शोध आलेख : नामवर सिंह के नागार्जुन / सुमित कुमार चौधरी, अंजनी कुमार उपाध्याय

नामवर सिंह के नागार्जुन
- सुमित कुमार चौधरी, अंजनी कुमार उपाध्याय

 

नामवर सिंह हिंदी साहित्य की प्रगतिशील आलोचना में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनकी आलोचकीय दृष्टि में लोक और शास्त्र का रूप निहित है। उन्होंने आलोचना की वाचिक परंपरा को बहुत आगे बढ़ाया है। उनकी आलोचनात्मक दृष्टि से ऐसी कोई विधा नहीं बच पायी है, जिस पर उन्होंने लिखा हो।  सिद्धान्त और व्यवहार उनकी आलोचना का मुख्य आधार है। वह आलोचना को समाज तक लाते हैं और समाज को आलोचना तक। अर्थात् उनकी आलोचना के केंद्र में समाज निहित है। इसलिए जब वे नागार्जुन की कविताओं पर आलोचना करते हैं, तो वे कविता को केवल सौंदर्यबोध की वस्तु के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसे समाज में हस्तक्षेप करने वाली एक शक्ति के रूप में भी स्वीकार करते हैं। उनकी आलोचकीय-दृष्टि साहित्य को सामाजिक यथार्थ, ऐतिहासिक संदर्भ और जनचेतना से जोड़कर देखने पर बल देती है। इसी दृष्टिकोण के अंतर्गत उन्होंने आधुनिक हिंदी कविता के अनेक कवियों का मूल्यांकन किया है, जिनमें नागार्जुन को वे जनकवि के रूप में स्थापित करते हैं। प्रस्तुत आलेख में नामवर सिंह की आलोचकीय-दृष्टि में नागार्जुन किस रूप में उभरते हैं- उसी का अवलोकन किया गया है।  

नामवर सिंह मूलतः मार्क्सवादी आलोचक हैं। उनकी आलोचकीय-दृष्टि में कोई संदेह नहीं होनी   चाहिए। अगर कोई संदेह हैं भी, तो उससे जल्दी निकल जाना चाहिए, चूँकि उनकी आलोचना में भौतिक वस्तुओं का समाहार है। वे अपनी आलोचना में वस्तु और कार्य-कारण संबंध को केंद्र में रखकर उसका मूल्यांकन करते हैं। नागार्जुन की कविताओं पर बात करते हुए, नामवर सिंह उनकी कविता का केंद्रीय आधार जनता को मानते हैं। चूँकि नागार्जुन के काव्य में जनता का संघर्ष, उसकी पीड़ा, श्रम और प्रतिरोध का जीवन स्पष्ट रूप से दिखता है। नामवर सिंह लिखते हैं किनागार्जुन स्वाधीन भारत के प्रतिनिधि जनकवि हैं। तरल आवेगोंवाला, अति भावुक, हृदयधर्मी जनकवि एहसास उन्हें जनकवि होने का भी है और जनकवि होने की ज़िम्मेदारी का भी 1  कहना होगा कि नागार्जुन की कविताओं में किसान, मजदूर, आम नागरिक और समाज के उपेक्षित वर्ग प्रमुखता से उपस्थित हैं। नामवर सिंह मानते हैं कि नागार्जुन की कविता सत्ता से संवाद स्थापित करने के बजाय उससे सीधे टकराती है। यही कारण है कि उनकी कविताओं में विद्रोह, विरोध और प्रतिरोध की चेतना अत्यंत मुखर रूप में दिखाई देती है। यह बात सत्य है कि नागार्जुन की कविता सत्ता से सीधे सवाल पूछती है। तभी वे कहते हैं-

जनता मुझसे पूछ रही है, क्या बतलाऊँ।

जनकवि हूँ मैं साफ़ कहूँगा, क्यों हकलाऊँ ?”2

और आगे लिखते हैं

जनकवि हूँ, क्यों चाटूँगा मैं थूक तुम्हारी

श्रमिकों पर क्यों चलने दूँ बंदूक तुम्हारी ?3

ज़ाहिर है कि इस तरह की कविताई से नामवर सिंह की आलोचना में नागार्जुन की काव्य-दृष्टि स्पष्ट रूप से जनवादी सिद्ध हुई है। चूँकि नागार्जुन शोषण-दमन, अन्याय-अत्याचार और असमानता को केवल चित्रित ही नहीं करते, बल्कि उनके विरुद्ध आवाज़ भी उठाते हैं। उनकी कविता सामाजिक यथार्थ का निष्पक्ष दस्तावेज़ होने के साथ-साथ परिवर्तन की आकांक्षा भी व्यक्त करती है। इस दृष्टि से नागार्जुन की कविताएं जनता की ओर से सत्ता के खिलाफ संघर्ष की भाषा बन जाती हैं। उदाहरणस्वरूप-

प्रतिहिंसा ही स्थायी भाव है मेरे कवि का

जन-जन में जो ऊर्जा भर दे, मैं उद्गाता हूँ उस रवि का 4

असल में यह प्रतिहिंसा ही क्रांतिकारी तेवर का रूप है। जनता के पक्ष में न्याय है। नामवर सिंह भी उनके व्यक्तित्तव का मूल्यांकन करते हुए लिखते हैं, यह प्रतिहिंसा ही नागार्जुन की शक्ति है; क्योंकि यह प्रतिहिंसा जितनी अपनी है उससे ज़्यादा उस जनता की है, जिसके वह प्रतिनिधि हैं 5 नामवर सिंह नागार्जुन के इस क्रांतिकारी तेवर को केंद्र बद्ध करने में सफल हुए हैं। ध्यातव्य हो कि नागार्जुन की सम्पूर्ण कविताओं को अगर देखा जाए तो उनकी संबद्धता हाशिये का समाज के प्रति ज़्यादा दिखती है। यही कारण है कि आज़ादी के बाद नागार्जुन की कविताओं का तेवर एकदम उग्र दिखता है। अर्थात् उनकी कविताएं बहुत बोलती हुई आती हैं। एकदम गर्जना के साथ। इसी का प्रतिफल रहा है कि उनकी संधर्मी चेतना उनकी काव्य-दृष्टि में आसानी से झलक जाती है। वे सामाजिक गैर बराबरी की खाई को पाटने का कार्य करते हैं। सामाजिक विडम्बना उनकी कविता में अनायास नहीं आई है। वे समाज के भीतरी तह तक जाकर देखते हैं और इसी वजह से उनकी कविता का मिज़ाज बदल जाता है। अर्थात् कोमलता कब तीक्ष्ण व्यंग्य का रूप धारण कर लेती है, पता ही नहीं चलता। नामवर सिंह इसे कड़वाहट का रसायन कहते हैं। हालाँकि नामवर सिंह ने नागार्जुन की कविताओं की आलोचना जिस मंसूबे को ध्यान में रखकर की है, उससे इंकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन उसकी दयार को और ज़्यादा साफ़ दृष्टि से देखा जा सकता है। नागार्जुन की कविता भारत-भूमि में प्रजातन्त्र का बुरा हाल है की यह पंक्तियाँ देखिये-

लालबहादुर नीचे, ऊपर कामराज है

इनकिलाब है नीचे, ऊपर दामराज है 6  

कहना होगा कि नागार्जुन की बोलती और गरजती हुई कविताओं के संदर्भ में गोबिन्द प्रसाद का यह कथन देखा जा सकता है- “नागार्जुन के कविता संसार का तीन-चौथाई हिस्सा तो लगता है गुस्से-गुर्राहट, नफ़रत, क्रोध और घृणा की भट्ठी में सुलग रहा है। जान पड़ता है यह कवि सारी दुनिया से बेहद ख़फ़ा है। ऐसी कविताओं में ज़्यादातर वे कविताएँ हैं जो शासन तंत्र और उसकी घिनौनी करतूतें श्रमजीवी वर्ग पर जुल्मों-जब्र करती हैं 7 गोबिन्द प्रसाद के इस कथन से असहमति का कोई कारण नज़र नहीं आता, क्योंकि नागार्जुन की कविताओं की एक ख़ासियत यह भी है।

नामवर सिंह ने नागार्जुन की राजनीतिक चेतना संबंधी काविताओं पर बहुत पैनी दृष्टि डाली है। असल में नागार्जुन ने जिन राजनीतिक चरित्रों को केंद्र में रखकर कविताएँ लिखी हैं- वह आज़ाद भारत के महत्वपूर्ण राजनीतिक चरित्र हैं। जवाहरलाल नेहरू से लेकर इन्दिरा गाँधी तक उनकी कविता के केंद्र में रचे-बसे हैं। इतना ही नहीं गाँधी भी उनकी कविता की धरती में स्थान पाते हैं। ये सारे के सारे राजनीतिक चरित्र नागार्जुन के तीक्ष्ण व्यंग्य से बच नहीं पाये हैं। व्यंग्य का एक नमूना इस गीत में देखा जा सकता है- “आओ रानी, हम ढोएँगे पालकी/यही हुई है राय जवाहरलाल की 8 यह गीत नागार्जुन की व्यंग्य शैली को बहुत स्पष्ट करती है। नामवर सिंह लिखते हैं,व्यंग्य की इस विदग्धता ने ही नागार्जुन की अनेक तात्कालिक कविताओं को कालजयी बना दिया है, जिसके कारण वे कभी बासी नहीं हुईं और अब भी तात्कालिक बनी हुई हैं। अन्य कवियों की तात्कालिक कविताओं से नागार्जुन की तथाकथित तात्कालिक कविताओं की यही विशेषता है। इसलिए यह निर्विवाद है कि कबीर के बाद हिन्दी कविता में नागार्जुन से बड़ा व्यंग्यकार अभी तक कोई नहीं हुआ 9 ध्यान देने वाली बात है कि नामवर सिंह ने जिस तरह से नागार्जुन को कबीर के समक्ष लाकर खड़ा कर दिया है, उससे तो असहमत नहीं हुआ जा सकता, लेकिन धार्मिक आडंबरों को लेकर कबीर की जो बेबाक़ी और व्यंग्य है- वह नागार्जुन से कहीं ज़्यादा है। चूँकि कबीर का समय अधीनता का था। उस समय इतना मुखर होकर कविता लिखना मुश्किल था, परंतु कबीर ने सबकी ख़बर ली। बहरहाल, व्यंग्य काव्य का एक अनिवार्य तत्व है, जिसे नामवर सिंह विशेष महत्व देते हैं। उनका मानना है कि नागार्जुन की कविता कभी तटस्थ नहीं रही। उनकी कविता में सत्ता-शासन और सामाजिक अन्याय के प्रति स्पष्ट असहमति और तीखा व्यंग्य दिखाई देता है। नामवर सिंह की यह दृष्टि नागार्जुन की वैचारिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है। यह प्रतिबद्धता कविता की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और यही शक्ति कविता को  सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में ढालती है। यानी कविता में वैचारिकी का होना महत्वपूर्ण है। शायद इसीलिए गोबिन्द प्रसाद ने लिखा है कि- “नागार्जुन दरअसल वैचारिक पक्षधरता के कवि हैं। इसी वैचारिक पक्षधरता के कारण नागार्जुन की कविता का स्वभाव दो टूक शैली में खरी-खरी सच्ची तथा मर्म-भरी बातें करने का है 10 नागार्जुन स्वयं अपनी कविता में इस बात की घोषणा करते हैं कि-

प्रतिबद्ध हूँ

संबद्ध हूँ

आबद्ध हूँ 

प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ11

कहना होगा कि नागार्जुन ने अपनी इसी प्रतिबद्धता की वजह से राष्ट्रीय राजनीति से लेकर विश्व राजनीति तक का सफर तय किया है, जिसमें वे वैश्विक राजनीति या साम्राज्यवादी ताकतों को चिन्हित करते हैं, जी राजनीतिक उथल-पुथल, विचारधाराओं के संघर्ष, उत्थान और पतन के सबसे बड़े हिमायती  हैं।

भारतीय राजनीति में दोहरे चरित्र की बढ़ती हुई संख्या, विश्वसनियता खोता बुद्धजीवियों का समुदाय, मशगूल होकर जीवन-यापन करते भद्र समाज के लोग सभ्य संस्कृति का दंभ भरते हैं। वे अपनी पक्षधरता के वजाय मुँह चुराते हैं, जबकि इनका यह धर्म होना चाहिए कि वे लोक हित और लोक रक्षा को बढ़ावा दें- पर ऐसा नहीं है, जबकि यही काम नागार्जुन ने अपनी कविताओं में ख़ूब किया है। उनकी कविता भविष्य-विधायक जनता से जुड़कर अपना स्वरूप निर्धारित करती है। इसलिए उनकी कविता जीवन की गतिशीलता को सर्वोपरि मानती है। मानवीय संवेदना की पूर्णता में अपना आधार ढूंढती है। पूंजीवादी शक्तियों से साधारण जनता को सतर्क करती है, जिससे वह पूंजीवादी भीड़ में अपनों के चेहरे को भूल सके। अपने गँवई जीवन को आधुनिक होकर भी जीते रहे, जिसकी वजह से नागार्जुन अपनी कविता में मानव-मूल्यों को विघटित करने वाली शक्तियों में परिवर्तन की लहर पैदा करती है। न्याय संगत ध्येय के प्रति जनता को चेतनाशील बनाना चाहती है, जो नागार्जुन की कविता का केन्द्रीय सार है। सामाजिक रूढ़ियों, नियमों और भ्रमित विचारों के जिन मृत संस्कारों ने जनता को जकड़ रखा है, उनसे मुक्ति का मार्ग दिखाना नागार्जुन की कविता की मूल धुरी है। ऐसे में नागार्जुन हरिजन-गाथा और मंत्र कविता देखी जा सकती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि नामवर सिंह ने इस तरह की कविताओं को केवल छूकर निकल जाते हैं।

नागार्जुन ने अपनी कविता की धरती में अमूमन सभी विषयों को (जो कुछ भी उन्हें दिखा) स्थान दिया है- जिसमें राजनीति, सामाजिक यथार्थ, गाँव और प्रकृति का मनोहर दृश्य, प्रेम, महानगरीय जीवन, कुली-मजदूर, स्त्री-सौन्दर्य, साहित्यिक चरित्र, रजीनीतिक चरित्र और सामाजिक चरित्र जैसे तमाम विषय शामिल हैं। उसी तरह नामवर सिंह भी अपनी आलोचना के केंद्र में उनके काव्य-चिंतन को बहुत करीब जाकर देखने-समझने की कोशिश किए हैं। जैसे- “नागार्जुन का काव्य-संसार का एक बहुत बड़ा भाग अनूठे प्रकृति-चित्रों से सजा है, जिसे कवि की गहरी ऐन्द्रियता और सूक्ष्म सौन्दर्य-दृष्टि का एहसास होता है 12 औरप्रकृति की तरह नारी-सौन्दर्य को भी नागार्जुन उसी खुली दृष्टि से देखते हैं 13 जाहिर है कि नामवर सिंह की दृष्टि में नागार्जुन का काव्य-संसार व्यापक अर्थों में जनजीवन का कोलाज प्रस्तुत करता है। असल में नागार्जुन बहुजन समाज का कवि होने के नाते जनता के सुख-दुख के अलावा प्रकृति के प्रति भी अपना अनुराग दिखाया है। प्रकृति और गाँव की ओर लौटते हुए उन सब मनोरम दृश्य को देखकर अपने होने का एहसास पाते हैं। सूर्य की भोरे-भोरे किरणों को देखकर कवि का मन मचल जाता है। उसको प्रणाम करने का मन करता है। नदी के तीरे भैसों के बड़े-बड़े खुर देखकर मन दुधिया जाता है। पके सुनहले फसलों को देखकर कवि का मन ललचा जाता है। कवि का यह सब रूप उसके अपने भोगे यथार्थ से है। बहुत दिनों के बाद कविता का यह अंश देखिये-

बहुत दिनों के बाद

अबकी मैंने जी भर भोगे

गंध-रूप-रस-शब्द-स्पर्श सब

साथ-साथ इस भू पर

बहुत दिनों के बाद14  

बहरहाल, नागार्जुन की कविताओं में अपने समकालीनों से एक अलग तरह की भिन्नता दिखाई देती है- चरित्र सृष्टि संबंधी कविता। इस तरह की कविताओं के माध्यम से इतिहास को समझा जा सकता है। चूँकि नागार्जुन ने चरित्रों को लेकर जो कोलाज बनाया है- उसमें ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक और मानवेत्तर चरित्र मुख्य रूप से आए हैं। ये चरित्र अपने देश, काल और वातावरण के सामाजिक सरोकारों से सम्बद्ध हैं। इनकी उपस्थिती समाज में अति महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनका भोगा हुआ यथार्थ ही कवि ने अपनी कविताओं में उतारा है। इनके व्यक्तित्तव के द्वारा ही समयानुकूल सामाजिक परिवेश का आकलन किया है। उसे ही कविता का विषय बनाया, जिससे एक नया सौन्दर्य शास्त्र तैयार हुआ। उदाहरणस्वरूप गांधी कविता देखी जा सकती है-

घर हो, बाहर हो, कारा हो

लाचारी हो, बीमारी हो

सत्याग्रह की तैयारी हो

बंबई हो कि या लंदन हो

हो क्षुद्र गाँव या महानगर

कुछ भी हो, कैसी भी स्थिति हो,

तुम सुबह-शाम

उस परमपिता परमेश्वर की प्रार्थना नित्य

करते आए हो जीवन भर,

दो-चार और दस-बीस जने

शामिल हो जाते हैं उसमें 15

नागार्जुन बहुत सधे हुए कवि हैं। उनकी कविताएँ आम आदमी की भाषा में लिखी गयी हैं और जीवन की असल सच्चाई को बिना लाग-लपेट के हू--हू प्रस्तुत करती हैं। न्गुगी वा थ्योंगो का भी मानना है कि भाषा केवल सम्प्रेषण का माध्यम ही नहीं है, बल्कि वह संस्कृति, इतिहास और पहचान की वाहक होती है। यदि कोई समाज अपनी भाषा खो देता देता है, तो वह अपनी सांस्कृतिक अस्मिता भी खो देता है। जाहिर है कि ने अपनी कविता में भाषा के सरोकार को जातीय रहने दिया है। वह औपनिवेशिक भाषा को अपनी कविता में स्थान नहीं देते हैं। इसी वजह से नागार्जुन की कविता में समाज की मूल समस्या अपने मूल स्वरूप में आई है। बहरहाल, नागार्जुन की कविता वैश्य-वस्तु के आधार पर बदलती रहती है। वह व्यंग्यात्मक भाषा का भी प्रयोग करते हैं। उनके काव्य में व्यंग्य केवल मनोरंजन के लिए प्रयोग नहीं किया गया है, बल्कि समाज और राजनीति के विद्रुप चेहरे और विसंगतियों को उजागर करने के लिए किया गया है। यह व्यंग्य निरंकुश सत्ता और सामाजिक व्यवस्था की विफलताओं पर करारा प्रहार करता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि नामवर सिंह को नागार्जुन की कविता में यह सारे विषय-वस्तु दिखे, लेकिन दलित जीवन और दलित नेताओं पर नागार्जुन ने जो कविताएँ लिखी हैं, उस पर नामवर सिंह की दृष्टि नहीं गयी। अस्तु, इससे नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि पर सवाल खड़ा होता है। चूँकि भारतीय राजनीति में कांशीराम, मायावती और फूलन देवी का विशेष स्थान है। भारतीय समाज का एक बड़ा तबका इनके समर्थन में खड़ा होता है। इन्हें अपना आदर्श मानता है। परंतु, नामवर सिंह की प्रगतिशील आलोचनात्मक दृष्टि में दलित समुदाय के राजनीतिक चरित्र नहीं आते हैं। इसके बावजूद भी नामवर सिंह की आलोचना में एक संतुलन देखा जा सकता है। बहरहाल, नागार्जुन की कविता की मुख्य विशेषता है- सामाजिक और राजनीतिक  प्रतिबद्धता। चूँकि उनकी कविताएँ समाज के वंचित वर्गों की आवाज़ बुलंद करती हैं और पाठक वर्ग को सोचने-समझने, प्रश्न पूछने और जागरूक होने के लिए प्रेरित करती हैं। प्रेरित करने की यह प्रवृत्ति सही मायने में नागार्जुन की मानवीय संवेदना और तार्किक शक्ति को दर्शाती है। गोबिन्द प्रसाद लिखते हैं- “वस्तुतः नागार्जुन गहरी मानवीय पीड़ा के साथ-साथ व्यापक प्रेम और करुणा के कवि हैं, बाद में कुछ और 16 यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि गोबिन्द प्रसाद जिस तरफ इशारा कर रहे हैं, वह नागार्जुन की कविता का महत्वपूर्ण अंग है। नागार्जुन की कविता का तेवर देखकर अधिकतर आलोचकों में यह समानता देखने को मिलती है कि नागार्जुन जनवादी, व्यंग्य और राजनीतिक कवि हैं और इससे आगे बढ़ते हैं, तो यह कहने से नहीं चूकते हैं कि उनकी कविता में गाँव और प्रकृति का चित्रण दिखता है। यहीं आकर सारी बातें ख़त्म-सी हो जाती हैं, लेकिन अगर नागार्जुन की कविताओं पर गौर किया जाए, तो प्रेम की तमाम कविताएँ आँखों के सामने तैर जाती हैं, जिसमें गुलाबी चूड़ियाँ’, सिंदूर तिलकित भाल’, रहा उनके बीच मैं से लेकर वह दंतुरित मुस्कान तक उनका प्रेम देखा जा सकता है।

नागार्जुन भाषा के जादूगर है। वह स्पेक्ट्रम रेखा की तरह कविता में भाषा को बरतते हैं। इसी वजह से नामवर सिंह, नागार्जुन की काव्य-भाषा में अनेक रूप देखते हैं। उनकी भाषा को लेकर नामवर सिंह कहते हैं कि- “भाषा में भी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृत की संस्कारी पदावली तक इतने स्तर हैं कि कोई भी अभिभूत हो सकता है। तुलसीदास और निराला के बाद कविता में हिन्दी भाषा की विविधता और समृद्धि का ऐसा सर्जनात्मक संयोग नागार्जुन में ही दिखाई पड़ता है 17 नामवर सिंह के इस कथन से सहमत हुआ जा सकता है कि भाषा के जितने प्रयोग नागार्जुन ने कविता में किया है, उतना हिन्दी कविता में और किसी के यहाँ नहीं दिखता। उनकी कविता में कहीं छन्द का प्रयोग दिखता है, तो कहीं मुक्त रूप, कहीं लय, तो कहीं गीत का रूप धारण करते हुए उनकी कविता आती है। लोक की शब्दावलियों के छौंक से भाषा में तरलता और ज़्यादा बनी हुई है। वे शास्त्रीय भाषा के बरक्स जन भाषा को तवज्जो देते हैं। चूँकि सामान्य या सबाल्टर्न समाज की जातीय ज़िंदगी को उन्हीं के भाषा में व्यक्त किया जा सकता है। नागार्जुन इस प्रक्रिया में बेजोड़ साबित होते हैं। अस्तु, सही मायने में देखा जाए तो नागार्जुन ने अपनी कविता में भाषा संबंधी जितने प्रयोग किए हैं- उसमें वह सफल हुए हैं।  

            कहना होगा कि नागार्जुन की भाषा का सहज रूप चरित्र को मूर्त रूप देकर उनमें जान डाल दिया है। संवेदना के धरातल पर उनकी जातीय ज़िंदगी का रेखाचित्र खींचते हुए नागार्जुन ने सभी विचारधाराओं को अपनी कविता की बस्ती में जगह दी है। गाँधी, मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, जोमो केन्याता और मायावती पर नेह दिखाया है, जबकि वहीं नेहरू और इन्दिरा गाँधी पर व्यंग्य और रोष व्यक्त किया है। चूँकि उनकी शासन व्यवस्था और दोहरे चरित्र को लेकर कविता की भाषा बदल जाती है। भाषा का रूप आलोचनात्मक हो जाता है, जबकि सामाजिक चरित्रों को लेकर नागार्जुन ने अपनी महती भूमिका निभाई है। समन्वयवादी दृष्टि अपना कर समाज के हर तबके से चरित्रों का चुनाव किया है। लिंग और जाति का ख़याल रखते हुए सबको अपनी कविता में समाहित किया है। सामाजिक चरित्रों के मुखर तेवर को कविता में जस का तास चित्रित किया है। भाव-भाषा का पूरा रूप-सौन्दर्य लेकर। नागार्जुन के सामाजिक चरित्र अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का लेखा-जोखा देते हुए, उनकी कविता में अपनी भाषा के साथ उतरते हैं। अपनी सामाजिक और आर्थिक गैर-बराबरी का पूरा विवरण उन्होंने नागार्जुन की कविता में दर्ज़ होने के लिए खुला छोड़ दिया है। कोई पर्दा नहीं है। कवि की भाषिक संवेदना उसे पकड़ने के में बेजोड़ है। वह सामाजिक चरित्रों के फटे विवाइयों से लेकर फटे हुए वस्त्र का विडम्बना भरा दृश्य कविता में उतारकर मन को द्रवित कर देते हैं। धन्नासेठों के दुर्गुणों को उजागर करते  हुए, उनके आँख का पानी जो सूख चुका है- उसका भंजन अपने व्यंग्यधर्मिता से जमकर करते हैं। नागार्जुन के भाषा का तेवर अगर दिखता है, तो व्यंग्य वाण में। चूँकि इनको किसी शास्त्रीय भाषा की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि जनता की भाषा का ख़याल रखकर ही भाषा में धार पैदा करते हैं। ध्यान रहे कि नामवर सिंह नागार्जुन की कविताओं पर लिखते समय इस तरह भाषा की सामाजिकी का ज़िक्र नहीं करते, बल्कि वे नागार्जुन को कबीर के बाद का व्यंग्यकार साबित करते हैं। परंतु, नागार्जुन के भाषायी अस्मिता एवं संस्कृति का ज़िक्र नहीं करते। इसके बावजूद भी नामवर सिंह की भाषा संबंधी मान्यता से असहमत नहीं हुआ जा सकता है।

नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि में नागार्जुन जनवादी कवि हैं, लेकिन नागार्जुन की कविताई को किसी ख़ास विचारधारा से हटाकर देखा जाए, तो वे सबाल्टर्न समाज के कवि हैं। चूँकि वे आधुनिक हिंदी कविता के विरले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने कविता को सबाल्टर्न समाज के दुख-दर्द, जीवन-संघर्ष और चेतना से जोड़ा है। अपनी प्रतिबद्धता को गिरवी नहीं रखा। वे जिस विषय, समुदाय और समाज पर कविता लिखते हैं- उनकी भाषा को केंद्र में रखते हैं। उनके लिए अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम, उस समाज की भाषा ही है। शायद इसीलिए नामवर सिंह भी नागार्जुन को हिंदी कविता की जनवादी, लोकतांत्रिक, प्रतिबद्ध और प्रगतिशील चेतना का सशक्त प्रतिनिधि मानते हैं।

संदर्भ :  

       1.    नामवर सिंह, कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. सं. 168.
2.    नागार्जुन रचनावली-2, संपादक-सोभाकांत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ. सं. 14.  
3.    वही, पृ. सं. 14.  
4.    नागार्जुन रचनावली-2, संपादक-सोभाकांत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ. सं. 13.
5.    नामवर सिंह, कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. सं.168.  
6.    नागार्जुन रचनावली-1, संपादक-सोभाकांत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011, पृ. सं. 10.  
7.    गोबिन्द प्रसाद, कविता के सम्मुख, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002, पृ. सं. 73.
8.    नागार्जुन, प्रतिनिधि कविताएँ, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2007, पृ. सं. 101. 
9.    नामवर सिंह, कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. सं.177.
10. गोबिन्द प्रसाद, कविता के सम्मुख, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002, पृ. सं. 61-62.
11.  राजेश जोशी (सं.), नागार्जुन रचना संचयन, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2017, पृ. सं. 19.    
12. नामवर सिंह, कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. सं.176.
13. वही, पृ. सं. 176.
14. राजेश जोशी (सं.), नागार्जुन रचना संचयन, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 2017, पृ. सं. 31. 
15. वही, पृ. सं. 93.
16. गोबिन्द प्रसाद, कविता के सम्मुख, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002, पृ. सं. 64.
17.  नामवर सिंह, कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2016, पृ. सं. 178.  


सुमित  कुमार चौधरी
सहायक आचार्य- हिन्दी विभाग, छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर
sumitkchaudhary@csjmu.ac.in, 9971707114
 
डॉ. अंजनी कुमार उपाध्याय
सहायक आचार्य- हिन्दी विभाग
छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर
anjanikupadhyay@csjmu.ac.in8130045405

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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