शोध आलेख : जालिम में थी इक और बात इसके सिवा भी / हरिशंकर परसाई

जालिम में थी इक और बात इसके सिवा भी 
-हरिशंकर परसाई


नामवर सिंह ने रेणु की 'परती-परिकथा' का खास नोटिस नहीं लिया। शिवदान सिंह चौहान उस पर 50-60 पृष्ठ लिखकर आए हैं।

लो, नामवर ने निर्मल वर्मा की 'परिदे' को हिंदी की पहली नई कहानी कहा है।

इसकी प्रतिक्रिया कमलेश्वर पर क्या है ? 'नई कहानी' आंदोलन के तीन-तिलंगों में सबसे 'स्मार्ट' कमलेश्वर हैं।

लो, नामवर ने उषा प्रियंवदा की 'वापसी' कहानी की बहुत तारीफ कर दी।

परिमलियों की बड़ी दुर्गति नामवर ने की।

'नई कविता' पर 'ज्ञानोदय' में नामवर बहुत अच्छा लिख रहे हैं।

अरे, अभी तो हाशिए पर हैं, जैसे अज्ञेय 'हरी घास पर क्षण भर' हैं।

नामवर सिंह हिंदी विभागों पर कब्जा किए हैं।

बड़ी महत्वपूर्ण बात कही है, नामवर ने प्रेमचंद श्रेष्ठ लेखक ही नहीं, सावधान लेखक भी थे।

अज्ञेय का पुनर्मूल्यांकन अच्छा किया है, नामवर ने।

भाई, नामवर 'ट्रेंड सेटर' हैं। प्रामाणिक बात नामवर कहते हैं।

चलता है, 'डिप्लोमेसी' भी तो कोई चीज़ है।

इस मुद्दे पर नामवर क्या कहते हैं ?

उस मुद्दे पर नामवर की बात पर ध्यान दो।

नामवर का मन्तव्य तो आ जाने दो। जल्दी क्या है।

नामवर जहाँ बिठाएँगे, वहाँ लेखक बैठ जाएगा। यह भी कोई बात है।

'दूसरी परंपरा की खोज' बहुत अच्छी है।

मगर दूसरी परंपरा की व्याख्या ठीक से नहीं कर सके हैं।

अब यह हिंदी-उर्दू का मामला उठा दिया।

नामवर 'कंट्रोवर्सी' खड़ी करते हैं।

ग़ाहित्य का कोई पक्ष हो, कोई मुद्दा हो, कोई प्रश्न हो, कोई विवाद हो, कोई उलझन हो, साहित्य के सरोकारी दो आलोचकों के मत का इंतज़ार करते हैं- डॉ. रामविलास शर्मा और नामवर सिंह। दोनों विवादास्पद हैं। दोनों का मत अंतिम, अकाट्य और विश्वसनीय चाहे न हो, पर यह जरूरी है कि दोनों के मत जाने जाएँ। यह कुछ मिली-भगत का मूल्य-साम्राज्यवाद है जो हिंदी में कई सालों से चल रहा है। जब मैं यह लिख रहा हूँ, तब मत-स्थापना के लिए दोनों साम्राज्यवादियों में विवाद चल रहा है।

नामवर सिंह सचमुच बहुत महत्वपूर्ण और दमदार समीक्षक तथा सिद्धांतशास्त्री हैं।

वे साठ वर्ष के हुए। मैंने उन्हें लिखा- लोग आपसे शतायु होने के लिए कह रहे होंगे, मगर मैं आपसे ऐसा नहीं कहता। मैं कहता हूँ कि आप जवान रहें और सक्रिय रहें।

सुन्न महल में दियना बार ले
आसन से मत डोल री
तोहे पिया मिलेंगे !

नामवर जी मेरे मित्र हैं, घनिष्ठ। मैं उनकी बहुत इज्जत करता हूँ। उन पर लिखने में हिचक रहा था कि कहीं मित्र के संबंध में 'हितोपदेश' के आदर्श का उल्लंघन न हो जाए।

बेतकल्लुफी की हद तक मेरे उनके संबंध हैं। मैंने 'राजकमल' से बाहर आकर कहा- चलिए ठाकुर साहब, पान सेवन कर लिया जावे। (बनारसी विद्वान खाते, पीते, चबाते नहीं, सेवन करते हैं) नामवर जी ने कहा- अगर आप मुझे ठाकुर कहेंगे, तो मैं आपको पंडित जी कहने लगूँगा। आप क्या बिगाड़ लेंगे। 'दूसरी परंपरा की खोज' पढ़कर मैंने उन्हें लिखा- मैंने 'दूसरी परंपरा की खोज' पढ़ डाली। मैंने जान-बूझकर मत नहीं दिया। तारीफ नहीं की। बनारसी ठाकुर उस्ताद हैं, चालाक हैं, चुस्त हैं, जवाब दिया- 'आपने दूसरी परंपरा की खोज पढ़ ली, यही क्या कम है।' मैं इसी सतर्कता की

आशा कर रहा था। मैं गद्गद उद्वेलित व्यक्ति नहीं है। मैं 'धन्य-धन्य' वाला नहीं है। काफी लोग नाराज भी हैं। मैं आम तौर पर मत देता ही नहीं। पर नामवर जी को और क्या चाहिए ? मेरी 'रचनावली' में पुस्तक पढ़ते हुए जो मेरा चित्र है, उसमें मेरे हाथ में जो पुस्तक है वह है- 'दूसरी परंपरा की खोज'।

नामवर जी से मेरी पहली भेंट 1957 में इलाहाबाद में हुई। वहाँ 'साहित्यकार सम्मेलन' आयोजित था। इसमें बिखरे हुए प्रगतिशीलों को एकत्र करने की कोशिश की गई थी। यह जवाबी सम्मेलन था। थोड़े समय पहले प्रयाग में ही अज्ञेय की प्रेरणा से 'परिमल' ने लेखक-सम्मेलन आयोजित किया था। वह जमाना 'लघुमानव' का और आस्थाहीनता का था। कुछ चलते-फिरते लेखक घोषित करते थे कि हम दो-तीन साल पहले मर चुके। उस सम्मेलन का उद्घाटन ताराशंकर बंद्योपाध्याय ने किया था। हमारे सम्मेलन का उद्घाटन पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया। द्विवेदी जी ने अत्यंत ओजस्वी भाषण दिया और 'लघु मानवों' को बहुत लताड़ा। उनके बाद डॉक्टर नामवर सिंह बोले। वे तब आज जैसे मोटे नहीं थे। दुर्बल भी नहीं। ऊँची कसी हुई काठी, लंबी नुकीली नाक, बड़ी-बड़ी भावपूर्ण आँखोंवाले तरुण थे वे। आँखों में शैतानी चमक तब भी आ जाती थी और आज भी आ जाती है। आँखों का उपयोग नामवर जी हथियार की तरह करते हैं। नामवर फार्म में थे। बहुत अच्छा बोले। आक्रामक बोले। तीखे तर्क, तेज भाषा और कटाक्ष। बाहर निकले तो साथ मुक्तिबोध भी थे। बहुत ठंड थी। हम ठेले पर चाय पीने लगे। मुक्तिबोध बहुत भावुक हो गए थे। बोले- पार्टनर, इन लोगों को ऐसा ही जवाब चाहिए था। वाह साहब, कमाल कर दिया। नामवर जी ने मुझसे कहा- आपका व्यंग्य चाहिए था। मैंने कहा- वह काम भी आपने कर दिया।

उस सम्मेलन में अंतरंगता आ गई। नामवर जी में विद्वता के साथ ही विलक्षण विनोद और व्यंग्य-क्षमता है। बनारसी लहजे में, पान-तमाखू भरे मुँह से वे जब आँखों में शैतानी चमक लाते तो सामनेवाला धराशायी हो जाता। वे व्याज-स्तुति और व्याज-निंदा के भी उस्ताद हैं। प्रयाग में 3-4 दिन खूब महफिलें जमीं, अक्सर बहादुरगंज में शमशेर बहादुर के रँडुवे कमरे पर।

फिर तो कई मुलाकातें हुईं। दिल्ली में, कलकत्ता में, भोपाल में, जबलपुर में

भी। दिल्ली में राजकमल प्रकाशन में उनके कमरे में जब घुसता तो पत्ते में लिपटा पान और तमाखू की डिबिया बढ़ाकर कहते- पहले पान-तमाखू यथास्थान जमा लीजिए। फिर बातें होंगी। भोपाल में 3 सेमिनारों में हम साथ थे। दिल्ली में ऐवाने-गालिब में प्रगतिशील लेखक संघ का जलसा था। मेरे बगल में मेरे मित्र बैठे थे। वे बैग रखकर कहीं चले गए थे। नामवर जी आए। वे मेरी बगल में बैठना चाहते थे। बैग देखकर बोले- अरे, कोई यहाँ बैठा है। मैंने कहा- आप कहें तो उसे उठा दूँ। नामवर ने अपनी विशिष्ट शैली मैं कहा- अरे, आप तो किसी को भी उखाड़ने को तैयार रहते हैं। और आगे बढ़ गए।

नामवर जी विद्वान हैं- साहित्य, राजनीति, इतिहास, समाजशास्त्र के। वे बहुत प्रभावी वक्ता हैं। शैली मोहक और आत्मविश्वासपूर्ण है। उनकी भाषण-शैली का एक तत्व है, जिसे अंग्रेजी में 'एनिमेशन' कहते हैं, जिसके कारण वे विषयांतर भी कर बैठते हैं। 'विट' उनका मित्र भी है और शत्रु भी।

नामवर क्यों महत्वपूर्ण हैं ? नामवर सिंह उनमें प्रमुख हैं, जिन्होंने आजादी के बाद के साहित्य को जिस दलदल में फँसा दिया गया था, उससे निकाला था। देश स्वाधीन हुआ था। ताजा उल्लास था। निर्माण का जोश होना था। मगर हिंदी साहित्य में जो 'फैशन' आ गया था, वह मुर्दा था। घोर अनास्था, निराशा, निष्क्रियता, मृत्यु-बोध, नियतिवाद ! भारत ने दूसरा महायुद्ध नहीं भोगा था। युद्ध का विनाश नहीं झेला था। जब यूरोप में महानाश हो रहा था, तब भारत में उल्लास से स्वाधीनता संग्राम चल रहा था। हम साम्राज्यवाद से लड़ रहे थे। फिर 1947 में स्वतंत्र हुए। दूसरे महायुद्ध के बाद पश्चिमी पूँजीवादी देशों के साहित्य में हताशा, विनाश, मृत्यु, मनुष्यता का नकार, जीवन की निरर्थकता, सबकुछ था। पर रूस के साहित्य में विजय का हर्ष और पुनर्निर्माण का उत्साह था। भारत में 4-5 सालों में देशी सरकार से कुछ मोह-भंग तो हुआ था, पर नव-स्वाधीन देश में हताशा नहीं थी। यह हताशा, यह पराजय-भावना एक तो आयातित थी, दूसरे, जल्दबाजी भी थी, तीसरे राजनीति प्रेरित थी। इसके पीछे 'कांग्रेस फॉर फ्रीडम ऑफ कल्चर !' और 'मारल रिआर्मामेंट' थे। जवाहरलाल के तेवर वामपंथी थे। वे समाजवाद की बात करते थे, 'वैज्ञानिक समाजवाद' की। रूस से संबंध बढ़ रहे थे। ऐसे में पूँजीवादी हितों की रक्षा के लिए वही टूटा हुआ आदमी साहित्य में जरूरी था, जो पश्चिमी पूँजीवादी देशों में था। यथार्थ को समझने, उसका सामना करने और संघर्ष करनेवाला आदमी नहीं चाहिए था। इस मूल्य-पद्धति के पुरोधा थे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'यज्ञेय' और उनके परिमलीय चेले।

नामवर सिंह ने इस मूल्य-पद्धति को चुनौती दी। प्रगतिवादी आंदोलन जड़वादी दुराग्रहों में फैसकर, कुल-युद्ध से टूटकर बिखर गया था। 'नया पथ' भी मारकाट के बाद बंद हो गया था। नामवर सिंह ने इस केंचुआ मूल्य-पद्धति से लड़ाई की और एक पीड़ित, शोषित मगर संघर्षशील और आशावान भारतीय मनुष्य की मूल्य-चेतना साहित्य को दी। यह बड़ा काम था। नामवर सिंह के साथ और आलोचक भी उठे और 'परिमलीय' धारा विलुप्त हो गई।

नामवर सिंह की समीक्षा तथा सैद्धांतिक व्याख्या में रचनात्मक साहित्य जैसा लालित्य है। लगता है, कोई ललित गद्य पढ़ रहे हैं। आम तौर पर समीक्षा की भाषा शुष्क और उबाऊ होती है, पर नामवर जी की भाषा और शैली बहुत प्रभावी है। सहज ढलान है उनके लेखन में ! सीढ़ियाँ चढ़ना या उतरना नहीं पड़ता। वे मुहावरों का अच्छा प्रयोग करते हैं। संबोधन-पद्धति से तर्क को जीवंत बनाते हैं। उनकी भाषा में विलक्षण 'लुसीडिटी' है। कटाक्ष है, व्यंग्योक्ति है, वक्रोक्ति है, व्याज-स्तुति और व्याज-निंदा है, और 'विट' है।

नामवर साठ के हुए। वे सतर्क हैं, जागरूक हैं। अभी तक उनके सामने यह चुनौती है-
हरित भूमि तृण संकुल सूझ परहिं नहिं पंथ। जिमि पाषंड विवाद तें लुप्त होहिं सग्रंथ।।
- तुलसीदास

(हरिशंकर परसाई की संस्मरण पुस्तक ‘जाने -पहचाने लोग’ से साभार )

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