शोध आलेख : नामवर सिंह का काव्यभाषा चिंतन / प्रीति मौर्या

नामवर सिंह का काव्यभाषा चिंतन
- प्रीति मौर्या

काव्य को समझने के लिए चिरकाल से नए-नए सिद्धांत और दृष्टि का गठन होता रहा है। प्राचीन काल में शब्द और अर्थ का सहभाव ही काव्य था। हिंदी साहित्य में भक्तिकाल, छायावाद, प्रगतिवाद, इत्यादि युग को देखा जाए तो वहाँ काव्य के मूल्यांकन का आधार भाव था; परंतु रीतिकाल पर भाषा शैली का प्रभाव मुख्य रूप से दिखाई देता है। पाश्चात्य में भाषा को आधार बनाकर काव्य मूल्यांकन की एक विस्तृत परम्परा देखी जा सकती है। यह परम्परा विलियम वर्ड्सवर्थ, आई. ए. रिचर्ड्स से होते हुए उत्तर संरचनावाद तक आती है। काव्यभाषा को मोटे तौर पर देखा जाए तो इसका तात्पर्य काव्य अर्थात् कविता की भाषा से है। नामवर सिंह एक मार्क्सवादी आलोचक हैं। उन्होंने छायावाद, नई कविता इत्यादि पर अपनी आलोचनात्मक दृष्टि प्रस्तुत की है। काव्यभाषा चिन्तन का प्रश्न छठे दशक में तेज़ी से उभरा। काव्यभाषा को कभी रूपवाद से जोड़कर देखा गया, तो कभी काव्य का बाहरी आवरण मानकर उसे नकार दिया गया। छठे दशक में महत्वपूर्ण बहसों जैसे- लघुमानव, लेखक की ईमानदारी का प्रश्न, वास्तविकता, बिम्ब, सामाजिक-दायित्व, संप्रेषणीयता, लेखक की वैयक्तिकता और उसकी निर्वैयक्तिकता इत्यादि के बीच काव्यभाषा मुख्य रूप से दिखाई देता है। काव्यभाषा का यह प्रश्न हिंदी साहित्य में प्रयोगवादी कवियों के द्वारा केंद्र में आया। नए कवि अपनी भावना की अभिव्यक्ति के लिए ‘नए राहों के अन्वेषी’ बने हुए थे। जिससे काव्य के अभिव्यक्ति पक्ष पर ज्यादा ज़ोर दिया गया। नया कवि लय, छंद, संगीत इत्यादि के सहारे कविता में उतरना चाहता है। किसी भी कविता को समझने के लिए उसकी काव्यभाषा महत्वपूर्ण है; क्योंकि जब तक हम किसी काव्य की भाषा को नहीं समझेंगे तब तक हम उसके अर्थ तक नहीं पहुँच सकते। काव्यभाषा के द्वारा ही हम मूल विषयवस्तु तक पहुँच सकते हैं। केवल काव्यभाषा ही नहीं बल्कि विषयवस्तु भी उसके केन्द्रीय भाव तक पहुंचने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। नामवर सिंह तत्कालीन बहसों पर विचार करते हुए काव्यभाषा सम्बंधी अपने मत प्रस्तुत करते हैं।

मोटे तौर पर देखा जाए तो काव्यभाषा का तात्पर्य कविता की भाषा से है। काव्यभाषा, बोलचाल की भाषा से कोई दूर की बात नहीं है और न ही गद्य की भाषा से। काव्यभाषा से इनका अंतर केवल इनकी प्रयोग-विधि का है। काव्य में चित्रित बिम्ब से है। जैसा कि ‘हिंदी साहित्य कोश भाग – 1’ में कहा गयाा है - “गद्य और कविता के बीच अंतर मात्र शब्द समूह का न होकर भाषा प्रयोग- विधि का होता है”।1 कवियों द्वारा बोलचाल की ही भाषा का सृजन किया जाता है; जिससे वह साहित्यिक भाषा की संज्ञा प्राप्त करता है या कहें कि वहीं काव्यभाषा कहलाता है। बोलचाल की भाषा में व्यक्तित्व शून्य होता है, जबकि काव्यभाषा में कवि व्यक्तित्व को उद्भावित करता है। कवि शब्दों के साथ खेलता है। शब्द से अनेक अर्थ संपृक्त होते हैं; परंतु कवि अपनी सृजन के द्वारा उसे विशिष्ट अर्थ प्रदान करता है; उसमें नए अर्थ का संकेत होता है, वह एक नए संदर्भ से जुड़ती हुई दिखाई देती है। अब प्रश्न यह उठता है कि समकालीन काव्य तो गद्य के अत्यधिक निकट है। शब्द भी वैसे ही हैं। तो समकालीन काव्य गद्य से किस प्रकार भिन्न है? गद्य की भाषा और काव्य की भाषा में अंतर केवल उसकी प्रयोग-विधि और नाटकीयता का ही होता है। ‘हिंदी साहित्य कोश भाग – 1’ में कहा गया है – “गद्य और कविता की भाषा में अंतर शब्दों के प्रयोग विधि को लेकर है, अन्यथा शब्द तो दोनों में लगभग एक से होते हैं। शब्द प्रयोग-विधि के संदर्भ में इतना कहना उचित होगा कि काव्यभाषा में निहित नाटकीयता गद्य को कविता से जोड़ती है। खासतौर से समसमायिक कविता में, जहाँ शब्दावली, लय यहाँ तक कि वाक्य की संयोजन बहुत कुछ, कभी- कभी तो एकदम गद्य के ढंग की होती है, नाटकीयता ही वह तत्व रह जाता है, जो कविता की भाषा का रूप बनाता है”।2

हिंदी साहित्य में काव्यभाषा का प्रश्न छठे दशक में तेज़ी से उभरता हुआ दिखाई देता है। काल , वातावरण और परिस्थिति बदलने के कारण रचनाकार की अनुभूति और अभिव्यक्ति में भी परिवर्तन आता है। शुक्ल जी के शब्दो में कहें तो “प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है”।3

नया कवि अपने नए अनुभव और उनकी जटिलता की अभिव्यक्ति के लिए शब्द प्रयोग प्रारंभ करता है। भाषा के माध्यम से नए बिम्ब और छंद गढ़ता है। ताकि वह उस वास्तविकता को - जिसे उसने अनुभव किया है - को अभिव्यक्त कर सके। कथ्य की वैयक्तिकता, निर्वैयक्तिकता अनुभव की वास्तविकता, ईमानदारी इत्यादि बिन्दुओं के मध्य टकराहट उत्पन्न हुई। इस द्वंद्व और परिस्थिति की अभिव्यक्ति भाषा के साथ तादात्म्य स्थापित करके ही किया जा सकता था। जिसे परत–दर–परत खोलकर, उसकी लयात्मकता को समझकर उसके भाव तक पहुंचा जा सकता था। द्वितीय विश्वयुद्ध से आक्रांत जनता, आजादी के पूर्व देखे हुए सपनों का आजादी के बाद टूट जाना, शहरीकरण, इत्यादि की अभिव्यक्ति, शब्द को नए साँचे में ढालकर की जाने लगी ।

काव्यभाषा चिन्तन ‘तार सप्तक’ के प्रकाशन से ही तेज़ी से देखी जा सकती है। इन कवियों को प्रयोगधर्मी कहा गया। यह अभिव्यक्ति के लिए नई ‘राहों के अन्वेषी’ हुए। काव्य को समझने के लिए। ‘पोएम्स ऑन द पेज’, की बात की जाने लगी। अज्ञेय ‘तार सप्तक’ के कवि वक्तव्य में कहते हैं – “काव्य सबसे पहले शब्द है और सबसे अंत में भी यही बात बच जाती है की काव्य शब्द है”।4 किसी भी काव्य के कथ्य, अन्तर्भाव तक पहुंचने के लिए उसकी भाषा का सहारा लेना पड़ता है। क्योंकि एक ही विषयवस्तु पर अनेक रचनाएँ की जा रही हैं। तो कौन- सी कृति कितनी महान है इसका निर्धारण उनकी काव्यभाषा और उसमें उपस्थित बिम्ब के आधार पर किया जा सकता है। कमलेश वर्मा ‘नागार्जुन की काव्यभाषा’ नामक पुस्तक में कहते हैं - “कविता की भाषिक बनावट की उपेक्षा करके केवल अर्थ तथा विषयवस्तु पर बात करना पर्याप्त नहीं है। एक ही विषय पर अनेक कवियों ने लिखा है, मगर उन कवियों के महत्त्व का निर्धारण भाषिक बनावट के आधार पर अंततः किया जाता है”।5

छठा दशक बहसों का दौर रहा है। काव्य क्या है, काव्य का स्वरूप क्या है, यह नई कविता क्या है, यह पूर्ववर्ती कविताओं से किस प्रकार भिन्न हैं? काव्य के मूल्यांकन का आधार क्या हो? इस प्रकार के विभिन्न प्रश्नों में डॉ. जगदीश गुप्त, डॉक्टर नगेंद्र, अज्ञेय, विजयदेव नारायण साही, लक्ष्मीकांत वर्मा, नामवर सिंह आदि जैसे कई बड़े-बड़े आलोचक हिस्सा बनें। नयी कविता और पूर्ववर्ती कविता में अन्तर क्या है, इस बात को कुछ आलोचक समझ रहे थे, परंतु उसे व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करने में चूक कर जा रहे थे। इसके उदाहरण स्वरूप नामवर सिंह, डॉ जगदीश गुप्त के इस वक्तव्य को प्रस्तुत करते हैं - “कविता सहज आंतरिक से युक्त अनुभूतिजन्य सघन लयात्मक शब्दार्थ है, जिसमें सह-अनुभूति उत्पन्न करने की यथेष्ट क्षमता निहित रहती है”।6 नामवर सिंह इस कथन पर कहते हैं कि जगदीश गुप्त ‘नई कविता’ में नया काव्य क्या है - इस पर विचार करते हैं, परन्तु वह जो नया है जो सर्जनात्मकता की ओर संकेत करता है। उसे अपनी इस व्यावहारिक परिभाषा में प्रस्तुत करने में चूक कर जाते हैं। नयी कविता में यह नया ही सृजनात्मक है। वह केवल भाव पर ज़ोर देते हैं। उनकी सर्जनात्मकता पीछे छूट जाती है।

काव्य की विषय वस्तु, उसकी बनावट, उसके कहने का ढंग निरंतर परिवर्तित होती आ रही थी। फिर ऐसा क्या हुआ की छठे दशक की कविता को नयी कविता कहने की आवश्यकता पड़ी। काव्यभाषा पर गौर किया जाए तो काव्यभाषा केवल भाषा नहीं है। इसके अंतर्गत समाहित है, इस लय , छंद ,शब्द, अर्थ, वाक्य, बिंब इत्यादि। जैसा कि डॉक्टर महेंद्र मधुकर ‘काव्य-भाषा के सिद्धांत’ में कहते भी हैं – “काव्यभाषा के रागात्मक, संश्लेषणात्मक, सर्जनात्मक और आलंकारिक स्वरूप प्रतिपादन के साथ उसके उत्पादन तत्वों – शब्द, अर्थ, वाक्य, कल्पना, प्रतीक, पुरावृत्त या मिथक, लय, छंद, संगीत, शब्द-चयन एवं शब्द-प्रयोग, अलंकार, मुहावरे और लोकोक्ति का विवेचन हुआ है”।7 आइ.ए. रिचर्ड्स की भाषा में कहा जाए तो काव्यभाषा एक सर्जनात्मक भाषा होती है। वह एक रागात्मक बोध है।

नए कवियों का मानना है कि हमारा कथ्य, हमारे भाव, हमारे राग, प्रेम, घृणा, ईर्ष्या सब वही है, बस बदला है तो उसका बाहरी कलेवर। अगर कवि उसके साथ तादात्म्य नहीं स्थापित करें तो उसका बाह्य वास्तविकता से संबंध टूट जाता है। नामवर सिंह काव्य को समूचे सन्दर्भ में देखने के आग्रही हैं। वह बाहरी कलेवर भी तो अनुभव क्षेत्र के परिवर्तन के कारण ही बदला होगा। इसलिए ‘कविता के नए प्रतिमान’ गढ़े गए। अतः ‘नई कविता के प्रतिमान’ की जगह ‘कविता के नए प्रतिमान’ को समझने की आवश्यकता है। वह विजयदेव नारायण साही की इस बात से सहमति व्यक्त करते हैं – “नई कविता की बहसों में यह मान्यता अंतर्भूक्त रही है कि न सिर्फ कविता का उपरी कलेवर बदला है, या नए प्रतीकों या बिम्बों या शब्दावली की तलाश हुई है, बल्कि गहरे स्तर पर काव्य अनुभूति की बनावट में ही परिवर्तन आ गया है। लेकिन बहस में इस पर कम बल दिया गया है”।8

काव्य या कहें कि किसी रचना में विचार ही होते हैं, जिसमें शब्दों का सार्थक प्रयोग होता है, जिसे किसी भाषा के प्रणाली में अभिव्यक्त किया जाता है। नामवर सिंह छठे दशक की काव्यभाषा पर चिन्तन करते हुए रघुवीर सहाय की पुस्तक ‘सीढ़ियों पर धूप में’ की अज्ञेय द्वारा लिखी गयी भूमिका को एक आधार के रुप में व्यक्त करते हैं - “काव्य के जो भी गुण बताए जाते हैं या बताए जा सकते हैं, अंततोगत्वा भाषा ही के गुण हैं”।9 इसी कड़ी में अज्ञेय के तार सप्तक के एक कथन को उद्धृत करते हैं – “काव्य सबसे पहले शब्द है और सबसे अंत में भी यही बात बची जाती है कि काव्य शब्द है”।10 पूर्ववर्ती काव्य को केवल भाव के ही स्तर पर परखा जाता था। भाषा या कला पक्ष को अंत में बस ज़रा - सा जिक्र करके छोड़ दिया जाता था। भाषा की इस प्रकार की उपेक्षा को नयी कविता के सन्दर्भ में नकार दिया गया। नामवर सिंह कहते हैं – “नई कविता के उदय के साथ जब पुनः कविता की रचना में ‘वागार्थ–प्रतिपत्ति’ की स्थापना की गयी तो स्वभावत: काव्य–समीक्षा में भी उसका प्रतिकलन दिखायी पड़ा। और पूर्ववर्ती आलोचना की त्रुटि का परिहार करते हुए काव्यभाषा को पुनः मूल्यांकन के मूलाधार के रूप में प्रतिष्ठित करने के प्रयास शुरू हुए”।11 नामवर सिंह रामस्वरुप चतुर्वेदी के काव्यभाषा सम्बन्धी दृष्टि पर कटाक्ष करते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी काव्य मूल्यांकन के लिए पहले जितने तत्व अपनाएं जाते थे जैसे – तुक, छंद, अलंकरण और रस ( शायद) – को नकार कर केवल काव्यभाषा को काव्य मूल्यांकन का महत्वपूर्ण आधार मानते हैं। रामस्वरूप चतुर्वेदी कहते हैं- “ आज की कविता को जाँचने के लिए जो अब सचमुच ‘प्रास के रजत पाश’से मुक्त हो चुकी है, अलंकारों की उपयोगिता अस्वीकार कर चुकी है और छंदों की पायलें उतार चुकी है, काव्यभाषा का प्रतिमान शेष रह गया है”।12 इस पर नामवर सिंह यह प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या इससे पूर्ववर्ती काव्य में काव्यभाषा न थी? वह कहते हैं – “स्पष्ट है कि डॉ रामस्वरूप चतुर्वेदी छन्द, अलंकार रस आदि को प्राचीन ‘काव्य-भाषा’ को समझने का शास्त्री उपकरण न मानकर काव्य-भाषा का वास्तविक अंग मानते हैं। इसलिए वे कवियों की भाषा में यह कहते हुए पाए जाते हैं कि आज की कविता सचमुच ‘प्रास के रजत पाश’ से मुक्त हो चुकी है।… क्या नई कविता के संदर्भ में यह छायावादी वाक्य आकस्मिक है? छायावादी कवियों ने यदि आचार्यों की अवधारणा को स्वयं प्राचीन कवियों की काव्य-भाषा के तत्व मान कर उनके विरुद्ध इस प्रकार के ‘काव्यात्मक’ उद्गार व्यक्त किए, तो बात समझ में आती है। किंतु नए काव्य बोध के आलोक में भाषा प्रयोग-विधि के प्रतिमान लेकर मैदान में आनेवाला कोई आलोचक यदि उन्हीं बातों को दोहराएँ तो यह भाषा-स्खलन विचार-स्खलन का वाचक हो जाता है। गुण, अलंकार आदि काव्यभाषा के वास्तविक अंग नहीं बल्कि विश्लेषण की सुविधा के लिए कल्पित विभाग हैं”।13

जो काव्य जिस युग में लिखा गया है, उस काव्य पर उस युग का प्रभाव अवश्य रहेगा। काव्य के मूल्यांकन में उस वातावरण के प्रभाव का मूल्यांकन भी ज़रूरी है। प्राचीन काल में भी काव्य की एक अपनी भाषा थी। उसे देखने, अभिव्यक्त करने में उस युग का प्रभाव होता है। हो सकता है कि सन्दर्भ बदल जाने से आज के कवि और आलोचक से इस बात की भूल हो सकती है। परंतु उस काव्य के मूल्यांकन के लिए उसे तिरस्कृत नहीं किया जा सकता। नामवर सिंह कहते हैं – “सन्दर्भ बदल जाने के कारण पूर्ववर्ती कवियों की ‘काव्य भाषा’ आज के कवि को अपनी सृजन के लिए अनुपयोगी लग सकती है, किंतु प्राचीन काव्य के लिए नए आलोचक को यदि प्राचीन काव्य का मूल्यांकन करना है तो उसे प्राचीन काव्य भाषा को तिरस्कृत करने का कोई हक़ नहीं, बल्कि उसे प्राचीन काव्य भाषा को समुचित संदर्भ के साथ आधार बनाना होगा”।14 इसलिए वह रामस्वरूप चतुर्वेदी के सन्दर्भ में कहते हैं कि उनके भाषा के प्रति इस प्रकार का दृष्टिकोण नयी कविता की किसी विशेष प्रकार की काव्यभाषा से हो जिस कारणवश उनका पूर्ववर्ती काव्य के प्रति यह नजरिया है। इसका कारण नामवर सिंह यह बताते हैं कि यह चित्त में ‘नयी कविता का प्रतिमान’ रखने की वजह से है। रामस्वरूप चतुर्वेदी काव्यभाषा को नयी कविता के सन्दर्भ में वस्तुनिष्ठ के रुप में देखते हैं। नामवर सिंह भाषा विचार क्रम में रामस्वरूप चतुर्वेदी की इस वस्तुनिष्ठता पर प्रश्न करते हैं। उनका मानना है कि इससे यह भाषा की वस्तुनिष्ठता नहीं होगी, काव्य कृति की भी होगी । जिसे अंग्रेजी आलोचक ‘Poem on the page’ कहते हैं, परन्तु नामवर सिंह का कहना है कि कितना भी कोई कृति वस्तुनिष्ठ क्यों न हो, उसमें सहृदयता तो शामिल हो ही जाती है, कविता सापेक्ष स्वतंत्र है और ये सापेक्षता की अनिवार्यता प्रत्येक मूल्यांकन की सीमा है। किसी आलोचक को किसी कृति का मूल्यांकन करते समय उसकी दृष्टि कैसी हो, वह कहते हैं – “आलोचक की वस्तुनिष्ठता इस बात में है कि वह किसी कृति के मूल्यांकन की प्रक्रिया में उसके रूप की जो पुनः सृष्टि अपने लिए करता है, वह यथासंभव अधिक से अधिक मूल कृति के निकट हो। इस प्रयास में एकमात्र अवलंब कविता की भाषा है”।15 अर्थात् काव्य के विषय में भले ही कितने संदर्भ क्यों न हो, परन्तु, काव्य कृति का मूल्यांकन कथ्य-कथन की संगति पर होना चाहिए। इसके लिए नामवर सिंह एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि काव्य की भाषा को ‘सुंदर’ कहकर कथ्य को ‘असुंदर’ कहना असंगत है। कथ्य को जानने के लिए कथन के अलावा ऐसा कोई साधन ही क्या है? कथ्य को मूल्यवान कहकर भाषा को सदोष या दुर्बल कहना एक बहुत बड़ी नासमझी है। रीतिकालीन कवि को कथ्य में कोई नवीनता नहीं दिखायी देती थी, जिस कारणवश वह शिल्प पर अत्यधिक जोर देते हुए दिखायी देते हैं। छायावादी कवियों के पास कथ्य में नवीनता थी। छायावादी काव्य में भाव पर अत्यधिक ज़ोर दिया गया, परंतु उनकी भाषा इतनी क्लिष्ट है कि उनके भाव तक पहुंचने के लिए उनकी भाषा को से होकर गुजरना ही पड़ेगा। परंतु उस समय की आलोचना में भावों को महत्त्व देकर भाषा बाद की बात हो गई थी। इसी बात की ओर इशारा करते हुए नामवर सिंह कहते हैं – “जब कविता के कथ्य की पूरी जानकारी कवि की आत्मचरित और उसके परिवेश में सुलभ है, तो काव्यभाषा पर नाहक सर मारने से मतलब? कविता के बाहर जाकर कविता की आलोचना करने का धड़का एक बार खुल गया तो फिर कविता की भाषा की ओर कौन देखता है”? इसी संदर्भ में, वह रघुवीर सहाय की एक कविता की कुछ पंक्ति प्रस्तुत करते हैं-

“बाहर जाते-जाते
अब तो यह मन खाली है
पर इसने तो जा जाकर
एक पगडंडी बना ली है है”।

“इस प्रकार कविता से बाहर जाने की जो पगडंडी छायावादी आलोचना में बनी वह नई कविता के आते आते राजमार्ग हो गई और आज कोई चाहे तो इसे ‘नेशनल हाईवे’ या ‘ग्रैंड ट्रक रोड’ भी कह सकता है”।16 इस तरह भाषा की उपेक्षा न केवल भाषा की है। बल्कि उस भावना भी है, जो कवि व्यक्त करना चाहता है। यह एक नैतिक विफलता का द्योतक है। इस विफलता को खत्म करने के लिए प्रयोगवादी कवियों ने काव्यभाषा को दोहरा साधन के रूप में प्रयुक्त किया - एक तो यह कि वह जो अभिव्यक्ति करना चाहते हैं उस सत्य को जानने के सन्दर्भ में और दूसरा उसकी अभिव्यक्ति के सन्दर्भ में। काव्यभाषा केवल एक साधन मात्र है। हम अपने अनुभवों को भाषा के द्वारा ही सम्प्रेषित करते हैं, इसलिए भाषा का क्षेत्र विस्तृत है। काव्यभाषा एक सर्जनात्मक वस्तु है, जो हमारे अनुभव सृजन और संप्रेषण के लिए आवश्यक है। नामवर सिंह लिखते हैं – “आलोचना के क्षेत्र में इससे एक निष्कर्ष यह निकला है कि यदि भाषा कवि के अनुभव और ज्ञान का साधन है, तो कविता की भाषा का विश्लेषण करके उसके अनुभव की शक्ति को मापा जा सकता है। इस सफाई के लिए कोई गुंजाइश नहीं रही कि कवि ने अनुभव तो बहुत किया किंतु भाषा की असमर्थता के कारण अपनी बात पूरी तरह कह नहीं पाया। यह सवाल उठेगा कि उसने बहुत अनुभव किया था। इसका प्रमाण क्या है? कथन के अतिरिक्त तथा कथित मूल्य अनुभव को जानने का साधन क्या है? अज्ञेय भी कहते हैं ‘कविता ही कवि परम वक्तव्य है”।17

कवि हमेशा नए शब्दों में नए अर्थ को भरने का प्रयास करता रहता है। यह सृजनात्मकता, कवि का एक प्रयोग, एक प्रकार खोज ही है। कवि अपनी अभिव्यक्ति के लिए हमेशा नए शब्द, नए अर्थ की तलाश करता है। जिससे यह सिद्ध होता है कि उसके पास एक ऐसा नया अनुभव है, एक ऐसी नयी बात है, जिसके लिए वह उपयुक्त शब्द की तलाश कर रहा है। यह शब्द का तलाश ही नए अनुभव खंड की तलाश है। नामवर सिंह कहते हैं कि किसी नए शब्दों के खोजने का अर्थ ही है, किसी नए अनुभव खंड अथवा वास्तविकता के किसी नए पहलुओं की खोज करना। जैसा विषय होता है वैसा भाषा सृजन करती है। वैसा ही लय विधान होता है। विचार व भाषा का अन्योन्याश्रित संबंध है। भाषा सामान्यतः बोलचाल की होती है, इसका प्रयोग उसको संदर्भित करता है कि वह काव्यभाषा है या गद्य की भाषा। नामवर सिंह काव्यभाषा व काव्याभास का भी ज़िक्र करते हैं। वह यह बताते हैं कि अगर किसी शब्द-समूह पर हमारी पकड़ ऐसी हो जाए कि वो सहज हमारे जिह्वा पर हो, अनायास ही हमारी रचना में आ जाए तो वह काव्यभाषा नहीं काव्याभास है। कुछ आलोचक भाषागत विशेषता को ही काव्य के मूल्यांकन का प्रमुख आधार मान लेते हैं। वह उसके अर्थ को उतना महत्व नहीं देते हैं। नामवर सिंह कहते हैं – “जागरूक समीक्षक शब्द के गिर्द बनने वाले समस्त अर्थवृत्तो तक फैलते जाने का विश्वास है। वह संदर्भ के अनुसार शब्दों में निहित अर्थपत्तियों को पकड़कर काव्यभाषा के आधार पर ही काव्य का पूर्ण मूल्यांकन कर सकता है। जिसमें उसका नैतिक मूल्यांकन भी निहित है”।18 उदाहरण के तौर पर नामवर सिंह छायावादी कवियों को लेते हैं। वह बताते हैं कि छायावादी कवियों को अकाल्पनिकता से जोड़ दिया गया। उनकी पकड़ को वास्तविक धरातल पर ढीली बतायी गयी, जिसको कवि के भावबोध की दुर्बलता बताया गया, विचारों का असामंजस्य कहा गया। कच्ची भावुकता वाला कवि भी कहा गया। अगर यही कसौटी नयी कविता पर लगाई जाती है तो धर्मवीर भारती की कुछ कविताओं पर भी कैशोर भावुकता का आक्षेप लगाया जा सकता है।

लय का महत्त्व अत्यधिक है, शब्द वही है, परंतु लय के द्वारा ही हम कथ्य को समझ सकते हैं। कभी-कभी साधारण से साधारण वाक्य का लय पकड़ आ जाने पर वह एक नए अर्थ की ओर संकेत करने लगता हैं। ये लय, बिम्ब इत्यादि भाव अभिव्यक्ति के लिए भाषा के अंग हैं। नामवर सिंह, विजयदेव नारायण साही के इस कथन से सहमति व्यक्त करते हैं – “आज के विशाल जीवन सागर के उतार-चढ़ाव को उसके प्रामाणिक अस्तित्व को बातचीत की लय के माध्यम से ही पकड़ा जा सकता है। उस लय की तलाश ही अभिव्यक्ति की तलाश है। उसी के लिए भाषा के गठन को , उसकी प्रतीक योजना को शब्दावली को बदलने की जरूरत पड़ी है।… सवाल यह है कि हम घनीभूत एकानता और फैलते हुए स्वर - संधान के द्वारा आधुनिक जीवन की इस नई गति से हिल्लोलित अबूझ सागर को अधिकृत करें या हताश शब्दावली और अस्फूट आह-आह के साथ किनारे छटपटाते रह जाए”।19 जीवन के स्पन्दन , उसकी धड़कन को समझने के लिए भाषा के अन्तर्भुक्त लय को पकड़ने की आवश्यकता है । अर्थात् भाषा की बोलचाल के साथ-साथ उसके लय को पकड़ना है, जिसमें यथार्थ है। जैसे शमशेर बहादुर सिंह के शब्दों में कहें तो लय के द्वारा हम काव्य के रस को शरीर से ‘निचोड़े हुए रक्त’ की तरह प्राप्त कर सकते हैं।

काव्यभाषा व सृजनशीलता अन्योन्याश्रित है। सृजन नयेपन का बोध कराता है। इस नएपन की अभिव्यक्ति जिसे जीवनाभिव्यक्ति कहते हैं, काव्यभाषा से ही समझा जा सकता है। इसी क्रम में नामवर सिंह मुक्तिबोध की काव्यभाषा पर दृष्टिपात करते हैं। वह कहते हैं कि इनकी काव्यभाषा काफी उबड़-खाबड़ है, परंतु इनके अंदर अत्यधिक गहराई है। यह गहराई और व्यापकता का प्रश्न उस दौर में काफी प्रचलित रहा है। व्यापकता और गहराई का यह प्रश्न काव्यवस्तु और उसकी काव्यभाषा पर ही निर्भर करती है।

भाषा साहित्य के अभिव्यक्ति का एकमात्र साधन है। कलात्मक सौंदर्य लाने के लिए भाषा पर अधिकार होना आवश्यक है। परंतु भाषा ही साध्य रहे, यह उचित नहीं है। नामवर सिंह भाषा को सबकुछ अर्थात् साध्य मानने के पक्ष में नहीं है। जो कवि या आलोचक भाषा पर ज़ोर देता है, वह कहीं न कहीं यह भूल करता है कि काव्य के अंतर्गत कितना ही भाषाई बनावट, अलंकारिकता क्यों न निहित हो, परंतु उसमें भाव भी है, भाव के द्वारा ही वह भाषा इस प्रकार से गढ़ी गई है। वह कहते हैं – “रूपवादी बहुत कुछ उस बतकहे की तरह है जिसमें बात करने का कौशल तो खूब हो, परंतु कहने के लिए कोई महत्वपूर्ण बात न हो”।20 अर्थात वह कहते हैं कि रूपवादी होने का मतलब यह नहीं कि उसमें भाषा ही सर्वथा निहित है। उसमें भाव भी अवश्य है। विषयवस्तु से काव्य सजीव हो उठती है। क्योंकि वह अपनी सामाजिक परिस्थितियों, मनुष्य की भावनाओं से जुड़े होते हैं। इसलिए नामवर सिंह प्रयोगवादी कवियों को इतिहास से सीखने की बात कहते हैं। साहित्य में विषय वस्तु पर ज़ोर देना आवश्यक है। सत्य यही विषयवस्तु ही है, इसी के कारण कलात्मक सौंदर्य का निर्माण होता है। साहित्यकार का वर्तमान, भविष्य और अतीत से गहरा सम्बंध होता है। वह उससे जितना अधिक तादात्म्य स्थापित करता है, उसकी भाषा में भी वह उत्कृष्टता दिखायी देती है। अभिव्यक्ति और अनुभूति दोनों का सामंजस्य किसी रचना को महान बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वह काव्य कितना वैयक्तिक, कितना निर्वैयक्तिक, कितना वास्तविक और कितनी ईमानदारी के साथ अभिव्यक्त किया गया है - वह उसके सन्दर्भ, उसकी भाषा, उसकी काव्यवस्तु पर निर्भर करता है। काव्यभाषा एक ऐसी वस्तु है, जो चमत्कार उत्पन्न करती है। काव्यभाषा गहराई में लेकर जाती है। वह शून्य में वहाँ तक लेकर जाती है, जहाँ मौन विस्तारित हो जाता है। वह हताशा का मौन नहीं और न ही पराजय का होता है। वह उस समय ऐसी मूक भाषा बन जाती है, जिसे केदारनाथ सिंह के शब्दों में कहा जाए तो जिह्वा पर नहीं बल्कि दांतों के बीच की जगहों में सटी हुई प्रतीत होती है। जो ज़बान तक आकर रूकी रहती है। उसे अभिव्यक्त करने के लिए बिम्ब की आवश्यकता होती है। ऐसी मौन वाली काव्यभाषा में खौफनाक ताकत होती है। वह मूक रहकर भी व्यक्त हो जाती है।

निष्कर्ष : नामवर सिंह काव्यभाषा को केंद्रीय महत्व नहीं देते हैं। वह संदर्भ को एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। नामवर सिंह बिम्ब के आग्रही नहीं है, क्योंकि इससे वास्तविकता तक पहुंचने में बाधा उत्पन्न होती है। काव्य को सपाट होना चाहिए। आलोचक को भी यह चाहिए कि वह भी काव्य का मूल्यांकन, रचनाकार क्या कहना चाहता है, उसका लय क्या है, उसका छंद क्या है, उसकी भाषा क्या है, उसे ध्यान में रखकर करे। तभी वह कथ्य तक पहुंचने में सफल हो सकेगा। कथ्य और कथन का संतुलित प्रयोग काव्य को महान बनाती है। यदि कथ्य सुन्दर हैं तो कथन की भंगिमा अवश्य उसके अनुरूप ही होगी। काव्यभाषा एक माध्यम मात्र है, वह साधन है। साध्य हो जाने से काव्य का विषय वस्तु खंडित हो जाएगा। काव्य का मूल्यांकन पूर्णतः संभव नहीं हो पाएगा। किसी भी रचना का मूल्यांकन उसके समूचे संदर्भ के रूप में करना चाहिए।

सन्दर्भ :
1. सम्पादक मण्डल – डॉक्टर धीरेंद्र वर्मा, डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा, श्री रामस्वरूप चतुर्वेदी, डॉक्टर रघुवंश (संयोजक), डॉक्टर धर्मवीर भारती, हिंदी साहित्य कोश भाग -1 - पारिभाषिक शब्दावली, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी, पुनर्मुद्रण – 2023, पृष्ठ संख्या 98.
2. वहीं.
3. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, साहित्य सेवा प्रकाशन, वाराणसी, छात्र संस्करण, पृष्ठ संख्या - xxviii.
4. संपादक – अज्ञेय, तार सप्तक, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 11वाँ संस्करण, 2014, पृष्ठ संख्या - 243.
5. कमलेश वर्मा, नागार्जुन की काव्यभाषा, अनन्य प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण 2024.
6. नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 21वाँ संस्करण – 2021, पृष्ठ संख्या – 17.
7. डॉ. महेंद्र मधुकर, काव्यभाषा के सिध्दांत, स्वराज प्रकाशन, दिल्ली संस्करण-2026, पृष्ठ संख्या- ix.
8. नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 21वाँ संस्करण – 2021, पृष्ठ संख्या – 27.
9. वहीं, पृष्ठ संख्या – 97.
10. वहीं.
11. वहीं.
12. वहीं, पृष्ठ संख्या – 98.
13. वहीं, पृष्ठ संख्या – 99.
14. वहीं, पृष्ठ संख्या – 100.
15. वहीं, पृष्ठ संख्या – 101 – 102.
16. वहीं, पृष्ठ संख्या – 104.
17. वहीं, पृष्ठ संख्या – 105.
18. वहीं, पृष्ठ संख्या – 109.
19. वहीं, पृष्ठ संख्या – 109 – 110.

प्रीति मौर्या
शोधार्थी: हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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