मेरे लिए नामवर जी
- केदारनाथ सिंह
कितना अच्छा हुआ कि नामवर जी को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में नियुक्ति नहीं मिली – बैठे-बैठे मैं सोच रहा था। अगर मैं भूलता नहीं तो कम-से-कम दो बार शायद ज्यादा भी हो, वह बुलाए गए, इंटरव्यू हुआ और उनसे कम योग्य व्यक्ति शून्य व्यक्ति कह लीजिए, नियुक्त हुआ और नामवर जी की नियुक्ति नहीं हुई। ये मैं सोचता हूँ कि मानिए हो गए होते, और यह हो सकता था। हजारी प्रसाद द्विवेदी अध्यक्ष थे, चाहते थे नामवर जी को वहाँ रखना, उनके होने के बावजूद और उनके सबसे प्रिय शिष्य और योग्य शिष्य के रूप में नामवर जी की पहचान थी। जो आज भी है। उनके होने के बावजूद भी यह सम्भव नहीं हो सका।
डॉ. नामवर सिंह डॉक्टर कैसे बनें? मुझे याद है कि नामवर जी को अस्थायी नियुक्ति मिल गई थी बहुत जल्दी और इस रूप में मैं उनका विद्यार्थी बना था। बी.ए. में तो नहीं, लेकिन एम.ए. में पढ़ाया भी। बी.ए. में तो नहीं, लेकिन हिन्दी के विकास में अपभ्रंश भाषा, अपभ्रंश कविता पढ़ाई और हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान, जो उनकी पुस्तक प्रचलित है आजकल और मानक पुस्तक है। वह अपनी पुस्तक को स्वयं पढ़ाते थे। इतना लोकप्रिय विषय हो सकता है, यह उनके कहने के ढंग से कहा जाना चाहिए। अपभ्रंश पर उनका काम भी बहुत है, लेकिन उन सारी व्याख्याओं के बीच नामवर जी की पी.एच-डी. का काम चलता रहा और लम्बे समय तक चला। गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते थे, एकाधबार मेरे सामने भी बात हुई कि नामवर सुस्ती कर रहा रहा है और उन्हें बुलाकर उन्होंने कहा कि ये काम तुमको एक महीने में पूरा करना है। अगर मैं भूलता नहीं तो वह काम लगभग एक महीने में बैठे-बैठे नामवर जी ने पूरा किया और थीसिस टाइप होकर नहीं छपी, हाथ से लिखकर छापी जाती थी। शायद वह पहली थीसिस थी, अन्तिम तो नहीं कहूँगा, लेकिन पहली थी, जो मुद्रित हुई और मुद्रित होकर वह जमा की गई थी। उसको मुद्रित करने का काम किया प्रेमचन्द के बढ़े बेटे श्रीपत ने और उन्होंने कहा कि तुम पुस्तक करके रख दो, मैं उसे छाप दूँगा दस दिन के भीतर। किस तरह से वह सारा कुछ हुआ था, वह मुझे अब तक याद है। और जितने कम समय में यह महत्त्वपूर्ण काम, इतनी सम्पूर्णता के साथ सम्पन्न हो, ऐसा कम देखा जाता है।
मैं सोचता हूँ कि नामवर जी अगर वहाँ अध्यापक हो गए होते, जे.एन. यू. का क्या होता? वह मैं नहीं सोच रहा हालाँकि जे.एन.यू. तब था नही, लेकिन अन्ततः आनन्द कुमार ने भी यह माना शायद उन्हें भी लगा जो वह करना चाह रहे हैं नहीं कर पा रहे! बनारस कर्म क्षेत्र था, राजनीतिक सक्रियता वहाँ थी। यह सब छोड़कर उनको बनारस, आना पड़ा। बनारस आकर हजारी प्रसाद द्विवेदी बहुत खुश हुए, यह लिखा भी है उन्होंने। बहुत सारी पीड़ा उनके मन में भी थी। जो वह करना चाहते थे, बनारस में नहीं कर सके। कितना विरोध हुआ नामवर सिंह से हजारी प्रसाद द्विवेदी का, उसका पूरा लेखा-जोखा हमारे सामने प्रस्तुत नहीं किया गया है, मुझे पता है। लेकिन मैं बनारस का कृतज्ञ हूँ और उससे ज्यादा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय और उससे भी ज्यादा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग का कृतज्ञ हूँ कि उसने नामवर जी को नहीं बचाया। वह बचा नहीं सकता था। और अन्ततः उन्हें बनारस से निकलना पड़ा। निकलने के बाद फिर अलग ही लम्बी कहानी है, वह इतिहास बन चुका है। उसके बारे में काफी कुछ चर्चाएँ हुई हैं, लिखा भी गया है।
अगर नामवर बनारस से नहीं आए होते और रह गए होते, तो जे.एन.यू. का ऐसा रूप नहीं होता। ये जे.एन.यू. का सौभाग्य था। हम नामवर जी का अभिनन्दन कर रहे हैं, जन्मदिवस पर। भारतीय भाषा केन्द्र के प्रथम नागरिक का अभिनन्दन कर रहे है। जैसे राष्ट्र का प्रथम नागरिक होता है, डॉ. नामवर सिंह भारतीय भाषा केन्द्र के प्रथम नागरिक हैं और सौभाग्य से अब भी केन्द्र से जुड़े हुए हैं, उसका हिस्सा हैं। हम उस प्रथम नागरिक का अभिनन्दन कर रहे है।
जे.एन.यू. में क्या? इसकी लम्बी कहानी है, इसके बारे में बातें कही जाती रही है। जे.एन.यू. में नामवर जी आए तो मुझे याद है कि जे.एन.यू. में बहुत मुश्किल से हिन्दी शब्द सुनने को मिलते था। हिन्दी बहुत कम सुनाई देती थी। आनन्द कुमार थे, छात्रसंघ में उनको शायद याद होगा। हिन्दी को बौद्धिक विमर्श के भाषा के रूप में जेनएनयू में प्रतिष्ठित करने का काम, उसे नया प्रासाद देने का और उसके लिए विश्वसनीयता पैदा करने का बहुत बड़ा काम है, जो नामवर जी ने किया और इस रूप में नामवर जी को बार-बार याद करते हैं। एक बार गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी कह रहे थे नामवर कितना अच्छा बोलता है, एकाधबार सुना भी था, लोकप्रिय अधयापक थे। मैं उसके लिए कुछ करना चाहता था। आप कल्पना नहीं कर सकते कि नामवर जब नए-नए अध्यापक बने थे बी.ए. के! बी.ए. में पढ़ाते क्या थे? चन्द्रगुप्त नाटक और चन्द्रगुप्त नाटक पढ़ाते हुए इतना लोकप्रिय ढंग था उनके पढ़ाने का, दूसरे विषयों के बहुत सारे छात्र अँग्रेजी के, समाजशास्त्र वगैरह के कक्षा में आ जाते थे, बैठने की जगह नहीं मिलती थी। ये आरम्भिक दौर था नामवर सिंह का। वह पढ़ के अध्ययन करके आते थे और हमेशा तरोताजा व्यक्ति, जो पूरे हिन्दी अध्ययन को नई धार दे रहा था, नई दिशा दे रहा था। ये नामवर जी का आरम्भिक दौर था।
नामवर जी का एक और पहलू है। दूसरी भाषाओं के लेखकों के साथ उठना-बैठना। नामवर जी को लेकर दूसरे भाषा के लोग इस तरह से बात करते हैं। अभी मैं भुवनेश्वर के एक सेमिनार में था, और सेमिनार हो रहा था पाठ्यक्रम पर और वहाँ अँग्रेजी के भी लोग थे, दूसरे विश्वविद्यालय के लोग, जे.एन.यू. से भी कुछ लोग थे। जे.एन.यू. का पाठ्यक्रम बार-बार उसकी चर्चा होती रही थी। नामवर सिंह जब आये तो उन्होंने बनाया था और साहित्य के पठन-पाठन की बात हो रही है कि नामवर सिंह ने किस तरह से हिन्दी पाठ्यक्रम को भारतीय साहित्य से जोड़ा। चूँकि यहाँ हिन्दी पढ़ाई जाती थी तो केवल हिन्दी नहीं पढ़ाई जाती थी, उसके साथ भारतीय साहित्य का भी एक पक्ष होता था। ये परम्परा हिन्दी साहित्य को भारतीय साहित्य के साथ जोड़कर देखती है और उसके सन्दर्भ में उसको पढ़ाया गया, इसकी पहली बार शुरुआत जे.एन.यू. में हुई थी, और अँग्रेजी के एक प्राध्यापक ने मुझसे कहा भी कि नामवर जी का योगदान मैं जानता हूँ। और हम कुछ इस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। नामवर जी ने कितनी प्रेरणा दी है। और हम कुछ इस दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। नामवर जी ने कितनी प्रेरणा दी है। अभी जिस पुस्तक की चर्चा हो रही है। नामवर विचार-कोश। जो थोड़ा बहुत काम है। और बेहतर बन सकता था, पर किया तो गया। बहुत दिन पहले उसका विमोचन हुआ, मैं हिन्दी के छात्रों से कहूँगा कि वह एक बार पुस्तक को देखें। उसमें बहुत संक्षेप में नामवर सिंह के कुछ विचार मिल जाएँगे, कुछ संदर्भ मिल जाएँगे। हिन्दी को रोजगारपरक बनाया जाए। अगर नहीं बनाया जाएगा तो हमारे लड़के बेकार हो जाएँगे। यह चिन्ता और इसका एक विचार के रूप में पुस्तक में दिया गया है।
जब मैंने पढ़ा तो मुझे याद आया कि जे.एन.यू. के पाठ्यक्रम प्रारूप बन चुका था लेकिन ये अनुवाद का पाठ्यक्रम बाद में जोड़ा गया और ये नामवर जी का प्रयास है, वह नामवर जी की देन है। विश्वविद्यालय में अनुदान आयोग के दो पाठ्यक्रम थे, उसके लिए हम आर्थिक सहायता भी देंगे पत्रकारिता और अनुवाद का पाठ्यक्रम और जे.एन.यू. में आरम्भ किया जाए। यह नामवर जी की राय कि चूँकि हमारा विश्वविद्यालय भारतीय भाषा केन्द्र है, यहाँ एक भाषा नहीं कई भाषाएँ, आज तो कई भाषाएँ हो गई हैं। पहले हिन्दी-उर्दू थी। तो वहाँ से इस प्रकार के पाठ्यक्रम की आवश्यकता है। जिसके माध्यम से अनुवाद कार्य को भारतीय साहित्य के बीच बढ़ाया गया और इसमें जे.एन.यू. की अपनी भूमिका हो सकती है। इसलिए अनुवाद का पाठ्यक्रम शुरू किया गया और इससे आगे फिर एक रोजगार का रास्ता खुलता है। यह नामवर जी की परिकल्पना थी और उसी के साथ उन्होंने पत्रकारिता का पाठ्यक्रम इन्हीं के सलाह पर दिल्ली विश्वविद्यालय को दिया गया और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को अनुवाद का पाठ्यक्रम दिया गया था।
(इस पाठ्यक्रम को लाने में प्रो. मैनेजर पाण्डेय की भी महती भूमिका रही है। इसे केदारनाथ सिंह जी कहना भूल गए) अध्यापक लाए जाएँ जो कम-से-कम द्विभाषी हों। यह भविष्य की परिकल्पना है। इस पर नामवर जी से बहुत चर्चा होती रही है, होती रहेगी।
मैं आप सबके साथ नामवर जी को सुनना चाहता हूँ। अपने जन्मदिन के 86 वर्ष पूरे किए हैं तो उसमें वे क्या महसूस करते हैं? कैसे महसूस करते है? जे.एन.यू. आकर कैसा लग रहा रहा है उन्हें, ये सारी बातें सुनना चाहेंगे। शतायु होना यह मुहावरा छोटा पड़ गया है। जिस तरह से कुछ वैज्ञानिक सुविधाएँ, मेडिकल सुविधाएँ उपलब्ध हुई हैं, जिसके चलते मनुष्य आज बचा है, यह कहते हुए अब मुझे सौ वर्ष जीने, या शतायु हों, यह मुहावरा छोटा पड़ रहा है। नामवर जी शतकोपरी हों, इसकी कामना करता हूँ।
केदारनाथ सिंह
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय, कंचनलता यादव एवं संजय साव

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