मेरे लिए नामवर जी
- तुलसीराम
नामवर जी ज्ञान की एक निरन्तर प्रक्रिया हैं। मैं उनको इस रूप में देखता हूँ। मैं उनका छात्र तो नहीं रहा सीधे-सीधे, लेकिन उनसे जो कुछ भी सीखा, मैंने काफी लम्बा समय बीताया है। जब से मैं उनके एक तरह से सान्निध्य में रहा हूँ। तो कभी-कभी निजी बातचीत में केदार जी से कहा करता था कि मैं नामवर जी को अपना गुरु द्रोणाचार्य मानता हूँ, और वे खूब हँसते थे। तो अभी पहले वक्तव्य में प्रो. मैनेजर पाण्डेय ने कहाँ की नामवर जी दुविधा पैदा करते हैं, और जाहिर है कि वे जन्मदिन की दुविधा को 1 मई और 28 जुलाई संकेत कर रहे थे। 1 मई को मैं भी शिकार हुआ, वह इस रूप में तथाकथित 1 मई को जब नामवर जी 60 साल के हुए थे तो वे, मैं उस समय 1986 की बात है ओल्ड कैम्पस के एक मकान में रहता था, वह ट्रीपल एस बील्डिंग जो है, तो उस दिन यह तय हुआ कि नामवर जी का साठवाँ वर्षगाँठ जो या साठवीं जयन्ती जो है वह मेरे निवास पर मनाई जाए। संयोग की बात है कि उस दिन नामवर जी के अलावा केदार जी, डॉ. बच्चन सिंह और बनारस के प्रसिद्ध कवि त्रिलोचन शास्त्री, ये लोग आए वहाँ पर। काफी देर रात तक, करीब बारह-एक बजे रात तक, वहाँ गपशप होती रही। खाना-पीना सब कुछ हुआ। और वह दिन मुझे याद था। उस समय मुझे विशेष रूप से केदार जी और डॉक्टर साहब भी सचेत करके रात में ओल्ड कैम्पस से न्यू कैम्पस अपने निवास पर लोग पैदल आए। वह बीच का रास्ता जो बड़ा फेमश था। उस समय कि त्रिलोचन से सावधान रहना ये उठकर के बोतल रात में खोजेगा। और यह मर जाएगा, तुम्हारे पर और बहुत बड़ा बबाल हो जाएगा। तो नामवर जी का इस तरह से साठवाँ वर्षगाँठ हमलोगों ने मनाया। जो 1 मई को पड़ती थी, वह मुझे सौभाग्य है अपने निवास पर मनाने का। तो इस तरह से नामवर जी बहुत ही, जिससे भी परिचित है, या जो भी कोई अपरिचित होते हुए पहली बार मिले, वह लगता है ऐसा कि वह युगों-युगों से परिचित है।
मैं साहित्य के सन्दर्भ में ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहूँगा। जाहिर है कि जहाँ तक साहित्य की आलोचना का सवाल है तो नामवर जी उसके पर्याय के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत होते हैं। लेकिन यह सब कुछ नामवर जी को बड़ी आसानी से नहीं मिला, यह जो उनका व्यक्तित्व या उनका यह जो विद्वता का रूप है, बहुत संघर्षों से वह भी गुजरें हैं। शायद इस पक्ष को बहुत कम लोग जानते हों, आपके बीच में नई जनरेशन के लोग हैं। मुझे मालूम है कि 1957-1958 में जब नामवर जी बनारस यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे, हिन्दी विभाग में, एक विचित्र कमीशन बैठाया गया यूनिवर्सिटी में। 'मुदालियर कमीशन के नाम जाना था, और उस कमीशन को जिम्मेदारी यह सौंपी गई थी कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का स्तर गिरता जा रहा है, दिन-पर-दिन तो उसके लिए वह उपाए सुझाएँ, कि क्यों ऐसा हो रहा है। 'मुदालियर कमीशन' के बैकग्राउंड के बारे में मैं बता दूँ कि वहाँ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दक्षिण भारतीय प्रोफेसरों का बोलबाला था उस समय। उसका कारण यह था कि बाकि दिनों में कुछ वाइसचांसलर वहाँ दक्षिण भारतीय थे, मुझे कहना नहीं चाहिए लेकिन बड़े पैमाने पर वहाँ दक्षिण भारतीय थे, उनके कॉन्फिडेंस पर कमेंट कर रहा हूँ, वे बड़े योग्य लोग थे लेकिन उस समय द्रविड़ आन्दोलन की शुरुआत हुई, होने लगी थी। दक्षिण भारत में तो हिन्दी विरोधी एक भावना दक्षिण भारतीय लोगों के बीच में उस समय ज्यादा होती थी। तो बहुत ही अरुचिकर लगा जानकर के कि 'मुदालियर कमीशन' ने जो रिर्पोट दी उसमें यह कहा गया कि कुछ पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रोफेसर या अध्यापक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में आ गया हैं, जिनकी वजह से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एजुकेशन का जो स्टैण्डर्ड है, वह गिर गया है और उसके चलते वहाँ पर वेणीशंकर झा, जो गुजरात के थे, वहाँ पर वाइस चान्सलर थे और जैसा कि जिक्र हुआ कि प्रो. नामवर सिंह को उस समय वहाँ से निकाला गया था। हजारी प्रसाद द्विवेदी को निकाला गया था। इंजिनियरिंग कॉलेज वहाँ था, बाद में उसके डायेरक्टर हुए गोपाल त्रिपाठी, वह बहुत फेमस इंजीनियर थे, उनको निकाला गया और बहुत सारे करीब सौ लोगों को निकाला गया था और उसमें छात्रों की संख्या बहुत बड़ी थी। तो मैंने इसका उदाहरण इसलिए दिया, कि उसके कारण नामवर जी वर्षों तक एक तरह से बेरोजगारी का जीवन उन्होंने बिताया। और उसी बीच आलोचना जो जर्नल थी, वह नामवर जी के सम्पादन में निकलती रही और आलोचना ने अचानक पूरे देश में तहलका मचा दिया। इस तरह से नामवर जी हम सबके समक्ष एक आलोचक के रूप में पहली बार एक तरह से आलोचना के क्षेत्र में कोई व्यक्ति आया तो वह नामवर सिंह थे।
वही पर मैं यह भी कहना चाहूँगा कि जिन लोगों के कारण यह कहा गया कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का स्टैंडर्ड गिरता जा रहा है। यह बहुत ही गर्व की बात है कि वही नामवर सिंह, वही हजारी प्रसाद द्विवेदी या वही गोपाल त्रिपाठी या अन्य लोग, वह न सिर्फ भारत स्तर के थे, बल्कि विश्वस्तर के विद्वानों में आज गिने जाते हैं। यह बहुत गर्व की बात है तो इस तरह से कभी-कभी शिक्षा जगत में भी होता है।
यहाँ एक बात और कहना चाहूँगा कि पाण्डेय जी ने जिस तरह से कहा कि कैसे नामवर जी प्रमोट करते थे लोगों को, चाहे वह किताब पढ़ने या मैगजीन के पढ़ने के माध्यम से शब्दों के शब्दार्थ बताने से या जिस भी हिसाब से। मैंने यह देखा कि नामवर जी किसी को लिखने को कहते तो वह बहुत सोच-समझ कर कहा करते थे। कौन व्यक्ति किस पर क्या लिख सकता है। जाहिर वह उसके लिए मैटेरियल भी उपलब्ध कराते थे। सिर्फ एक उदाहरण मैं देना चाहूँगा कि कई साल पहले की बात है, मेरे ख्याल से 2002-2003 की। उसी समय की। रामविलास शर्मा के बारे में वह एक विशेषांक निकालना चाहते थे आलोचना में और रामविलास शर्मा की जो इतिहास दृष्टि थी, खासकर के बौद्ध दर्शन के बारे में, अम्बेडकर के बारे में, आर्यों के बारे में। एक दिन नामवर जी ने मुझे बुलाकर कहा कि इस पर आपको लिखना है तो मैंने कहा कि मैंने रामविलास शर्मा की एक-दो किताबों को छोड़कर कुछ पढ़ा नहीं है। भारत में अँग्रेजी राज जो वह पॉलिटिकल रेकगनाइज्ड थी या निराला पर जो कुछ लिखते थे वह, मैंने थोड़ा पढ़ा था। उन्होंने कहा नहीं आपसे जब भी हमारी चर्चा होती है, जिस तरह से बातें होती है, उससे लगता है कि इस विषय पर आप ही लिख सकते है। तो मैंने कहा, मेरे पास कोई किताब वगैरह है नहीं, जो रामविलास शर्मा को पढूँ। तो इन्होंने दूसरे-तीसरे ही दिन वह जो हिन्दी प्रदेश वाली, जो किताब थी, दो वॉल्यूम में, वह और अम्बेडकर लोहिया पर जो किताब थी वह, गाँधी अम्बेडकर लोहिया और नामवर जी ने रामकमल वालों से कहा कि आप तुरन्त उनके पास पहुँचा दीजिए। वह लेकर के मेरे पास आए। तो इस तरह से कोई भी चीज वह लिखने के लिए कहते हैं तो कितना अच्छा बन सके, तो उसके लिए मैटेरियल भी जुटाते हैं। बाद में वह लेख छपा। आप लोग जानते हैं उस लेख के बारे में कुछ कहना नहीं है। तो जहाँ तक आलोचना का क्षेत्र है। मैं नामवर जी को जिस तरह से जो स्थान अमेरिका में नाम चॉम्स्की का है, मैं समझता हूँ कि पूरे एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका को अगर उसमें समेटूं तो नामवर जी जो हैं, इन तीनों महाद्वीपों के नॉम चॉम्स्की हैं।
एक और बात अगर नामवर जी को सिर्फ हिन्दी साहित्य से जोड़कर देखा जाय तो यह अनुचित होगा। ये जो तमाम भारतीय साहित्याकार हैं, उसके तमाम महान लेखक भी हैं, लगभग सबकी रचनाओं को नामवर जी अच्छी तरह से पढ़े हैं। उस पर बहुत ही ऑथिरीटी के साथ कमेन्ट भी करते हैं। मुझे जानकर हैरत हुई, कुछ साल पहले कि बात है कि उड़िया लेखक फकीर मोहन सेनापति के बारे में, एक बार आईआईपीएम के प्रोफेसर हैं राधाकान्त द्वारी यहाँ आए हुए थे। बात चल रही थी कुछ लिटेरचर पर ही, तो उन्होंने अचानक मुझे बताया कि फकीर मोहन सेनापति उड़िया के बहुत बड़े लेखक हैं। उनके बारें में कि वह कैसे लेखक हैं, खुद उड़िया के लोगों को भी नहीं पता था। तो उन्होंने उदाहरण दिया कि करीब 15-20 साल पहले किसी जर्नल में नामवर जी का एक-दो-तीन पेज का लेख फकीर मोहन के बारे में लिखा था और उन्होंने आज भी जो है, उड़िया साहित्य फकीर मोहन के ऊपर जो कमेंटरी है, उसमें वह कॉमा फुल स्टॉप है। तो इस तरह से वह कह रहे थे कि सब लोग उड़िया, जितने भी स्कॉलर्स है वह नामवर जी के दो-तीन पेज का जो लेख जिनमें उन्होंने आलोचना प्रस्तुत की मोहन सेनापति की तो वही लोग उदाहरण देते हैं, उसी को कोट करते हैं।
इतना ही नहीं बांग्ला लिटेरेचर पर, मैंने सुना है खुद। जब नामवर जी का साथ होता है, चाहे वह साथ में बैठे हों, या यात्रा कर रहे हों, पूरी यात्रा में, संयोग से बहुत बार सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि नामवर जी के साथ मैंने कई यात्राएँ की है। पूरी यात्रा एक तरह से सेमिनार में बदल जाती है। जिस तरह से वह बातें करते हैं, वह सीखने लायक होती है। कई बार यात्राओं में उनसे सीखने का मौका मिला मुझे। एक यात्रा मैं नहीं भूलता हूँ, वह है गोरखपुर की। प्रेमचन्द की एक सौ पन्द्रहवीं जयन्ती थी। नब्बे के दशक में, हम लोग साथ ही यहाँ से गए थे। और जाहिर है कि गोरखपुर दिल्ली से काफी दूरी पर है। चौदह-पन्द्रह घण्टे की यात्रा होती है। देर रात तक प्रेमचन्द पर डॉ. साहब जो थे, वह मुझसे पूछते रहे कि आपके क्या विचार हैं। कहानी को लेकर चर्चा करते थे। उपन्यासों के बारे में चर्चा करते थे। और खुद ही बताते थे कि मेरा यह कहना, मेरा यह कहना है। उस समय हिन्दी क्षेत्र में नया-नया दलित साहित्य जो है सामने आ रहा था। एक-दो-तीन दलित साहित्यकार ऐसे थे जो खासकर के दलित लेखक थे, उनके ऊपर गम्भीर टिप्पणी, गम्भीर ही नहीं कहूँ बल्कि उसके खिलाफ टिप्पणी कर रहे थे और वह उस समय काफी चर्चा का विषय था। नामवर जी को, चूँकि उद्घाटन करना था वहाँ पर गोरखपुर में उसी सत्र में मुझे भी बोलना था। ‘कफ़न’ कहानी को लेकर के काफी चर्चा हो रही थी, उस समय दलित साहित्य में, और आरोप भी लगाए जा रहे थे उस वक्त, कि दलित विरोधी है। उन्होंने मेरी राय जाननी चाही, यद्यपि उनके सामने मैं साहित्य में क्या ठहरता हूँ, कुछ नहीं। लेकिन नामवर जी का यह एक डेमोक्रेटिक करेक्टर कहूँगा, विद्वता के क्षेत्र में, कि वह छोटे-से-छोटे व्यक्ति की भी राय को महत्त्व देते हैं।
‘कफन’ पर मैंने यही कहा था कि 'मेरा एक ऑब्जरवेशन यह है कि वह घीसू जो है, कफन को बेचकर जो शराब पीता है, यह मेरे गले उतरता नहीं है। दलित अपने को भूखा रहकर के अपने बच्चों को खिलाता है। उसका ट्रेडिशनल विहेवियर दलित का जो है वह यही रहा है। लेकिन इसमें जो चमत्कारिक करेक्टर प्रस्तुत किया गया है कि कफन का पैसा बेचकर के वह शराब पीता है, फिर नाचता है और फिर नाचते-नाचते गिर जाता है। तो मैंने यही कहा की वह मेरी एक उक्ति थी जिसको बाद में बहुत लोगों ने उस पर चर्चा भी की। मैंने कहा कि प्रेमचन्द ने दलित कैरेक्टर का ‘लंफगीकरण’ किया है, ‘लुम्पेनाइजेशन।'
मुझे हैरत हुई, जब नामवर जी वहाँ बोल रहे थे, गोरखपुर में, तो सारा साहित्य प्रेमचन्द का उन्होंने समेटा लेकिन कफन का जिक्र नहीं किया। तो नामवर जी का तो डेमोक्रेटिक करेक्टर की बात है, जो मैं कह रहा हूँ, नामवर जी ऐसे व्यक्ति हैं कि छोटे-छोटे व्यक्ति की ओपिनियन को ध्यान में रखते हैं और जिसका सोशल रिलेवेन्स होता है। अगर कोई बात सोशली अप्रिय है, को शायद नामवर जी, एक ऐसे व्यक्ति हैं, कि वह उसको अवॉइड करते हैं सिर्फ कन्ट्रोवर्सी को रोकने के लिए। यद्यपि उसी सेमिनार में कुछ दलित साहित्यकारों ने ‘वरबली’ गाली-गलौज किया। गाली तक दिया। बहुत भद्दे शब्द इस्तेमाल किए।
मैं एक और उदाहरण देना चाहूँगा कि जो नामवर जी में ग्राह्य करने का पावर है, जो आत्मसात कर लेते हैं किसी चीज को उलट-पुलट के, या थोड़ी-सी भी उसके बारे में जानकारी हो तो उसके रूट में चले जाते हैं। एक बार मण्डी में प्रगतिशील लेखक का सम्मेलन हो रहा था, करीब तीन सौ लेखक आए थे। मुझे हैरत हुई कि उस समय भी नामवर जी प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष थे और इन्होंने मुझे चुना उसका उद्घाटन भाषण देने के लिए। और उस समय साहित्य की जो थीम थी, उस सम्मेलन की, वह थी, ‘फासिज्म या फाँसीवाद और साहित्य’। उस सम्मेलन में नामवर जी जब समापन कर रहे थे, एक कोई किताब किसी महिला ने कविता की, किताब नामवर जी को दी थी और दो-चार मिनट तक उन्होंने किताब को उलटा-पलटा और जो एक कैच प्वाइंट होता है नामवर जी में, वह एक ऐसी बात कह देते हैं कि जिससे लगता है कि पूरा का पूरा वह बैकग्राउंड जो साहित्य का होता है, वह कैसे सामने आ जाता है। भाषण में जब वह बोल रहे थे, उस किताब में एक कविता का शीर्षक था ‘सुन्दर लड़कियाँ’। नामवर जी वह शीर्षक पढ़े शायद उस कविता को भी पढ़े होंगे, उस किताब में। उसी मंच से वह प्रस्तुत की गई थी, जिस पर हम लोग बोल रहे थे। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि यह किताब मुझे अभी मिली, मैंने उलटा-पलटा तो देखा, उससे मुझे अन्दाजा लगा की हिमाचल से ज्यादा सुन्दर लड़कियाँ कहाँ मिलेंगी। इस पर पूरा ठहाका हॉल में लगा। और इस तरह से जैसे लगा नामवर जी उसी पाँच-दस मिनट के अन्दर कैसे उस किताब को आत्मसात कर गए थे।
ऐसे ही बहुत सारी चीजें हैं, जो नामवर जी के बारे में कहने को। क्या छोड़ा जाए, क्या न छोड़ा जाए। ये बड़ा मुश्किल होता है। लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से नामवर जी को द्रोणाचार्य इसलिए भी कहता हूँ कि वह सही मायने में मेरे लिए गुरु का काम करते हैं। और मैं हिन्दी साहित्य का व्यक्ति नहीं हूँ, लेकिन फिर भी वह इतना महत्त्व मुझे तो देते हैं हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में और जब कोई नई बात आती है, तो वह कैसे कागज निकालकर उस पर नोट करते हैं। मैं कई जगहों पर उनके साथ गया हूँ। अहमदाबाद मैं गया था। गोदर गाँव, बिहार के एक गाँव में प्रगतिशील लेखक संघ का सम्मेलन हुआ था। लखनऊ में था और कई जगहों पर। लेकिन एक बात मैं बताना चाहूँगा आज लोगों को कि मैनेजर पाण्डेय बता रहे थे, नामवर जी कितने बड़े विद्वान होते हुए भी सहज पुरुष हैं और किस तरह से वह महत्त्व देते है, दूसरे के ओपिनियन को।
खालसा गर्ल्स कॉलेज दिल्ली में एक सेमिनार बुलाया गया था और जो दलित साहित्य के बारे था। नामवर जी के ही आग्रह पर मैं उसमें हिस्सा लेने गया था, तो वह साहित्य के सन्दर्भ में सेक्युलरिज्म के बारे में एक उद्धरण था, गौतम बुद्ध का, उसको ही कहकर मैंने अपना लेक्चर खत्म किया था। एक 'अलगद्धपम सूत्र' है। अलगद्ध कहते है, साँप को। तो बुद्ध ने उस सूत्र में यह बताया कि जिस तरह से धर्म के बारे में खासकर के कि धर्म का गलत इस्तेमाल करिए तो उसका कुपरिणाम होता है तो उसी को मैंने कोट किया, बुद्ध ने कहा कि 'धर्म को बहुत सतर्कता से इस्तेमाल करना चाहिए। उसी सन्दर्भ में उन्होंने कहा अपने शिष्यों से की जैसे चतुर सँपेरा ‘आकुशी’ लेकर साँप को जब पकड़ना चाहता है तो सबसे पहले गर्दन पर रस्सी लगाता है, और गर्दन से पकड़ता है। फिर साँप भले ही पूरे शरीर को लपेट ले लेकिन वह कोई नुकसान नहीं कर पाता है। लेकिन वही सँपेरा साँप को पूँछ की तरफ से पकड़े तो सबसे पहले साँप उसी को काटता है। और उसकी मृत्यु हो जाती है। इसी तरह से धर्म है। उसको सीधे नहीं पकड़ कर कोई उल्टे पकड़ेगा तो समाज को बहुत नुकसान पहुँचाएगा।' मैं अपनी बात कहकर के चला आया। नामवर जी ने तुरन्त मुझसे पूछा कि यह सूत्र कहाँ है जल्दी मुझे बताइए, तो मैंने कहा इस मैगजीन में लिखा है। कागज लेकर उन्होंने नोट किया। तो मैंने कई बार यह देखा है नामवर जी को ऐसे करते हुए कि छोटा से छोटा व्यक्ति भी अगर उसके मुँह से अच्छी बात निकलती है तो उसे करने में जरा भी हिचकते नहीं हैं। यहाँ बहुत लोग हैं जो अपने को बड़ा विद्वान समझकर के ऐसा करने पर, समझते हैं कि इससे उनकी तौहीन होगी। तो, नामवर जी इन सब चीजों से बहुत ऊपर उठ गए हैं। इसीलिए हम सभी सम्मान करते हैं।
जब यहाँ पर कैम्पस में वह रहते थे तो अक्सर घूमते हुए मेरे घर पर चले आते थे। मेरी भी बहुत बड़ी लायब्रेरी थी, सबसे पहले वह लायब्रेरी में ढूढ़ते थे कि नई किताब कौन है, और फिर उसके बारे में यह पूछते थे इस किताब में क्या लिखा गया है, कैसा है, और इस तरह से उन्होंने वह मिड 80 का जो दशक था, उस समय ढेर सारी चर्चाएँ दलित साहित्य के बारे में वह किया करते थे। अम्बेडकर के बारे में किया करते थे, और जब अम्बेडकर के बारे में कई चीजें मैंने बतायी तो वह इतना खुश हुए कि मुझे उन्होंने कहा कि आप अम्बेडकर की जितनी भी रचनाएँ छपी हैं, वह लाकर के मुझे दीजिए। तो मैंने उनको बताया कि महाराष्ट्र गर्वमेंट उनके कम्पलीट वर्क को छाप रही है। फिर तुरन्त उन्होंने दुकान का नाम पूछा कि कहाँ से मिलेगी। और वह तुरन्त उसे मँगाए।
इस तरह से मैंने देखा कि सिर्फ वह किताबें मैनेजर पाण्डेय को देते नहीं थे, बल्कि किताबें लेते भी थे नामवर जी। तो विद्वता की या ज्ञान की जो पिपासा थी, वह नामवर जी में आज भी निरन्तर जारी है। (‘मेरे लिए नामवर जी’ सं. रामबक्ष जाट, पुस्तक से साभार।)
तुलसीराम
(जे एन यू दिल्ली में प्रोफेसर रहे और दलित साहित्य का बड़ा नाम हैं, दलित साहित्य में हिंदी आत्मकथाओं में बहुपठित 'मुर्दहिया' और 'मणिकर्णिका' के लेखक के तौर पर हम उन्हें ज्यादा जानते हैं. आप अब स्मृति-शेष हैं. उन पर बुद्ध, मार्क्स और अम्बेडकर का गहरा प्रभाव था)
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय, कंचनलता यादव एवं संजय साव



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