संस्मरण : मेरे लिए नामवर जी / आनंद कुमार

मेरे लिए नामवर जी
- आनंद कुमार


प्रो. नामवर सिंह के बारे में बहुत कुछ कहा गया, जो यहाँ बनारसी हैं और जिनके मन में सामाजिक सरोकार रहा है तथा विद्यार्थी जीवन में अभी भी थोड़ी बहुत सक्रियता आपमें भरसक रहती है। एक आदर्श भाव रहा है। शिक्षकों के बारे में ये कहा जाता है कि जो कुछ नहीं कर सकता वो पढ़ाता है। नामवर जी उस शिक्षक धरा के व्यक्ति हैं, जिन्होंने सब कुछ 'साध' लिया, सब कुछ कर लिया और तब तमाम विकल्पों के बीच से अपना मार्ग चुना कि मुझे शिक्षक बनना है। ये शिक्षक सघन राजनीतिक चेतना के केन्द्र में इन्होंने कम्यूनिस्ट पार्टी का झण्डा लेकर उस समय के बड़े-बड़े दिग्गजों को, जहाँ – कमलापति त्रिपाठी, रूस्तम सेठी, राज नारायण, सम्पूर्णानन्द, उस दौर में जनता के बीच में किसानों का काम किया। जब बनारस वाले उनकी तपिश से, उनकी आँच से जलने लगे, शब्दशः जलने लगे और काशीनाथ का निर्वाचन हुआ तो इन्होंने आलोचना में, साहित्य में जो जगह बनानी शुरू की... तो साहित्य के "शिखर पुरुष" तो वे बहुत कम उम्र में बन गए। इनके मुष्ठि प्रहार से जो बचा वही साहित्य में चल सका, वर्ना किसी ने अगर कुछ किया तो वह हिन्दी साहित्यकार नहीं बन पाया। न कविता में, न गद्य में, न उपन्यास में, न कहानी में। और न नीति निर्माता लोग थें, और जो 70 के दशक में सम्मान, उस समय में शिक्षा मंत्री, चेयरपर्सन जो दिया करते थे उसमें हम सब लोग साक्षी हैं; और में भी हो सकते थे, नीति निर्माताओं के इर्द-गिर्द सलाहकार मण्डल में भी शामिल हो सकते थे किन्तु उन्होंने "शिक्षक पद" से अपनी जीवनयात्रा, जो जीवन की नाव खेने के पतवार के रूप में चुना, वो हम सबके लिए बहुत प्रेरणा की बात है। और गुरुत्वाकर्षण जो इनका बना, गुरु वो है जो आकर्षित करें, गुरु वो है जो प्रकाश दे, गुरु वो है जो गंगा की तरह से आमंत्रित करे की एक डुबकी तुम भी लगा लो, चाहे कितने भी तुम आखिरी कतार के व्यक्ति क्यों न हो। तुम आओ हमारा आँगन खुला है, किनारा खुला है गुरु वो है जो आपके अन्दर गाम्भीर्य दे, विनम्रता दे। सबसे ज्यादा ज्ञान साधना की प्रेरणा दे। प्रो. नामवर सिंह ने भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यापक के रूप में हम सबके लिए जो बड़ा काम था, अपनी भाषायी बुनियाद को जो "हिन्दी" थी, उसको इतना विराट बना दिया, गहरा बना दिया कि वो स्वतः इतना बड़ा वृक्ष बन गया। कब ये हिन्दी पढ़ाते-पढ़ाते बंगला पढ़ाने लगते, और बंगला पढ़ाते-पढ़ाते कब मराठी, तमिल, संस्कृत में और कब अँग्रेजी में, हिन्दी साहित्य का अंग जैसा बन गयी और इसलिए हिन्दी को लेकर जो एक अजीब किस्म का कठमुल्लापन था कि हिन्दी माने ये, हिन्दी ये नहीं। हिन्दी-उर्दू की मशहूर लड़ाई, हिन्दी अँग्रेजी का अन्तर्विरोध इन सबको लांघने में एक बड़ी लकीर लगातार खिंचने में, एक समीक्षक के रूप में, एक शिक्षक के रूप में 'नामवर जी' ने हम सबका रास्ता सहज कर दिया, वर्ना आपको अंदाजा भी नहीं कि 60 के दशक में हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में कैसा एक तरह का 'डाह' का भाव था। भाषा का अपना संख्याबल, राजनीति, हिन्दी भाषी छात्रों की वर्चस्वता और उसके बाद फिर ऐतिहासिक और राजनीतिक औपनिवेशिक नीति की 'विरासत को बाँटो और राज करो' की नीति।

मैं तो नामवर जी के बगल में पहले एक समाजशास्त्री था। पड़ोसी था, भारतीय भाषा केन्द्र का शिक्षक बना, फिर मैंने देखा कि नामवर जी एक शिक्षक के रूप अपने विद्यार्थियों के साथ आचरण कैसे करते हैं। जैसा एक कुम्हार मिट्टी के साथ करता है। उन्होंने भी उसे गढ़ने में अपना पूरा कौशल लगा दिया, फिर उसे स्वतंत्र कर दिया और अपना कोई सम्प्रदाय विकसित नहीं किया। शुरू-शुरू में जे. एन. यू. का ये हाल था कि शिक्षक लोग शिक्षा कम देते थे और दीक्षा ज्यादा देते थे, यानि वो जिस विचारधारा के हैं उसमें विद्यार्थी भी शामिल हो जाइए, जिस राजनीतिक पार्टी के हैं उसमें आप भी शामिल हो जाइए, जिस नेता का जिन्दाबाद लगाते हैं उसके समक्ष आप भी शामिल हो जाइए। ऐसी कोई कतार 'नामवर जी' ने बनाने से इन्कार कर दिया।

इसलिए आज हिन्दी में जो विविधता है, उस विविधता के हर मोड़ पर, हर मोर्चे पर नायकत्व तो नामवर जी के विद्यार्थियों के हाथ में है, लेकिन इनमें से कोई भी उस अखाड़े की मिट्टी को अपने माथे पर नहीं लगाता, जिससे वो निकले हैं, वो नामवर जी के कन्धे पर शुरू से आगे तक जो दिखाई पड़ सकता है या उनके बगल का, पीछे का, दायें बायें का, उन सबको अपने-अपने तरीके से परिभाषित किया।

मैं जब विद्यार्थी था तो नामवर जी का उनकी दूसरी छवि के जरिए जानता था, दूसरी छवि जो बच्चन सिंह जी, प्रो. काशीनाथ सिंह जी, त्रिभुवन सिंह जी और मेरे परिवार में कृष्णनाथ जी, जो उनके विद्यार्थी थे। मेरे अपने सांस्कृतिक-राजनीतिक परिवेश में पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की कल्पना साहित्य और उसे देखकर लगता था कि कोई बहुत ऊँचाई पर बैठा शिखर पुरुष है "नामवर सिंह"। पहले तो ये गाँव के आदमी, दूसरे ये बनारसी, तीसरे ये हिन्दी के, चौथे ये मार्क्सवादी, पाँचवें ये आलोचक। पर आप जब इनसे मिलेंगे तो आपका, इनके रजिस्टर्ड 5 वर्ष के विद्यार्थियों का।

मैं जब यहाँ पर आया तो बड़े संकट में था। मुझे एक पर्चा शुरू करने की सनक थी, क्योंकि जब मैं पढ़ने आया तो भारत के जितने मनीषी थे, वो सब समाज विज्ञान में पिछले दरवाजे से ही आप उनसे मिल सकते थे। सामने का दरवाजा तो हार्बड, मैकाइवर, वेबर, दुर्खीम के लिए खुला था। जैसा कहा मैनेजर पाण्डेय ने कि उनके नाम के उच्चारण को लेकर भी हम लोग असफल होते थे, कि दुर्खाइम होगा या कि दुर्खीम। लेकिन भारतीय चिंतको का जहाँ तक भारत पर असर था, समाज पर असर था। उनका जो योगदान था, वो कहीं परिलक्षित नहीं था। न ही बनारस में, न ही जे.एन.यू. में। जब जे.एन.यू. में आए तो हमसे कहा गया- ‘जब पढ़ाने लगागे तो पढ़ाना’। जब पढ़ाने आए तो, कहा हमारी बारी है। तो जो ‘परचा’ हम लोगों ने बनाया 'सामाजिक चिंतको का' और शुरू किया हम लोगों ने विवेकानन्द, फूले, रामास्वामी नायकर से होते हुए अम्बेडकर, लोहिया और बीच में जवाहरलालजी, गाँधीजी, अरविन्द महर्षि जी, रवीन्द्रनाथ टैगोर। पर्चा तो बन गया, किन्तु उसमें बहुत जान नहीं थी।, ये सब उदास मोहल्ले के लोग हैं, जिसमें किसी की जागृत या शाश्वत प्रेरणा सत्तर के दशक में नहीं थी, ये मोहमंग का दौर था। अस्सी के दशक में तो कतई नहीं थी। तथाकथित एंडोबायोलॉजी का दौर था। मैं एकदम से बिना संकोच प्रो. नामवर जी की शरण में गया और मैंने निवेदन किया कि आपने जो चमत्कार साहित्य में किया है कि लोग पढ़ने तो हिन्दी आते हैं, जिसमें रसखान, रहीम, जायसी के साथ ग्राम्शी, मार्क्स, हैबरमास और फिर भारतीय राजनीतिक आन्दोलन, पढ़ने लगते हैं। ये आपने जो सिखाया है, ये जो आपकी शिक्षा का व्याकरण है, इसी व्याकरण कों हम समाजशास्त्र में इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो कृपया एकबार आकर भारतीय समाज के बारे में बोलें। मेरा सौभाग्य था कि जब तक आपके पास समय था तो शुरुआती व्याख्यानों में एक-दो व्याख्यान देते रहते थे।

आचार्यवर शतक बनाने के निकट हैं, तो हम लोग भी उमर के तीसरे पड़ाव में हैं। साल दो साल में अवकाश लेना है। लेकिन जो उन्होंने योगदान दिया, वो हमारे पाठ्यक्रम में शायद पहली हिन्दी की पुस्तक है। जे.एन.यू. 'सोशियोलॉजी' विभाग में 40 साल से दर्जनों विषय पढ़ाए जाते हैं लेकिन जब आप आए तो आपने कहा कि भारत में अगर चिंतनधारा के विभिन्न आयामों को समझना है, उनकी परतों को खोलना है, उसमें सनातन मूल्यों से लेकर तत्कालीन प्रश्नों के संदर्भ समझना है, तो आपको मैं एक ही किताब बताता हूँ। मेरी सूची में 30-35 किताबें थी। एक तरफ और नामवर जी ने बताई जो किताब वह दूसरी तरफ। उन्होंने कहा 'गोरा' एक उपन्यास है, उसको रवीन्द्रनाथ टैगोर नामक आपके एक जानकार ने लिख है। आप लोगों ने शायद नहीं पढ़ा होगा। मैं भला क्या पढ़ता? मैं तो बिल्कुल नहीं जानता था। उनकी 'गीतांजलि' को हम लोग जानते थे। उसको नोबल पुरस्कार मिल गया, तो वो थी। गोरा में जो आत्मंथन है, भारतीय अस्मिता का। भारत और पश्चिम का जो संवाद है, और भारत के विभिन्न वर्गों के जो अन्तर्विरोध है, वो आपको 'गोरा' में सबसे सुन्दर तरीके से समझ में आयेगा। आज भी मेरे पाठ्यक्रम में प्रो. साहब 'गोरा' पर समीक्षा लिखना विद्यार्थियों की पहली पसंद रहती है। वो कहते हैं कि सर हमको बुक रिव्यू लिखना है तो "गोरा" दीजिए। ऐसा हुआ गोरा के साथ।

फिर आगे चलकर इसी प्रकार दलित विमर्श के साथ आपने कहा कि अच्छा ये विमर्श तो उस समय नहीं था, तो आपने शरण कुमार लिंबाले की 'अक्करमाशी' का नाम तो सुना होगा। हमने न तो अक्करमाशी का नाम सुना था, न ही शरण कुमार लिंबाले का। इन्होंने हाल ही में इसे देखा था। इन्होंने कहा इसे तो पहले तुम पढ़ो, देखो और आत्मसात करो और फिर उसके बाद भारत में जो आधुनिकीकरण की सीमाएँ हैं, जो जातिप्रथा कि विडम्बाएँ है और जातिप्रथा का जो वर्तमान है, भविष्य है, वो समझ में आयेगा 'अक्करमाशी' से।

मित्रो! हम उस बगीचे में पढ़ा रहें थे जिसमें ये एक सुगन्ध का वृक्ष था 'प्रो. नामवर सिंह'। जहाँ से बात चलती थी, प्रारम्भ होती थी। अक्सर मेरे क्लास के लड़के गायब हो जाते थे। मैं जब पूछता भाई कहाँ गए थे परसों, आप नहीं थे। तो उनका जवाब होता- स’र वो नामवर जी का SSS-I आडिटोरियम में लेक्चर था। और हम सब लोगों के लिए इतने जबरदस्त आधार थे, ज्ञान के आधार 'प्रो. नामवर सिंह'।

नामवर जी के लिए दूरियाँ तय करना भी अद्भुत था। कोई भी दूरी हो-काल की दूरी, व्यक्ति की दूरी। ये होता है गुरु का महत्त्व जो किसी भी अगम्य को सहज बना दे। मुझे लगता है अभी हम लोगों के लिए बहुत कुछ इनकी विरासत और इनकी परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक कार्य करना होगा। जैसा कि मैंने कहा कि आज शिक्षक होना 'आत्महीनता की गठरी' ढोना हो गया है। न तो विद्यार्थी को समझ में आता है, न समाज को, न शिक्षक को।

मुझे एक आई. ए. एस ने कहा कि अब तो आप लोगों को एक लाख मिलने लगा! क्या करते हैं? न पढ़ते हैं, न पढ़ाते हैं। पर मुझे तो आड़ तो लेनी थी। मैंने कहा ‘हमारे यहाँ प्रो. नामवर जी एक सज्जन हैं, जो सुबह 5 बजे उठ जाते हैं। आते हैं, पढ़ाते हैं और बाद में जब आप भोजन करके विश्राम करते हैं तो ये एक नींद लेकर 2-3 बजे फिर लाइब्रेरी चले जाते हैं और विद्यार्थी जितना इन्हें नहीं पहचानता, उतना कर्मचारी जानता है। खासतौर से वह 'चपरासी' जिसको यह बताने का बड़ा गर्व होता है कि सर यह किताब नई आयी है।

जैसा कि प्रो. तुलसीराम जी ने कहा कि जिसके हम सभी साक्षी हैं कि नामवर जी के घर में केवल किताब के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं, इसलिए शायद कभी ताला लगाने की जरूरत नहीं थी कि चोर किताब का क्या करेगा।

ऐसा कुछ जीवन का रूप बनाना जिसमें ज्ञान का आनन्द हो, ज्ञान ही आरम्भ हो, ज्ञान ही मध्य हो, ज्ञान ही अन्त हो और ज्ञान को समाज के साथ सरोकारी बनाके जोड़ना। अभी जो ये "नामवर विचार गोष्ठी" शुरू हुआ, बहुत देर से आया। हम जब बनारस में पढ़ते थे तो हमारे कुछ मित्र हुआ करते थे, बाद में हिन्दी में और कुछ अन्य विषयों के विशेषज्ञ बने। उनके जरिए 'नामवर जी' के बनारस आने की "मुनादी" होती थी कि नामवर जी आने वाले हैं। क्योंकि उस समय विजय मोहन जी, धूमिल, काशीनाथ जी, शिवप्रसाद सिंह जी, योगेश्वर जी जैसे लोग थे। फिर जब "नामवर जी" आ गए तो अखबारों में छपा करता था। फिर नामवर जी चले गए तो तो घण्टों, हफ्तों, महीनों चर्चा होती थी कि उन्होंने ऐसा कह दिया, वैसा कह दिया। और उनकी स्थापनाओं के इर्द-गिर्द बहस चला करती थी।


आनंद कुमार
जब मैं इनसे मिला तो मुझे लगा ये बहुत बन्द दिमाग के खाली। जिसका मुँह बहुत बड़ा हो; खाली प्रवचन देने वाला, महान विद्वान होगा। लेकिन मैंने देखा कि मुँह से बड़ी इनकी आँखें हैं और बड़ी आँख से ज्यादा बड़ा इनका कान है। ये ध्यान से देखते हैं, उससे ज्यादा ध्यान से सुनते हैं, इसीलिए चाहे हिन्द स्वराज पर बोलें या कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो पर बोलें, रामचन्द्र शुक्ल पर बोलें या ग्राम्शी पर या गोर्की पर बोलें, आपको सदा कुछ नित्य, नवीन मिलता है। जैसा प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने और उसी प्रकार प्रो. रामबक्षजी ने कहा कि उनकी आदत है कि जहाँ पर विवाद की कोई संभावना नहीं है वहाँ विवाद पैदा करना और जहाँ संवाद की कोई संभावना नहीं, वहाँ संवाद के सेतु बनाना और इन दोनों के बीच का जो समन्वय होता है, वही 'विचारधारा' कहलाती है। नामवर जी ने इन तमाम वर्षों में इस काम को लगातार किया। इसलिए हमारे विश्वविद्यालय की पहचान और एक मान हैं 'नामवर जी'। हिन्दी साहित्य की पहचान में नामवर जी एक मानक हैं, भारतीय साहित्य के आलोचना से लेकर रचना में नामवर जी एक मानक हैं। भारतीय राजनीति, साहित्य और समाज इस त्रिकोण को बनाने में जिन लोगों ने पिछले आधी शताब्दी अपना सब कुछ खपाया, उसमें नामवर जी का नाम बहुत ऊँचाई पर है।

ऐसा सौभाग्य बहुत कम लोगों को मिला कि एक तरफ नामवर जी के निमित्त के रूप में गाँधीवादी के रूप में प्रभाष जोशी ने पहल की, तो दूसरी और राजेन्द्र, गाँधी ऐकेडमी समापान समारोह में भारत में एक पोलिटकल पार्टी को छोड़कर सभी पार्टियों में होड़ लगी थी कि- "नामवर जी हमारे हैं, हमारे हैं, हमारे हैं! आज भी देश कहता है वो हमारे हैं, और हमें इससे कोई झगड़ा नहीं।"

आप सभी को बहुत धन्यवाद !

(‘मेरे लिए नामवर जी’ सं. रामबक्ष जाट, पुस्तक से साभार)


आनंद कुमार
( आप भारत के जानेमाने समाज-विज्ञानी हैं. जे एन यू दिल्ली में सालों तक प्रोफ़ेसर रहे हैं. प्रसिद्द राजनितिक-विश्लेषक हैं. आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से भी सम्बद्ध रहे हैं. वर्तमान में दिल्ली में रहते हैं )

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( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय, कंचनलता यादव एवं संजय साव 

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