राग दरबारी में राष्ट्रवाद का अभिनव स्वरूप
- दीक्षा मेहरा
शोध सार : श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास ‘राग दरबारी’स्वतंत्रता के बाद भारत के सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ का व्यंग्यात्मक आख्यान है, जो राष्ट्रवाद की अवधारणा को उसके व्यवहारिक रूप में उजागर करता है। उपन्यास यह दिखाता है कि किस प्रकार आदर्शों पर आधारित राष्ट्रवाद स्वाधीनता के बाद धीरे-धीरे प्रशासनिक औपचारिकता और राजनीतिक स्वार्थ का उपकरण बनता गया। ‘राग दरबारी’ में राष्ट्रवाद का जो स्वर उभरता है, वह न तो राष्ट्रभक्ति का उन्माद है, न ही अंध निष्ठा, बल्कि सामाजिक आत्मालोचना, व्यंग्य और नैतिक विवेक का अभिनव रूप है। उपन्यास राष्ट्रवाद को नारे या उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि आत्मालोचन और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है। उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय समाज में जहाँ राष्ट्र के आदर्श धीरे-धीरे सत्ता, भ्रष्टाचार और आडंबर में ढलते जाते हैं, वहाँ शुक्ल व्यंग्य को राष्ट्र की आत्मा की शुद्धि का साधन बनाते हैं। शिवपालगंज, भारत का एक सूक्ष्म प्रतीक है- जहाँ राजनीतिक संस्थान, शैक्षणिक ढाँचे और सामाजिक मूल्य राष्ट्र की दिशा और दशा का रूपक बन जाते हैं। शुक्ल के लिए सच्चा राष्ट्रवाद सत्ता के प्रति अंधविश्वास नहीं, बल्कि सामाजिक विवेक और नैतिक आत्मानुशासन का आग्रह है। स्वतंत्रता के पश्चात् राष्ट्रवाद की अवधारणा भी बदल गई। समस्त भारतीय जनमानस जिसने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी, स्वतंत्रता को लेकर उनकी अलग-अलग अपेक्षाएँ थी, स्वतंत्रता के पश्चात् जो परिस्थितियाँ भारतीय समाज में उभरी वह उन अपेक्षाओं से बिल्कुल भिन्न थी। सत्ता वर्ग में भ्रष्टाचार, लोलुपता, स्वार्थ आदि भावनाएँ बलवती होती गईं और आम जनता का समाज और राजनीति से मोहभंग का दौर शुरू हुआ। श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास 'राग दरबारी' में व्यंगात्मक ढ़ग से स्वतंत्रता के बाद की परिस्थितियों को सफलता से उजागर किया गया है। जिसमें राष्ट्रवाद का अभिनव स्वरूप दिखाई देता है।
बीज शब्द : राष्ट्रवाद, व्यंग्य, उत्तर–औपनिवेशिकता, शिवपालगंज, सामाजिक चेतना, लोकतंत्र, भ्रष्टाचार, जातिवाद, आधुनिकीकरण
मूल आलेख : स्वाधीनता के बाद भारतीय समाज जिस तीव्र परिवर्तन से गुज़रा, उसने राष्ट्र की अवधारणा को वैचारिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर चुनौती दी। आज़ादी का सपना जब प्रशासनिक और राजनीतिक स्वार्थों में सिमटने लगा, तब साहित्य ने उस परिवर्तन का साक्ष्य और आलोचना दोनों का कार्य किया। राग दरबारी (1968) इस संक्रमण काल की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में है। यह केवल ग्रामीण यथार्थ का उपन्यास नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की नैतिक आत्मा का गहन परीक्षण है। श्रीलाल शुक्ल ने इस रचना में राष्ट्र की विफलताओं को उजागर करते हुए ‘राष्ट्रप्रेम’ की परिभाषा को नये सिरे से निर्मित किया है- जिसमें आलोचना भी देशभक्ति का ही रूप है। हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली में डॉ. अमरनाथ राष्ट्रवाद को परिभाषित करते हैं-“राष्ट्रीय भावना मनुष्य के राजनीतिक जीवन को सदा से ही प्रभावित करती रही है। राज्य के जनपदीय स्वरूप से लेकर वर्तमान राष्ट्रीय राज्य तक यह भावना सदैव किसी न किसी रूप में राजनीतिक संगठनों के निर्माण को प्रभावित करती रही है। परंतु राष्ट्रीयता का वर्तमान स्वरूप, जिसे हम ‘राष्ट्रवाद’ कहते हैं, आधुनिक काल की देन है।”1 भारत में राष्ट्रीय भावना का पुरजोर उदय अंग्रेज़ों से शासन काल से हुआ। अंग्रेज़ों के शासन काल में जब सम्पूर्ण देश की प्रजा ने एक समान यातना का अनुभव किया, तब उन्हें यह प्रतीत हुआ कि वे सब मिलकर एक हैं, चाहे वे किसी जाति, संप्रदाय या धर्म के हों, अँग्रेज़ों के गुलाम हैं और गुलामी से उन्हें एकजुट होकर लड़ना और स्वतंत्र होना है। इस प्रकार एकता के अर्थ में भारतीय राष्ट्रवाद का उदय आधुनिक काल में ही हुआ। आधुनिक काल में राष्ट्रवाद का जो स्वरूप उभरा और विकसित हुआ, उसके मुख्यतः तीन आधार माने जा सकते हैं- पहला अंग्रेज़ी शासन द्वारा उत्पन्न यातना से मुक्ति दूसरा स्वाधीन भारत का निर्माण एवं उसकी रक्षा, तीसरा जनसामान्य के जीवन में विकास तथा उनकी विभिन्न समस्याओं का निराकरण। इन्हीं आधारों पर देश के कोने-कोने में स्वाधीनता की लड़ाई लड़ी गयी। कहना न होगा कि स्वाधीनता-प्राप्ति तक प्रथम दो आधार बहुत प्रबल रहे, किंतु स्वाधीनता-प्राप्ति के पश्चात् तीसरे आधार की ही सार्थकता शेष रह गई।
वर्तमान समस्याओं और प्रश्नों के संदर्भ में जब हम समाज को देखते हैं तो स्वाधीनता का उद्देश्य केवल लोक-कल्याणकारी गणराज्य की संकल्पना नहीं था, उस विकास को अंतिम जन तक पहुँचाने के लिए भी कृतसंकल्प होना था। कहीं-न-कहीं वह अंतिम जन किसी शहर में नहीं अपितु अंचल के दूरस्थ कोने में ही था। आजादी के बाद के दौर में गाँव व कस्बे विकास की धारा के बहाव में आने की कोशिश तो करने लगे किन्तु चंद पूँजीपतियों और सत्ताधारियों के हाथ की कठपुतली बनकर विकास की धारा के रोड़े बनते चले गये। हजारी प्रसाद द्विवेदी अपने निबन्धों में प्राचीन भारतीय संस्कृति के उदात्त स्वरूप और उसके वर्तमान स्वरूप पर लिखते हैं, “राष्ट्रीयता का एक पक्ष वहाँ दिखाई देता है, जहाँ रचनाकार अपनी रचनाओं में वर्तमान के प्रति चिंता व्यक्त करता है, देश की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करता है, इन स्थितियों में सुधार की कामना करता है, जनता का आह्वान करता है और स्वयं सक्रियता पूर्वक भाग भी लेता है।”2
भारतीय राष्ट्रवाद का विकास स्वतंत्रता-पूर्व संघर्षों से लेकर स्वतंत्रता-उत्तर समाज की विडंबनाओं तक एक लंबी वैचारिक यात्रा का परिणाम है। औपनिवेशिक काल में राष्ट्रवाद एक प्रेरक शक्ति था- गांधी, नेहरू, सुभाष और टैगोर जैसे विचारकों ने इसे त्याग, नैतिकता और समरसता के आदर्शों से जोड़ा। किंतु स्वतंत्रता के बाद यही राष्ट्रवाद प्रशासनिक योजनाओं, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सत्ता की भाषा में सीमित होता गया। ‘राग दरबारी’ इस संक्रमण का तीखा दस्तावेज़ है। यहाँ राष्ट्रवाद किसी आदर्शीकृत प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहारिक राजनीति के रूप में प्रकट होता है। शुक्ल ने दिखाया कि कैसे सत्ता-प्राप्त वर्ग राष्ट्र के नाम पर भ्रष्टाचार, अवसरवाद और वैचारिक पतन को संस्थागत रूप देता है। इस संदर्भ में वैद्यजी का चरित्र अत्यंत प्रतीकात्मक है- वे राष्ट्र की उन ताकतों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो ‘देशसेवा’ के नाम पर सत्ता को स्थायी बनाए रखना चाहती हैं, “वैद्यजी शिवपालगंज की राजनीति के आधार स्तम्भ हैं जिनको सर्दी लगने पर सम्पूर्ण गाँव को छींक रोग हो जाता है।”3
उत्तर–औपनिवेशिक अध्ययन के दृष्टिकोण से देखें तो शुक्ल राष्ट्रवाद की उस विडंबना की ओर इशारा करते हैं जहाँ ‘स्वतंत्र भारत’ भी औपनिवेशिक मनोवृत्तियों से मुक्त नहीं हो पाया। नौकरशाही, शैक्षणिक संस्थान और स्थानीय राजनीति में वही पदानुक्रम और अधीनता कायम रही। इसीलिए उनका राष्ट्रवाद नारे या किसी आदर्श के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक परीक्षण की प्रक्रिया के रूप में सामने आता है। वह पाठक से यह प्रश्न पूछता है- क्या स्वतंत्रता केवल सत्ता-परिवर्तन थी या कोई नैतिक जागरण भी हुआ? श्रीलाल शुक्ल के दौर में समकालीन साहित्य सामाजिक सक्रियता की ओर बढ़ रहा था। परिवर्तन की अदम्य चाह में समकालीन साहित्यकार अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति से नई भूमिका प्रस्तुत कर रहे थे। यह दौर मनुष्य के अमानवीकरण की तीव्र गति का साक्षी हैं जहाँ वैचारिक दृष्टि से समाजवाद का स्वप्न ध्वस्त हुआ है और यांत्रिक सभ्यता का कहर विद्यमान है। साहित्यकार अब न केवल आक्रोश व्यक्त करता है, बल्कि एक बेहतर सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था की तलाश भी करता है। साहित्य का सरोकार मूलतः शाश्वत मूल्यों, विवेक, भावना और चेतना से रहा है। राष्ट्रवाद का अगर कोई अर्थ साहित्य के संदर्भ में हैं तो यह है कि वह राष्ट्र के लोगों में ऐसी चेतना पैदा करें, जो समानता, सहिष्णुता और शांति की दिशा में समाज और राष्ट्र को आगे ले जाने में सहायक हो। इसी दृष्टिकोण पर शुल्क जी के उपन्यास ‘राग दरबारी’ की रचना हुई है। ‘शिवपालगंज’ गाँव पर केंद्रित यह उपन्यास रोचक एवं कटु राजनीतिक प्रश्नों को उठता है तथा व्यंग्य के माध्यम से गाँव के विद्रूप विकास को उजागर भी करता है, “राग दरबारी का सम्बन्ध एक बड़े नगर से कुछ दूर बसे हुए गाँव की जिन्दगी से है जो पिछले बीस वर्षों की प्रगति और विकास के नारों के बावजूद निहित स्वार्थों और अनेक अवांछनीय तत्वों के आघातों के सामने घिसट रही है। यह उसी जिन्दगी का दस्तावेज है।”4
उत्तर–औपनिवेशिक समाज में सत्ता और जनता का रिश्ता जटिल होता गया। औपनिवेशिक प्रशासन की जगह देसी सत्ता-संरचना ने ले ली, लेकिन दृष्टिकोण वही रहा। जनता से दूरी, नैतिकता का अभाव और व्यवस्था पर नियंत्रण। ‘राग दरबारी’ में वस्तुतः शिवपालगंज के माध्यम से उपन्यासकार भारतीय समाज के देहातीपन की पहचान को नए तरीके से प्रस्तुत करते हैं - “मुझे तो लगता है दादा सारे मुल्क में यह शिवपालगंज ही फैला हुआ है।”5 जो स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् अपनी विकास की व्यथा पर रोता है, यहाँ विकास के लिए जरूरी कार्यक्रम और अनुदान जमीनी स्तर पर वर्चस्व और सम्पन्नता वाले लोगों के हाथ की कठपुतली हैं, ग्रामीण सत्ता अब भी उच्च जाति के लोगों के हाथ में केंद्रित है, हर तरफ भ्रष्टाचार, कदाचार, मूल्यहीनता, जातिवाद, भाई-भतिजावाद, लूट-खसोट, चाटुकारिता विद्यमान है - “‘चमरही’ गांव के एक मुहल्ले का नाम था जिसमें चमार रहते थे. चमार एक जाति का नाम था जिसे अछुत माना जाता था. अछूत एक प्रकार के दुपाये का नाम है जिसे लोग संविधान लागु होने से पहले छुते नहीं थे. संविधान एक कविता का नाम है जिसके अनुच्छेद १७ में छुआछुत खत्म कर दी गई है क्योंकि इस देश के लोग कविता के सहारे नहीं, बल्कि धर्म के सहारे रहते हैं और क्योंकि छुआछुत इस देश के लोगों का धर्म है, इसलिये शिवपाल गंज में भी दूसरे गांवों की तरह अछुतों के अलग अलग मुहल्ले थे और उनमें सबमें प्रमुख मुहल्ला चमरही था…।”6 यहाँ शिक्षा-प्रणाली में आदर्शों का स्थान छल ने ले लिया है, और राजनीति ‘जनसेवा’ के मुखौटे में स्वार्थ का उत्सव बन गई है। रंगनाथ, जो शहर से गाँव आता है, बाहरी दृष्टा की भूमिका निभाता है; उसकी आँखों से हम देखते हैं कि राष्ट्र की आत्मा अब भाषणों में नहीं, बल्कि सामाजिक जड़ता में कैद है-“बुढ़ापा। वैद्यजी के लिए इस शब्द का इस्तेमाल तो सिर्फ अरिथमेटिक की मजबूती के कारण करना पड़ा क्योंकि गिनती में उनकी उमर बासठ साल हो गई थी। पर राजधानियों में रहकर देश-सेवा करनेवाले सैकड़ों महापुरुषों की तरह वे भी उमर के बावजूद बूढ़े नहीं हुए थे और उन्हीं महापुरुषों की तरह वैद्यजी की यह प्रतिज्ञा थी कि हम बूढ़े तभी होंगे जब कि मर जाएँगे और जब तक लोग हमें यकीन न दिला देंगे कि तुम मर गए हो, तब तक अपने को जीवित ही समझेंगे और देश-सेवा करते रहेंगे। हर बड़े राजनीतिज्ञ की तरह वे राजनीति से नफ़रत करते थे और राजनीतिज्ञों का मज़ाक उड़ाते थे। गाँधी की तरह अपनी राजनीतिक पार्टी में उन्होंने कोई पद नहीं लिया था क्योंकि वे वहाँ नये खून को प्रोत्साहित करना चाहते थे; पर कोऑपरेटिव और कॉलिज के मामलों में लोगों ने उन्हें मजबूर कर दिया था और उन्होंने मजबूर होना स्वीकार कर लिया था।”7
शुक्ल ने ग्राम्य जीवन को केवल सामाजिक अध्ययन का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा का स्थल माना। यह वही दृष्टि है जो हमें उत्तर–औपनिवेशिक सिद्धांतकारों जैसे फ़्रांत्ज़ फ़ैनन और अशिस नंदी के विचारों में मिलती है कि औपनिवेशिकता केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक अवस्था भी होती है - “यह वह दौर है जब सूचना क्रान्ति ने सदियों पुराने भारतीय समाज के ताने-बाने को तहस-नहस किया। बाजारवाद का प्रभुत्व कायम होने लगा, मानवीय सम्बन्धों के मान बदलने लगे, जीवन की बुनियादी प्रवृत्तियों में भी तेजी से बदलाव आया। राजनीति भी बदली, उसके भी मान-मूल्य बदले, जनता के प्रति उसकी पक्षधरता में कमी आयी। साम्प्रदायिकता उभरी, जातियों के बीच भेद-भाव पैदा हुए। यह अनिश्चितता और अव्यवस्था का दौर है जिसमें भौतिक विकास के समानान्तर मनुष्य का जीवन बदशक्ल होता जा रहा है।”8 ‘राग दरबारी’ में यह मानसिक दासता पूरी व्यवस्था में व्याप्त है। उपन्यास का व्यंग्यात्मक स्वर उस समय की राष्ट्रवादी भाषा को चुनौती देता है, जो वास्तविकता से कटकर आदर्शों का जाल बुनती थी। शुक्ल ने दिखाया कि जब राष्ट्र अपनी आत्मलोचना की क्षमता खो देता है, तब लोकतंत्र केवल एक औपचारिकता रह जाता है - “आज राजनीति और कला में प्रतिक्रियावादी शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष में आलोचनात्मक और समाजवादी यथार्थवाद एक साथ हैं।”9 शिवपालगंज ‘राग दरबारी’ का सबसे सशक्त प्रतीक है- यह एक गाँव होते हुए भी पूरे भारतीय राष्ट्र की रूपकात्मक प्रतिध्वनि बन जाता है। इस गाँव में जो घटित होता है, वह वस्तुतः भारत की लोकतांत्रिक यात्रा की समीक्षा है। वैद्यजी, पंचायत, कॉलेज, और प्रशासन सब एक ऐसे तंत्र का निर्माण करते हैं जो स्वार्थ, जातिवाद और सत्ता-संतुलन पर टिका है - “क्योंकि इस कॉलिज की स्थापना राष्ट्र के हित में हुई थी, इसलिए उसमें और कुछ हो या नहीं, गुटबन्दी काफ़ी थी। वैसे गुटवन्दी जिस मात्रा में थी, उसे बहुत बढ़िया नहीं कहा जा सकता था; पर जितने कम समय में वह विकसित हुई, उसे देखकर लगता था, काफी अच्छा काम हुआ है। वह दो-तीन साल ही में पड़ोस के कॉलिजों की गुटबन्दी की अपेक्षा ज़्यादा ठोस दिखने लगी थी। बल्कि कुछ मामलों में तो वह अखिल भारतीय संस्थाओं तक का मुकाबला करने लगी थी।”10 शिक्षा जो राष्ट्र की आत्मा कही जाती है, यहाँ भ्रष्टाचार और नौकरशाही की शिकार है। कॉलेज का प्रधानाचार्य व्यवस्था की निष्ठुरता का उदाहरण है; वह विद्यार्थियों में प्रश्न पूछने की बजाय अनुशासन के नाम पर चुप्पी सिखाता है। यह वही राष्ट्र है जो आलोचना से डरता है।
शिवपालगंज का भौगोलिक संकुचन वास्तव में भारत के सामाजिक विस्तार का प्रतीक है। इस छोटे से गाँव में जो सत्तात्मक संबंध हैं- वे दिल्ली, लखनऊ या किसी भी सत्ता-केंद्र में दिखाई देते हैं। इसीलिए आलोचक कहते हैं कि ‘राग दरबारी’ किसी एक क्षेत्र का नहीं, बल्कि पूरे भारत का यथार्थ है। यहाँ शिवपालगंज एक कस्बाई गाँव है, जो शहर से कुछ दूरी पर रोड एवं रेल द्वारा सीधे संपर्क में है। यहाँ एक तहसील का मुख्यालय है जहाँ थोड़े बहुत सरकारी दफ़्तर भी हैं। यह एक बदला हुआ भारतीय गाँव है। यह ‘गोदान’ के गाँव की तरह नहीं है, जिसमें गाँव और शहर दो अलग-अलग दुनिया हैं। यह वह गाँव है जो देश की स्वतंत्रता के बीस साल बाद का है, जहाँ विकास की हवा कुछ हद तक पहुँची है, जहाँ एक इण्टर कॉलेज है, कोओपरेटिव यूनियन है, विकास खंड का दफ़्तर है, ताड़ीघर है, थाना है, पर फिर भी यह एक गाँव है जो शहर के सीधे संपर्क में है। यह अविकसित एवं विकासशील देशों में नगरीकरण की उस प्रक्रिया का हिस्सा है जहाँ शहर गाँव की तरह और गाँव शहर की तरह लगते हैं। इस उपन्यास के प्रथम पृष्ठ में ही स्टेशन से कुछ दूर चलकर आने वाले शहर के किनारे की दुकानों, उनमें पाए जाने वाले पकवानों, पेयों, कूड़े को स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों में बदल देने की तरकीबों, यातायात के साधन के रूप में सड़क पर पाए जाने वाले ट्रक के खड़े होने के तरीके और चालू फैशन के प्रति आमजन के लगाव, पुलिस की यातायात नियमों को पालन करने की चुस्ती इत्यादि दिखाई देती है - “श्रीलाल शुक्ल की की अंतरभेदी दृष्टि अपने समय में पनप रही और आज बड़े पैमाने पर फल-फूल रही पतनशील राजनीतिक संस्कृति की प्रतीति को भेदकर सार (विकृति) को रेखांकित करती है।”11
शुक्ल ने इस रूपक को केवल नकारात्मक नहीं, बल्कि चिंतनशील अर्थों में भी उपयोग किया। गाँव का यह हमें बताता है कि राष्ट्र का संकट बाहरी नहीं, भीतरी है। जब नागरिक अपने विवेक और उत्तरदायित्व से विमुख हो जाते हैं, तब राष्ट्रवाद केवल एक भावनात्मक उद्घोष बनकर रह जाता है - “यदि लेखक आजादी के सवाल पर ईमानदार है, वह वास्तविक आजादी की ही तलाश में है तो उसे आजादी को संपूर्ण आयामों में पहचानना होगा, संघर्षरत जनता के संघर्ष द्वारा ही उसकी कामना करनी होगी। लेकिन यह कोई ऐसी चीज भी नहीं कि मात्र इच्छा से या शुभाशंसा से प्राप्त हो जाए। इसके लिए सक्रिय कार्रवाई की आवश्यकता है। कि दासता के सिद्धांत पर आधारित इस व्यवस्था का बुनियादी चरित्र क्या है, उसे तोड़ सकने वाली शक्तियां कौन सी हैं, उन शक्तियों को मैं कहां तक और किस तरह योग दे सकता हूं, कि उनकी स्वतंत्रता के प्रयास ही मेरी स्वतंत्रता के प्रयास भी है, उनकी जीत ही उसकी गारंटी भी है। यही वास्तविक मुक्ति भी है।”12
श्रीलाल शुक्ल के यहाँ व्यंग्य केवल शैलीगत उपकरण नहीं, बल्कि एक वैचारिक औजार है। व्यंग्य उनके लिए राष्ट्र की आत्मा की शुद्धि का माध्यम है। वे किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि व्यवस्था की मानसिकता पर हँसते हैं, यह हँसी केवल मनोरंजन नहीं, आत्मबोध का द्वार है जो आज के दौर में अत्यंत प्रासंगिक है - “गाँवों की राजनीति का जो स्वरूप यहाँ चित्रित हुआ है, वह आज के राष्ट्रव्यापी और मुख्यतः मध्यम और उच्च वर्गों के भ्रष्टाचार और तिकड़म को देखते हुए बहुत अदना जान पड़ता है और लगता है कि लेखक अपनी शक्ति कुछ गँवारों के ऊपर ज़ाया कर रहा है। पर जैसे-जैसे उच्चस्तरीय वर्ग में गबन, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार और वंशवाद अपनी जड़ें मज़बूत करता जाता है, वैसे-वैसे आज से चालीस वर्ष पहले का यह उपन्यास और ज़्यादा प्रासंगिक होता जा रहा है।”13
राष्ट्रवाद की पारंपरिक व्याख्याएँ जहाँ गौरव, बलिदान और एकता पर केंद्रित हैं, शुक्ल वहाँ विडंबना, विरोधाभास और अपूर्णता को उजागर करते हैं। उनके अनुसार, राष्ट्र का अस्तित्व तभी सार्थक है जब वह स्वयं की कमज़ोरियों पर हँस सके। यही कारण है कि ‘राग दरबारी’ में व्यंग्य की हर पंक्ति आलोचना का ही दूसरा रूप है। उपन्यास की भाषा ‘लोक’ और ‘शास्त्र’ के बीच का सेतु है- यहाँ परिहास में दर्शन है, और हास्य में विवेक। वैद्यजी जैसे पात्र हमें यह सिखाते हैं कि व्यवस्था कैसे व्यक्ति की नैतिकता को निगल जाती है - "मुक़दमे के लिए एक पुराने फैसले की नकल चाहिए। उसके लिए पहले तहसील में दरख्वास्त दी थी। दरख्वास्त में कुछ कमी रह गई, इसलिए वह खारिज हो गई। इस पर इसने दूसरी दरख्वास्त दी। कुछ दिन हुए, यह तहसील में नकल लेने गया। नकलनवीस चिड़ीमार निकला, उसने पाँच रुपये माँगे। लंगड़ बोला कि रेट दो रुपये का है। इसी पर बहस हो गई। दो-चार वकील वहाँ खड़े थे; उन्होंने पहले नक़लनवीस सेकहा कि, भाई दो रुपये में ही मान जाओ, यह बेचारा लंगड़ा है। नकल लेकर तुम्हारे गुण गायेगा। पर वह अपनी बात से बाल-बराबर भी नहीं खिसका। एकदम से मर्द बन गया और बोला कि मर्द की बात एक होती है। जो कह दिया, वही लूँगा”14
‘राग दरबारी’ उत्तर भारत के समाज की उस चेतना को सामने लाता है जो सामंतवाद, जातीय वर्चस्व और राजनीतिक स्वार्थों के बीच संघर्षरत है। उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्र स्वतंत्रता के बाद भी सामंती मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए- “दरबारी औपनिवेशिक और सामंती मानसिकता तथा व्यवस्था के खिलाफ शंखनाद है।”15 वहीं से राष्ट्र की नैतिक दिशा प्रभावित होती है। शुक्ल ने इस यथार्थ को किसी निराशा के रूप में नहीं, बल्कि परिवर्तन की संभावना के रूप में देखा। उनके पात्रों में हँसी, चालाकी और भ्रम है पर साथ ही आत्मसमीक्षा की झलक भी। यही द्वंद्व आधुनिक भारत की आत्मा का हिस्सा है।
निष्कर्ष : राग दरबारी में राष्ट्रवाद किसी वैचारिक घोषणापत्र का नाम नहीं, बल्कि समाज की नैतिक अंतःचेतना का पुनर्पाठ है। शुक्ल ने राष्ट्र के भीतर व्याप्त विडंबनाओं को उजागर करते हुए यह दिखाया कि सच्चा राष्ट्रवाद सत्ता की प्रशंसा में नहीं, बल्कि उसकी समीक्षा में निहित है। स्वाधीनता के बाद से आज तक, भारत में बदलते राजनीतिक स्वरूपों के बीच राग दरबारी वह कृति है जो हमें बार-बार राष्ट्र की आत्मा में झाँकने का साहस देती है। राष्ट्रवाद का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों से कुरूप हुआ है राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि में यह कुरूपता भय, भूख और भ्रष्टाचार है। किसान आत्महत्या, मजदूरों का शोषण आदि भी समाज की मुख्य धारा में शामिल हैं। वर्तमान समय में इन समस्याओं को उजागर करने वाला साहित्य ही राष्ट्रवादी परम्परा का साहित्य है। जिसमें स्वतन्त्र होकर भी व्यक्ति परतन्त्र है।
संदर्भ :
1. डॉ. अमरनाथ, हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2013, पृष्ठ सं- 301
2.https://www.rachanakar.org/2016/12/blog-post_11.html?utm_source=chatgpt.com&m=1 वर्तमान साहित्य में राष्ट्रीयता के सन्दर्भ / सुशील कुमार शर्मा
3. श्रीलाल शुक्ल, राग दरबारी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2007, पृष्ठ सं- 51
4. डॉ. विजयचन्द, हिन्दी आलोचना एवं अनुसंधान, पृष्ठ सं-42
5. https://mediamarch.blogspot.com/2013/06/blog-post_9761.html?m=1 मोहभंग का महारूपक राग दरबारी, रविवार, 30 जून 2016, जयप्रकाश त्रिपाठी at 06:16
6. श्रीलाल शुक्ल, राग दरबारी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2007, पृष्ठ सं- 100
7. वही, पृष्ठ सं- 32
8. लक्ष्मी गौतम, उत्तरआधुनिक और समकालीन कथा साहित्य, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण-2013, पृष्ठ सं-119
9. जार्ज लूकाच, अनुवाद कर्ण सिंह चौहान, समकालीन यथार्थवाद, स्वराज प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2006, पृष्ठ सं- 98
10. श्रीलाल शुक्ल, राग दरबारी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2007, पृष्ठ सं- 76
11.https://www.hindisamay.com/content/7854/1/%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BF-%E0%A4%B0%E0%A4%82%E0%A4%9C%E0%A4%A8-%E0%A4%86%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%9A%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%97-%E0%A4%A6%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%AF%E0%A4%A5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7-%E0%A4%96%E0%A4%A1%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4-%E0%A4%AC%E0%A4%A4%E0%A4%B0%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%BE.cspx रवि रंजन, राग दरबारी : यथास्थितिवाद के विरुद्ध खड्गहस्त बतरस की कला
12. कर्ण सिंह चौहान, साहित्य के बुनियादी सरोकार, स्वराज प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण-2000, पृष्ठ सं- 80
13. श्रीलाल शुक्ल, राग दरबारी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2007, पृष्ठ सं- 5-6
14. वही, पृष्ठ सं- 16-17
15. https://mediamarch.blogspot.com/2013/06/blog-post_9761.html?m=1 रविवार, 30 जून 2016, जयप्रकाश त्रिपाठी at 06:16
दीक्षा मेहरा
असिस्टेंट प्रोफेसर (अतिथि व्याख्याता), हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषा विभाग, डी. एस. बी. परिसर, कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल, उत्तराखंड
dikshamehra@kunainital.ac.in, 9759739015
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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