शोध आलेख : वाचिक परंपरा के काव्यशास्त्री चिंतक: नामवर सिंह / आकाश शंकर

वाचिक परंपरा के काव्यशास्त्री चिंतक: नामवर सिंह
- आकाश शंकर

सबाल्टर्न इतिहासकार (नव्य इतिहासवाद )‘वाचिक परंपरा’ को इतिहास की अमूल्य निधि मानते हैं। ‘वाचिक परंपरा’ भारतीय श्रुति परंपरा का ही विकास है, जिसे हिंदी में नामवर सिंह ने प्रतिष्ठित किया। उन्होंने अपने संवादी व्यक्तित्व, बहसधर्मी तेवर एवं वैचारिक विवेक के आधार पर हिंदी आलोचना जगत में ‘वाचिक परंपरा’ को आलोचना प्रणाली के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनकी वाचिक समीक्षा पूर्ववर्ती आलोचक, सहधर्मी समीक्षक तथा युवा पीढ़ी के अध्येताओं से संवाद स्थापित करती है। नामवर सिंह की वाचिक आलोचना ने लगभग साहित्य और वैचारिकी के प्रत्येक क्षेत्र में हस्तक्षेप किया। इसी कड़ी में उनका काव्यशास्त्रीय चिंतन भी है। उन्होंने व्याख्यानों, क्लास लेक्चरों, साक्षात्कारों में भारतीय एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों पर मौलिक निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं। नामवर सिंह काव्यशास्त्र को विभिन्न संप्रदायों में वर्गीकृत करने के पक्षधर नहीं है। उन्होंने काव्यशास्त्र के विविध संप्रदायों के ऐतिहासिक विकासक्रम के सिद्धांतों को क्षैतिज विकास के रूप में देखा है। नामवर सिंह ने काव्यशास्त्र को समग्रता में विवेचित किया है। उन्होंने अपने वाचिक चिंतन के माध्यम से भारतीय काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों की मौलिक समीक्षा की तथा उसकी नीरस सैद्धांतिकी को लोकप्रिय बनाया। उनकी वाचिकता ने काव्यशास्त्रीय आलोचना को पाठ्य संस्कृति की परिधि से बाहर निकालकर श्रव्य संस्कृति के केंद्र में स्थापित किया। प्रस्तुत लेख में हम उनके इन्हीं विचारों पर केन्द्रित रहकर उनकी आलोचना दृष्टि पर बात करेंगे.

वक्ता और श्रोता की भारतीय आर्ष परंपरा ही ‘वाचिक परंपरा’ है। ‘वाचिक’ का शाब्दिक अर्थ- ‘बोलना’ या ‘कहना’ है। अपने ज्ञान-विज्ञान की अक्षय निधि को बोलकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित करने की परंपरा को हम ‘वाचिक परंपरा’ कहते हैं। इस परंपरा का निर्वाह वाचिक भाषा संकेतों के माध्यम से होता है। मानव सभ्यता के विकास में मनुष्य ने सर्वप्रथम वाचिक भाषा के माध्यम अपने भावों को अभिव्यक्त किया। प्राचीन काल में ज्ञान का प्रसार ‘वाचिक परंपरा’ के माध्यम से ही हुआ। तमाम वैज्ञानिक प्रगतियों के पश्चात् वक्ता-श्रोता की यह परंपरा आजतक अपनी निरंतरता बनाए हुए है। वक्तव्य की पूर्ण प्रतिबद्धता, प्रामाणिकता एवं वाचिक अंतर्विरोधों को समाप्त करने के लिए ‘लिखित परंपरा’ का विकास हुआ, किंतु वाक् शक्ति के प्रति अनन्य निष्ठा और वाक् परिशुद्धता के प्रति निरंतर चिंतनशील होने के कारण ‘लिखित परंपरा’,‘वाचिक परंपरा’ को प्रतिस्थापित नहीं कर पाई। इसके महत्व को रेखांकित करते हुए, विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं- “वाचिक परंपरा के कारण संस्कृति की निरन्तरता बनी रहती है, यह जो पीढ़ियों की दूरी की बात इतनी होने लगी है, उसका कारण वाचिक परंपरा के प्रति अनादर है। हमारे यहाँ वाचिक सम्प्रेषण एक पीढ़ी लाँघकर ही अधिक सक्रिय होता रहा है।…..वाचिक परंपरा केवल बोली जाने वाली भाषा ही नहीं है, वह जीवन-दर्शन भी है।"1 ‘वाचिक परंपरा’ ही सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करती है।

डॉ.नामवर सिंह की ख्याति ‘वाचिक परंपरा’ के आलोचक के रूप में है। उन्होंने हिंदी आलोचना की ‘वाचिक परंपरा’ को समृद्ध किया तथा हिंदी के अध्ययन- अध्यापन को नई दिशा दी। ऐसा नहीं है कि नामवर सिंह के पहले यह परंपरा नहीं थी। भारतेंदु के भाषणों से प्रादुर्भूत आलोचना की इस परंपरा को डॉ. नगेंद्र ने अकादमी विस्तार दिया, किंतु नामवर सिंह ने इसे शुद्ध आलोचना प्रणाली के रूप में विकसित करने का असाधारण काम किया। उनका मानना था कि- "जिस समाज में साक्षरता पचास फीसदी से भी कम हो, हिंदी समाज में वहाँ वाचिक परंपरा के द्वारा ही महत्त्वपूर्ण काम किया जा सकता है।”2 नामवर सिंह आलोचना के माध्यम से संवाद करते थे। उनके लिए संवाद आलोचना की संस्कृति को जीवंत रखने का माध्यम था। वह बोलता हुआ सा लिखते थे और लिखता हुआ सा बोलते थे। उनकी वाचिकता नवाचारी नैरंतर्य और वैचारिक संघर्ष का परिणाम थी।

नामवर सिंह की वाचिक आलोचना की पहली पुस्तक समीक्षा ठाकुर द्वारा संपादित पुस्तक ‘कहना न होगा’(1994 ई.) है। इसके पश्चात् उनकी वाचिक आलोचना से संबंधित अनेक पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। जैसे- ‘आलोचना के रचना पुरुष’( भरत यायावर, 2003 ई.) ‘नामवर सिंह आलोचना की दूसरी परंपरा’ (कमला प्रसाद, 2002 ई.), ‘आलोचक के मुख से’ (खगेन्द्र ठाकुर, 2005 ई.), 'काशी के नाम' (काशीनाथ सिंह, 2006 ई.), ‘बात बात में बात’(समीक्षा ठाकुर, 2006 ई.),'घर का जोगी जोगड़ा'(काशीनाथ सिंह, 2008 ई.), 'नामवर सिंह संचयिता' (नंदकिशोर नवल, 2008 ई.) 'जे. एन. यू. में नामवर सिंह'(सुमन केशरी, 2009 ई.),'हिन्दी समीक्षा और रामचंद्र शुक्ल'( ज्ञानेन्द्र कुमार संतोष, 2013 ई.), 'प्रारम्भिक रचनाएँ' (भरत यायावर, 2013 ई.), 'नामवर सिंह का आलोचना कर्म एक पुर्नपाठ' (भरत यायावर, 2015 ई.) 'नामवर के नोट्स' (शैलेश कुमार, मधुप कुमार और नीलम सिंह, 2016 ई.)। इसी क्रम आशीष त्रिपाठी ने नामवर सिंह के व्याख्यानों, टिप्पणियों, साक्षात्कारों का संपादन 'प्रेमचन्द और भारतीय समाज' (2010 ई.), 'जमाने से दो दो हाथ' (2010 ई.), 'कविता की जमीन जमीन की कविता' (2010 ई.), 'हिन्दी का गद्य पर्व' (2010 ई.), 'साहित्य की पहचान’ (2012 ई.), 'आलोचना और विचारधारा' (2012 ई.), 'सम्मुख' (2012 ई.), 'साथ-साथ' (2012 ई.), 'पूर्वरंग' (2018 ई.), ‘आलोचना और संवाद’ (2018 ई.) शीर्षक से किया। उपर्युक्त व्याख्यान, परिसंवाद, साक्षात्कार, टिप्पणी, फुटकल आलेख एवं पत्र व्यवहार नामवर सिंह के साहित्यिक व्यक्तित्व और वैचारिक चिंतन का प्रमाण है। इन संपादित पुस्तकों में नामवर सिंह की आलोचना पद्धति की वाचिक निधि सुरक्षित है।

नामवर सिंह की वाचिक आलोचना का महत्वपूर्ण पक्ष है- काव्यशास्त्र। विदित है कि भारतीय काव्यशास्त्र एवं पाश्चात्य काव्यशास्त्र की सैद्धांतिक मान्यताओं का परित्याग करके, हिंदी आलोचना की विचारसरणियों का व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया जा सकता। इसलिए उन्होंने अपनी समीक्षा पद्धति में भारतीय काव्यशास्त्र और पाश्चात्य काव्यशास्त्र की मान्यताओं का समन्वय किया। उन्होंने स्पष्ट किया है कि-“काशी में आलोचना इसलिए संभव हो सकी क्योंकि काशी में काव्यशास्त्रीय चिंतन की हजार-दो हजार वर्षों की परम्परा रही है।”(3) अर्थात् काव्यशास्त्रीय चिंतन आलोचना को पुष्ट करती है। नामवर सिंह ने आचार्य भरत, आनंदवर्धन, कुंतक एवं अभिनवगुप्त पर व्यवस्थित चिंतन किया। उन्होंने अपनी कक्षाओं में इन काव्याचार्यों के व्यक्तित्व-कृतित्व पर विधिवत् व्याख्यान दिया था।

नामवर सिंह ने आचार्य भरत का समय पांचवीं शताब्दी ई.पू. से तीसरी शताब्दी ई.पू. तक माना है। उन्होंने आचार्य भारत को शूद्र माना है तथा अपने समर्थन में मराठी विद्वान दि. के. बेडेकर और डॉ. सुरेन्द्र बारलिंगे के मतों को उद्धृत किया है। नामवर सिंह के अनुसार- "भरत संभवतः शूद्र थे। पंचमवेद, नाट्यवेद । पंचमवर्ण, अंत्यज । नाट्यवेद सार्ववर्णिक है। यह सभी वर्णों के लिए है। वेद शूद्रों के लिए नहीं थे। नाट्यवेद सभी के लिए है, “तस्मात सृजापरं वेदं पञ्चमं सार्ववर्णिकमं।”4 नामवर जी के अनुसार ‘नाट्यशास्त्र’ अचानक से अस्तित्व में नहीं आया। यह पूर्व से चली आ रही भारतीय साहित्य की रसात्मक वृत्ति का प्रतिफल है, क्योंकि ‘नाट्यशास्त्र’ के पूर्व वेदों और उपवेदों की रचना हो चुकी थी, जिन्हें हम रसविहीन नहीं कह सकते हैं। भरत ने नाटक को त्रैलोक्य के भावों के ‘अनुकीर्तन’ का माध्यम माना है- “यह नाटक न असुरों का है, न देवताओं का बल्कि यह तो त्रैलोक्य के भावों का अनुकीर्तन है।”5 नामवर सिंह ने भरतमुनि के ‘अनुकीर्तन’ की प्रक्रिया को अरस्तू के ‘इमिटेशन’ से संपृक्त करते हैं- "नाटक अनुकीर्तन हैं, उसे वास्तविक न समझो। जैसा कि ग्रीक में अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत है, इमिटेशन। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में भी इमिटेशन का सिद्धांत है। भरतमुनि के अनुकीर्तन के सिद्धांत को व्याख्यायित करते हुए अभिनवगुप्त ने कहा की पूरा का पूरा अनुकरण संभव नहीं है। अतः अनुकरण की जगह अनुकीर्तन कहा गया।”6 नामवर सिंह की इस मौलिक स्थापना ने भारतीय काव्यशास्त्र और पाश्चात्य काव्यशास्त्र के सापेक्षिक अध्ययन का मार्ग प्रशस्त किया।

नामवर सिंह ने यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि अनार्य जातियों को रस की सृष्टि का श्रेय दिया है- "भरतमुनि की कहानी से मालूम होता है कि रस नामक कला निधि केवल आर्यों की चीज नहीं है। आर्येतर लोगों ने ही रस की सृष्टि की। अन्य स्त्रोतों में भी रस को अथर्ववेद से सम्बद्ध माना जाता है जो कि अनार्यवेद कहा जाता है।"7 उनके अनुसार भरत लोक विवेक के समर्थक हैं। इसलिए उन्होंने रसोत्पत्ति में कवि की भूमिका को सर्वाधिक महत्त्व दिया है, क्योंकि कवि के हृदय का अमूर्त भाव ही प्रसंगानुसार मूर्तिमान् होकर अभिव्यक्ति होता है- “ जिस प्रकार शब्द में अर्थ सोया रहता है, उसी प्रकार हृदय में भाव। कवि के हृदय का भाव अमूर्त रूप से सोया रहता है... जो भाव कवि हृदय में अमूर्त होकर सोया रहता है, वही रगड़, संघर्ष, द्वंद्व के द्वारा रस बनता है।”8 भरतमुनि ने भाव के संयोग से रस की उत्पत्ति स्वीकार की है। उन्होंने आठ भाव और आठ रस की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके मत की समीक्षा करते हुए, दि.के.बेडकर ने श्रृंगार, वीभत्स, वीर एवं रौद्र को मूल रस माना तथा हास्य, अद्भुत, भयानक और करूण को इन रसों का अनुचर बताया। यहाँ भी नामवर जी ने अपनी मौलिक स्थापना देते हुए, रसों को केवल दो वर्गों में विभक्त किया है- "चार को भी दो में रिड्यूस किया है.... श्रृंगार, वीर, हास्य, अद्भुद प्रीतिकर हैं, वीभत्स, रौद्र, भयानक, करुण अप्रीतिकर। प्रथम सुखमूलक एवं दूसरा दुखमूलक।”9 नामवर जी मानते हैं कि ‘नाट्यशास्त्र’ का फलक अत्यंत विस्तृत है। यह नाट्य तत्वों की विधिवत् व्याख्या करने वाला ग्रंथ है, किंतु दुर्भाग्यवश वह केवल मुक्तक पद्य तक सीमित रह गया- “भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का रेंज बहुत व्यापक है। धीरे-धीरे संकुचित होते हुए अपना (काव्यशास्त्र का) क्षेत्र मुक्तक पद्य तक सीमित हो गया।”(10) नामवर सिंह ने पारंपरिक रसशास्त्र की पुनर्व्याख्या करते हुए, रस को आस्वाद की प्रक्रिया एवं अर्थ मीमांसा के साधन के रूप में देखा।

नामवर सिंह के अनुसार आनंदवर्धन का आठवीं शताब्दी एवं नौवीं शताब्दी के मध्य में विद्यमान थे। इन्होंने आनंदवर्धन को वृत्तिकार के साथ-साथ कारिकाकर भी माना है। आनंदवर्धन के अनुसार काव्य का उद्देश्य अतीत के धरोहरों की रक्षा करना है तथा उसकी श्रेष्ठता से सहृदयों को परिचित करवाना है। नामवर जी बताते हैं कि आनंदवर्धन ने ऐसा इसलिए कहा होगा, क्योंकि आठवीं-नौवीं शताब्दी तक संस्कृत काव्य रचना के युग का लगभग-लगभग समापन हो चुका था और लोकभाषा प्राकृत कविता की भाषा बन रही थी। इसलिए नामवर जी ने आनंदवर्धन को संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषा का कवि माना है- "वे कवि भी थे तथा संस्कृत और लोकभाषा प्राकृत दोनों में काव्य रचना करते थे।”11 नामवर सिंह के अनुसार आनंदवर्धन ने काव्य सौंदर्य की मौलिक व्याख्या की। उन्होंने सौंदर्य की प्रतीति के लिए ‘प्रतीयमान’ शब्द का प्रयोग किया। आनंदवर्धन की मान्यता है कि कवि की वाणी ही ‘प्रतीयमान’ का साधन है। इस प्रकार ‘प्रतीयमान’ का सीधा संबंध ‘काव्यात्मा’ से है। ‘प्रतीयमान’ काव्य में आह्लादक चारूता की वृद्धि करता है। नामवर सिंह ने ‘प्रतीयमान’ के दूसरे अर्थ पर भी विचार किया है। उन्होंने ‘प्रतीयमान’ का दूसरा अर्थ ‘व्यंग्यार्थ’ माना है तथा स्पष्ट किया है कि यह ‘व्यंग्यार्थ’ वाच्य से भिन्न है।

नामवर सिंह ने कुंतक का समय 950 ई. के आसपास माना है। कुंतक कई अर्थों में विलक्षण काव्यशास्त्री थे। कुंतक भारतीय काव्यशास्त्र के पहले आचार्य है, जिन्होंने व्यावहारिक समीक्षा के दौरान दूसरे काव्याचार्यों की कविता का उदाहरण प्रस्तुत करके व्याख्या-विश्लेषण किया है। कुंतक की विशिष्ट काव्यशास्त्रीय प्रतिभा को नामवर सिंह ने रेखांकित किया है- "कुंतक कई दृष्टि से अनोखे काव्यशास्त्री हैं। कुंतक की काव्यशास्त्रीय प्रतिभा का साक्ष्य कवि प्रतिभा, कवि व्यापार, क्रिएटिव इमेंजिनेशन की दृष्टि से समस्त काव्य चिंतन पर विचार करना है एवं संस्कृत काव्यशास्त्र में ऐसा करने वाले वे एक मात्र कव्यालोचक हैं। व्यावहारिक समीक्षा जो आधुनिक आलोचना का आभास देती है वह कुंतक में ही मिलती है।"12 आचार्य कुंतक ने व्यावहारिक समीक्षा में तुलनात्मक दृष्टि का प्रयोग किया है। उन्होंने कालिदास कृत ‘मेघदूतम्’, ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’, ‘कुमारसम्भवम्’ की आलोचना करते हुए, उनके गुण और दोष का सम्यक् निरूपण किया कुंतक के काव्यशास्त्री सिद्धांतों का अध्ययन करते हुए, नामवर सिंह ने स्पष्ट किया है कि कुंतक ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ की प्रतीति, नवीन प्रसंगोद्भावना एवं कवि प्रतिभा के विश्लेषण के प्रति विशेष रूप से सतर्क थे। उन्होंने ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ में नवीन प्रसंगोद्भावना और कवि प्रतिभा का सार्थक विवेचन किया है- “‘अभिज्ञानशाकुन्तलम्’ के एक से एक बारीक़ चीजों के विश्लेषण में कुंतक ने नए प्रसंगों की उद्भावना की महत्ता एवं कवि प्रतिभा के विश्लेषण में उसके प्रयोग की व्याख्या की है।"13

कुंतक ने कवि की प्रतिभा को काव्य का मूल माना है। उनके अनुसार ‘वक्रोक्ति’ कवि की प्रतिभा को मापने का माध्यम है। सर्वप्रथम कुंतक ने ही सिद्धांत के रूप में ‘वक्रोक्ति’ को व्याख्यायित किया। नामवर सिंह ने ‘वक्रोक्ति’ को अंग्रेजी के ‘डेवीएशन’ के समकक्ष माना है- “जब आप एक करेक्ट ग्रैमेंटिकल सेंटेंस से हटते हैं, तो वह ‘डेवीएशन’ है। सीधी बात, सीधा रास्ता, सीधी रेखा, जीवन और काव्य दोनों में दुर्लभ... वक्रता में कला है।"14 कुंतक की यह ‘वक्रता’ सौन्दर्यान्वेषण का परिणाम है। ‘सौन्दर्य’ कवि के मानस व्यापार का प्रतिफल है। कवि काव्य का स्रष्टा है। इसलिए कवि की उपेक्षा करके, कविता को नहीं समझा जा सकता है। नामवर सिंह के शब्दों में- "कवि प्रतिभा का विवेचन करते हुए कुंतक ने इसकी दो अवस्थाएँ बताई। पहला काम अन्वेषण का एवं दूसरा काम सान पर चढ़ाकर तराशने का। पहली अवस्था को सूझ कह सकते हैं।... दूसरी अवस्था में सान पर तराशी हुई प्रतिभा मणि हो जाती है।.... दूसरा स्फुरण, जीवन्त बनाना।”15 उनके लिए काव्य एक अखंड अविभाज्य इकाई है। जिसमें ‘वक्रोक्ति’ अलंकार की भूमिका में है तथा ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ अलंकार्य के रूप में। नामवर सिंह मानते हैं कि कुंतक ने काव्य को समग्रता में देखा है। उन्होंने ‘कंटेंट’ और ‘फॉर्म’ को अलग नहीं किया। नामवर जी ने कुंतक के ‘वक्रोक्ति सिद्धांत’ को नई समीक्षा के अमेरिकी विद्वान आर.पी.ब्लैकमोर के ‘लैंग्वेज एडजेस्टर’ के सिद्धांत से जोड़ा है।

नामवर सिंह के अनुसार, आचार्य अभिनवगुप्त 950 ई. से 1030 ई. के मध्य विद्यमान थे। अभिनवगुप्त ने ‘अभिनवभारती’ नाम से ‘नाट्यशास्त्र’ की टीका लिखी। इन्होंने भरत के रस विवेचन और कुंतक के सहृदय की अवधारणा को पुनर्व्याख्यायित किया। नामवर सिंह के शब्दों में- “काव्यशास्त्र के सुमेरू थे-अभिनवगुप्त। सहृदयता की जो परम्परा कुंतक से प्रारंभ हुई थी, उसे चरमोत्कर्ष तक पहुँचाने का श्रेय इन्हें है। काव्य की रसज्ञता एवं चिंतन का मणिकांचन योग उनके यहाँ मिलता है।”(16) आचार्य अभिनवगुप्त ने आचार्य भरत के द्वारा प्रतिपादित ‘भावानुकीर्तन’ के दर्शन पर पर्याप्त विचार करते हुए, नाटक को ‘अनुकरण’ न मानकर, उसे ‘अनुव्यवसाय’ माना है। नामवर जी स्पष्ट करते हैं कि अभिनवगुप्त ने ‘अनुव्यवसाय’ को ‘अभिज्ञान’ के रूप में विवेचित किया है। इसमें व्यक्ति के स्थान पर भावों के अनुकरण की प्रक्रिया लेखन, नट के प्रदर्शन और सहृदय के स्तर पर होती है- “अनुव्यवसाय की मान्यता के माध्यम से अभिनवगुप्त ने सृजनशीलता का सिद्धांत प्रस्तुत करते हुए एक साथ तीन व्यक्तियों की स्वतंत्रता के द्वार खोल दिए।"(17) नामवर सिंह मानते हैं कि अभिनवगुप्त की व्याख्यों ने नाटक को लौकिक से अलौकिक बना दिया। यह आलौकिकता अद्वितीय कोटि की है, जिसे दुबारा न तो बनाया जा सकता है और न ही पाया जा सकता है। अभिनवगुप्त की इन सृजनशील व्याख्याओं ने रस को अलौकिक और सर्वोच्च बना दिया‌।

भारतीय काव्यशास्त्र के प्रत्येक संप्रदाय एवं उनके प्रर्वतक तथा अनुपालक आचार्यों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से ‘सहृदय’ की अवधारणा पर विचार किया है। भारतीय काव्यशास्त्र के समर्थ अध्येता के रूप में नामवर सिंह ने भी ‘सहृदय’ की अवधारणा का विवेचन किया। भारतीय काव्यशास्त्र के ‘सहृदय’ को पाश्चात्य काव्यशास्त्र में सामान्य पाठक या आदर्श पाठक कहा गया है। नामवर सिंह का मत है कि संस्कृत काव्यशास्त्र का ‘सहृदय’ तत्कालीन समाज का अभिजन वर्ग है। संस्कृत काव्यशास्त्र की रचना भी अभिजनों ने की थी तथा इसका पाठक भी अभिजन ही था- “संस्कृत काव्यशास्त्र में आदर्श पाठक की तरह एक सहृदय पाठक की अवधारणा है जो तत्कालीन भारतीय समाज का अभिजन है.... प्राचीन संस्कृत काव्यशास्त्र की रचना रसिक अभिजनों द्वारा की गई और इसका संवाद भी उन्हीं अभिजनों से था।"(18) ‘सहृदय’ की पृष्ठभूमि स्पष्ट करते हुए, नामवर सिंह ‘रीडर रिस्पांस’, ‘कॉमन रीडर’, ‘क्लोज रीडर’ तक जाते हैं। नामवर सिंह ने भारतीय काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों का अध्ययन करते हुए, पाश्चात्य काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों पर सम्यक् रूप से विचार किया है। उन्होंने पाश्चात्य काव्यशास्त्र के ‘रेटोरिक’, ‘पोइतिक्स’ एवं ‘एस्थेटिक्स’ में विभेद तो करते हैं, किंतु अंततः इनकी गणना भारतीय काव्यशास्त्र में वर्णित ‘सौन्दर्य’ के विविध भेदों के अंतर्गत करते हैं।

नामवर सिंह की भारतीय काव्यशास्त्र संबंधित अवधारणा आनंद के. कुमार स्वामी, सुशील कुमार डे एवं गणेश त्र्यंबक देशपांडे के विचारों से प्रेरित है। नामवर सिंह इन विद्वानों से इसलिए सहमत हैं क्योंकि इन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्र में निहित ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ की मीमांसा शक्ति को रेखांकित किया है तथा यह भी स्वीकार किया है कि संस्कृत काव्यशास्त्र अपनी परिधि में अन्य कलाओं को भी शामिल कर सकती है। इन विद्वानों ने विभिन्न काव्यशास्त्रीय संप्रदायों के स्थान पर भारतीय काव्यशास्त्र को समग्रता में विवेचित करने का सूत्र दिया। नामवर सिंह इस दृष्टि से भी पूर्णतः सहमत हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा आचार्य भरत से लेकर पंड़ितराज जगन्नाथ तक जाती है। सभी संप्रदाय सहयात्री हैं, तभी तो भरत ‘रीति’ को ‘वृति’कहते हैं और आनंदवर्धन ‘संघटना’। अलंकारों में भी ‘वक्रोक्ति’ की चर्चा होती है तथा ‘वक्रोक्ति’ संप्रदाय के रूप में भी सर्वस्वीकृत है। नामवर सिंह ने समस्त काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों के अंतर्संबंधों एवं अंतर्विरोधों का विश्लेषण किया। इसके पश्चात् उन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्र के समस्त सिद्धांतों को सहयात्री के रूप में देखने आग्रह किया। भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ पर नामवर सिंह का यह कथन उनकी समग्रता के आग्रह का प्रमाण है - “भरतमुनि का नाट्यशास्त्र, अलंकारशास्त्र भी है, काव्यशास्त्र भी और सौंदर्यशास्त्र अथवा कलाशास्त्र भी।"(19) कथन का तात्पर्य यह है कि भारतीय काव्यशास्त्रीय संप्रदायों के अंतर्संबंधों का समग्रता में मूल्यांकन करके ही काव्य के मूलार्थ को समझा जा सकता है, अन्यथा नहीं। इसलिए नामवर सिंह काव्यशास्त्र का अनुशीलन करने के पूर्व संप्रदायगत राग-द्वेष की भावना के संकुचित मंडलों से ऊपर उठने का आग्रह करते हैं। उनके अनुसार- "संस्कृत काव्यशास्त्र का विकास क्रमिक विकास था 'होरिजेंटल' (क्षैतिज) था, जिसका समापन रस एवं ध्वनि की पूर्णता में हुआ। रस एवं ध्वनि का प्रभुत्व बनाए रखते हुए उसमें अन्य चीजों की 'हायरार्की' (पदानुक्रम) स्थापित की गई।"(20) काव्यशास्त्र की समग्रता पर बल देते हुए नामवर सिंह ने घोषित किया है कि काव्यशास्त्र का प्रयोजन साहित्य के सिस्टम को समझना है।

स्पष्ट है कि ‘वाचिक परंपरा’ के आलोचक के रूप में नामवर सिंह ने काव्यशास्त्र के क्षेत्र में अनेक मौलिक स्थापनाएँ दी तथा पूर्ववर्ती आचार्यों के सिद्धांतों का मौलिक विश्लेषण किया। उन्होंने स्थापित काव्यशास्त्रीय मान्यताओं से टकराते हुए, अपने आलोचकीय व्यक्तित्व का विस्तार किया। नामवर सिंह ने काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों की समीक्षा करके परंपरा से संवाद स्थापित किया, जिससे उनके व्यक्तित्व को सहमति का विवेक और असहमति का साहस प्राप्त हुआ। उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों और पाश्चात्य काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों का सापेक्षिक अध्ययन किया। काव्यशास्त्र को समग्रता में विवेचित करने के पक्षधर नामवर सिंह, पाश्चात्य काव्यशास्त्र की द्वैध परंपरा का विरोध करते हैं। ‘सहृदय’ की व्याख्या ‘रीडर रिस्पांस’, ‘कॉमन रीडर’, ‘क्लोज रीडर', ‘आइडियल रीडर’ की पृष्ठभूमि के आधार पर करते हैं। भारतीय काव्यशास्त्र में वर्णित सौंदर्य के विविध भेदों के अंतर्गत ‘रिटोरिक’, ‘एस्थेटिक्स’, ‘पोलिटिक्स’, ‘लिटरेरी क्रिटिसिज्म’ की गणना करते हैं। आचार्य भरत के विवेचन से लेकर पंड़ितराज जगन्नाथ तक के काव्यशास्त्रीय चिंतन की परंपरा को अविभाज्य तथा अखंडित बताने वाले नामवर सिंह ने ‘सेन्स ऑफ टाइम’ और ‘सेन्स ऑफ प्लेस’ पर गंभीरता से विचार किया। उनकी काव्यशास्त्रीय आलोचना एक साथ भारतीय काव्यशास्त्र और पाश्चात्य काव्यशास्त्र से संवाद स्थापित करती है। उन्होंने अपने वैचारिक बहसों के माध्यम से पूर्ववर्ती काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों की व्याख्याओं से सहमति-असहमति प्रकट करते हुए, हिंदी की काव्यशास्त्रीय समीक्षा पद्धति को जनतांत्रिक मूल्यों से संपृक्त किया।

संदर्भ :
1). विद्यानिवास मिश्र, देश, धर्म और साहित्य, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण: 2010, पृ.55
2). कमला प्रसाद(संपा.), आलोचना की दूसरी परंपरा, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण: 2005, पृ.15
3). आशीष त्रिपाठी(संपा.), आलोचना और विचारधारा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण: 2012, पृ.141-142
4). शैलेश कुमार, मधुप कुमार, नीलम सिंह(संपा.), नामवर के नोट्स, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण: 2016, पृ.90
5). वही, पृ.92
6). वही, पृ.93
7). वही, पृ.93
8). वही, पृ.96
9). वही, पृ.100
10). वही, पृ.103
11). वही, पृ.75
12). वही, पृ.55
13). वही, पृ.72
14). वही, पृ.57
15). वही, पृ.63
16). वही, पृ.112
17). वही, पृ.115
18). योगेन्द्र प्रताप सिंह, हिंदी साहित्य का इतिहास और उसकी समस्याएँ, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण: 2016, पृ.40
19). शैलेश कुमार, मधुप कुमार, नीलम सिंह(संपा.), नामवर के नोट्स, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण: 2016, पृ.25
20). अवधेश कुमार सिंह, समकालीन आलोचना विमर्श, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण: 2016, पृ.44

आकाश शंकर
शोधार्थी, हिंदी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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