- दीपशिखा सिंह
यों
तो
नामवर
सिंह
ने
अपने
सुदीर्घ
आलोचना
कर्म
के
दरमियान
हिन्दी
साहित्य
का
कोई
व्यवस्थित
इतिहास-ग्रंथ
नहीं
लिखा,
लेकिन
उनके
आलोचनात्मक
लेखन
पर
आद्योपांत
नज़र
डालें
तो
हिन्दी
साहित्य
के
एक
व्यवस्थित
इतिहास
का
परिचय
अवश्य
मिलता
है।
उनकी
आलोचना
हिन्दी
साहित्य
के
आदिकाल
से
शुरू
होकर
इक्कीसवीं
सदी
के
साहित्य
तक
विस्तृत
है।
हिन्दी
भाषा
और
साहित्य
के
ऐतिहासिक
नैरंतर्य
और
उसकी
जातीय
अस्मिता
को
नामवर
सिंह
की
आलोचना
पूरी
तरह
आत्मसात्
किए
हुए
है।
दरअस्ल
भाषा
और
साहित्य
का
आलोचनात्मक
विवेक
उसके
ऐतिहासिक
निरंतरता
के
बोध
से
ही
संभव
है।
इतिहास
लेखन
और
आलोचनात्मक
विवेक
को
लेकर
नामवर
जी
की
दृष्टि
बेहद
साफ़
है।
साहित्येतिहास
दर्शन
के
विवेचन
के
क्रम
में
उन्होंने
बहुत
स्पष्ट
शब्दों
में
किसी
एक
धारा
या
खंडित
इतिहास
दृष्टि
को
नकारा
है।
ऐसे
में
उनके
आलोचना-कर्म
में
ही
उनकी
इतिहास
दृष्टि
की
भी
तलाश
की
जा
सकती
है।
‘इतिहास
का
नया
दृष्टिकोण’
शीर्षक
निबंध
में
उन्होंने
लिखा
है-
“जिस
प्रकार
सामाजिक
इतिहास
में
विविध
सत्ताधारी
वर्गों
का
उत्थान-पतन
होता
गया,
लेकिन
आधारभूत
जनता
कभी
खुले
रूप
में
और
कुछ
चुपचाप
अपने
अधिकारों
के
लिए
लड़ती
चली
आ
रही
है,
उसी
तरह
हिंदी-साहित्य
की
मूल
धारा
हिंदी-जनता
के
सतत
संघर्ष
की
कहानी
है।
भावी
इतिहास
के
निर्माता
को
साहित्यिक
इतिहास
के
इस
जीवंत
नैरंतर्य
पर
काफ़ी
ज़ोर
देने
की
ज़रूरत
है,
साथ
ही
यह
भी
बताने
की
ज़रूरत
है
कि
यह
अनंत
और
निरुद्देश्य
नहीं
है।”1
‘इतिहास
और
आलोचना’
एवं
‘दूसरी
परंपरा
की
खोज’ जैसी
पुस्तकों
में
हिन्दी
साहित्य
के
विकासक्रम
और
उसकी
आंतरिक
धारा
की
पड़ताल
नामवर
सिंह
की
लोकधर्मी
आलोचना
दृष्टि
का
परिचायक
है।
यह
कहा
जा
सकता
है
कि
आचार्य
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
की
आलोचना
दृष्टि
और
इतिहास
दृष्टि
का
पूरा
प्रभाव
नामवर
सिंह
पर
है,
किंतु
इस
प्रभाव
के
बावजूद
उन्होंने
अपनी
एक
अलग
राह
बनाई
और
अपने
आकाशधर्मा
गुरु
की
छाया
मात्र
न
बनकर,
अपनी
स्वतंत्र
दृष्टि
का
विकास
किया।
जैसा
कि
द्विवेदी
जी
के
भारतीय
संस्कृति
सम्बन्धी
विवेचन
के
संदर्भ
में
उन्होंने
कहा
है
कि
वह
एक
‘अमूर्त
बौद्धिक
अवधारणा’
मात्र
नहीं
बल्कि
‘दृष्टि
का
उन्मेष’
था।
स्वयं
नामवर
सिंह
के
लिए
भी
यह
बात
उतनी
ही
ठीक
है।
उनके
यहाँ
भी
आलोचना-कर्म
पहले
से
चली
आ
रही
आलोचना-परंपरा
का
अवधारणात्मक
विवेचन
मात्र
नहीं,
बल्कि
उस
आधार
पर
विकसित
होने
वाली,
उससे
मुठभेड़
करने
वाली
और
साहित्य
जगत
में
चुनौती
देने
वाली
दृष्टि
रही
है।
इतिहास
को
आलोचना
का
प्रतिमान
मानने
वाले
नामवर
सिंह
के
आलोचना
कर्म
की
व्यवस्थित
शुरुआत
हिन्दी
साहित्य
के
आदिकाल
से
होती
है।
हाँलाकि
उनकी
पहली
प्रकाशित
पुस्तक
‘बकलम
खुद
है’,
लेकिन
उनकी
आलोचना-दृष्टि
का
प्रथम
उत्थान
‘हिंदी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’
पुस्तक
में
दिखाई
देता
है।
इस
पुस्तक
का
प्रारम्भिक
रूप
एम.ए.
के
दौरान
लघु
शोध-प्रबंध
का
था,
बाद
में
इसका
परिवर्धित
संस्करण
पुस्तकाकार
प्रकाशित
हुआ।
हिन्दी
साहित्य
के
आदिकाल
से
नामवर
सिंह
के
आलोचना-कर्म
की
शुरुआत
के
पीछे
आचार्य
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
की
महत्त्वपूर्ण
भूमिका
है।
उस
भूमिका
की
और
ठोस
परिणति
इनके
शोध
के
विषय
और
कालांतर
में
पुस्तक
के
रूप
में
प्रकाशित
शोध-प्रबंध
‘पृथ्वीराज
रासो
: भाषा और साहित्य’ में दिखाई देती है। इन दोनों पुस्तकों के विवेचन के क्रम में द्विवेदी जी के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है, लेकिन उसमें मौजूद नामवरीय दृष्टि को अलग से पहचाना जा सकता है। ‘भारतीय साहित्य की प्राणधारा और लोकधर्म’
के
विवेचन
के
क्रम
में
जिस
तरह
शास्त्रीय
परंपरा
के
लोक
की
ओर
झुकने
की
‘स्वाभाविक’ प्रक्रिया
पर
नामवर
जी
मुग्ध
हैं;
दरअसल
खुद
उनकी
अपनी
आलोचना
दृष्टि
आचार्य
द्विवेदी
से
‘प्रभाव’
ग्रहण
करते
हुए
भी,
उनके
अपने
‘स्व-भाव’
के
अधिक
निकट
है।
जिस
तरह
लोकशक्ति
भारतीय
चिंताधारा
की
शास्त्रीयता
को
बेधकर
उसे
एक
नई
दिशा
की
ओर
धकेले
जा
रही
थी,
उसी
तरह
नामवर
सिंह
की
आलोचना-दृष्टि
आचार्यों
की
परंपरा
को
आत्मसात्
करते
हुए
व्यावहारिक
और
समकालीन
साहित्य-सिद्धांतों
की
ओर
अग्रसर
हुई।
वस्तुतः
नामवर
सिंह
हिन्दी
साहित्य
के
ऐसे
आलोचक
हैं
जिनका
जितना
मज़बूत
जुड़ाव
भाषा
और
साहित्य
की
भारतीय
एवं
पाश्चात्य
शास्त्रीय
परंपरा
से
है,
उतना
ही
गहरा
जुड़ाव
समकालीन
साहित्य
और
व्यावहारिक
आलोचना
से
है।
इस
दृष्टिकोण
से
देखा
जाय
तो
कह
सकते
हैं
कि
प्राच्य
और
पाश्चात्य,
इतिहास
और
समकाल,
शास्त्र
और
व्यवहार
के
साथ-साथ
काशी
के
पांडित्य
और
फक्कड़पन
की
परंपरा
से
निर्मित
होने
वाला
आलोचकीय
विवेक
जिस
आलोचक
के
यहाँ
है,
वे
नामवर
सिंह
हैं।
‘दूसरी
परंपरा
की
खोज’
में
इन्होंने
लिखा
है-
“ग्रामशी
ने
यह
कहने
का
साहस
दिखलाया
कि
मार्क्स
द्वारा
निरूपित
‘आइडियालोजी’
की
क्लासिकी
अवधारणा
इन
जन-आंदोलनों
की
लोकप्रिय
विचारधारा
को
समझने
में
बहुत
काम
की
साबित
नहीं
हो
सकती।
वस्तुतः
किसी
जन-विद्रोह
की
लोकप्रिय
विचारधारा
का
मूल्यांकन
‘ऐतिहासिक’
दृष्टि
से
ही
उचित
है
‘तात्विक’
दृष्टि
से
नहीं।”2 साहित्य
के
विश्लेषण
और
मूल्यांकन
के
लिए
रूढ़
हो
चुकी
काव्यशास्त्र
के
‘तात्विक’
मानदंडों
से
हिन्दी
साहित्य
को
बाहर
लाने
का
काम
महावीरप्रसाद
द्विवेदी
और
पीताम्बरदत्त
बड़थ्वाल
से
लेकर
आचार्य
रामचंद्र
शुक्ल,
आचार्य
हजारीप्रसाद
द्विवेदी,
राहुल
सांकृत्यायन,
रामविलास
शर्मा
सदृश
अन्य
आलोचक
एवं
विद्वान
कर
चुके
थे।
अपने-अपने
नज़रिए
से
हिन्दी
साहित्य
की
ऐतिहासिक
निरंतरता
और
उसकी
जातीय
अस्मिता
की
तलाश
भी
इन
आलोचकों
ने
की,
लेकिन
उस
जातीय
अस्मिता
और
उसकी
ऐतिहासिक
निरंतरता
को
सीधे
अपने
समकाल
से
जोड़ने
का
ज़रूरी
कार्य
हिन्दी
आलोचना
में
नामवर
सिंह
ने
किया।
वे
जीवन
के
आख़िरी
समय
तक
अपने
आलोचनात्मक
मानदंडों
पर
न
सिर्फ़
समकालीन
कृतियों
का
मूल्यांकन
करते
रहे
बल्कि
खुद
अपने
भी
आलोचना-कर्म
का
पुनर्मूल्यांकन
करते
रहे।
इससे
पैदा
होने
वाले
विवादों
या
अंतर्विरोधों
का
अंदाज़ा
भी
उन्हें
बखूबी
था,
लेकिन
पांडित्य
और
आचार्यत्व
को
व्यवहारिकता
में
ढालने
का
खिलंदड़पन
नामवर
को
इन
दोनों
के
बीच
का
‘नामा-बर’ बनाता है।
आचार्य
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
के
व्योमकेश
शास्त्री
वाली
भूमिका
के
बारे
में
नामवर
सिंह
का
कहना
है
कि
“इस
भूमिका
के
लिए
एक
विशेष
प्रकार
के
व्यक्तित्व
की
ज़रूरत
है।
इसके
लिए
ऐसा
व्यक्ति
वांछनीय
है
जो
पंडित
होते
हुए
भी
आचार्य
के
लोकदत्त
पदभार
से
मुक्त
हो।”3
हालाँकि
जिसे
व्योमकेश
शास्त्री
रूपी
द्विवेदी
जी
नीरस
काम
कहते
हैं
और
उससे
विश्राम
पाने
के
लिए
गप्पों
की
रचना
हेतु
इस
रूप
को
धरते
हैं,
असल
में
उनके
द्वारा
कथित
वह
नीरस
काम
भी
उतना
ही
रसयुक्त
है।
चाहे
उनके
निबंध
हों,
या
फिर
इतिहास
और
आलोचना
हो
या
उनका
कला
और
सौंदर्य
संबंधी
चिंतन
हो।
द्विवेदी
जी
के
आचार्य
रूप
में
भी
व्योमकेश
शास्त्री
हमेशा
झाँकता
रहता
है।
नामवर
सिंह
की
भी
असल
पहचान
इस
आचार्य
परंपरा
के
‘लोकदत्त
पदभार’
से
मुक्ति
की
है।
हिन्दी
साहित्य
के
आदिकाल
पर
काम
करते
हुए
आज
भी
आचार्य
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
की
परंपरा
से
अलग
रास्ता
बनाना
कठिन
है,
वह
इसलिए
की
एक
तरह
से
आदिकालीन
साहित्य
के
ऐतिहासिक
एवं
व्यावहारिक
मूल्यांकन
का
सबसे
पहला
और
बड़ा
काम
आचार्य
द्विवेदी
का
ही
है।
उसमें
भी
तब
जब
उन्हीं
के
दिशा-निर्देशन
में
कोई
शोध
कार्य
हो
रहा
हो,
तब
तो
उनकी
छाया
से
उस
कार्य
का
थोड़ा-बहुत
मुक्त
हो
पाना
भी
बड़ी
बात
है।
यह
एक
आचार्य
और
शोध-निर्देशक
तथा शोधार्थी और भविष्य के आलोचक, दोनों के लिए ही बड़ी चुनौती रही होगी। यह संयोग घटे हुए भी लगभग पचहत्तर वर्ष हो गए हैं। ऐसे में दोनों आलोचकों की आलोचना-दृष्टि का मूल्यांकन किया जाए
तो
दिखाई
देता
है
कि
आदिकाल
के
संदर्भ
में
भी
नामवर
सिंह,
द्विवेदी
जी
के
आलोचनात्मक
मानदंडों
और
उनकी
परंपरा
का
निर्वाह
करते
हुए
भी
अपनी
एक
अलग
पहचान
छोड़ते
हैं।
साथ
ही
कई
जगहों
पर
आचार्य
द्विवेदी
की
मान्यताओं
के
अंतर्विरोधों
को
भी
सामने
रखते
हैं।
आचार्य
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
ने
हिन्दी
के
आरम्भिक
साहित्य
को
सही
मायने
में
उन्हीं
के
शब्दों
में
कहें
तो
‘म्यूज़ियम
इंटरेस्ट’
से
बाहर
लाकर
‘जीवन-रसदायिनी’
के
रूप
में
देखने
की
दृष्टि
दी।
फिर
भी
आज
तक
हिन्दी
का
अकादमिक
जगत,
आदिकालीन
साहित्य
को
लेकर
इस
‘म्यूज़ियम
इंटरेस्ट’
से
ना
तो
पूर्णतः
मुक्त
हो
पाया
है
और
ना
ही
अनाक्रांत।
आदिकालीन
साहित्य
की
यह
विडम्बना
ही
रही
है
कि
आचार्य
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
जैसे
इतिहासकार
और
आलोचक
की
समर्थ
दृष्टि
का
स्पर्श
पाकर
भी
वह
इतिहास
लेखन
के
संकीर्ण
नज़रिए
से
बाहर
नहीं
निकल
पाया।
द्विवेदी
जी
की
आलोचना
और
इतिहास
दृष्टि
को
शुक्ल
जी
के
बरअक्स
खड़ा
करने
और
उनमें
दो-दो
हाथ
करवाने
में
ही
आदिकाल
संबंधी
हिन्दी
आलोचना
का
अधिकांश
खर्च
होता
रहा
है।
द्विवेदी
जी
के
आदिकालीन
साहित्य
संबंधी
मानदंडों
का
विकास
आदिकाल
की
कुछ
साहित्यिक
परंपराओं
के
विश्लेषण
में
ही
किया
गया,
बाक़ी
जगह
वही
ढाक
के
तीन
पात।
समाज
के
सामंती
ढाँचे
में
विकसित
साहित्य
का
मूल्यांकन,
सामंती
दृष्टि
से
तो
नहीं
किया
जा
सकता!
या
फिर
उस
दौर
के
साहित्य
में
वर्णित
भावों
को
समाज
के
हूबहू
प्रतिबिम्बन
के
रूप
में
देखने
वाली
कसौटी
से
भी
हम
उस
साहित्य
में
मौजूद
युग
की
वास्तविकता
को
उजागर
नहीं
कर
सकते।
साहित्य
और
समाज
का
संबंध
सपाट
और
एकरेखीय
नहीं
होता
है।
अतः
किसी
समय
का
सामाजिक
यथार्थ
भी
तत्कालीन
साहित्य
में
सीधे-सीधे
अभिव्यक्त
हो,
यह
ज़रूरी
नहीं
है।
साहित्य
में
सामाजिक
यथार्थ
की
सीधी
अभिव्यक्ति
की
माँग
करना
उसके
कलात्मक
मूल्यों
व
वास्तविक
सांस्कृतिक
दायित्व
की
उपेक्षा
करना
है,
क्योंकि
किसी
भी
समाज
से
उसकी
भाषा
और
साहित्य
का
यांत्रिक
नहीं
बल्कि
सजग,
सहज
व
जीवंत
संबंध
होता
है।
टेरी
ईगलटन
ने
लिखा
है-
“अपने
बुनियादी
अर्थों
में
साहित्य
द्वारा
यथार्थ
को
प्रतिबिम्बित
करने
का
विचार
अपर्याप्त
ही
कहलाएगा।
इससे
साहित्य
और
समाज
के
निष्क्रिय,
यांत्रिक
संबंधों
का
बोध
होता
है।
इस
धारणा
से
ऐसा
लगता
है
जैसे
साहित्य
किसी
दर्पण
या
फ़ोटोग्राफ़ी
की
प्लेट
की
तरह
बाहरी
समाज
को
निष्क्रियतापूर्वक
दर्ज
करने
का
काम
करता
है।”4 हिन्दी
साहित्य
के
आदिकाल
के
मूल्यांकन
में
अधिकांश
आलोचकों
द्वारा
यही
प्रणाली
अपनाई
गई।
उसमें
भी
रासो-साहित्य
इसका
सबसे
बड़ा
शिकार
हुआ।
जब
रासो
काव्य-परंपरा
की
सबसे
बड़ी
रचना
‘पृथ्वीराज
रासो’
को
लेकर
हिन्दी
अकादमिक
जगत
बिलकुल
निरपेक्ष
हो
चला
था।
उन्नीसवीं
सदी
से
ही
कभी
उसका
प्रकाशन
रोका
गया,
तो
कभी
सम्पूर्ण
ग्रंथ
को
जाली
बताकर
उसे
एक
तरह
से
साहित्यिक
बहसों
से
ही
बहिष्कृत
कर
दिया
गया,
ऐसे
में
आचार्य
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
ने
रासो-काव्यों
के
मूल्यांकन
के
लिए
न
सिर्फ़
नए
मानदंडों
की
निर्मिति
की,
बल्कि
इस
ग्रंथ
की
भाषा
पर
नामवर
सिंह
को
शोध-कार्य
करने
के
लिए
प्रेरित
भी
किया।
एक
ऐसी
रचना
जिसे
साहित्य
के
आलोचनात्मक
और
ऐतिहासिक
बहसों
से
ही
बाहर
कर
दिया
गया
हो,
उसकी
पांडुलिपि
को
अपने
शोध-कार्य
का
विषय
बनाना
अपने
आप
में
एक
चुनौती
को
स्वीकार
करना
है।
यह
चुनौती
कबीर
के
‘सुच्छ्मवेद’
की
तरह
है,
जो
लोक
और
शास्त्र
दोनों
से
भिड़ते
हुए
अपनी
जगह
बनाती
है।
'पृथ्वीराज
रासो’
जो
पुस्तकालयों
और
संग्रहालयों
की
वस्तु
बन
गई
थी,
प्रामाणिकता
संबंधी
तमाम
आरोपों
से
घिर
कर
अकादमिक
जगत
और
भारतीय
ज्ञानमीमांसा
से
पदच्युत
हो
गई
थी,
उसकी
भाषा
पर
मुख्य
रूप
से
और
परिशिष्ट
के
रूप
में
उसके
साहित्यिक
पक्षों
का
अध्ययन
करके
नामवर
सिंह
ने
उसके
अध्ययन-अध्यापन
को
आगे
बढ़ाने
में
महत्त्वपूर्ण
भूमिका
निभाई।
‘पृथ्वीराज
रासो’
के
पाठ
की
प्रामाणिकता
पर
काम
करने
वाले
महत्त्वपूर्ण
विद्वान
माताप्रसाद
गुप्त
ने
भी
नामवर
जी
के
इस
शोध
कार्य
को
पर्याप्त
महत्त्व
दिया
है
और
इनके
भाषा
संबंधी
अधिकांश
निष्कर्षों
से
सहमति
जतायी
है।
पृथ्वीराज
रासो
के
मूल्यांकन
के
ही
बहाने
नामवर
सिंह
आदिकालीन
साहित्य
के
विवेचन
की
एक
ऐसी
दृष्टि
देते
हैं,
जो
रूमानियत
से
मुक्त
और
अपेक्षाकृत
यथार्थवादी
है।
हिन्दी
में
पुराने
साहित्य
पर
लिखते
हुए
अमूमन
एक
ऐसी
हाइपोथिसिस
के
सहारे
आगे
बढ़ा
जाता
है
जिसमें
हर
रचना
से
एक
तो
यांत्रिक
तरीक़े
की
सामाजिक
परिस्थिति
और
दूसरा
उसमें
छुपे
आदर्शवाद
की
छवियों
को
किसी
न
किसी
रूप
में
ढूँढ
निकाला
जाता
है।
पुराने
साहित्य
को
नैतिक-शिक्षा
या
फिर
सुभाषित-संग्रह
वाली
दृष्टि
से
बाहर
निकाल
पाना
भी
हिन्दी
आलोचना
के
लिए
बड़ी
चुनौती
रही
है,
क्योंकि
किसी
भी
युग
का
साहित्य
सामाजिक
यथार्थ,
उसकी
विकृतियों
और
विडंबनाओं
की
उपज
होते
हुए
आदर्श
मूल्यों
व
सम्भावनाओं
का
वहन
करने
वाला
भी
हो,
यह
हमेशा
सम्भव
नहीं
होता।
साथ
ही
यह
भी
बहसतलब
है
कि
तत्कालीन
समाज
के
आदर्श
मूल्य
और
उसकी
सम्भावनाओं
की
निर्मिति
किस
पृष्ठभूमि
पर
हुई
है!
जैसे
शंकर
और
रामानुज
जैसे
आचार्यों
के
आदर्श
मूल्य
सिद्धों-नाथों-जैनियों
के
लिए
आदर्श
सम्भावनाएँ
नहीं
हो
सकती
थीं
या
फिर
कबीर
के
यहाँ
मौजूद
आदर्श
संभावनाएँ
तुलसीदास
के
लिए
आदर्श
मूल्य
नहीं
हो
सकते
थे।
रासो
का
मूल्यांकन
करते
हुए
नामवर
सिंह
कहीं
भी
इसमें
घालमेल
नहीं
करते।
न
ही
शोध-विषय
होने
के
मोह
में
डूबते-उतराते
ही
दिखाई
देते
हैं।
‘पृथ्वीराज
रासो’
जैसी
बड़ी
रचना
पर
शोध-कार्य
करते
हुए
नामवर
जी
के
यहाँ
एक
भी
वाक्य
में
इसके
प्रति
अतिरिक्त
मोह
नहीं
दिखाई
देता
है।
बेहद
तटस्थ
रूप
से
अपने
शोध-विषय
को
बरत
पाना
भी
किसी
शोधार्थी
के
लिए
बड़ी
साधना
है
और
नामवर
सिंह
इसमें
सिद्ध
हैं।
पृथ्वीराज
रासो
की
रूमानियत
को
तोड़ते
हुए
इन्होंने
लिखा
है-
“पृथ्वीराज
रासो
संत-भक्ति
काव्य
की
भाँति
सामान्य
जन-जागरण
की
उत्थानशील
भावना
का
प्रतिबिम्ब
न
होते
हुए
भी
ह्रासोन्मुखी
सामंती
शक्तियों
के
अंतर्विरोध
का
चित्रण
करने
वाला
महाकाव्य
है।
निश्चय
ही
इसकी
वीर
भावना
में
न
तो
महाभारत-सा
उद्दात्त
शौर्य
और
पराक्रम
है
और
न
इसकी
शृंगार
भावना
में
कालिदास
की
सी
मुग्ध
तन्मय
भवकुलता।
ह्रासयुग
का
प्रभाव
रासो
की
वीरता
और
शृंगार
दोनों
भावनाओं
पर
पड़ा
है।”5
रासो-काव्यों
एवं
अन्य
ऐहिकतापरक
रचनाओं
का
मूल्यांकन
तत्कालीन
सामाजिक
परिस्थिति
में
न
करके
बेहद
रूमानी
धारणा
में
बँधकर
किया
गया
और
आज
का
अकादमिक
जगत
भी
इसे
इसी
मुग्ध-भाव
से
देखता
है।
चारण-काव्यों
की
परंपरा
इतनी
लोकप्रिय
और
मनोरंजक
रही
कि,
इसकी
मुख्य
दो
प्रवृत्तियाँ
शौर्य
और
शृंगार
में
ही
आदिकालीन
साहित्य
के
अधिकांश
को
समेट
लिया
गया।
ये
प्रवृत्तियाँ
ही
अधिकतर
आलोचकों
और
इतिहासकारों
के
विश्लेषण
की
औज़ार
बनीं।
शासक-वर्ग
की
उपभोगवादी
महत्वाकांक्षा
को
ही
हिन्दी
साहित्य
के
बहुत
से
प्रगतिशील
आलोचकों
ने
भी
अपनी
कसौटी
बनाई।
सत्ता-वर्ग
की
घातक
और
क्रूर
आकांक्षाओं
को
भी
परवर्ती
इतिहास
कितने
रूमानी
रंग
में
रंग
देता
है,
आदिकालीन
साहित्य
की
आलोचना
का
इतिहास
इसका
प्रामाणिक
दस्तावेज
है।
इस
पूरी
काव्यधारा
का
विश्लेषण
शासक
और
सत्ता-पक्ष
की
दृष्टि
से किया गया। इसका एक कारण उन्नीसवीं सदी के
यूरोपीय
विद्वानों
की
औपनिवेशिक
दृष्टि का प्रभाव और पुनरुत्थानवाद हो सकता
है,
लेकिन
आचार्य
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
के
लोकधर्मी
आलोचनात्मक
मानदंडों
के
बाद
भी
उस
दृष्टि
का
क़ायम
रहना
हिन्दी
आलोचना
की
लोकतांत्रिकता
पर
कई
सवाल
भी
खड़े
करता
है।
‘पृथ्वीराज
रासो’
की
युगीन
वास्तविकता
के
विश्लेषण-क्रम
में
नामवर
सिंह,
आचार्य
द्विवेदी
की
मान्यताओं
से
आगे
बढ़ते
हुए
उसे
एक
ठोस
वैचारिक
रूप
देते
हैं।
कवि
चंद
के
विषय
में
उन्होंने
लिखा
है-
“वह
पृथ्वीराज
तथा
उससे
सम्बद्ध
राजाओं
और
सामंतों
के
प्रणय
तथा
युद्ध-विषयक
संबंधों
के
माध्यम
से
उस
युग
के
ह्रासोन्मुख
उपरले
समुदाय
की
वास्तविकता
प्रकट
करता
है।
निस्संदेह
चंद
अपने
चरित
नायक
पृथ्वीराज
का
सखा
था
और
पृथ्वीराज
के
प्रति
उसका
पक्षपात
भी
स्वाभाविक
था।
इस
सहानुभूति
के
बावजूद
उसके
अनजाने
पृथ्वीराज
तथा
उसके
समाज
की
कमज़ोरियाँ
उभर
गई
हैं।”6 आलोचना-कर्म
में
सहित्येतिहास
की
निरंतरता
को
बेहद
महत्त्वपूर्ण
मानने
के
साथ
ही
उसके
भीतर
निहित
अंतर्विरोधों
का
भी
सटीक
मूल्यांकन
करना
नामवर
सिंह
की
आलोचनात्मक
दृष्टि
का
ज़रूरी
पक्ष
है।
साहित्य
की
‘प्राणधारा’
के
भीतर
मौजूद
‘अंतर्धाराओं’
के
सहभाव
और
टकराहटों
से
उनके
संबंधों
का
सापेक्षिक
मूल्यांकन
करने
की
बात
उन्होंने
वस्तुतः
द्विवेदी
जी
की
मान्यताओं
के
क्रम
में
की
है,
लेकिन
‘हिंदी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’,
आदिकालीन
साहित्य
की
प्राणधारा
में
निहित
अंतर्धाराओं
के
इन्हीं
सापेक्षिक
अध्ययन
के
लिए
ही
आज
भी
हिन्दी
साहित्य
में
अपना
महत्त्व
बनाए
हुए
है।
आदिकालीन
साहित्य
की
विविध
और
कई
बार
विरोधी
सी
जान
पड़ती
धाराओं
का
ऐसी
प्रवाहमय
भाषा
में
एक
साथ
मूल्यांकन
भाव
और
विचार
की
तारतम्यता
से
ही
संभव
है।
यह
पुस्तक
भी
दो
हिस्सों
में
है,
पहला
खंड
भाषिक
विश्लेषण
का
है
और
दूसरा
खंड
साहित्यिक
विवेचन
का।
अपभ्रंश
साहित्य
की
महत्त्वपूर्ण
उपादेयता
भाषिक
विकास
के
संदर्भ
में
है।
साहित्य
के
रूप
और
अंतर्वस्तु
का
ऐतिहासिक
विकास
अन्योन्याश्रयी
होता
है।
दोनों
को
एक-दूसरे
से
अलग
करके
उसका
सही
मूल्यांकन
संभव
नहीं
है।
जैसे-जैसे
साहित्य
की
अंतर्वस्तु
बदलती
है
वैसे-वैसे
उसकी
भाषिक
और
रूपगत
संरचना
भी।
साहित्य
के
इतिहास
में
किसी
भी
नई
भाषा
की
प्रतिष्ठा
का
असल
मूल्यांकन
इस
आधार
पर
किया
जा
सकता
है।
नई
भाषा
पीछे
की
साहित्यिक
परंपरा
में
दूसरे
नए
संरचनात्मक
उपादानों
के
साथ
शामिल
होती
है,
और
इन
संरचनाओं
का
अपना
सामाजिक-सांस्कृतिक
परिप्रेक्ष्य
होता
है।
अपभ्रंश
के
साहित्यिक
उत्थान
की
विभिन्न
सामाजिक-सांस्कृतिक
परिस्थितियों
में
ही
वस्तु
के
साथ
उसके
अंतरसंबंधों
की
व्याख्या
की
जा
सकती
है।
इस
क्रम
में इस पुस्तक के ‘अपभ्रंश साहित्य का ऐतिहासिक महत्त्व’ शीर्षक हिस्से के दो पैराग्राफ़ अद्भुत बोधगम्य
एवं
पठनीय
हैं,
जिसके
आख़िरी
हिस्से
में
इन्होंने
लिखा
है-“वह
जिन
लोगों
की
आशाओं
और
आकांक्षाओं
को
व्यक्त
कर
रहा
था,
उन्हें
बहुत
दिनों
के
बाद
अपनी
देसी
भाषा
में
ह्रदय
की
बात
कहने
का
अवसर
मिला
था।
संस्कृत
के
माध्यम
से
उस
समय
उस
लोक-जीवन
की
अभिव्यक्ति
नहीं
हो
सकती
थी।
पृथ्वी-पुत्रों
की
वह
सारी
भाव-सम्पदा
सीधे
अपभ्रंश
को
ही
पहली
बार
प्राप्त
हुई।
अपभ्रंश-साहित्य
की
शक्ति
का
यही
रहस्य
है।
इसी
लोक-तत्त्व
के
द्वारा
अपभ्रंश
साहित्य
ने
भारतीय
साहित्य
में
अपना
ऐतिहासिक
कार्य
सम्पन्न
किया
और
इसी
लोक-तत्त्व
से
उसमें
युग-युग
तक
मानव-ह्रदय
को
आनंदित
करने
की
शक्ति
आई
है।”7 अपभ्रंश
साहित्य
को
लेकर
उनकी
दृष्टि
एकरेखीय
और
सतही
नहीं
है।
बहुत
स्पष्ट
तरीक़े
से
उन्होंने
यह
भी
लिखा
है
कि
“अपभ्रंश
साहित्य
के
भीतर
रूढ़ि-पोषक
और
नवोन्मेषशालिनी
दो
प्रकार
की
साहित्यिक
प्रवृत्तियों
का
अस्तित्त्व
निःसंदिग्ध
है।
ये
परस्पर
विरोधी
प्रवृत्तियाँ
दो
विभिन्न
प्रदेशों
और
भिन्न
कवियों
में
नहीं
बल्कि
एक
ही
कवि
की
एक
ही
रचना
के
अंतर्गत
देखी
जा
सकती
हैं।”8 इस
रूप
में
अपने
प्राचीन-साहित्य
को
देखने
वाली
दृष्टि,
निश्चित
तौर
पर
खुद
को
अतीत-मोह
और
जातीय
एवं
क्षेत्रीय
भेद
रूपी
अवधारणाओं
से
बचा
ले
जाएगी।
इस
तटस्थता
के
साथ
अपभ्रंश
और
आदिकालीन
साहित्य
की
एक-एक
धारा
और
उनके
महत्त्वपूर्ण
ग्रंथों
का
जितना
जीवंत
विवेचन
इस
पुस्तक
में
नामवर
सिंह
ने
किया
है,
वह
इन
‘अंतर्विरोधों’
या
द्विवेदी
जी
के
शब्दों
में
कहें
तो
‘स्वतो-व्याघातों’
के
युग
की
एक-एक
सरणी
को
आगे
के
अध्येताओं
के
लिए
खोलने
वाला
है।
नामवर
सिंह
का
ही
कथन
है
कि
‘चिंतन
के
क्षेत्र
में
पूर्वजों
से
उऋण
होने
का
एक
तरीक़ा
यह
है
कि
उनकी
मान्यताओं
की
पुनःप्रस्तुति
स्वयं
उनकी
प्रस्तुति
से
बेहतर
की
जाए।’
इस
‘पुनःप्रस्तुति’
में
जो
‘बेहतर’
है
निश्चित
तौर
पर
वह
आगे
की
चिंतन
प्रक्रिया
है।
नामवर
सिंह
के
यहाँ
यह
‘प्रस्तुति’
रुकी
हुई
न
होकर
निरंतर
नए-नए
रूपों
को
धारण
करने
वाली
और
इन
नए
रूपों
से
नए
आयामों
का
उद्घाटन
करने
वाली
है।
परंपरा
के
पुनर्मूल्यांकन
की
निरंतरता
और
उसमें
से
श्रेष्ठ
को
ग्रहण
कर,
उसे
और
अधिक
वैज्ञानिक-चेतना-सम्पन्न
बनाना
उनका
ध्येय
है।
इसमें
उनकी
मार्क्सवादी
आलोचना
दृष्टि
बहुत
सहायक
हुई।
यही
कारण
है
कि
अपने
अध्ययन
और
लेखन
के
क्रम
में
कहीं
भी
वे
न
तो
मोहाविष्ट
दिखाई
देते
हैं
और
न
ही
आक्रांत।
आदिकालीन
साहित्य
की
आलोचना
के
सिलसिले
को
देखें
तो
द्विवेदी
जी
से
पहले
आगे
की
साहित्यिक
परंपरा
से
उसे
जोड़ने
या
फिर
जिसे
वे
साहित्य
की
‘प्राणधारा’
कहते
हैं
उसे
तलाशने
का
प्रयास
लगभग
नहीं
के
बराबर
है।
उनके
बाद
इस
दिशा
में
जो
कार्य
हुए,
उसमें
‘हिंदी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’
एक
महत्त्वपूर्ण
काम
है।
भक्ति-आंदोलन
का
मूल,
शास्त्र
और
लोक
के
बीच
का
द्वंद्व
है।
यह
निष्कर्ष
आचार्य
द्विवेदी
की
मध्यकालीन
भारतीय
साहित्य
और
इतिहास
की,
एवं
उसकी
पृष्ठभूमि
में
मौजूद
आदिकालीन
साहित्य
के
संबंध
में
अद्यतन
अध्ययन
तक
सर्वाधिक
महत्त्वपूर्ण
और
अकाट्य
स्थापना
है।
इस
अवधारणा
का
पल्लवन
और
विस्तार,
आगे
की
हिन्दी
आलोचना
में
सबसे
मज़बूत
और
व्यवस्थित
रूप
से
नामवर
सिंह
द्वारा
‘हिंदी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’
में
ही
किया
गया
है।
अपभ्रंश
और
अवहट्ट
भाषा
की
परंपरा
में
हिन्दी
के
निरूपण
का
बहुत
महत्त्वपूर्ण
और
बड़ा
कार्य,
किशोरीदास
वाजपेयी
और
गुलेरी
जी
से
लेकर
धीरेंद्र
वर्मा,
रामकुमार
वर्मा,
भोलाशंकर
व्यास
एवं
शिवप्रसाद
सिंह
जैसे
विद्वानों
ने
किया।
इसी
तरह
अपभ्रंश
के
काव्यरूपों,
छंद-परंपरा,
वर्ण्य-विषय एवं अपभ्रंश साहित्य का हिन्दी पर
पड़ने
वाले
प्रभाव
के
संबंध
में
भोलाशंकर
व्यास,
हरिवंश
कोछड़,
रामसिंह
तोमर
और
शम्भूनाथ
पांडेय
के
कार्यों
को
भुलाया
नहीं
जा
सकता
है।
अपभ्रंश
साहित्य
के
पाठ-प्रकाशन,
पाठान्तर
और
पाठ-केंद्रित
आलोचना
पर
उन्नीसवीं
सदी
के
यूरोपीय
विद्वानों
से
लेकर
मुनि
जिनविजय,
चिमनलाल
डाह्यभाई
दलाल,
डॉ
गुणे,
अगरचंद
नाहटा,
हीरालाल
जैन,
नेमिनाथ
उपाध्ये,
श्री
भयाणी,
बाबूराम
सक्सेना,
माताप्रसाद
गुप्त,
राहुल
सांकृत्यायन
सदृश
विद्वानों
ने
कठोर
परिश्रम
के
साथ
महत्त्वपूर्ण
शोध
और
लेखन
न
किया
होता
तो
हिन्दी
साहित्य
का
आज
जो
इतिहास
और
स्वरूप
है,
इसकी
कल्पना
भी
संभव
नहीं
थी।
इसके
बावजूद
‘हिंदी
साहित्य
की
मूल
चिंताधारा
लोक
और
शास्त्र
के
द्वंद्व
से
निर्मित
हुई
है
और
आदिकालीन
साहित्य
हिन्दी
साहित्य
का
एक
हिस्सा
मात्र
न
होकर
उसका
मूल
है’,
द्विवेदी
जी
की
इस
अवधारणा
का
पूर्ण
रूप
से
विकास
नामवर
सिंह
की
आलोचना
में
ही
दिखाई
देता
है।
आदिकालीन
साहित्य
का
परवर्ती
साहित्य
पर
प्रभाव
और
उसकी
भाषिक-साहित्यिक
परंपरा
का
हिन्दी
साहित्य
में
विकास
दिखाने
का
कार्य
अन्य
आलोचकों
ने
भी
किया
है,
लेकिन
आदिकालीन
साहित्य
को
परवर्ती
हिन्दी
साहित्य
का
‘मूल’
मानकर
उसके
ऐतिहासिक
संबंधों
की
तलाश;
‘साहित्यिक
चेतना
की
तारतम्यता’
और
‘भावधारा'
के
नैरंतर्य
में
करने
के
कारण
आचार्य
द्विवेदी
और
उनके
बाद
नामवर
सिंह
का
अपभ्रंश
एवं
आदिकालीन
साहित्य
संबंधी
चिंतन
अधिक
प्रासंगिक
हो
जाता
है।
आदिकालीन
साहित्य
के
अंतर्विरोधों
पर
लिखते
हुए
नामवर
सिंह
ने
लिखा
है-
“हिंदी
साहित्य
के
आदिकाल
में
प्रवृत्ति
की
अराजकता
नहीं
थी,
उसमें
बेतरतीब
उगी
हुई
प्रवृत्तियों
का
जंगल
नहीं
था।
उस
विविधता
में
भी
व्यवस्था
थी
और
वह
व्यवस्था
यह
थी
कि
दो
स्पष्ट
विरोधी
साहित्यिक
प्रवृत्तियाँ
प्रचलित
थीं।
एक
प्रवृत्ति
वह
थी
जो
क्रमशः
क्षीयमाण
थी,
दूसरी
वह
थी
जो
क्रमशः
वर्धमान
थी।
पहली
का
संबंध
राजस्तुति,
सामंतों
के
चरितवर्णन,
युद्धवर्णन,
केलि
विलास,
बहुविवाह
के
लिए
विजयोन्माद
आदि
से
था
और
दूसरी
का
संबंध
नीची
समझी
जाने
वाली
जातियों
के
धार्मिक
असंतोष,
रूढ़ि-विरोध,
बाह्यडंबर
खंडन,
जाति-भेद
की
आलोचना,
उच्चतर
आचार,
व्यापक
भगवत्प्रेम,
मानवीय
आत्मगौरव
से
था।
एक
का
नाम
तथाकथित
वीरगाथा
काव्य
है
और
दूसरी
का
तथाकथित
योगधारा।”9 हिन्दी
साहित्य
में
आदिकाल
के
बाद
विकसित
होने
वाली
भक्ति-साहित्य
की
परंपरा
में
इस
दूसरी
प्रवृत्ति
वाली
भावधारा
का
ही
विकास
हुआ
है
और
यही
हिन्दी
साहित्य
की
मूल
‘प्राणधारा’
है,
इसे
लेकर
नामवर
सिंह
के
यहाँ
कहीं
कोई
दुविधा
नहीं
दिखाई
देती
है।
भक्ति-आंदोलन
के
संबंध
में
एक
महत्त्वपूर्ण
तथ्य
यह
है
कि
दक्षिण
में
भक्ति
को
ज्ञानात्मक-दार्शनिक
विस्तार
देने
के
क्रम
में
उसे
पूर्णतः
शास्त्रीय
किया
जा
चुका
था,
जबकि
उत्तर
भारत
में
भक्ति
के
शास्त्रीय
स्वरूप
की
पृष्ठभूमि
उस
रूप
में
नहीं
विकसित
हो
पाई
थी,
जिसका
मूल
कारण
था
बौद्ध-सिद्धों,
जैन
योगियों
और
नाथ-पंथियों
की
परंपरा।
इस
आधार
पर
कबीर
आदि
संतों
को
दक्षिण
से
उठने
वाले
भक्ति
आंदोलन
के
शास्त्रीयकृत
रूप
का
प्रति-आख्यान
माना
जाना
चाहिए।
इस
प्रति-आख्यान
की
रचना
इस
रूप
में
उत्तर-भारत
की
ही
परिस्थितियों
में
संभव
थी।
आदिकालीन
साहित्य
की
परस्पर
विरोधी
इन
दोनों
प्रवृत्तियों
का
आधार
नामवर
सिंह
से
पहले
के
विद्वानों
ने
जातीय
और
क्षेत्रीय
माना
है।
स्वयं
द्विवेदी
जी
ने
इसे
पूर्वी
और
पश्चिमी
क्षेत्रों
में
बसे
अलग-अलग
आर्यों
की
भिन्न-भिन्न
प्रकृति
के
आधार
पर
व्याख्यायित
किया
है।
जिसका
सार
यह
है
कि
पूर्वी
प्रदेशों
में
बसने
वाले
आर्यों
की
मूल
प्रकृति
रूढ़ियों
और
परंपराओं
के
प्रति
विद्रोह
की
रही
है
तो
पश्चिमी
प्रदेशों
में
बसे
आर्यों
के
उनके
पालन
में।
नामवर
सिंह,
द्विवेदी
जी
समेत
अपने
पूर्ववर्ती
विद्वानों
की
इस
क्षेत्रीय
और
जातीय
अवधारणा
का
खंडन
करते
हैं।
उनका
स्पष्ट
मत
है
कि
सरहपा
और
काणहपा
जैसे
सिद्धों
की
ही
तरह
रामसिंह
और
जोइन्दु
जैसे
कवियों
के
यहाँ
भी
रूढ़ियों
के
प्रति
विद्रोह
का
स्वर
उतना
ही
तीव्र
है।
यहाँ
तक
कि
स्वयंभू
और
पुष्पदंत
जैसे
कवियों
को
भी
रूढ़ि-पोषक
नहीं
कहा
जा
सकता
है।
उन्होंने
लिखा
है-“पश्चिमी भारत में रूढ़ियाँ जड़ जमाएँ और पूर्वी भारत के रहने वालों को उनसे असंतोष हो यह बहुत दूर की बात मालूम होती है। दरअसल, रूढ़ियों का विरोध वहीं होता है जहाँ रूढ़ियाँ मौजूद होती हैं। प्राचीन काल से ही काशी और मगध में यदि रूढ़ि विरोधी आचार्य और पंडित होते आए हैं, उनके साथ ही रूढ़ि-पोषक विद्वानों का भी
गुट
रहता
आया
है।”10
इस
तरह
पूर्वी
और
पश्चिमी
अपभ्रंश
की
रचनाओं
में
कोई
मूलभूत
अंतर
नहीं
है,
बल्कि
उपरोक्त
दोनों
प्रवृत्तियाँ
उस
युग
के
अंतर्विरोध
को
दर्शाती
हैं
और
यह
लगभग
हर
युग
का
सच
है, ज़रूरत उसे परखने की है।
अपभ्रंश
साहित्य
के
बाद
जिस
महत्त्वपूर्ण
साहित्यिक
धारा
का
विकास
हुआ,
उसका
निर्विवाद
संबंध
अखिल
भारतीय
स्तर
पर
उठ
खड़े
होने
वाले
भक्ति-आंदोलन
से
है।
सम्पूर्ण
भारत
में
उसका
स्वरूप
स्थान-विशेष
और
वहाँ
की
देशज
परिस्थितियों
के
अनुरूप
विकसित
हुआ
था।
ध्यातव्य
है
कि
भक्ति-आंदोलन
में
आचार्यों
की
परंपरा
का
सीधा
संबंध
पूर्व
मध्यकाल
में
ब्राह्मण
धर्म
के
पुनरुत्थान
और
संगठन
के
साथ
ही
उसके
शास्त्रीकरण
के
विभिन्न
सोपानों
से
जुड़ा
हुआ
है,
लेकिन
उनके
संप्रदायों
से
जुड़े
कवियों
की
भी
साहित्यिक
परंपरा
निश्चित
तौर
पर
इन
आचार्यों
की
शास्त्रीय
और
ज्ञानात्मक
भक्ति
के
दार्शनिक
बंधनों
का
अतिक्रमण
करती
हुई
दिखाई
देती
है।
हिन्दी
के
सगुण
भक्ति
काव्य
में
भी
इसका
निदर्शन
किया
जा
सकता
है।
हिन्दी
की
संत
कविता
तो
सीधे
तौर
पर
दक्षिण
की
शास्त्रीय
परंपरा
से
अलग
सिद्धों-नाथों-जैन
योगियों
वाली
परंपरा
की
नियामक
भूमिका
लिए
हुए
उठ
खड़ी
हुई
थी।
उत्तर-भारत
में
भक्ति
की
दो
अलग-अलग
धाराओं
के
बावजूद
यह
तय
है
कि
सामान्य
मानवता
की
स्थापना
करने
वाला
भक्ति
साहित्य
सम्पूर्ण
भारत
में
सामाजिक
विषमताओं
के
ख़िलाफ़
उठने
वाली
मज़बूत
आवाज़
थी,
जिसकी
ऐतिहासिक
प्रतिध्वनि
आज
भी
समाजार्थिक
विडंबनाओं
और
धर्म
आधारित
विद्रूपताओं
पर
चोट
पहुँचाने
वाली
है
तथा सामाजिक-न्याय के आधार की नींव रखने वाली है। इस परिप्रेक्ष्य में अपभ्रंश
साहित्य
संबंधी
नामवर
सिंह
की
उपरोक्त
अवधारणा
और
अधिक
प्रासंगिक
हो
उठती
है।
हर
युग
और
स्थान
के
साहित्य
में
प्रगतिशील
और
प्रतिगामी
दोनों
तत्त्वों
की
उपस्थिति
रहती
है।
इसका
सिर्फ़
जाति-नस्ल-क्षेत्र
के
आधार
पर
सम्यक्
मूल्यांकन
संभव
नहीं
है।
हर
युग
की
नई
और
अपेक्षाकृत
प्रगतिशील
चेतना
भी
एक
समय
के
बाद
अपनी
ऐतिहासिक
भूमिका
पूरी
करके
रूढ़ि
बन
जाती
है।
अपभ्रंश
की
साहित्यिक
प्रवृत्तियाँ
भी
इससे
अछूती
नहीं
हैं।
जैन
कथा-काव्यों
और
संदेशरासक
जैसी
रचनाओं
में
भाव-सम्पदा
की
नवीनता
लेकिन
परिपाटी
के
निर्वाह
हेतु
आए
नगर-वर्णन,
ऋतु-वर्णन
आदि
के
संबंध
में
नामवर
सिंह
ने
लिखा
है-
“धीरे-धीरे
अपभ्रंश
की
यह
नवचेतना
भी
रूढ़ि
बनती
गई।
परवर्ती
अपभ्रंश
काव्य
की
इतिवृत्तात्मकता
और
निष्प्राणता
इस
रूढ़ि
का
प्रमाण
है।
तीर्थंकर
वही
हैं,
शलाका
पुरुष
वही
हैं
लेकिन
उनके
बारे
में
लिखे
हुए
काव्य
निर्जीव
हैं।
जैन
धर्म
के
सिद्धांत
वही
हैं,
लेकिन
परवर्ती
कवियों
के
कथन
में
वह
सजीवता
नहीं
है
कि
उन
सिद्धांतों
को
जीवंत
चरित्रों
में
ढाल
सकें।”11 आगे
उन्होंने
यह
भी
स्पष्ट
किया
है
कि
‘हिंदी
साहित्य
अपभ्रंश
काव्य
की
रूढ़ियों
का
रक्षक
मात्र
नहीं’
बल्कि
उसकी
‘जीवंत
परंपरा
को
लेकर
आगे
बढ़ने
वाला
रहा
है।’
इस
स्थान
पर
दो
कवियों-
विद्यापति
और
अमीर
खुसरो
की
चर्चा
भी
अपेक्षित
है
जो
आते
तो
आदिकाल
की
समय-सीमा
में
हैं,
लेकिन
उनकी
साहित्य-दृष्टि
और
भाषिक-परंपरा
दोनों
का
संबंध
आगे
की
साहित्यिक
प्रवृत्तियों
के
अधिक
निकट
है।
विद्यापति
को
आचार्य
शुक्ल
ने
आदिकाल
के
फुटकल
खाते
में
डाला
है।
नामवर
जी
ने
लिखा
है
कि
“विद्यापति
असंदिग्ध
रूप
से
आधुनिक
भाषाओं
में
‘लिरिक’
के
पहले
महान
कवि
थे।
अब
यदि
ऐसा
कवि
साहित्यिक
इतिहास
के
अंतर्गत
एक
काल
के
फुटकल
खाते
में
स्थान
पाए
तो
क्या
उस
काल-विभाजन
का
समूचा
सिद्धांत
ही
संदिग्ध
नहीं
हो
जाता?”12
विद्यापति
आदिकाल
ही
नहीं
बल्कि
सम्पूर्ण
हिन्दी
साहित्य
में
सौंदर्य
के
अद्भुत
शिल्पी
हैं।
भारतीय
इतिहास
के
मूल्यांकन
की
उपनिवेशवादी
दृष्टि
का
गहरा
प्रभाव
राष्ट्रवादी
धड़े
के
इतिहासकारों
पर
भी
पड़ा।
इसी
वजह
से
विद्यापति
के
साथ
जैसा
अन्याय
विक्टोरियन
नैतिकता
के
चलते
हुआ,
वह
हिन्दी
साहित्य
के
इतिहास
लेखन
और
आलोचना
पर
तो
सवाल
खड़ा ही करता है, साथ ही साथ सौंदर्य-बोध और संस्कृति के ऐतिहासिक अंतरसंबंधों के प्रति
इतिहासकारों
की
सतही
दृष्टि
का
भी
परिचय
देता
है।
आज
जब
भारतीय
संस्कृति
के
नाम
पर कथित नैतिकता और वर्जना के द्वारा संकीर्णता का प्रचार
किया
जा
रहा
है,
उसमें
विद्यापति
जैसे
सौंदर्योपासक
कवि
की
ऐतिहासिक
ज़रूरत
और
अधिक
बढ़
गई
है।
जैसा
कि
नामवर
जी
ने
लिखा
है,
ऐसे
रचनाकार
को
हाशिए
पर
जगह
देने
वाली
दृष्टि
पर
पुनर्विचार
होना
चाहिए
और
इस
दिशा
में
हिन्दी
आलोचना
में
काम
हो
भी
रहे
हैं।
सल्तनतकालीन
इतिहास
और
धर्म
परिवर्तन
के
संदर्भ
में
रोमिला
थापर
ने
लिखा
है-“शिल्पियों
के
दो
समूह
जो
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
एक
ही
जाति
अथवा
श्रेणी
के
अंग
रहकर
इकट्ठे
काम
करते
रहे
थे,
एक
समूह
के
धर्म-परिवर्तन
कर
लेने
पर
भी
अपने
सब
संबंधों
को
नहीं
तोड़
सकते
थे।
किंतु
शासक
वर्गों
में
दो
विचारधाराओं
के
सांस्कृतिक
विलयन
के
संबंध
में
कुछ
भी
कहना
कठिन
था,
और
दोनों
धर्मों
के
आचार्य
तथा
अनेक
अवसरों
पर
कुलीन
वर्ग
के
राजनीतिक
महत्वाकांक्षी
भी
उनके
अलगाव
पर
जोर
देते
थे।”13 भारत में
इतिहास
लेखन
की
उपनिवेशवादी
दृष्टि
ने
इस
अलगाव
को
और
अधिक
बढ़ावा
दिया।
जिसका
प्रभाव
रहा
कि
हिन्दी
के
तमाम
आलोचक
और
इतिहासकार
मध्यकालीन
साहित्य
के
मूल
द्वंद्व
को
हिंदू
और
मुसलमान
से
जोड़कर
देखने
लगे।
आचार्य
हजारीप्रसाद
द्विवेदी
ने
बहुत
तार्किक
और
व्यवस्थित
रूप
से
इस
मान्यता
का
खंडन
किया
है।
इसके
बाद
भी
कुछ
ऐसा
रह
जाता
है,
जहाँ
हिन्दी
आलोचना
कवि
अमीर
खुसरो
का
मूल्यांकन
करते
हुए
उनके
इतिहासकार
वाली
भूमिका
की
ओर
बार-बार
न
सिर्फ़
जाती
है
बल्कि
उनके
द्वारा
तुर्क
राज्य
को
इस्लाम
राज्य
और
अलाउद्दीन
को
ख़लीफ़ा
बनाने
की
कोशिश
पर
रुक
भी
जाती
है।
कवि
अमीर
खुसरो
और
दरबारी
इतिहासकार
अमीर
खुसरो
का
यह
अंतर्विरोध
असल
में
तत्कालीन
समय,
समाज
और
राजनीति
का
अंतर्विरोध
है।
इस
संदर्भ
में
नामवर
जी
ने
बहुत
संजीदगी
और
दृढ़ता
के
साथ
कहा
है
कि
“अलाउद्दीन
ख़िलजी
को
खुश
करने
के
लिए
‘खज़ायनुल
फुतूह’
में
बहुत
कुछ
ऐसा
लिखना
पड़ा
जो
अपनी
ही
मसनवी
‘नूहसिपहर’
की
रूह
के
ख़िलाफ़
था।”14 एक
लोकधर्मी
आलोचक
की
यह
सबसे
बड़ी
पहचान
है
कि
वह
एक
युग
के
ऐसे
अंतर्विरोधों
का
मूल्यांकन
किन
आधारों
पर
कर
रहा
है।
वह
शासन-सत्ता
के
नज़रिए
को
अपना
आलोचनात्मक
टूल
बना
रहा
है
या
आम
आदमी
के
नज़रिए
को।
नामवर
सिंह
आम
आदमी
के
नज़रिए
से
अमीर
खुसरो
को
देख रहे थे, इसीलिए वे खुसरो के असली रंग और मिज़ाज को व्यक्त करने वाले इस शेर तक पहुँचते हैं-
काफ़िर-ए-इश्क़म
मुसलमानी
मरा
दरकार
नीस्त
हर
रग-ए-मन
तार
गश्तः
हाजत-ए-ज़ुन्नार
नीस्त
यहाँ
तक
पहुँचना
अमीर
खुसरो
की
कविता
तक
ही
नहीं,
असल
में
हिन्दी
साहित्य
की
आत्मा
तक
पहुँचना
है।
1. इतिहास और आलोचना, पृ.149, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण, 2018
2. दूसरी परम्परा की खोज, पृ. 97, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण, 2008
3. वही, पृ.137
4. मार्क्सवाद और साहित्यालोचन, पृ. 60, आधार प्रकाशन, पंचकूला, संस्करण, 2006
5. पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य, पृ. 263, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, संस्करण 2018
6. वही, पृ. 263
7. हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग, पृ. 258, साहित्य भवन लिमिटेड, इलाहाबाद, संस्करण 1954
8. वही, पृ. 272
9. वही, पृ. 267
10. वही, पृ. 271
11. वही, पृ. 272-273
12. दूसरी परम्परा की खोज, पृ. 99
13. भारत का इतिहास, पृ. 262, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण 2009
14. नामवर सिंह संकलित निबंध, पृ.135, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, संस्करण 2010
हिन्दी विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़

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