अपभ्रंश-हिंदी संबंध, पृथ्वीराज रासो और नामवर सिंह की इतिहास दृष्टि
- दलपत राजपुरोहित
‘पृथ्वीराज रासो’ को हिंदी का ‘महाभारत’ कहा जाता है। यह केवल इसीलिए नहीं कि इसमें बारहवीं सदी के “अंतिम हिंदू सम्राट” पृथ्वीराज चौहान (राज्यकाल 1178 – 1192 ई.)[i] तथा उसके मुहम्मद गौरी से हुए एक युगांतरकारी युद्ध व उसके बाद की घटनाओं—जिन्हें ‘पृथ्वीराज रासो’ में ‘बड़ी लड़ाई’ और ‘बानबेध’ कहा गया है—आदि का वर्णन है। बल्कि यह पृथ्वीराज चौहान से उत्तर भारत के अनेक राजवंशों के अपने संबंधों की भी विस्तृत गाथा है; ठीक वैसे ही जैसे ‘महाभारत’ तत्कालीन राजवंशों का आख्यान है। ‘पृथ्वीराज रासो’ में महाभारत के संदर्भों का भी बार-बार आना यह संकेत करता है कि यह ग्रंथ देशभाषा के बढ़ते हुए साहित्यिक परिवेश और मुग़लकाल में राजस्थान, उत्तर व मध्य-भारत में उच्च पद के आकांक्षी राजपूत राजाओं की महत्वाकांक्षा को दर्शाने वाला महाकाव्य भी था। यानी अकबर के काल में विकसित हो रही अपनी ‘राजपूत’ अस्मिता को गढ़ने वाले राजवंश जिनमें राठौड़, चौहान, बुंदेले, सोलंकी, तंवर, कछवाहा, भाटी, सिसोदिया, दायमा आदि कुल शामिल थे, अपने पूर्वजों को पृथ्वीराज चौहान से जोड़कर देखने में गर्व महसूस करते थे। यही वजह रही है कि सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में ‘पृथ्वीराज रासो’ की पाण्डुलिपियों का बढ़ाव होता जाता है। कविता के रूप में रासो का यह बढ़ाव भी बहुत कुछ महाभारत के विकास की तरह ही लगता है।
पृथ्वीराज चौहान से पहले-पहल अपना संबंध बूंदी, आमेर और बीकानेर के राजा जोड़ते हैं, क्योंकि पृथ्वीराज चौहान की विस्तृत कहानी, तथा ‘पृथ्वीराज रासो’ की प्राचीनतम पांडुलिपियाँ, और ब्रजभाषा के चरित काव्यों में चंद बरदाई का उल्लेख (जैसे आमेर के अमृतराय के ‘मानचरित’में) पहले इन्हीं रजवाड़ों में मिलता है। ऐतिहासिक रूप से बूंदी, आमेर और बीकानेर राजवंश मुग़ल बादशाह अकबर से जुड़ पहले ही गए थे और जुड़ने की इस प्रक्रिया में पृथ्वीराज चौहान की स्मृति को पुनर्जीवित करके ये रजवाड़े स्वयं अपने वंश का स्वर्णिम इतिहास दिखा रहे थे। इनकी मान्यता थी कि पृथ्वीराज चौहान दिल्ली पर राज करने वाला सम्राट था और उसके इतिहास में इन राजवंशों का अपना स्वर्णिम अतीत भी समाहित था। इनके बाद दूसरे राजपूत रजवाड़े भी ‘पृथ्वीराज रासो’ को लिखवाते हैं, जिससे एक काव्य के रूप में पृथ्वीराज चौहान संबंधी कविता की अनेक पांडुलिपियों या ‘प्रारूपों’ का विकास होता चला जाता है।
‘पृथ्वीराज रासो’ राजस्थान के अनेक राजवंशों द्वारा लिखवाया तो गया लेकिन हमारी स्मृति में और उत्तर भारत के साहित्यिक परिवेश में उस ‘पृथ्वीराज रासो’ की गहरी छाप है जो मेवाड़ में निर्मित हुआ। मेवाड़ से ही ‘पृथ्वीराज रासो’ की ‘वृहत्तम’ पांडुलिपियाँ प्राप्त होती हैं जो सत्रहवीं सदी में संग्रहीत हुईं थीं। इन्हीं वृहत्तम पांडुलिपियों को आधार बनाकर जेम्स टॉड राजपूताने का इतिहास लिखते हैं, व इन्हीं को आधार बनाकर बंगाल की ‘रॉयल एशियाटिक सोसायटी’ रासो का प्रकाशन शुरू करती है। मेवाड़ की इन्हीं वृहत्तम पाण्डुलिपियों को आधार बनाकर ‘नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी’ ने भी ‘पृथ्वीराज रासो’ का संपादन किया था। कुल मिलाकर रासो के मेवाड़ संस्करण की सर्वत्र ज़बरदस्त छाप रही है और इस संस्करण ने पृथ्वीराज को एक योद्धा व नायक के रूप में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय बनाया।
जब हम पृथ्वीराज चौहान की इतिहास में लोकप्रियता का ख़्याल करते हैं तो ‘द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ में हुआ एक उल्लेख याद आता है जिसमें जवाहरलाल नेहरू पृथ्वीराज को एक “हीरो” के रूप में याद करते हैं। नेहरू के अनुसार पृथ्वीराज ऐसा नायक था जो मुहम्मद गौरी से लड़ा और जिसकी प्रेमकहानी गीतों और ‘लेजेंड्स’ में प्रसिद्ध है।[ii] यानी नेहरू भारतीय इतिहास में पृथ्वीराज की एक नायक के रूप में लोकप्रियता को स्वीकार करते हैं और इशारा करते हैं गीतों, खासकर कविता में उस नायक की उपस्थिति की तरफ़। नेहरू की यही बात ‘पृथ्वीराज रासो’ कविता के महत्त्व को सामने लाती है क्योंकि इसी ग्रंथ में पृथ्वीराज की एक नायक वाली छवि [ज़ोर मेरा] उभरती है। ‘पृथ्वीराज रासो’ की पांडुलिपियों के बढ़ाव के साथ पृथ्वीराज की नायक वाली छवि का भी विस्तार होता चला जाता है। इस छवि में मुग़ल काल के अन्य राजपूत राजवंश भी अपनी तस्वीर भी देखते थे और पृथ्वीराज के साथ अपने पूर्वजों को जोड़ने में गर्व का अनुभव करते थे। ‘पृथ्वीराज रासो’ का लगातार लिखा जाना और उसके कलेवर में बढ़ाव होना इस ग्रंथ को पहले की संस्कृत और फ़ारसी की रचनाओं से अलग करता है।
पृथ्वीराज रासो: शोध, कविता का विकास, और इतिहास में स्थिति -
हिंदी साहित्य की सुदीर्घ परम्परा को खोजने व उसे प्रतिष्ठित करने का जो आख्यान आज़ादी से पहले रचा जा रहा था उसे भारत को आज़ादी मिलने और हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने के साथ ही नया बल मिला। हिंदी साहित्य के इतिहास को रचने के इस आख्यान का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय ‘पृथ्वीराज रासो’ को हिंदी के ‘महाकाव्य’ के रूप में प्रतिष्ठा दिलवाना भी था। इतिहासकारों के बीच ‘पृथ्वीराज रासो’ उन्नीसवीं सदी के अंत से अपनी प्रतिष्ठा खो चुका था। इसलिए इसके महत्त्व को सामने लाने में ज़ाहिर है ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ और हिंदी के आचार्यों जैसे माताप्रसाद दीक्षित, कविराव मोहनसिंह, माताप्रसाद गुप्त, हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह का बड़ा योगदान था। ‘पृथ्वीराज रासो’ वह ग्रंथ है जिससे नामवर सिंह आज़ादी के बाद के पूरे एक दशक तक जुड़े रहे। उन्होंने इसकी भाषा पर अपनी पीएचडी का शोधग्रंथ लिखा जो पहले ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ व बाद में ‘पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य’ नाम से प्रकाशित हुआ।[iii] इससे पहले ही 1952 ई. में वे ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’ लिख चुके थे।[iv] 1950 ई. के दशक में ही ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’ का प्रकाशन होता है।[v] यह वही दशक था जब हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने ‘बिहार राष्ट्रभाषा परिषद’ में अपने व्याख्यान भी दिए थे, जो 1952 ई. में ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’ नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित हुए थे। यानी अपने गुरु हजारी प्रसाद द्विवेदी के साथ नामवर सिंह शुरुआती हिंदी साहित्य जिसमें ‘पृथ्वीराज रासो’ ग्रंथ के बनने के इतिहास और इसकी भाषा पर लगतार चिंतन करते रहे। अपनी पीएचडी हेतु पुरानी पांडुलिपियों की खोज के लिए नामवर सिंह ने बीकानेर की यात्रा की।[vi] वे राजस्थान के अध्येताओं से गहरे में जुड़े रहे, जिससे ‘पृथ्वीराज रासो’ का वृहद अध्ययन सामने आया। आरंभिक आधुनिक काल में ‘पृथ्वीराज रासो’ की सैंकड़ों पांडुलिपियों के रूप में व्यापक उपस्थिति को देखकर ही नामवर सिंह ने हजारीप्रसाद द्विवेदी के साथ जब ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’ का संपादन किया तो “रास” और “रासो” शीर्षक वाले काव्यों के समग्र इतिहास को दर्शाते हुए उन्हें कहना पड़ा कि “काव्य-सौष्ठव की दृष्टि से इनमें से कोई ग्रंथ पृथ्वीराज रासो से तुलनीय नहीं हो सकता”[vii] तथा यह ग्रंथ [अर्थात् ‘पृथ्वीराज रासो’] “मानव जीवन की विविध परिस्थितियों और भावदशाओं का महासागर है। यही वह विशेषता है जिससे ह्रास युग के सभी काव्यों में [पृथ्वीराज] रासो को सर्वोपरि स्थान दिया है। निश्चय ही यह उस युग की सांस्कृतिक परिस्थितियों तथा पूर्व परम्पराओं का बृहद कोश और मध्ययुगीन भारतीय समाज का एक काव्यात्मक इतिहास है।”[viii]
ऐतिहासिक पृथ्वीराज चौहान व उसके चौहान पूर्वजों संबंधी तत्कालीन इतिहास बारहवीं सदी के अंतिम दशक में लिखे संस्कृत ग्रंथ ‘पृथ्वीराज विजय’ से आता है। इस ग्रंथ के अलावा कुछ स्तंभलेख और एक जैन संस्कृत रचना ‘खरतरगच्छ पट्टावली’ भी पृथ्वीराज चौहान से संबंधित समकालीन ऐतिहासिक जानकारी देती है। मानीखेज़ है कि ‘पृथ्वीराज विजय’ में पृथ्वीराज और मुहम्मद गौरी के बीच की अंतिम लड़ाई का उल्लेख नहीं है, न ही पृथ्वीराज और संयोगिता-विवाह का वर्णन। अर्थात जिन दो चीज़ों के लिए पृथ्वीराज आज प्रसिद्ध है उनका उल्लेख पृथ्वीराज चौहान के समकालीन ग्रंथ नहीं करते। तेरहवीं सदी में लिखे फ़ारसी ग्रंथ (जैसे ‘ताज अल-म’आसिर’ 1217 ई., व ‘तबक़ाते नासिरी’ 1260 ई.) में लेखक अपने आश्रयदाताओं अर्थात् दिल्ली के बादशाहों का नज़रिया रखते हैं, जिसमें दिल्ली को इस्लामी ताक़त का बड़ा केंद्र माना जाता है।[ix] इन ग्रंथों में भी पृथ्वीराज चौहान का वर्णन है। इन ग्रंथों का महत्त्व इतिहासलेखन के लिए तो ज़रूर है लेकिन इसके परे इनमें वह प्रक्रिया नहीं दिखाई जाती है जिसमें पृथ्वीराज एक राजपूत नायक के रूप में उभरता है। संस्कृत ग्रंथों में ज़रूर चौहान वंश, पृथ्वीराज के युद्धों व उसके शासन का वर्णन है लेकिन उनमें भी वह सांस्कृतिक अंतर्वस्तु नहीं है जो ‘पृथ्वीराज रासो’ में है: वह बात जो उसे मुग़लकाल में लगभग हर राजपूत रजवाड़े के लिए एक आवश्यक ग्रंथ बना देती है।
इतना तो सभी जानते हैं कि पृथ्वीराज रासो का जो रूप आज हमें उपलब्ध है वह किसी एक कवि की नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की सामूहिक रचना है। इसका प्रकाशन 1883 ई. से ही ‘रॉयल एशियाटिक सोसाइटी’, बंगाल से शुरू हो गया था और बाद में ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ के अलावा लाहौर, उदयपुर और चंडीगढ़ स्थित प्रकाशन भवनों से भी यह ग्रंथ प्रकाशित हुआ। विद्वानों ने इस ग्रंथ की पांडुलिपियों को उनके आकार के आधार पर चार वर्गों में रखा है: लघुतम, लघु, मध्यम और वृहद। लघुतम वर्ग की दो पांडुलिपियों में लगभग 400 छंद या 1300 पंक्तियाँ हैं, वहीं वृहद में लगभग 30,000 पंक्तियाँ। यानी अपने लघुतम रूप में जो रचना सन् 1600 ई. के आस पास कुछेक पृष्ठों की थी वह अठारहवीं सदी में अपने वृहद रूप को प्राप्त करते-करते कई गुना बड़ी हो गई।
उन्नीसवीं सदी से ही इतिहासकारों का ध्यान ‘पृथ्वीराज रासो’ के मूल रूप की खोज पर केंद्रित रहा है, और इसी आधार पर बाद में विकसित अंशों को प्रक्षिप्त माना गया। नामवर सिंह का ध्यान लेकिन ‘पृथ्वीराज रासो’ के चार रूपांतरणों के बनने के पीछे का इतिहास जानने की ओर ज़्यादा था। ‘पृथ्वीराज रासो’ के चार रूपान्तरों के निर्माण के बारे में नामवर सिंह द्वारा प्रस्तुत अवधारणा बहुत महत्त्व की है—विशेष रूप से यह विचार कि ‘पृथ्वीराज रासो’ कहानी तो बारहवीं सदी की कहता है लेकिन एक ग्रंथ के रूप में इसके विकास के पीछे उन राजपूत रियासतों का हाथ था जो सोलहवीं सदी के अंत से ही मुग़लों से जुड़ रही थीं। ये रजवाड़े अपने पूर्वजों को पृथ्वीराज से जोड़कर दिखाते हैं और अपनी समृद्ध ऐतिहासिक अस्मिता का निर्माण करते हैं। पृथ्वीराज चौहान का दिल्ली का सम्राट होना, जो रासो का मुख्य तर्क है, भी एक बड़ा कारण था जो उच्च पद की आकांक्षी राजपूत जातियों को उससे जुड़ने के लिए विशेष आकर्षित करता था। मुग़ल काल में सभी रजवाड़े पृथ्वीराज की कहानी में अपनी कहानी भी जोड़ते गए जिससे ‘पृथ्वीराज रासो’ का आकार बढ़ता गया। इस बात को पहचानना नामवर सिंह को अन्य विद्वानों से अलग करता है। और उनकी इसी इतिहास-दृष्टि को सामने लाना इस आलेख का उद्देश्य है।
अपभ्रंश ग्रंथ और हिन्दी साहित्य का विकास -
नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य का कोई स्वतंत्र इतिहास नहीं लिखा लेकिन अपभ्रंश काव्य, रासो कविता, छायावाद आदि आधुनिक कविता की प्रवृत्तियों, नई कहानी और नई कविता पर उन्होंने जो पुस्तकाकार अध्ययन किये उन सभी में उनकी इतिहास दृष्टि मुखर रूप से सामने आई। इतिहास को नामवर सिंह केवल “नवीन व्याख्याओं का उपयोग” भर नहीं मानते थे बल्कि इतिहास उनके लिए “स्वयं एक नई व्याख्या” थी।[x] उनके अनुसार इतिहास लिखने का कार्य वही व्यक्ति कर सकता है जो स्वयं इतिहास बनाने में योगदान देता है। इसलिए जो लोग समसामयिक समस्याओं से जूझ रहे होते हैं वे न चाहते हुए भी, नामवरसिंह के अनुसार, इतिहास निर्माण में योगदान दे रहे होते हैं। नामवर सिंह इसी क्रम में एक महत्त्वपूर्ण स्थापना देते हैं कि, “इतिहास संबंधी पुनर्विचार का अर्थ है क्रमशः अपने वास्तव बोध को जटिल बनाते रहना। चूंकि हमारे जाने अनजाने किसी-न-किसी प्रकार इतिहासबोध सदा हमारे साथ है, इसलिए उसके दुरुपयोग के संकट से बचने के लिए इतिहास-बोध को सतत सूक्ष्मतर एवं यथातथ्य बनाए रखना नितांत आवश्यक है।”[xi] उनके अनुसार किसी रचना की समीक्षा का क्रम इतिहासक्रम से भिन्न नहीं है और “किसी रचना के संदर्भ की खोज का अर्थ है उसके ऐतिहासिक अर्थ की खोज।”[xii] किसी रचना के ऐतिहासिक अर्थ को यह जानने के लिए खोजा जाना चाहिए कि कोई रचना अपने युग के सम्पूर्ण सामाजिक सत्य को कितनी वाणी दे चुकी है या सत्य के बयान में कहाँ बाधा पहुँची है। नामवरसिंह के अनुसार सच्चा इतिहास दर्शन वही है जो “इतिहास से मुक्ति की चेतना” प्रदान करता है।[xiii] ‘इतिहास से मुक्ति’ का तात्पर्य अतीत जीवी न होकर उन मुक्ति कामी परिवर्तनों को पहचानना है जो समाज में निरंतर उपस्थित हुए और साहित्य में उनकी अंतर्ध्वनि सुनाई दी। इतिहास के प्रति उनके इसी दृष्टिकोण की वजह से हिंदी साहित्य में लोकजागरण व नवजागरण अर्थात् सामाजिक परिवर्तन पर सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण काम करने वाले आलोचक रामविलास शर्मा पर भी नामवर सिंह कटाक्ष करना न भूले। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में वेदों की तरफ़ झुकाव व वैदिक आर्यों को भारतीय संस्कृति का मूल हेतु समझकर रामविलास शर्मा बहुत कुछ ‘अतीत-जीवी’ या ‘इतिहास-बद्ध’ हो चुके थे। रामविलास शर्मा की इसी इतिहास दृष्टि को नामवर सिंह ने “इतिहास की शव-साधना” कहा है।[xiv]
नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य का भले ही कोई स्वतंत्र इतिहास ग्रंथ न लिखा हो, इतिहासलेखन पर वे बराबर चिंतन करते रहे। वे लिखते हैं कि हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन में इतिहासकारों की मुख्य दृष्टि प्रायः इस बात पर केंद्रित रही है कि किसी रचना में चली आ रही परंपरा का निर्वाह किस प्रकार हुआ है। इतिहासकार प्रायः किसी कृति को किसी विशिष्ट विधा, भाषाई प्रवृत्ति या साहित्यिक विकास-क्रम के भीतर रखकर उसका विश्लेषण करते रहे हैं। इसलिए अपभ्रंश साहित्य को भाषा और विधा दोनों ही दृष्टियों से हिंदी साहित्य के आदिकाल में स्थान दिया गया है। लेकिन नामवर सिंह के अनुसार किसी चीज़ को पहले परंपरा कहना और फिर उसके निर्वाह को खोजने से ज़्यादा अहम बात किसी साहित्य की मूल चेतना को पकड़ना होता है। क्योंकि भाषा या विधागत तारतम्य भले ही दो काव्य-धाराओं में नहीं बैठे लेकिन रचना की मूल चेतना से भी साहित्यिक परम्परा का विकास दिखाया जा सकता है। खासकर साहित्य में होने वाले बदलावों को इसी मूल चेतना के द्वारा बेहतर आंका जा सकता है। अपभ्रंश-हिंदी के संबंध के मूल में नामवर सिंह की यही इतिहासदृष्टि काम कर रही थी।
हज़ारीप्रसाद द्विवेदी संभवतः वे पहले इतिहासकार थे जिन्होंने अपभ्रंश साहित्य को हिंदी का अंग न मानते हुए भी उसे हिंदी साहित्य का “मूल रूप” माना। उन्होंने यह भी कहा कि बाक़ी सभी भारतीय भाषाओं की तुलना में हिंदी में अपभ्रंश साहित्य की परंपरा ज्यों की त्यों संरक्षित रही है। नामवर सिंह ने इसी ‘मूल-चेतना’—या कहें, साहित्य की प्राणधारा—की उपस्थिति को हिंदी साहित्य के विकास में अधिक गहराई से देखा है। नामवर सिंह ने अपभ्रंश काव्य में उपस्थित साहित्य की दो धाराओं की चर्चा की है जिनमें कुछ रूढ़िबद्ध थीं तो कुछ में एक जीवंत परंपरा भी विद्यमान थी, जो आगे जाकर हिंदी साहित्य में प्रकट हुई। अपभ्रंश काव्य-परंपरा के भीतर विद्यमान अपने अंतर्विरोध थे। स्वयंभू, पुष्पदंत, धनपाल, जोइंदु, मुनिराज रामसिंह आदि कवियों तथा संदेश-रासक तथा बौद्ध-सिद्ध और जैन ग्रंथों में एक तरफ़ जिस परंपरा का निर्वाह हुआ और दूसरी तरफ़ जिस सांस्कृतिक-साहित्यिक चेतना का विकास हुआ, उसी से आगे चलकर हिंदी में रासो, रास और रासक संज्ञक काव्य-परंपराएँ विकसित हुईं। इन्हीं परंपराओं में एक ओर पृथ्वीराज रासो जैसे चरित-काव्य की रचना हुई तो दूसरी ओर बीसलदेव रासो जैसा गीत-काव्य भी प्रतिष्ठित हुआ।
इतिहासकारों के बीच ‘रास’ और ‘रासो’ संज्ञक शीर्षक पर हुए विवाद पर नामवर सिंह का कहना यही था कि ‘रास’ को प्रेमगीत मानना व ‘रासो’ को वीर रसात्मक चरित काव्य मानने के पीछे कोई ठोस आधार नहीं है बल्कि यह केवल सुविधा के लिए अपनायी गई श्रेणियाँ हैं। दशरथ शर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी, नरोत्तमदास स्वामी, अगरचंद नाहटा, मोतीलाल मेनारिया आदि के शोध पर दृष्टिपात करते हुए वे कहते हैं कि ‘रास’ श्रेणी के काव्य निसंदेह रासो से पुराने हैं लेकिन ‘रासो’ ग्रंथ भी विविध भाव, विषय और रसों पर लिखे गए। नामवर सिंह लिखते हैं कि 12वीं से 15वीं सदी के बीच बहुत कुछ जैन कवियों द्वारा रचित ‘रास’ काव्य मिलते हैं। फिर ऐतिहासक ‘रासो’ काव्य की परंपरा बहुत कुछ सत्रहवीं सदी से शुरू होती है। और इस श्रेणी के बीसियों ‘रासो’ सत्रहवीं व अठारहवीं सदी में लिखे जाते हैं।पृथ्वीराज रासो इसी पिछली श्रेणी का प्रभावशाली ग्रंथ था।
पृथ्वीराज रासो के रचनाकाल व पाठ संबंधी बहस और नामवर सिंह का संपादन -
‘पृथ्वीराज रासो’ के रचनाकाल को लेकर हुआ विवाद हिंदी का सबसे जटिल और लंबा चलने वाला विवाद रहा है। यह विवाद आरम्भ हुआ 1880 ई. के दशक में कविराज श्यामलदास और डॉक्टर बूलर द्वारा। श्यामलदास पृथ्वीराज रासो को 1583 से लेकर 1613 ई. के बीच रचा गया काव्य मानते थे, वहीं डॉ. बूलर इसे अनैतिहासिक ग्रंथ या लगभग जाली ग्रंथ मानते थे।[xv] जहाँ तक ‘पृथ्वीराज रासो’ के रचनाकाल की बात है, नामवर सिंह श्यामलदास से सहमत होते हैं। लेकिन ‘पृथ्वीराज रासो’ को सोलहवीं सदी के अंत में उभरी रचना मानने के पीछे नामवर सिंह के अपने कारण थे जिनकी चर्चा हम आगे करेंगे। ‘पृथ्वीराज रासो’ ग्रंथ अपने प्राचीन रूप में क्या था, अर्थात् वे कौनसे प्रसंग संस्कृत के ग्रंथ ‘पृथ्वीराज विजय’ और ‘पृथ्वीराज रासो’ में समान रूप मिलते हैं? इस सवाल के जवाब में नामवर सिंह का यही कहना था कि ‘कैमास वध’ को छोड़कर बाक़ी कोई प्रसंग ऐसा नहीं है जो दोनों में समान है। पंद्रहवी सदी में संग्रहीत ‘पुरातन प्रबंध संग्रह’ में कैमास वध संबंधी छप्पय मिलते हैं, जिससे इतना तो तय हो जाता है कि पृथ्वीराज से जुड़ी कुछ कविता मुग़लकाल से पहले प्रसिद्ध थी जिसमे पृथ्वीराज और उसके मंत्री कैमास का हाल प्रमुख था। मूल रूप से संस्कृत में लिखे गए ‘पुरातन प्रबंध संग्रह’ में पृथ्वीराज संबंधी छप्पयों की भाषा लेकिन अपभ्रंश है जिसके आधार पर राजस्थान के इतिहासकार दशरथ शर्मा का मानना था कि मूल ‘पृथ्वीराज रासो’ अपभ्रंश की रचना थी। लेकिन नामवर सिंह ने इस मत का खंडन किया है: उनके अनुसार ‘पुरातन प्रबंध संग्रह’ में पृथ्वीराज रासो संबंधी छन्द किसी प्रसिद्ध कविता के अपभ्रंश रूपांतरण हैं, न कि ‘पृथ्वीराज रासो’ जैसे किसी ग्रंथ की सूचना।[xvi]
नामवर सिंह का ध्यान मूल ‘पृथ्वीराज रासो’ की खोज को लेकर हुई उठापटक की तरफ़ बखूबी था। मूल पाठ की अंतहीन बहस में नहीं पड़कर भी वे रासो के प्राचीनतम पाठ को ज़रूर सामने लाना चाहते थे। इसी का परिणाम था नामवर सिंह और हज़ारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’। यह रासो के उसी भाग का संपादन है जिसे इस ‘पृथ्वीराज रासो’ की लघु अथवा प्रामाणिक [प्राचीन] परंपरा माना जाता है। नामवर सिंह को ‘पृथ्वीराज रासो’ की सर्वाधिक प्राचीन या लघुतम पांडुलिपि जिसे ‘धारणोज वाली’ प्रति कहा जाता है, बीकानेर में श्री नरोत्तम दास स्वामी से मिली थी। यह पांडुलिपि जो 1610 ई० की लिपिबद्ध है तथा उसे गुजरात के पाटन तालुके के धारणोज गाँव से प्राप्त किया गया था। इसीलिए इसे “धारणोज वाली प्रति” कहा जाता है। सौभाग्य से, हमारे पास उस मूल पांडुलिपि की छाया-प्रति उपलब्ध है। लेकिन 1950 के दशक में नामवर सिंह के लिए फ़ोटो कॉपी की व्यवस्था नहीं थी इसलिए पूरी पांडुलिपि की उन्होंने अपनी हस्तलिखित प्रति तैयार की थी। नामवर सिंह इस पांडुलिपि के मिलने को अपना सौभाग्य मानते थे, शायद इसीलिए उनका शोध-ग्रंथ जब एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुआ तब उसे उन्होंने नरोत्तम दास स्वामी की पुण्य स्मृति को समर्पित किया था। इसी धारणोज वाली पाण्डुलिपि से पृथ्वीराज रासो का संपादन राजमल बोरा ने भी किया है।[xvii] इस पांडुलिपि की पुष्पिका दिखाती है कि इसे बीकानेर के महाराजा कल्याणमल के पोते राजा भगवानदास के पठन हेतु तैयार किया गया था।[xviii]
‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’ के सम्पादन के लिए उपर्युक्त प्राचीनतम प्रति आधार बनी। नामवर सिंह ने ‘पृथ्वीराज रासो’ के चारों रूपांतरों की प्रतियों के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा ऐसे दस प्रसंग चिह्नित किए हैं जो सभी प्रतियों में मिलते हैं। ये सारे प्रसंग अपने लघुत्तम रूप में ‘पृथ्वीराज रासो’ की प्राचीनतम प्रति [धारणोज वाली] में भी हैं। वे इस प्रकार हैं -
1. आदि पर्व (मंगलाचरण, पृथ्वीराज के पूर्वजों को अजमेर का राज्य मिलना, चौहान सोमेश्वर के यहाँ पृथ्वीराज का जन्म आदि)
2. दिल्ली-किल्ली कथा (दिल्ली स्थित लोहे की कील (लाट) और तोमर वंश के बाद दिल्ली पर चौहानों का राज्य, फिर उसका तुर्कों आदि को मिलने की कथा)
3. अनंगपाल दिल्ली दान (अनंगपाल तोमर का अपनी पुत्री के पुत्र पृथ्वीराज को दिल्ली दान)
4. पंग यज्ञ विध्वंस (पंगुराय राठौड़ जयचंद का राजसूय यज्ञ)
5. संयोगिता नेम आचरण (संयोगिता का पृथ्वीराज से विवाह का प्रण)
6. कैमास वध (पृथ्वीराज द्वारा अपने मंत्री का वध, कवि चंद का पृथ्वीराज को धिक्कारना)
7. षट्ऋतु वर्णन (पृथ्वीराज का कन्नौज गमन का विचार लेकिन अपनी रानियों के कहने पर छह ऋतुएँ उनके साथ बिताना)
8. कनवज कथा (पृथ्वीराज का कन्नौज गमन, गंगा व कन्नौज नगर वर्णन, चंद की जयचंद दरबार में परीक्षा, संयोगिता हरण और जयचंद से युद्ध)
9. बड़ी लड़ाई (पृथ्वीराज-संयोगिता श्रृंगार वर्णन, शाहबुद्दीन गौरी का आक्रमण व युद्ध, पृथ्वीराज का पकड़ा जाना)
10. बान बेध (अवधूत योगी के वेश में कवि चंद का ग़ज़नी जाना, चंद-गौरी, मिलन, शब्दभेदी बाण द्वारा गौरी का मरण, चंद-पृथ्वीराज का मरण)
‘पृथ्वीराज रासो’ का प्राचीनतम पाठ प्रस्तुत करते हुए भी परिशिष्ट रूपी अपने ‘परिचय’ में नामवर सिंह चारों रूपांतरों के बनने की तरफ़ भी ध्यान दिलाते हैं। उनके अनुसार अधिकांश इतिहासकारों की रुचि किसी रचना के मूल रूप की खोज और उसकी प्रामाणिकता सिद्ध करने में अधिक रही है। वे किसी कथा की जड़ को आदिकाल में खोजते हैं और बाद में जुड़े अंशों को तुरन्त ‘प्रक्षिप्त’ कहकर अलग कर देते हैं। ‘पृथ्वीराज रासो’ के साथ भी यही हुआ था। इसी प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए नामवर सिंह कहते हैं कि “ये खोजी विद्वान केवल नींव का पता लगाने निकले हैं, इनको नींव के ऊपर चुनी हुई ईंटों की प्रमाणिकता-अप्रामाणिकता को लेकर बेहद परेशानी होती है। लेकिन ऐसा होना परेशानी की चीज़ नहीं है। नींव ही वास्तविक नहीं है, उनके ऊपर समय समय पर जितनी ईंटें रखी गई हैं वे सब भी वास्तविक हैं, उन सबका भी ऐतिहासिक महत्त्व है। बल्कि इतिहासकार की दिलचस्पी इन स्तरों में ही सबसे अधिक होनी चाहिए। किस युग की विचारधारा ने मूल-कथा पर कौनसी चिप्पी लगाई, यह जानना कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। समय-समय पर जोड़ी हुई ये चिप्पियाँ किसी युग के साहित्य और समाज को समझने में विशेष सहायक हुआ करती हैं।”[xix] और अपनी इसी इतिहास दृष्टि को वे पाठ सम्पादन व पांडुलिपियों के बढ़ाव को समझने में अपनाते हैं जिससे वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ‘पृथ्वीराज रासो’ का संग्रहण और फिर बढ़ाव मूल रूप से मुग़ल काल की देन है।
पृथ्वीराज रासो मुग़ल-कालीन ऐतिहासिक सन्दर्भ में विकसित हुई रचना -
नामवर सिंह ने यह बात पूरे प्रमाण सहित व प्रभावी ढंग से रखी थी कि सम्राट पृथ्वीराज से संबंधित कविता ‘पृथ्वीराज विजय’ ग्रंथ से यानी बारहवीं सदी से मिलती ज़रूर है लेकिन पृथ्वीराज रासो जैसा ग्रंथ पहले-पहल अकबर के ज़माने में विकसित होता है। और अगली एक सदी, यानी पूरी सत्रहवीं सदी में, इस कविता का बढ़ाव होता है। उनके अनुसार सत्रहवीं सदी ही वह समय है जब पृथ्वीराज रासो के चारों रूपान्तर बन जाते हैं। नामवर सिंह इस अवधारणा के पीछे कविता और समाज के अंतःसंबंध और पांडुलिपियों के लिखे जाने के इतिहास को सामने लाते हैं। वे यह ज़रूर मानते हैं कि ‘पृथ्वीराज रासो’ समाज के उपरले वर्ग की चिंताओं को सामने लाता है और उस ढंग से लोक से जुड़ा नहीं था जिस तरह अन्य रासो जैसे ‘बीसलदेव रास’ था। क्योंकि पृथ्वीराज रासो राजपूत दरबारों के आश्रय में विकसित हुई कविता थी। लेकिन इतना होते हुए भी यह एक बढ़ते राजपूत समाज की आशाओं और चिंताओं को व्यक्त करने वाला काव्य था। समाज के इस राजसी तबके के अंतर्विरोधों को चित्रित करते हुए ‘पृथ्वीराज रासो’ मानव जीवन की विविध परिस्थितियों और भावदशाओं को दर्शाने वाला काव्य भी है।
‘पृथ्वीराज रासो’ के समय का निर्धारण करने हेतु पहले नामवर सिंह यह स्थापित करते हैं कि अकबर के ज़माने की शुरुआत में पृथ्वीराज चौहान के वंशज अर्थात चौहानों को भी पृथ्वीराज रासो जैसे किसी ग्रंथ [ज़ोर मेरा] का ज्ञान नहीं था। वे लिखते हैं, “संवत् 1635 (सन् 1578 ई0) में चौहान वंशी बूंदी नरेश सुरजन तथा उसके पुत्र भोज के आश्रित कवि चन्द्रशेखर रचित ‘सुरजन चरित’ नामक संस्कृत काव्य में जहाँ पृथ्वीराज के लिए पूरा सर्ग दिया गया है और पृथ्वीराज के साथ चंद का भी उल्लेख है, परंतु चंद को रासोकार नहीं कहा गया है। उससे स्पष्ट है कि संवत् 1635 (सन् 1578 ई0) तक स्वयं पृथ्वीराज के वंशजों को भी पृथ्वीराज रासो का पता न था। ... इस प्रकार अकबर के शासनकाल से पहले पृथ्वीराज रासो के अस्तित्व का पता नहीं चलता।”[xx] “सुदृढ़ अनुश्रुति के बावजूद अकबर के शासन काल से प्राचीन कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता जिसमें पृथ्वीराज रासो के रचयिता के रूप में चंद कवि का उल्लेख हो।”[xxi] ‘पुरातन प्रबंध संग्रह’ (लिपिकाल 1528 संवत्) से “इतना तो निश्चित है कि चंद बलद्दिय नामक एक कवि अवश्य था जिसने पृथ्वीराज के विषय में कुछ काव्य रचना की थी।”[xxii] इतने प्रमाण होने के बावजूद ‘पृथ्वीराज रासो’ जैसे पूरे ग्रंथ की पांडुलिपि या उस ग्रंथ का उल्लेख अकबर के काल से पहले का नहीं मिलता।
मुग़ल काल में ‘पृथ्वीराज रासो’ के विकास का सामाजिक-साहित्यिक आधार खोजते हुए व राजस्थान के विद्वान नरोत्तमदास स्वामी का हवाला देते हुए नामवर सिंह कहते हैं, “अकबर की अधीनता स्वीकार करते समय मेवाड़ के राजघराने ने अपना गौरव बढ़ाने के लिए पृथ्वीराज चौहान से अपना संबंध स्थापित किया और इसके लिए पृथ्वीराज की पृथा नामक बहिन की कल्पना की। अंत में उन्होंने इन सबको काव्य रूप देकर परम्परागत ‘पृथ्वीराज रासो’ से मिलाकर सम्पूर्ण काव्य को लिपिबद्ध रूप में संग्रह करवाया। रासो संग्रह का यह क्रम अनेक पीढ़ियों तक चला जिसकी चरम परिणति अमर सिंह द्वितीय (राज्यकाल 1755-67 वि.) में हुई।”[xxiii] नरोत्तमदास स्वामी ने जिस महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया की ओर इशारा किया है उसे विस्तार राजमल बोरा और सिंथिया टैलबॉट के काम में मिलता है। पृथ्वीराज रासो की 1703 ई की पांडुलिपि को अमर सिंह द्वितीय ने लिखवाया था। पांडुलिपि की पुष्पिका में करुणाउदधि नामक कवि की छाप है जो पाण्डुलिपि में बढ़ाए गए हिस्सों के लेखक भी ज्ञात होते हैं। वैसे मेवाड़ दरबार का रासो के साथ जुड़ाव जगतसिंह प्रथम (राज्यकाल 1628-1652 ई) से ही शुरू हो गया था । मेवाड़ के राणा राजसिंह (राज्यकाल 1652-1680 ई0) के काल के दो ग्रंथ मानकवि का ‘राजविलास’ और रणछोड़ भट्ट का ‘राजप्रशस्ति’ दोनों पृथ्वीराज रासो ग्रंथ का ज़िक्र करते हैं। ये दोनों ग्रंथ मेवाड़ के महाराणाओं के पूर्वज रावल समरसिंह का ज़िक्र करते हैं जिसने चौहान राजकुमारी व पृथ्वीराज की बहन पृथा से विवाह किया था। इस तरह समरसिंह पृथ्वीराज के सबसे नज़दीकी और सामाजिक रुतबे में उसके समान दिखाए जाते हैं। इन समरसिंह का ‘पृथ्वीराज रासो’ के लघुतम संस्करण में उल्लेख भर भी नहीं है। पृथ्वीराज की लड़ाइयों और विवाहों का विस्तार मेवाड़ संस्करण में होता जाता है। ‘पृथ्वीराज रासो’ में मेवाड़ के राजाओं की दिलचस्पी उस ऐतिहासिक प्रक्रिया का हिस्सा थी जिससे वे सत्रहवीं सदी में अपनी प्रतीकात्मक सांस्कृतिक पूंजी को बढ़ाना चाह रहे थे। 1615 ई0 में मेवाड़ का मुगलों के साथ एक लंबे संघर्ष का अंत एक संधि में होता है जिससे मेवाड़ की सीमाएं पहले से छोटी रह जाती हैं। आमेर, जोधपुर आदि राज्यों से मेवाड़ की शक्ति भी कमतर होती जाती है। इसलिए जगत सिंह प्रथम और राज सिंह द्वारा ‘चित्रित रामायण’ लिखवाना, जगदीश मंदिर, राजसमंद झील और उदयपुर पैलेस आदि का निर्माण अपनी प्रतिष्ठा की पुनः प्राप्ति हेतु उठाए गए क़दम ही थे। शिवाजी का अपने राज्याभिषेक पर सिसोदिया कुल से संबंध जोड़ना इस बात का प्रमाण है कि मेवाड़ के राणा अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने में सफल रहे।[xxiv]
सिंथिया टैलबॉट के अनुसार ‘पृथ्वीराज रासो’ जितना पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के युद्ध का काव्य है उतना ही पृथ्वीराज रासो से जयचंद की लड़ाई का भी। वे लिखती हैं कि अकबर के काल में जो मनसबदारी व्यवस्था शुरू हुई उसमें उत्तर भारत के राजपूत राजा अपने अभिजात पद को प्राप्त करने के लिए पूरे उत्तर और पश्चिमोत्तर भारत को ऐसे राजपूत नायकों के इतिहास से भर रहे थे, जिस भारत में अभी ये राजा स्वयं उभर रहे थे।[xxv] उत्तर भारत के पाठक-श्रोता समुदाय को लक्ष्य करते हुए ‘पृथ्वीराज रासो’ ने महाभारत के ‘क्लासिक ऐज’ को फिर से उसी जगह कल्पित किया और राजपूत राजाओं ने स्वंय अपने कुलों को इतिहास में दर्शा कर नई गरिमा प्राप्त की।
देखा जाए तो सिंथिया टैलबॉट ने जिस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से दिखाया है उस पर नामवर सिंह की इतिहास दृष्टि की गहरी छाप है। नामवर सिंह ने निसंदेह इस इतिहास दृष्टि को राजस्थान के साहित्यकार नरोत्तमदास स्वामी से संवाद करके विकसित किया था। इसी से ‘पृथ्वीराज रासो’ के अद्भुत विकास की गुत्थी सुलझी। नामवर सिंह की दृष्टि में ‘पृथ्वीराज रासो’ की पांडुलिपियों के विकास के पीछे साहित्य और समाज के गहरे रिश्ते को खोजना ही प्रमुख था। पांडुलिपि विज्ञान और पाठालोचन जैसे अनुशासन को समाज और ‘जनता की चित्तवृत्ति’ से जोड़कर तथा उसे ऐतिहासिक प्रक्रिया में दिखाकर नामवर सिंह ने इस अनुशासन को पुनर्नवा कर दिया। और मार्के की बात यह है कि नामवर सिंह ने यह काम आपने अकादमिक जीवन के शुरुआती दशकों में किया। साहित्य और समाज के अंतःसंबंध की यही गहन दृष्टि उनके बाद के लेखन में भी समाहित रही।
सन्दर्भ :
[i] पृथ्वीराज चौहान को जेम्स टॉड ने अनेक बार “अंतिम हिंदू सम्राट” कहा है। ज़ाहिर है टॉड भारतीय इतिहास को “हिंदू”, “मुस्लिम” व “ब्रिटिश” आदि कालों में बाँटकर देखते थे। इसलिए मुहम्मद गौरी की विजय और पृथ्वीराज की हार जेम्स टॉड को “हिंदू युग” के अंत जैसी लगती है। टॉड का पृथ्वीराज चौहान को अंतिम हिंदू सम्राट मानना पृथ्वीराज की प्रसिद्धि को भी बयान करता है। भारत के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास से पृथ्वीराज चौहान ही ऐसा राजा था जिसकी प्रसिद्धि ‘आरंभिक आधुनिक काल’ (1300-1800 ई.) में भी बनी रही। पृथ्वीराज की तुलना में अशोक महान की लोकप्रियता उन्नीसवीं सदी में फिर से बननी शुरू होती है। शिवाजी और महाराणा प्रताप दो राजा ज़रूर थे जिनकी प्रसिद्धि लगातार बनी रही लेकिन वे पृथ्वीराज के काफ़ी बाद में हुए। सिंथिया टेलबॉट, ‘द लास्ट हिंदू एम्परर: पृथ्वीराज चौहान एंड द इंडियन पास्ट 1200-2000, ’ कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज यू के, 2016 ई., पृष्ठ 3.
[ii] जवाहरलाल नेहरू, द डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 1989 [प्रथम प्रकाशन 1946], पृष्ठ 237.
[iii] देखें ‘पृथ्वीराज रासो : भाषा और साहित्य’, राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, 1997 ई [प्रथम संस्करण 1956 ई.]
[iv] ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’, नामवर सिंह, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 1971 ई. [प्रथम संस्करण 1952 ई.]
[v] ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’, संपादक- हजारी प्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह, साहित्य भवन लिमिटेड, इलाहाबाद, 1998 ई. [प्रथम संस्करण 1952 ई.]
[vi] बीकानेर प्रवास के अपने अनुभव बताते हुए नामवर सिंह लिखते हैं कि बीकानेर में“सहज ही कईं साहित्यिक सुहृद मिल गए. बीकानेर अनायास ही बनारस जैसा हो गया....जहाँ तक पृथ्वीराज रासो की प्राचीन पांडुलिपियों का प्रश्न है श्री अगरचंद नाहटा और उनसे भी ज़्यादा श्री नरोत्तमदास स्वामी की कृपा से लघुतम रूपांतर की दोनों पाण्डुलिपियाँ सुलभ हो गईं।” ‘पृथ्वीराज रासो : भाषा और साहित्य’, पृष्ठ XI
[vii] ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’, पृष्ठ 172
[viii] ‘संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो’, पृष्ठ 198-9
[ix] ‘द लास्ट हिंदू एम्परर’ पृष्ठ 44
[x] इतिहास और आलोचना, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2002 ई० [पहला संस्करण, 1957 ई.], पृष्ठ 154
[xi] हिंदी साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार, नामवर संचयिता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2003 ई०, पृष्ठ 391,
[xii] हिंदी साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार, नामवर संचयिता, पृष्ठ 397
[xiii] हिंदी साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार, नामवर संचयिता, पृष्ठ 399
[xiv] देखें ‘इतिहास की शव-साधना’, नामवर संचयिता, पृष्ठ 410-425
[xv] ‘द लास्ट हिंदू एम्परर’ पृष्ठ 277, संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, पृष्ठ 174
[xvi] संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, पृष्ठ 177
[xvii] राजमल बोरा, चंद बरदाई कृत प्रिथीराज रासउ, मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद, 2004 ई.
[xviii] “संवत् 1667 वर्षे शाके 1532 प्रवर्त्तमाने आसाढ़ मासे शुक्ल पक्षे पंचमी तिथि महाराजाधिराज महाराज श्री श्री कल्याणमलजी तत्पुत्र राजा श्रीभाण जी तत्पुत्र राजा श्री भगवानदासजी पठनार्थ।। श्री कल्याण।। श्री सुभम् भवतु।।” राजमल बोरा, चंद बरदाई कृत प्रिथीराज रासउ, भाग-3, पृष्ठ 120
[xix] हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग, 241
[xx] संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, पृष्ठ 177
[xxi] संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, पृष्ठ 178
[xxii] संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, पृष्ठ 178
[xxiii] संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, पृष्ठ 178
[xxiv] ‘द लास्ट हिंदू एम्परर’ पृष्ठ 277
[xxv] ‘द लास्ट हिंदू एम्परर’ पृष्ठ 143-145
दलपत राजपुरोहित
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, टेक्सस विश्विद्यालय-ऑस्टिन, अमेरिका
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव

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