संस्मरण : मेरे लिए नामवर जी / मैनेजर पाण्डेय

मेरे लिए नामवर जी
- मैनेजर पाण्डेय

नामवर जी हिंदी साहित्य में दुविधा की तरह हैं और वे दुविधा पैदा भी करते हैं। जिसका सीधा संबंध उनके जन्मदिन से है। हम लोग दशकों तक यह जानते थे कि वे एक मई को पैदा हुए हैं। यह हुआ था या नहीं पर मैं मान कर चलता था। जैसा कि निराला जी अपने को मान कर चलते थे कि वे बसंत पंचमी को पैदा हुए थे। कोई उनका जीवनी-लेखक अब तक नहीं बता पाया कि वे कब पैदा हुए थे। उसी तरह नामवर जी जिन कारणों से अपने को एक मई का पैदा हुआ मानकर चलते थे आप अनुमान कर सकते हैं। मैं उसके बारे में बात नहीं करूंगा। अब वह बात महत्वहीन हो गई है तो नामवर जी 28 जुलाई को पैदा हो गए। यह दुविधा है।

इनसे मेरी पहली मुलाकात काशीनाथ सिंह के घर पर पिछली सदी के साठ के दशक के लगभग अंत (67-68) में हुई। काशी से हमलोगों की आत्मीयता थी। जब नामवर जी आते थे तो काशी बताते थे। उस बार उन्होंने कहा भैया आ रहें हैं और एक गोष्ठी भी है। आप उसमें जरूर आइए। मैं गया, हुआ यह कि उसमें विजय मोहन जी भी थे और कई थे। विजय मोहन जी ने बोलते हुए, अचानक एक पत्रिका जो कि इंग्लैंड से निकलती थी 'इनकाउंटर' नाम से, बड़ी प्रसिद्ध पत्रिका थी, उसका हवाला देते हुए बात कही, जो कुछ उनको कहना था वो कह चुके थे फिर हमने कहा कि बात 'इनकाउंटर' के हवाले से कहने का क्या अर्थ है। कुछ हिंदी में भी किसी ने कुछ कहा है कि जो कुछ है सब 'इनकाउंटर' और 'टाइम्स' मैग्जीन में ही है। अच्छा बनारस के लोगों की आदत ही यही है। शिवप्रसाद सिंह ने लालबहादुर जी के प्रधानमंत्री होने पर एक लेख लिखा तो हवाला दिया, कि टाइम्स मैग्जीन में यह छपा था कि हिंदुस्तान में ऐसा होता है कि एक रास्ते से आप चले जा रहे हों और एक सांप और एक कायस्थ दोनों मिलें तो पहले कायस्थ को मारना चाहिए। तो मैं बहुत चकित हुआ कि जब कहावत हिंदुस्तान की है तो टाइम्स मैग्जीन को उद्धृत करने का क्या मतलब है? जब मैंने यह कहा तो अचानक नामवर जी ने मेरी तरफ ध्यान दिया कि विजयमोहन के इनकाउंटर का खंडन मैंने किया। फिर दो-एक बात उन्होंने की और गोष्ठी खत्म हो गई। फिर हमलोग हॉस्टल चले गए। मेरी ठीक से उनसे मुलाकात बाद में हुई। बीच-बीच में एक-दो गोष्ठियाँ बनारस में होती थी। वह बनारस के साहित्यिक माहौल के विनाश का दौर था। इसीलिए अंत में गोष्ठियाँ भी कम हो गई थीं।

नामवर जी जोधपुर विश्वविद्यालय पहुँच चुके थे। मेरा भी appointment वहाँ हो गया था। पर मैं बरेली में था। बरेली का एक कॉलेज था, मैं उसमें था और ऐसा संतुष्ट था कि नामवर जी ने दो-तीन बार मुझसे कहा कि जल्दी वहाँ आ जाइए। फिर भी मैं नहीं जा सका। मैंने एक चि‌ट्ठी उनको लिखी, उसमें क्या लिखा था वह सब तो याद है पर बदले में उन्होंने जो चिट्ठी लिखी उसकी एक बात मुझे याद है। मैंने उसमें कुछ लिखा होगा बनारस से अपने लगाव के बारे में तो नामवर जी ने जो चिट्ठी लिखी उसमें गालिब को उद्धृत किया और कहा कि ‘जब मय-कदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की क़ैद / मस्जिद हो मदरसा हो कोई ख़ानक़ाह हो'। उन्होंने कहा कि भई कौन बनारस नहीं रहना चाहता था। मैं नहीं रहना चाहता था, कि केदार नहीं रहना चाहते थे, और एक-दो जोड़े, आप भी उसी में से हैं। असल में मैंने अपनी चिट्ठी में लिखा था कि बनारस से थोड़ी दूर पर है बरेली और बहुत दूर है जोधपुर, इसीलिए जोधपुर जाने की ज्यादा इच्छा नहीं थी। तो उसी के जवाब में उन्होंने वह चिट्ठी लिखी थी। खैर! नामवर जी के कारण मैं जोधपुर गया। यह इसलिए कह रहा हूँ कि बहुत कम ऐसा होता है। Appointment हुआ था अक्टूबर-नवंबर में और ज्वाइन किया मैंने अगले साल जुलाई में। उस समय वी.वी. जॉन से उनकी बहुत आत्मीयता थी, उन्होंने कहा कि आप एक्सटेंशन की चिंता मत कीजिए। मैं यह कर लूँगा। आपको जब सुविधा हो तो आइए। हम यहाँ अकेले हैं। गया मैं और हम लोग तीन साल वहाँ साथ रहे। फिर डॉक्टर साहब आ गए जे.एन.यू.। जे.एन.यू.भी वे मुझे जबरदस्ती ले आए क्योंकि मेरे कुछ व्यक्तिगत कारण थे जिस कारण से मैं जोधपुर से नहीं आना चाहता था। मैं आ गया यहाँ। अब आपको यह बताऊँ जोधपुर के प्रसंग की बात कि नामवर जी जिनसे आत्मीयता महसूस करते हैं उनको पढ़ने-लिखने में किस तरह मदद करते हैं। जिसका एक उदाहरण जोधपुर का दूँगा और एक-दो जे.एन.यू. का।

जिन दिनों नामवर जी जोधपुर में थे उन्हीं दिनों मैंने साहित्य के इतिहास दर्शन पर कुछ लेख लिखे जो आलोचना में छपे। हमारे सामने बड़ी समस्या यह होती थी कि इन सब विषयों पर हिंदी में तो बहुत कम सोचा विचारा गया था। जो था सब अंग्रेजी में और यूरोपीय साहित्य में। हम लोगों के लिए और मैं जानता हूँ आपके लिए भी यह फ्रांसीसी नाम, जर्मन नाम, इनका उच्चारण एक टेढ़ी समस्या थी। तो मैंने नामवर जी से कहा कि डॉ. सहब मैं कैसे इनका नाम लिखूँ, मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है। तो इन्होंने कहा कि एक काम कीजिए, किसी का नाम देकर उद्धरण देना है तो उसका नाम आप रोमन लिपि में लिख दीजिए। मैं जहाँ हूँ, मतलब जे.एन.यू. में, वहाँ विभिन्न भाषाओं के लोग हैं। उनकी मदद से सही-सही जो उच्चारण होगा वह पता करके मैं आपके लेख में डाल दूँगा। मेरे उन चार-पाँच लेखों एवं पूरी किताब में विदेशी लेखकों के नाम हैं, जैसे रोमन याकोब्सन, जिस तरह से लिखा जाता है उस तरह से याकोब्सन नहीं होता, हम लोग जाकोब्सन पढ़ते हैं। अनेक नाम ऐसे हैं। तो नामवर जी ने इस तरह से मेरे लिखने की प्रक्रिया में मदद की। दूसरी बात यह थी कि जोधपुर विश्वविद्यालय में दो लोग ऐसे थे जो किताबों, पत्र-पत्रिकाओं के परम प्रेमी थे। एक तो स्वयं वाइस चांसलर वी.वी जॉन। नामवर जी इसके गवाह हैं कि जोधपुर में जॉन साहब के कारण यूरोप और अमेरिका की पत्रिकाएँ आती थीं। साहित्यिक, सौंदर्यशास्त्र, समाजशास्त्र से सम्बन्धित, उनमें से बहुत सारी पत्रिकाएँ आज भी जे.एन.यू. की लाइब्रेरी में नहीं हैं। नामवर जी तो हर दूसरे दिन लाइब्रेरी जाते थे, जो पत्रिका ये इशु करवा के ले जाते और जब लौटाते थे, तो मैं इशु करवाता था। एक तरह से क्या पढ़ना चाहिए और क्या नहीं पढ़ना चाहिए इसमें नामवर जी ने मेरा मार्ग दर्शन किया। इसीलिए ऐसे बहुत सारे विषयों पर मैंने काम किया और लिखा जिन पर हिंदी में कम काम हुआ है। पर उसका अधिकांश श्रेय नामवर जी के मार्गदर्शन को है।

नामवर जी को एक और सुविधा थी, वी.वी. जॉन ने इनसे कह रखा था कि जो किताबें तुम्हें पसंद हों वे स्वयं ले आओ और लाइब्रेरी को सौंप दो। अच्छा ये करते क्या थे, इनकी आदत बहुत पुरानी है। ये दिल्ली से किताबें खरीद कर ले जाते। पहले खुद पढ़ते फिर इसके बाद लाइब्रेरी को सौंपते थे, और जब उसमें प्रक्रिया पूरी हो जाती थी, तब हम लोगों के समाने आती थी। दूसरा उनका जो हमारे ऊपर आभार है वह यह कि जो अच्छी किताबें थीं, मेरी दिलचस्पी भी उसी में थी जिनमें इनकी थी, मतलब मार्क्सवाद, मार्क्सवादी आलोचना आदि-आदि से सम्बन्धित जो नामवर जी पढ़ चुके होते थे, वे मुझे भी बताते थे कि ये किताब जरूर पढ़िए, जो लाइब्रेरी में उपलब्ध है- मैं ही ले आया हूँ। फिर इसके बाद से जॉन साहब ने जोधपुर में एक और सुविधा तैयार की। विश्वविद्यालय की एक बुक-शॉप खोल दी। उसके लिए भी किताबें नामवर जी खरीद कर ले आते थे दिल्ली से और उस प्रसंग में भी मुझे बताते थे कि अमुक-अमुक किताबें आई हैं, उनमें से दो तीन-तीन बहुत अच्छी हैं। इच्छा हो तो आप जाकर वहाँ से खरीद लीजिए। इस तरह से नामवर जी ने मेरे पढ़ने-लिखने का मार्गदर्शन किया।

जब मैं जे.एन.यू. में आया तो एक प्रक्रिया इन्होंने अपनाई। प्रक्रिया यह थी कि हमारा जे.एन.यू. का कोर्स इनका बनाया हुआ था। इसमें चार-पाँच एम. ए. और एम.फिल्. में पेपर ऐसे थे जो अधिकांशतः व्याख्यात्मक थे। साहित्य का समाजशास्त्र, साहित्य का इतिहास दर्शन आलोचना एक पेपर था-मार्कसिस्ट अप्रोच टू लिटरेचर। दूसरा था फॉर्मलिस्ट अप्रोच टू लिटरेचर। होता यह था कि प्रायः इन प्रश्न-पत्रों में से तीन मैं पढ़ाता था और दो ये पढ़ाते थे। नामवर जी ने एक ऐसा अद्भुत काम किया जो मेरे लिए परम लाभदायक सिद्ध हुआ। हर दो साल पर यह कहते थे कि पाण्डेय जी यह कोर्स पढ़ाते-पढ़ाते मैं बहुत ऊब गया हूँ। अब इन दोनों को जो मैं पढ़ाता था वह आप पढ़ाइए और आप जो पढ़ाते थे वह मैं पढ़ाऊँगा। इससे मेरी सारी तैयारी उनके माध्यम से हुई। जितने कोर्स थे यहाँ और उसमें कोई ऐसा कोर्स नहीं था। जो नामवर जी पढ़ा नहीं सकते थे और इन्हीं की इस प्रक्रिया के मारे मैं भी वो सब पढ़ने-पढ़ाने लायक बना। एक बात आपसे कहूँगा कि अगर आदमी में आत्मविश्वास हो तो वह ज्ञान के मामले में किसी को छोटा नहीं समझता और आत्मविश्वास का अभाव है तो किसी मतलब का नहीं समझता! जब नामवर जी मुझसे प्रश्न-पत्र पढ़ाने के लिए लेते थे तो पूछते थे कि पाण्डेय जी इस पेपर से सम्बन्धित पत्रिकाओं में कितने लेख छपे, जो आपने पढ़े। किताबें कौन-कौन सी नई आई हैं। अब इससे किसी सपने में भी मेरे मन में यह भ्रम नहीं हुआ कि नामवर जी जानते नहीं हैं। ये इनका आत्मविश्वास था और यह साथ ही हिम्मत भी दिलाते थे कि आप भी पूछिए मुझसे तो मैं भी पूछता था इनसे कि कौन-सी पत्रिका में कौन से लेख छपे थे और कौन सी किताबें इस बीच में पढ़ी हैं आपने। मैं आजकल जब अपने इस भारतीय भाषा केन्द्र को देखता हूँ, संयोगवश जिसमें से एक-दो को छोड़ दें तो अधिकांश हमारे छात्र ही हैं, पर इनकी क्या मजाल कि कोई एक-दूसरे से पूछे कि जब आप इसको पढ़ा रहे थे तो कौन-कौन-सी किताबें पढ़कर पढ़ा रहे थे। क्यों नहीं पूछते ये, वे ही बेहतर जानते होंगे।

यही नहीं नामवर जी भाषा कैसे ठीक करते थे? शुरु-शुरू के दिनों में हम लोगों पर जयशंकर प्रसाद, रामचंद्र शुक्ल आदि की भाषा का खराब असर था। तो एक बार नामवर जी को एक लेख लिखकर मैंने दिया, आलोचना के लिए। नामवर जी ने लेख पढ़ लिया और दूसरे दिन मुझसे बोले कि पाण्डेय जी उसमें थोड़ी भाषा-संबंधी समस्या है। मैं आपको लौटा रहा हूँ। ठीक करके दीजिए। देखा हमने कि कुछ चिन्ह तो कहीं लगाया नहीं हैं, तो हमने कहा कि डॉ. साहब क्या समस्या है? बोले – ‘कई वाक्य ऐसे हैं जो एक ही वाक्य में मौलवी साहब अपनी दाढ़ी फटकार रहें हैं और पंडित जी अपनी चुटिया हिला रहें हैं।’ मतलब कठिन संस्कृत के भी शब्द हैं और कठिन अरबी-फारसी के भी शब्द हैं। ऐसी भाषा नहीं चलती, दोनों में एक संतुलन हो और अरबी फारसी के केवल वे शब्द हिंदी में चलें जो प्रचलन में हों और संस्कृत के शब्दकोष से शब्द निकाल कर न लेख लिखने चाहिए, न भाषण लिखने (देने) चाहिए। यह पद्धति थी नामवर जी की। अपने से छोटे अपने प्रिय और आत्मीय लोगों को सिखाते थे और इस प्रक्रिया से मैंने बहुत कुछ सीखा। जो कुछ abcd आज मैं हूँ, उसे बनाने में या आप अनुमदि दें तो ‘मुझे बिगाड़ने’ में नामवर जी का जो योगदान है, वह मैं इस जीवन में कभी भी नहीं भूल सकता।


मैनेजर पाण्डेय

(प्रसिद्द आलोचक और विद्वान जो अपने लिखे के लिहाज से हमेशा हमारे बीच उपस्थित हैं. बरेली, जोधपुर और दिल्ली में वर्षों तक प्रोफेसर रहे हैं. कई पुस्तकें और कई सम्मान आपके नाम हैं. )

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( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय, कंचनलता यादव एवं संजय साव

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