अम्बेडकर की इतिहास-दृष्टि एवं संवेदनाएं
- कन्हैया त्रिपाठी एवं अपूर्वा
शोध सार : सभ्यता व संस्कृति अपने इतिहास में जीवित होते हैं। इसीलिए विश्लेषण का विषय इतिहास को माना गया है। मनुष्य अपनी परंपराओं को इतिहास में देखता है जिसमें उसकी संवेदनाएं होती हैं। इसमें वह अपने पूर्वजों के शौर्य व गाथा का विश्लेषण करता है। मनुष्य इस बहाने अपनी विभिन्न ज्ञानानुशासन को समझने की कोशिश करता है। कालसापेक्ष व स्थितिसापेक्ष निरपेक्ष चिंतन इतिहास से निकलते हैं। चूंकि प्रत्येक युग अपनी सामाजिक-ऐतिहासिक-आर्थिक-सांस्कृतिक-दार्शनिक-आध्यात्मिक यात्रा के साथ गतिशील होता है इसलिए ये सभी तत्व व विश्लेषण इतिहास अपने साहित्य-निर्माण में समय-समय पर प्रतिबिंबित करता है। डॉ. आंबेडकर की इस इतिहास को समझने की अपनी दृष्टि व संवेदनाएं रही हैं और उन्होंने भारतीय शास्त्रों को समझने की कोशिश बखूबी की। इस प्रपत्र में यह समझने की कोशिश की गयी है कि डॉ. आंबेडकर की इतिहास की समझ, संवेदनाएं व दृष्टि भारतीय परिप्रेक्ष्य में और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में कैसी थी। उन्होंने अपने विश्लेषण के बाद इतिहास को किस प्रकार प्रकट किया और उनके अपने चिंतन व लेखन में इतिहास किस प्रकार उभरकर सामने आता है, इसे इस प्रपत्र में विश्लेषित किया गया है।
बीज-शब्द : इतिहास-बोध, डॉ. आंबेडकर, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, भारतीय-संस्कृति, सभ्यतागत इतिहास परंपरा।
मूल आलेख : इतिहास के भीतर इतिहास होते हैं। इसका आकलन हमारे इतिहासकार सदैव करते रहे हैं। दुनिया की क्लासिक में भी जहाँ इतिहास की खोज व उसके विश्लेषण में नए इतिहास का सूत्रपात हुआ और उससे नए विमर्श हमारी चर्चा में आये, ऐसे अनेक उद्धरण हमारे धर्मशास्त्रों में विद्यमान हैं। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक धर्म और समाज में लिखा है कि मनुष्य में एक, न केवल जीने की, अपितु गौरव के साथ जीने की तत्त्वगत (मौलिक) आकांक्षा विद्यमान है। ...ऐसा व्यक्ति कोई भी नहीं है, जिसके मन में कभी न कभी ये आधारभूत प्रश्न न उठे हों- मैं क्या हूं? मेरा मूल कहां है? मेरी भवितव्यता क्या है?...उस सचाई को, जो इस अर्थ में सार्वभौम और परम है कि वह सब मनुष्यों के लिए, सब देशों और कालों के लिए प्रामाणिक है।1 इतिहास हमें यह अवसर प्रदान करता है कि हम हमारी अर्वाचीन जीव-जीवन-जगत-उद्देश्य के माध्यम से स्वयं को जानें। किन्तु हमारा चश्मा भी हमने दूसरे से लिया और उसी चश्में से अपने इतिहास को समझने की कोशिश की। इस विषय में हमारे चिंतकों ने विभिन्न प्रकार से रोष व्यक्त किया। राधाकृष्णदास ने लिखा है कि क्या हमें अपने पूर्वजों की कीर्ति तथा अपने प्राचीन इतिहास की खोज से परांगमुख होना चाहिए? कदापि नहीं। ...देखिए तो! परम बुद्धिमान् युरोपीय विद्वानों ने आपके प्राचीन इतिहासों का यथा-कथंचित् पता कैसे लगाया है? जिन बातों को आप स्वप्न में भी नहीं जानते उन्हें वे विदेशी, विजाती विधर्मी आपकी भाषा-रीति-व्यवहार आदि से संपूर्ण अनभिज्ञ होने पर भी आपको बताते हैं। कैसी लज्ज़ा की बात है कि हमारे पूर्व पुरुषों का वृत्तांत हमें छः हजार कोस से अजनबी लोग आकर बतावें और हम अकर्मण्य होकर बैठे उन्हीं का भरोसा करें और जो कुछ अपना वृत्तांत जानना हो तो उन्हीं का आश्रय ढूँढें।2 लुईस मेनैंड ने दि न्यू यॉर्कर में 2022 में एक आलेख लिखा था-The People Who Decide What Becomes History ‘इतिहास को निर्धारण करने वाले लोग’ उसकी टैग-लाइन थी-तथ्यों के प्रति चाहे वे कितने भी सजग क्यों न हों, इतिहासकार कहानी सुनाने में लगे होते हैं, विज्ञान में नहीं।3 इस आलेख में उन्होंने दो बातों का बहुत ही अभूतपूर्व उदघाटन किया है। पहला, ‘मेकिंग हिस्ट्री’ इतिहासकारों का एक व्यापक सर्वेक्षण है जो हेरोडोटस (प्लूटार्क के अनुसार झूठ का जनक) से लेकर हेनरी लुईस गेट्स जूनियर तक के इतिहास को समेटता है। दूसरा वह कोहेन के माध्यम से कहते हैं कि ‘मेकिंग हिस्ट्री’ एक पुस्तक है, कोई विश्वकोश नहीं, और कोहेन जिस भी विषय पर लिखते हैं, उसे पूरे जोश के साथ लिखते हैं। कोहेन ही मानते हैं कि इतिहास निर्माण में पूर्वाग्रह उतना ही अपरिहार्य है जितना कि दृष्टिकोण। आप इससे बच नहीं सकते।4
इतिहास लेखन, उसके पाठ और साथ ही उसके साथ समझ व संवेदना बनाने में ऐसी अनेक विसंगतियां देखी गयीं और उस पर अनेक प्रतिरोध भी उभरकर सामने आए हैं। लुईस मेनैंड ने इतिहास के बारे में जो तथ्य सामने रखा है वह मेकिंग हिस्ट्री की तकनीकी दिक्कते हैं। भारत में इतिहास के बारे में जो विवाद हैं उसे भी यदि विश्लेषित किया जाए तो ऐसे अनेक तथ्य उभरकर सामने आते हैं। सैद्धांतिक रूप से इतिहास को समझने की विसंगतियां हों या आध्यात्मिक रूप से, भारतीय इतिहास को लेकर अनेक शिकायतें हैं और समय-समय पर इतिहासकारों के बीच इस पर अपने-अपने तर्क टकराहट के कारण बने हैं। इतिहासकार अर्नाल्ड जे. टायनबी ने कहा था कि, विश्व के इतिहास में अगर किसी देश के इतिहास के साथ सर्वाधिक छेड़छाड़ की गयी है, तो वह भारत का इतिहास ही है। अर्नाल्ड जे. टायनबी कोई सामान्य इतिहासकार नहीं हैं जिन्होंने इस तरह की बातें भारत के विषय में कही। इसके पीछे निःसंदेह उनका बहुत बड़ा अध्ययन है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भारत के इतिहास को अपने वैचारिकी व प्रज्ञा के अनुसार देखने की कोशिश की। वर्णाश्रम व्यवस्था, जाति के प्रश्न, छुआछूत-अस्पृश्यता के प्रश्न और शूद्र समाज के राजकाज पर डॉ. आंबेडकर का विषद अध्ययन है।
भविष्य के अनुरूप इतिहास-बोध -
डॉ. आंबेडकर की ऐतिहासिक दृष्टि व संवेदनाओं को समझने के लिए सबसे पहले उनकी भविष्य-दृष्टि पर विचार करना चाहिए। इस सन्दर्भ में डॉ. आंबेडकर द्वारा परिकल्पित 21वीं सदी में भारत की संकल्पना विषय पर डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मृति व्याख्यान भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दिया था। उन्होंने सितंबर 2014 को अपने अभिभाषण को कुछ इस प्रकार अंत किया था कि डॉ. अंबेडकर द्वारा 25 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए, उनके कहे गए इन शब्दों से मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ- ‘‘जाति एवं पंथ के रूप में हमारे पुराने शत्रुओं के साथ ही, अब हमारे यहां विभिन्न तथा विरोधी राजनीतिक दल होंगे। क्या भारतीय, देश को अपने पंथ से ऊपर रखेंगे अथवा पंथ को देश से ऊपर रखेंगे? मुझे नहीं पता। परंतु यह तय है कि यदि दल पंथ को देश से ऊपर रखते हैं तो हमारी स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी और शायद हम सदा के लिए इसे खो दें। हम सभी को इस स्थिति से दृढ़ संकल्प होकर बचना होगा। हमें अपने खून की आखिरी बूंद के साथ अपनी आजादी की रक्षा का संकल्प लेना होगा।’’5 वस्तुतः डॉ. आंबेडकर के इस कथन में उनके जीवन के चिंतन व इतिहास के आकलन को समझा जा सकता है। वह किस स्तर पर भारतीय जीवन, सामजिक-सांस्कृतिक व वैचारिक जीवन-शैली से संघर्ष करके इस नतीजे पर पहुंचते हैं, उसकी भी मीमांसा संभव होती है।
भारत में जातिप्रथा संरचना, उत्पत्ति और विकास विषय पर 9 मई, 1916 को कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यूयार्क, अमरीका, में आयोजित डॉ. ए.ए. गोल्डनवाइजर गोष्ठी में नृविज्ञान पर पठित लेख में डॉ. आंबेडकर ने कहा था, ‘मैं निःसंकोच कह सकता हूं कि अतीत के रहस्यों को खोलने वालों के मार्ग में अनेक कठिनाइयां आती हैं और निःसंदेह भारत में जाति-व्यवस्था अति प्राचीन संस्था है। इन हालात में यह और भी ज्वलंत यथार्थ है कि जहां तक हिन्दुओं का संबंध है, उनके बारे में कोई आधिकारिक या लिखित संकेत नहीं हैं तथा भारतीयों का दृष्टिकोण ऐसा बन गया है कि वह इतिहास लेखन को मूर्खता मानते हैं, क्योंकि उनके लिए जगत मिथ्या है। लेकिन ये संस्थाएं जीवित रहती हैं, यद्यपि चिरकाल तक इनका लिखित प्रमाण नहीं रहता और उनके रीति-रिवाज व नैतिक मूल्य अवशेषों की भांति अपने आपमें एक इतिहास हैं।‘6 डॉ. आंबेडकर ने इतिहास में व्याप्त अविचारित सर्जना को ही एक तरह से चुनौती दी। उन्होंने जातीयता और भारतीय सोच के द्वैध को चुनौती दी और यह कहा कि यदि हम मिथ्याचार के साथ अपने इतिहास को जोड़कर देखते हैं तो यह खुद सवालों के घेरे में है। डॉ. आंबेडकर ने भारतीय इतिहास के विषय में कहा कि हिन्दू इतिहास में किसी समय पुरोहित वर्ग ने अपना विशिष्ट स्थान बना लिया और इस तरह स्वयं सीमित प्रथा से जातियों का सूत्रपात हुआ।7 डॉ. आंबेडकर ने बहुत सुन्दर उदाहरण आयरिस इतिहास का देकर अल्पसंख्यकों के साथ भी बर्ताव को प्रश्नांकित किया था।8 आयरलैंड, रोम के कैथोलिक व प्रोटेस्टेंट संघर्ष व उसके इतिहास को बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने बहुत गहराई से समझने की कोशिश की। इस क्रम में वह भारतीय इतिहास के बारे में इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि भारत के इतिहास में इस बात का चित्रण है कि धर्म सत्ता का स्रोत है, जहां पुजारी को सामान्य व्यक्ति से अधिक महत्व प्राप्त है और कभी-कभी तो यह प्रथम मजिस्ट्रेट से भी अधिक होता है। भारत में हर चीज, यहां तक कि हड़ताल और चुनाव पर भी आसानी से धर्म का प्रभाव पड़ता है और वह ऐसी घटनाओं को धार्मिक मोड़ दे देता है।9 डॉ. आंबेडकर का मानना रहा है कि भारतीय इतिहास में केवल एक काल ऐसा है, जिसे स्वतंत्रता, महानता और गौरवपूर्ण युग कहा जाता है। वह युग है, मौर्य-साम्राज्य। सभी युगों में देश में पराभव और अंधकार छाया रहा है। लेकिन मौर्यकाल में चातुर्वर्ण्य को जड़-मूल से समाप्त कर दिया गया था। मौर्य-युग में शूद्र, जिनकी संख्या काफी थी, अपने असली रूप में आए और देश के शासक बन गए। भारतीय इतिहास में पराभव और अंधकार का युग वह था, जब घृणित चातुर्वर्ण्य देश के अधिकांश भाग में अभिशाप बनकर फैल गया।10 इस दृष्टि से डॉ. आंबेडकर का एक अपना स्वतंत्र विचार इतिहास की चेतना की खोज करता है। यह देखने की और चिह्नित करने की उनकी कोशिश रही है कि हमें लकीर के फ़क़ीर नहीं होने चाहिए बल्कि जो इतिहास में सबके हित की छवि हो और उसको इतिहास में अभिव्यक्ति मिली हो, उसे ही स्वीकार किया जाना चाहिए क्योंकि इससे हमारे भविष्य व भावी-पीढ़ी को सही दिशा मिलती है।
डॉ. आंबेडकर का प्रतिरोध -
समय के अनुरूप समय को समझने की यह शृंखला निरंतर डॉ. आंबेडकर में देखी गयी। उन्होंने महाराष्ट्र के भाषावार प्रांत पर विचार व्यक्त करते हुए कहा भी कि इतिहास हमें यह बताता है कि जिस राज्य की जनता में समरूपता नहीं मिलती, वहां लोकतंत्र असफल हो जाता है। ऐसे विषम समाज में, जो वर्गों में बंटा हो और जिसके सभी वर्ग एक-दूसरे के प्रति आक्रामक और गैर-सामाजिक रुख रखते हों उस समाज में लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता। उलटे, उसमें भेदभाव, अवहेलना और अनुचित पक्षपात पनपेगा तथा जिस वर्ग के हाथ में राजनीतिक सत्ता होगी, वह दूसरे वर्ग के हितों को दबाने की चेष्टा करेगा।11 डॉ. आंबेडकर ने भारतीय इतिहास के स्वतंत्र, लोकतांत्रिक व समावेशी सामाजिक चेतना को स्वीकृति दी और इसके बरक्स जो भेदभावपूर्ण, अवहेलनात्मक व पक्षपातपूर्ण ऐतिहासिक पक्ष रहे उसका उन्होंने प्रतिरोध किया। डॉ. आंबेडकर ने सदैव स्वीकार किया जो उनके अध्ययन व चिंतन से इतिहास समझ आया था कि इतिहास समस्त काल खंडों में जन-समुदायों के बीच जो संपर्क ज्ञात हैं, वे सब विजेताओं और विजितों के बीच के हैं।12 बाम्बे लेजिसलेटिव काउंसिल डिबेट में तो उन्होंने कह दिया था कि हमें इतिहासकारों से सावधान रहना चाहिए।13 उनका रोष यह था कि कभी हम अतीत की ओर झाँकने लगते हैं तो कभी भविष्य की बात करने लगते हैं। उन्हें बार-बार इसका भी प्रतिरोध करना पड़ा। एक बार तो वह इतना क्रोध में आ गए कि कह बैठे- मैं अतीत या प्राचीन इतिहास में नहीं जा रहा हूं। मैं 1929 से शुरू करना चाहता हूं।14 वह इस प्रकार सीधी बातें करने के लिए जाने जाते थे और उनका प्रतिरोध सामने से दीख जाता था कि वह उलझना नहीं चाहते बल्कि मुद्दे पर बात करना चाहते हैं जिससे न्याय के लिए बातें स्पष्ट हो सकें। इस प्रकार डॉ. आंबेडकर की इतिहास की समझ न्याय-केन्द्रित होती थी।
अस्पृश्यता की समस्या को भी वह बहुत बार उठाते रहे और उनकी इस सन्दर्भ में स्पष्ट बात थी कि भारतीय इतिहास साक्षी है कि अनेक महात्माओं ने भारत भूमि से अस्पृश्यता को समूल नष्ट करने के प्रयास किए हैं। उनमें बुद्ध, रामानुज, कबीर और वैष्णव संत जैसे महापुरुष भी शामिल हैं। यह मान लेना खतरनाक होगा कि जिस पद्धति ने ऐसे सभी प्रहारों को झेल लिया है, अतः मेरा विचार है कि जब तक यह धारणा बनी रहेगी, तब तब अस्पृश्यता भी बनी रहेगी।15 उन्होंने इसलिए अस्पृश्यता पर चली अनेक बहसों को इतिहास से उठाकर पढ़ने व समझने के बाद इस प्रकार के विचार प्रकट किया। डॉ. आंबेडकर भारत के वर्ग-संघर्ष के दुखांत इतिहास से हमेशा दुखी रहे। उन्होंने इसका सदैव विरोध किया। वह कई बार कहते थे कि भारतीय इतिहास में पराभव की एक परंपरा बनी हुई है, उसके लिए जाति-व्यवस्था ही जिम्मेदार है।16 इसलिए उनका प्रतिरोध तो इस व्यवस्था के खिलाफ़ दिखाई देता है। उनकी लड़ाई इस बात से थी कि हम किसी के साथ खेल न खेलें। किसी को वस्तु न समझें। इसीलिए एक बार उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत के इतिहास का काफी हिस्सा बिल्कुल भी इतिहास नहीं है। ऐसा नहीं है कि प्राचीन भारत बिना इतिहास के है। प्राचीन भारत का बहुत सारा इतिहास है। लेकिन वह अपना स्वरूप खो चुका है। महिलाओं और बच्चों का मनोरंजन करने के लिए इसे पौराणिक आख्यान बना दिया गया है।17...प्राचीन भारत के इतिहास से पर्दा हटाया जाना चाहिए।18 डॉ. आंबेडकर का मानना था कि प्रथम समाज सुधारक और उनमें सबसे महानतम गौतम बुद्ध थे। समाज सुधार का इतिहास ही बुद्ध से शुरू होता है और कोई भी इतिहास उनकी उपलब्धियां बताए बिना अधूरा रहेगा।19 डॉ. आंबेडकर ने संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन के रूप में अभूतपूर्व कार्य किया। उनके इस कार्य में उनकी अपनी भारतीय ऐतिहासिक समझ ने भी बहुत सहयोग दिया। एक डिबेट में जोसफ अल्वान डिसूजा (बम्बई-साधारण) ने डॉ. आंबेडकर की प्रशंसा में कहा था- उपसभापति जी! इस महान देश के इतिहास के पन्नों में जो हजारों वर्ष पुराना है, और संभवतः हमेशा रहेगा। जरुरत है उसे वह सब कुछ देने की जो उसे देय है, निश्छल और ईमानदारी से आत्म निरीक्षण करने की, भाईचारे और सहयोग की भावना की, जिसके परिणामस्वरुप शांति, सौहार्द और सद्भाव व्यष्टि और समष्टि के रुप में हमारे विविध अस्तित्वों के जीवन-लक्ष्य होंगे, पर्याप्त विस्तृत दृष्टि अपनाने की, ताकि वे जटिल और कठिन समस्याएं जो इस संवैधानिक स्थापना के संबंध में हमारे सामने आनी हैं।...अनेक सदस्यों ने खासकर उन सदस्यों ने जिन्होंने अपने वक्तव्य दिए हैं, यह मान लिया है कि प्रारूप संविधान एक श्रेष्ठ कृति है। यदि इजाजत हो तो मैं इसे माननीय डॉ. आंबेडकर और उनकी प्रारुपण समिति के महीनों की श्रमसाध्य स्मरणीय कृति कहूँगा। हम इस कृति को निश्चित रुप से विशेषज्ञों की कृति कह सकते हैं, यह कृति आद्योपांत तुलनात्मक, चयनात्मक और दक्षात्मक स्वरूप की है।20 डॉ. आंबेडकर की इससे बड़ी तारीफ़ कुछ और हो ही नहीं सकती। डॉ. अंबेडकर ने लिखा था कि अमरीका के एक प्रसिद्ध इतिहासकार ने कहा है- ‘‘अपने संवैधानिक संगठन के किसी भाग की विफलता और लिखित संविधान के एक बड़े भाग के डूबने की कल्पना करना कहीं आसान है, पर राजनीतिक समूहों के बिना आगे बढ़ने की कल्पना करना कहीं कठिन है। वे तो हमारी जीवनदायनी संस्थाएं हैं।21 हमारे संविधान में अब तक हुए संशोधन बहुत से परिवर्तन में सहयोगी साबित हुए हैं लेकिन आंबेडकर के इतिहास की समझ व संवेदनाओं की मूल चेतना अभी भी उन तबकों से अलग नहीं होने देतीं जिसके लिए डॉ. आंबेडकर ने श्रम-साध्य परिश्रम किया।
निष्कर्ष : ‘शूद्र कौन थे’ नामक पुस्तक को भी बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर वाड्.मय में प्रकाशित किया गया है। इसमें डॉ. आंबेडकर ने इतिहास को समझने व अभिव्यक्त करने की पहेली को सुलझाया है। वे लिखते हैं कि एक इतिहासकार को सटीक, ईमानदार, निष्पक्ष, द्वेष रहित, रूचि, भय, क्षोभ और पूर्वाग्रह से मुक्त, सत्यनिष्ठ होना चाहिए जो इतिहास का मूल है, वह उन महान घटनाओं का संरक्षक, उपेक्षा का शत्रु, अतीत का साक्षी और दूरदर्शी होना चाहिए। संक्षेप में वह मुक्त विचारों वाला हो, पर उसका खाली दिमाग न हो और प्रत्येक साक्ष्य की निरख-परख करे चाहे वह मिश्रित भी क्यों न हों।22 बहुत ही निरपेक्ष होकर इतिहास को आत्मसात करने, रचने, बुनने व परोसने के हिमायती थे डॉ. भीमराव आंबेडकर। आज जो इतिहास के साथ नाराज़गी है, जो गुस्सा है, जो शिकायतें हैं, जिसे पुनर्परिभाषित व पुनर्लिखित किए जाने की कोशिश हो रही है, उसकी कदापि ज़रूरत नहीं महसूस होती अगर डॉ. आंबेडकर जैसी सूझबूझ वाली इतिहास दृष्टि व संवेदनाएं होतीं। उनकी चिंता में सम्मिलित लोगों को भी उचित स्थान इतिहास में होते, तो डॉ. आंबेडकर के मन में कोई ऐसी बातें न उभरतीं जिसकी उन्होंने कड़ी आलोचना की। फिलहाल डॉ. आंबेडकर ने ‘शुद्र कौन थे’ नामक पुस्तक में ऐसे कई शूद्र वर्ग में जन्में राजाओं की गाथाओं का उल्लेख किया है जिसे हर इतिहासकार को जानना चाहिए। ऐसे स्रोतों को समझते हुए इतिहास के पन्नों पर सृजन परंपरा में जब कोई नया इतिहास लेखक सम्मिलित होगा तो उसे सही लिखने का साहस मिलेगा। डॉ. आंबेडकर ऐसे ही इतिहास लेखन, चिंतन व उसे आगे की पीढ़ियों तक ले जाने के उपक्रम को सच्ची कोशिश मानते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम इतिहास को समझने के लिए एक बार डॉ. आंबेडकर को भी अवश्य पढ़ें। उनकी दृष्टि व संवेदनाओं को समझें. उनकी कृतियों व अभिभाषणों का पाठ करें। निश्चय ही यह पाठ और चिंतन न केवल डॉ. आंबेडकर की दृष्टि व संवेदनाओं से जोड़ेगा अपितु इतिहास के सत्य-शोधन व विश्लेषण में भी मदद करेगा।
सन्दर्भ :
- डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, धर्म और समाज, हिन्द पॉकेट बुक्स पेंगुइन रैंडम हाउस इिम्प्रंट, 2023, पृष्ठ 42
- राधाकृष्ण-ग्रंथावली, पहला खंड, (संपा•) श्यामसुंदरदास, बी० ए०/इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग/प्रथम संस्करण 1930, पृष्ठ 147
- Louis Menand, The People Who Decide What Becomes History, The New Yorker, April 11, 2022
- Ibid
- https://www।presidentofindia।gov।in/shri-pranab-mukherjee/speeches/speech-president-india-shri-pranab-mukherjee-delivering-dr-br
- भारत में जातिप्रथा संरचना, उत्पत्ति और विकास विषय पर 9 मई, 1916 को कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यूयार्क, अमरीका, में आयोजित डॉ. ए.ए. गोल्डनवाइजर गोष्ठी में नृविज्ञान पर पठित लेख, बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वाड्.मय, खंड 1, पृष्ठ 13
- वही, पृष्ठ 19
- वही, पृष्ठ 48
- वही, पृष्ठ 50
- वही, पृष्ठ 74
- वही, पृष्ठ 117
- वही, पृष्ठ 128
- बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाड्मय, खंड 3 पृष्ठ 109
- बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाड्.मय, खंड 3 पृष्ठ 268
- बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाड्.मय, खंड 4 पृष्ठ 209
- बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाड्.मय, खंड 6 पृष्ठ 84
- बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाड्.मय, खंड 7 पृष्ठ 3
- वही, पृष्ठ 4
- वही, पृष्ठ 18
- बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वाड्.मय, डॉ. आंबेडकर प्रतिष्ठान सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार 15 जनपथ, नई दिल्ली, 2020, खंड 26, पृष्ठ 73
- वही, 272
- बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संपूर्ण वाड्.मय, खंड 13, पृष्ठ 9
कन्हैया त्रिपाठी
चेयर प्रोफेसर, डॉ. आंबेडकर मानवाधिकार एवं पर्यावरणीय मूल्य पीठ, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा-151401 (पंजाब)
9818759757, hindswaraj2009@gmail.com
अपूर्वा
असिस्टेंट प्रोफेसर (इतिहास), स्कूल ऑफ़ एजुकेशन, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा-151401 (पंजाब)
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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