संस्मरण : मन के शिक्षक / रामबक्ष जाट

मन के शिक्षक
- रामबक्ष जाट

आजकल संस्मरण लेखन का फैशन नहीं है। किसी व्यक्ति-विशेष के जीवन के बारे में विवरणपरक ढंग से सूचना दे दी गई हो-ऐसा काम अब नहीं किया जाता। भले ही ऐसा विवरण किसी लेखक के व्यक्तित्व को समझने में सहायक हो सके। संस्मरण लेखक को अपने 'स्व' का बलिदान और दूसरे के महत्व को स्वीकार करना पड़ता है। इसे हम स्वयं अपने लिए हानिकर तो मानते ही हैं, बल्कि पिछड़ापन भी मानते हैं। फिर हमारे यहाँ 'तथ्य' से अधिक 'मूल्य' मूल्यवान माना जाता है। अतः मूल्य निर्णय देना, या किसी का मूल्यांकन करना अधिक आधुनिक माना जाता है। इसलिए कई लोग संस्मरण लिखने से बचते हैं या वो संस्मरण तब लिखते हैं जब उनका 'स्व' स्वयं ही प्रतिष्ठत हो चुका होता है।

फिर भी मेरे मन में संस्मरण लिखने की भावना बल पकड़ती रही है। मैं जानता हूँ कि इस 'निगुरे' संसार में गुरु का होना और गुरु को मानना गर्व की बात नहीं मानी जाती। फिर भी मेरे मन में गुरु प्रो. नामवर सिंह के प्रति अत्यधिक श्रद्धा का भाव है। यहाँ तक कि लगभग पूजा का भाव है। उनके आगे अनायास ही मेरे 'स्व' का लोप हो जाता है और मन उनके माहात्म्य-बोध से नतमस्तक हो जाता है। मेरे मन में कैसे और कब यह भाव आया, मुझे स्वयं याद नहीं पड़ रहा।

डॉ. नामवर सिंह से मेरे रिश्ते के कई स्तर हैं। वे हिन्दी के बड़े आलोचक हैं। मैं उनकी पुस्तकें पढ़ता रहा हूँ। उनकी पुस्तकों, निबन्धों और भाषणों से मेरा एक रिश्ता बनता है। फिर उनसे साहित्य-चर्चा करने का, सत्सर्ग का मुझे अवसर मिला है। दिल्ली में 1975 से 1978 तक शोध के दौरान लगभग रोज रात को 9.00 बजे से 10.30 बजे तक घूमते हुए उनसे न मालूम कितने विषयों, समस्याओं, घटनाओं पर चर्चा हुई है और मैंने उनके विचार सुने हैं। इस समय की बातचीत मुझे बिल्कुल याद नहीं आ रही है। ऐसा लगता है कि वे सारी बातें मेरे मन में बैठकर मेरे साहित्य-संस्कारों का अंग बन गई हैं। इसका एहसास मुझे तब है जब किसी खास विषय पर वे वक्तव्य देते हैं तो सुनते समय उन्हीं बातों की स्पष्ट-अस्पष्ट-सी गूँज मेरे मन में भी हो रही होती है। मेरे लेखन को उन्होंने पहली बार 'आलोचना' में प्रकाशित किया और लिखने-पढ़ने में मेरी रीति को बनाए रखा है। फिर सबसे बड़ी बात यह है कि मेरा रिश्ता अध्यापक छात्र का रिश्ता रहा है-एक मर्यादा और अनुशासन में बँधा हुआ है। संबंधों की इस बारीक मर्यादा को मुझसे अधिक प्रो. नामवर सिंह ने निभाया है। मेरे जीवन में उनके अध्यापन का अमूल्य योगदान है। मेरा उनसे संबंध आश्वस्त होते हुए भी औपचारिक आवरण में लिपटा हुआ संबंध है। फिर भी मेरा संबंध इकहार है। जो 'दोनों पक्षों' को देखने के आदी है, उन्हें इस संस्मरण से निराश ही होना पड़ेगा, क्योंकि मेरे हिस्से तो उनका एक ही पक्ष-बड़प्पन आया है। मेरे लिए तो मेरा वही अनुभव 'सच' है, भले ही 'एकांगी' हो।

दिल्ली आने के बाद मुझे कुछ लोगों ने समझाया कि आकाशधर्मी और शिलाधर्मी दो तरह के गुरु होते हैं। सूत्र रूप में उन्होंने यह भी बताया कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी आकाशधर्मी गुरु थे, जबकि प्रो. नामवर सिंह शिलार्धी गुरु हैं। शिलाधर्मी अर्थात् जो अपने से अधिक अपने शिष्य को बढ़ने न दे। इसे मैं अपना सौभाग्य समझें या दुर्भाग्य कि उस ऊँचाई तक मैं पहुँच नहीं पाया, जहाँ उन्हें शिला का धर्म निभाना होता। या वह शिला न मालूम कितनी आकाशधर्मी कि उसका एहसास मुझे अभी तक नहीं हो पाया।

प्रो. नामवर सिंह को मैं लगभग 17-18 वर्षों से जानता हूँ। इनमें से 11 वर्षों तक तो मैं उनका नियमित छात्र रहा हूँ। यह संयोग उनके अध्यापक जीवन में किसी दूसरे छात्र को शायद नहीं मिला। 1970 ई. में मैं जोधपुर विश्वविद्यालय में बी. ए. (प्रथम) वर्ष में भर्ती हुआ। इसी वर्ष मैंने उन्हें पहली बार देखा था। सफेद खादी का कुर्ता व धोती पहने हुए। सहपाठियों ने बताया कि ये एम. पी. का चुनाव लड़े थे और उसमें पराजित हो चुके थे, सुनकर बड़ा बुरा लगा। खादी पहनने वाला काँग्रेसी होता है-यह बात सहज ही मन में आई। चुनाव में जो हार जाता है उसे विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी बना दिया जाता है, यह सोचकर और भी बुरा लगा। संयोगवश वे हमारे सेक्शन में हिन्दी अनिवार्य पढ़ाने लगे। कक्षा में हम पचास-साठ विद्यार्थी होते थे। उस कमरे में आगे-पीछे चार दरवाजे थे। उन दिनों विद्यार्थियों की उपस्थिति अनिवार्य होती थी, परन्तु विद्यार्थी तब भी हिन्दी अनिवार्य पढ़ना नहीं चाहते थे। नामवर जी कक्षा में आते और ही सिर नीचा किए हुए हाजिरी लेने लगते। हाजिरी लेते समय दूसरे अध्यापक बार-बार छात्रों की तरफ देख लेते थे कि कहीं विद्यार्थी दूसरे के बदले में तो नहीं बोल रहे हैं। लेकिन डॉ. नामवर सिंह छात्रों पर ऐसा अविश्वास नहीं करते थे। कुछ विद्यार्थी दरवाजे के पास ही बैठते और हाजिरी बोलकर चुपके से खिसक जाते थे। हमें इनकी यह बात अच्छी लगती थी। बाद में स्वयं अध्यापक बनने के बाद पता चला कि सर नीचे किए हुए भी पता चलता रहता है कि कहाँ गलत हाजिरी बोली जा रही है। बाद में मुझे यह भी पता चला कि वे अनिवार्य उपस्थिति के समर्थक नहीं है। हर अच्छे अध्यापक की तरह उनके मन में भी विश्वास रहता है कि यदि छात्र विश्वविद्यालय प्रांगण में आ गया है तो मेरी कक्षा में तो वह आएगा ही। बहरहाल, इस कक्षा में डॉ. नामवर सिंह ने हमें जो पहली कविता पढ़ाई वह मुझे अभी भी याद है- "कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ, जिससे उथल पुथल मच जाए" (बालकृष्ण शर्मा 'नवीन') इस कविता का उन्होंने कैसे और क्या अर्थ किया था, यह तो मुझे याद नहीं; परन्तु इतना अभी तक याद है कि उन्होंने कक्षा में मनोयोगपूर्वक एवं रस लेकर इस कविता का पाठ किया था। अर्थ से अधिक पाठ करना मुझे अधिक अच्छा लगा था। कविता पढ़ने का एक आनंद होता है, यह पहली बार उसी दिन महसूस हुआ था।

1974 ई. में डॉ. नामवर सिंह जोधपुर से विदा हुए। मैं उस वर्ष एम. ए. (उ.) का विद्यार्थी था। इन वर्षों में मैं लगातार उनसे पढ़ता रहा। वे अक्सर जोधपुर से बाहर आते-जाते रहते, लेकिन इतने वर्षों में ऐसा दिन शायद ही कभी आया हो, जब वे जोधपुर में होते और पढ़ाने नहीं आते। कभी हमने नहीं सुना कि आज गुरुजी का पढ़ाने का मन नहीं है या कक्षा में आकर कभी बेमन से पढ़ाया हो या पढ़ाया ही न हो। वे अपने सारे कार्यक्रम (स्थानीय) कक्षा को केन्द्र में रखकर बनाते थे। अतः इतना बाहर रहने के बावजूद पाठ्यक्रम संबंधी कोई शिकायत कभी हमारे मन में नहीं आई। विभाग में तनाव हो, व्यक्तिगत जीवन में कोई परेशानी हो-हो तो हो उसकी कोई छाप हमने एवं गंभीर। कक्षा में वे कभी बिना तैयारी किए आए हों-ऐसा नहीं लगा। वैसे तो घरेलू साहित्य-चर्चा या गोष्ठी में कभी मैंने उनको असहाय अवस्था में नहीं देखा। उनके पास प्रस्तुत समस्या के बारे में कहने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण हमेशा होता है। फिर भी तैयारी का अभाव विद्यार्थियों से छिपता नहीं है। कभी-कभी विद्यार्थी भी उदार होने का आनंद ले लेता है। हम लोगों ने भी अनेक अध्यापकों के अज्ञान को अनदेखा किया है। जब भी मुझे लगता है कि अमुक प्रश्न इनको नहीं आता तब मैं झूठ-मूठ में ही उनसे सहमत होकर उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश करता रहता कि आपने ठीक बताया है। या अब हमारी समझ में आ गया है। ऐसा सुख अपने छात्र जीवन में बहुत लिया है परन्तु इस तथ्य को यहाँ रेखांकित करना मुझे आवश्यक लगता है कि गुरुवर प्रो. नामवर सिंह ने मुझे हमेशा इस सुख से वंचित रखा है। शायद इसीलिए मैं उन्हें ही अपना 'गुरु' मानता हूँ। मेरे बहुत से अध्यापक इस भाव से पीड़ित रहे हैं कि मैं उन्हें तो अपना अध्यापक मानता ही नहीं।

उनकी कक्षा में प्रबुद्ध से प्रबुद्ध एवं भोले से भोले विद्यार्थी के पढ़ने-समझने के लिए कुछ-न-कुछ अवश्य ही होता। एक दिन में ही वे हमें इतना कुछ नया बता देते थे कि उसे पचाने में ही हम लोगों को बड़ी मेहनत करनी पड़ती। एम. ए. में पढते समय तो हमें कभी यह महसूस नहीं हुआ कि गुरुदेव कल के व्याख्यान का पुनर्कथन कर रहे हैं, या बातें बता रहे हैं जिन्हें पहले से ही पढ़ चुके हैं। फिर डॉ. नामवर सिंह उन अध्यापकों में से नहीं छात्रों को अन्य बहुत सारी किताबें तो बता दें, पर उस पुस्तक का जिक्र न करें, जिससे वे पढ़कर पढ़ाते हों। वे उस पुस्तक का जिक्र कक्षा में विशेष रूप से करते। कई बार कुटिल जिज्ञासावश हमने उस पुस्तक को पढ़कर भी देखा है; लेकिन हर बार लगा है कि पुस्तक में उपलब्ध सामग्री के अलावा भी उन्होंने बहुत कुछ नया बताया है। अन्य विद्वानों के विचारों की जानकारी देते हुए भी उनके व्याख्यानों में मौलिकता रहती है-इसका एहसास हमें जोधपुर से रहा है। वह तो बाद में जब उनसे अत्यधिक विचार-विमर्श करने का मौका मिला (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में) तब पता चलने लगा कि आपकी बातों में परसों का कुछ पुनर्कथन है। एक आलोचक के लिए हो चाहे न हो एक शिक्षक के लिए हर दिन नया पढ़ाना सिखाना निश्चय ही बहुत बड़ी बात है।

एम. ए. तक आते-आते गुरुदेव का जादू सारी कक्षा पर छा गया था। हमारी कक्षा का शायद ही कोई विद्यार्थी हो, जो उनकी कक्षा में न जाकर पछताता न हो। इसके लिए हम अपने कार्यक्रम तद्‌नुसार बनाते थे। मैं ठेठ देहात का रहने वाला हूँ-जहाँ न तो डाकघर है और न कोई स्कूल। मुझे हर महीने अपने खर्चे के पैसे लाने के लिए गाँव जाना पड़ता। माता-पिता अनपढ़ होन के कारण डाकघर का उपयोग नहीं कर पाते, और न घर पर भी इतने पैसे होते कि महीने के खर्च का पैसा एक साथ दे पाते। अस्तु, जब पैसे खत्म होते तो मुझे घर जाना ही पड़ता। तब डॉ. साहब की कक्षा की समस्या आती। मैं उनकी कक्षा किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहता था। इसके फलस्वरूप अनजाने ही मेरे गाँव जाने का कार्यक्रम उनके दिल्ली जाने से जुड़ गया। ऑफिस में जाकर हम पता कर आते कि डॉ. साहब का बाहर जाने का प्रोग्राम क्या है? (बाहर का अर्थ हम यही लगाते कि वे दिल्ली ही जाते है) यदि उनको जल्दी वापस आना होता तो उसी के अनुरूप मैं गाँव से जल्दी भाग आता, अन्यथा चार-पाँच दिन वहाँ रहे बिना मन मानता नहीं था। नामवर जी से पढ़ने का वह मोह अभी भी बना हुआ है। 1975 ई. में मैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (नई दिल्ली) में शोध कार्य करने आया, तब भी एम.ए. के छात्रों के साथ बैठकर 'साहित्य की रूपवादी दृष्टि' और 'साहित्य की मार्क्सवादी दृष्टि'- ये दोनों पाठ्यक्रम पढ़ने जाता था। यहाँ तक कि 1978 में मैं महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय (रोहतक) में अध्यापक बन गया। तब भी, जब मेरा दिल्ली आना होता और गुरुदेव पढ़ा रहे होते तो मैं उनकी कक्षा में अवश्य जाता। रोहतक छोड़ने के बाद अब ऐसे अवसर कम मिलते हैं, लेकिन मन में बराबर इच्छा रहती है कि उनकी कक्षा में बैठकर पढ़ता रहूँ।

एम. ए. तक आते-जाते हमारी कक्षा के सामने अच्छे व बुरे अध्यापक का भेद खुल गया था। किसी कमजोर अध्यापक का सम्मान करना बड़ा मुश्किल काम होता है। कुछ दिनों तक तो सम्मान का नाटक हम लोगों ने भी किया था। परन्तु बाद में कुछ शरारती वृत्ति बढ़ी और इसका फल यह निकला कि हम सब लोग बैठकर कैंटीन में चाय पीते रहते। वहीं से हमें दिखाई देता कि रजिस्टर बगल में दबाए एक अध्यापक बरामदे में टहल रहे हैं और खीझ रहे हैं। इतने में एकाध भटका हुआ विद्यार्थी उन्हें मिलता है। वह हमे बुलाने का बहाना करके खिसक जाता। कई बार उन्होंने शिकायत भी दिखाई नहीं पड़ रहा। हम लोगों को पैंतालीस मिनट मौन रहकर नासमझ अध्यापक को सुनना बर्दाश्त नहीं हो पाता। प्रो. नामवर सिंह को जितना पढ़ाना होता, उतना वे कक्षा में अवश्य पढ़ा देते। पढ़ाते के बीच-बीच में वे "साहित्य का इतिहास-दर्शन" पढ़ा रहे थे। कक्षा के बाहर हम छात्रों में चर्चा होती रहती। इस चर्चा से कई प्रश्न दिमाग में आए। मैंने उन प्रश्नों को नोट कर लिया और अगले दिन ज्यों ही वे कक्षा में आए, तो मैंने एक-एक करके प्रश्न पूछने शुरू किए। वे उस दिन पढ़ाने के मूड में थे। थोड़ी-सी असुविधा होने लगी, पर वे उसका उत्तर देकर ज्यों ही पढ़ाने का मन बनाते, मैं अगला प्रश्न पूछा बैठता और अंत में गुरुवर झुंझला गए और इस झुंझलाहट को प्रकट करने के लिए उन्होंने कालिदास के 'कुमार संभव' का यह श्लोक सुनाया और संदर्भ सहित उसका अर्थ भी किया :

निवार्यतामामि किमप्ययं बटुः पुनर्विवक्षुः स्फुरितेत्तराधरः।
न केवलं यो महतोऽपि भाषते बटुः पुनर्विवक्षुः स्फुरितेत्तराधरः।

पार्वती शंकर को पाने के लिए तपस्या कर रही हैं। स्वयं शंकर वेश बदलकर वहाँ जाते है शंकर की निंदा करते हैं तब पार्वती अपनी सखी से कहती हैं-हे सखी! देखो इस ब्रह्मचारी का अधर फिर से हिल रहा है, लगता है, यह फिर कुछ कहना ही चाहता है, इसे रोको। नहीं तो फिर मैं ही उठकर यहाँ से चली जाती हूँ।

जाहिर है कि तीर निशाने पर बैठा। मुझे बहुत बुरा लगा। डॉ. साहब ने भी इसे महसूस किया और पुचकारने की शैली मे सांत्वना देने लगे कि रामबक्ष जी वैसे बकवादी नहीं हैं। इनके मन में सच्ची जिज्ञासा है आदि-आदि। फिर भी मुझे उनका व्यवहार बड़ा अपमानजनक लगा। इस कारण डॉ. साहब भी जो पढ़ाना चाहते थे, पढ़ा नहीं पाए। इसकी झुंझलाहट उनके मन में थी। इस प्रसंग को मैंने कितने दिन याद रखा और कब भूल गया ध्यान नहीं पड़ता। मेरे छात्र जीवन में वही ऐसा दिन था, जिस दिन उन्होंने पढ़ाया नहीं।

विभागाध्यक्ष के रूप में उनका व्यवहार कैसा रहता होगा? यह तो उनके सहकर्मी ही बता सकते हैं। परन्तु यह जरूर याद आता है कि विभाग का संचालन वे विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखकर किया करते थे। प्रो. नामवर सिंह को यह पता रहता है कि उनके विभाग का कौन सदस्य क्या और कितना पढ़ाने की क्षमता रखता है। इसी समझ से उन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की कमजोर टीम को लेकर अध्यापन का कुशल संचालन किया। इसके लिए उन्होंने पाठ्यक्रम को खास तरह से विभाजित किया और इस समझदारी से अध्यापकों को पाठ्यक्रम वितरित किया कि कमजोर अध्यापन के बावजूद छात्रों की कोई हानि न हो।

1973-74 के वर्ष हम कक्षा के पाँच-सात विद्यार्थी एक अध्यापिका के खिलाफ शिकायत लेकर उनके पास पहुँचे कि इस महिला को पढ़ाना नहीं आता। गुरुदेव ने धैर्यपूर्वक हमारी बात सुनी और बोले कि वे विभाग की वरिष्ठ सदस्या हैं। उनके बारे में ऐसे बातें आप लोग न किया करें। इससे विभाग चलाने में दिक्कतें आ सकती हैं। आपकी कठिनाइयों को दूर करने के लिए कुछ किया जाएगा। इससे पहले 1971-72 ई. में मैं बी. ए. ऑनर्स का विद्यार्थी था। इस कक्षा में अपभ्रंश भाषा एवं साहित्य का एक प्रश्न-पत्र था। इसे पढ़ाने का जिम्मा डॉ. मदनराज मेहता को दिया गया। मेहता साहब ने कक्षा में आकर बड़ी स्पष्ट घोषणा की कि यह अपभ्रंश न तो मुझे आती है और न आपको। इसलिए दोनों मिलकर इसे पढ़ेंगे। हम लोग उनसे नियमित रूप से पढ़ने लगे। बाकी तो हमारी समझ में आ गया, परन्तु अपभ्रंश व्याकरण में उलझ गए। कक्षा के सभी विद्यार्थी प्रो. नामवर सिंह के पास पहुँचे और उन्हें अपनी परेशानियाँ बताईं। मुझे याद है, वे हँसकर बोले, अरे अपभ्रंश व्याकरण में क्या है? वह तो एक पोस्टकार्ड पर लिखा जा सकता है। फिर उन्होंने अपने कक्ष में तीन-चार दिन व्याकरण पढ़ाकर हमें व्याकरण के संकट से उबारा।

एम. ए. (उ.) में मैं छात्रों की 'हिन्दी साहित्य परिषद्' का सचिव था। कक्षा में हमें जो पढ़ाया जाता था, उसमें कुछ अध्यापकों से हमें थोड़ा-बहुत असंतोष था। एक महिला की तो हमने शिकायत भी की थी। गुरुदेव से विचार-विमर्श करके साल के अंत में हमने एक सेमिनार सप्ताह चलाया। उसमें यह तय हुआ कि कुछ चुने हुए विषयों पर अलग-अलग व्यक्तियों से भाषण दिलवाए जाएँ। उनमें अध्यक्षीय भाषणों के द्वारा डॉ. साहब हमारी साल भर की कमी पूरी कर देंगे। इस योजना का मर्म बहुत कम लोगों को पता था। स्वयं डॉ. साहब ने इस क्रम में 'बाणभट्ट की आत्मकथा' पर भाषण दिया था।

प्रो. नामवर सिंह अध्यापक के साथ हिन्दी विभाग के अध्यक्ष भी रहे हैं। अध्यापक का काम सिर्फ दिए पाठ्यक्रम को पढ़ाना ही नहीं है, बल्कि अच्छा पाठ्यक्रम तैयार करना भी है। शिक्षा जगत् के भ्रष्टाचार का एक बड़ा गढ़ पाठयक्रम है। प्रो. नामवर सिंह ने इस गढ़ में सबसे पहले जोधपुर विश्वद्यिालय में दखल दिया। उन्होंने लगभग 50 वर्षों बाद हिन्दी पाठ्यक्रम का ढाँचा बदला। उनका मानना है कि हिन्दी के अध्यापक जब तक हिन्दी विभागों के पाठ्यक्रम में रूचि नहीं लेंगे, तब तक हिन्दी पाठकों के संस्कार नहीं बदल पाएँगे।

पाठ्यक्रम तैयार करते समय प्रो. नामवर सिंह ने यह ध्यान रखा कि हिंदी साहित्य का विद्यार्थी हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्य से अपने आपको अभिज्ञ पाए और स्तरीय साहित्य का अस्वाद उसे कक्षा में ही मिल जाए। इसके साथ ही उन्होंने हिन्दी के छात्रों के मानसिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए उसकी जीवन-दृष्टि को निर्मित करने वाली रचनाएँ एवं रचनाकारों को पढ़ाया। छात्रों की वैचारिक समझ को विकसित करने के लिए उन्होंने कार्ल मार्क्स, फ्रायड, डार्विन, ज्याँ पाल सार्त्र, महात्मा गाँधी और अरविंद के दर्शन को बी. ए. (ऑनर्स) में पढ़ाया। अब तक हिन्दी के विद्यार्थी के लिए हिन्दी साहित्य छायावाद के बाद समाप्त हो जाता था। यदि थोड़ा सा आगे भी बढ़ा तो दिनकर, बच्चन के बाद बन्द। एम.ए. में मैथिलीशरण गुप्त व हरिऔध की पुस्तकें और यहाँ तक कि रत्नाकर का 'उद्धव-शतक' भी अनिवार्य माना जाता था और ये सब 'आधुनिक कविता' के नाम पर पढ़ाए जाते थे। डॉ. साहब ने जब जोधपुर में इस प्रश्न-पत्र पुनर्गठन किया तो कवि रखे प्रसाद, निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध, कुँवरनारायण और शमशेरबहादुर सिंह।

इस तरह उन्होंने निश्चित कर दिया, द्विवेदी युग के कवियों की तरह पंत और महादेवी वर्मा को भी स्नातक स्तर तक पढ़ाकर छुट्टी करनी चाहिए। इसी तरह एम. ए. हिन्दी में एक प्रश्नपत्र 'भाषा विज्ञान' का होता था और वह लगभग सब विश्वविद्यालय में अनिवार्य माना जाता था। डॉ. नामवर सिंह ने इस प्रश्न-पत्र को बिल्कुल हटा दिया। इसी तरह एक प्रश्न-पत्र में 'काव्यशास्त्र' और 'पाश्चात्य काव्यशास्त्र' का परिचय दिया जाता था। इससे छात्रों के आलोचनात्मक विवेक का कोई लेना-देना नहीं होता। इसका ढाँचा भी उन्होंने बदल दिया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, अभिनव गुप्त व टी. एस. इलियट की रचनाओं के कुछ पाठ प्रस्तावित किए तथा व्यवहारिक आलोचना' का कुछ अंश इसमें भी सुधार किया तथा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ. रामविलास शर्मा को भी पाठ्यक्रम में रखा। इसी तरह 'हिन्दी साहित्य का इतिहास' को स्नातक स्तर तक पढ़ा कर ही 'साहित्य का इतिहास दर्शन' का एकदम नया पाठ्यक्रम उन्होंने चलाया। प्रसंगवत यहाँ उल्लेख कर दूँ कि ये दोनों प्रश्न-पत्र डॉ. नामवर सिंह स्वयं पढ़ाते थे।

इसी तरह हिन्दी के अनेक नए रचनाकारों को उन्होंने पहली बार पाठ्यक्रम में रखा। कुँवरनारायण व शमशेर के अलावा उन्होंने धर्मवीर भारती की 'कनुप्रिया', राजेन्द्र यादव का 'सारा आकाश', कृष्ण बलदेव वैद का 'उसका बचपन', यशपाल का 'झूठा सच', रेणु का 'मैला आँचल', राही मासूम रजा का 'आधा गाँव' आदि। इस 'आधा गाँव' को केन्द्र बनाकर डॉ. नामवर सिंह के विरोध में जोधपुर जो सशक्त आन्दोलन चलाया गया था, उससे हिन्दी संसार अपरिचित नहीं है। इस मुद्दे पर जोधपुर शहर के तमाम प्रतिक्रियावादी लोग सहज ही संगठित हो गए। हिन्दी विभाग में भी थोड़ा बहुत विरोध हुआ व विभाग की पाठ्यक्रम समिति के तीन वरिष्ठ सदस्यों ने 'आधा गाँव' के विरोध में अखबार में बयान दिए। शहर में बड़ी पंचैबाज़ी व अखबारबाजी हुई। दिलचस्प बात यह विरोध 'आध गाँव' के पाठ्यक्रम में लगने के तीन वर्ष बाद में शुरू हुआ।

वास्तव में नए पाठ्यक्रम के बनने से जिन लोगों के आर्थिक हितों व वैचारिक खेमों पर चोट पहुँची थी, उन्होंने अवसर की तलाश की और इस मुद्दे पर वे सब एक हो गए। डॉ. नामवर सिंह के पाठ्ययक्रम पर दो प्रमुख आरोप गए-एक तो यह कि डॉ. नामवर सिंह अपने पाठ्यक्रम के द्वारा कम्युनिस्ट विचारों का प्रचार कर रहे हैं और दूसरा, पाठ्यक्रम में 'आधा गाँव' जैसी अश्लील पुस्तक पढ़ाई जा रही हैं। यहाँ दो एक बातें और स्पष्ट करनी जरूरी हैं। डॉ. नामवर सिंह ने सिर्फ एम. ए. हिन्दी का पाठ्यक्रम ही नहीं बदला, बल्कि बी.ए. के पाठ्यक्रम में भी व्यापक परिवर्तन किए। परिवर्तन ही नहीं किया, बल्कि पूरा ढाँचा बदल दिया। बी. ए. में पहले निजी प्रकाशकों की पुस्तकें चलती थीं। उन्होंने तत्कालीन कुलपति वी.वी. जॉन से विचार-विमर्श करके उन सब को हटा दिया और बी.ए. के लिए नए संकलन तैयार करवाए तथा उनके प्रकाशन वितरण का जिम्मा विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने हाथ में लिया। अनिवार्य हिन्दी की इन पुस्तकों में कई उर्दू रचनाकारों को भी स्थान दिया। (हिन्दी में यह काम शायद पहली बार हुआ) जाहिर है इससे पाठ्यक्रम से जुड़े हुए भ्रष्टाचार की नींव हिली और उन लोगों ने डॉ. साहब के विरोध का माहौल बनाया। 'आधा गाँव' संबंधी विवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह था कि हिन्दी के साहित्याकरों ने पहली बार हिन्दी पाठ्यक्रम में रुचि दिखाई और इस बिन्दु पर डॉ. नामवर सिंह का साथ दिया। डॉ. नामवर सिंह के विरोध का कोई मौका न चूकने वाले धर्मवीर भारती ने भी 'धर्मयुग' में उनका इस मुद्दे पर समर्थन किया। दूसरे, जिन छात्रों के शील की रक्षा के लिए यह आन्दोलन चलाया जा रहा था, उन छात्रों ने सर्वसम्मति से लिखित रूप में वक्तव्य देकर 'आधा गाँव' का समर्थन किया। बाद में उन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय के इस पाठ्यक्रम को ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में और अधिक विकसित किया। यह कहना शायद अत्युक्ति न होगी कि यह उनके पाठ्यक्रम और उनके अध्यापकीय व्यक्तित्व का ही असर है कि भीषण बेरोजगारी के इस दौर में भी डॉ. नामवर सिंह के विद्यार्थी बेरोजगार नहीं है। शायद कोई एकाध हों तो हों।

जो हो, बाद में डॉ. नामवर सिंह ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद्, नई दिल्ली में भी हिन्दी का पाठ्यक्रम तैयार करवाया। यदि इस पाठ्यक्रम को भी ध्यान में रखा जाए तो एम. ए. व एम. फिल. तक के पाठ्यक्रम को मिलाकर देखने से उनके पाठ्यक्रम संबंधी सुसंगत चिंतन का पता चलता है। हिन्दी के प्रोफेसरों में डॉ. नामवर सिंह अकेले प्रोफेसर हैं जिन्होंने यह कार्य किया है।

विश्वविद्यालय में हिन्दी पाठ्यक्रम के इतिहास पर जब विचार किया जाएगा तब उनके इस ऐतिहासिक योगदान को अच्छी तरह से रेखांकित किया जा सकेगा।

जोधपुर में मैं उनके घर बहुत कम बार गया हूँ। जब भी मैं वहाँ उनसे मिला डॉ. मैनेजर पाण्डेय के साथ ही मिला। वहाँ मेरे उनसे निजी संबंध नहीं थे, एक सामान्य विद्यार्थी के रूप में मैं भी उनका उतना ही आदर करता था, जितना दूसरे विद्यार्थी करते थे। लेकिन नई दिल्ली में (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) उनके निर्देशक में शोध कार्य करना मेरी निजी उपलब्धि है। सितम्बर 1975 में मैं दिल्ली आया था और जुलाई, 1978 में रोहतक (महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय) में प्राध्यापक बनकर चला गया। 1980 ई. में मैंने अपना शोध-प्रबन्ध जमा किया था। इस दौरान उनसे जो मेरा सम्पर्क रहा है, कायदे से उसी से मेरे संस्कार बने हैं। इस दौरान उनसे घण्टों बातचीत करने का. उनकी बातचीत सुनने का मौका मिला। दिन भर जो भी वे अध्ययन करते या कोई प्रसंग छिड़ जाता, उस पर घण्टों चर्चा होती रहती। मैं दिल्ली में इसी वर्ष आया था-कुछ सहमा हुआ-सा था। साल भर मुझे दिल्ली और विश्वविद्यालय का वातावरण समझने में लगा। वर्ष के अंत होते-होते मेरे शोध का विषय तय हुआ 'प्रेमचंद और भारतीय किसान'।

मैंने इस बीच थीसिस का पहला अध्याय लिखा 'प्रेमचंद के युग की पूर्व-पीठिका'। इसमें मैंने इतिहास व समाजशास्त्र की पुस्तकों से उद्धरण देकर भारतीय समाज की पृष्ठभूमि बना डाली। एक दिन वह अध्याय डॉ. साहब को दे आया। उन्होंने देखा पढ़ा और बोले कि अपने पृष्ठभूमि तो अच्छी तरह से समझा दी है, परन्तु शोध-प्रबन्ध का वाक्य 'प्रेमचन्द' शब्द से शुरू होना चहिए। फिर साहित्य और समाज के संबंधों की चर्चा के क्रम में बताया कि हमारी मुख्य चिंता साहित्य की होनी चाहिए। अतः अध्ययन का बल समाज नहीं साहित्य होना चाहिए। इस चर्चा के बाद मैंने सम्पूर्ण प्रेमचंद साहित्य व अन्य पुस्तकें पढ़ी और उनसे मिला। अबकी बार वे मुझे एक निर्देशक के रूप में मिले। मैं उनके कक्ष में गया। वहाँ 15-20 मिनट की बातचीत में विषय की मोटी-मोटी रूपरेखा बन गई। इसके बाद वे मुझसे कभी निर्देशक के रूप में नहीं मिले। मैं उन्हें एक-एक अध्याय लिखकर देता रहा और वे उसे पढ़कर अपनी सहमति देते रहते है। इस बात से मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी कि उन्होंने मेरा लिखा हुआ एक भी वाक्य बदला नहीं। ऐसा शायद इसलिए संभव हुआ, क्योंकि उनका निर्देशक मेरे मन में बस गया। इसीलिए शोध-प्रबन्ध की भूमिका में मुझे लिखना पड़ा, "निर्देशक शोधकर्ता की चेतना का अंग बनकर एक हो तो भीतरी सेंसर का काम करता है और दूसरे सही मार्ग का निर्देश' ही दिए हैं और मेरी चेतना में निहित निर्देशक को शक्तिशाली बनाया है। संभवतः यही कारण है कि मेरे कार्य में उन्होंने बहुत ज्यादा फेर-बदल नहीं किया और मतभेदों को बने रहने दिया है।"

मैंने अपनी और से सात अध्याय लिखकर कार्य सम्पन्न करने की घोषणा कर दी। इसके बाद डॉ. साहब ने सलाह दी कि प्रेमचंद के साहित्य में भारतीय किसान की संश्लिष्ट प्रतिमा कैसी है? इस पर भी टिप्पणी लिखनी चाहिए। इस पर होरी व मनोहर की तुलना करते हुए स्वयं डॉ. नामवर सिंह भी लिख चुके थे। मैंने इस दृष्टि से पुनः अध्ययन किया और मनोयोगपूर्वक शोध-प्रबंध का आठवाँ अध्याय लिखा। इसमें मैंने डॉ. नामवर सिंह के मत से भिन्न मत प्रस्तुत किया और उनको दे आया। डॉ. साहब ने उसे पढ़ा और अगले दिन घूमते हुए इसी विषय पर चर्चा केन्द्रित की। मुझे याद है लगभग डेढ़ घण्टे तक उन्होंने अपने मत के समर्थन में लगभग भाषण दे दिया। मैं साथ-साथ चलते हुए चुपचाप सुनता रहा। अंत में उन्होंने मेरी राय पूछी तो मैंने बताया, चूँकि मैंने आपके मत पर टिप्पणी की है। अंत बहुत सोच-समझकर लिखा है। उसमें अब परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं है। यह बात यहीं समाप्त हो गई और शोध-प्रबन्ध का आठवाँ अध्याय उसी रूप में जमा हुआ और बाद में उसी रूप में छपा भी। उस समय यह बड़ी साधरण बात लगी थी। लेकिन ज्यों-ज्यों मुझे हिन्दी विभागों का अनुभव हुआ तो मुझे लगा कि डॉ. नामवर सिंह होने का अर्थ क्या है?

डॉ. नामवर सिंह ने न केवल मेरे शोध-प्रबन्ध का निर्देशन किया है, वरन् मेरे छोटे-बड़े लेखों को भी उन्होंने सुधारा-सँवारा है। मेरे आरंभिक लेख पहली बार 'आलोचना' में उन्होंने प्रकाशित किए। उनमें भी उन्होंने कभी कोई फेर-बदल नहीं किया। एक बार नन्द किशोर नवल ने अवश्य मेरे लिखे हुए को काट-छाँटकर 'आलोचना' में प्रकाशित कर दिया था। मुझे इससे काफी असुविधा हुई थी और गुरुदेव को भी यह महसूस हुआ था। मैंने मान लिया था कि जब तक नवल आलोचना से जुड़े हुए रहेंगे, मैं उसमें नहीं लिखूँगा और नहीं ही लिखा।

इतने वर्षों के संबंधों में कभी नाराजगी के क्षण न आए हों-ऐसा कैसे हो सकता है? वैसे देखा जाए तो संबंधों की गहराई और आदमी के बड़प्पन का पता इन्हीं नाराज क्षणों में चलता है। मुझसे कई बार नादानीवश कुछ गुस्ताखियाँ भी हुई हैं। एकाध प्रसंग में यह नाराजगी लम्बे दिनों तक चली भी। यूँ कभी बीच-बीच में वे किसी से कुछ ऐसा सुन लेते, जो उन्हें पसन्द न आया हो, तब अनमने से हो जाते। मिलने पर उनका भरा-भरा चेहरा देखकर मैं समझ जाता कि कुछ गड़बड़ हुई है। फिर मैं देखता कि वे स्वतः आश्वस्त हो जाते और संबंध पुनः सहज हो जाते। कुछ लोग कहते हैं कि नामवर जी भी आजकल कान के कच्चे हो गए हैं। मुझे लगता है कि डॉ. साहब कान से अधिक अपनी आँख पर भरोसा रखते हैं और कान की गलती को तुरंत सुधार लेते हैं। हाँ, यह बात अवश्य है कि वे अपना कान बन्द करके नहीं रहते इस संदर्भ में एक बात विशेष रूप से कहना चाहता हूँ। हालाँकि वे अपने हाव-भाव या व्यक्त अव्यक्त तरीके से अपनी नाराजगी प्रकट कर देते हैं, लेकिन उन्होंने कभी मुझे बुलाकर मेरे किसी काम की कैफियत नहीं माँगी और उन्होंने मुझसे कभी सीधे-सीधे यह नहीं कहा कि यह काम करे या यह मत करो। उनका जितना अधिकार मैं अपने ऊपर मानता हूँ, उसमें यह बहुत सहज-स्वाभाविक है। लेकिन हमारे बीच ऐसा अवसर कभी नहीं आया। मैंने भी उनके सामने कभी अपने किसी काम की सफाई पेश नहीं की। इस तरह उन्होंने अपने सामने मुझे लज्जित नहीं किया। दूसरों को लज्जित करने का सुख वे कभी लेते। सामने वाले व्यक्ति के आत्मसम्मान की, इज्जत की रक्षा करना वे बखूबी जानते हैं। इसके अलावा वे बहुत अंशों तक व्यक्ति की सीमा और कमजोरियों को नजरअंदाज करने की क्षमता रखते हैं। आजकल एक शब्द चलता है 'उपकार करना'। उन्होंने बहुतों का बहुत तरह से उपकार किया है, लेकिन शायद ही किसी को समाने बिठाकर कहा हो कि मैंने आपका अमुक काम कर दिया है। इसमें बड़ी दिक्कत आई, आदि-आदि। वे तो उपकार करके सूचित भी नहीं करते।

इस अवसर पर मैं यह स्वीकार कर लूँ कि गुरुदेव प्रो. नामवर सिंह की कृपा मुझ पर कुछ अधिक ही रही है। मैं नहीं जानता कि मेरे छोटे से जीवन में मुझे जो कुछ मिला है, उसका कितना श्रेय मेरी अपनी योग्यता का है और कितना उनके अतिरिक्त स्नेह का है। प्रेमचंद पर हिन्दी, उर्दू एवं अँग्रेजी में एक-एक पुस्तक लिखवानी थी। डॉ. नामवर सिंह विशेषज्ञ थे। उन्होंने मेरा नाम सुझाया। प्रेमचंद पर मैंने अपना शोध-प्रबन्ध जमा कर दिया था, लकिन मेरी कोई पुस्तक नहीं छपी थी। सिर्फ चार-पाँच आलोचनात्मक निबन्ध प्रकाशित हुए थे। ऐसे समय में मुझसे पुस्तक लिखवाना मेरे लिए तो बहुत बड़ी बात थी। हालाँकि इस पुस्तक को काफी पसन्द किया गया, यह अलग बात है। परन्तु डॉ. नामवर सिंह ने मुझे इस बारे में कुछ बताया नहीं। वह तो एन सी. ई. आर. टी. का पत्र आया तब पता चला। इसके साथ और बात भी है। गुरुवर डॉ. नामवर सिंह ने मुझे जो दिया है, उसके लिए कभी मुझे उनसे निवेदन नहीं करना पड़ा। उन्होंने जो कुछ दिया अनायास ही दे दिया।

इसलिए कभी-कभी संदेह होता है कि कहीं नामवर जी पक्षपात तो नहीं करते। भले ही यह पक्षपात स्वयं मेरे साथ ही क्यों न किया हो। अपने चाहने वालों का ध्यान कौन नहीं रखता? देखा जाए तो अनासक्त अज्ञेय ने भी अपने चाहने वालों का ध्यान रखा ही है। आखिर उनके लिए ही तो उन्होंने 'चौथा सप्तक' निकाल था। डॉ. नामवर सिंह जी भी ध्यान तो रखते ही होंगे। उनके तरह-तरह के लोगों से संबंध हैं। दुनियादारी के तकाजों के मुताबिक वे लोगों की मदद भी करते हैं, लेकिन साहित्य की दुनिया में उनसे किसी प्रकार की पक्षपात की उम्मीद नहीं की जा सकती।

मैंने देखा है कि अपनी व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द से वे बहुत जल्दी उबर जाते हैं और साहित्य का मूल्यांकन करते समय एकदम निर्लिप्त हो जाते हैं। जोधपुर में एक बार डॉ. रघुवंश आए थे। उन्होंने 'तुलसीदास की प्रतिबद्धता' पर हिन्दी विभाग में भाषण दिया। डॉ. नामवर सिंह को अध्यक्षीय भाषण देना था, उन्होंने भाषण दिया और रघुवंश जी की धज्जियाँ उड़ा दीं। भाषण खत्म होने के बाद वही प्रेम भाव फिर प्रकट हुआ। उस दिन मुझे बड़ा आश्चर्च हुआ था कि विचारों को व्यक्त करने में जरा भी लिहाज नहीं बरतते। मेरे हाँ हाँ वादी संस्कारों को इससे बड़ा धक्का लगा था। इसी तरह रमेश उपाध्याय के कहानी संग्रह 'नदी के साथ' का विमोचन डॉ. साहब को करना था। गोष्ठी का आयोजन श्याम कश्यम के घर में किया गया। उन दिनों रमेश उपाध्याय को डॉ. साहब से उतनी शिकायतें नहीं थी, बल्कि दो-एक बार वे उनके घर जाकर प्रेमपूर्वक मिल आए थे। उस दिन भी डॉ. साहब ने बड़ी बेरहमी से रमेश जी की कहानियों की आलोचना की (उस गोष्ठी की रिपोर्ट 'निर्झर' नामक पत्रिका में छपी भी थी।)

इसी तरह डॉ. साहब असद जैदी के बारे में अच्छी राय नहीं रखते। असद जैदी भी यदा-कदा उनका विरोध करते रहते थे। लेकिन असद की पुस्तक 'बहनें और अन्य कविताएँ' प्रकाशित हुई, तब डॉ साहब ने किसी इंटरव्यू में नए कवियों में असद जैदी की कविताओं की तरीफ की। मुझे एक बार फिर आश्चर्य हुआ और आश्चर्य स्वयं असद जैदी को भी हुआ। उनकी राय से मतभेद हो सकता है, कभी-कभी उनकी राय में कुछ-कुछ 'डिप्लोमेसी' भी होती है, वे काफी बारीक कताई भी करते हैं, तारीफ के बहाने निन्दा करने के तो वे आचार्य हैं ही। लेकिन उनके चिन्तन और लेखन में मैंने कभी कोई अन्तर्विरोध नहीं देखा। जो वे मानते हैं, वही वे लिखते हैं, वही वे लिखते हैं, या कहते हैं। उनके नजदीक रहने वाले उनसे अपने लिए तारीफ निकलवा लें, ऐसा संभव नहीं है। ऐसे कंठोर अनुशासनबद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने कहानीकार के रूप में काशीनाथ सिंह का जिक्र किया तब उन्होंने कितना मनन किया होगा। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। अपने छोटे भाई के प्रति अपने ही प्रेम भाव पर विजय पाने तटस्थ होने में उन्होंने पर्याप्त समय लिया।

विश्वविद्यालय प्रशासन संबंधी कई मामलों में उनके विचार प्रचलित विचारों से अलग हैं। मसलन वे परीक्षा में प्रश्न-पत्रों की गोपनीयता में बहुत अधिक विश्वास नहीं रखते है। उनका मनना है कि छात्रों को प्रश्न बता दिए जाएँ तब भी उनके उतने ही अंक आएँगे, जितने आने चाहिए। गोपनीय प्रश्न तो एक प्रकार का जुआ है। फिर हमें विद्यार्थियों की कमजोरी की परीक्षा तो लेनी नहीं, उनकी शक्ति की जाँच करनी है। उनकी यह दृष्टि मौखिक परीक्षा, साक्षात्कार आदि में भी रहती है। साक्षात्कार में तो वे सामने वाले व्यक्ति की सहायता करते हैं कि वह अपने सर्वश्रेष्ठ का प्रदर्शन कर सके। चयन चाहे जिसका हो, लेकिन साक्षात्कार देना अनुभव होता है, इसे अधिकांश व्यक्ति मानते हैं। वे अपने विद्यार्थियों और सहकर्मियों के सर्वश्रेष्ठ की शक्ति से अवगत होते हैं। अतः आवश्यकतानुसार उचित उपयोग कर लेते हैं। वैसे भी नामवर जी से अपने-आपको छिपाना बहुत मुश्किल होता है। वे बातों-ही-बातों में अनायास ही आपकी थाह ले लेंगे और आपको पता ही नहीं चलेगा। कभी-कभी तो वे सामने वाले व्यक्ति को बहस के लिए आमंत्रित ही नहीं, विवश कर देते हैं। इस बहस से नए विचार तो पनपते ही हैं, दूसरे को सँभलने का अवसर भी मिल जाता है। वे इसके लिए एक अतिरिक्त पूर्ण मत प्रस्तुत करके बात करने लगेंगे और फिर जबर्दस्ती आपकी राय माँगेंगे।

वैसे डॉ. नामवर सिंह से जब भी मैं मिला हूँ, साहित्य व समाज की चिंताओं और समस्याओं से ही उन्हें घिरा पाया है। वे अनेक कामों में, मीटिंगों में, भाषणों, बैठकों में व्यस्त रहते हुए भी पढ़ने का समय निकाल लेते हैं। कई बार दिन-भर की गोष्ठी में हम लोग उनके साथ रहते और शाम को घूमने के लिए उनके घर जाते तो पता चलता कि वे तो अभी पढ़ रहे हैं, आने वाले हैं। 1984 में मैं रोहतक छोड़कर जोधपुर चला गया। कुछ महीनों बाद मैं दिल्ली आकर उनसे मिला। लगभग 15-20 मिनट घर-परिवार, विभाग, शहर आदि के बारे में जब बातें समाप्त हुईं तो आपने पूछा कि और क्या लिख पढ़ रहे हो? कुछ ऐसा संयोग हुआ कि उन दिनों मैं कुछ काम नहीं कर रहा था। कुछ घरेलू झंझट थे, कुछ शहर बदलने से मानसिक व्यवस्था उलट-पुलट गई थी। मैंने नकारात्मक उत्तर से उनको इतना आश्चर्य और दुःख हुआ कि उस दिन की बातचीत लगभग वहीं समाप्त हो गई। अब तो यह स्थिति है कि राह चलते, उठते-बैठते उनकी आश्चर्य मिश्रित दुःखपूर्ण भर्त्सना याद तो रहती ही है, बल्कि जब भी उनसे मिलने जाता हूँ, इस प्रश्न के लिए तैयार होकर जाता हूँ।

डॉ. नामवर सिंह अपनी चिंताओं और विचारों के साथ बहुत देर तक रह सकते हैं। सांसारिक बाधाएँ उन्हें विचारों की दुनिया से अलग नहीं कर पाईं। इसलिए वे साहित्य की किसी भी समस्या पर बिना तैयारी किए हुए बहुत देर तक बातें कर सकते हैं। आम तौर से लोग बिना तैयारी किए हुए किसी भी विषय पर बात नहीं कर सकते। ऐसा नहीं है कि डॉ. साहब बिना तैयारी किए हुए ही भाषण दे देते हों। उनकी तैयारी का हाल तो यह है कि प्रस्तुत विषय पर उपलब्ध सम्पूर्ण सामग्री को जब तक मनन नहीं कर लेते, तब तक उन्हें चैन ही नहीं पड़ता। पुस्तकों की खोज की हालत तो यह है कि वे जब तक विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में एक बार चले नहीं जातें, तब तक उन्हें चैन ही नहीं पड़ता। ऐसा ही पवित्र स्थान उनके लिए किताब की दुकान होती है। जहाँ वे अवश्य जाते हैं। इसलिए कौन-सी पुस्तक किस सार्वजनिक या व्यक्तिगत पुस्तकालय में उपलब्ध है? या किसके पास है? उन्हें लगभग सब ध्यान रहता है।

प्रो. नामवर सिंह कभी औसत विचार व्यक्त नहीं करते। जो सब जानते और मानते हैं, उन्हें वे कभी कहते नहीं। वे युगीन विचारों को व्यक्त नहीं करते बल्कि युग के नए विचार देने की कोशिश में रहते हैं। वे जब बोलते हैं या लिखते हैं, तब प्रयास-पूर्वक 'नया' कुछ कहना चाहते हैं। जाहिर है, कुछ भी नया कहने के लिए न केवल पुराने के सांगोपांग जानकारी आवश्यक है, वरन् उसमें 'नए' की संभावना की समझ भी आवश्यक है। कहना ही होगा कि लीक से हटकर और 'नया' कुछ कहने की इस धुन ने उनको यथातथ्य मार्क्सवादियों के बीच विवादास्पद भी बना दिया है। वे तो मानते हैं कि जो कुछ मार्क्स ने कह दिया है, उसके पुनर्कथन की जरूरत नहीं है। यदि फिर से कह भी दिया तो उसमें 'सर्जनात्मकता' कहाँ? उन्होंने एक प्रसंग में कहा कि "मैं किसी भी सेक्युलरिज्म की सबसे बड़ी कसौटी मानता हूँ सृजनात्मकता। बड़ी से बड़ी कोई विचारधरा हो, धारण हो, अगर वो किताब होगी तो उसमें सृजन की चीजें पैदा नहीं हो सकतीं। अगर वो जिन्दगी में रची-पची होगी तो उसकी झलक आपको दिखाई पड़ेगी कविता में, नाटक में, उपन्यास में, पेंटिंग में, संगीत में, मूर्ति-कला में, भवन-निर्माण कला में। इसलिए इस दौर को, उसके महत्त्व को समझने के लिए इस बात को देखें कि पिछले अड़तीस साल में हरिजनों को, बाकी लोगों को बड़ी सुविधाएँ दी गईं। लेकिन ये तमाम सुविधाएँ, वजीफे देने के बावजूद, वे डिप्टी कलक्टर हो गए हैं, आई. ए. एस. और इंजीनियर हो गए हैं, वे डॉक्टर भी हो गए होंगे, साहित्यकार और बुद्धिजीवी इनमें से एक पैदा नहीं हुआ।" (कबीर, चार, पृ. 49)

सर्जन-कर्म की विशेषता है मौलिकता या नयापन। गुरुवर डॉ. नामवर सिंह ने अपने लेखन में हमेशा इस मौलिकता को बहुत महत्त्व दिया है। महत्त्व देना तो एक बात, उन्होंने मौलिकता की संभावनाओं को परखा-पहचाना और उसे प्रतिष्ठित किया है। 'आलोचना' पत्रिका की संपूर्ण फाइलों को देखने से पता चलता है कि कितने ही नए और महत्त्वपूर्ण लेख पहली बार इसमें प्रकाशित हुए हैं। यदि फेहरिस्त बनाकर तुलना की जाए तो पता चलेगा कि हिन्दी के किसी भी समर्थ और बड़े आलोचक से अधिक उन्होंने नए लेखको को प्रोत्साहित ही नहीं किया, साहित्य में प्रवेश भी दिलाया है। इस मौलिक सर्जनात्मक दृष्टि से उन्होंने हिन्दी पाठ्यक्रम बनाया है, इसका जिक्र पहले ही किया जा चुका है।

कहने-सुनने में आज भले ही अजीब लगे लेकिन हिन्दी विभागों में डॉ. साहब ने डॉ. रामविलास शर्मा के कृतित्व को प्रवेश दिलवाया है। उन्होंने बहुत ही सुनियोजित रूप से कक्षाओं में, भाषणों में महत्त्व देकर डॉ. शर्मा का परिचय दिया है किसी विश्वविद्यालय में चाहे जिस विषय पर उनका भाषण हो, तो यह संभव नहीं है कि डॉ. रामविलास शर्मा की चर्चा न हो। जे. एन. यू. में तो उनको अब पढ़ाया जाने लगा है, पहले से ही वह यह काम करते रहे हैं। डॉ. नामवर सिंह में यह सजगता बराबर बनी रहती है कि हिन्दी विभागों की दुनिया साहित्य की दुनिया से थोड़ी अलग है। वहाँ की समस्याएँ अलग है। अतः हिन्दी विभागों में उन्होंने अज्ञेय तक का समर्थन किया है। कलावादियों के बीच रामविलास जी का समर्थन करते हैं। मार्क्सवादियों के बीच उनके व रामविलास जी के मतभेद खुलकर प्रकट होते हैं। इस बारीक भेद को जो लोग नहीं समझ पाते वे यह शिकायत करते रहते हैं कि नामवर जी एक जगह एक बात कहते हैं और दूसरी जगह दूसरी बात कह देते हैं। या कवि वे श्रोता देखकर भाषण देते हैं। इतना सरल मामला है नहीं। वे योजन से काम करते हैं। फिर नामवर जी के श्रोता ठंडे दिमाग से हाँ, हाँ करते हुए उनका भाषण सुन नहीं सकते। वे अपने श्रोताओं को ॐ की आजादी नहीं देते। उनमें उबाल आता ही आता है।

अपने संस्कारों के कारण ही नहीं, उनके पास जाने में मुझे अभी तक भय लगता है। लेकिन वे अपने व्यवहार या बातचीत से कभी किसी को छोटा महसूस नही करवाते। वे तो प्रयासपूर्वक सामने वाले व्यक्ति को ऊपर उठाकर उसे अपने समान बना लेते हैं। उनमें यह तो नहीं है कि सामने वाले व्यक्ति के स्तर तक स्वयं उतर आएँ, रहते तो वे अपने स्तर पर ही हैं, परन्तु दूसरे व्यक्ति को ऊपर उठाते चलते हैं। उनके पास जाकर दैनिक क्षुद्र भाव तिरोहित हो जाते है, जिसके कारण उनसे ज्ञान के संबंध ही बन पाते हैं। उनसे मिलने के बाद प्रसन्नता व उल्लास की अनुभूति होती रहती है। आम तौर से बड़े लोगों से मिलने के बाद चिढ़, आत्मग्लानि व घृणा तक के भाव मन में आ जाते हैं। उनसे मिलने के बाद हर बार लगा कि फिर मिलें। यह नहीं लगा कि अब नहीं मिलना। उनसे मिलने पर न तो आत्महीनता की अनुभूति होती है और न अतिरिक्त आत्मविश्वास की, बल्कि जानने-समझने की जिज्ञासा वृत्ति बढ़ती है। इसलिए ज्यादा-से-ज्यादा समय तक उनके साथ रहने की इच्छा हमेशा बनी रहती है।

(‘मेरे लिए नामवर जी’ सं. रामबक्ष जाट, पुस्तक से साभार)


रामबक्ष जाट

(आप जे एन यू दिल्ली से सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं. प्रेमचंद साहित्य के अध्येता माने जाते हैं. राजस्थानी पृष्ठभूमि के हैं. आपने नाम्स्व्र सिंह जी के सानिध्य में काफी वक़्त बिताया है.)

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय, कंचनलता यादव एवं संजय साव 

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