सौन्दर्यशास्त्र : उद्भव और चिंतन की दिशा
- पुष्पराज यादव
सौंदर्यशास्त्र एवं ललित कलाओं के समग्र अध्ययन के क्षेत्र में यह तथ्य सर्वमान्य है कि सौंदर्य एवं कलाओं के बहुभाँति मूल्यांकन और विवेचन के लिए “सौन्दर्यशास्त्र” जिसे ‘ललित कलाओं का दर्शन’ भी कहा जाता है; उसके निर्माण का प्रस्थान-बिंदु हमें प्रथम-दृष्ट्या पाश्चात्य विचारकों से ही ग्रहीत करना पड़ता है। सौन्दर्यशास्त्र को सामान्यतः दर्शन की एक शाखा के रूप में देखा जाता है और उसका अनुशीलन क्षेत्र वस्तुतः ज्ञानार्जन, कला और कलाकार के अंतःसंवेदी समबन्धों को समझने से है। जैसा कि प्रसिद्ध सौंदर्यशास्त्रीय-विचारक और इतिहासकार बर्नार्ड बोसांके ने अपने ग्रंथ ‘हिस्ट्री ऑफ़ ऐस्थेटिक्स’ की भूमिका में ही लिखा है, “AESTHETIC theory is a branch of philosophy, and
exists for the sake of knowledge and not as a guide to practice. ___ The
aesthetic theorist, in short, desires to understand the artist, not in order to
interfere with the letter, but in order to satisfy an intellectual interest of
his own.”[i]
(अर्थात् सौन्दर्यशास्त्र मूलतः दर्शन की एक शाखा है और उसका उद्देश्य ज्ञान अर्जन करना है न की कला-स्रष्टा का निर्देशन। सौन्दर्यशास्त्र का अध्येता वस्तुतः कलाकार को समझने की चेष्टा करता है न कि उसके कार्य में हस्तक्षेप।)
‘Aesthetics’ जिसे हिंदी में ‘सौन्दर्यशास्त्र’, ‘लालित्य-शास्त्र’, ‘नंदन-शास्त्र’ आदि कहा जाता है, मूलतः ग्रीक भाषा के ‘atoQnTikos’ से बना है। कला-विवेचन और चिंतन के क्रम में यही ग्रीक शब्द बाद में ‘Aesthesis’ बना और विद्वानों ने जिसका अर्थ लिया ‘ऐन्द्रिय-सुख की चेतना’। इस ‘Aesthesis’ को सर्वप्रथम ‘Aesthetics’ के रूप में परिभाषित किया सन् 1750 ई. में अलेक्जेंडर बाउमगार्टन ने। बाद में इसी ऐन्द्रिय-सुख के चित् को पाश्चात्यों ने समय-समय पर ललित-कलाओं के परिप्रेक्ष्य और वैज्ञानिक अथवा दार्शनिक उत्थानों के बाद तरह-तरह से व्याख्यायित किया। इस क्रम में प्राचीन पाश्चात्य सौंदर्य-विचारकों में होरेस, सुकरात, प्लेटो, अरस्तू और सिसेरो का नाम प्रमुख है, तत्पश्चात मध्ययुगीन कला-साहित्य-चिंतन में जर्मन-विचार-प्रणाली से लोंजाइनस, इमैनुएल कांट, हेगेल, लेसिंग, शिलर, ऑर्थर शॉपनहॉवर और नीत्शे आदि का नाम युगीन सन्दर्भों में कला और साहित्य के समग्र मूल्यांकन और विश्लेषण के लिए ‘सौन्दर्यशास्त्र’ में अनेक महत्त्व की अवधारणाएँ स्थापित कर इसे स्वतंत्र शाखा के रूप में प्रतिफलित होने में अपनी भूमिका का निर्वाह किया।
इसी तरह ललित-कलाओं और दर्शन की युगीन संपृक्ति ने आधुनिक युग के औद्योगिक और बौद्धिक समाज के निर्माण के साथ-साथ बदलते सौंदर्यबोध की भी नींव डाली और इसकी छाप लगभग विश्वभर के हर साहित्य और कला-चिंतन में देखी गई। आधुनिक युग के तेज़ी से करवट बदलते समाज और मानुषिक अवचेतन ने अजाने ही सौन्दर्यबोध की नवीन दिशा और अनेक नए वैचारिक आंदोलनों को जन्म दे दिया। उदाहरण के लिए हम जर्मन-विचार-प्रक्रिया में ही कई तरह की करवटें बदलते हुए पाते हैं। हेगेल का ‘मेटाफिजिकल डायलेक्ट’, मार्क्स का भौतिक और ऐतिहासिक द्वंद्ववाद, मनोविज्ञान में एक नई तरह की ‘साइकोऐनालिसिस’ की पद्धति का विकास, दो-दो विश्वयुद्धों की तपिश से उपजा हुआ अस्तित्त्ववाद सब एक साथ या कुछ आगे-पीछे अपनी संवेदी-शक्ति का एक नया अध्याय पेश करते हुए प्रतीत होते हैं। इन सबका प्रभाव और दृष्टि का अंश लेते हुए साहित्यिक आंदोलनों में कला और साहित्य की शुद्ध-चिंताधारा, जिन्हें हम एक दृष्टि से विशुद्ध-कलावादी भी कह सकते हैं, इनमें बेनेदेत्तो क्रोचे, सूजन के. लैंगर, टी. एस. इलियट, एज़रा पाउण्ड, जॉन क्रो रैनसम और आई. ए. रिचर्ड्स प्रमुख हैं।
भारतीय काव्यशास्त्र और ललित-कला का सौंदर्य।
इसी प्रकार जब हम भारतीय सौंदर्य-शास्त्र की अवधारणा और उसके साहित्य-कला-चिंतन के पक्ष पर चिंतन करते हैं तो हमें अपने इतिहास और संस्कृतियों के अगणित द्वारों से होते हुए गुज़रना पड़ता है। प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर हम यह निसंदेह कह सकते हैं कि प्राचीन भारत के लोग, चाहे वे आर्य रहे हों या आर्येत्तर जातियों से, ललित-कलाओं की सिसृषा और सर्जना से भली-भाँति परिचित थे। प्राचीन भारत के कला-विवरण को ही ले लें तो हमारे सामने हड़प्पा सभ्यता की अनेक सौन्दर्यात्मक प्रतिकृतियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें देवताओं, मातृदेवी, नटराज, पशुपति, नर्तकी एवं एक सींग वाले सांड की चित्रित मूर्तियां, मुहरें, गहने, बर्तन और रहन-सहन का स्तर बतौर प्रमाण मौजूद हैं। जो यह बताती हैं कि भारत के इतिहास में दब गई पूर्व मानवी सभ्यता भी सौंदर्य-तत्त्वों से परिचित और उनका सर्जन करने वाली थी।
हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद अस्तित्त्व में आई आर्य-वैदिक सभ्यता और आर्येत्तर भारतीय या मूल-जातियों की लोक-कलाओं के मिश्रण से सौंदर्य के अनेक नवीन पहलू सामने आते हैं। भीमबेटका, अजंता-एलोरा की गुफ़ाएँ, साँची, भरहुत, बौद्ध एवं जैन धर्म-दर्शन से संबंधित कला और शिल्प यह दर्शाता है कि हमारी सौंदर्य-चेतना अपने ललित-तत्त्वों के समाहार हेतु सदैव अग्रसर रही है। इस क्रम में जहाँ हमारे पास संस्कृत-काव्यग्रंथों और उसमें समाहित अनगिनत दर्शनों या शास्त्रों जैसे- संहिताओं, सूक्तों, ब्राह्मण-ग्रंथों, उपनिषदों अथवा पौराणिक-कथाओं आदि की झड़ी सी लगी हुई प्रतीत होती है, तो उसके विस्तृत अनुशीलन और गुण-धर्म-दोष आदि के विवेचन की वृहद् काव्यशास्त्रीय परंपरा, यथा- भरत का नाट्यवेद, मीमांसा-ग्रंथ, यास्क अथवा सायण के निरुक्त-भाष्य, पतंजलि का महाभाष्य, पाणिनि की अष्टाध्यायी, भर्तृहरि का वाक्यपदीयम् (स्फोटवाद) आदि भी लक्षित होती है। संस्कृत-साहित्य ने जहाँ आर्य-अभिजात वर्गीय शास्त्रीय परंपरा और चिंतन को प्रश्रय दिया वहीं ललित-कलाओं ने आर्येत्तर एवं आर्य-पूर्व भारतीय लोक-सौन्दर्य की रक्षा नृत्य, संगीत, चित्र, मूर्ति, नाटक अथवा काव्य के माध्यम से की। इस तथ्य के प्रमाण के लिए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के निबंध-संग्रह ‘अशोक के फूल’ और ‘लालित्य-तत्त्व’ तथा डॉ. नामवर सिंह की पुस्तकों में ‘इतिहास और आलोचना’, ‘कविता के नए प्रतिमान’, ‘आधुनिक विश्व साहित्य और सिद्धान्त’ एवं ‘दूसरी परम्परा की खोज’ से ‘संस्कृति और सौंदर्य’ निबंध और सन् 1992 ई. में जेएनयू में संभवतः अपनी अंतिम संस्कृत-काव्यशास्त्रीय कक्षाओं में दिए उनके व्याख्यान ‘नामवर के नोट्स’ में देखा जा सकता है।
उनकी मान्यता है कि “सुकुमार कलाएँ आर्येत्तर जातियों के माध्यम से आईं ।”[ii]
उनके अनुसार पंचमवेद यानी नाट्यशास्त्र के रचयिता भरतमुनि स्वयं ‘शूद्र’ समाज से आते थे। रस भी आर्येत्तर जातियों की दें है। हालाँकि ऐसा दावा करते हुए वे अपने गुरु आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की स्थापनाओं को अवश्य दोहराते जान पड़ते हैं। अपने ललित-निबंधों और ‘कालिदास की लालित्य-योजना’ तथा ‘लालित्य-तत्त्व’ नामक पुस्तक में अपनी संस्कृति तथा सौन्दर्यशास्त्रीय मान्यताओं को आचार्य द्विवेदी बखूबी व्यक्त कर, हिंदी भाषा में सौन्दर्यशास्त्र के मौलिक विवेचन की ओर ज़रूर एक अत्यंत महत्त्व का कार्य कर गए हैं। जबकि आलोचना के क्षेत्र के शिखर-पुरुष कहलाने वाले नामवर सिंह ने ‘सौन्दर्यशास्त्र’ पर कोई स्वतंत्र ग्रन्थ की रचना नहीं की। उनके सौंदर्य संबंधी विचार फुटकल-निबंधों, आलोचनात्मक लेखों या उनके ‘क्लास-नोट्स’ से ही प्राप्त होते हैं।
तथ्य है कि वेद मात्र द्विज जातियों के लिए ही थे जो कि अपौरुषेय माने जाते थे। जिस आधार पर शूद्रों द्वारा उनका पाठ, श्रवण और अभिनय आदि वर्जित था, इसके समानांतर आचार्य भरत ने एक अन्य पंचमवेद की रचना कर डाली जो कि सर्व-साधारण के लिए उपलब्ध था। नामवर सिंह के अनुसार, भरत ने आर्येत्तर कलाओं, अभिनय अथवा अनुकीर्तन (भरत ने इस शब्द का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि उनका मत था कि किसी भी कला का पूर्णतः अनुकरण नहीं हो सकता, जिसे अरस्तू ने ‘अनुकरण का सिद्धांत’ कहा।), शिल्प और सौंदर्य को लेकर एक वैकल्पिक अनार्य-कलाशास्त्र ‘नाट्यशास्त्र’ की रचना कर भारतीय सौंदर्यशास्त्र के मूलाधार की स्थापना तथा अर्वाचीन भारतीय ललित-कलाओं के संवर्धन का मार्ग प्रशस्त किया। अपने निबंध ‘संस्कृति और सौंदर्य’ में वे लिखते हैं, “आर्येत्तर अवदान की इस सूची में यदि ‘भक्ति द्राविड़ ऊपजी’ और आभीरों के आराध्यदेव बालकृष्ण तथा देवी राधा को जोड़ लें तो हमारी परंपरा में सुंदर माना जाने वाला ऐसा कुछ भी नहीं बचता जो आर्येत्तर न हो!”[iii]
इस प्रकार हम देखते हैं नामवर सिंह ‘वेदों से आदि और वेदों में अंत’ वाले रेले में न बहकर ज़मीनी धरातल और सांस्कृतिक-वर्चस्व या बंधनों को तोड़ते हुए ‘सौंदर्य के सांस्कृतिक-सामग्र्य’ पर बल देते हैं, देखा जाए तो एक प्रखर मार्क्सवादी आलोचक होते हुए वे भारतीय सौंदर्य और सामग्र्य की संस्कृति को भारतीयता-बोध और खुली आँखों से देखने का प्रयास कर, अपने वैचारिक-सत्त्व का भी मान रख लेते हैं।
नामवर सिंह के अनुसार संस्कृत-काव्यशास्त्र सौन्दर्यशास्त्र का अंग अवश्य हो सकता हो किंतु इसे हम सौन्दर्यशास्त्र (Aesthetics) का पर्याय नहीं मान सकते। काव्यशास्त्र को सौन्दर्यशास्त्र न मानने के पीछे उनके जो तर्क हैं, उनमें सबसे पहला यह है कि संस्कृत आचार्यों द्वारा काव्य तथा अन्य ललित-कलाओं के अंतर्संबंधों के विश्लेषण, विवेचन, गुण-दोष-प्रकृति, तात्त्विक-समय और वैषम्य आदि पर विचार न कर केवल काव्य को ही अपने शास्त्र में विवेचन का विषय बनाया। दूसरा यह कि काव्यशास्त्र में पूर्णतः इंद्रियानुभूति अथवा संवेदना दार्शनिक अध्ययन को विवेचन का आधार नहीं बनाया गया। जबकि कला-विवेचन के समग्र-मूल्यांकन के लिए ऐसा होना एक आवश्यक शर्त मानी जाती है। अंतिम बात जो उनके अध्यापन और वक्तव्यादि (1992 में ली काव्यशास्त्र की कक्षाओं) से सामने आने यह है कि हमारे यहाँ शास्त्र की परंपरा के विकासक्रम की उपेक्षा कर उसे ‘संप्रदायवाद’ में बाँट दिया गया और इस अतार्किक विभाग को स्वतंत्र अध्ययन का विषय बनाया गया। इससे न तो काव्यशास्त्र के ही समग्र-अध्ययन और उसके विस्तृत होने मार्ग खुला, न ही भारतीय भाषाओं के साहित्य का। फलतः दोनों ही खंड-खंड रूप में अध्ययन के अरुचिकर और बनकर उभरे। जबकि हम पहले ही देख चुके हैं कि भरत ने अपने नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में ‘नाट्य’, ‘अभिनय’, ‘अनुकीर्तन’ तथा ‘रस’ आदि की लोक-संपृक्त परंपरा, उपेक्ष्य अथवा क्षीण ही सही, के अनवरत विद्यमान होने के प्रामाणिक संकेत दिए हैं। हमारे यहाँ ज्ञान एवं शास्त्र-परंपरा में ‘इंडिविजुअल’ या ‘निषेध’ के बजाय ‘परंपरा-अध्ययन का सामग्र्य-विकास’ निरूपित किया गया है। हमने यह ‘सांप्रदायिक-विभाग’ पाश्चात्यों के ‘स्कूल’ की तर्ज पर स्थापित कर अपने ही सिद्धांतों को ‘हायरारिकी’ का शिकार बना डाला। इस संबंध में नामवर सिंह ने डॉ. वी. राघवन की पुस्तक ‘हाइवेज एंड बाइवेज ऑफ़ लिटरेरी क्रिटिसिज्म’ में रस, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, औचित्य एवं ध्वनि पारस्परिक अन्तःसाम्य या अंतःपूरक स्थिति और जी. टी. देशपांडे के “संस्कृत काव्यशास्त्र का विकास क्रमिक विकास था- ‘होरिजेंटल’ था- जिसका समापन रस एवं ध्वनि की पूर्णता में हुआ।”[iv]
नामवर सिंह के सौंदर्य-विवेचन में सर्वाधिक प्रमुख भारतीय सौंदर्यशास्त्रियों में कुन्तक, आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त एवं आचार्य भरत हैं। उन्होंने कुंतक के कवि प्रतिभा, कवि व्यापार और ‘क्रिएटिव इमेजिनेशन’, काव्य-कला अथवा अन्य ललित-कलाओं के बीच पूर्वापर संबंध और क्रमागत विकास, कालिदास के काव्य की व्यावहारिक समीक्षा, तथा वक्रोक्तिवाद का समर्थन किया। उनके अत्यंत प्रिय आचार्य आनंदवर्धन के भामह से ग्रहीत ‘प्रतीयमानर्थ’, ‘आह्लादक चारुत्व-प्रतीति’, मीमांसकों के शब्द एवं अर्थ के मध्य ‘तात्पर्य’ और वैयाकरणों (भर्तृहरि) के ‘स्फोटवाद’, आदि का ‘ध्वन्यालोक’ में समाहार और विस्तार को ललित-कला और सौंदर्य-विवेचन के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना है। और अंत में नामवर सिंह ने जिसे काव्यशास्त्र का ‘सुमेरु’ कहा वे हैं अभिनवगुप्त। अभिनवगुप्त की दार्शनिक-दृष्टि, कला-विवेचन, रूप और भाव का अनुकीर्तन या अनुकरण (Narration और Re-narration) का ‘अनुव्यवसाय’ तथा भावों के साधारणीकरण का दार्शनिक विवेचन उनका प्रिय रहा है। उनका मत है कि भारतीय काव्य और ललित कलाओं के विवेचन के लिए वक्रोक्ति, ध्वनि (भामह का प्रतीयमान), अभिनवगुप्त का न्याय-दर्शन, भरत का नाट्य, रस अथवा भाव आदि प्रमुख हो सकते हैं। अन्य महत्त्वपूर्ण काव्यशास्त्रीय आचार्यों में वे भामह, वामन, मम्मट, विश्वनाथ, पण्डितराज जगन्नाथ तथा नागेश भट्ट की स्थापनाओं की समालोचना करते हैं।
आचार्य द्विवेदी एवं पश्चिम के विद्वानों हेगेल या कांट के सौंदर्य-विषयक-विवेचन ‘संवेदना या अनुभूतियों के दर्शन’ को नामवर सिंह ने अपने लेख ‘व्यापकता और गहराई’ में भाव और चिंतन की कसौटी पर कसते हुए लिखा है कि, “ऐन्द्रिय-बोध अनुभूति की केवल पहली अवस्था है; इसके बाद उनकी मानसिक प्रतिक्रिया भावानुभूति की सृष्टि करती है जो अंत में चिंतन के आलोक से आलोकित हो उठती है। परंतु ऐन्द्रिय-बोध को भाव और चिंतन की अवस्थाओं तक ले जाने के लिए क्षणों के प्रवाह से गुज़रना पड़ता है।”[v]
इस आधार पर देखें तो नामवर सिंह की सौंदर्य-दृष्टि मात्र काव्य अथवा ‘पोएटिक एलिमेंट्स’ तक ही नहीं ठहरती वह अन्य ललित-कलाओं, यथा- संगीत, चित्र, स्थापत्य, शिल्प, रीति, नाट्य या अभिनय, भाषा के साथ ‘प्रोज़ एलिमेंट्स’ यानी गद्य-विधाओं के लिए भी एक मानक सौंदर्यशास्त्र के माँग की पूर्ति करते दिखाई देते हैं। वह संवेदना और विचार-प्रवाह के बीच शैल्पिक-सुंदरता और पके हुए अनुभूत्यतात्मक सत्य की स्थापना पर बल देते हैं।
अपने ‘मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के विकास की दिशा’ और ‘कलात्मक सौंदर्य का आधार’ नामक लेख में उन्होंने सौंदर्य और कला के ‘ग्रेडेड डिवीज़न’, उसके सूक्ष्म तथा स्थूल प्रकारों, वर्ग तथा वर्णभेद आदि का ऐतिहासिक एवं भौतिक आधारों पर गुण-दोष-विवेचन कर मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाओं को इंगित किया है। उनका मत है कि मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र तब तक नहीं रचा या सम्पूर्ण माना जा सकता है जब तक हम उक्त विभेदों को स्वीकार और उनका निराकरण करने की दिशा में नहीं बढ़ेंगे। वे लूकाच के जर्मन-ग्रंथ ‘सौन्दर्यशास्त्र’ की कमियों को भी पूरी ईमानदारी और मार्क्सवादी दृष्टि से उद्घाटित करते हैं, उनका मानना है कि लूकाच स्वयं को ‘क्लासिक एस्थेटिक ट्रेडिशन’ और कला नामक संस्था के हावी होने से नहीं बच सके हैं। उन्होंने आगे बढ़ते हुए मानवता के सकारात्मक क्रियावाद एवं थोथे आदर्शवाद, कलावाद को कला और जीवन दोनों में समन्वयात्मक संबंध, रूपवाद या वर्ण्य-विषय (मूर्त और ठोस रूप, न कि अमूर्त और सामान्य सा कोरा आदर्श-विधान), विचारधारा के स्तर पर जनवादी साहित्य और कलाओं को प्रधान तथा मध्यवर्गीय-बुर्ज़ुआजी यथार्थवाद की कड़ी आलोचना की है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आचार्य नामवर सिंह एक मार्क्सवादी और आधुनिक आलोचक होते हुए हिंदी में शास्त्र और लोक, समाज और संस्कृति के पारस्परिक प्रभाव-ग्रहण, आम और खास, रूप और वस्तु, विचारधारा और संवेदना के धरातल पर भारतीय एवं पाश्चात्य दोनों छोरों पर “सामग्र्यवादी आलोचक और सौंदर्य-द्रष्टा” की तरह अपने अडिग कदम जमाए हुए बढ़ते गए। अफ़सोस है कि सौंदर्य-विचार में वे आचार्य द्विवेदी के अगले स्वतंत्र शास्त्र-कार के रूप में किसी ग्रंथ की रचना करने को प्रेरित नहीं हुए, संभव है कि उन्हें मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के अधूरेपन और वैचारिक-प्रातिबाध्यता ने ‘स्वतंत्र ग्रंथ-रचना’ से रोका हो। लेकिन जितना हमारे समक्ष है वह उनके दृष्टिकोण और आगामी सौंदर्यशास्त्र के लिए ज़रूर प्रेरणादायी होगा।
[i] बर्नार्ड बोसांके, ए हिस्ट्री ऑफ़ एस्थेटिक्स, जॉर्ज एलेन एंड अनविन, लंदन, भूमिका पृष्ठ 11, 1949
शोधार्थी, भारतीय भाषा केंद्र, जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067
pushap27_lle@jnu.ac.in, 9760557187

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