‘एहसास-ए-बरतरी से ख़ुदा हो गया हूँ मैं’
- दिव्यानंद
एक : उच्च विद्यालय महादेवपुर -
उच्च विद्यालय महादेवपुर के दिनों की बात है। राजकुमार बाबू हमें हिन्दी पढ़ाया करते थे। शिक्षकों के सामने हम उन्हें सर कहते; आपसी बातचीत में नाम के साथ बाबू लगाते : आरुणि बाबू, जेपी बाबू, राजकुमार बाबू आदि। बाबू मतलब अतिरिक्त सम्माननीय व्यक्ति। तो पहली मर्तबा मैंने नामवर जी का नाम इन्हीं राजकुमार बाबू से सुना। मेरे गाँव के हाई स्कूल की व्यवस्था कुछ-कुछ पुराने ढंग के गुरुकुल जैसी थी। शिक्षक सोमवार की सुबह अपने घर से मेरे गाँव आते और शनिवार की दोपहर तक वहीं रहते। उनके रहने के लिए एक बड़ा हॉल था। उसी हॉल में उनका खाना-सोना सब होता। शिक्षकों के साथ हम सात-आठ विद्यार्थी रहते। बस, खाने-पीने-स्नानादि के लिए हमलोग घर जाते। यह अन्तेवासी जैसी व्यवस्था थी जिसमें हमलोग शिक्षकों के खाने-रहने में हर तरह से सहयोग करते और इसके बदले में हमें अलग-अलग शिक्षकों की निगरानी और सीख मिलती। दो शिक्षक- राजकुमार बाबू और देवेन्द्र बाबू क़रीब बीस किलोमीटर दूर के एक गाँव से रोज़ाना आते थे। और ये दोनों कभी-कभी यहीं ठहर जाते। आज सोचता हूँ तो भारत में आवागमन के तेजी से बदले चित्र सामने फैल जाते हैं। पहले 20 किमी की दूरी भी दूरी थी। लोग रोज़-रोज़ आने-जाने से परहेज़ करते थे। अब 20 किमी की दूरी कोई दूरी नहीं रही। बड़े क़स्बों या शहरों में रहने के लिए लोग रोज़ लम्बी यात्राएँ कर रहे हैं। तो उस रोज़ राजकुमार बाबू अपने गाँव ‘अम्बा’ नहीं गए। हाई स्कूल के हॉल में ही रुक गए। झुटपुटे शाम का वक़्त रहा होगा। वे बरामदे में अकेले बैठे गुनगुना रहे थे। मैं तब नौवें दर्जे में था। उनसे कुछ पूछने गया। आज अब वो प्रसंग याद नहीं कि क्या पूछने गया था और बात-ही-बात में कैसे नामवर जी की बात उठी! नामवर जी की बात करते हुए उनका लम्बा चेहरा जैसे और लम्बा हो गया। विस्मय और श्रद्धा घुली आवाज़ में वे ऐसे बोलने लगे जैसे लोग अपने दीक्षागुरु या देवता के बारे में विभोर हो उनका सुमिरन करते हैं। वे हाई स्कूल के एक सामान्य हिन्दी शिक्षक थे। अपने जीवन में उन्होंने कभी एक बार नामवर जी को पटना में सुना था और तब से नामवर जी उनके चित्त में बैठ गए थे। उस दिन नामवर जी के बारे में उनका कहा मुझे याद है : "हिन्दी में आज नामवर जी से बड़ा विद्वान कोई नहीं। मुँह में साक्षात सरस्वती विराजमान हैं। उनको बोलते मैंने सुना है। बस एक बार। पटना में। आह! क्या बोले थे वे! किसी को वैसा बोलते इस उमर तक नहीं सुना।" आगे वे बोले, "पलट कर देख लो। हिन्दी की सभी सभा, सोसायटी, कमेटी, सिलेबस में इनका नाम होगा। इस देश में कई काम बहुत मुश्किल हैं। उसमें से एक है, हिन्दी पढ़कर यहाँ प्रतिष्ठा कमा पाना। नामवर जी ने कमाया। और अभी भी कमा ही रहे हैं।" इतना कहकर वे देर तक मन्द-मन्द मुदित होते रहे। जैसे उन्हें कोई स्वाद मिल रहा हो! स्मृति के ऐसे आनन्द को तब मैं नहीं समझ पाया। इस घटना को बीते कई वर्ष गुज़र गए। धीरे-धीरे मेरे ध्यान से ये नाम और वृत्तान्त धूमिल होता गया।
दो: एनी बेसेन्ट, कमच्छा, वाराणसी -
क़रीब पाँच साल बाद 2007 में एक दिन क्या हुआ कि देखता हूँ, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में जगह-जगह एक पोस्टर लगा है। पोस्टर था : 'अस्सी के हुए नामवर।' विवरण ये था कि श्रीप्रकाश शुक्ल जी की पुस्तक 'नामवर की धरती' का इस अहद पर लोकार्पण होना है और 'आलोचना की लोकधर्मिता' विषय पर विचार किया जाना है। कार्यक्रम हिन्दी विभाग में होना था और इसके संयोजक श्रीप्रकाश शुक्ल जी थे। जब मैंने ये पोस्टर देखा, उस समय कला संकाय से क्लास ख़त्म कर हॉस्टल की ओर लौट रहा था। राजकुमार बाबू ने इसी नाम की एक शाम भावप्रवण चर्चा की थी; ये बात उस समय मेरी स्मृति में कौंधी ही नहीं। मुझे बैनर का सिरनामा ही समझ में नहीं आया : ‘अस्सी के हुए नामवर'। ये अस्सी क्या है? और नामवर? ये नाम है या कुछ और? स्मृति ने क्या तो धोखा दिया कि उस समय बिल्कुल याद नहीं आया कि राजकुमार बाबू से इनके बारे में सुन चुका हूँ! आज अपनी मूर्खता पर तरस ही खाता हूँ कि हॉस्टल जाने के बजाए हिन्दी विभाग क्यों नहीं गया! श्रीप्रकाश शुक्ल सर की कक्षाएँ बी.ए प्रथम वर्ष में नहीं लगी थीं। हमने सर को देखा न सुना था। अगर वे हमें पढ़ा रहे होते तो पोस्टर पर आयोजक के रूप में उनका नाम देख ज़रूर उत्सुकतावश कार्यक्रम में पहुँच जाते कि ये ‘अस्सी के हुए नामवर’ क्या है! राजकुमार बाबू से पहली बार नाम सुना था। दूसरी बार के मौक़े में उनको देख-सुन पाता लेकिन अपनी मूर्खता में यह अवसर भी जाता रहा।
तीन: बिरला ‘ए’ -
दोपहर होने को थी कि शास्त्री जी बिरला ‘ए’ के मेरे कमरे पर आए और दरवाजे से लगकर कहने लगे, "ए देव भाई! सुनलS कि न हो? नामवर जी आवत हउवS। यूपी कॉलिज मS। बिरला 'सी' के एगो भैया हमरा बतवलS।" शास्त्री जी कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज को छोड़कर बनारस हिन्दी भाषा और साहित्य पढ़ने आए थे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के ऑल इण्डिया एंट्रेंस में टॉप टेन में थे; इसलिए बीए प्रथम वर्ष में ही बिरला 'ए' हॉस्टल मिल गया था। और इससे हुआ ये कि सीनियर्स के बीच उनकी अच्छी पहचान हो गई। बांग्ला मज़े में बोलते थे लेकिन भोजपुरी फर्राटेदार! तत्सम हिन्दी लिखने में उनकी क़लम सधी हुई थी। और तकल्लुफ़ के मौक़े को अगर छोड़ दिया जाए तो वे भोजपुरी मिक्स हिन्दी में सबसे ज़्यादा सहज थे। अलग-अलग रंग-ढंग के कवियों की पंक्तियाँ उद्धृत करना उनके लिए बातचीत की तरह सहज था। उत्साही, सादे-सरलमना और हिन्दी के एक होनहार विद्यार्थी रहे; इसलिए हमारे बैच में उनकी आभा थी। और इस आभा ने उनका नाम अभिषेक मिश्र से शास्त्री कर दिया। यह नाम अपने भाषा-ज्ञान और वाक्चातुर्य के एवज में उन्होंने सीनियर्स से कमाया था। फिर तो यही नाम चलता रहा। अभिषेक मिश्र बस काग़ज़ों तक महदूद रह गया। उनका परिवार दो पीढ़ियों से बंगाल के बैरकपुर में सेटल था। उत्तर प्रदेश एक तरह से छूट गया था लेकिन भोजपुरी को कसकर पकड़े हुए थे। तो नामवर जी यूपी कॉलेज आ रहे हैं- इस ख़बर के साथ उस दोपहर उन्होंने दरवाज़े पर दस्तक दी। वे दिन व्हाट्सएप के नहीं थे। सोशल मीडिया के कुछ प्लेटफॉर्म्स थे लेकिन उनका इस्तेमाल बेहद सीमित दायरों और यूजर्स के बीच था। हमें ऐसी ख़बरें शिक्षक, सीनियर्स या फिर अख़बार आदि से मिलती थीं। शास्त्री जी को एक सीनियर ने ये ख़बर दी और वे हुलसकर मुझे बताने आ गए। दोपहर के भोजन के समय से पहले हमलोग झटपट मेस पहुँचे। महाराज से कहा, जो और जितना बना है, दे दीजिए। आधा-अधूरा खाकर हमलोग निकले। साथ में हम दो थे और जब लंका पहुँचे तो वहाँ जाने वालों का हमें हुजूम मिला। सब एक-दूसरे को देख ख़ुश हो रहे थे। ख़ुश क्यों रहे थे भला? क़रीब सात बरस पहले राजकुमार बाबू नामवर-वृत्तान्त सुनाकर चुप हो गए लेकिन उनका चेहरा और आँखें मुदित होती रहीं। लंका पर यूपी कॉलेज जाने वालों को ख़ुश देखकर मुझे राजकुमार बाबू का मुदित चेहरा याद आने लगा। हम सब समय से पहले वहाँ पहुँच गए। नामवर जी के साथ दूसरे वक्ता कवि अरुण कमल थे। विषय था, 'कविता का भविष्य'। पहले अरुण कमल बोले फिर नामवर सिंह। कुर्सी से ऐसे उठे जैसे कोई तकल्लुफ़ दृश्य हो गया हो। नपे-तुले-सधे क़दमों से धीरे-धीरे माइक की ओर बढ़ते-बढ़ते एक हाथ ऊपर वाले जेब की जानिब गया और फिर उंगलियों में फॅंसी हुई एक छोटी-सी पर्ची की सलवटें खोलते-न-खोलते उन्हें हमने माइक के ऐन सामने देखा। पल भर के भीतर ही हॉल के हर सिम्त की ज़ाहिर-गोपन अंदाज़े के बाद उन्होंने बोलना शुरू किया :
"मोरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै।"
समझने वाले समझ गए कि सूरदास की पंक्ति में पंछी आज ख़ुद नामवर सिंह हैं और जहाज उदय प्रताप कॉलेज। मैं भला क्या दुहराऊं; लोगों को याद ही होगा कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पहले की नामवर सिंह की पढ़ाई उदय प्रताप कॉलेज में हुई थी। अब तो मुझे यह भी याद आ रहा है कि उदय प्रताप कॉलेज को जहाज बताने के साथ ही उन्होंने उस दिन यह भी कहा कि अगर यह कॉलेज न होता या मुझे यहाँ दाख़िले का अवसर न मिला होता तो मैं होने को भले कुछ होता लेकिन 'नामवर सिंह' नहीं होता। इंसान बन जाते हैं और उनके बनने की निशानियाॅं पीछे छूट जाती हैं। कभी-कभी वो निशानियाॅं यकायक जगमगाने लगती हैं। उदय प्रताप कॉलेज का मैंने इससे पहले नाम भर सुना था। अब वो नाम मेरे ज़ेहन में जगमगाने लगा और फिर मैंने पता किया कि उस संस्थान ने भाषा-समाज-देश की सेवा के निमित्त कई नामवरों को बनाया, खड़ा किया। हमारे नामवर सिंह उन्हीं में से एक रहे। आज के दिन अपनी मातृसंस्था के इस संक्षिप्त कृतज्ञ-स्मरण के बाद उन्होंने विषय की बाट धर ली। विषय आप भूल तो नहीं गए? भूल भी सकते हैं। कितनी-कितनी ही बातें बीच में आ जाती हैं। तो विषय था : 'कविता का भविष्य'। आते ही उन्होंने पान के पत्ते की तरह विषय को फेर दिया : 'भविष्य की कविता'। इस उलट-पलट से विषय के अर्थ-बोध की कोई हानि नहीं हुई; अलबत्ता एक ज़ाविया और मिल गया या कहे कि एक गली और दिख गई जो वहीं ले जाती थी जहाँ हमें जाना था। कविता का भविष्य या भविष्य की कविता को बताने के पहले वे कविता के अतीत की ओर मुड़े और वाया भक्तिकाल-छायावाद होते हुए कविता के भविष्य के सम्बन्ध में उन्हें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की स्मृति हुई और उनका कहा, उन्होंने बड़ी आश्वस्ति से दुहराया कि "...प्रच्छन्नता का उद्घाटन कवि-कर्म का एक मुख्य अंग है। ज्यों-ज्यों सभ्यता बढ़ती जाएगी त्यों-त्यो कवियों के लिए यह काम बढ़ता जाएगा। मनुष्य के हृदय की वृत्तियों से सीधा संबंध रखने वाले रूपों और व्यापारों को प्रत्यक्ष करने के लिए उसे बहुत से पदों को हटाना पड़ेगा। इससे यह स्पष्ट है कि ज्यो-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएँगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कवि कर्म कठिन होता जाएगा।"
मेरे पास एक गुलाबी और उजले रंग की जेबी डायरी हुआ करती थी। अब याद नहीं आता कि वह कहाँ पड़ी हुई है! उस दिन के भाषण का एक मुख़्तसर नोट मैंने उसी डायरी में लिखा था। इसी तरह के और इन्दिराज उसमें दर्ज थे। ये कुछ छोटी-छोटी बातें याद है लेकिन डायरी कहाँ गई, इस बाबत कुछ भी याद नहीं। शाम ढले सभा समाप्त होने के बाद हमारी टोली जब कैम्पस की ओर लौट रही थी तो सभी ख़ुश थे, उत्साहित थे। विचार हमें प्रसन्न और जागृत बना रहा था। शायर का नाम याद नहीं लेकिन हम सभी कैसा महसूस कर रहे थे, उसे इस शे’र से समझें :
“ये किसने पुकारा है इतनी चाह से हमको
एहसास-ए-बरतरी से ख़ुदा हो गया हूँ मैं”
एक बड़ा आदमी संगत के और लोगों को भी ख़्याली तौर पर बड़ा बना देता है। एहसास-ए-बरतरी का वलय सबको अपने गिर्द घेरे रहा और दिनों तक उस उत्सवनुमा दिन की गहरी ख़ुमारी रही। अब नामवर जी नहीं रहे तो ऐसे और दिनों की स्मृति से नराई आती है।
चार: लोहित, पश्चिमाबाद, जेएनयू -
एम.ए के बाद एम.फिल् के लिए फिर से प्रवेश परीक्षा देनी थी। प्रवेश परीक्षा के पहले लगने लगा कि हमलोग फिर से एक खुले मैदान में आ गए हैं। जो ठीया एम.ए में जम गया था, वो बेगाना महसूस होने लगा। एम.फिल् में एम.ए से सीटें भी कम हुआ करती थीं और पिछले कुछ सालों से भारतीय भाषा केन्द्र के एम.ए के टॉपर प्रवेश परीक्षा में बाहर होते चले गए थे। इस सचाई के पीछे जितने तर्क थे, उन्हें तर्कों से पार पाने की कोशिश में भय और भी मन में बैठता जाता। और जब आख़िरकार एम.फिल् की लिस्ट में नाम आ गया तो वो दिन याद आया जब बनारस से बी.ए करने के बाद दिल्ली एम.ए के लिए आ रहा था। दिल्ली आने की सबसे बड़ी लालसा मन में ये थी कि प्रोफ़ेसर नामवर सिंह के निर्देशन में शोध कर सकूंगा। इस लालसा में जिस एम.फिल् प्रवेश का धड़का था, वह अब कुछ-कुछ मिट चला था। प्रवेश परीक्षा में लड़कों की श्रेणी में पहला स्थान था। इतने बरसों बाद अब ये सारी बातें मामूली लगती हैं लेकिन तब यही सब वह छोटी-छोटी पूंजी थी जिसके सहारे नामवर जी के पास शोध के लिए मैं अपनी दावेदारी का कच्चा-पक्का मसौदा गढ़ रहा था। आशा बनते-बिगड़ते देर नहीं लगती। कभी लगता, सब आसान है और अगले ही दिन से आने वाले कई दिनों तक सब कुछ बेहद मुश्किल जान पड़ता। प्रोफ़ेसर नामवर सिंह जेएनयू के भारतीय भाषा केन्द्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस थे। एम.फिल् या पी-एच.डी में वे सहायक निर्देशक हो सकते थे और निर्देशक प्रोफ़ेसर रामबक्ष। यही व्यवस्था थी। मैंने रामबक्ष जी से इसके लिए बात की। उन्होंने कहा, “मैं इसके लिए तैयार हूँ। नामवर जी को राज़ी करना तुम्हारा काम है। उनसे मैं कुछ नहीं कहूँगा।” मुझे थोड़ी देर के लिए बुरा लगा कि सर मेरे लिए नामवर जी से क्यों बात नहीं करेंगे लेकिन यह भी समझ आया कि रामबक्ष सर शुरू में सबकुछ साफ़-साफ़ कह दे रहे हैं। और कम-से-कम वे तैयार हैं। चुनौती नामवर जी की है। उनकी साफ़गोई भली लगी। मैंने सोचना शुरू किया कि किससे कहूँ जो मेरे लिए नामवर जी से बात करे! भारतीय भाषा केन्द्र के कई चेहरे उभरे लेकिन उससे मन में आस नहीं बॅंधी। कई सच्ची-झूठी कहानियाँ मैंने सुन रखी थीं जिससे किसी से भी मदद माँगते संकोच और भय दोनों होता कि कहीं इससे काम बिगड़ न जाए। बनारस से भी कोई नाम ध्यान में नहीं आया जो इसमें मेरी मदद करता। एक दिन हिम्मत की और नामवर जी को सीधे फ़ोन कर उनसे मिलने का समय माँगा। उन्होंने परिचय पूछकर समय दे दिया। गर्मी चढ़ने लगी थी। मैं उनके शिवालिक अपार्टमेंट वाले पते पर समय से पहुँचा। एम.ए करते हुए जेएनयू और दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों में अब तक उन्हें कई बार सुन चुका था। लेकिन कभी उनसे अकेले की भेंट नहीं थी। जब भी देखा, सभा, सोसाइटी में देखा-सुना और भीड़ के साथ वापस आया। यह पहली मर्तबा था जब उनसे इस तरह भेंट हो रही थी कि और कोई आसपास नहीं था। मन में असहजता थी। तरह-तरह के प्रश्न थे। दरवाज़ा उन्होंने ही खोला। अन्दर आकर बैठने के लिए कहा। और ख़ुद बैठने से पहले पानी के लिए पूछा। मैं खड़ा हो गया कि अपने से पानी ले लूंगा। वे हँसे और बोले : “बैठो! तुम इस घर के भूगोल से परिचित नहीं हो।” उन्होंने पानी का ग्लास लाकर दिया और सामने बैठ गए। मेरे सर पर असहजता की जो गठरी लदी थी, वो कुछ-कुछ उतर गई। मन का भय पानी हो गया। उनकी विद्या से मैं तो क्या ज़माना अभिभूत रहा है और उनके विनय ने उन्हें और बड़ा बना दिया। अगर वे मुझे पानी लाकर नहीं देते या उसके लिए नहीं पूछते तो भी मन में ये प्रश्न नहीं आता कि देखो! पानी तक के लिए नहीं पूछा। क्योंकि ऐसी उम्मीद मन में थी ही नहीं। लेकिन उन्होंने पानी लाकर दिया और इत्मीनान से कहा, अब बताओ, क्या बात है? पानी को जैसे मैं गटगटाकर पी गया था, उसी वेग में अपने आने के प्रयोजन को दो-चार साँसों में बता दिया। वे थोड़ी देर चुप रहे। फिर पूछा, रामबक्ष जी से क्या बात हुई है? जो बात हुई थी, सो मैंने बताई। विषय पूछा, बताया। पीछे की पढ़ाई-लिखाई के बारे में पूछा। बनारस से जुड़ी कुछ बातें पूछीं और अन्त में कहा, अभी कुछ नहीं कहूँगा। विषय पर सबकुछ पढ़कर मिलो तो बताऊॅंगा। जो उन्होंने कहा, उसमें मेरी मुराद के सिक्के अब खनकते सुनाई दे रहे थे। विषय पर सबकुछ पढ़ने में क्या गया है! ये तो आसान परीक्षा हुई। जितनी शंकाओं, भय और ऊहापोह के साथ मैंने शिवालिक में प्रवेश किया था, उतनी ही उत्फुल्लता, ताज़गी और भरे आत्मविश्वास के साथ वहाँ से मैं निकल रहा था। आगे के दिन भागमभाग में विषय पर सामग्री जुटाने के रहे। थोड़ी कठिनाई हुई और वो जुट गईं। मेरा काम शेखर जोशी पर था। दैनिक जागरण में काम करने वाले एक पत्रकार अनुराग शर्मा जी ने इसमें मेरी बड़ी मदद की। उन दिनों वे गाज़ियाबाद में रहते थे। सामग्री जुटाने के बाद टिककर उसे पढ़ा-समझा और सरसरी तौर पर एक नोट्स लेकर मैं उनसे मिला। अगली बार जब उनसे भेंट हुई तो उन्होंने शेखर जोशी पर मेरी तैयारियों के बाबत थोड़ी देर बात की और कमल जोशी, शैलेश मटियानी, विद्यासागर नौटियाल, मनोहर श्याम जोशी, मंगलेश आदि के लेखन के बारे में पूछने लगे। मुझे जितना ध्यान में आया, बताया। लेकिन मैं समझ गया और अगली बार के लिए सतर्क हो गया। सिनॉप्सिस बना, उन्होंने देखा और इस तरह मैं एम.फिल् में रजिस्टर्ड हुआ। मेरे एक सीनियर हैं, योगेश सर! उनसे मुझे बहुत मदद मिली। मेरे हर ड्राफ्ट को उन्होंने पहले से बेहतर किया। जब सीनियर किसी जूनियर की सहायता करते हैं तो वे मेहरबानी के छींटे से गाहे-बगाहे भिगोने लगते हैं लेकिन इसका अहसास देरी से हो पाता है। योगेश सर का व्यवहार इस मामले में मेरे लिए मिसाल और जीवनपर्यन्त समोखन की तरह रहा। उन्होंने मदद में मेहरबानी का अर्क नहीं मिलाया। शोध के दरम्यान कुमाऊँ अंचल के अलग-अलग जनपदों में गया। लखनऊ जाकर शेखर जोशी से मिला। उनके साथ दो दिन रहा। उस भले पहाड़ी बुजुर्ग के साथ रहने, बाज़ार घूमने और बात करने के सुख को लिखकर नहीं बता सकता। मेरे अनुभव संसार में वह एक नई बात थी। उनकी कहानियों के कई पात्रों को अब मैं और समझ पा रहा था। मुझे एक सीढ़ी मिल गई थी जो ऊपर-ऊपर और साफ़-साफ़ दिखने वाले सतह के नीचे ले जाती थी। यह मिलने का ही सुफल था कि उनकी कहानी ‘कोसी का घटवार’ को मैं अलग नुक़्ते से समझ पाया। वह कहानी हिन्दी की दुनिया में प्रेमकथा के रूप में बहुप्रचारित है। लेकिन मैंने उसे पहाड़ के साथ युद्धों के ऐतिहासिक और औपनिवेशिक सम्बन्ध के रूप में देखा। ‘पहल : 99’ में वह ‘युद्ध, पहाड़ और ‘कोसी का घटवार’ के नाम से छपा। ज्ञानरंजन जी ने एक अच्छे इंट्रो के साथ उसे प्रकाशित किया था। शेखर जोशी के साथ हुई रतजगे की बातचीत को मैंने रिकॉर्ड किया था। लेकिन अपनी ही किसी मूर्खतापूर्ण मशीनी जिज्ञासा के फेर में उसे मैं लिखने से पहले ही गँवा बैठा। इसका पता चलने पर मुझे बेइंतहा हताशा हुई। जब ख़ुद को कोसते-कोसते थक गया, बोर हो गया तो एक पूरी रात टिककर धौलपुर हाउस में बैठा। मनुष्य के पास जो सबसे अद्भुत चीज़ है- वो हुई उसकी स्मृति! जब मैंने याद कर लिखना शुरू किया तो क़रीब-क़रीब मुकम्मल बात उभरकर आ गई। हताशा मिटी लेकिन रिकॉर्डिंग को गॅंवाने का मलाल अब तलक है। स्मृति ने ग़ालिबन सब याद दिला दिया किन्तु जिस प्यारे इंसान की आवाज़ के साथ मेरी संगत थी, वो थाती खो गई। नामवर जी से मिलकर जब इस भेंट वार्ता का मैंने बयान किया तो वे ख़ुश हुए। शेखर जोशी जी के स्वास्थ्य, परिवार आदि के बारे में कई बातें पूछीं। और मुझे नया टास्क थमा दिया : “शेखर जी से मिले, ठीक किया। लेकिन उनके कई समकालीन अभी जीवित हैं। उनसे भी जाकर मिलो। बात करो।” और फिर अपने एक मित्र ओमप्रकाश जी के साथ तब के इलाहाबाद गया। शेखर जोशी के साथी अमरकांत से मिला। अमेरिका से कुछ दिनों के लिए दिल्ली आईं उषा प्रियंवदा से मिला। आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने शेखर जोशी की कुछ कहानियों पर सटीक, सरस और विषय का समझ बढ़ाने वाली आलोचना लिखी हैं। ‘दाज्यू’ कहानी पर जैसा विश्वनाथ त्रिपाठी ने लिखा है, उससे रचना और आलोचना का वो युग्म बनता है, जिसे बोलचाल की भाषा में बीसम-बीस कहते हैं। यह विधाओं का परस्पर मान हासिल करना और सार्थक होना हुआ। तो उनकी आलोचना पढ़कर उनसे कई बार मिला। आलोचक और ‘आलोचना’ के सम्पादक संजीव कुमार ने एनबीटी के लिए शेखर जोशी की कहानियों को सम्पादित किया है और उसकी विस्तृत और गहन भूमिका लिखी है। भूमिका पढ़ने के बाद संजीव जी से उनके कॉलेज में मिला। इस मिलने-जुलने ने शोध की ड्राफ्टिंग को बढ़ा दिया। उद्यम बढ़ा लेकिन काम पूरा कर सन्तोष मिला। वाइवा में इग्नू से प्रोफ़ेसर जवरीमल पारख आए थे। क़रीब पौने घण्टे बात हुई। वाइवा समाप्त होने के बाद परीक्षक और निर्देशक दोनों ने शोध को पुस्तक रूप में प्रकाशित करवाने को कहा लेकिन अब तक वह काम नहीं कर पाया हूँ। यह आलस्य का ही कोई रूप है या अपने ही काम के प्रति कमतरी का कोई भाव, नहीं जानता! किए हुए काम को फिर से पलटना, ठीक करना, उसके रूप को बदलना- ये सब नए किए जाने वाले काम से भी कठिन जान पड़ता है।
पी-एच.डी का मेरा काम अंगिका - लोकगीतों पर है। क़रीब 80 ऐसे गीतों को मैंने पूरे अंग क्षेत्र से ऊपर किया जो पहले प्रिंट या सॉफ्ट फॉर्म में नहीं था। इस काम के दरम्यान कई ऐसे लोगों से मिलना हुआ या नई और अंदरूनी जगहों पर जाना हुआ, जिसका जीवन में अन्यथा मौक़ा नहीं मिलता। इसका विवरण एक अलग कथा है। लेकिन बताने वाली बात यही है कि मेरे इस विषय को भी नामवर जी ने ही निर्धारित किया था। ‘योगवाशिष्ठ’ के श्लोक का अधूरापन याद आ रहा है : “शिष्यप्रज्ञेव बोधस्य कारणम् गुरुवाक्यतः।” और अधूरापन यह है कि प्रज्ञा की अभिव्यक्ति के लिए साधु-संगति अनिवार्य है। वह स्वयं में कुछ ख़ास नहीं है।
उनके सम्बन्ध में मेरे पास और स्मृतियाँ हैं। उसका सम्बन्ध दक्षिण भारत और दिल्ली से है। उसे मैं जैसे प्रकट करना चाहता हूँ, वैसा बन नहीं पा रहा। तो जब सुयोग होगा, उसे भी आप लिखा पावेंगे।
दिव्यानन्द
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव

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