संस्मरण : शिव से शिवालिक की यात्रा: छाया चौबे

शिव से शिवालिक की यात्रा
- छाया चौबे

शोध निर्देशक : नामवर जी (भारतीय भाषा केंद्र) 27 सितम्बर 2012

“धरती सब कागज़ करूँ ,लेखनी सब बनराय |
सात समुन्द्र की मसि करूँ ,गुरु गुण लिखा न जाय||” (कबीर)

हिंदी जगत में एक शीर्षस्थ आलोचक के रूप में नामवर जी को भला कौन नहीं जानता | वाचिक परम्परा के सबसे बड़े हस्ताक्षरके रूप में नामवर जी जानें कितनी पीढ़ियों का पथ आलोकित करते रहेंगे| सबके हिस्से के अपने अपने नामवर जी हैं| उसी एक हिस्से में नामवरजी मेरे गुरु बनकर मेरे जीवन का एक अलग अध्याय रचते हैं | नामवर जी को छात्र जीवन से ही सुना-पढ़ा है लेकिन एक शोध निर्देशक के रूप में मुझे गढ़ने वाले गुरु के रूप में मेरी यात्रा जवाहरलाल नेहरु विश्विद्यालय से शुरू होती है| इसलिए मैंने इस संस्मरण का नाम शिव से शिवालिक रखा| मैं शिव की नगरी काशी में पली-बढ़ी हूँ। शिवालिक उस पड़ाव का नाम है जहाँ मेरे जीवन को दिशा मिली। ये नाम तब से ज़ेहन में था जब से मैं अपने गुरूवर नामवर जी की स्मृति को कहीं अंकित करना चाहती थी।

कहते हैं कि मूर्खता का स्वाद कभी-कभी बहुत मीठा लगता है उनमें एक स्वाद यह भी है कि मैं जब जेएनयू के सपने देखती थी तो उसमें कक्षाओं में पढ़ाते नामवर जी की छवि भी क़ैद थी। जुलाई 2010, जेएनयू में दाखिला लेने के बाद मैंने सीआईएल में चेम्बर के सभी बोर्ड खंगाल डाले जिसपर नामवर जी का नाम लिखा हो। अंततोगत्वा मुझे पता चला कि नामवर जी रिटायर्ड हो चुके हैं और अब केवल शोध कराते हैं। मैंने उसी दिन नामवर जी के निर्देशन में शोध की इच्छा को प्रबल कर लिया था। एम.फिल. में कोर्सवर्क के बाद जब शोध-निर्देशक की प्रक्रिया शुरू हुई तो नामवर जी के निर्देशन में कुछ छात्रों का चयन हो चुका था किन्तु इस पूरी चयन प्रक्रिया से मुझे बाहर रखा गया। न मालूम क्यों हमारे एक प्रोफेसर को ऐसा लगता था कि नामवर जी के निर्देशन में शोध हेतु केवल वही छात्र योग्य हैं जिन्होंने एम.ए. जेएनयू से किया है| मैं इस दायरे से बाहर थी। मन बहुत उलझन में था क्योंकि नामवर जी से मिलना तो दूर फ़ोन मिलाने पर गुस्से में फ़ोन तुरंत काट देते थें। इसी बीच बीएचयू के एक प्रोफ़ेसर और मेरे प्रिय शिक्षक ने मुझे नामवर जी के घर जाकर बात करने की सलाह दी। बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना अनुमति लिए ,बगैर किसी रेफरेंस के नामवर जी के घर जाना किसी समुद्र को पार करने जैसा लग रहा था| उस पर से दिल्ली जाने के बाद मैंने जेएनयू कैंपस से बाहर कभी कदम नहीं रखा था| कैम्पस से बाहर निकलना मेरे लिए बड़ी चुनौती थी। बाणभट्ट की आत्मकथा की पंक्तिया – किसी से न डरना, न गुरु से, न लोक से , न वेद .....” को मन में रटती पहली बार कैम्पस से बाहर कदम रखा| अलकनंदा ,शिवालिक अपार्टमेंट फ़्लैट नम्बर बत्तीस | यह पड़ाव न केवल शिवालिक की ओर था बल्कि मेरे जीवन के आगामी परिवर्तन का भी था | इस क्रांतिकारी पड़ाव का नाम था शिवालिक। मन में बहुत से विचार आवाजाही कर रहे थे और डर सबसे ज़्यादा लग रहा था क्योंकि फ़ोन पर नामवर जी की डाँट याद आ रही थी। आख़िर मैं शिवालिक अपार्टमेंट पहुँची। एक लंबी गहरी साँस भरी। गेट पर गार्ड ने नामवर जी के घर का रास्ता दिखाया। फिर आख़िर में जाकर अंतिम लेन में ऊपर की सीढ़ियाँ चढ़ने लगी। उन एक एक सीढ़ियों पर चढ़ते समय लगा जैसे किसी शिखर या चोटी पर चढ़ाई कर रही हूँ। मन की सारी घबराहट पीछे छूट रही थी और एक स्थिरता, एक शांति साथ आगे बढ़ रही थी। सोचा क्या होगा? अगर डांट खाई तो कहूँगी नामवरजी ने डांटा है| मैं अपनी मंजिल पर पहुँच चुकी थी। मैं जिस शिखर पर खड़ी थी वो शिखर आलोचना के शिखर पुरुष प्रो नामवर जी का घर था।

दरवाज़े के बाहर एक तुलसी का पौधा मुंडेर पर रखा था। दरवाज़े से लगा चिट्ठियों का बॉक्स था। वो दरवाजा आज भी याद है। घंटी बजाने के बाद दरवाजा खोलकर धीरे-धीरे आगे बढ़ते कदमों से सोफे पर बैठे नामवर जी को देख मन श्रद्धा से नत था। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिन नामवर जी से मैं जेएनयू आने के बाद मिलने का रास्ता खोज रही थी। आज उसी मुकाम पर हूँ। मैंने साहित्य की दुनियां में आचार्य शुक्ल, आचार्य द्विवेदी की अग्रणी परंपरा के रूप में हाड़मांस के 84 वर्षीय नामवर जी को देखा। वह युगपुरुष मेरे सामने बैठे थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उनकी विद्वत्ता और वाग्मिता के अनेक किस्से सुने थे और खचाखच भीड़ से भरी संगोष्ठियों में बोलते सुना था। प्रेमचंद, निराला, अज्ञेय, बच्चन, मुक्तिबोध, जैनेंद्र किसी को देखा-सुना नहीं था। उस दिन मेरे सामने वाचिक परंपरा के सबसे बड़े मूर्धन्य आलोचक गुरूवर नामवर जी खड़े थे। इस संदर्भ में याद आता है राजेन्द्र यादव ने कहीं कहा था कि” पीढ़ियाँ याद करेंगी कि उन्होंने नामवर को देखा है।“ वही क्षण मेरे लिए भी था जहाँ गोष्ठियों की तमाम भीड़ से अलग एक साधक पुरुष के रूप में मैं उन्हें देख रही थी। मैंने पैर छूना चाहा पर नामवरजी ने मना कर दिया। मैं नीचे दरी पर बैठने लगी तो कहा कि विद्यार्थी भी शिक्षक को सिखाता है इसलिए वह उसके समकक्ष है। कुर्सी पर बैठो। वह नामवर जी का अपार्टमेंट वाला फ्लैट नहीं बल्कि एक योगी का साधना स्थल लग रहा था। चारों ओर बस किताबों का ढेर। जहाँ तक नज़र जाती बस किताबें ही दिखायी पड़ी। भीतर का कमरा जो उनके सोने का कक्ष था उस बिस्तर पर बड़ी ऊँचाई तक सिर्फ़ पुस्तकें…यत्र तत्र सर्वत्र पुस्तकें। नामवर जी जहाँ सोफ़े पर बैठे थे उसके ठीक ऊपर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की मुस्कुराती हुई भव्य तस्वीर और उसके नीचे बैठे नामवर जी ।हाँ वही दूसरी परमरा की खोज करने वाले ,आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अन्यतम शिष्य नामवर जी| बायीं ओर छन्दों से आजादी के लिए बगावत करने वाले महाप्राण निराला की तस्वीर का औदात्य फैला था| बगल में कोना लिए टेबल पर ढेरों अवार्ड एवं स्मृतिचिन्ह बिना किसी सजावट के रखे गए थे| एक लम्बी ऊँची नर्तकी जैसी प्रतिमा हमेशा ध्यान खींचती थी| उसी टेबल के साथ सोफे और टेबल पर रखी पत्रिकाओं –शोध ग्रंथों के ढेर को मैं निहार रही थी और सोच रही थी| इतना सब पढ़ पाना कैसे संभव है? सभी पत्रिकाएँ लिफाफे से निकालकर पढ़ी हुई सी थीं। मानों सभी अपने लेखन को नामवर जी तक ज़रूर पहुंचाना और पढ़वाना चाहते थे| कि काश! नामवर जी उनके लिखे पर दो शब्द कहीं कह सुन दें। तभी उस घर का मौन टूटा। ऐसा लगता था कि सन्नाटा भी नामवर जी के साथ साधना कर रहा है| शब्द साधक और भाषा के समर्थ सर्जक ने अपने शब्द अरण्य से निकलकर कुछ कहा-क्या काम है? सर शोध हेतु आपका मार्गदर्शन चाहिए। नामवर जी ने कहा अभी तो दो रोज पहले ही गया था उसी मीटिंग में ,कुछ शोधार्थियों को संस्तुति दे दी गई। मैंने कहा सर मुझे इस मीटिंग से बाहर रखा गया ताकि मैं आपसे न मिल सकूँ। मैंने जेएनयू से पी.जी.नहीं किया है संभवतःयही कारण है। कहाँ से पढ़ाई की है? मैंने कहा सर उदय प्रताप कॉलेज से स्नातक और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से परास्नातक। उदय प्रताप कॉलेज ,काशी हिंदू विश्वविद्यालय फिर अपभ्रंश साहित्य का स्पेशल पेपर पढ़ने का ज़िक्र। इस परिचय के बाद नामवर जी तेवर अचानक बदल गया ऐसा लगा कोई जादू कर अपना रूप बदल लिया। मन्द मुस्कुराए आँखों की बढ़ी चमक से मेरे विषय ज्ञान को जाँचने लगे। बी. ए. में क्या विषय थे ? मेरे हिंदी के बाद संस्कृत बोलते ही वे बोले पाणिनि के बारे में क्या जानती हो ,माहेश्वर सूत्र याद है? मुझे याद है कि मैं कंठस्थ सूत्र को बड़ी ही गंभीरता से ठहर कर बोलने लगी। मैं खुश थी कि महेश्वरसूत्र मुझे कंठस्थ था और कुछ अन्य सवालों के बाद उदय प्रताप कॉलेज के अपने दौर और कुछ शिक्षकों के बारे में बताने लगे। मैं दत्तचित्त होकर नामवर जी को सुन रही थी जैसे लगा कि नामवर जी कितने आत्मीय भाव से बात कर रहे हैं। मैं सोच रही थी कि इतना आतंकित मन क्यों था मेरा। नामवर जी कितने सहज हैं। फिर नामवर जी ने जेएनयू प्रवेश के दौरान प्रस्तुत शोध प्रस्ताव के बारे में पूछा। मेरे “एक कहानी यह भी:मन्नू भंडारी”जी की पुस्तक का नाम लेते ही उन्होंने सामने टेबल पर रखी छोटी सी डायरी से मन्नू जी का नंबर निकाला| कहा मन्नू जी से बात करके मिल लो वो मेरी अच्छी मित्र हैं। उनका लेखक बहुत ठोस है। फिर नामवर जी ने पानी पूछा और धीरे- धीरे कदमों से बगल में किचन से पानी लाने चले गए। मुझे शर्मिंदगी होने लगी मैंने कहा- सर मैं पानी ले लेती हूँ। आप बैठिए। फिर मुस्कुराकर कहा-इस घर का भूगोल जानती हो? सचमुच एक सादा किंतु अद्भुत भूगोल था उस घर का। “फूल मरै पर मरै न बासु” वाली विद्वात्तामय सुगंधी सर्वत्र विद्यमान थी। शब्द साधना के बाद जो दिव्यता उस वातावरण में थी बताना मुश्किल होगा कि और कहाँ मैंने ऐसा महसूस किया।

अब बतौर शोध निर्देशक के रूप में सर ने मेरे आवेदन पत्र पर संस्तुति दे दी। सामने टेबल पर टिका कर रखा कैलेंडर, छोटा सा पेन स्टैंड जिसमें जेल पेन, दो- एक पेंसिल और बगल में छोटी सी डायरी जिसमें फोन नम्बर लिखा होता था साथ ही बेतरतीब ढंग से अनगिनत गोष्ठियों में बुलावे के ढेरों आमंत्रण-पत्र,चूने की डिबिया,रिमोट और चश्में का डिब्बा पड़ा था| ऐसा लगता था कि इन वस्तुओं को सफाई के दौरान किसी को हाथ लगाने की अनुमति नहीं थी| नामवर जी ने जेल पेन निकालकर संस्तुत लिखकर अपना नाम लिखा। केवल अपना नाम जो बिना किसी उपाधि के ही एक बड़ा नाम था– नामवर सिंह| उस क्षण मैं एक अदम्य उत्साह से भर गई। नामवर जी से इतना स्नेह पाकर मैं अभिभूत थी। एक युगपुरुष गुरुवर नामवरजी की मैं शोधार्थी थी| अब आगे की राह और कठिन थी| ख़ैर! नामवर जी का निर्देशन मिलना आसान राह नहीं । ये मानकर ही मैं उनके पास गई थी।

काग़ज़ी औपचारिकताओं के बाद विषय चयन की बारी आयी| किसी ने कहा 4-5 टॉपिक ले जाओ फिर आगे वे खुद बतायेंगे| मैं चार शीर्षक में टॉपिक लिखकर ले गई थी जिसमें अपभ्रंश पर काम करना पहली प्राथमिकता थी और आखिरी शीर्षक भारतेंदु के लेखन पर था| सर ने व्यंग में कहा– तुम्हारा ज्ञान तो आदिकाल से आधुनिक काल तक छाया है| मैं चुप हो गई| सर ने कहा पद्मावत पर काम करो लेकिन आलोचनातमक पक्ष पर नहीं| आलोचना स्वयम में सर्जना है| एम.फिल. के लिए बहुत व्यापक विषय हो जायेगा| आगे विषय पर बोलते हुए उन्होंने “पद्मावत में स्त्री की छवि” विषय रखा। नामवर जी ने कहा- “दुनिया के किसी धर्म में स्त्री को खुदा नहीं माना गया| हमारे यहाँ भी देवियों की चर्चा उस तरीके से नहीं मिलती है जैसे सूफ़ियों ने स्त्री को गढ़ा। सृष्टि की सर्जना में जिस अद्भुत सुंदरता का सर्जन सूफ़ियों ने किया, अन्यत्र नहीं। प्रेम की जो परंपरा आधुनिक काल में छायावाद तक जाती है वो सूफ़ी प्रेम परम्परा की ही कड़ी है।“ फिर अंग्रेजी की कई पुस्तकों के नाम, प्रकाशन के साथ नोट कराया और चंद्रबलि पांडेय की पुस्तक पर जोर देकर कहा कि शोध की दृष्टि से यह पुस्तक कितनी महत्वपूर्ण है| साथ ही विजयदेव नारायण साही की पुस्तक की चर्चा करते हुए कहा-“’ लिखों तो पत्थर पर, पानी पर क्या लिखना । ये पुस्तक ऐसी ही है ;कम से कम में जितनी बातें साही जी ने लिखी है वे बहुत ही मानिखेज़ हैं।“ कई अन्य पक्षों की चर्चा की जिससे लगा कि नामवर जी विजयदेव नारायण साही के कितने मुरीद थे ।

नामवर जी ने सीआईएल में कक्षाएं भी ली| हमारे जूनियर बैच के साथ नामवरजी की कक्षा में बैठने का मेरा स्वप्न भी पूरा हुआ| दो कक्षाएं ली गई जिसमें एक पद्मावत पर और एक शोध प्रविधि पर| शोध में बड़े विषय नहीं होते बल्कि विषय छोटा और शोध बड़ा होना चाहिए| नामवर जी ने कहा कि अगर कोई चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जी एक कहानी “ उसने कहा था” पर एम. फिल. में शोध करना चाहे तो मैं तैयार हूँ| 50-60 पन्नों के भीतर एक महत्वपूर्ण शोध लिखा जा सकता है| नामवर जी ने अपनी कक्षा में उदाहरणों का भरपूर प्रयोग किया जिससे सभी बातें हम तक पहुचीं और आज भी इतने वर्षों के बाद कुछ बातें याद हैं | जैसा की नामवर जी कहते थें कि कक्षा के पूर्व की उनकी तैयारी किसी काम नहीं आती थी| सचमुच ! उनकी वाणी में जो विद्वता थी उससे ऐसा महसूस होता था कि बिना किसी आयास के ही ज्ञान का सहज प्रस्फुटन हो रहा है | स्मृतियों के संचित कोष में ऐसे क्षणों को मैंने बड़े जतन से संजोया है|

कक्षा लेते नामवर जी, सीआईएल|

अब मुझे सर की दिनचर्या याद हो गई थी| 9 बजे फ़ोन करके समय लेना है फिर उनके बताए अनुसार 11 बजे या शाम 4 बजे मिलना है। नामवर जी समय के पाबंद थे| वे कब सोते हैं, कब मिलतें हैं, कब फ़ोन उठाते हैं इत्यादि जानकारी उनसे मिलनें वालों को याद रहती। एक रोज़ शिवालिक जाते वक्त मैं सत्तू लेकर गई थी जो मेरे गांव से आया था। घर में प्रवेश करते ही मैंने जैसे ही सत्तू को झिझक के साथ सर को देने की कोशिश की। तुरंत सर ने हाथ से लेकर मेज पर रखने की बजाय वे किचन की ओर बढ़ गए। मानो सत्तू को भीतर किचन में रखकर उन्होंने सत्तू को आश्वस्त कर दिया की अब महाराज सत्तू महफ़ूज़ हैं। बाद के वर्षों में एक साक्षात्कार में पढ़ा कि उन्होंने अपना प्रिय भोजन सत्तू बताया ।

जब पद्मावत पर पहला अध्याय लिखा तो डर बहुत था| वहां मुझसे पहले एक शोधार्थी मौजूद थे। मेरे सामने नामवर जी ने उस शोधार्थी के लिखे को क्रोध से फेंक दिया। कहा इतना आडम्बर भर कर लाए हो अब जाओ यहाँ से ।मैं सोच रही थी कि यदि कोई ईमानदारी से कहे तो कहेगा मैंने नामवर जी से डाँट खायी है और यह कितना अनमोल है। डांट भी गुरू का प्रसाद है ऐसा सोचकर डर कम हो जाता लेकिन धीरे धीरे सर से हुई एक एक मुलाकातों के क्रम में सब सहज और सुखद लगने लगा। मुझे नामवरजी से अपने गुरु से इतना नेह क्यों मिला? शायद उसका बड़ा कारण मेरा बनारसी होना भी हो सकता है| बनारस से सर को कितना नेह है सभी जानते हैं| मुझे कईयों के किस्से मालूम थे| नामवर जी का किसी को समय देना कोई छोटी बात नहीं थी| उनके सामने मुझे हर क्षण लगता था कि इस उम्र में मुझे उनके मार्गदर्शन की जो रौशनी मिली है वह मेरे जीवन की अनमोल थाती है| मैं अपने सामने नामवर जी की आँखों के पैनेपन को देख रही थी। जो ओज था वह उनकी उस एकांत तपस्थली में एक साधक का तेज था| जिसे उन्होंने अर्जित किया था।

नामवर जी ने प्रथम अध्याय में ‘इल्म ए सीना’ शब्द पढ़ा और जाने क्या था वाह! कहकर वहीं ठहर गए फिर उसकी लंबी व्याख्या की। आगे कहा पद्मावती के भव्य बखान में नागमती को नजरंदाज मत करो| क्या नागमती को निकाल देने से पद्मावत वही रह जायेगा। इसी तरह सृजन शब्द पढ़कर कहा सर्जन शब्द सही है और इसकी भाषा वैज्ञानिक व्याख्या की। कहा एक शब्द जानो पर सम्यक | एक एक शब्द का इतना विस्तृत अध्ययन मुझ जैसे अदने छात्र को अचरज से भर देने वाला था |

एक बार बहुत अचरज वाली घटना भी हुई। मैंने किसी शब्द में हलंत लगाया था| कोई कोटेशन था| नामवर जी ने कहा- हलंत का बोझ क्यों लाद दिया इस शब्द पर? मैंने कहा- नहीं सर पुस्तक से यथावत लिया गया है। नामवरजी ने तपाक से संस्करण और पेज नंबर बताते हुए मुझे लाइब्रेरी से दाहिनी ओर से माताप्रसाद गुप्त वाली पद्मावत लाने को कहा। फिर पेज नंबर और पंक्ति बताते हुए कहा देखो हलंत कहाँ है? मैं अचंभित थी कि सर को पेज नंबर और उस कोटेशन की पंक्ति भी याद थी। ऐसी स्मृति क्षमता (फोटोग्राफ़िक मेमोरी)जिसके बारे में केवल पढ़ा था,चकित भाव से प्रत्यक्ष महसूस किया| काशीनाथ सिंह ने भी लिखा है अँधेरा होने पर वे एक खेल खेलते थे| जिसमें जिस भी पुस्तक का नाम वो लेते भईया (नामवर जी) तुरंत खोज निकलते | उस रोज मैंने देखा कि 85 साल के नामवर जी की स्मृतिक्षमता कितनी अद्भुत थी। ऐसा ज्ञान जो सभाओं में श्रोता को मुग्ध कर देता है, निरुत्तर कर देता है| केवल मात्र गुरुवर नामवर जी ही कर सकते हैं अन्य नहीं |

अब मैं उस श्रेणी में आ गई थी जिसे नामवर जी ने साथ चाय पीने का अवसर दिया हो। शाम के वक़्त मिलने पर कुसुम दीदी जो नामवर जी की गृहसेविका थीं उनके द्वारा एक लेमन टी बग़ैर चीनी के, साथ में दो मुनाको बिस्किट आती थी। एक बिस्किट सर बड़ी आत्मीयता से मेरी ओर बढ़ा देते। अब शोध के अलावा भी बहुत सी बातें होने लगी। जैसे सीआईएल,नागरी प्रचारिणी सभा,बनारस और जेएनयू की बातें। सर जो भी पूछते मैं बहुत बेबाकी और सच्चाई से जवाब देती ।मेरी बहुत सी बातों को सुनकर मुस्कुरा उठते|

मुझे बहुत तस्वीरें लेना पसंद नहीं था लेकिन नामवर जी के साथ अक्सर ये साध रहती थी। प्रायः सर अकेले ही होते थे इसलिए तस्वीर लेना संभव नहीं हो पाता | गाहे-बगाहे घर की अनेक तस्वीरें खीच लिया करती थी और जब कुसुम दीदी (गृहसेविका) होती तो मैं अनुरोध जरूर करती। बस एक तस्वीर सर के साथ चाहिए| जब भी नामवर जी से कहा वे कभी मना नहीं करते थे बल्कि भीतर जाकर एक धवल कुर्ता पहन कर आते और फिर तस्वीर लेने की अनुमति देते। नामवर जी बगल में बैठने को कहते और तस्वीर के साथ मैं अपने हिस्से का इतिहास क़ैद कर लेती। एम.फ़िल जमा करते समय नामवर जी का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था लेकिन फिर भी तस्वीर लेने के आग्रह पर वे भीतर गए और एक साफा ओढ़ कर बैठ गए। उस मुस्कुराती तस्वीर को देखकर आज भी वही अनुभूति होती है| इससे लगता है कि वे हर क्षण जीवंत और सजग रहने वाले व्यक्ति थें। उनके अनुशासनात्मक जीवन की हर छवि बेजोड़ थी।

तस्वीर -नामवर जी :शिवालिकअपार्टमेंट

एम.फ़िल के बाद पीएचडी के लिए नामवर जी ने पास भक्तमाल का आलोचनात्मक अध्ययन विषय लेकर गई| नामवर जी ने हँसते हुए कहा तुम आलोचक और आलोचना के पीछे ही पड़ी हो। मेरे अनुरोध करने पर कहा भक्तमाल बहुस्तरीय रचना है इसलिए सबसे पहले प्रियादास की टीका सहित, सीतारामशरण के तिलक के साथ “भक्तमाल” पढ़ो | अगली मीटिंग सीईएल में थी जहाँ सर ने इस ग्रंथ में अनेक सांस्कृतिक विषयों जैसे हाट-बाज़ार, नदी, उत्सव, खेत खलिहान आदि की चर्चा की और कहा इन पहलुओं के दृष्टिकोण से “भक्तमाल का सामाजिक सांस्कृतिक अवदान” शीर्षक तय किया। इस दृष्टि भक्तमाल पर कोई शोधकार्य नहीं हुआ था। क्षणभर में जो जानकारी सर से मिल जाती थी कि उसका कोई अन्य स्रोत नहीं मिलता था। जैसे राजस्थान के पोथीखाने में उपलब्ध सामग्री का भी जिक्र किया। उन्हें पुस्तक के साथ प्रकाशन और संस्करण सब याद होता था | किसी भी विषय पर सबसे महत्वपूर्ण और एक नए संदर्भ के मौलिक विचार उसी क्षण बताना सचमुच! हमें हतप्रभ करता था|

पीएचडी के दौरान एक और वाकया हुआ | संभवतः जुलाई, 2014 में यूजीसी की ओर से नोटिस जारी की गई जिसमें कहा गया कि एमेरिटस प्रोफ़ेसर, को–सुपरवाईजर ही होंगें | इस बदलाव से अफरा-तफरी वाली स्थिति थी| कई शोध निर्देशकों ने सह-शोध निर्देशक बनने से इन्कार कर दिया | मेरी एक शोधार्थी मित्र के साथ मैं केदार जी के घर भी गई थी जिन्होंने एम.फिल. के बाद, को-गाइड बनने से साफ़ मना कर दिया | मैं मन ही मन आश्वस्त हो चुकी थी कि अब नामवर जी शोध नहीं कराएँगे| जब मैं इस विषय पर नामवर जी से बात करने गई तो उन्होंने ग़ालिब का कोई शेर कहते हुए कहा” सह-निर्देशक बनना प्रथम दृष्टया अनुचित लगता है किन्तु जब मैं जगह की जब्द से आजाद हूँ तो फिर सह-निर्देशक बनने से बात नहीं बदल जाएगी| हम पी- एचडी शोधार्थियों की आखिरी खेप के शोधार्थी थे| अगर नामवर जी शोध न भी कराते तो उन्हें कोई फ़र्क न पड़ता लेकिन उनका हमें शोधार्थी चुनना, हमारे जीवन के लिए ऐसा ऋण है जिसे नहीं चुकाया जा सकता| नामवर जी ने छात्र-हित में हमें शोध कराने का निर्णय लिया |

नामवर जी के घर अब जब भी जाना होता कालका चौराहे पर बुके शॉप के बगल से पान दुकान तक पहुचते ही बस खड़े होने की देर थी कि नामवर जी के लिए पान बाँध कर दे देते। जाड़े का दिन था| सामने से मीठी धूप आ रही थी| सर पान देखकर बहुत खुश हुए। पान खाने के बाद बीएचयू के हिंदी विभाग के सामने की पान दुकान की तीन पीढ़ियों की कथा सुनायी। अक्सर मैंने देखा था पान खाने के बाद सर का मिजाज बहुत खिल उठता था।

मई 2015 की दोपहरी, मैं बहुत अशांत थी क्योंकि शोध-सामग्री भी नहीं जुटा सकी थी और न्यायोचित काम भी नहीं हुआ था। नामवर जी ने मेरे लिखे को बस नज़र भर देखा| बोले– एक टेढ़ी लकीर खींचना आसान है लेकिन एक सीधी रेखा खींचना बहुत कठिन है| हांथों के संतुलन और अभ्यास के बाद ही सीधी सरल रेखा संभव है| मैं समझ गई, मेरा लिखा सर को पसंद नहीं आया| नामवर जी कही की छोटी सी छोटी बात भी कितनी बड़ी और गंभीर होती थी| उनके कहे को पचाना सामान्य सहज नहीं होता| यह बात मेरे जीवन की अनमोल दीक्षा थी | सर ने उस रोज़ नौकरी की बात की और कहा -कहीं पढ़ाओ,आगे का रास्ता देखो। जीवन में सदैव आगे की राह पर चलते रहना चाहिए। मैंने प्रायः लोगों को कहते सुना हैं कि नामवर जी के निर्देशन में शोध करने का मतलब नौकरी के लिए सरल रास्ता तय करना। लेकिन मैंने कभी नहीं कहा कि मैं अमुक जगह इंटरव्यू दे रही हूँ। मैंने सर से मिली दीक्षा को गाँठ बाँध लिया था जब मेरे श्रद्धेय गुरूवर नामवर जी ने मुझे कबीर का दोहा सुनाया –

“हाथी चढ़िये ज्ञान की,सहज दुलीचा डारि| स्वान रूप संसार है,भूकन दे झक मारि।|”

उन्होंने कहा यह पंक्तियां द्विवेदी जी उन्हें सुनाते थे| जब सारे झंझावातों से मुक्त होकर अपनी ज्ञान की दुनिया बसानी हो। इस श्वान रूपी संसार को झक मारकर आगे बढ़ना हो। ये पंक्तियाँ आज तक जीवन थाती बनी हुई है।

मैं स्वयं को बहुत भाग्यशाली मानती हूँ कि नामवर जी मुझसे हमेशा स्नेह से मिलें। किसी रोज शिवालिक से निकलते समय किराए के लिए पूछा, तो हृदय भावुकता से भर जाता गया । मैं हमेशा सोचती कि सर का अभिभावक हृदय अपने छात्रों सभी कठिनाइयों को लेकर कितना चिंतित हो जाता है। जब कभी शाम होने लगती तो कहते देर हो जाएगी, जल्दी बढ़ो, पहुँचों कैंपस। कभी बादल घिरे हैं तो छाता के लिए पूछा। अपने छात्रों के लिए सर कितने फिक्रमंद थे| इसका अनुमान इसी बात से कर सकते हैं कि जब नामवर जी ने जेएनयू की बातों का जिक्र किया तो कहा- छात्र घर आते-जाते रहते थें| फ्रिज में जो भी कुछ होता निकाल कर खा लेते। यही नहीं कई छात्रों का विवाह भी नामवर जी ने कराया था| उन विद्यार्थियों को याद करते हुए वे अक्सर कहते- जेएनयू को जेएनयू बनाने में विद्यार्थियों का सबसे बड़ा योगदान है। इन बातों से मेरे मन में जेएनयू के उस लोकतांत्रिक बुनियाद के मुखिया के रूप में नामवर जी की स्नेहिल छवि सहज ही अंकित हो जाती है जिसे उन्होंने गढ़ा है | जीवन के आख़िरी दिनों में वे पुरानी बातें ज़्यादा याद करते थे।

मई 2018 में एक दोपहरी में नामवर जी से मुलाकात करने गयी। मुझे नहीं मालूम था कि अपने अभिभावक तुल्य गुरु से यह आख़िरी मुलाकात भी नहीं होगी। कुसुम दीदी का घर भी पास ही था। कुसुम दीदी के घर गई तो कहा -सर कहाँ हैं ? फ़ोन भी नहीं उठा रहे और दरवाज़े पर इंतज़ार करते हुए दोपहरी बीत गई। जवाब आया-बाबा नहीं हैं | कहीं बाहर गए हैं। कुसुम दीदी को मैंने सर को डाँटते भी सुना है जब भी वो कुछ फ़िक्र में कहती-सुनती (डाँटने के लहजे में)सर हमेशा मुस्कुराया करते थें। सीआईएल में दुलारे जी भी बड़े हक़ से सर की बातें करते। चाहे कुसुम जी हो या दुलारे जी सभी एक अधिकार बोध से भरे थें। जो नामवर जी ने उन्हें दिया था। आज भी जब कामगार( स्वीपर्स) या गार्ड के अधिकारों के लिए छात्रों को आंदोलन करते देखा है तो बुनियाद के रूप में उस संस्कृति के संवर्धक नामवर जी को याद करती हूँ जो पायदान में सबसे छोटे व्यक्ति के अस्मिता की रक्षा भावना से शुरू होता है।

शिवालिक में बीती वो शाम अपने गुरु नामवर जी जीवन के इंतज़ार में मेरी आख़िरी शाम थी। आलोक धन्वा की पंक्तियों के सहारे कहूँ तो – सब कुछ पार्थिव है यहाँ \ लेकिन मुलाकातें नहीं हैं पार्थिव \इनकी ताजगी रहेगी यहीं हवा में....| 19 फ़रवरी 2019 में मैं जयपुर जाने के लिए ट्रेन में थी तभी ख़बर मिली नामवर जी नहीं रहे! एक युग का अवसान था नामवर जी का जाना। आँखों के आगे अँधेरा छा गया। कुछ सूझ नहीं रहा था। अंत्येष्टि में जाने की हिम्मत नहीं थी। हमेशा सोचती नामवर जी अपनी निब वाली कलम और किताब साथ ले गए होंगे। उस समय अपने गुरु का वही चेहरा याद आ रहा था जब नामवर जी के जन्मदिन पर राजकमल की ओर से भव्य आयोजन था। सर के सुपुत्र विजय सहित विश्वनाथ त्रिपाठी, पुरुषोतम अग्रवाल जी ने नामवर जी की स्मृतियों को साझा किया। भोजनोपरांत जब सर जाने लगे तभी मैं संकोच के साथ आगे बढ़ी। बधाई देना चाहा तब तक सर ने कहा-भोजन हुआ? जी सर! लेकिन आइसक्रीम बहुत स्वादिष्ट है। ऐसी आइस्क्रीम मैंने जीवन में नहीं खायी। नामवर जी मुस्कुराते हुए बोले-तब तो राजकमल(महेश्वरीजी ) से कहना होगा कि ऐसा जन्मदिन हर साल जरूर मनावें । सभी मुस्कुराने लगें। हर वर्ष सीआईएल में नामवर जी के जन्मदिन पर हमें सर की उपस्थिति और उनपर होने वाली चर्चाओं का बेसब्री से इंतज़ार रहता था। अब नामवर जी नहीं हैं केवल उनकी स्मृतियाँ हैं । आकाशधर्मा मेरे गुरु जिनमें मैंने एक सदी की अनवरत बहती परंपरा को देखा है अब वो शिवालिक छूट गया। बनारस की शामों में गंगा किनारे बैठकर,अलकनंदा के शिवालिक की याद आ ही जाती है|

जन्मदिन पर: मेरे लिए नामवर जी | 29 जुलाई 2012

आज भी उस तनी हुई रीढ़ से ध्यानस्थ होकर बैठे नामवर जी की छवि ज़ेहन में उभरती है| हर बार यही गर्व होता है कि जीवित हाड़मांस की महती परम्परा में मैंने गुरुवर नामवर को देखा है-

“मैंने देखा (नामवरजी को) 93 साल में
रीढ़ की तनी हुई हड्डी
से तने हुए वे वाद विवाद संवाद करते हुए
आलोचक के मुख से वे
इस पीढ़ी को बताते हैं
कि यही हिंदी है
पढो
रीढ़ को तना रखो
और
चाटूकारिता से बचो
हिंदी भी स्वस्थ्य बनी और बची रहेगी।”

नामवर जी के साथ पहली तस्वीर जो दृश्य में जितनी धुंधली है स्मृतियों में उतनी ही सघन| 2011

मैंने अपना शोधकार्य जायसी से शुरू किया था तो जायसी के माध्यम से ही मैं ये पंक्तियाँ अपने गुरु को अर्पित करती हूँ-

“गुरु सुवा जेहीं पंथ देखवा
बिनु गुरु जगत को निर्गुन पावा ।।”

चित्र :साभार चितरंजन

छाया चौबे 
असि.प्रोफ़ेसर ,हिंदी, महर्षि विश्वामित्र महाविद्यालय, बक्सर(बिहार ),पिन -802101.
8851103287, chhayach4@gmail.com

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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