नामवर सिंह की कहानी आलोचना
कहानी की प्रतिष्ठा और इसकी समीक्षा के नये प्रतिमान-निर्माण का सार्थक प्रयास
- इन्द्रमणि कुमार
आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित हज़ारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ रामविलास शर्मा के बाद हिन्दी साहित्य को अपने आलोचनात्मक अवदान से समृद्ध करने वाले लोगों में नामवर सिंह का नाम उल्लेखनीय है। 20वीं शताब्दी के छठवें दशक के पूर्वार्द्ध से लेकर 21वीं शताब्दी के दूसरे दशक के उत्तरार्द्ध तक लगभग 70 वर्षों की अपनी रचनात्मक यात्रा में उन्होंने हिन्दी आलोचना के क्षितिज को विस्तृत किया। नामवरजी के पढ़ने, लिखने, सोचने और बोलने का दायरा व्यापक है। इसमें अपभ्रंश से लेकर 21वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों तक का हिन्दी साहित्य, हिन्दीत्तर भाषाओं का भारतीय साहित्य, काव्यशास्त्र की भारतीय एवं पाश्चात्य परंपराएँ, इतिहास, राजनीति, दर्शन, समाजशास्त्र - सब शामिल हैं। उनके समग्र आलोचना-कर्म पर की जाने वाली कोई भी चर्चा पर्याप्त विस्तार की अपेक्षा रखती है। एक छोटे से लेख में उनका परिचयात्मक विवरण ही दिया जा सकता है। इसीलिए प्रस्तुत आलेख में सिर्फ उनकी कहानी-आलोचना से जुड़े सन्दर्भों को समेटने और उन पर विचार करने की कोशिश की गई है।
हिन्दी आलोचना की गौरवशाली परंपरा को समृद्ध करने वाले आलोचकों में नामवर सिंह का नाम महत्त्वपूर्ण है। उनकी गिनती प्रगतिवादी आलोचना की आधार-भूमि को विस्तृत करने वाले आलोचक के रूप में की जाती है। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है कि यदि रामविलास शर्मा ने प्रगतिशील आलोचना को "जातीय और हिन्दी पाठकों की दृष्टि में विश्वसनीय बनाने का काम किया तो उसे सक्रिय आंदोलन के रूप में जीवित रखने और इस दिशा में हिन्दी भाषी बुद्धिजीवी-युवकों में तत्संबंधी रुचि जागृत करने का दायित्व नामवरजी ने पूरा किया।"¹ उनका महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने साहित्य के सन्दर्भ में जड़ शास्त्रवाद, शुद्ध कलावाद और प्रतिक्रियावाद का हमेशा विरोध किया। विचारों से प्रगतिशील होने के बावज़ूद प्रगतिवादी आलोचना की अतिवादिताओं का भी।
नामवरजी के अध्ययन और आलोचना का दायरा काफी विस्तृत था। अपभ्रंश से लेकर इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों तक के हिन्दी साहित्य पर वे लगातार लिखते-बोलते रहे। कविता, कहानी, उपन्यास,आलोचना जैसी विधाओं की प्रकृति और इनसे संबंधित साहित्य पर उन्होंने गंभीरता से विचार किया है। संस्कृत से लेकर आज तक की भारतीय और पाश्चात्य साहित्य चिंतन परंपरा की उन्हें गहरी समझ थी। हिन्दी ही नहीं, तमाम भारतीय भाषाओं में लिखे गये और लिखे जा रहे साहित्य में उनकी गहरी दिलचस्पी थी। विश्व साहित्य की अधुनातन प्रवृत्तियों से वे परिचित थे। सबसे बड़ी बात यह कि साहित्य के अलावा इतिहास, राजनीति विज्ञान, समाजशास्त्र और समाज विज्ञान के विभिन्न विषयों एवं ज्ञानानुशासनों की भी उन्हें पर्याप्त जानकारी थी।
लेकिन नामवर सिंह को सिर्फ आलोचक कहना उनका आधा-अधूरा परिचय देना है। उन्होंने अपने रचनात्मक जीवन की शुरुआत कविताओं से की। "जिन लोगों ने उनकी कविताएँ पढ़ी या सुनी है, वे कहते हैं कि उनका कवि रूप उनके आलोचक रूप से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है।"² वे एक अच्छे निबंधकार भी थे। महज 24-25 वर्ष की उम्र में, अपने विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने पचासों निबन्ध लिखे। इनमें से कुछ निबंध 'बकलम खुद'(1951) में संकलित हैं । वे एक ऐसे अध्यापक थे जिन्होंने साहित्य के अध्ययन-अध्यापन, सृजन-समीक्षा और संपादन से जुड़े योग्य और स्वतंत्रचेता विद्यार्थियों की कई पीढ़ियाँ तैयार की। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य ही था - युवा पीढ़ी में स्वतंत्र चेतना और उत्तरदायित्वपूर्ण असहमति-विवेक का विकास। उन्होंने लिखा है - "गुरु की चिंतन परंपरा का विकास उत्तरदायित्वपूर्ण असहमति का साहसी शिष्य ही कर सकता है, सतत सहमति का भीरु सेवक नहीं और स्थिति यह है कि अब के आचार्य सेवक चाहते हैं, शिष्य नहीं। इस वातावरण में जहाँ कोई कुमारिल ही नहीं, वहाँ कोई प्रभाकर क्या होगा?"³ ये पंक्तियाँ अध्यापन के विषय में उनके आदर्शों और चिंताओं का परिचय देती हैं। वे एक गंभीर संपादक भी थे। 'जनयुग' और 'आलोचना' जैसी पत्रिकाओं के संपादक के रूप में उन्होंने जो पहचान बनाई उससे हम सब परिचित हैं। लोगों का कहना है कि एक वक्ता के रूप में उन्हें जितनी ख्याति मिली संभवत: उनके समय में हिन्दी के किसी विद्वान को नहीं।
नामवरजी की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इनके नाम हैं- बक़लम खुद (1951), हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग (1952) आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (1954) छायावाद (1955) पृथ्वीराज रासो की भाषा (1956) इतिहास और आलोचना (1957) कहानी : नई कहानी (1965) कविता के नए प्रतिमान (1968) दूसरी परंपरा की खोज (1982) और वाद विवाद संवाद (1990)। इसके अलावा समीक्षा ठाकुर ने उनके द्वारा दिए गए साक्षात्कारों को 'कहना न होगा' और 'बात-बात में' शीर्षक पुस्तकों में संकलित किया है। उनके विद्यार्थियों ने 'नामवर के नोट्स' (शैलेश कुमार, मधुप कुमार, नीलम सिंह) तथा 'पाश्चात्य आलोचक और आलोचना' (राजकुमार, उदयभान दुबे) शीर्षक से क्रमशः भारतीय और पाश्चात्य काव्यशास्त्र पर केंद्रित उनके क्लास नोट्स का संकलन और संपादन किया। आशीष त्रिपाठी के संपादन में उनके व्याख्यानों और अब तक अनुपलब्ध लेखों के कई संकलन प्रकाशित हुए हैं। इन पुस्तकों से गुजरते हुए नामवर जी के अध्ययन-मनन की व्यापकता और गहराई का पता चलता है।उनके समग्र लेखन और सृजन कर्म पर गंभीर चर्चा काफी विस्तार की अपेक्षा रखता है। इसलिए प्रस्तुत आलेख की संदर्भ परिधि में सिर्फ उनकी कहानी - आलोचना को सम्मिलित किया गया है।
नामवरजी के कहानी संबंधी आलेख मुख्यतः 'कहानी : नई कहानी' नामक पुस्तक में संकलित हैं जिसे उन्होंने लगभग एक दशक (1956 - 1965) की अपनी 'चिंतन यात्रा की पगडंडी' कहा है। इसमें उपर्युक्त अवधि में लिखे गए उनके ऐसे आलोचनात्मक निबंध हैं जिनका सम्बन्ध 'कथा - समीक्षा की एक पद्धति निकालने की कोशिश', उस दौर में लिखी जा रही कहानियों की प्रकृति की पहचान, और उनके वैशिष्टय - रेखांकन से है। पुस्तक के प्रकाशन से पहले ये निबंध 'कहानी,' कृति', 'नई कहानियाँ' और 'माया' जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थे। इनका लेखन कहानी - समीक्षा को लेकर हिन्दी आलोचना की उदासीनता से उत्पन्न असंतोष की जमीन पर हुआ था। नामवरजी ने लिखा है "हिंदी आलोचना जो अभी तक मुख्यतः काव्य - समीक्षा रही है, कविता से इतर कथा, नाटक आदि साहित्य रूपों का विधिवत विश्लेषण करके ही अपने को सुसंगत एवं समृद्ध बना सकती है। कहानी समीक्षा संबंधी ये निबंध इसी दिशा में विनम्र प्रयास हैं।"⁴ उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि "मेरी अपनी सीमा यह है कि मैं अब तक मुख्यत: काव्य का पाठक रहा हूँ। कहानियाँ मैंने कम पढ़ी हैं और उनमें अंतर्निहित सत्य को समझने और व्यक्त करने की भाषा भी अब तक नहीं तय कर पाया हूँ।"⁵
अपने समय की कथा समीक्षा के परिदृश्य को लेकर यह असंतोष और इस दिशा में किए जाने वाले प्रयास की जरूरत उस दौर के अन्य आलोचक और रचनाकार भी समझ रहे थे। देवीशंकर अवस्थी ने इस बात की चर्चा की है कि हिंदी में कविता की आलोचना छायावाद में ही बहुत ऊँचाई पर पहुँच गई थी। आचार्य शुक्ल ने उसे शिखर पर स्थापित कर दिया था। लेकिन नाटक के साथ-साथ कथा समीक्षा बहुत पिछड़ी अवस्था में थी। प्रगतिवादी आलोचना का इन रूपों की ओर ध्यान गया जरूर, किन्तु वहाँ भी इन पर विचार 'कला - रूप' के संदर्भ में नहीं, 'सामाजिक इतिहास, वर्ग संघर्ष का शस्त्र या कांता सम्मित उपदेश' - जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहा। डॉ. रामविलास शर्मा की पुस्तक 'प्रेमचंद और उनका युग' से उनकी शिकायत है कि इसमें प्रेमचंद के एक भी उपन्यास का विश्लेषण उसकी आंतरिक कलात्मक सत्ता को ध्यान में रखकर नहीं किया गया। कहानियों की ओर तो उनका ध्यान गया ही नहीं। उन्होंने टिप्पणी की कि इस पुस्तक में वे सिर्फ प्रेमचंद के उपन्यासों में उठाई गई समस्या और उसके समाधान को 'कच्ची पक्की रोकड़ों में खतियाते चलते हैं।' इसी तरह की शिकायत उन्हें अज्ञेय जैसे लेखकों से भी थी और इस सन्दर्भ में विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों द्वारा अपनाए गए 'एकेडमिक सुविधावाद' से भी। इन परिस्थितियों में वे मोहन राकेश और राजेंद्र यादव जैसे नये कथाकारों के साथ-साथ भैरव प्रसाद गुप्त और नामवरजी की भूमिका को रेखांकित करते हुए लिखते हैं-"हिंदी में कहानी की वास्तविक चर्चा सन् 1955 के आसपास प्रारंभ होती है कहानी पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के बाद ही। मोहन राकेश के कहानी संग्रह 'नये बादल' (जनवरी, 57) और राजेंद्र यादव के कहानी संग्रह 'जहाँ लक्ष्मी कैद है' (अगस्त, 57)की भूमिकाएँ इस कहानी संबंधी नई समीक्षा चेतना को व्यक्त करती हैं। यूँ संपादक के रूप में भैरव प्रसाद गुप्त और समीक्षक के रूप में नामवर सिंह ने कहानी संबंधी चर्चा को शुरू से ही विशिष्ट योग दिया है।"⁶
क्या था नामवरजी का विशिष्ट योग? कहानी आलोचना को लेकर उनकी चिंताएँ क्या थी? कहानी समीक्षा के उनके मानदंड क्या थे? हिन्दी कथा लेखन और कथा आलोचना को नयी दिशा देने में उनकी क्या भूमिका है? हिंदी के कथाकार और आलोचकों ने नामवरजी की कथा-समीक्षा को किस तरह से लिया? प्रस्तुत आलेख में इन्हीं सवालों पर विचार करने का प्रयास किया गया है।
इस संदर्भ में नामवरजी दो काम करते नजर आते हैं। पहला कहानी की तात्विक और शास्त्रीय समीक्षा परंपरा से इतर इसकी पाठ-प्रक्रिया के नए तरीकों की प्रस्तावना और दूसरा अपने समय में प्रकाशित कहानियों की समीक्षा के माध्यम से कहानी लेखन और आस्वादन की नई दिशाओं की पहचान। कहानी समीक्षा के क्षेत्र में किए गए इन प्रयासों को उन्होंने ‘सहयोगी प्रयास’ कहा। हालाँकि बाद में उन्होंने इस बात की भी चर्चा की कि ‘ज्यादातर लेखकों ने विरोध के द्वारा ही सहयोग’ किया।
नामवरजी की चिंता हिन्दी आलोचना में कहानी को एक गंभीर साहित्यिक विधा के रूप में स्वीकृत दिलाने की है। उन्होंने लिखा कि अब तक के आलोचकों ने कहानी को 'मनोरंजन' के लिए पढ़ा और 'शिल्प' के रूप में आलोचित किया। इनके द्वारा कहानी आलोचना के नाम पर कहानी का सारांश बताते हुए उनका परिचयात्मक विवरण दिया गया है या फिर कथानक, चरित्र,वातावरण आदि अलग-अलग अवयवों में बाँटकर इसकी 'जीवनी शक्ति का अपहरण' कर लिया गया है। उन्हें इस बात की तकलीफ थी कि "जहाँ साहित्य के मान और मूल्यों की चर्चा होती है वहाँ कहानियों के हवाले नहीं मिलते।...यदि शास्त्रीय आलोचक कहानी को केवल साहित्य रूप समझते हैं तो मूल्यवादी आलोचक उसे जीवन की सार्थक अनुभूतियों के लिए असमर्थ मानते हैं। संभवत: जीवन के लघु प्रसंगों को लेकर लिखी जाने वाली कहानी स्वयं भी 'लघु' समझी जाती है।"⁷ इस सन्दर्भ में वे लिखते हैं कि "कहानी जीवन के इस छोटे पक्ष या टुकड़े में निहित 'अंतर्विरोध, 'द्वन्द्व', 'संक्रांति' या 'क्राइसिस' को पकड़ने की कोशिश करती है और ठीक ढंग से पकड़ में आ जाने पर यह खंडगत अंतर्विरोध ही वृहद अंतर्विरोध के किसी-न-किसी पहलू का आभास दे जाता है।"⁸ उन्होंने इस सामान्य समझ का भी खंडन किया कि सिर्फ कहानियाँ लिखकर कोई व्यक्ति बड़ा रचनाकार नहीं बन सकता।
कहानी की पूर्व प्रचलित समीक्षा पद्धतियों के समानांतर कहानी-समीक्षा के नए मूल्य और मानक गढ़ने की कोशिश में नामवरजी 'वर्तमान वास्तविकता के सम्मुख उसकी सार्थकता' को परखने का प्रस्ताव देते हैं। वे कहानी के 'कहानीपन' को समझने की बात करते हैं और इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि जो जगह कविता में लय का है, वही कहानी में कहानीपन का। उन्हें कहानी समीक्षा की 'एक व्यापक और निश्चित भाषा' के निर्माण की जरूरत का अहसास होता है। वे अपने समय के कथाकारों और कहानियों के समर्थ पाठकों के सहयोग से 'कहानी समीक्षा के संतुलित प्रतिमान' तैयार करने की बात करते हैं।
नामवरजी ने कहानियों की 'पाठ-प्रक्रिया' पर विशेष जोर दिया है। उन्हें लगता है कि किसी अच्छी कृति का निर्णय करने के लिए एक बने-बनाये मानदंड से आरंभ करने की अपेक्षा पढ़ने की प्रक्रिया से शुरू करना अधिक उपयोगी हो सकता है। इस संदर्भ में वे साधारण पाठक की सहज दृष्टि की भूमिका को रेखांकित करते हैं। इस हिदायत के साथ कि इस 'सहज दृष्टि' को 'साधारण दृष्टि' का पर्याय न समझा जाय। क्योंकि 'पोथी पढुए पंडित' जहाँ चूक जाते हैं वहाँ यह 'सहज दृष्टि' जड़ों तक पहुँचने की क्षमता रखती है। नामवरजी का यह भी मानना है कि एक अच्छा पाठक कहानी का सिर्फ प्रभाव ग्रहण नहीं करता बल्कि कहानी की पाठ- प्रक्रिया से गुजरते हुए उसकी एक 'प्रतिमा' का निर्माण करता है, उसे 'ट्रांसलेट' करता है। इसके लिए वे पाठक के भीतर आत्मीयता, समझदारी और यथाशक्ति मूल की रक्षा करने की क्षमता को जरूरी मानते हैं।
अपने समय में लिखी जा रही कहानियों पर बात करते हुए नामवरजी सांकेतिकता को उसकी महत्त्वपूर्ण विशेषता मानते हैं। उनकी स्थापना है कि सांकेतिकता की इस प्रवृत्ति को पूर्ववर्ती कहानियों में भी देखा जा सकता है। लेकिन पूर्ववर्ती कथाकार इसका सहारा कभी ही कभी लेते थे, आज का लेखक अक्सर इसका सहारा लेता दिखाई देता है। पूर्ववर्ती कहानियों में जहाँ कहानी के आधारभूत विचार का अंत में संकेत कर दिया जाता था,वहीं नई कहानी का पूरा का पूरा 'स्ट्रक्चर’ तथा 'टेक्सचर' ही सांकेतिक है। नया कहानीकार अपनी कहानी में जगह-जगह संकेत देता चलता है ये संकेत न सिर्फ परस्पर संबद्ध होते हैं अपितु उनकी संरचना आवयविक होती है। इस प्रकार आधारभूत विचार किसी एक जगह स्थिर नहीं रहता अपितु पूरी कहानी में प्रवाहित होता रहता है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अभीष्ट विचार अथवा भाव को सांकेतिक बनाने के लिए नए कथाकारों ने वातावरण पर विशेष बल दिया है। लेकिन पुरानी कहानियों की तरह वातावरण यहाँ सजावट का उपकरण या ‘अलंकरण' मात्र नहीं, पूरी कहानी का 'अंत:करण' है। उन्होंने यह भी कहा कि कहानी में वातावरण सृष्टि के लिए नये कथाकारों ने नए बिंबो की सृष्टि की जो उनके विकसित इंद्रियबोध का प्रमाण देते हैं।
कहानी पर बात करते हुए नामवरजी भावुकता का प्रश्न भी उठाते हैं।उनका मानना है कि भावुकता के कारण जीवन की जटिलताओं को समझने और उन्हें व्यक्त करने की रचनाकार की क्षमता में कमी आती है। एक ओर यह ‘दृष्टिगत वास्तविकता’ पर ‘भावनात्मक कुहासा’ डालने का काम करती है तो दूसरी ओर इससे कहानी के रचना विधान में ‘निर्जीव सपाटता’ आती है। भावुकता कहानी के कथ्य, विन्यास, भाषा और प्रभावात्मकता - सब पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने द्विजेंद्रनाथ ‘निर्गुण’ की ‘एक शिल्पहीन कहानी’, विष्णु प्रभाकर की ‘धरती अब भी घूम रही है’ तथा उषा प्रियंवदा की ‘वापसी’ कहानी पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि जहाँ पहली दो कहानियाँ भावुकता को लेकर रचनाकार के अतिरिक्त आग्रह के कारण नाटकीय और प्रभावहीन लगती हैं, वहीं तीसरी कहानी में भावुकता की जगह रचनाकार की तटस्थता अपने समय के जीवन की एक नई और भयावह स्थिति का साक्षात्कार करा पाने में समर्थ साबित होती है। उन्होंने यह भी कहा कि इन कहानियों में दिखाई पड़ने वाला अंतर सिर्फ दो कहानियों का या दो कहानीकारों की रचनात्मक दृष्टि का अंतर नहीं है। इसे कहानी के दो युगों के बोध के अंतर के रूप में पढ़ा जा सकता है। यहाँ नामवरजी ‘भावुकता’ और ‘भाव प्रवणता’ में अंतर करते हैं। वे ऐसी भावुकता का विरोध करते हैं जो लेखक की दृष्टि को आंसुओं से धुंधली कर दे।
आरंभिक दिनों में ‘नई कहानी’ पर यह आरोप लग रहा था कि यह कहानी पूर्ववर्ती कहानियों का अनुसरण या ‘डिस्टार्टेड’ प्रस्तुतीकरण है। इस दौर में लिखी जा रही ग्राम कथाओं को प्रेमचंद का विकृत संस्करण तथा शहरी कथाओं को विदेशी रचनाकारों की नकल बताया गया। यह भी कहा गया कि शिल्प चमत्कार के अलावा इनमें कुछ भी नया नहीं है। नामवरजी इन बातों का खंडन करते हैं। वे कहते हैं कि नई कहानियों में नवीनता केवल शिल्पगत नहीं है बल्कि इसके मूल में नए परिवेश और उसे देखने की कलाकार की नवीन दृष्टि है। उन्होंने रेखांकित किया कि नये कहानीकारों के पास आजादी के बाद देश की परिवर्तित परिस्थितियों के दबाव में बदलती हुई सामाजिक वास्तविकताओं, मानवीय संबंधों और अनुभवों को देखने-समझने की न सिर्फ नई दृष्टि है अपितु उन्हें अभिव्यक्त करने के लिए नई शिल्प प्रविधियों के प्रयोग की योग्यता भी। उनका मानना था कि इसके चरित्र भी जीवन की वास्तविकताओं के ऐतिहासिक विकास के प्रतीक हैं। उन्होंने लिखा “मार्कंडेय के किसान चरित्र जीवन की जिन परिस्थितियों के संदर्भ में चित्रित हुए हैं वे आधुनिक भूमि सुधारों और विकास योजनाओं से संबद्ध हैं और उनकी भूमि समस्याएँ नई जीवन व्यवस्था तथा मानसिक अवस्था को व्यंजित करती हैं। इसी प्रकार भीष्म साहनी, मोहन राकेश तथा अमरकांत की कहानियों में नवीन आर्थिक परिस्थितियों का सामना करने वाले निम्न मध्यवर्गीय व्यक्तियों की लाचारी, पीड़ा, आत्मप्रवंचना और जिजीविषा आदि मनःस्थितियों का कलापूर्ण मार्मिक चित्रण मिलता है। राजेंद्र यादव, निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती तथा मन्नू भंडारी ने निम्न मध्यवर्गीय स्त्री पुरुष के सामाजिक संबंध की नैतिक और मानसिक समस्याओं के नए परिवर्तित रूप का भावपूर्ण चित्रण प्रस्तुत किया है’’⁹
नई कहानी के संदर्भ में नामवरजी ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि “इस बीच अपने यहाँ कहानी, उपन्यास, नाटक, रेखाचित्र, डायरी, संस्मरण आदि विविध गद्य रूपों तथा कविता के बीच आपसी विनिमय काफी हुआ है।”¹⁰ थोड़ी चुटकी लेते हुए वे कहते हैं “बेशक इस विनिमय से वे परेशान होंगे, जिनके लिए साहित्य की हर विधा एक ईश्वर प्रदत्त(?) चौखटा है। लेकिन जिनके सामने विविध साहित्य रूपों का इतिहास स्पष्ट है वे जानते हैं कि किस प्रकार मानव की संवेदनाओं के विकास के साथ अभिव्यक्ति के विविध रूप पैदा हुए और बदले।”¹¹ उन्होंने ‘रसप्रिया’, ‘परिंदे’, ‘एक कमजोर लड़की की कहानी’ आदि कहानियों को मिश्रित शिल्प की कहानी कहते हुए इनकी समीक्षा के लिए नए प्रतिमानों की जरूरत पर बल दिया। साहित्यिक विधाओं के बीच बढ़ते इस मेलजोल की चर्चा निर्मल वर्मा ने भी अपने निबंधों में किया है।
नामवरजी कहानी के संदर्भ में ‘फैंटेसी’ के रचनात्मक प्रयोग पर बात करते हैं। वे इस सवाल को सामने रखते हैं कि आदिम लोक कथाएँ, परी कथाएँ व ऐन्द्रजालिक कहानियों की दुनिया महज काल्पनिक सृष्टि हैं या फिर इनका संबंध किसी न किसी रूप में जीवन की वास्तविकता से भी है? वे पूछते हैं क्या काफ्का की कहानी ‘मेटामारफोसिस’ की दुनिया अवास्तविक है? क्या वास्तविक दुनिया महज हमारी अतिपरिचित दुनिया है? क्या ऐसा नहीं है कि हम अपनी अतिपरिचित दुनिया को ही वास्तविक दुनिया मानकर इसके अंदर छिपी असली दुनिया को देख नहीं पाते? क्या काफ्का की कहानी हमारे सामने इस असली दुनिया को ही उद्घाटित नहीं करती? वे लिखते हैं “आज की समस्या ही यही है कि दिन पर दिन लोग अपने आप में सिमटते जा रहे हैं। स्वर्गीय गुलेरी जी ने इसे ‘कछुआ धर्म’ कहा था।…. यथार्थ के नाम पर नितांत वर्तमान से चिपकते जाना।… ऐन्द्रजालिक कहानी समय के इस सिमटते दायरे को तोड़ती हैं।”¹² वे ‘नीलम देश की राजकन्या’ (जैनेंद्र) और ‘स्वर्ग के खंडहर में’ (प्रसाद) जैसी कहानियों के विश्लेषण के माध्यम से इस बात को सामने रखते हैं कि ये कहानियाँ वास्तविकता के नए-नए स्तरों का उद्घाटन भी करती हैं।
नामवरजी ने नई कहानी पर बात करते हुए जिस रचनाकार की सर्वाधिक प्रशंसा की है वे हैं निर्मल वर्मा। उन्होंने उनके संग्रह ‘परिंदे’ को ‘नई कहानी की पहली कृति’ कहा। इस टिप्पणी के साथ कि इस संग्रह की कहानियों को पढ़ते हुए यह विश्वास नहीं होता कि ये उसी भाषा की कहानियाँ हैं जिनमें अभी तक ‘शहर, गाँव, कस्बा और तिकोने प्रेम’ को ही केंद्र में रखकर कहानियाँ लिखी जा रही थी। उन्होंने इस तथ्य को रेखांकित किया कि यह कहानी अलग-अलग कोणों से मानव मुक्ति का प्रश्न उठाने वाली और ‘विरासत में मिले फार्मूले’ से मुक्त होकर जीवन का साक्षात्कार कराने वाली कहानियाँ हैं। इन कहानियों में ‘जीवन की गहरी समझ’, ‘दुर्लभ अनुभूति चित्र’ और ‘कला का कठोर अनुशासन’ तो दिखाई ही देता है, संगीत का-सा प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता, नई प्रयोगशील भाषा और गद्य का अनूठा विन्यास भी।
नामवरजी की कहानी समीक्षा पर अनेक आरोप लगाए गए हैं। राजेंद्र यादव और मोहन राकेश से लेकर पाठकों और आलोचकों के एक बड़े वर्ग ने कहा कि वे काव्य समीक्षा के प्रतिमानों के आधार पर कहानी समीक्षा करते हैं। इनका मानना है कि “उनका कथालोचक जैसे उनके काव्यालोचक की शरण में चला जाता है। नतीजनन वे यथार्थ, अंतर्वस्तु, सामाजिक सोद्देश्यता आदि की जगह संगीत, रूप, ध्वनि, लय आदि के टूल्स से कहानियों को जाँचने-परखने लगते हैं।”¹³ पक्षपात के भी आरोप लगे। कहा गया कि कहानियों पर बात करते हुए नामवर जी के भीतर निर्मल वर्मा के प्रति आसक्ति के हद तक का मोह एवं मोहन राकेश और राजेंद्र यादव के प्रति अतिशय निर्ममता दिखाई देती है”¹⁴ शिवदान सिंह चौहान और देवीशंकर अवस्थी जैसे आलोचकों ने उन पर उपन्यास की तरह कहानी पढ़ने का आरोप लगाया। अवस्थी जी ने लिखा कि “ऐसा लगता है कि कहानियों की बात करते समय नामवरजी के मन में उपन्यास रहता है।”¹⁵ संजीव कुमार का मानना है कि नामवरजी की पीढ़ी ने कथानक, चरित्र, कथोपकथन वाले आलोचनात्मक ढाँचे को खत्म तो किया पर कोई वैकल्पिक शब्दावली संपन्न ढाँचा नहीं खड़ा कर पायी।¹⁶ नामवरजी का नाम लिए बगैर कमलेश्वर ने लिखा कि कथा समीक्षा की यह पद्धति इकहरी, असंतुलित, लड़ाने-भिड़ाने वाली और अंतर्विरोधों से युक्त थी। आलोचक नई कहानी के केंद्रीय संघर्ष को देखने-पहचानने की बजाय “निहायत सतही स्तर पर गाँव, कस्बा और शहर की लड़ाई, आंचलिकता और संगीतात्मकता, सूक्ष्मता और असूक्ष्मता, वातावरण और अलंकरण, चमत्कार और विकार, गल्प और स्वल्प, पाठक और पाठ, प्रक्रिया और प्रतिक्रिया, भावुकता और रोमांटिकता आदि समस्याओं में ही उलझा रहा क्योंकि वहाँ उसे फतवे देने की सुविधा थी।”¹⁷ और भी बहुत कुछ। हिंदी आलोचना में इन आरोपों के समर्थन और विरोध में खूब बातें हुई हैं। इस विस्तार में जाए बगैर इतना तो कहा ही जा सकता है कि उनकी यह पुस्तक कहानी समीक्षा की पहली पुस्तक है जिसे हम काव्य समीक्षा की पुस्तकों के समक्ष रख सकते हैं। इस पुस्तक के साथ कहानी की प्रौढ़ समीक्षा की जो शुरुआत होती है उसका विकास विजय मोहन सिंह की ‘आज की कहानी’, सुरेंद्र चौधरी की ‘नई कहानी : प्रक्रिया और पाठ’,विश्वनाथ त्रिपाठी की ‘कुछ कहानियाँ : कुछ विचार’ से लेकर संजीव कुमार की ‘हिंदी कहानी की इक्कीसवीं सदी’ जैसी पुस्तकों में देख सकते हैं।
निष्कर्ष : नामवर जी ने न सिर्फ हिन्दी में कहानी को एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित किया अपितु इसकी समीक्षा के नये प्रतिमान भी विकसित किये। यह उनके समय की एक ऐतिहासिक जरूरत थी जिसकी बुनियाद पर हिन्दी की कहानी समीक्षा नयी दिशा में आगे बढ़ती है।
सन्दर्भ :
1. हिन्दी आलोचना, विश्वनाथ त्रिपाठी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2018, पृष्ठ 198
2. नामवरजी से बहुत कुछ सीखा, विश्वनाथ त्रिपाठी, बहुवचन 50, पृष्ठ 20
3. वाद विवाद संवाद, नामवर सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 1989 पृष्ठ.133
4. कहानी: नई कहानी, नामवर सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, संस्करण 1999, पृष्ठ 10
5. वही पृष्ठ 30
6. नई कहानी: संदर्भ और प्रकृति, संपा. देवीशंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संo 1993, पृष्ठ 14
7. कहानी: नई कहानी, पृष्ठ 18
8. वही, पृष्ठ 25
9. वही, पृष्ठ 48-49
10. वही, पृष्ठ 44
11. वही
12.वही, पृष्ठ 80
13. नामवर सिंह की पुस्तक कहानी नई कहानी, राकेश बिहारी, समालोचन, दिसंबर 10, 2015 https:// samalochan.com
14. वही
15. रचना और आलोचना देवी शंकर अवस्थी, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, सं. 1995, पृष्ठ133
16. हिन्दी कहानी की इक्कीसवीं सदी‚ संजीव कुमार‚ राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली‚ सं. 2019, पृष्ठ
17. नई कहानी की भूमिका, कमलेश्वर, अक्षर प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 1969, पृष्ठ 144
इन्द्रमणि कुमार
हिन्दी विभाग, राणा प्रताप स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सुलतानपुर - 228001 (उत्तर प्रदेश)
9450714647, imk.hindi@gmail.com
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव

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