नामवर सिंह की कहानी आलोचना और समकालीनता
- यत्येंद्र सिंह
नामवर सिंह हिंदी आलोचना के श्रेष्ठतम आलोचक में से एक हैं। नामवर सिंह का लेखन क्षेत्र व्यापक है जोकि लगभग सात दशकों में फैला हुआ है। उन्होंने सैद्धांतिकी और व्यावहारिक दोनों क्षेत्रों में अपनी लेखनी चलायी है। उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं यथा- भाषा, काव्य, कहानी, उपन्यास आदि क्षेत्रों में आलोचना की है। नामवर सिंह की आलोचनात्मक दृष्टि में कथालोचना केवल साहित्यिक विमर्श नहीं, बल्कि एक गहन संवादात्मक प्रक्रिया का रूप ग्रहण करती है, जिसमें साहित्य, समाज और पाठक त्रिवेणी के रूप में अंतःक्रिया करते हैं। उनके कथालोचना, काव्यालोचन, निबंध, व्याख्यान और साक्षात्कारों में यह संवादधर्मिता एक जीवंत बौद्धिक प्रवाह के रूप में प्रकट होती है। वे कहानी आलोचना को स्थिर प्रतिमानों से मुक्त कर, उसे समकालीनता के दबावों में पुनर्परिभाषित करने का साहस दिखाते हैं। नामवर सिंह की संवादी आलोचना ने हिंदी साहित्य में विमर्श की एक नई परंपरा स्थापित की; जहाँ विचार, संवेदना और यथार्थ का संयोग दिखाई देता है।
स्वतंत्रता पूर्व हिंदी में कहानियां तो बहुत लिखीं गयीं लेकिन कहानियों पर आलोचना न के बराबर लिखीं गयीं। स्वातंत्र्योत्तर हिंदी आलोचना में विस्तृत रूप से कहानियों पर आलोचना की शुरुआत होती है। भैरवप्रसाद गुप्त, नामवर सिंह, सुरेन्द्र वर्मा, राजेन्द्र यादव, मार्कण्डेय, मोहन राकेश आदि स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कहानी आलोचना के प्रारम्भिक व महत्त्वपूर्ण आलोचक हैं। हिंदी कहानी आलोचना के विकास में जिन आलोचकों ने योगदान दिया, उनमें प्रारम्भिक महत्त्वपूर्ण आलोचकों में नामवर सिंह हैं। नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना की शुरूआत आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर समीक्षात्मक लेख से की जोकि सन 1950 में जनवाणी पत्रिका में प्रकाशित हुआ। उसके बाद नामवर सिंह ने काव्य से संबंधी अनेक आलोचनाएँ लिखीं। साठ के दशक में कहानी के क्षेत्र में हो रहे परिवर्तन और कहानी आलोचना के अभाव ने नामवर सिंह को कहानी आलोचना की ओर प्रेरित किया। ऐसा माना जाता है कि नामवर सिंह कहानी आलोचना में दोस्तों के लिहाज में आए। इसका जवाब देते हुए नामवर सिंह कहते हैं कि “उस समय के मेरे साथ के लोगों में राजेंद्र यादव, अमरकांत,शेखर जोशी और मोहन राकेश भी, ये लोग लिख रहे थे और उन लोगों ने मुझसे कहा कि भई तुम कविता के बारे में बहुत लिखते हो इधर हम लोग इतना प्रयत्न कर रहे हैं,...और खास तौर से कई लोग थे जो प्रगतिशील आंदोलन के साथ जुड़े हुए लोग थे। उन्होंने कहा की कहानी की उपेक्षा हो रही है, उस पर आलोचना नहीं लिखी जाती है और तुम यह क्यों नहीं लिख रहे हो…तो जो दबाव और लिहाज था वह यह था”1।
नामवर सिंह हमारे सामने संवादी आलोचक के रूप में आते हैं। हम इसे उनकी समूची आलोचना प्रक्रिया में देख सकते हैं। उनके यहां वाद-विवाद-संवाद दिखाई पड़ता है। वे हिंदी कहानी आलोचना में भी इसी प्रक्रिया को अपनाते हैं।
हिंदी कहानी आलोचना पर नामवर सिंह की पहली पुस्तक ‘कहानी नई कहानी’ है। इस पुस्तक के ज्यादातर आलेख पूर्व में विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके थे इसका उल्लेख इस पुस्तक की भूमिका में भी करते हैं कि यह पुस्तक नामवर जी के एक दशक की चिंतन यात्रा है। ‘कहानी नई कहानी’ हिंदी कथा साहित्य के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक कृति मानी जाती है। इस पुस्तक में उन्होंने नई कहानी आंदोलन तक की कथाप्रवृत्तियों का गहराई से विश्लेषण किया है, नई सैद्धांतिकी भी दीं हैं। इसमें वे न केवल कहानियों की सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि नई कहानी किस प्रकार पुराने कथा-संसार से अलग अपनी पहचान बनाती है। वे पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं- “हिंदी आलोचना जो अभी तक मुख्यत: काव्य समीक्षा ही रही है कविता से इतर कथा- नाटक आदि साहित्य रूपों का विधिवत विश्लेषण करके ही अपने को सुसंगत एवं समृद्ध बना सकती है। कहानी समीक्षा संबंधी में निबंध इसी दिशा में विनम्र प्रयास हैं। इसलिए मेरे निकट इनका महत्त्व केवल कहानियों की समीक्षा तक सीमित न होकर एक व्यापक समीक्षा पद्धति के निर्माण की दिशा में है”।2
यद्यपि नई कहानी आंदोलन के बाद के कथा साहित्य पर नामवर सिंह ने कोई बड़ी आलोचनात्मक पुस्तक नहीं लिखी, किंतु उन्होंने इस विषय पर विभिन्न व्याख्यान, साक्षात्कार और चर्चाओं के माध्यम से अपनी दृष्टि स्पष्ट की है। उनके ये वक्तव्य उस दौर के कथा-साहित्य की दिशा और प्रवृत्तियों को समझने में अत्यंत उपयोगी हैं। नामवर सिंह उन आलोचकों में से हैं जो पाठ से आलोचना की ओर जाते हैं न की आलोचना से पाठ की ओर। “किसी अच्छी कृति का निर्णय करने के लिए एक बने बनाए मानदंड से आरंभ करने की अपेक्षा पढ़ने की प्रकिया से शुरू करना अधिक उपयोगी हो सकता है”3। इसी के अनुसार वे कहानी को देखतें हैं कि अगर कोई कहानी,कहानी है तो उसमें कहानीपन का भाव मौजूद हो। साहित्य की कोई भी विधा हो जो अपने समय, परिस्थितियों के अनुसार नई चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने स्वरूप का विकास करती है; वही जीवंत दिखाई देती है।
‘कहानी नई कहानी’ में नामवर सिंह कहानी को देखने का नया दृष्टिकोण देते हैं जहाँ पहले ये मान्यता थी कि कहानी जीवन का एक टुकड़ा है। नामवर सिंह इसे नकारते हैं “लोगों की यह धारणा गलत है कि कहानी जीवन के एक टुकड़े को लेकर चलती है, इसलिए उसमें कोई बड़ी बात कही ही नहीं जा सकती। कहानी जीवन के टुकड़े में निहित अंतर्विरोध, द्वंद्व सक्रांति अथवा क्राइसिस को पकड़ने की कोशिश करती है और ठीक ढंग से पकड़ में आ जाने पर यह खण्डगत अंतर्विरोध की वृहद अंतर्विरोध के किसी न किसी पहलू का आभास दे जाता है”4। वे नई कहानी की एक और विशेषता ‘सांकेतिकता’ की ओर इशारा करते हैं कि “नई कहानी में केवल संकेत मात्र नहीं है; बल्कि स्वयं संकेत है। नई कहानी में में जो सांकेतिकता को लेकर बात है वह वातावरण को लेकर है। यहां कहीं न कहीं वातावरण ही स्वयं पात्र के रूप में उपस्थित है चाहे वह ‘परिंदे’ कहानी हो या फिर ‘कोसी का घटवार’ या ‘बदबू’ आदि। इन कहानीयों में जीवन का यथार्थ सांकेतिक रूप में अभिव्यक्त है।
अनेक आलोचकों ने नई कहानी को मुख्यत: दो वर्गों में विभक्त करके देखा है जहाँ वे एक ओर निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, उषा प्रियंवदा आदि को रखते हैं तो दूसरी ओर मार्कण्डेय,अमरकांत, शेखर जोशी, परसाई आदि को रखते हैं। जिनकी कहानियों के केंद्र में ग्रामीण जीवन, शोषित समाज है। इस विभाजन को नामवर सिंह सिरे से नकार देते हैं। वे सुरेश कुमार के साथ साक्षात्कार में कहते हैं “कहानी की दुनिया में छठे दशक के जितने लेखन का नाम लिया तुमने… जो बहुत भिन्न और विरुद्ध हैं, आप लोगों को दिखाई पड़ रहे हैं। ऐसा उस समय था नहीं… मैं नहीं मानता कि ऐसा स्पष्ट विभाजन जिसमें वर्गीय आधार पर जैसा कि तुम कहना चाहते हो कि एक ओर बुर्जुआ वर्ग के मूल्यों को समर्थन देने वाले लेखक थे और दूसरी ओर उन मूल्यों का विरोध करके, जिसको कहें कि सर्वहारा की वर्ग चेतना को आधार बनाकर लिखने वाले लेखक रहे हों ... मैं नहीं समझता कि अमरकांत और भीष्म साहनी के बीच कोई ऐसी विभाजक रेखा तब थी उसके बाद भी नहीं थी…।”5
नामवर सिंह के अनुसार कहानी को जो सार्थकता मिलती है वह मिलती है ‘ऐतिहासिक नवीनता’ से। इस पर बात करते हुए वे कहते हैं कि नई कहानी के कुछ कहानीकारों ने नई शब्द का अर्थ नए पन के रूप में ले लिया। “नया विषय लेने से ही कोई कहानी नई कहानी नहीं हो जाती, महत्वपूर्ण है विषय के प्रति लेखक दृष्टि और फिर तदनुरूप उसका कलात्मक निर्वाह”।6 कहानी में बदलते समय के जटिल यथार्थ को पकड़ने की क्षमता हो जब कोई लेखक विरासत में मिले फार्मूले से मुक्त होकर सीधे जिंदगी की जटिलताओं को पकड़ने की कोशिश करता है तभी नवीन कलाकृति का सृजन होता है।
नामवर सिंह प्रगतिशील आलोचक हैं किन्तु विचारधारा के परे वे साहित्य को देखते है। विचारधारा के चश्मे से साहित्य, साहित्य न रहकर एक टूल बन जाता है। विचारधारा के परे नामवर सिंह परिंदे कहानी पहली नई कहानी मानते हैं लेकिन ये भी स्पष्ट करते हैं पहली कहानी जरुर है लेकिन पहले पायदान पर नहीं। वे ये भी मानते हैं कि नई कहानी में जो मध्य वर्ग आया है वह यकायक ही प्रकट नहीं हो गया है वह विकास के परम्परा में अपने अलग स्वरूप में सामने आता है। बलराज पांडे लिखते हैं कि “स्वतंत्रयोत्तर हिंदी कहानी में प्रेमचंद की परंपरा का विकास नामवर सिंह ने अपने तरीके से देखा उनका मानना है कि प्रेमचंद के कथा साहित्य में गांव किसान मजदूर ही नहीं है उनके यहां पर्याप्त मात्रा में मध्य वर्ग भी है इसलिए नई कहानी में यदि मध्य वर्ग की समस्या जोर-शोर से उठाई गई है तो इससे भी प्रेमचंद की कथा साहित्य की विकास परंपरा में ही स्वीकार किया जाना चाहिए”।7
‘कहानी नई कहानी’ पुस्तक में हमें मुक्तिबोध की कहानियों पर चर्चा देखने को नहीं मिलती है।नामवर सिंह सिंह मानते हैं कि घोषित कहानीकारों की अपेक्षा मुक्तिबोध ने कहानी की दुनिया में कई ज्यादा महत्वपूर्ण काम किया। “गुलेरी जी अपनी एक कहानी उसने कहा था के द्वारा अमर हो सकते हैं तो मुक्तिबोध की अगर एक कहानी भी आप कहें तो क्लॉड ईथरली… क्लॉड ईथरली हिन्दी में एक ऐसी कहानी है कि दूसरे किसी आदमी ने वैसी कहानी लिखी और ना कोई लिखने की क्षमता रखता है। मानव नियति की बड़ी लंबी चौड़ी बातें करने वाले निर्मल वर्मा और दूसरे लोग हैं, अकेली है कहानी उन लोगों को चुनौती देती है। इतिहास के विराट परिपेक्ष में मनुष्य की नीति आज क्या है, इसे देखना हो तो क्लॉड ईथरली को देखें।”8
नामवर सिंह हिंदी कहानी आलोचना मेंऐसे पहले आलोचक हैं, जो कहानी में पाठक की भूमिका को भी केन्द्र में देखते हैं। “कहानी स्वयं एक प्रक्रिया है। ऐसी प्रक्रिया जिससे होकर लिखते समय लेखक गुजरता है तो पढ़ते समय पाठक। पाठक इस प्रक्रिया को याद करे तो लिखने की प्रक्रिया के भी कुछ सूत्र हाथ आ सकते हैं; साथ ही कहानी का ज्यादा से ज्यादा रूप पकड़ में आ सकता है।”9
नामवर सिंह की नई कहानी सम्बन्धी आलोचना ने नई बहस को जन्म दिया। विभिन्न आलोचक जैसे राजेंद्र यादव, धनंजय वर्मा, जगदीश, रमेश उपाध्याय हैं जो नामवर सिंह पर यह आलोचक आरोप लगाया हैं कि वे कहानी के नहीं मूल रूप से कविता के आलोचक हैं। उन्हीं प्रतिमानों को लेकर नामवर सिंह कहानी के क्षेत्र में आए हैं। राजेंद्र यादव कहते हैं “नामवर सिंह का संस्कार मूलतः काव्य समीक्षा का ही संस्कार है और उसे लेकर ही कहानी समीक्षा में आए हैं।”10 ‘कहानी: नई कहानी’ हिंदी साहित्य में कहानी आलोचना की एक नई पद्धति प्रस्तुत करने वाली पुस्तक मानी जाती है। वे इस पुस्तक में कहानी को केवल उसके कथानक, चरित्र या शैलीगत तत्वों में बाँटकर नहीं, बल्कि एक अखंड कलात्मक इकाई के रूप में समझने की कोशिश करते हैं। यह दृष्टिकोण उस समय की पारंपरिक आलोचना से भिन्न था, जिसने कहानी को व्यापक सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और कलात्मक संदर्भ में देखने की दृष्टि दी। इस कृति ने न केवल नई कहानी आंदोलन की सैद्धांतिक नींव को स्पष्ट किया, बल्कि हिंदी में कहानी समीक्षा की नई दिशा भी निर्धारित की।
साठोत्तरी कहानी के दौर में कई कहानी आंदोलनों ने जन्म लिया यथा अकहानी, सक्रिय कहानी, सहज कहानी, समानांतर कहानी आदि। नामवर सिंह के इन कहानियों पर ‘अराजकतावादी’ होने व ‘सेक्स ऑब्सेस्ट’ होने का आरोप लगाते हैं। सन 1965 के बाद जो संक्रमण का दौर है। जब चीन युद्ध, सरकारों का पतन, नक्सलवाद का उभरना आदि घटनाएं हो रही थी और कहानीकार अपने आंतरिक मन में झाक रहे थे। इन आंदोलन और व्यावसायिकता के चलते कहानी के कहानीपन में कमी आ रही थी। इसी के चलते सातवेंदशक में “कहानियों ने कविता से कहीं ज़्यादा मूलगामी परिवर्तन किए और इस बात की सराहना करनी चाहिए कि उन्होंने नई कहानी के भोगे हुए यथार्थ के मायावरण को ही नहीं उघाड़ा बल्कि नई संभावनाएं खोजी”।11
सातवें दशक के बाद हिंदी साहित्य में अस्मितामूलक विमर्शों की शुरुआत होती है। इन विमर्शों को लेकर हिंदी में साहित्य रचा जाने लगा। नामवर सिंह विमर्शों को ही आधार बनाकर लिखे जा रहीं कहानीकारों से असहमत दिखाई पड़ते हैं। वे मानते हैं “सिद्धांतों से कहानी नहीं, बनती संवेदना से बनती है उस संवेदना की कोई जाति नहीं होती। कोई धर्म नहीं होता कोई महजब नहीं होता। मानवीय संवेदना कहां किस रूप में दिखाई पड़ती है, इससे जांच होती है कहानी की। संप्रदायों, विषयों से कहानी को बांट करके देखने का चलन निकला है। कुछ लोग दलित लोगों की कहानी चलाने की कोशिश कर रहे हैं कुछ स्त्री विमर्श कहानी की”।12 ध्यान देने योग्य है कि नामवर सिंह अस्मिता मूलक विमर्शों से असहमत नहीं हैं बल्कि उनकी असहमति इन्हीं को केवल रचना कर्म का आधार मानने से है।
नामवर सिंह जब किसी कहानी की आलोचना करते हैं तो केवल उसी कहानी या कहानीकार की कहानियों को साथ में रखकर नहीं देखते बल्कि उसकी परम्परा, उस समय लिखीं जा रही अन्य लेखकों की कहानियां, अन्य भारतीय भाषओं में लिखीं जा रही कहानियों को भी देखते हुए आगे बढ़ते हैं। कथालोचना के संदर्भ में नामवर सिंह कहतें हैं “कहानी का सारांश बताकर के कहानी की आलोचना नहीं हो सकती और न कहानी के किसी चरित्र का चित्रण कर आप आलोचना कर सकते हैं...कहानी में भी सर्जनात्मक भाषा ही महत्त्वपूर्ण होती है, कहानी का भी एक टेक्स्ट होता है और उसको उतनी ही बारीकी से पढ़ना चाहिए जितनी बारीकी से कविता पढ़ी जाती है।”13
नौवें दशक के बाद हिंदी कहानी में एक विशेष परिवर्तन आता है जिसे ‘लंबी कहानी’ की संज्ञा संबोधित किया गया। भूमंडलीकरण, उदारीकरण आदि के परिणामस्वरूप कहानी स्वरूप में बदलाव आता है। विभिन्न-पत्र पत्रिकाओं ने भी लंबी कहानी नाम से स्तम्भ निकलना शुरू कर दिया। नामवर सिंह लंबी कहानियों से सहमत नज़र नहीं आते हैं । वे मानते हैं कि कहानी को जबरदस्ती उपन्यास की चुनौती के सामने ले जाने की कोशिश की जा रही है। “कहानी लिखते समय वह यह तय नहीं कर पता है कि इसको उपन्यास बनाना है कि यह कहानी ही रहेगी इसलिए इस बीच लंबी कहानी नाम की एक विधा चल पड़ी है...रबर की भी, खींच की, विस्तार की, इलेस्टिसिटी की एक सीमा हुआ करती है। इस कला को साधने में कहाँ-कहाँ चूक हई है, कहाँ जाना चाहिए, कहाँ नहीं, इस पर विचार करना चाहिए। यह हिन्दी कहानी के हित में है और खुद कहानीकार के हित में है”।14 नामवर सिंह का इशारा उस तरफ़ है जहां कहानी में निरर्थक जानकारी ठूसी जाती है। इसके चलते कहानी का कहानीपन समाप्त हो जाता है।
बीसवीं सदी के अन्त में यथार्थ ‘जटिल यथार्थ’ में तब्दील हो गया। इस यथार्थ को पकड़ने की कहानीकारों ने भरपूर कोशिश की है। नामवर सिंह मानते हैं कि लेखक 21वीं सदी में नई तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। “जैसे कि अखिलेश और उदय प्रकाश ने अपनी अपनी कहानी में पिस्चुला नामक रोग का इस्तेमाल युक्ति की तरह किया है मैं समझता हूं कि इस व्यवस्था को भी पिस्चुला है। व्यवस्था की उन कमजोरीयों पर कथाकार उंगली रख सकता है। समाज का रोग और मर्ज कहां छुपा है उस पर उंगली रखना कथाकार की ड्यूटी है। नई प्रतिभाएं नई से नई युक्तियां इस्तेमाल कर रही हैं।… नई भाषा है, नए मुहावरे हैं, कहने का अंदाज नया है और यथार्थ को देखने की वह दृष्टि है जो ज्ञान रंजन, रवींद्र कालिया, काशीनाथ के दौर से अलग है और अब ऐसी पीढ़ी भी आ गई है जो अखिलेश और उदय प्रकाश वाली पीढ़ी से भी अलग तरीके से दुनिया को देख रही है”।15 भूमंडलीकरण के दौर में जब ग्राम्य संस्कृति अपनी नैसर्गिकता खो रही है। किसान, स्त्री बाजारवादी व्यवस्थाओं, उपभोक्तावाद और पूँजी-संचालित नीतियों के लिए केवल खिलोने बन गये हैं। लोकतंत्र पूंजीवादी शक्तियों द्वारा हथिया लिया गया हो तब रचनाकार का धर्म है, अपने वर्तमान को दिखाना, नामवर सिंह मानते हैं कहानीकारों ने इसे बखूबी दिखा रहे हैं।
नामवर सिंह कहानी को एक छापामार लड़ाई के रूप में देखते हैं, जो समाज की अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं और सत्ता के विरुद्ध एक रचनात्मक प्रतिरोध है।इसके लिए वे रूस और चीन के कहानीकारों का उदाहरण देते हैं, जिनकी रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक यथार्थ की गूंज मिलती है। गोगोल, चेखव, टॉलस्टॉय, गोर्की, जैसे लेखकों ने अपने देशों के संघर्षशील जनजीवन को चित्रित किया। इसी तरह अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड आदि के कहानीकारों ने भी सामाजिक बदलाव की कहानियाँ लिखीं। भारत में टैगोर, बंकिमचंद्र, भारतेन्दु, जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद जैसे लेखकों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
मधुरेश नामवर सिंह को केवल नई कहानी का कथालोचक मानते हैं। वे कहते हैं “कहानी के समकालीन परिदृश्य पर उनकी टिप्पणियां किसी वैचारिक संघर्ष की ऊर्जा का कोई साक्ष्य नहीं छोड़ती क्योंकि किसी भी वैचारिक संघर्ष के लिए रचना से जिस आत्मीय संलग्नता की अपेक्षा सहज ही की जाती है। उनकी टिप्पणियां और वक्तव्य उस आत्मीयता का कोई बोध नहीं जगाते”।16 लेकिन नामवर सिंह का कथा-साहित्य पर योगदान केवल ‘कहानी नई कहानी’ तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके व्याख्यानों, साक्षात्कारों और विचारों के माध्यम से यह लगातार विकसित होता रहा है, जिसने हिंदी कहानी की आलोचना को एक नए विमर्शात्मक आयाम तक पहुँचाया। नामवर सिंह अपनी उसी ( नई कहानी) आत्मीयता से हिंदी के सम्पूर्ण कथा साहित्य को देखते हैं इसे हम ‘हिंदी का गद्य पर्व’ व ‘प्रेमचंद और भारतीय समाज’ में देख सकते हैं। ‘उसने कहा था’ कहानी के प्रेम को नामवर सिंह ‘लोक प्रेम की संज्ञा’ देते हैं। कहानी की जड़ें नामवर सिंह ‘दाढ़ियावाले की टिपरारी’ में देखते हैं। उसने कहा था कहानी केवल प्रेम कहानी नहीं बल्कि “ यह हिंदी का वह गद्य है जिसमें एक ओर कुड़माई है तो दूसरी ओर हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा में दंतवीणापदेशाचार्य कहलाती”।17 ‘प्रेमचंद और भारतीय समाज’ नामक यह कृति मात्र प्रेमचंद के कथा-संसार तक सीमित नहीं है, अपितु यह प्रेमचंद को माध्यम बनाकर रवींद्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र, बंकिमचंद्र, यू.आर. अनंतमूर्ति और फकीर मोहन सेनापति जैसे भारतीय साहित्य के मूर्धन्य रचनाकारों तथा पश्चिम के टोलस्टॉय, चेखव, और मोपासाँ की कालजयी कथा-परंपरा से भी हमारा परिचय कराती है। इसके अनुशीलन से हम न केवल हिंदी कथा-साहित्य की अंतर्धाराओं, बल्कि भारतीय कथा-साहित्य और उसके व्यापक वैश्विक परिदृश्य को एक साथ आत्मसात कर पाते हैं।
नामवर सिंह न केवल हिंदी कहानी आलोचना में वरन संपूर्ण हिंदी आलोचना में छह दशकों तक अपनी आलोचनात्मक दृष्टि से प्रभावी बने रहे। इसका मुख्य कारण यह है कि बदलते समय के साथ बदलती दृष्टियों के साथ उन्होंने अपने समय को देखा और चुनौतियों को स्वीकारा। डॉ. सिंह कहानी आलोचना में सैद्धांतिकी पर ज्यादा बल है उसका कारण बताते हुए कहते हैं कि "कथा साहित्य की हमारी परम्परा बहुत छोटी है। इसलिए इस छोटी परम्परा के कथा साहित्य में कालजयी परम्परा का निर्णय करते समय ध्यान रखिए कि कथा समालोचना अभी बहुत गम्भीर और प्रौढ़ नहीं हुई है। उसकी तुलना में हमारी काव्य चर्चा और काव्य समीक्षा अधिक समृद्ध है।”18
नामवर सिंह ने सम्पूर्ण कहानी परम्परा को अपनी आलोचना में जगह दी है। नामवर सिंह के आलोचनात्मक क्षितिज पर, कथालोचना मात्र साहित्यिक विमर्श तक सीमित न रहकर, एक गहन संवादात्मक प्रक्रिया का रूप ग्रहण करती है; जिसमें साहित्य, समाज और पाठक का तीनों का सामंजस्य परिलक्षित होता है। उनकी कथालोचना, काव्यालोचना, निबंधावली, व्याख्यानमालाएँ और अंतर्वार्त्ताएँ इस संवादधर्मिता को एक प्राणवंत बौद्धिक स्फुरण के तौर पर अभिव्यक्त करती हैं। वे आलोचना को रूढ़िगत प्रतिमानों की जकड़न से विमुक्त कर, उसे समसामयिकता के द्वंद्वों के मध्य पुनर्परिभाषित करने का साहस प्रदर्शित करते हैं। नामवर सिंह की यह संवादी आलोचना-पद्धति हिंदी साहित्य में एक नवीन वैचारिक परिपाटी का प्रवर्तन करती है।
सन्दर्भ :
1. ज्ञानरंजन और कमलाप्रसाद (संपादक), कहानी: आज की कहानी(साक्षात्कार), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. सं. 9
2. सिंह, नामवर, ‘कहानी नई कहानी’ राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. सं. 10
3. वही, पृ. सं. 136
4. वही, पृ. सं. 15
5. ज्ञानरंजन और कमलाप्रसाद (संपादक), कहानी: आज की कहानी(साक्षात्कार), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. सं. 19
6. सिंह, नामवर, ‘कहानी नयी कहानी’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2021 पृ. सं. 167
7. पाण्डेय, बलराज, “कहानी समीक्षा और नामवर सिंह” ‘बहुवचन’, अंक -50 (जुलाई-सितम्बर) 2016, पृ. सं.227
8. ज्ञानरंजन और कमलाप्रसाद (संपादक), कहानी: आज की कहानी(साक्षात्कार), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ. सं. 32
9. सिंह, नामवर, ‘कहानी नयी कहानी’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,2021, पृ. सं. 73
10. यादव, राजेंद्र, ‘कहानी स्वरूप और संवेदना’, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2010, पृ. सं. 141
11. सिंह, नामवर, आशीष त्रिपाठी(संपादक), हिंदी का गद्य पर्व, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. सं. 78
12. सिंह, नामवर, आशीष त्रिपाठी(संपादक), ‘साहित्य की पहचान’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,2022, पृ. सं.185
13. सिंह, नामवर, समीक्षा ठाकुर(संपादक), बात बात में बात, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. सं. 154
14. सिंह, नामवर, आशीष त्रिपाठी(संपादक), ‘साहित्य की पहचान’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,2022, पृ. सं. 178-179
15. वही 207
16. मधुरेश, “कहानी का समकालीन परिदृश्य और नामवर सिंह”, जगदीश चतुर्वेदी(संपादक), ‘नामवर सिंह और समीक्षा के सीमान्त’, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स लिमिटेड नई दिल्ली, 2016, पृ. सं. 196
17. सिंह, नामवर, आशीष त्रिपाठी(संपादक), हिंदी का गद्य पर्व, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. सं. 112
18. सिंह, नामवर, आशीष त्रिपाठी(संपादक), ‘साहित्य की पहचान’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,2022, पृ. सं. 164
यत्येंद्र सिंह
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव

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