी बौद्धिकता और वैचारिकता की सान पर तेज किया। प्रगतिशील लेखक संघ के वे आजीवन सदस्य रहे। यशपाल, भगवतीचरण वर्मा और अमृतलाल नागर जैसे बड़े साहित्यकारों की संगत में इनकी साहित्यिक रुचियाँ परिष्कृत हुईं। कुँवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल, नरेश सक्सेना, अखिलेश, मुद्राराक्षस, कामतानाथ जैसे साहित्यकारों के साथ वीरेन्द्र यादव ने लखनऊ के साहित्यिक सांस्कृतिक वातावरण को जीवंत और समृद्ध बनाए रखा।
वीरेन्द्र यादव राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी थे। लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने राजनीति विज्ञान से स्नातकोत्तर की डिग्री ली थी। राजनीति विज्ञान का यह विद्यार्थी हिन्दी साहित्य की उपन्यास विधा का सर्वश्रेष्ठ आलोचक बना। उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता और जनपक्षधरता अपराजेय थी। अनौपचारिक बातचीत के क्रम में भी वे इन मूल्यों पर अडिग रहकर ही बात करते थे। इस अटूट वैचारिक प्रतिबद्धता के मूल में कहीं न कहीं राजनीति विज्ञान विषय का भी योगदान जरूर रहा होगा जिसमें हम संसार भर के श्रेष्ठ विचारकों और समस्त विचारधाराओं का अध्ययन कर अपनी विचारधारा चुनकर उससे प्रतिबद्ध होते हैं। यह साहित्य की तरह तरल नहीं बल्कि ठोस विषय है। शायद इस विषय के इस मूलभूत गुण के चलते ही वीरेन्द्र जी कभी कविता की ओर आकृष्ट नहीं हुए। हिन्दी आलोचना कविता की नींव पर खड़ी हुई है। हिन्दी का कोई आलोचक कविता को छोड़कर केवल गद्य को नहीं अपनाता । वीरेन्द्र यादव ने केवल उपन्यास को अपनी आलोचना दृष्टि के केन्द्र में रखा। 'उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ तथा ‘उपन्यास और देस’ उनकी उपन्यास आलोचना की महत्वपूर्ण किताबें हैं।
वीरेन्द्र यादव की मान्यता थी कि अपने समय और समाज की जितनी व्यापक व्याख्या उपन्यास में सम्भव है, उतनी कविता और कहानी में नहीं। इसके बावजूद हिन्दी आलोचना प्रमुखतः कविता और कहानी केन्द्रित रही। उपन्यास का आलोचना कर्म मुख्यतः पुस्तक समीक्षा तक ही सिमटा रहा। यह बात भी उन्हें खटकती थी कि उपन्यासों के आकलन की अपनी स्वतंत्र कसौटी न होकर अक्सर कविता के प्रतिमानों को उसपर थोपा जाता रहा। इसलिए उन्हें उपन्यासों पर लिखना चुनौतीपूर्ण और आवश्यक लगा। उनके लिए उपन्यास मात्र एक साहित्यिक संरचना न होकर सामाजिक संरचना भी है। अत: उसकी आलोचना के लिए हमारे उपकरण साहित्यिक होने के साथ-साथ समाजशास्त्रीय भी होने चाहिए। बेहतर उपन्यास की कसौटी के बारे में बात करते हुए अपनी किताब ‘विमर्श और व्यक्तित्व’ में वे कहते हैं ‘बेहतर उपन्यास की कसौटी मेरी दृष्टि में समाज निरपेक्ष नहीं हो सकती। विशेषकर तब जब इतिहास और समाजशास्त्र को औपन्यासिक कृतियों के माध्यम से परिपुष्ट किए जाने की जरूरत दरपेश है।‘ वे यह भी कहते हैं कि ‘भारत सरीखे अर्धसामंती, पारम्परिक विकासशील समाज में उपन्यास के आकलन की कसौटी वही नहीं हो सकती जो यूरोपीय और पश्चिमी समाजों में है। आज भी अपनी सम्पूर्णता में भारतीय समाज नगरीय समाज न होकर पारंपरिक और ग्रामीण संरचना का समाज है। यहाँ व्यक्ति मात्र एक व्यक्ति न होकर एक समुदाय का हिस्सा है, जिसकी चाही-अनचाही निष्पत्तियाँ हैं। इसलिए ‘शेखर : एक जीवनी’ और ‘अंतिम अरण्य’ सरीखे उपन्यास हिन्दुस्तानी अभिजन समाज के ग्लोबल नागरिक की कथा तो कह सकते हैं लेकिन भारतीय समाज की कथा तो होरी, फुन्नन, बालदेव, बलचनमा और अलीमन सरीखे पात्रों और उनके परिवेश के बिना सम्भव ही नहीं।"
वीरेन्द्र यादव जनसरोकारों से युक्त साहित्य को ही अपनी निगाह में रखते हैं। अमूर्तन, कलावाद, मिथक या किसी भी कारण से जो साहित्यकार अपने सामाजिक यथार्थ से विमुख होते हैं वे उनकी आलोचनात्मक सीमा से बाहर हो जाते हैं। इसी के चलते प्रेमचंद और उन्हीं की तरह सामाजिक यथार्थ को केन्द्र में रखने वाले लेखकों के उपन्यास ही उनकी आलोचकीय दृष्टि के केन्द्र में रहे। अपने सर्वाधिक पसन्दीदा दस उपन्यासों की सूची में वे शेखर : एक जीवनी, त्यागपत्र, जिन्दगीनामा, कसप, कुरू-कुरू स्वाहा, नौकर की कमीज, दीवार में एक खिड़की रहती थी जैसे प्रसिद्ध उपन्यासों को शामिल नहीं करते। इन्हें इस सूची में शामिल न कर पाने को वे अपने औपन्यासिक निकष की सीमा बताते हैं। अपनी किताब 'उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ में वे गोदान, झूठा सच, आधा गाँव, राग दरबारी, आखिरी कलाम जैसे जनसरोकार धर्मी उपन्यासों को शामिल करते हैं। ‘उपन्यास और देस’ में भी यह परंपरा जारी रहती है। औपन्यासिक आलोचना के क्रम में भारतीय साहित्यकारों द्वारा अंग्रेजी में लिखे जाने वाले उपन्यासों को भी वीरेन्द्र यादव अपनी समीक्षा के दायरे में रखते हैं- बिना अपना समीक्षात्मक निकष परिवर्तित किए। इन उपन्यासों में वे भारतीय सामाजिक यथार्थ परखते-ढूँढते हैं। वैश्विक बाजार में सफल होने के लिए जो भारतीय अंग्रेजी लेखक अपने लेखन में बाजारू तत्व शामिल करते हैं उनका वे जबरदस्त विरोध करते हैं।
प्रेमचंद वीरेन्द्र यादव के सर्वाधिक प्रिय लेखक होने के साथ उनकी औपन्यासिक समीक्षा दृष्टि के निकष भी हैं। उन्होंने हमेशा प्रेमचंद के हर कुतार्किक पाठ का तार्किक खण्डन किया। ‘गोदान’ पर लिखने की प्रेरणा उन्हें निर्मल वर्मा के इस कुपाठ से मिली कि ‘गोदान’ होरी की गाय के प्रति एक किसान गृहस्थ की अधूरी लालसा न होकर उसका यह दुख है कि वह गोदान के अपने धार्मिक दायित्व को पूरा नहीं कर पाया। जब दलित लेखकों ने 'रंगभूमि’ की प्रतियाँ जलाते हुए प्रेमचंद को दलित विरोधी सिद्ध करने की हल्लाबोल कोशिश की तो वीरेन्द्र यादव ने अपने गम्भीर अध्ययन और तर्कपरक विश्लेषण से उनके मत का ऐसा खण्डन किया कि हिन्दी साहित्य में हमेशा के लिए प्रेमचंद के दलित विरोधी होने का स्वर दब गया। इसी प्रकार जब प्रेमचंद के स्त्री के प्रति दृष्टिकोण को प्रश्नांकित किया गया तो वे अपनी तार्किक बौद्धिकता से प्रेमचंद के स्त्री पात्रों के प्रगतिशील चरित्र का विश्लेषण करते हुए प्रेमचंद के पक्ष में खड़े होते हैं और सफलतापूर्वक खड़े होते हैं।
स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की जनतांत्रिक चेतना वीरेन्द्र यादव की वैचारिकी में अनुस्यूत थी। व्यक्तिगत जीवन के सामान्य लोक-व्यवहार में भी वे हद दर्जे तक जनतांत्रिक थे। अगर किसी व्यक्ति के किसी विचार या व्यवहार से वे असहमत हैं तो असहमति उसी विचार-व्यवहार तक सीमित रखते थे। उस असहमति के बिन्दु के चलते उसके समूचे व्यक्तित्व का विरोध वे कभी नहीं करते। प्रगतिशील लेखक संघ की 75वीं जयन्ती के अवसर पर लखनऊ में आयोजित समारोह के उद्घाटन भाषण में नामवर सिंह ने कुछ आरक्षण विरोधी बातें कहीं। इसपर वीरेन्द्र यादव ने ‘प्रगतिशील लेखक मंच से आरक्षण का विरोध’ लेख लिखकर अपना प्रतिवाद दर्ज किया। इस वैचारिक प्रतिवाद में वे यह भी इंगित करते हैं कि आरक्षण को लेकर नामवर सिंह का वक्तव्य सूचिंतित न होकर तात्कालिक था। इस एक वक्तव्य भर से वे नामवर सिंह के साहित्यिक चिंतन के प्रगतिशील आयामों को समूचा खारिज नहीं करते जैसा कि उस समय कई लोगों ने किया। इस लेख के बाद नामवर सिंह ने अपना वक्तव्य बदला और कहा कि मैंने आरक्षण का नहीं बल्कि 'साहित्य में आरक्षण का विरोध’ किया था। नामवर सिंह के इस परिवर्तित वक्तव्य को असत्य बताते हुए भी उन्होंने इसका स्वागत किया और कहा कि काश यही बात उन्होंने मंच से भी कही होती।
दिसम्बर -14 में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने अपनी सरकार के ग्यारह वर्ष पूर्ण करने के अवसर पर रायपुर में तीन दिवसीय साहित्यिक महोत्सव का आयोजन किया। असहमति और मानवाधिकारों के दमन का आरोप झेल रहे रमन सिंह 'असहमति का सम्मान' के नाम पर यह आयोजन करवा रहे थे। इस आयोजन में कई बड़े साहित्यकारों के साथ लखनऊ के उनके कवि मित्र नरेश सक्सेना भी शामिल हुए। मुक्तिबोध की धरती पर हुए इस आयोजन पर वीरेन्द्र यादव ने दो लेख ‘पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है’ और ‘प्रतिरोध का प्रहसन' लिखे। इन दोनों लेखों में वे इस समारोह में शामिल हुए साहित्यकारों की लिजलिजी दलीलों की धज्जियाँ उड़ाते हुए उनके इस समारोह में जाने को एक दक्षिणपंथी दमनकारी सरकार को मान्यता देने के उपक्रम के रूप में साबित कर देते हैं। इसके बावजूद वे यह भी लिखते हैं कि “यहाँ इस चर्चा का आशय यह नहीं है कि जो इस आयोजन में शामिल हुए वे बिक गए या अपने विचारों से उनका विचलन हो गया। लेकिन यह जरूर है कि अपने विरोधी विचार द्वारा खुद के इस्तेमाल किए जाने के विरुद्ध वे दृढ़ क्यों नहीं रह सके? फिर क्या होगा लेखन और आचरण के बीच उस फाँक का, मुक्तिबोध जिसे मिटाने की आजन्म पैरोकारी करते रहे?” संवाद के लोकतंत्र से उन्हें कोई गुरेज़ नहीं था लेकिन आपका आचरण अगर दक्षिणपंथी विचार को वैधता प्रदान कर रहा हो तो ऐसे संवाद और आचरण का वे विरोध करते हैं। परन्तु इस विरोध को वे कभी भी उस व्यक्ति के सम्पूर्ण निषेध तक नहीं ले जाते। अपना नीर-क्षीर विवेक वे जागृत रखते हैं। जनतांत्रिक आचरण के मुद्दे पर वे राजेन्द्र यादव के कायल थे। हिन्दी साहित्य में 'हंस" के माध्यम से राजेन्द्र यादव ने स्त्री विमर्श एवं दलित विमर्श को जो स्पेस दिलाया उसकी वीरेन्द्र जी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। पर जब कभी राजेन्द्र यादव के कुछ वक्तव्य स्त्रियों के प्रतिकूल आए, उन्होंने तत्काल उसकी आलोचना की ।
वीरेन्द्र यादव आलोचक के साथ एक जनबुद्धिजीवी थे। जनता और समाज के प्रति एक विचार सुदृढ़ व्यक्ति का जो दायित्व होता है, उससे वे कभी विमुख नहीं हुए। वे वर्ग-वर्ण विहीन एक समतामूलक समाज के आग्रही थे। ऐसे समाज के निर्माण में जो मूल्य आवश्यक हैं उनके पक्ष में और जो मूल्य विरोधी हैं उनके विपक्ष में वीरेन्द्र जी आजीवन वैचारिक युद्ध लड़ते रहे। एक आदर्श भारतीय समाज के निर्माण में अम्बेडकर के साथ मार्क्स को वे अनिवार्य मानते हैं। साहित्यिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल पर टकराव के चलते उन्होंने भारतीय कम्यूनिष्ट पार्टी की सदस्यता छोड़ दी। परन्तु कभी भी वे उन विचारकों की पंक्ति में नहीं खड़े हुए जो अम्बेडकर को स्वीकार कर वामपंथ को भारतीय समाज के लिए पूर्णतया अनुपयुक्त विचार मानते हैं।
साम्प्रदायिकता और जाति व्यवस्था के विरोध में वे अपने लेखन और जीवन में एक एक्टिविस्ट की तरह सक्रिय थे। समकालीन उपन्यासों में उनका सर्वाधिक प्रिय उपन्यास 'आखिरी कलाम' था। बाबरी विध्वंश की पृष्ठभूमि पर लिखे गए दूधनाथ सिंह के इस उपन्यास में सम्प्रदायिकता, धर्म, वर्णव्यवस्था और तुलसीदास का क्रिटीक रचा गया है। इस किटीक को वीरेन्द्र यादव हिन्दी समाज और साहित्य के लिए अति आवश्यक लेखन मानते हैं। इस उपन्यास को वे साम्प्रदायिक फासीवाद के विरोध में एक ऐसी जीवंत जिरह मानते हैं जो धर्म, धर्म निरपेक्षता, जनतंत्र, मीडिया, मुसलमान व वामपंथ को लेकर लोहियावादी राजनीति तक का विस्तार लिए हुए है। वे कहते हैं कि 'रामचरित मानस’ व तुलसीदास को इस उपन्यास में जिस तार्किकता के साथ प्रश्नांकित किया गया है, वह इसे जोखिम के लेखन की कोटि में शामिल करता है। क्या कारण है कि सारी तार्किकता और युक्तिसंगत चिंतन को परे रखकर हिन्दी के अधिकांश सवर्ण साहित्यिकों में तुलसीदास और ‘रामचरित मानस’ को 'लोकमंगलकारी’ मानने की हठी आस्था आज भी विद्यमान है। दूधनाथ सिंह के उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ को लेकर हिन्दी साहित्य का कुलीनतंत्र इसलिए कुपित था कि इसमें तुलसीदास और 'रामचरितमानस' दोनों का ही उच्छेदन (सबवर्जन) किया गया था।"
दलित विमर्श और साहित्य की तरह जब ओबीसी विमर्श और साहित्य की चर्चा हिन्दी जगत में हुई तो वीरेन्द्र यादव ने इस विचार को खारिज किया। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि लेखन जाति के आधार पर नहीं सरोकार के आधार पर होना चाहिए। जाति के आधार पर लेखक का चुनाव ऐसी विसंगतियों को जन्म देगा कि विमर्श जिस विचार के विरोध में खड़ा हुआ है उसी विचारधारा के लेखक को विमर्श के लेखक के रूप शामिल करना पड़ेगा। मैथिलीशरण गुप्त और भारतेंदु को अगर जाति के आधार पर हम ओबीसी लेखक मानेंगे तो मैथिलीशरण गुप्त के लेखन में जो वर्ण व्यवस्था का धुर समर्थन है उसका क्या करेंगे? क्या होगा भारतेंदु के लेखन में मुस्लिम विरोध का? अपने चिंतन में हाशिए के समाज की प्रबल पक्षधरता के बावजूद राजेन्द्र यादव का कथा साहित्य मध्यवर्गीय सरोकारों का लेखन है। जाति लेखन में निर्णायक भूमिका कभी नहीं निभा सकती, सरोकारपरक लेखन ही साहित्य और साहित्यकार को समाज के लिए प्रासंगिक बनाए रख सकता है। अपनी किताब " विवाद नही हस्तक्षेप" में संकलित लेख ‘ओबीसी साहित्य की अवधारणा कितनी प्रासंगिक?' में वे लिखते हैं “आज जरूरत है कबीर, फूले, पेरियार, अम्बेडकर सरीखे सामाजिक चिन्तकों के वर्णाश्रम और बाह्मणवाद विरोधी चिंतन एवं बहुजन समाज के संघर्ष, स्वप्न और आदर्श को साहित्य में केन्द्रीयता प्रदान करने की, न कि जाति के आधार पर साहित्य का एक अलग कुनबा बनाने की। जब साहित्य की मुख्यधारा बहुजन समाज के सरोकारों से जुड़ने का जतन कर रही हो, तब 'ओबीसी साहित्य' की किसी भी अवधारणा की न तो कोई आवश्यकता है और न ही औचित्य।“
वीरेन्द्र यादव कभी भी 'अभिव्यक्ति के खतरे’ उठाने में पीछे नहीं रहे। हिन्दी के वर्तमान लेखकों से भी वे यही उम्मीद रखते हैं कि 'जोखिम भरे समय में जोखिम की कथा कहें।‘ अन्य भारतीय भाषाओं में ऐसा लेखन हो रहा है। कई भारतीय भाषाओं के लेखक अपने लेखन से सत्ता और दक्षिणपंथी ताकतों से सीधे टकराए और जेल जाकर या जीवन देकर उन्होंने इसका मूल्य चुकाया। हिन्दी का वर्तमान लेखन इस जोखिम से बच रहा है। जरूरत यह जोखिम उठाने की है। अगर हम यह कर सके तो वीरेन्द्र यादव जैसे जनबुद्धिजीवी के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
विभु प्रकाश सिंह
असिस्टेंट प्रोफेसर (हिंदी) राजकीय महाविद्यालय उन्नाव
7565864805, vibhuprakashsingh@gmail.com
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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