कविताएँ
- गीता प्रजापति
(1)
मेरी माँ किसान की बेटी है
उस किसान की नहीं
जो खेत में अन्न की जगह जहर उपजाता है
नाना की किसान वाली छवि आज भी ज्यों की त्यों है
भोर में बैल को हाँकते हुए
गमछा सर पर कसे हुए
हल की मूठ पकड़े
वे अपने क्षेत्र के राजा से लगते
जो अपनी फसलों को पुत्रवत सींचते थे
नानी के हाथ से बना खाँड का रस
और पीतल के लोटे से पानी पीकर
वे हरियर हो जाते थे
जैसे धरती ने उनको बस इसी काम के लिए जन्मा था
माँ ने भी कटनी, रोपनी और बोआई की बारीकियों को
किसी किसानी किताब में नहीं
बल्कि नाना के सान्निध्य में रहकर सीखा
एक शाम माँ के साथ मैँ खेत में गई
फसल कटने को तैयार थी
माँ ने एक-एक से पूछा
क्या तुम हमारे लिए अपनी आहुति देने के लिए तैयार हो?
फसलें खरखराकर झूमने लगीं
उस दिन धरती और माँ की ध्वनि एक थे
दोनों एक दूसरे के त्याग को पहचानती थीं।
(2)
ब्याही हुई स्त्रियाँ आज भी अपना जख्म लिए वहीं खड़ी हैं
वे एक ही रात में लड़की से औरत बन गईं
अचानक से अपनी जड़ से उखड़कर
दूसरी मिट्टी में खुद को उगा लिया
जैसे उनके लिए अपनी कोई जमीन ही न हो
सोचती हूँ उन तमाम स्त्रियों के बारे में
जो कच्ची उमर में ब्याह दी गईं
वे घूँघट और काम के बीच
अपने बचपन को कैसे भूल गईं ?
उनके शरीर पर ही सारी प्रथाएं थोपी गईं
पहनाई गई उन्हें हथकड़ी जैसी चूड़ियाँ
अनचाहे रिश्तों का बोझ लिए
वे बराबर ध्यान रखती रहीं सभी के पेट का
जले हुए हाथ से उन्हें लीपने को कहा गया कई गज आँगन
फिर भी खुद को मिटाकर भी घर का हर कोना चमकाया
ओखली और ढेंकी के बीच ही पिसती रही उनकी सासें
पसीने से तर होकर भी चाकी में दरी कई मन दाल
गर्भ लिए चलनी से पानी भर कर सींचा सबका गला
लाख वज्रपात होने पर भी कभी देहरी नहीं लांघी
छुपाया कैसे होगा इतनी छोटी-सी उम्र में मिले इतने बड़े घाव ?
अपने बचपन की स्मृति में
मैंने माँ की कलाइयों से खून उतरते देखा है
शायद किसी बात की सजा खुद को दी होगी
उनके रोने को यह कहकर टाल दिया जाता
कि औरतों का जन्म होता ही है दुख सहने के लिए
इसके आगे न वो कुछ बोलती
न ही कोई उन्हें सुनने के लिए बैठा रहता
माँ की तरह सारी स्त्रियाँ बिना किसी जंग के
तमाम उम्र किसी जंग में रहीं।
(3)
अठन्नी-चवन्नी के सिक्कों को
पाते ही आँखें जुगनू की तरह चमक जाना
मौनी भर गेहूं बेचकर
बरफ से जिह्वा रंगीन कर लेना
चूरन की पुड़िया,संतरे की गोली
याद आता है अपना बेहद स्वाद भरा बचपन
लूडो की फटी हुई किताब
कलम से खींची गई पासे पर गिनतियाँ
आधी टूटी हुई डिबिया
पूरा जुड़ा हुआ मन
याद आता है अपना अल्हड़-सा बचपन
बारिश और आंधी को चीरते हुए
आम के गिरने की आहट सुनना
दौड़े हुए छिले हुए और भूले हुए घुटने
याद आता है अपना जामुन वाला बचपन
सारे मौसम से दोस्ती करना
कीचड़ से मिलना
तालाब से खेलना
धूल में लोटना औघड़ हो जाना
शीत,घाम और लू को बेफिक्री में उड़ा देना
याद आता है अपना खाली थैली वाला बचपन।
गीता प्रजापति
सहायक प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, कुँवर आर०सी० महिला महाविद्यालय,मैनपुरी।
geetabhiti@gmail.com, ७७०४८६९७८०
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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