अफ़लातून की डायरी (11) / विष्णु कुमार शर्मा

अफ़लातून की डायरी (11)
- विष्णु कुमार शर्मा

 

25.09.2025

मम्मी सिद्धेश्वरी है।
वह सेतु है- बेटों के बीच, बहुओं के बीच।

माँएं सेतु होती हैं;
पिता सेतु होते हैं न के बरोबर।

26.09.2025

लगता है मैं श्रीकांत वर्मा के मगध का निवासी हूँ। घर-परिवार और कॉलेज, दोनों जगह सबसे सबंधों का निर्वाह करके चलना पड़ रहा है। मैं थक गया हूँ इस बैलेंसिग से। छोटा हो या बड़ा किसी को टोक नहीं सकते अधिकारपूर्वक या ससम्मान या प्रेम के नाते। संतुलन साधना पड़ रहा है। किसी को नाराज नहीं कर सकते। कब किसकी भावनाएँ आहत हो जाएँ, कहा नहीं जा सकता। न आप सच के पक्ष में खड़े हो सकते हैं और न गलत को गलत कह सकते हैं। इस डर से कि मगध की शांति भंग नहीं हो जाए।

लेकिन ये स्वदेश दीपक तो श्रीकांत वर्मा को इंदिरा गांधी का चंदवरदाई कह रहे हैं?

गुरुजी कहने लगे- स्वदेश सच्चा आदमी है, वह झूठ नहीं बोलता।

“स्वदेश तुम कहाँ गुम हो गए...” – कृष्णा सोबती

27.09.2025

अनिल यादव की ‘कीड़ाजड़ी’ में एक फ़िरंगी कहता है कि भारत में बस एक चीज काम की है, वह है- अध्यात्म। अब जब ट्रंप कार्ड से भारत त्राहिमाम् है, वस्तुओं पर टैरिफ बढ़ा दिया है और वीज़ा शुल्क में जबर्दस्त बढ़ोतरी कर दी है तब हमें अमेरिका को योग और अध्यात्म बेचना चाहिए। सामान के लिए नए बाजार तलाशने चाहिए।

28.09.2025

भारत को भूटान और स्केंडीवेनियाई देशों से सीखना चाहिए कि हमें बस उतने ही विकास की जरूरत है जितने से पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे। पर्यावरण की कीमत पर किया गया विकास असल में विनाश है। हमें अब अमरीकी मॉडल का पिछलग्गू होना बंद करना चाहिए। अभी तक सामान्य आदमी को भी यही समझाया जा रहा था कि विकास के लिए पर्यावरण की कीमत चुकानी ही पड़ती है। लेकिन अब हम साफ़ तौर पर देख सकते हैं कि क्लाइमेट चेंज के कारण भारत और दुनिया के कई देशों में बाढ़, सूखे की मार, भूकंप, जंगलों में लगी आग, तूफ़ानों व तेज गर्मी से फसल उत्पादन को जबर्दस्त नुकसान पहुँचा है। फल-सब्जियों के लिए भी एक आदर्श तापमान और मौसम की जरूरत होती है। देश की इतनी बड़ी आबादी के लिए हम भोजन आपूर्ति कैसे करेंगे? जैव-विविधता नष्ट हुई है। विस्थापन और पलायन हुआ है। राहत आपूर्ति पर सरकारों को करोड़ों रुपए खर्चने पड़े हैं। पर्यटन से हिमालय को भयंकर नुकसान पहुँचा है। हम पर्यटन से पहाड़ों के निवासियों की आय बढ़ने के आँकड़े पेश करते हैं। यह पर्यटन देश के मैदानी हिस्सों में रहने वाले लोगों के लिए तो मुश्किल बनेगा ही लेकिन पहाड़ का आदमी पहले चपेट में आएगा। उसके लिए तो यह साक्षात् काल बनकर आएगा। प्राकृतिक आपदाओं से जनजीवन और अर्थव्यवस्था को भीषण चोट पहुँच रही है। जिन्हें हम प्राकृतिक आपदाएँ कह रहे हैं वे असल में मानव निर्मित आपदाएँ हैं। हीट वेव्स से दिहाड़ी मजदूर, खुले में रहने वाले कितने लोग मारे गए, इसका सही-सही आँकड़ा किसी सरकार के पास नहीं होगा। पिछले दिनों उत्तरकाशी और जम्मू कश्मीर के कठुआ में बादल फटने से भू-स्खलन हुआ, इस मानसून में बाढ़ से पंजाब और बिहार त्रस्त है। ये कुछ उदहारण मात्र हैं जो हमारी आँखें खोलने के लिए पर्याप्त हैं।

दोस्त फोन पर पूछता है- क्या सोनम वांगचुक जैसे लोग जेल में बंद किए जाने लायक हैं?

मेरे पास कोई उत्तर नहीं।

29.09.2025

-आपने नाम तो पूछा नहीं, मैं निधि हूँ।

मैंने बिल्कुल नहीं कहा कि मिलकर ख़ुशी हुई। बिल्कुल नहीं हुई।

तभी आलोकधन्वा वहाँ पहुँच गए। थोड़े दिन पहले मुलाकात हुई थी। निराला का लघु-संस्करण बनने की लगातार कोशिश। निधि को देखा। देखते रहे। खूबसूरत औरत को देखते ही आलोकधन्वा को एकदम से भूख लग जाती है, जबकि उनका पेट हमेशा ख़राब रहता है।

स्वदेश जी इनसे परिचय करवाइए न।

मैं चुप। जिसे ख़ुद नहीं जानता, उसका क्या परिचय दूँ? निधि ने संकट से उबारा।

-मैं स्वदेश जी की दूसरी पत्नी हूँ।

कवि को बिजली का शॉक लगा:

-हमें तो पता ही नहीं।

निधि : यह बताने वाली बात भी नहीं।

कवि की भूख भी मिट गई, प्यास भी। चले गए।

(‘मैंने मांडू नहीं देखा’ से)

20.10.2025

सब बेटों के अपने-अपने घर नहीं होने चाहिए।

मामाजी के जाने के बाद गाँव में पहली दीवाली है। मामी अकेली है। मैंने गाँव जाने का प्रस्ताव रखा तो नीलू ने कहा आप यहीं रहिए, मैं जाता हूँ। प्रीति ने कहा कि आप वहाँ जा रहे हैं तो मैं यहाँ क्या करूंगी? मैं भी चलती हूँ। राधे यहाँ ताऊजी-ताईजी के पास रह लेगा... जहाँ सब साथ रहें वह घर है, ईंट पत्थरों का जमावड़ा कोई घर थोड़े होता है?

ओशो कहते हैं- “अपनी संतान से प्रेम सब करते हैं, जो अपने मां बाप से प्रेम करे, उसे ही मैं मनुष्य कहता हूँ”।

31.10.2025

शादी वाले घर में रौनक लाइटिंग और चाइनीज झालरों से नहीं होती। रौनक होती है बहन-बेटियों से, बुआओं और मौसियों की नोंकझोंक से, ताईयों की नसीहतों से और चाचियों से चुटकियों से। फूफाजी की नाराज़गी और जीजाजी के एटीट्यूड से। दूल्हे के दोस्तों से। हल्दी-मेहंदी से, बन्ना-बन्नी से।

01.11.2025

रामदरश मिश्र नहीं रहे। शरीर यात्रा पूरी हुई। अंजुम ने पिछले दिनों संगत में उनका साक्षात्कार किया था। साक्षात्कार में बोले कि मेरे साहित्यिक जीवन की सफलता का राज है मेरी निस्पृहता और महत्वाकांक्षा का अभाव। मैं धीरे-धीरे अपना काम करता रहा और यही ‘धीरे-धीरे’ मेरे जीवन का ध्येय वाक्य बन गया। जीवन के उत्तरार्द्ध में मुझे वह सब मिला जो किसी भी मनुष्य को काम्य होता है। प्रियंवद जी भी शेक्सपीयर के हवाले से महत्वाकांक्षा को लेखक के पतन का कारण बता चुके हैं लेकिन महत्त्वाकांक्षा का मतलब क्या है? महत्त्वाकांक्षा किसकी? यश की, धन की, अमरत्व की... महत्त्वाकांक्षा में महत् को जाने बिना कैसी महत्त्वाकांक्षा? महत् माने क्या? हमने यश की, धन की, अमरत्व की लिप्सा को ही महत् माना है, यही कारण है कि ये महत्त्वाकांक्षाएँ हमें कुतरती जाती हैं, समझौते करने को मजबूर करती हैं, हम छीजते जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता... इस तरह यह हमें पतन की ओर ले जाता है।

06.11.2025

समझ ज़रा देर से आती है। काश, ये बीस-पच्चीस की उमर में आ जाए। पर नहीं आती। आ जाए तो हम बहुत सारी गलतियों से बच जाएँ। माँ-बाप का दिल दुखाने से बच जाएँ। गलत रिश्तों और गलत दोस्तियों से बच जाएँ। और बच जाएँ उस पश्चाताप से जो चालीस की उम्र के बाद आ हमें घेरने लगता है। सबके साथ ऐसा हो जरूरी नहीं। किसी को जल्दी भी समझ आ जाती है और किसी को पैंतीस-चालीस में भी नहीं। पश्चाताप उसी को घेरता है जिसे जीवन की बुनियादी समझ आने लगती है, जिस भी उम्र में आए। जब उनके बच्चे उनके सामने नई चुनौतियाँ खड़ी करने लगते हैं। हम अक्सर वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं जैसा हमारे मामले में हमारे माता-पिता हमारे साथ करते थे। लेकिन तब वे हमें गलत लगते थे। अब हमारे बच्चे हमें गलत समझते हैं।

07.11.2025

आज मामाजी का साढ़े ग्यारह महिने का श्राद्ध था। स्थानीय हिन्दू लोकरीति के मुताबिक उन्हें विदा कर दिया गया। विदा? कहाँ से विदा? घर से विदा? इस लोक से विदा? संसार से विदा तो मनुष्य तभी हो जाता है जब मृत्यु आ घेरती है। और मृत्यु क्या है? आयु के साथ आई शारीरिक जीर्णता से, रोग से या किसी दुर्घटना से जब अचानक अथवा धीरे-धीरे चेतना को जब यह आभास होने लगता है कि यह शरीर चलाने लायक नहीं रह गया है तो वह निर्देश देती है और संबंधित अंग की किसी एक कोशिका के लाइसोसोम के फटने से यह शुरुआत होती है। एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी कोशिका... बुलबुले की तरह फटती चली जाती हैं और इस तरह एक अंग और एक तंत्र नष्ट होता है और अंत में हृदयगति रुक जाती है और चिकित्सक मृत्यु की घोषणा कर देते हैं। लाइसोसोम को इसीलिए आत्मघाती थैली कहा जाता है। पर यह निर्णय चेतना के स्तर पर होता है या शरीर यह निर्णय स्वयं लेता है? और चेतना क्या है? चेतना शरीर से भिन्न थोड़े ही है। शरीर की विधिवत बुनावट से ही चेतना की निर्मिति होती है, वह बुनावट या स्ट्रक्चर टूटा कि मृत्यु घटित हुई। चेतना कभी ऐसा निर्णय नहीं करेगी कि शरीर छोड़ना पड़े। ख़ासकर जब हम माया से यानी अज्ञान से अंधे हों। और हम अधिकांश पृथ्वीवासी ऐसे ही हैं। इसलिए ही तो हम मौत से घबराते हैं। मृत्यु के बारे में घर में डिस्कसन नहीं होता। गर होने भी लगे तो बड़ों द्वारा चुप करा दिया जाता है। जबकि इस जगत में मृत्यु से शाश्वत सत्य और क्या? हाँ, मुक्त चेतना ऐसा निर्णय ले सकती है। जैन धर्मं में संथारा प्रथा एक ऐसी ही व्यवस्था है जिसमें व्यक्ति जीते-जी यह निर्णय लेता है कि उसे इस शरीर को अब नहीं चलाना या नहीं जीना। इसलिए वे अन्न-जल का त्याग कर मृत्यु का वरण करते हैं। ये चेतना की ऊँचाई का एक पायदान है। लेकिन ऊँचाई की अंतिम पायदान पर विराजित चेतना कभी ऐसा निर्णय नहीं लेती। मृत्यु आए जब आए, चाहे जिस रूप में आए, स्वागत है।

इस तरह चेतना शरीर से भिन्न भी है और नहीं भी। यह शरीर है और यह मैं (चेतना) हूँ, ऐसा जानने को ही आत्मज्ञान कहा गया है। इस चेतना को ही भारतीय मनीषा ने ऊँचा और सुंदर नाम दिया-आत्मा। और हमने इस ऊँचे और सुंदर नाम का ही सबसे ज्यादा अपमान किया। इसे कभी किसी के शरीर में प्रविष्ट करा दिया तो कभी इसे पीपल पर बिठा दिया। और कभी इसकी शांति के नाम पर हवन करा दिया। जो स्वयं शांति-स्वरूप है उस आत्मा की शांति के लिए शोक संदेश लिखे, प्रार्थना सभाएँ की। श्रीमद्भगवद्गीता का कुपाठ कर, उसकी दुर्व्याख्या कर जितना अपमान हमने अपने ग्रंथ का किया उतना शायद किसी धर्मग्रंथ का नहीं हुआ। मृत्यु के बाद के सारे कर्मकांड केवल स्मरण-विस्मरण की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता के अनुरूप निर्मित हुए हैं। इनका चेतना, सूक्ष्म शरीरधारी आत्मा की सद्गति से कोई संबंध नहीं। जैन मतावलंबियों ने इसे गहराई से समझा और व्यावहारिक जीवन में अमल में लाए।

चेतना के दो छोर हैं। एक सिरे का नाम मन है और दूजे का नाम आत्मा। मन कलुषित है और आत्मा निष्कलुष। मन मलीन है और आत्मा निर्मल। मन चलायमान है और आत्मा अचल। मन मोह से आविष्ट रहता है और आत्मा प्रेमपूर्ण है। मन बाँधता है और आत्मा मुक्त करती है। मन अमरता के कौतुक रचता है और आत्मा मौन है। मन खंड-खंड रहता है और आत्मा अखंड है। मन का हर जीव के जन्म के साथ पुनर्जन्म होता है और आत्मा अजन्मी है। मन अशांत रहता है और आत्मा स्वभाव से ही शांत है। मन नासमझ है और आत्मा समझदार। आत्मा सत्, चित् व आनंद स्वरूप है। इसी को सम्मिलित रूप में सच्चिदानंद रूपाय कहा गया है। इसी चेतना का नाम शिव है। पार्वती के पति और गणेशजी के पिता वाले शिव नहीं। चैतन्य स्वरूप शिव। इसी आनंदघन का नाम राम है। दशरथनंदन राम नहीं, सत्य स्वरूप राम। इसी परम सत्ता को कृष्ण कहा गया। मोरमुकुटधारी कृष्ण नहीं, प्रेम स्वरूप कृष्ण। हालाँकि पार्वतीपति शिव, दशरथनंदन राम और मोरमुकुटधारी कृष्ण की तरह यदि कोई चेतना की उस ऊँचाई वाली भाव-भूमि पर आसन जमा ले तो उसे ही मुक्त पुरुष या परमात्मा की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। इसीलिए वे पूज्य हैं और हमारे लिए आदर्श भी। वे हमें जीवन की ऊँचाई का लक्ष्य भी देते हैं और मार्ग भी बताते हैं। इसी साक्षी भाव, इसी दृष्टा भाव, इसी बोध स्वरूप परम चेतना को हमने सशरीर गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी के रूप में जीते-जागते देखा। ऐसी ही एक परम चेतना ने उद्घोष किया- सब मोक्ष के लिए काशी आते हैं, मैं काशी छोड़कर मगहर जाऊँगा।

“हम न मरहिं, मरहिं संसारा”

05.02.2026

जब मृत्यु का बुलावा आए,
तो मेरे द्वार पर कोई सन्नाटा न हो.
मेरे मस्तक पर चंदन का तिलक लगा देना,
और मेरे अंगों को फूलों से सजा देना.
विदा के समय कोई रोए नहीं,
बल्कि मंगल-शंख बजाना और दीप जलाना.
-रवीन्द्र नाथ टैगोर

25.03.2026

अशोक कुमार पांडेय की राहुल सांकृत्यायन पर केन्द्रित पुस्तक ‘अनात्म बेचैनी का यायावर’ पूरी की. अशोक जी ने रज़ा फाउंडेशन की फ़ेलोशिप के तहत यह शोधपूर्ण कार्य किया है. पुस्तक में अशोक जी ने अच्छी समालोचना करते हुए राहुल जी के साहित्य और उन पर उपलब्ध किताबों विशेषकर जीवनियों की गहरी पड़ताल की है. पुस्तक पठनीय है. अपने शीर्षक को चरितार्थ करती है. राहुल जी के हिंदी जगत को प्रदाय के साथ उनकी मानवीय कमजोरियों को लेखक ने उभारा है. ख़ासकर वे पितृसत्तात्मक सामंती स्वभाव और पुरुषोचित अहंकार को अंत तक नहीं त्याग सके. कमला सांकृत्यायन और रूसी पत्नी लोला के साथ उनका व्यवहार इसका प्रमाण है. अपने रूसी पुत्र ईगोर के प्रति उपेक्षा भाव भी उन पर प्रश्न अंकित करता है. नेहरू से आजीवन चिढ़ भी.

बालक राहुल पर ननिहाल में नाना के गहरे अनुशासन पर लेखक लिखते हैं- “अक्सर अपनी ज़िंदगी में मुश्किल रास्ते चुनने वाले संतानों के लिए सुरक्षित रास्ते तलाशते हैं”. ठीक यही हाल साठ बसंत पार कर चुके राहुल सांकृत्यायन का होता है जब अपने पुत्र-पुत्री जेता और जया के सुरक्षित भविष्य के लिए वे एक और मकान खरीदने की जुगत में लगे होते हैं कि उनके न रहने की स्थिति में दूसरे मक्कन के किराए से उनका जीवन चलता रहे. यही नियति है.

राहुल सांकृत्यायन के पिता के संबंध में लिखते हैं कि “उम्र के साथ बढ़ती पिताओं की लाचारियाँ उन्हें दयनीय भी बना देती हैं और लाचार भी”. सच में जो आदमी पूरी दुनिया को जीतने की कुव्वत रखता है वह भी औलाद के सामने हार जाता है.

राहुल सच में महामानव थे, महापंडित और बेचैन यायावर. भारत सदैव इस महामानव का ऋणी रहेगा.

26.03.2026

प्रवीण झा मेरे प्रिय रचनाकारों में से एक है. वे विविध विषयों पर ललित गद्य रचते रहे हैं. इतिहास उनका अपना क्षेत्र है. इतिहास को आख्यान की तरह रचने वाले डॉक्टर झा भारतीय व यूनानी इतिहासकारों की शृंखला में संभवतः सबसे नए हैं. कई दिनों से वांछा-सूची में शामिल उनकी नई किताब ‘द्रविड़ राजनीति : पेरियार से जयललिता तक’ पढ़ी. तमिल राजनीति को एक उत्तर भारतीय द्वारा यथासंभव निरपेक्ष दृष्टि से देखने समझने का एक स्तुत्य प्रयास है यह पुस्तक.

विष्णु कुमार शर्मा
सहायक आचार्य, हिंदी, स्व. राजेश पायलट राजकीय महाविद्यालय बांदीकुई, जिला- दौसा, राजस्थान

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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