शोध आलेख : हिन्दी आलोचना की ‘नामवरी भाषा’: नामवर सिंह की आलोचना-भाषा / अभय कुमार

हिन्दी आलोचना की ‘नामवरी भाषा’
(नामवर सिंह की आलोचना-भाषा)
- अभय कुमार

प्रत्येक महत्त्वपूर्ण रचनाकार की भाषा-शैली पर उसकी निजता की छाप होती है। ‘प्रसाद’, ‘निराला’, पन्त और महादेवी एक ही युग के कवि हैं, किन्तु चारों की भाषा और शैली में भिन्नता का रंग विद्यमान है और इनमें से किसी कवि का नाम देखे बिना उनकी काव्य-भाषा को देखकर पाठक यह समझ जाएगा कि यह किस रचनाकार की भाषा है। इसी प्रकार प्रेमचन्द और जैनेन्द्र की कहानियों की भाषा भी एक नहीं है। आलोचना-विधा भी इसका अपवाद नहीं है। रामचन्द्र शुक्ल, हजारीप्रसाद द्विवेदी, मुक्तिबोध, नामवर सिंह, वीर भारत तलवार आदि आलोचकों की भाषा एक-दूसरे से भिन्न और विशिष्ट है। विडम्बना यह है कि हिन्दी-साहित्य में कहानीकारों, विशेषकर कवियों की भाषा पर तो काफी कलम चली है, पर कैसा दुर्योग है कि आलोचकों की आलोचना की भाषा पर किसी महत्त्वपूर्ण आलोचक द्वारा आजतक कुछ लिखा ही नहीं गया है, गोया आलोचना की भाषा विचार करने लायक ही नहीं है।

जिस प्रकार दो व्यक्तियों का स्वभाव हू-ब-हू एक नहीं होता है, उसी प्रकार न दो विधाओं की प्रकृति एक होती है और न दो विधाओं की भाषा। दो विधाओं की भाषा की प्रकृति एक होनी भी नहीं चाहिए। दो विधाओं के भेदक तत्त्वों में भाषा के मिजाज का भेद भी अन्तर्निहित है। इतना ही नहीं, एक विधा के लिए जो भाषा भूषण है, दूसरी के लिए वही दूषण। कहीं सीधी-सपाट वाचक भाषा अधिक सौन्दर्याधायक होगी, कहीं लाक्षणिक तो कहीं व्यंजक। हमें नहीं भूलना चाहिए कि खुद नामवर जी ने सपाटबयानी को भी एक महनीय काव्य-प्रतिमान के रूप में प्रतिष्ठापित करने की वकालत की है।[1]

यहाँ आलोचना और विशेषकर नामवर जी की आलोचना की भाषा के वैशिष्ट्य-निरूपण का ही अवकाश है। जिस प्रकार आचार्य शुक्ल की भाषा की सबसे बड़ी खासियत है कसावट, उसी प्रकार नामवर जी की भाषा की सबसे बड़ी खासियत है रचनात्मकता। भाषा की ऐसी रचनात्मकता अन्य किसी आलोचक की भाषा में नहीं दिखाई पड़ती है। वास्तव में रचनात्मकता नामवर जी की भाषा का प्राणतत्त्व है और यह नामवर जी की भाषा की अनोखी और अद्वितीय विशेषता है। उनकी भाषा की रचनात्मकता की यह आभा वर्ण-विन्यास से लेकर वाक्य-विन्यास तक छिटकती हुई दिखाई पड़ती है।

किसी शब्द के विभिन्न पर्यायों के अर्थों में सूक्ष्म भेद होता है, जिसे अर्थच्छाया या अर्थच्छटा कहते हैं। मिसाल के तौर पर ‘नदी’ शब्द के कुछ पर्यायवाची इस प्रकार हैं — नदी, सरिता, तटिनी, शैवालिनी इत्यादि। ‘नदी’ का अर्थ है नाद करने वाली। बड़ी नदियों की धारा नाद करती है। दोनों तटों के बीच आबद्ध होकर प्रवाहित होने के कारण यह ‘तटिनी’ कहलाती है। ‘सरिता’ ‘सृ’ धातु से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है चलना, चलनेवाली। अर्थात् ‘सरिता’ शब्द से गतिशीलता और प्रवहमानता का गुण ध्वनित होता है। ‘शैवालिनी’ शैवालयुक्त नदी को कहते हैं, यानी जिसके पानी में शैवाल पनप गया हो। कहना न होगा कि किसी रचना में ‘नदी’ के जिस रूप का चित्रण किया जा रहा है, उसी प्रसंग के अनुकूल विशिष्ट पर्यायवाची शब्द का चयन रचना के सौन्दर्य में अद्भुत निखार पैदा कर देता है। रचनाकार नदी के नाद-धर्म को व्यंजित करना चाहता है अथवा उसकी संसरणशीलता या प्रवहमानता को; किनारों या चट्टानों के बीच उछलते-कूदते-खिलखिलाते नदी के बाँकपन या किनारों को थामे हुए घाट को ध्वनित करना रचनाकार का उद्देश्य है अथवा शैवालयुक्त सुषमा के बीच इठलाती हुई जलराशि के सौन्दर्य का चित्रण करना? कहना न होगा कि सन्दर्भ के अनुसार ही विभिन्न पर्यायों में किसी एक पर्यायवाची पद का प्रयोग उपादेय है। इस सन्दर्भ में सुमित्रानन्दन पन्त का यह लम्बा उद्धरण द्रष्टव्य है, “भिन्न-भिन्न पर्यायवाची शब्द, प्रायः संगीत-भेद के कारण, एक ही पदार्थ के भिन्न-भिन्न स्वरूपों को प्रकट करते हैं। ‘भ्रू’ से क्रोध की वक्रता, ‘भृकुटी’ से कटाक्ष की चंचलता, ‘भोहों’ से स्वाभाविक प्रसन्नता, ऋजुता का हृदय में अनुभव होता है। ऐसे ही ‘हिलोर’ में उठान, ‘लहर’ में सलिल के वक्षःस्थल की कोमल कम्पन्न, ‘तरंग’ में लहरों के समूह का एक-दूसरे को धकेलना उठकर गिर पड़ा, ‘बढ़ो बढ़ो’ कहने का शब्द मिलता है, ‘वीचि’ से जैसे किरणों में चमकती, हवा के पलने में हौले-हौले झूमती हुई हँसमुख लहरियों का, ‘ऊर्म्मि’ से मधुर मुखरित हिलोरों का, हिल्लोल-कल्लोल से ऊँची-ऊँची बाँहें उठाती हुई उत्पातपूर्ण तरंगों का आभास मिलता है। ‘पंख’ शब्द में केवल फड़क ही मिलती है, उड़ान के लिए भारी लगता है, जैसे किसी ने पक्षी के पंखों में शीशे का टुकड़ा बाँध दिया हो, वह छटपटाकर बार-बार नीचे गिर पड़ता हो, अंगरेजी का ‘विंग’ जैसे उड़ान का जीता-जागता चित्र है। उसी तरह ‘टच’ में जो छूने की कोमलता है, वह स्पर्श में नहीं मिलती। ‘स्पर्श’ जैसे प्रेमिका के अंगों का अचानक स्पर्श पाकर हृदय में जो रोमांच हो उठता है, उसका चित्र है, ब्रज भाषा के ‘परस’ में छूने की कोमलता अधिक विद्यमान है, ‘जॉय’ से जिस प्रकार मुँह भर जाता है, ‘हर्ष’ से उसी प्रकार आनन्द का विद्युत स्फुरण प्रकट होता है। अंग्रेजी के ‘एअर’ में एक प्रकार की ट्रांसपेरेन्सी मिलती है, मानो इसके द्वारा दूसरी ओर की वस्तु दिखाई पड़ती हो, ‘अनिल’ से एक प्रकार की कोमल शीतलता का अनुभव होता है, जैसे खस की टट्टी से छनकर आ रही हो, ‘वायु’ में निर्मलता तो है ही, लचीलापन भी है, यह शब्द रबड़ के फ़ीते की तरह खिंचकर फिर अपने ही स्थान पर आ जाता है, ‘प्रभंजन’ ‘विंड’ की तरह शब्द करता, बालू के कण और पत्तों को उड़ाता हुआ बहता है, ‘श्वसन’ की सनसनाहट छिप नहीं सकती, ‘पवन’ शब्द मुझे ऐसा लगता है जैसे हवा रुक गई हो, ‘प’ और ‘न’ की दीवारों से घिर-सा जाता है, समीर लहराता हुआ बहता है।

“कविता के लिए चित्र भाषा की आवश्यकता पड़ती है, उसके, शब्द सस्वर होने चाहिए, जो बोलते हों, सेब की तरह जिसके रस की मधुर लालिमा भीतर न समा सकने के कारण बाहर झलक पड़े, जो अपने भावों को अपनी ही ध्वनि में आँखों के सामने चित्रित कर सकें…।”[2] इसी अर्थच्छाया या अर्थच्छटा को आचार्य कुन्तक ने पर्यायवक्रता कहा है।[3] कहने की आवश्यकता नहीं कि पर्यायवक्रता काव्यभाषा में नई जान भर देती है। यद्यपि अर्थच्छटा छिटकानेवाली विशिष्ट पर्याय के बाँकपन (पर्यायवक्रता) से दीप्त ऐसी भाषा काव्य के लिए अपेक्षाकृत अधिक उपादेय है, पर नामवर जी की खूबी यह कि उन्होंने अर्थच्छाया की व्यंजकता को पहचानकर उसका बखूबी प्रयोग किया है। कहना न होगा कि यह पर्यायवक्रता नामवर जी की आलोचना की भाषा का मदिर आकर्षण है। इस सन्दर्भ में उनका यह उद्धरण द्रष्टव्य है, “ ‘चिन्तामणि’ का दूसरा भाग आचार्य शुक्ल के निधन के लगभग चार वर्ष बाद 1945 में निकला, जिसके संकलन-संपादन का श्रेय शुक्लजी के अन्तेवासी और रीतिकाव्य के अनन्य आराधक पण्डित विश्वनाथप्रसाद मिश्र को है।”[4] इस वाक्य में ‘विद्यार्थी’ या ‘छात्र’ के बदले ‘अन्तेवासी’ पद का प्रयोग कितना उपयुक्त और समीचीन है, कहना अनावश्यक है। विद्यार्थी या छात्र प्रभृति पदों से आचार्य शुक्ल और आचार्य मिश्र की परस्पर आत्मीयता और प्रेम की ध्वनि नहीं निकलती है। यह ध्वनि ‘अन्तेवासी’ पद से ही निकलती है। ‘अन्तेवासी’ पद इस वाक्य के सौन्दर्य और रचनात्मकता के निखार को कितना व्यंजित करता है, यह कहना अनावश्यक है। पन्त जी से उपमा उधार लेकर कहें तो सेब की तरह ‘अन्तेवासी’ पद की अर्थच्छटा की मधुर लालिमा भीतर नहीं समा पाती है और छलक-छलककर बाहर आ जाती है। व्यंग्य की मुद्रा में अन्यत्र प्रयुक्त ‘अन्तेवासी’ पद का यह प्रयोग भी द्रष्टव्य है, “कहीं आचार्य के अन्तेवासी भ्रान्त भाष्य पर तुले हैं, जो अपनी प्रामाणिकता के लिए उनकी अप्रकाशित मौखिक उक्तियों का हवाला देते चलते हैं।”[5] यहाँ ‘अन्तेवासी’ पद की अर्थच्छटा व्यंग्य को कितना पैना बना देती है, कहना अनावश्यक है। इतना ही नहीं, ‘भाष्य’ विशेष्य से पहले ‘भ्रान्त’ विशेषण के प्रयोग से निष्पन्न अनुप्रास की छटा इस वाक्य के सौन्दर्य और सृजनशीलता में चार चाँद लगा देता है। इसी प्रकार इससे ठीक ऊपर के उद्धरण में ‘रीतिकाव्य के अनन्य आराधक’ पदबन्ध भी द्रष्टव्य है। साथ ही ‘अनन्य आराधक’ पदबन्ध में अनुप्रास की छटा भी द्रष्टव्य है। वास्तव में रचनात्मक विशेषणों के प्रयोग में नामवर जी को महारत हासिल है। निम्नलिखित वाक्य में प्रयुक्त ‘विधाबद्ध विद्वान’ पदबन्ध में व्यंग्य की मारकता और अनुप्रास के चमत्कार की छटा के एकत्र सम्मिलन का सौन्दर्य देखते ही बनता है, “वैसे भी शुक्लजी के चिन्तामणिवाले निबन्धों को ही निबन्ध माननेवाले विधाबद्ध विद्वान द्विवेदीजी के निबन्धों के हल्केपन को बहुत ऊँची दृष्टि से देखते प्रतीत नहीं होते।”[6] जहाँ शुक्ल जी के विशेषणों में अर्थ-गाम्भीर्य का ताप है, वहीं नामवर जी के विशेषणों में रचनात्मकता की आर्द्रता की आभा। कहीं-कहीं तो रचनात्मकता की आर्द्र आभा के कारण वाक्य में लयात्मकता आ गई है। आलोचना की भाषा या वाक्य-अन्वय में पद-मैत्री अलंकार का ऐसा विरल चमत्कार नामवर जी ही पैदा कर सकते हैं, “एक प्रकार से यह कृत का भी स्मरण है और ऋत का भी।”[7] कहना अनावश्यक है कि ‘कृत’ और ‘ऋत’ विशेषणों के प्रयोग के कारण इस वाक्य में लयात्मकता आ गई है। इन विशेषणों के प्रयोग से उत्पन्न फिसलन के कारण पदमैत्री अलंकार का चमत्कार देखते ही बनता है। यद्यपि ‘भी’ अव्यय के प्रयोग की पुनरावृत्ति से वाक्य में पुनरुक्ति-दोष अवश्य आ गया है, पर लयात्मकता, प्रवहमानता और पदमैत्री के चमत्कार के सम्मिलन से उत्पन्न रचनात्मकता के सौन्दर्य के आगे यह पुनरुक्ति-दोष छिप जाता है।

सम्पूर्ण पद्यात्मक वाक्य या पद्यांश को गद्य के वाक्य-विन्यास में कुशलता और सहजतापूर्वक पिरोकर सौन्दर्य, सृजनात्मकता और चमत्कार पैदा करने की कला में नामवर जी अपना सानी नहीं रखते। गद्य के वाक्य-विन्यास रूपी धागे में पिरोए गए पद्य के जगमगाते हुए मोती के मानिन्द ऐसे कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं - 

(1) “प्रभात की पहली किरण ने जिस प्रकार रवींद्रनाथ के निर्झर-हृदय का स्वप्न भंग कर दिया, उसी प्रकार सुमित्रानंदन पंत के कवि को भी ‘स्वप्न में चौंका गई प्रभात!’”[8]
(2) “पंत ने कहीं ‘चल चितवन के बंदनवार’ टाँगे तो कहीं ‘उमह बह, फैल अकूल अपार’ हो रहे और ‘खर तृन पात’ चुने तो अलग। ‘प्रसूनों के ढिग रुककर’ ‘हुंलास’ प्रकट करना तथा ‘धूम धूँआरे काजर कारे विकरारे बादर’ कहना आम बात है। निराला भी कभी ‘उत्सुकता से उकता-उकताकर ताकने’ लगते थे तो कभी ‘बोहित के हित’ तुलसीदास के ‘बोहित-बेरा’ को स्मरण कर लेते थे।… इन पुराने तद्भव शब्दों के अतिरिक्त छायावाद ने अपने मुख-सुख के लिए कई तत्सम शब्दों को तद्भव कर डाला। ‘अजान’, ‘अनजान’ की पंत ने झड़ी लगा दी। कहीं ‘कान तक खिंचे अजान नयन’ तो कहीं ‘मधुरता से अपनी अनजान’।”[9]
(3) “जब प्रसाद जी ने सौन्दर्य को ‘उज्ज्वल वरदान चेतना का’ कहा तो प्रकारान्तर से उन्होंने इसी भावात्मक दृष्टिकोण का समर्थन किया।”[10]
(4) “तिरस्कृता विधवा को ‘इष्टदेव के मन्दिर की पूजा-सी’ पवित्र कहना, भोग्या नारी के ‘संग में पावन गंगा-स्नान’ की कल्पना करना और उसे ‘देवि, माँ, सहचरि, प्राण’ कहकर पुकार उठना आदि बातें आधुनिक कवि के नारी-आदर्श की सूचक हैं।”[11]
(5) “उसने बादलों के छायामय मेला के स्थान पर ‘फैली खेतों में दूर तलक मखमल की कोमल हरियाली’ वाली ग्रामश्री को अपनी कविता का विषय बनाया।…तब उसकी दृष्टि में ‘लहलह पालक महमह धनिया’, ‘लाल लाल चित्तियाँ पड़े पीले-मीठे अमरूद’, ‘अरहर सनई की सोने की किंकिणियों’, ‘तीसी की नीलम कली’, ‘सरसों की उड़ती भीनी तैलाक्त गंध’ जैसी सुन्दर वस्तुयें नहीं आयी थीं लेकिन जब कवि ने देखा कि ——

छायातप के हिलकोरों से चौड़ी हरीतिमा लहराती
ईखों के खेतों पर सुफेद कासों की झंडी फहराती
तो वह ‘सुछवि के छायावन की साँस’ वाले पल्लवों को भूल गया।”[12]

(6) “गाँव के ‘कलंगी मौर वाले बावले कासों’ पर प्रयोगवादी कवि की भी दृष्टि जाती है लेकिन वह वहाँ केवल पिकनिक की गरज से जाता है और आँख मारकर चला आता है।”[13]

ऊपर निवेदन किया जा चुका है कि कसावट आचार्य शुक्ल की भाषा का प्राणतत्त्व है। शुक्ल जी की भाषा में एक भी अनावश्यक पद का प्रयोग प्रायः नहीं किया गया है। उनके वाक्य से एक भी पद अगर निकाल दिया जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाएगा। इसीलिए उनके वाक्य की तुलना प्रायः मिश्र के पीरामीड से की जाती है। इसी प्रकार विशेषणों के प्रयोग में भी वे अत्यन्त सतर्क और मितव्ययी हैं। आलोचना के लिए ऐसी ही भाषा आदर्श है और इससे आलोचक की विश्वसनीयता बरकरार रहती है। पर, सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि ऐसी भाषा नीरस हो जाती है। जैसे उबली हुई सब्जी चाहे लाख पौष्टिक हो, पर वह सुस्वादु नहीं होती, उसी प्रकार आलोचना के लिए ऐसी भाषा चाहे लाख आदर्श और विश्वसनीय हो, पर उसमें सरसता नहीं होती। ऐसी भाषा आलोचना के लिए आदर्श तो है, पर उसमें रचनात्मकता नहीं होती। दूसरी तरफ आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी न विशेषणों के प्रयोग में उतने सतर्क हैं और न ही वाक्य-गठन में अनावश्यक पदों के प्रयोग से उन्हें उतना परहेज है। इसीलिए उनकी भाषा में शुक्लीय कसावट और चुस्ती का तो अभाव है, पर सरसता की आर्द्रता भरपूर है। खुद नामवर जी ने मस्ती और फक्कड़पन को द्विवेदी जी के व्यक्तित्व की विशेषता के रूप में विश्लेषित किया है।[14] यह मस्ती और फक्कड़पन द्विवेदी जी की भाषा का भी मदिर आकर्षण है। हजारीप्रसाद द्विवेदी की भाषा में संस्कृत के अप्रचलित और कठिन पदों के साथ-साथ अरबी-फारसी और ठेठ भोजपुरी पदों का प्रयोग भी यही दर्शाता है।

नामवर जी द्वारा प्रयुक्त शीर्षकों की भाषा का क्या कहना! वास्तव में हिन्दी-आलोचना में किसी अन्य आलोचक का शीर्षक उतना सर्जनात्मक नहीं है, जितना नामवर जी का। इस दृष्टि से उनकी ‘छायावाद’ शीर्षक किताब के विभिन्न अध्यायों के शीर्षकों की भाषा आदर्श है। मिसाल के तौर पर, ‘प्रथम रश्मि’, ‘केवल मैं केवल मैं’, ‘एक कर दे पृथ्वी-आकाश’, ‘पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश’, ‘देवि माँ सहचरि प्राण’, ‘जागो फिर एक बार’, ‘कल्पना के कानन की रानी’, ‘खुल गए छंद के बंध’ और ‘जिसके आगे राह नहीं’।[15] छायावादी कवियों की कविताओं से उद्धृत इन पंक्तियों और पदबन्धों को शीर्षक बना देना नामवर जी की गहरी काव्यमर्मज्ञता का प्रमाण है। ये शीर्षक जितने सर्जनात्मक और रसास्वादक हैं, उतने ही छायावादी रचनाओं के मर्म और स्प्रिट तथा उनकी विभिन्न विशिष्टताओं को उजागर करने में समर्थ। किसी पुस्तक के अध्यायों के शीर्षकों में अन्तर्वस्तु और रूप के सन्तुलन और सामंजस्य का ऐसा अनोखा उदाहरण मुश्किल से मिलेगा।

पर, अपवादस्वरूप ही सही, कहीं-कहीं रूप और अन्तर्वस्तु के सन्तुलन और सामंजस्य का गियर नामवर जी के सधे हुए हाथों से छूट गया है और भाषा अलंकारिक हो गई है। नामवर जी की अलंकारिक भाषा की एक झलक द्रष्टव्य है, “…प्रगतिवाद आरम्भ की अनेक अध्यात्मवादी, व्यक्तिवादी, प्राकृतिकवादी आदि मध्यवर्गीय प्रवृत्तियों से क्रमशः मुक्त होता हुआ अपना प्रकृत जनवादी रूप प्राप्त कर रहा है। इस विराट जनवादी अभियान में जो रुका सो छूटा; जिसने इसका विरोध करने की हिमाकत की, वह गया और जिसने इसके उद्देश्य और कार्य में संदेह प्रकट किया, वह संदेहवादी टूटा। वे गुरु द्रोणाचार्य हों चाहे भीष्म पितामह, वे कर्ण हों अथवा जयद्रथ — इस महाभारत के विरोध पक्ष में जाकर उन्हें गतश्री होना ही है। अपने पूर्व वैभव के द्वारा आज वे चाहे जितने बड़े प्रतीत हो रहे हों लेकिन यदि इतिहास-विधाता के अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्र-वाले विराट वपु की वाणी सुनें तो पता चलेगा कि ये तमाम महारथी वस्तुतः मारे जा चुके हैं; इतिहास ने भीतर से इनका सारा तेज हर लिया है!”[16] यद्यपि आलंकारिक भाषा आलोचना के स्वास्थ्य के लिए हितकारी नहीं होती है, पर ऐसे स्थल नामवर जी की आलोचना की भाषा की दुनिया में अत्यल्प ही हैं।

‘सचाई यह है कि’ [“सचाई यह है कि ‘गहराई’ के हिमायती अधिकांशतः अन्तर्मुखी हैं और अपने अन्दर निरन्तर सिमटते जाने को ही वे गहराई कहते हैं।”][17], ‘सच पूछिए तो’ [“सच पूछिए तो सामाजिक वास्तविकता में प्रवेश करने पर ही हम अपने भी मन में प्रवेश करते हैं।”][18], ‘अगर यह कहें कि’ [“अगर यह कहें कि ‘आन्तरिक सामाजिकता’ का अर्थ है समाज को अपने अन्दर ले आना तो भी यह समस्या नहीं सुलझती।”][19], ‘मतलब यह कि’ [“मतलब यह कि लेखक के व्यक्तित्व को अपने-आपमें पूर्ण मान लेना गलत है।”][20], ‘तात्पर्य यह कि’ [“तात्पर्य यह कि लेखक की विशिष्टता उसकी व्यक्तिगत इकाई के अतिरिक्त अधिकांशतः उसके सम्बन्धों और सम्बन्धों की समझदारी पर निर्भर है।”][21] ‘गरज कि’ [“गरज कि विभिन्न रचनाओं में व्यक्त जीवन के चित्रों को देखने से पता चलता है कि कुल मिलाकर इन खण्ड-चित्रों से भी कहीं अधिक विशाल जीवन है जो समूचा-का-समूचा किसी एक रचना में नहीं आ सका है और न एक लेखक अथवा एक युग के सभी लेखकों की रचनाओं में ही वह महान चित्र आ पाया है।”][22], ‘कुल मिलाकर’ [“कुल मिलाकर यह बात हम सबके सहज ज्ञान को तुरन्त अपील करती है कि आदमी को अपने विवेक पर ही सबसे अधिक भरोसा करना चाहिए क्योंकि अपने प्रत्येक कार्य के लिए अन्ततोगत्वा प्रत्येक व्यक्ति स्वयं उत्तरदायी है।”][23], ‘बात यह है कि’ [“बात यह है कि आधुनिक परिस्थितियों ने इस युग के व्यक्ति को अत्यधिक संवेदनशील बना दिया…।”][24] और ‘निःसन्देह’ [“निःसन्देह विकास-क्रम में यह भावुकता धीरे-धीरे कम होती गयी और कैशोर भावुकता का स्थान प्रौढ़ चिंतन ने ले लिया।”][25] प्रभृति पद एवं पदबन्ध नामवर जी के तकिया कलाम हैं, जिनके प्रयोग से एक तरफ वाक्य-विन्यास में प्रवहमानता आ जाती है, दूसरी तरफ अर्थ-निष्पत्ति में नई जान। ‘कहना न होगा कि’ [“कहना न होगा कि कविता का यह वस्तुगत रूप-परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन के समानान्तर ही था।”][26] उनका सबसे प्रिय सखुन तकिया है और इसी शीर्षक से (‘कहना न होगा’) से उनके साक्षात्कारों का एक संग्रह भी प्रकाशित है। इसी प्रकार वाक्य के बीच में ‘गोया’ [“समाज और साहित्य के सम्बन्ध की चर्चा चलाते हुए अक्सर लोग इस तरह बात करते हैं गोया समाज अपने आप साहित्य हो जाता है।”][27] जैसे क्रियाविशेषण के प्रयोग से वाक्य के प्रवाह में क्षिप्रता आ जाती है और अर्थ-निष्पत्ति में जीवन्तता।

वाक्य-प्रवाह की यह क्षिप्रता कहीं-कहीं सूक्तिमयता का रूप ले लेती है, जैसे, “दृष्टि बदलते ही दृष्टिबिन्दु भी बदल गया और साथ ही दृश्य भी।”[28]

चुटकी लेने और चुटीले पदों एवं वाक्यों के प्रयोग में भी नामवर जी को दक्षता प्राप्त है। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी नामवर जी ऐसे वाक्यों के प्रयोग के द्वारा व्यंजकता से भरपूर अद्भुत हास्य की सर्जनात्मक फुलझड़ियाँ छोड़ते रहते थे। काशीनाथ सिंह ने हास्य-व्यंग्य से भरपूर ऐसे कई सरस प्रसंगों का जिक्र किया है।[29] हास्य-व्यंग्य से भरपूर ऐसी भाषा नामवर जी के सैद्धान्तिक आलोचनात्मक निबन्धों में भी कहीं-कहीं दिखाई पड़ती है। ‘इतिहास और आलोचना’ में संकलित पहले निबन्ध का प्रारम्भ ही इन पंक्तियों से होता है, “अक्सर देखते हैं कि पानी के सोते की तरह लेखक भी साफ होता है तो उथला कहा जाता है और गँदला होता है तो गहरा। इसका ताजा नमूना यह है कि ‘आलोचना’ के सम्पादक अपने को गहरा बता रहे हैं और प्रेमचन्द को सतही।…कदम-कदम पर संघर्ष करते हुए जिस ‘होरी’ ने जिन्दगी का लम्बा रास्ता तय किया, उसने तो अपनाया ‘शॉर्टकट’ और जिसने बैठे-बिठाये आसमान में ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ दौड़ाया उसका रास्ता हुआ लम्बा! क्यों न हो? आसमान से धरती तक की लम्बी दूरी, सपनों का भारी बोझ और टाँगें बेकार! नौ दिन चले अढ़ाई कोस!

“ ‘शॉर्टकट’ की शिकायत केवल सातवें घोड़े के सवार को ही हो”, ऐसी बात नहीं है। शिकायत करनेवाले और भी हैं। इनका विरोध ‘सीधी रेखा’ से है। ‘सीधी रेखा’ से उनका मतलब है सोद्देश्यता। साहित्य में जहाँ सोद्देश्यता होती है, उसे वे समाज की ‘सीधी छाया’ या सत्य की ‘सीधी रेखा’ कहते हैं। यह ‘सीधी रेखा’ वही ‘शॉर्टकट’ है, जिसका निषेध करके ‘वर्तुल अथवा वक्र रेखा’ पर चलने की सलाह दी जाती है। ‘चलई जोंक जल वक्र गति जद्यपि सलिल समान।’ ”[30] इसी सन्दर्भ में उनका यह उद्धरण भी द्रष्टव्य है, “मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र पर डॉ. रमेश कुंतल मेघ का पांडित्यपूर्ण लेख सुनने के बाद सोचना पड़ रहा है कि सौंदर्य की चर्चा इतनी असुंदर क्यों होती है। एक तो सौंदर्यशास्त्र जैसा गंभीर विषय, फिर उस पर कुंतल मेघ जी की गुरु गंभीर भाषा। “ज़िक्र उस परीवश का और और फिर बयाँ अपना।” राज़दाँ भी रक़ीब होने के लिए लाचार है, बेशक किसी और अंदाज़ में। कुंतल मेघ जी की यही भाषा सुनकर अज्ञेय ने कभी कहा था कि कि कुंतल तो कभी-कभी छँट भी जाते हैं, मेघ कभी नहीं छँटते।”[31] यहाँ एक ही साथ व्यंग्य की बेधकता और हास्य की रोचकता देखते ही बनती है।

यह उद्धरण नामवर जी के एक भाषण का आरम्भिक अंश है और कहना न होगा कि मारक व्यंग्य की बेधकता और हास्य की गुदगुदाहट उनके भाषणों में विशेष रूप से निखरकर सामने आई है। निस्सन्देह उनके भाषणों की भाषा का विश्लेषण अलग से अपेक्षित है, पर प्रसंगवश यहाँ यह निवेदन करना असंगत न होगा कि नामवर जी के भाषण, भाषण-कला या वक्तृत्व-कला के सर्वश्रेष्ठ निदर्शन हैं। सर्वविदित है कि नामवर जी हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ वक्ता थे। वस्तुतः हिन्दी अकादमिक-जगत् के वे लिजेण्डरी वक्ता थे। यह भी सुविदित है कि उनके व्याख्यानों के वाक्य भी लिखित निबन्धों की तरह सुगठित होते थे। इतना ही नहीं, निरक्षर लोगों के बीच भी उनके भाषणों की बड़ी धूम थी। प्रसंगवश ध्यातव्य है कि 1959 में वे चकिया चन्दौली लोकसभा से भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के प्रत्याशी के रूप में लोकसभा का चुनाव लड़ा। इस चुनावी अभियान के दौरान दिए गए उनके भाषणों का जिक्र करते हुए काशीनाथ सिंह ने लिखा है, “विद्यार्थियों, लेखकों, पाठकों, बुद्धिजीवियों के बीच उन्होंने बड़े भाषण दिए हैं, काश, गाँव की अपढ़ जनता के बीच दिए गए वे भाषण आज हमारे पास होते!

“लोगों ने वोट तो नहीं दिए, लेकिन वे भाषण आज भी याद रखे हुए हैं।”[32]

अगर आगे हिन्दी में कभी वक्तृत्व-कला का शास्त्र निर्मित होगा तो नामवर जी के भाषण उसके आदर्श प्रतिमान के रूप में उद्धृत किए जाएँगें। नामवर जी के भाषण वास्तव में वक्तृत्व-कला के मानदण्ड हैं।

नामवर सिंह की आलोचना-भाषा की इन इन्द्रधनुषी और बहुरंगी विशेषताओं की आभा ने हिन्दी-आलोचना की भाषा को रचनात्मकता की खूशबू प्रदान की।

सन्दर्भ  :
[1]) नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान (काव्य-बिंब और सपाटबयानी), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, पुनर्मुद्रण 1995, पृ. 115-131
[2]) यथावत् उद्धृत (SIC)
श्री सुमित्रानन्दन पन्त, पल्लव (प्रवेश), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, नौवां संस्करण, 1993, पृ. 29-30
[3]) डॉ. राजवंश सहाय ‘हीरा’, भारतीय आलोचनाशास्त्र (वक्रोक्ति-संप्रदाय), बिहार हिंदी ग्रंथ अकादमी, पटना-3, प्रथम संस्करण 2000, पृ. 247-248
[4]) रामचन्द्र शुक्ल (सम्पादक, नामवर सिंह), चिन्तामणि, तीसरा भाग, (विज्ञप्ति), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, द्वितीय संस्करण, 1985, (पृष्ठ सं. अंकित नहीं है)
[5]) नामवर सिंह (सम्पादक, ज्ञानेन्द्र कुमार सन्तोष), हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल (हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, पहला संस्करण 2013, पृ. 48
[6]) नामवर सिंह, दूसरी परम्परा की खोज (व्योमकेश शास्त्री उर्फ हजारीप्रसाद द्विवेदी), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, तीसरी पेपरबैक आवृत्ति 2000, पृ. 119
[7]) रामचन्द्र शुक्ल (सम्पादक, नामवर सिंह), चिन्तामणि, तीसरा भाग, (विज्ञप्ति), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, द्वितीय संस्करण, 1985, (पृष्ठ सं. अंकित नहीं है)
[8]) नामवर सिंह, छायावाद (पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, प्रथम पेपरबैक संस्करण 1993, पृ. 38
[9]) नामवर सिंह, छायावाद (पद-विन्यास), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, प्रथम पेपरबैक संस्करण 1993, पृ. 113
[10]) नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (छायावाद), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, सातवाँ संस्करण 1983, पृ. 28
[11]) नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (छायावाद), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, सातवाँ संस्करण 1983, पृ. 44
[12]) नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (प्रगतिवाद), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, सातवाँ संस्करण 1983, पृ. 95
[13]) नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (प्रगतिवाद), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, सातवाँ संस्करण 1983, पृ. 98
[14]) नामवर सिंह, दूसरी परम्परा की खोज (व्योमकेश शास्त्री उर्फ हजारीप्रसाद द्विवेदी), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, तीसरी पेपरबैक आवृत्ति 2000, पृ. 118-119
[15]) नामवर सिंह, छायावाद (अनुक्रम), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, प्रथम पेपरबैक संस्करण 1993, पृ. 7-9
[16]) नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (छायावाद), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, सातवाँ संस्करण 1983, पृ. 94
[17]) नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना (व्यापकता और गहराई), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, चौथा संस्करण 1986, पृ. 18
[18]) नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना (व्यापकता और गहराई), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, चौथा संस्करण 1986, पृ. 19
[19]) नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना (व्यापकता और गहराई), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, चौथा संस्करण 1986, पृ. 18
[20]) नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना (समाज, साहित्य और लेखक का व्यक्तित्व), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, चौथा संस्करण 1986, पृ. 39
[21]) नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना (समाज, साहित्य और लेखक का व्यक्तित्व), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, चौथा संस्करण 1986, पृ. 42
[22]) नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना (समाज, साहित्य और लेखक का व्यक्तित्व), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, चौथा संस्करण 1986, पृ. 43
[23]) नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना (आस्था का प्रश्न), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, चौथा संस्करण 1986, पृ. 67
[24]) नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (छायावाद), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, सातवाँ संस्करण 1983, पृ. 30
[25]) नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (छायावाद), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, सातवाँ संस्करण 1983, पृ. 30
[26]) नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना (पाँचवें दशक की कविता), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, चौथा संस्करण 1986, पृ. 76
[27]) नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना (समाज, साहित्य और लेखक का व्यक्तित्व), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, चौथा संस्करण 1986, पृ.37
[28]) नामवर सिंह, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (प्रगतिवाद), लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद-1, सातवाँ संस्करण 1983, पृ. 95
[29]) काशीनाथ सिंह, घर का जोगी जोगड़ा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, पहला पेपरबैक संस्करण 2008, पृ. 28, 29, 30, 45, 57, 107
[30]) नामवर सिंह, इतिहास और आलोचना (व्यापकता और गहराई), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, चौथा संस्करण 1986, पृ. 9-10
[31]) नामवर सिंह, वाद विवाद संवाद (मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र के विकास की दिशा), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, द्वितीय संस्करण 1991, पृ. 73
[32]) काशीनाथ सिंह, घर का जोगी जोगड़ा (गरबीली गरीबी वह), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली-2, पहला पेपरबैक संस्करण 2008, पृ. 28

- अभय कुमार
एसोसिएट प्रोफेसर, दयाल सिंह कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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