राजस्थानी कहानी : तीसरी आँख / अनुवाद / राजपाल सिंह शेखावत

तीसरी आँख
अनुवाद- राजपाल सिंह शेखावत

मैं अभी भी रोजाना उसी गाड़ी से अप-डाउन करता हूँ। मुनीमजी, सरदारजी और मास्टरजी भी अमूमन मिल ही जाते हैं। कई बार भाभी यानी ‘वह’ भी साथ हो ही जाती है किंतु मैं उसके सामने नहीं देखता। यदि कभी आमने-सामने बैठना पड़ भी जाए या फिर चढ़ते-उतरते सामना हो जाए तो भी नज़र मिलाने से बचता हूँ। हालांकि बात पहले भी कभी नहीं हुई और अब तो कोई गुंजाइश भी नहीं बची। मुझे नहीं पता वह उसे याद करती भी है या नहीं, किंतु उसे देखते ही मेरी आँखों के सामने वह मुस्कुराता चेहरा आकर खड़ा हो जाता है। कभी-कभी तो लगता है जैसे वह अभी आएगा और व्हाट्सएप पर आया हुआ कोई नया ‘जोक’ सुनाएगा। उसकी स्मृति मात्र से मेरे अंतस में उदासी उतर आती है। कई बार तो हँसी-मजाक के बीच भी आँखों की कोर गीली हो जाती है।

कभी-कभी सोचता हूँ, वह मेरा था कौन? जाति का नहीं, गाँव का भी नहीं। केवल गाड़ी के साथ भर को टाल दिया जाए तो मेरा उससे कौनसा नाता था। मैं सरकारी नौकर और वह मोबाइल की दुकान पर काम करने वाला। उम्र का अंतराल भी पंद्रह वर्ष से ज्यादा ही होगा। मैं चालीसी चढ़ा हुआ और वह अभी कोई बाईस-तेईस का हुआ होगा। लेकिन कुछ भी कहो, चार वर्षों तक रोज़ाना साथ आने-जाने से उसके साथ एक नाता ज़रूर कायम हो गया था। उसे भाई कहूँ या दोस्त, वह कुछ ना कुछ तो अवश्य ही लगता था मेरा। क्या लगता था? यह मैं नहीं जानता। उसने भी कभी नहीं बताया। इस रिश्ते को कोई नाम नहीं दिया गया। दूसरों की तरह वह भी मुझे ‘पटवारीजी’ के नाम से ही बुलाता। मैं उसे ‘हैप्पी’ कहता। सच पूछो तो मुझे भी उसके पूरे नाम का पता उस ‘परचे’ में देखने पर ही चला। चार दिनों तक हमने वे परचे रेलगाड़ियो में चिपकाए। यात्रियों को बाँटे। फेसबुक पर पोस्ट में भी लगाए। इन दिनों में घर जाने के बाद मोबाइल को बंद करना भी छोड़ दिया है। क्या पता कब उसका फोन आ जाए। पिछले चार वर्षों से दिन का पहला फोन उसी का आता। जब गाड़ी रवाना होती, पहला एसएमएस आता- ‘मोरनी उड़ गई।' सुपरफास्ट एक्सप्रेस गाड़ी को वह ‘मोरनी’ कहता। उसका मैसेज देखते ही मैं नहाना-धोना शुरू कर देता। मेरे स्टेशन से ठीक पहले वाले स्टेशन ‘मंडी’ से गाड़ी छूटते ही वह लंबी रिंग करता। यदि मैं कॉल अटेंड कर लेता तो उसकी पतली-सी आवाज़ सुनाई देती- ‘पटवारीजी जल्दी पहुंचो।' जब गाड़ी मेरे स्टेशन पर पहुँचती तो वह खिड़की या दरवाजे से हाथ निकालकर मुझे अपने डिब्बे में बुला लेता। मुझे बिठाने के लिए वह पहले से ही अपना टिफिन या रुमाल खाली सीट पर रखकर सीट रोक कर रखता। यदि कभी सीट नहीं मिलती तो वह अपनी जगह मुझे बिठाने के लिए तैयार रहता। उसका यह स्नेह केवल मेरे लिए ही नहीं, मंडी वाले मुनीमजी, सरदारजी और मास्टरजी के लिए भी था। गाड़ी रवानगी की ख़बर से लेकर सीट के जुगाड़ तक भी उसका काम समाप्त नहीं होता, पानी की बोतल, अख़बार और समय बिताने के लिए ताश की जोड़ी के प्रबंध की जिम्मेदारी भी उसी ने ले रखी थी।

स्मृतियों के कई टुकड़े मेरे मन-मस्तिष्क पर इस भांति अंकित हैं कि जब-तब चलचित्र की भांति आँखों के सामने चलने लगते हैं।

“यार हैप्पी, बीच-बीच में तुम छुट्टी मत किया करो। जिस दिन तुम नहीं आते उस दिन हमारी गाड़ी चूक जाती है और बस में बैठने पर खामखां साठ रुपए की चपत लग जाती है।” मैं कहता।

“काम होने पर रुकना ही पड़ता है पटवारीजी। वैसे आप इस ‘एंटीक पीस’ को छोड़कर एंड्रॉयड फोन ले लीजिए, जिससे गाड़ी की लोकेशन आप ख़ुद देख सकें। ख़ूब कमाई है, क्या करेंगे इतने पैसों का?” वह हंसता हुआ कहता।

“कहाँ कमाई है हैप्पी! घर बसाआगे तब पता लग जाएगा। अकेले हो, इसलिए बातें आती हैं। तनख्वाह से नमक-तेल ही मुश्किल से आ पाते हैं।” मैं ज़वाब देता। असल में मुझे ‘की-पैड’ वाला मोबाइल चलाना आसान लगता है। मैं स्मार्टफोन रखता जरूर हूँ लेकिन नौकरी से जुड़े काम होने पर ही उसे संभालता हूँ।

“रहने दो, सरदारजी कह रहे थे, ऊपर करतार और नीचे पटवार। आपको तनख्वाह की क्या जरूरत? लोग थैलों में रुपए भरकर आपके पीछे घूमते हैं।” वह सरदारजी को भी अपनी तरफ़ मिला लेता।

“मरना है क्या? आजकल रुपयों से रंग उतरते समय नहीं लगता। हम तो जैसे-तैसे सूखी पगार से ही काम चला लेंगे।” मैं उसे कहता, परंतु वह, सरदारजी, मुनीमजी और मास्टरजी बात को खींचकर देश में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार पर गर्मागर्म बहस में बदल डालते। इस बहस में फिर मेरी सुनता भी कौन, इसलिए मैं मौन धारण करना ही उचित समझता।

मैंने न तो कभी अपना जन्मदिन मनाया और न ही कभी शादी की वर्षगाँठ मनायी। सच्चाई तो यह है कि जीवन की इस आपाधापी में इन सब बातों का ध्यान ही नहीं रहता। आधी से अधिक ज़िंदगी जमाबंदी और नक्शों के बीच ही गुजर गई। भूलने की इस आदत के कारण निजी जीवन में कई बार घमासान भी हो चुका है। किंतु पिछले चार वर्षों से लगातार मेरा जन्मदिन मनाया जा रहा है, वह भी रेलगाड़ी में। हैप्पी मेरे लिए जन्मदिन का गिफ्ट तो लाता ही, साथ ही ठंडे और नमकीन की ‘पार्टी’ भी करता है। यह केवल मेरे लिए ही नहीं, वह साथ यात्रा करने वाले सभी व्यक्तियों के सुख-दुख में शामिल होता। पराई पीड़ा बाँट लेना स्वभाव ही है उसका। मुनीमजी की बेटी की डिलीवरी बिगड़ी तो वह तुरंत अस्पताल पहुँचा और खून भी दिया। सरदार जी की भतीजी की शादी में उसने दो दिन की छुट्टी लेकर सहारा लगवाया। इतना ही नहीं, साथ वालों में से किसी के बच्चे का रिजल्ट देखना हो या कोई ऑनलाइन फॉर्म भरना हो, रेलवे की ई-टिकट बनानी हो या कंप्यूटर-मोबाइल सुधारना हो, इन सभी समस्याओं का एक ही इलाज था- हैप्पी। उसको काम कहने का मतलब था, आप निश्चिंत हो गए। सच में, रोज़ाना एक-सवा घंटे की यात्रा में उसने कितने रिश्ते कमा लिए।

लेकिन एक रिश्ता जो ताश के पत्ते फैंटते समय हमने जबरदस्ती स्थापित किया, आज हमारे पैरों की जंजीर बनकर हमें ही उलझा रहा है। वह रोज़ मंडी से गाड़ी में सवार होकर शहर जातीं। रूप-रंग की सुंदर और उम्र हैप्पी के आसपास ही। शायद वह किसी जगह नौकरी करती होगी क्योंकि रविवार और अन्य छुट्टी वाले दिन वह नहीं दिखतीं। मैं उसका नाम नहीं जानता। शायद वह भी नहीं जानता होगा। बावजूद इसके, मैंने और मुनीमजी ने मन ही मन उन दोनों की जोड़ी बना दी।

‘यार हैप्पी यह तो तुम्हें ही आँखें फाड़-फाड़ कर देखती रहती है’ या ‘यह तुम्हारे लिए ही रोज बन-संवरकर आती है’ ऐसी बातों से उसे छेड़ते। वह मुस्कुराकर कहता, ‘सुधर जाओ डोकरों, टाबर को मत बिगाड़ो।’ उसको हमने कभी उससे बात करते नहीं देखा। फिर भी हम एकदम बचपने पर उतर जाते, “कल तुम आए नहीं तो यह पूरे डब्बे में तुम्हें ढूँढती फिर रही थीं।” जिस दिन वह नहीं आती तो हम पूछते, “भाभी कैसे नहीं आई आज?”

पिछले एक महीने से छुट्टी को छोड़कर मैं रोज़ उसी रेलगाड़ी से जाता हूँ। भाभी यानी ‘वह’ भी रोज़ आती है, किंतु हैप्पी नहीं आता। पता नहीं अचानक कहाँ चला गया? क्यों चला गया? कौन ले गया? एक दिन सुबह गया तो हमारे साथ ही था लेकिन शाम को वापस नहीं लौटा। अगले दिन भी कोई फोन या मैसेज नहीं आया। दोपहर को उसके छोटे भाई का फोन आया, ‘अंकल जी, हैप्पी की कोई सूचना है क्या आपके पास? वह कल सुबह से ही गायब है।’

उसके घरवालों ने हैप्पी को ढूंढने में दिन-रात एक कर दिए लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला।

आज मैंने हिम्मत जुटाकर उसकी तरफ़ देखा। वह हमेशा की तरह सजी-संवरी थीं और आँखें बंद करके ईयर फोन पर कुछ सुनने में मग्न थीं।

मेरे कलेजे में एक हूक-सी उठी, क्या इंतज़ार की कोई तीसरी आंख भी होती है!
 
मूल लेखक -
डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
(राजस्थानी के चर्चित कवि-कहानीकार। आलोचना और अनुवाद में भी सक्रिय। हिंदी में साधिकार लेखन। विभिन्न विधाओं में एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित। साहित्य अकादेमी अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित।)
पता- 144, लढ़ा निवास, महाजन-334604, जिला- बीकानेर (राजस्थान)

अनुवादक -
राजपाल सिंह शेखावत
जन्म- 01 जनवरी 1986 को गांव- टाटनवां, जिला- सीकर (राज.) में।
शिक्षा- एम.ए. (हिंदी, पत्रकारिता एवं जनसंचार, राजस्थानी), पी.एच.डी. (हिंदी)
रचना कर्मः- वागर्थ, पाखी, कथादेश, शेष, समकालीन भारतीय साहित्य, मधुमती, प्रसंगम, जागती-जोत, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर आदि पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, लघुकथाएँ, डायरी अंश, अनुवाद व लेख आदि प्रकाशित।
पुरस्कारः- राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा ‘चन्द्रदेव शर्मा पुरस्कार’ तथा राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर द्वारा ‘भत्तमाल जोशी पुरस्कार’।
संप्रति- श्री कल्याण राजकीय कन्या महाविद्यालय, सीकर में सहायक आचार्य के रूप में कार्यरत।
पता- गांव पोस्ट- टाटनवां, जिला- सीकर (राजस्थान) पिन- 332042
9772098960,  rajpalanant@gmail.com

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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