राधाकृष्ण का रूपान्तर उपन्यास : आध्यात्मिक व मानवीय-मूल्यबोध
- प्रमोद कुमार
शोध सार : मनीषियों द्वारा भारतीय चिंतन में आध्यात्मिकता को प्रधानता दी गई है। धर्म की रक्षा में अध्यात्म का काफी महत्त्व होता है। चार पुरुषार्थ में से अंतिम पुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति हेतु प्रक्रिया का नाम ही आध्यात्मिकता है। यह आध्यात्मिक दृष्टि भारतीय संस्कृति की मूलभूत मान्यता है, जिसका स्वर भक्ति आंदोलन में मुखरित हुआ है। भारतीय वाङ्मय में अद्वैत की धारणा विद्यमान है। इससे अध्यात्मिकता में एकात्मक का भाव जागृत होता है। समाज में भले ब्रह्म के अनेक नाम, अवतार व देवी-देवताओं के माध्यम से आख्यान किया गया है, परंतु इस विविधता और विषमता में एकता का जो सूत्रपात हुआ है वह ब्रह्म को मूलतः सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक स्वीकार किया है। सर्वमान्य है कि हिंदी कथा साहित्य को प्रेमचंद ने एक नयी ऊर्जा प्रदान की। वे हिंदी के सर्वोत्कृष्ट उपन्यासकार माने जाते हैं। राधाकृष्ण ने भी प्रेमचंद के मार्ग पर चलकर हिंदी उपन्यास साहित्य में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रेमचंद के समान राधाकृष्ण भी संघर्षपूर्ण जीवन जीते हुए अपने समाज के लोगों की पीड़ा का अनुभव करते हैं। तभी तो इनके उपन्यासों में प्रेम, त्याग, सहानुभूति, मानवता जैसे मूल्यों की अभिव्यक्ति हुई है। इनका ‘रूपान्तर’ उपन्यास आध्यात्मिकता और मानवीय मूल्यों की एक व्यापक, गहन तथा उदात्त साधना का सशक्त प्रतिबिंब है।
बीज शब्द : राधाकृष्ण, रूपान्तर, आध्यात्मिकता, मानवीय मूल्य, श्रेय-प्रेय, मानवतावाद, लोककल्याण, योग-भोग, सामाजिक मूल्य, दर्शन, कर्मयोग, गृहस्थाश्रम, संन्यास।
मूल आलेख : स्मरणीय है कि राधाकृष्ण का जन्म 18 सितंबर, 1910 ई. को झारखंड के राँची में हुआ तथा उनका निधन 3 फरवरी, 1979 ई. को हुआ। अपने 69 वर्ष के जीवनकाल में उन्होंने अधिकांश समय साहित्य सृजन को समर्पित किया। वे 1929 ई. से मृत्युपर्यंत निरंतर रचनारत रहे और कहानी, उपन्यास, हास्य-व्यंग्य, निबंध, संस्मरण, नाटक एवं गद्यगीत जैसी विविध विधाओं के माध्यम से हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनकी यह सृजनात्मक ऊर्जा उन्हें प्रेमचंद की परंपरा से प्राप्त हुई थी, और वे भी उनकी तरह उदार हृदय के साहित्यकार थे। उन्होंने मात्र 16 वर्ष की आयु से ही साहित्यिक क्षेत्र में सक्रियता दिखानी शुरू कर दी थी। उनके उपन्यासों में युगीन समस्याओं का सजीव चित्रण तथा गहन चिंतन का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
राधाकृष्ण ने अपने उपन्यासों में जिस यथार्थ को चित्रित किया है, वह निकटता उनके जीवन की स्वानुभूति है। उनकी सर्जक प्रतिभा इस बात पर अवश्य निर्भर करती है कि जिस लेखक ने अपनी छवि एक यथार्थवादी कथाकार या फिर एक हास्य-व्यंग्यकार के रूप में बना चुका होता है वही कालांतर में स्वयं अपनी इस पुरानी छवि को तोड़कर 'रूपान्तर' जैसा सर्वश्रेष्ठ उपन्यास की रचना करता है जो अन्य के लिए अत्यंत दुष्कर है। श्रवणकुमार गोस्वामी राधाकृष्ण को एक जटिल उपन्यासकार मानते हुए कहते हैं— "उपन्यासकार के रूप में राधाकृष्ण मुझे एक 'जटिल' उपन्यासकार लगते हैं। 'जटिल' इस अर्थ में कि कभी वह वर्तमान की समस्याओं एवं विसंगतियों से टकराते हुए दिखते हैं, तो कभी वह वर्तमान की तरफ से पूरी तरह मुँह फेरकर कल्पनालोक में विचरण करते हुए दिखाई देते हैं। मजे की बात यह होती है कि समकालीन जीवन के यथार्थ का भूत उनके पीछे-पीछे कल्पनालोक में भी जा पहुँचता है।"1 राधाकृष्ण के उपन्यासों में यह जटिलता निश्चित ही इनके बचपन की साहित्यिक प्रेरणा व जीवन शैली का प्रतिफल है। वे बचपन से ही विभिन्न साहित्यिक गोष्ठियों में शामिल होने लगे थे। गोष्ठियों के लिए वे अवसर की खोज में रहते थे। उनका राँची स्थित आवास साहित्यकारों के लिए तीर्थस्थल के समान था। चाहे गोष्ठी हो या मित्र मंडली, वे अपने हास्य-व्यंग्य की फुलझड़ी से सभी को मुग्ध कर देते थे। प्रसिद्ध साहित्यकारों से वार्तालाप, सलाह, मार्गदर्शन जैसे गुण इनकी सृजनशीलता को और भी निखारता गया। इस कौशलता से ही वे एक सफल संपादक व पत्रकार बने थे। उन्होंने अपनी सर्जन शक्ति को निष्ठा पूर्वक साहित्य में उतारा है। उनकी इस प्रतिभा से नवोदित साहित्यकारों की सर्जनशक्ति को भी काफी प्रोत्साहन मिला। पं० छविनाथ पाण्डेय के अनुसार, "उस अंचल के साहित्यिकों पर राधाकृष्ण का ऋण है। उनसे प्रायः साहित्यकारों को प्रेरणा मिली है।"2
निश्चित रूप से उपन्यास जीवन-चित्रण के महाकाव्यात्मक गरिमा का उद्घोषक होता है। इसलिये उपन्यासकार को चाहिये कि वे अपनी श्रेष्ठ कृति से जीवन के श्रेष्ठ मार्ग का निर्माण करें, इसी में उसकी सार्थकता है। इस दृष्टि से राधाकृष्ण एक विशिष्ट व सफल उपन्यासकार माने जाते हैं। मान्य है कि वे 1929 ई० से ही उपन्यास रचना की ओर प्रवृत्त हो गये थे। इनका प्रसिद्ध उपन्यास 'रूपान्तर' (पांडुलिपि) दस वर्षों तक संशोधित-परिवर्तित होने के बाद 1952 ई० में प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास आध्यात्मिक व मानवीय-मूल्यबोध की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।
चूँकि मनुष्य राजनीतिक, सामाजिक व ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण अद्वैत जैसे परम तत्व के बोध से अनभिज्ञ होकर भूमा के महत्त्व से क्षीण हो जाते हैं और आत्मा की साधना में संलग्न होते हुए भी वे सुख को प्राप्त नहीं कर पाते। इससे समाज में समरसता की जगह बिखराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। इस द्वंद्व व समस्या से उबरने का एकमात्र उपाय अध्यात्म है। भले ही अध्यात्म की सीमा में मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं के अलावा सभी कुछ शामिल है। फिर भी यहाँ विचारणीय है कि मनुष्य के जीवनयापन में आध्यात्मिकता की क्या आवश्यकता है? इस प्रश्न पर डॉ. महावीर श्रीवास्तव का कहना है कि "इस शरीर के ही साधन से भगवान के स्वरूप के साथ संबंध साक्षात्कार किया जा सकता है। भगवान की सर्वोत्तम कृति, विविध गुणों का समुच्चय, हृदय के अष्ट सात्विक भाव, सौंदर्य का रसोद्रेक, ब्रह्मानुभूति कर सकने की क्षमता, मानव के अतिरिक्त अन्य किसी प्राणी में संभव नहीं है। सत् चिद आनंद रूप परब्रह्म का ज्ञान, स्वरूप की पहचान, भगवान से ममत्व और नैकट्य का अनुभव ईश्वर की कृपा तथा अनुग्रह प्राप्त कर आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण साधने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता है।"3 इस दृष्टि से ही आध्यात्मिक मूल्यों का विकास होता है। आध्यात्मिक मूल्य को परिभाषित करते हुए डॉ. मोहिनी शर्मा ने लिखा है— "मनुष्य की कतिपय जिज्ञासाओं का संबंध उसके भावनात्मक तथा वैचारिक स्तर से होता है….. इस वृत्त की सीमा में आने वाले मूल्यों को आध्यात्मिक मूल्य कहा जाता है।"4 डॉ. मनमोहन सहगल के अनुसार, "अपने रचयिता और नियंता को जानने की स्वाभाविक इच्छा जब सही आत्मिक मार्गदर्शन पाकर अध्यात्म-ज्ञान तथा ज्ञान की प्रतिक्रिया रूप में परम तत्व के प्रति आस्था, अनुराग और समर्पण के भाव उजागर होते हैं, तो ये ही आध्यात्मिक मूल्य कहलाते हैं।"5 स्पष्ट है कि इस आध्यात्मिक दृष्टि के केंद्र में आत्मा और परमात्मा का ज्ञान है, जिसका मूल आधार परम तत्व के प्रति आस्था है। इसके अलावा भक्ति के माध्यम से ईश्वर की अभिव्यक्ति, अदृश्य शक्ति के प्रति भक्ति और अनंत शक्ति के साथ एकरूपता की परम अनुभूति को भी आध्यात्मिक मूल्य कहे जा सकते हैं। विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर डॉ. हरीश सेठी कहते हैं— "आध्यात्मिक मूल्य, मनुष्य द्वारा परम-तत्व में आस्था रखते हुए उससे संबंध जोड़ने के निमित्त लौकिक जगत से ऊपर उठकर अपनी विचार शक्ति एवं भावनाओं का एकीकरण कर उसमें आस्तिकता और परम-अनुरक्ति की अंतरंग अभिव्यक्ति है।"6 अतः इन मूल्यों के आधार पर ही मनुष्य परम-तत्व के साथ संबंध स्थापित कर पाता है।
‘रूपान्तर’ उपन्यास में योग और भोग के मनोवैज्ञानिक चित्रण के माध्यम से श्रेय और प्रेय के महत्त्व का प्रभावी प्रतिपादन हुआ है। राधाकृष्ण मूलतः आध्यात्मिक प्रवृत्ति के साहित्यकार थे और डोमचांच के परमहंस बाबा की संगति से गहरे रूप में प्रभावित थे। यही कारण है कि यह उपन्यास उनकी आध्यात्मिक चेतना का प्रतिफल है। उपन्यास की रचना-प्रेरणा भी उन्हें इसी संगति से प्राप्त हुई और उन्होंने इसकी पहली प्रति परमहंस बाबा को समर्पित की। राधाकृष्ण जीवन के श्रेय और प्रेय के प्रश्न को अत्यंत गंभीरता से लेते हैं। उनके अनुसार— "हमारे होने की स्थिति, हमारे 'भाव' में ही प्रवृतियाँ रमी हुई हैं….. दूसरी ओर 'संन्यासधर्म' है जो गृहस्थाश्रम त्याग कर प्रवृत्तियों से लुप्त होने का मार्ग है।"7 वे इस द्वंद्व को स्वीकार करते हुए लिखते हैं—"जीवन में क्या श्रेय है और क्या प्रेय….. यह समस्या हमें निरंतर उलझाती रही है।"8 और आगे स्पष्ट करते हैं— "दृष्टि-भेद से शरीर को यदि हमने प्रेय माना, तो आत्मा को श्रेय। प्रेय को छोड़ो, श्रेय की कामना करो।”9 इस प्रकार लेखक श्रेय और प्रेय को परस्पर विरोधी न मानकर दृष्टिकोण का भेद मानते हैं।
मानव जीवन की श्रेष्ठता इसी में है कि वह आत्मोन्नति की दिशा चुन सकता है। श्रेय मार्ग मनुष्य को त्याग की ओर नहीं, बल्कि कर्तव्यनिष्ठ, संतुलित और मूल्यनिष्ठ जीवन की ओर प्रेरित करता है। परोपकार, दया, प्रेम, सहयोग और संतोष जैसे गुणों के आधार पर मनुष्य गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी मोक्ष प्राप्त कर सकता है। डॉ. हरीश सेठी के शब्दों में— "वास्तव में मनुष्य के द्वारा आत्मा और परमात्मा के अभेद को समझ लेना ही ज्ञान है। समूची आध्यात्मिकता इसी ज्ञान में निहित है।"10 विष्णुकांत शास्त्री भी श्रेय की महत्ता स्वीकार करते हुए कहते हैं— "मेरी मान्यता यह है की वैदिक परंपरा में सबसे बड़ा मूल्य लोक-हित, मानव-हित है और इसीलिए प्रेय के वर्ग में आने वाले मूल्यों से अधिक महत्व श्रेय के वर्ग में आने वाले मूल्यों को, उपनिषदों में दिया गया है।"11 स्पष्ट है कि शास्त्री जी ने लोकहित को ही सबसे बड़ा मूल्य माना है और संबंधित मूल्यों की प्रतिष्ठा में श्रेय को अपेक्षाकृत अधिक सुगम बताया। वहीं राधाकृष्ण इससे एक कदम आगे बढ़कर रूपांतर उपन्यास के माध्यम से श्रेय और प्रेय के द्वंद्व को दूर ही नहीं किया बल्कि गृहस्थ जीवन में लोकहित व जनकल्याण का मार्ग भी प्रशस्त किया।
उपन्यास की कथा दो धाराओं में प्रवाहित होती है—सम्राट मान्धाता और योगीराज सौभरि। मान्धाता का जीवन भौतिक सम्पन्नता से पूर्ण होते हुए भी आंतरिक अशांति से ग्रस्त है। वे कहते हैं— "मैं बहुत ही छोटी-सी चीज चाहता हूँ इन्दुमती; मैं 'शांति' चाहता हूँ। जब तक मुझे यह चीज न मिलेगी मुझे चैन न होगा।"12 और "शांति नहीं है, इसलिए सुख नहीं है।"13 उनकी समस्या यह है कि सब कुछ प्राप्त होने के बावजूद जीवन में उद्देश्य का अभाव है। पुत्रों के भविष्य और पुत्रियों के विवाह को लेकर उनकी चिंता उनके मानसिक द्वंद्व को और गहरा करती है।
दूसरी ओर सौभरि का चरित्र आध्यात्मिक साधना से आरंभ होकर कर्मयोग की ओर अग्रसर होता है। आरंभ में वे एक तपस्वी योगी हैं, परंतु जीवन के अनुभव उन्हें विचलित करते हैं और अंततः वे गृहस्थ जीवन को स्वीकार करते हैं। धौम्य ऋषि का परामर्श इस परिवर्तन का आधार बनता है— "परमात्मा तुम्हें गृहस्थाश्रम में भेजकर गार्हस्थ्य में भी तुम्हारे द्वारा अपने महत्त्व की स्थापना करना चाहते हैं।"14 गृहस्थ बनने के बाद सौभरि का दृष्टिकोण परिवर्तित हो जाता है। वे अपनी पत्नी कुन्तला की एक जिज्ञासा पर कहते हैं— "योग तो अब आकर मैंने सीखना प्रारंभ किया है। इसके पहले जो मैंने पाया था, वह वियोग था। वह अपने को पाने का एकांगी प्रयत्न था। जो मिलावे वही योग है।"15 यह कथन उपन्यास के केंद्रीय भाव को उद्घाटित करता है कि सच्चा योग लोकसेवा और मानव-संबंधों में निहित है। उस आश्रम में नाभाग और उसकी प्रेमिका भद्रा का भी आगमन हो जाता है। अपने गुरु में यह परिवर्तन देखकर नाभाग को आश्चर्य होता है, पर बाद में वह इस रहस्य व उद्देश्य को समझ जाता है। इस तरह उस गृहस्थ आश्रम में योगीराज सौभरि, कुन्तला, नाभाग तथा भद्रा चारों साथ में रहते हुए मानव सेवा में तत्पर हो जाते हैं।
उपन्यास में और भी कई घटनाएँ घटती हैं जिससे आध्यात्मिक मूल्यों के साथ-साथ मानवीय-मूल्यों का बोध होता है। यह सत्य है कि सौभरि ऋषि के अंदर आध्यात्मिक दृष्टि नहीं होती तो वे लोक-कल्याण के प्रति आकर्षित नहीं होते। आध्यात्मिकता ने ही उनके जीवन को परिवर्तित किया। उन्होंने मूल्यों के विघटनकारी तत्वों को निरस्त कर मानवीय-मूल्यों को साहित्यिक चेतना का अंग बनाया है। इसी चेतना की उपलब्धि के कारण 'रूपान्तर' को मानवीय-मूल्यों का चित्राधार कहना सर्वथा उचित होगा। उपन्यास का मूल स्वर मानव-सेवा है, जिसे प्रारंभिक श्लोक में व्यक्त किया गया है—
"न त्वहं कामये राजयं न स्वर्ग नापुनर्भवम्।
कामये दुःखतप्तानां प्राणिर्नामार्त्तिनाशनम्।।”16
अर्थात् न तो मैं राज्य चाहता हूँ, न स्वर्ग की इच्छा करता हूँ। मैं मोक्ष भी नहीं चाहता। मेरी यही कामना है कि दुःख से तपे हुए प्राणियों की पीड़ा का नाश करूँ।" स्पष्ट है कि लेखक इस उपन्यास को मानवीय-मूल्यों से जोड़ने में काफी सक्रियता दिखाते हैं। जीवन में व्याप्त श्रेय और प्रेय के द्वन्द्व के निवारण हेतु लेखक व्याकुल रहते हैं। इस द्वंद्व को समाप्त करते हुए लिखते भी हैं— "भूमा और भूमि में केवल नाम का अंतर है। श्रेय और प्रेय में केवल रूप का पार्थक्य है।"17 अर्थात् आध्यात्मिक और लौकिक जीवन में वास्तविक अंतर नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का अंतर है।
उपन्यास में मनुष्य के अंदर के सत् और असत् को आचरण तथा विचार दोनों ही दृष्टियों से अभिव्यक्ति मिली है। अहंकार से मनुष्य का व्यक्तित्व दोषपूर्ण तो होता ही है, हृदय भी अशांति से घिर जाता है। उपन्यास के प्रमुख पात्र मान्धाता के आचरण में अहंकारी रूप उनके सोच व विचारों से स्पष्ट होता हैं। परन्तु सामाजिक स्तर में उनकी हार होती है। पुत्रियों के विवाह हेतु अपने से श्रेष्ठ राजा न मिलने की स्थिति में सम्राट को अपनी बेटी कुन्तला को निर्धन सौभरि ऋषि के हाथों सौंपना पड़ता है। अशांति व चिंता से घिरे सम्राट मान्धाता अंत में पराजित होकर ध्वस्त खंडहर के समान प्रतीत होते हैं। वे वैयक्तिक जीवन-मूल्यों की स्थापना तो करते हैं, पर अहंकार से घिरे होते हैं। एकांत जीवन भी मूल्यों का विनाशक होता है। सौभरि आरंभ में अपने इसी आचरण से जीवन को गति नहीं दे पाते। इससे वैयक्तिक-मूल्यों का संरक्षण नहीं हो पाता। वहीं जब वे कर्मयोगी बनकर अपनी साधना को समाज से जोड़ते हैं तो मूल्यवान हो उठते हैं। वैयक्तिक-मूल्य सामाजिक-मूल्यों को प्रोद्भासित कर ही अपनी महत्ता प्रतिपादित करते हैं। सौभरि का व्यक्तित्व व्यष्टि से समष्टि की ओर उन्मुख होता है। नाभाग उनके परिवर्तन को देखकर कहता है— "स्रोत आज सागर हो उठा है।"18 आरम्भ में सौभरि का सांसारिक जीवन से कोई आस्था नहीं थी। वे स्वयं स्वीकार करते हैं— "अज्ञान बहुत कष्ट देता है। सब-कुछ स्पष्ट नहीं होने पर चारों और भ्रम का कुहरा घिरा रहता है। मैं भी इसी अज्ञान में लीन था। परमात्मा बारम्बार प्रेरणा भेजते, परंतु मैं उस ओर आँख उठाकर भी नहीं देखता। अपनी उसी तपस्या को उग्र रूप से उग्रतर बनाता हुआ जैसे प्रभु से छूटा जा रहा था। प्रभु ने जैसे अपनी कृपा के सहस्रों करों से मुझे अपनी ओर खींचा।"19
परिवारिक मूल्यों की अभिव्यक्ति मान्धाता के परिवार में स्पष्ट दिखाई देती है, वहीं कुन्तला का त्याग और समर्पण विशेष रूप से उल्लेखनीय है— "यह आत्मसमर्पण; निर्मल-निश्छल आत्मसमर्पण! उन्हें लगता कि यह योगियों के भी सीखने की वस्तु है। इस कुन्तला से सीखो कि किस प्रकार प्रेम-भाव से आत्मसमर्पण किया जाता है।"20 कुन्तला और सौभरि के दाम्पत्य प्रेम की गहनता को भी अत्यंत मार्मिक रूप में व्यक्त किया गया है— "कभी वह कुन्तला से कहते 'मैं तुमसे भिन्न नहीं मालूम होता, ऐसा लगता है मैं कुछ भी नहीं और तुम सब कुछ हो।"21
इसी प्रेम, समर्पण और पारस्परिक सहयोग की भावना से पारिवारिक व सामाजिक मूल्य प्रतिष्ठित होते हैं। इन जीवन-मूल्यों के द्वारा ही अन्य मूल्यों का विकास होता है। आगे यह राष्ट्र निर्माण से लेकर विश्व के मंगल में समर्थ होता है। इन मूल्यों की सार्थकता सामाजिकता के निर्वाह में अत्यधिक है। राधाकृष्ण सामाजिक जीवन-मूल्यों को प्रतिष्ठित करने के लिए ही मान्धाता की कथा अवसान से कुन्तला-सौभरि की कथा को विस्तार देते हैं। कुन्तला से त्याग, समर्पण और सौभरि के सेवा-भाव से ग्रामीण समाज में प्रेम और सहयोग की भावना का संचार होता है। सामाजिक जीवन में सौभरि का आश्रम सेवा, सहयोग और समन्वय का केंद्र बन जाता है— "गाँव के लोग अब सौभरि को काम करने नहीं देते। स्वयं ही दीवार उठाने के पीछे लग गए। वे अपना अहोभाग्य मान रहे थे कि एक दिव्य पुरुष उनके गाँव में बसेरा ले रहा है। वे परस्पर इस बात की चर्चा बड़े गौरव के साथ किया करते थे।"22 वे स्पष्ट रूप से मानव सेवा को ही जीवन का लक्ष्य मानते हैं और अपने शिष्य नाभाग का मार्ग प्रशस्त करते हुए कहते हैं— "नाभाग, पीड़ित तथा दु:खी मानव की सेवा ही एकमात्र मार्ग है। इसी मार्ग का निर्माण करो। इसी मार्ग से होकर सतोगुण का राज्य आवेगा। निर्वैर होकर, निर्भीक होकर सेवा करो। यही भगवान् की पूजा है। यही निर्माण है और यही अन्याय, अनाचार तथा अज्ञान के प्रति विद्रोह भी है।"23
इस उपन्यास में त्याग, सेवा, समर्पण, प्रेम, कर्तव्यनिष्ठा, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना, समानता, ममता का भाव आदि मानवतावाद के पोषक तत्वों की कुशल अभिव्यक्ति हुई है। इन्हीं भावनाओं व तत्वों के आधार पर उपन्यास की नारी-प्रतिनिधि कुन्तला और भद्रा तथा पुरुष-प्रतिनिधि सौभरि और नाभाग द्वारा दीन-दुखियों, पीड़ितों, दलितों के उत्थान का प्रयास हुआ है। इसमें जीवन-चित्रण का एक पक्ष मनुष्यत्व का भाव अंतरात्मा के विकास के द्वारा भरने का संदेश देता है। वहीं दूसरा पक्ष, जहाँ आत्मबल को निर्बलों की शक्ति नहीं, सबलों का धर्म बतलाया है। वे आत्मबल के महत्त्व को रेखांकित करते हुए अम्बरीष का अज्ञान दूर करते हैं- "यह एक उपलब्धि है जिसे बलवान ही प्राप्त कर सकते हैं। उसके सामने पशुबल पर आस्था रखनेवाला हिंसक पशु टिक नहीं सकता, उसे परास्त होना ही पड़ेगा।"24 लेखक के अनुसार मानवतावाद की रक्षा अहिंसा के सिद्धांत पर चलने से ही हो सकती है।
लेखक ने सौभरि द्वारा बुद्ध, महावीर, गाँधी, विनोबा भावे आदि के आदर्श, विचार और मानवतावादी दृष्टिकोण को भी लोगों तक पहुँचाया है। मानवतावाद की स्थापना करते हुए उनका विचार है— "मेरा विचार है कि मनुष्य की सबसे बड़ी विपत्ति यही है कि मानव जाति को वही खंड-खंड करके देखता है, समझता है तथा उसी विचार के अनुसार आचरण भी करता है….. जिस प्रकार मानव जाति खंड-खंड नहीं, उसी प्रकार उसका आचरण भी पृथक्-पृथक् नहीं होना चाहिए।"25 इस मानववादी स्वर में ही मानवीय-मूल्य प्रतिष्ठित होते हैं। लेखक ने मूल्य-विघटन के इस युग में मानव के विनाशकारी बुद्धि का तिरस्कार भी किया है। उपन्यास में इन्द्रप्रस्थ से एक भारी वस्तु के साथ आया व्यक्ति सौभरि से आशीर्वाद पाने की विनती करता है। तब वे विनाशकारी प्रवृत्तियों का विरोध करते हुए स्पष्ट करते हैं—"इससे अज्ञान का नाश तो होता नहीं; सब कुछ का ही नाश हो जाता है। इसके द्वारा प्रेम तो फैलता नहीं, सर्वत्र मृत्यु फैल जाती है।....... जब हत्या ही ठीक नहीं, तो फिर हत्या की वस्तु का उपयोग कैसे उचित ठहराया जा सकता है? इस वस्तु को मेरा आशीर्वाद नहीं मिल सकता।”26 अंततः वे दस्यु के तीर से मरते-मरते भी जीवन का सार प्रस्तुत करते हैं— "अज्ञान को परास्त करो।.....लोभ का त्याग करो।"27 अंत में कुन्तला भी इस उपदेश को दोहराते हुए अपने पति के साथ चिता पर बैठकर सती हो जाती है। कुन्तला का त्याग और समर्पण भी मानवीय मूल्यों की चरम अभिव्यक्ति बनकर सामने आता है।
निष्कर्ष : स्पष्टतः ‘रूपान्तर’ केवल एक आध्यात्मिक उपन्यास नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का समन्वयवादी प्रतिपादन है। इसमें श्रेय और प्रेय के द्वंद्व को समाप्त करते हुए यह सिद्ध किया गया है कि सच्ची आध्यात्मिकता लोक-कल्याण, मानव-सेवा और जीवन की सार्थकता में निहित है। राधाकृष्ण ने सौभरि के माध्यम से यह स्थापित किया है कि गृहस्थ जीवन ही मानव-मूल्यों की वास्तविक भूमि है, जहाँ सेवा, त्याग, प्रेम, करुणा और समर्पण के द्वारा मनुष्य आत्मोन्नति तथा समाज-निर्माण दोनों कर सकता है। राधाकृष्ण का ‘रूपान्तर’ हिंदी साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण कृति है, जिसमें आध्यात्मिक और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत हुआ है। यह उपन्यास जीवन के द्वंद्वों को सुलझाते हुए यह संदेश देता है कि सच्ची साधना लोकसेवा, परोपकार और मानवीय सहअस्तित्व में निहित है। सम्राट मान्धाता और सौभरि के चरित्रों के माध्यम से लेखक ने भौतिकता और आध्यात्मिकता, शक्ति और शांति, ऐश्वर्य और लोकमंगल के अंतर को प्रभावपूर्ण ढंग से स्पष्ट किया है। प्रेम, त्याग, सेवा, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा को ही जीवन के वास्तविक मूल्य रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। उपन्यास में सम्राट मान्धाता संपत्ति और शक्ति के अहंकार से घिरे हैं, इसलिए उनके जीवन में शांति का अभाव है। इसके विपरीत, दुःखी संसार को सुखमय बनाने के उद्देश्य से सौभरि ऋषि का ध्यानयोगी संन्यासी से कर्मयोगी गृहस्थ के रूप में रूपान्तरण होता है। संसार में कर्मरत व्यक्ति केवल अपना ही नहीं, बल्कि अनेक जनों का कल्याण करता है। लेखक ने एक ओर एकांगी साधना की सीमाओं को रेखांकित किया है, तो दूसरी ओर कर्मयोग को अधिक व्यापक, कठिन और श्रेयस्कर सिद्ध किया है। प्रारंभ में सौभरि श्रेय मार्ग अपनाते हैं, पर बाद में प्रभु-प्रेरणा से प्रेय मार्ग अर्थात् गृहस्थ जीवन की ओर अग्रसर होते हैं। अनेक बाधाओं के बावजूद वे अंतिम क्षण तक सेवा-भाव से विमुख नहीं होते। यही उपन्यास का मूल संदेश है कि मनुष्य की श्रेष्ठता एकांत साधना में नहीं, बल्कि समाज के बीच रहकर मानवता की सेवा करने में है।
अतः कहा जा सकता है कि राधाकृष्ण ने ‘रूपान्तर’ में मानवतावादी दृष्टि, विश्वबंधुत्व और आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से मानवीय-मूल्यों की अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति की है। इसी कारण यह उपन्यास मानव-मूल्यों का सशक्त चित्राधार और हिंदी साहित्य की प्रेरणादायी कृति है।
संदर्भ :
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3. हरीश सेठी, जीवन मूल्य विमर्श. नई दिल्ली : संजय प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2008, पृ०183.
4. वही, पृ० 183.
5. वही, पृ०.184.
6. वही, पृ० 184.
7. धर्मराज राय, राधाकृष्ण विशेषांक. ब्रह्मर्षि समाज दर्शन (त्रेमासिक), राँची : सद्भावना प्रकाशन, जनवरी-मार्च, 2015, पृ० 11.
8. राधाकृष्ण, रूपान्तर, नई दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 2012, पृ० आमुख.
9. वही, पृ० आमुख.
10. हरीश सेठी, जीवन मूल्य विमर्श. नई दिल्ली : संजय प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2008, पृ० 182.
11. रतना लाहिड़ी, मूल्य : संस्कृति साहित्य और समय. नयी दिल्ली : नेशनल पब्लिशिंग हाउस, प्रथम संस्करण, 1987, पृ० 13.
12. राधाकृष्ण, रूपान्तर. नई दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 2012, पृ० 16.
13. वही, पृ० 18.
14. वही, पृ० 59.
15. वही, पृ० 115.
16. वही, पृ० 06.
17. वही, पृ० 08.
18. अर्जुन देव शर्मा, औपन्यासिक शिल्पविधि और राधाकृष्ण. पटना : जानकी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2014, पृ० 258.
19. राधाकृष्ण, रूपान्तर, नई दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 2012, पृ० 141.
20. वही, पृ० 113.
21. अर्जुन देव शर्मा, औपन्यासिक शिल्पविधि और राधाकृष्ण. पटना : जानकी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2014, पृ० 259.
22. राधाकृष्ण, रूपान्तर, नई दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 2012, पृ० 125.
23. वही, पृ० 135.
24. वही, पृ० 120.
25. अर्जुन देव शर्मा, औपन्यासिक शिल्पविधि और राधाकृष्ण. पटना : जानकी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2014, पृ० 261.
26. राधाकृष्ण, रूपान्तर, नई दिल्ली : राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 2012, पृ० 143-44.
27. वही, पृ० 150.
प्रमोद कुमार
सहायक प्राध्यापक, हिंदी विभाग, सरिया कॉलेज, सरिया, गिरिडीह (झारखण्ड)
pramodkumarprince413@gmail.com, 7870296211, 6205691162
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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