शोध आलेख : कविता के नए प्रतिमान और नामवर सिंह / नीलम वर्मा

कविता के नए प्रतिमान और नामवर सिंह
- नीलम वर्मा

जीवंतता, गतिशीलता और मौलिकता मूल्य निरूपण के महत्वपूर्ण आयाम हैं। नवीनता कसौटियों को यथार्थता, युगानुकूलता और प्रासंगिकता प्रदान करती है, गतिशीलता साहित्य में वर्णित जीवन के गूढ़ और संगुंफित रहस्यों को यथार्थ संदर्भ प्रदान करती है। ऐसे में, किसी विशेष काल, विधा, साहित्यिक आन्दोलन का निर्धारण भी इन्हीं के आलोक में किया जाना श्रेयस्कर होता है और यही तत्त्व उन विशिष्टताओं के विशेष प्रतिमान बनते हैं। प्रतिमानों की नवीनता विशिष्टताओं को स्व-व्याख्या, स्व-मूल्यांकन का विशिष्ट अवसर प्रदान करती है। साहित्यिक समीक्षा के अनवरत विकास में क्रमबद्ध होने के बावजूद प्रत्येक काल के लिए प्रतिमानों का साम्य होना निश्चित नहीं होता। एक लंबे समय-अंतराल के साथ ही, भाव, शैली, रूप, गुण आदि का परिवर्तन प्रतिमानों की नवीनता की अपेक्षा रखता है। साहित्य के आदिकाल, मध्यकाल के लंबे समय-अंतराल में प्रतिमानों की क्षीण समानता बनी रही और स्थूल रूप में एक ही आन्दोलन के अन्तर्गत कुछ छुटपुट विशेषताओं को आधार मान प्रवृत्तियों की गणना की जाती रही। आधुनिककाल के आते-आते एकरूपता का यह भाव स्थायित्व बनाए रखने में समर्थ न रह सका और नवजागरण, आधुनिकता, यथार्थता, शहरीकरण, मशीनीकरण, प्रेस आदि के विकास के साथ-साथ यह तीव्र गति से परिवर्तित होते युगों में विभाजित होने लगा। बीसवीं सदी के प्रारम्भ से इस प्रवृत्ति में और तीव्रता आई; साहित्यिक समीक्षा और साहित्येतिहास लेखन में यह प्रवृत्ति उस तीव्रता के साथ खुद को समायोजित न कर सकी और न्यून समयांतराल में कई युगों- जैसे द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नवलेखन, साठोत्तरी युग, अकविता, असंगत कविता, समानांतर कविता, समकालीन कविता आदि- के रूप में तो सामने आई किन्तु इनका विश्लेषण, मूल्यांकन भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग, छायावाद के दौरान विकसित हुए प्रतिमानों अथवा किसी विचारधारा विषयक मान्यताओं के द्वारा ही किया जाता रहा। सिद्धहस्त समीक्षक नामवर सिंह ने मान्यताओं की नवीनता के सम्बन्ध में अपने मौलिक विचार व्यक्त किया; हालांकि इनके विचार 'कविता के नए प्रतिमान' के अनुसार मुक्तिबोध और नवलेखन युग पर केंद्रित हैं किन्तु इस विचारोद्भावना ने प्रतिमानों की नवीनता की आवश्यकता को उजागर किया और हिन्दी समीक्षा में नवप्रतिमानों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। नामवर सिंह ने नए प्रतिमानों पर विचार करते हुए अपने आलेखों, पुस्तकों एवम् साक्षात्कारों में नवीन उद्भावनाओं को गढ़ा। यह प्रतिमान साहित्य की विषय और वस्तु दोनों को स्पष्ट रूप में अभिव्यक्त करते हैं। उनकी मान्यता है कि साहित्य की समीक्षा देश-काल-वातावरण की अनुकूलता में होना चाहिए। अनुकूलता का अभाव साहित्यिक समीक्षा को एकरसता, नीरसता तो प्रदान करती ही है साथ ही यह आलेखन की प्रयोजनीयता के साथ भी न्याय नहीं होता है। ऐसे में प्रतिमानों की नवीनता एक काल विशेष की नहीं बल्कि प्रत्येक युग और धारा की अनिवार्यता है।

साहित्य जनता की चित्तवृत्ति के संचित प्रतिबिम्ब के साथ ही दर्पण भी होता है जो जनता की भावनाओं से प्रेरित होता है और जनता को अपनी संस्कार-परिष्कार की अंतर्तम शक्ति से संकर्षित करता है। ऐसे में समाज की रुचि एवं भावों के प्रेरित होते ही साहित्य में परिवर्तन का होना अवश्यंभावी और समयानुकूलता की मांग होता है। यह परिमार्जन-परिवर्तनीयता ही युगीन परिवेश में साहित्य की जीवंतता को न केवल निर्धारित करती है बल्कि साहित्य की नवीनता और मौलिकता को अपनी भाव प्रेरणा में शामिल कर अपनी मूल ‘स’ ‘हित’ अर्थात सबका हित (स हितस्य), समाज हित को स्थापित करती है। गौरतलब है कि साहित्यिक समीक्षा की दृष्टि, साहित्य की इस अवधारणा की विभिन्न शाखाओं-प्रशाखाओं के अंतर्तम में छिपे अनेक उन पक्षों को साकार करती है जो तात्कालिक समाज में समायोजन की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथा भविष्योन्मुखी समाज के पथप्रदर्शक होते हैं। इसी कसौटी पर कबीर, तुलसी आदि का सृजन आज अनेक शोध एवं खोजों के बाद भी युग संदर्भों में नित नवीनता की अपेक्षा रखता है। यह साहित्य की अर्थाभिव्यक्ति नहीं, बल्कि चिरकालिक भावाभिव्यक्ति है; जो आवश्यकता, माँग और अपेक्षा के अनुसार नवीन रूप प्राप्त कर अपने पूर्व रूप से अधिक सशक्त होता है। स्पष्ट है इस प्रकार की आकांक्षा होते ही प्रत्येक युग के अनुकूल साहित्य की समीक्षा करने के लिए प्राय: वस्तुनिष्ठ मानकों की आवश्यकता होती है जो समाज की मनश्चेतना में परिपक्व होकर साहित्यिक अवदान से निकला नवनीत होता है; जिसके आधार पर, साहित्य के मूल्यांकन की अपेक्षा साहित्य शुभेच्छुओं को होती है।

यह मानक, आधारों को स्वीकार कर प्रतिमान बन जाते हैं। जो प्रत्येक जीवंत समाज के लिए निरन्तर नवीन व्याख्याओं की माँग करते हैं; जिस समाज या युग में रूढ़िवादिता या जड़मानसिकता के चलते इनका परिमार्जन संभव नहीं हो पाता है वहां साहित्य अपनी ‘स हित’ की अवधारणा से दूर जाने लगता है और समाचार पत्रों की सूचनापरकता या अभावात्मक वृत्ति की ओर अग्रसर होता है। साथ ही समीक्षाजगत की जड़वादिता, युगानुकुलता, भविष्योन्मुखीयता, एवं प्रासंगिकता को नजरंदाज करने लगता है, जिससे रचनात्मकता एकांगी होने लगती है। इससे समीक्षा या तो प्रतिमानों की अनुकूलता की तरफ जाकर निकृष्ट होकर भी महानता अदि के टैग प्राप्ति की ओर अग्रसर होती है या फिर प्रतिमानों का विरोधकर समीक्षा जगत का विरोध सहन कर उत्कृष्टता को खारिज कर अस्वीकार की तरफ। निराला की रचना 'जूही की कली' इस दृष्टि की द्योतक प्रमुख रचना है, जिसे युगानुकूल छंदमुक्तता को स्वीकार न कर पाने की तिरस्कृत दृष्टि से गुजरकर कूड़ेदान तक का शिकार होना पड़ा। ध्यातव्य है द्वैत की यह प्रवृत्ति दो युगों के संक्रमण काल में तथा तीव्र गति से परिवर्तित होते युगों में अधिक दिखायी देती है; जब रचनाएँ किसी एक ढांचे का अनुसरण नहीं कर पाती हैं और उससे पहले ही युगपरिवर्तन हो जाता है तब यह ढांचा मानक रूप पाकर प्रतिमानों का निश्चित रूप प्राप्त करने से पहले ही समाप्त हो जाता है और रचनाएँ नए प्राकार की तरफ अग्रसर हो जाती है। सामान्य रूप से बीसवीं सदी से और स्पष्ट रूप से छायावादोत्तर युग से समाज में मध्यवर्ग का उदय, सामंतवाद की समाप्ति और पूँजीवाद का विकास, शहरीकरण, लोकतंत्र की अवधारणा का विकास, प्रिंटिंग प्रेस का विकास तथा विश्वयुद्ध, भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात की स्थितियों में मोहभंग, अस्तित्व संकट, नैतिकता के बदलते प्रतिमान, बिखरते संयुक्त परिवार, शिक्षा के नैतिकता से व्यवसायीकरण की तरफ उन्मुखता आदि प्रवृत्तियों की प्रभाविता से हिन्दी साहित्य में कोई दीर्घकालिक एकाकी युग संभव न हो सका; बल्कि प्रवृत्तियों की प्रेरणा से वार्षिक युग, दशकीय युग यहाँ तक कि समानांतर युगों का प्रादुर्भाव हुआ। “यह केवल यूरोपीय प्रभाव ही नहीं है। भारत में आधुनिक सौंदर्य-बोध के विकास में निःसंदेह एक हद तक यूरोपीय सौंदर्य-बोध का काफी योग है, परंतु यह भी निश्चित है कि यूरोपीय प्रभाव के बावजूद भारत में स्वतंत्र रूप से आधुनिक सौंदर्य-भावना का विकास हुआ।”1

तीव्र परिवर्तित और भाव वैविध्य इस नई कविता के युग के लिए पूर्व के प्रतिमानों को अप्रयोजनीयता एवं अनुकूलता की अप्रभाविता की ओर इशारा करते हुए विजय देव नारायण साही ने स्पष्ट कहा है कि- “समूची नई कविता को ठीक-ठीक देखने के लिए नई कविता के प्रतिमान की जरूरत नहीं है बल्कि कविता के नए प्रतिमान की जरूरत है।”2 इस समय तक लम्बे समय के बाद स्थापित हो सके छायावादी एवं वैश्विक प्रभाविता से प्रेरित प्रगतिवादी प्रतिमानों के आधार पर ही साहित्य को आंकने की कोशिश को खारिज करने का स्तुत्य प्रयास नामवर सिंह की समीक्षा दृष्टि की युग-अनुकूलता में दिखाई देता है। उनकी समीक्षा दृष्टि ने छायावाद के कोमल भाव, सौंदर्य, स्वच्छंदता, रोमांटिक प्रेम, रहस्यवादिता को खारिजकर पार्थिव जटिलता, नीरसता एवं कुरूपता से उत्प्रेरित प्रतिमानों को साहित्यानुकूल स्थापित करने का प्रयास किया।

प्रतिमानों की नवीनता का प्रश्न नामवर सिंह के समक्ष सृजनकार्य की समीक्षा के लिए सामने आता है और वे क्रमवार काव्य रचना के विभिन्न तत्त्वों का विश्लेषण करते हुए पूर्व के जड़ प्रतिमानों को खारिज करते हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘कविता के नए प्रतिमान’ के ‘मुक्तिबोध’ और ‘नई कविता’ पर केन्द्रित होने तथा सृजनकाल नवलेखन का समय होने के कारण इन प्रतिमानों की सैद्धांतिकी नई कविता के लिए नए प्रतिमानों को स्थापित करती है; किन्तु इनका भाव बोध प्रत्येक काल की नई रचना के लिए नवीन प्रतिमानों की खोज को संबोधित करता है।

ध्यातव्य है कि, किसी सृजन की व्यावहारिक समीक्षा का मूल तत्त्व विधा निर्धारण होता है जिसके द्वारा उसे साहित्य की पृथक कोटि प्रदान की जाती है। संस्कृत के विभिन्न आचार्यों ने जिस शब्द और अर्थ के सौरस्य से उत्पन्न रमणीयता पूरित विधान को साहित्य या कविता कहा, जिसे ‘आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’ ने ‘हृदय की मुक्तावस्था के लिए मनुष्य के द्वारा किए गए शब्द विधान’ कहा, उसे ही ‘नामवर सिंह’ ने नवीनता की परिभाषा में संगुंफित करते हुए परिभाषा को शब्द-अर्थ के संयोजन और टकराहट से ऊपर उठाकर युगसापेक्षता को शामिल किया। जिससे अनुभूति, कल्पनाशीलता, शब्द-अर्थ की आपसी टकराहट और समाज हित की अवधारणा के साथ ही कविता के लोक अनुभवों, लोकाचारों तथा सांसारिक व्यवहारिकता को साहित्य के निर्धारण में ही स्थान मिला। नामवर सिंह ने प्रतिमानों की जड़ता और स्थायित्व का विरोध किया। वे मानते हैं कि “जैसे-जैसे बाह्य वास्तविकता बदलती है वैसे-वैसे हमारे उससे रागात्मक संबंध जोड़ने की प्रणालियां भी बदलती हैं- और अगर नहीं बदलती तो उस बाह्य वास्तविकता से हमारा संबंध टूट जाता है। कहना न होगा कि जो आलोचक इस परिवर्तन को नहीं समझ पा रहे हैं, वे उस वास्तविकता से टूट गए हैं जो आज की वास्तविकता है। उससे रागात्मक संबंध जोड़ने में असमर्थ वे उसे केवल बाह्य वास्तविकता मानते हैं जब कि पीछे हम उससे वैसा संबंध स्थापित करके उसे आंतरिक सत्य बना लेते हैं। और इस विपर्यय से साधारणीकरण की नई समस्याएँ आरंभ होती हैं।”3 साधारणीकरण में उपजी समस्या से सहृदयों को काव्यास्वादन में बाधा होती है, फलत: साहित्य के यथौचित्य को प्रश्नांकित किया जाने लगता है। साहित्य की मूल परिभाषा ही किसी भी सृजन को साहित्य या सिद्धांत की कसौटी में बाँधती है जिसकी विभेदक विशेषताएँ सौंदर्य, रमणीयता, ‘स’ ‘हित’ की अवधारणा आदि होती हैं; जिससे साहित्य का साहित्य होना या न होना निर्धारित होता है।

“कविता, कविता में फर्क होता है। आजकल कविताएँ यथार्थ के इतने निकट आ गई हैं कि वह गद्य की भाषा बोलने लगी हैं। और अनुभूतियों में वह तरलता, भावुकता, सौन्दर्यवादिता आदि ही कविता में नहीं होती, कविता तलवार भी होती है।”4 इस तलवार का कार्य साहित्य की विषयवस्तु करती है। वस्तुतः साहित्य की विषयवस्तु भावानुकूलता, सहृदयता और संवेदना को प्रस्फुटित करने प्रमुख का माध्यम होती है। विषयवस्तु की अनुकूलता साहित्य के साथ पाठक का भावनात्मक संबंध स्थापित कर न केवल साहित्य को जीवंतता और समकालीनता प्रदान करती है बल्कि रचना की सार्थकता, स्थायित्व, रमणीयता और समयानुकूल प्रासंगिकता को स्पष्ट करती है। नामवर सिंह की मान्यता है कि रचना की विषयवस्तु किसी भी समय की समकालिक अनुभूति से उद्भूत होनी चाहिए। किसी एक निश्चित प्रारूप को मानक मानकर उसी रूप और प्रारूप पर रचना करना साहित्य की अंतर्रात्मा के साथ खिलवाड़ है। इससे वह साहित्य नहीं रह जाता बल्कि साहित्य के नाम पर पुनरुत्थानवादी मानसिकता का प्रतिफलन मात्र होता है। साहित्य में विषयवस्तु की नवीनता और अद्यतन स्थिति समाज को साहित्य से जोड़ती है और समाज के दर्पण के रूप में अनावृत्त होती है। साहित्य वही महान होता है जिसमें लोक को साहित्य में और साहित्य को लोक में ढूंढा जा सके; रोमांच पैदा करने वाला, कल्पनाश्रित वायवीय या जड़वादी विषयवस्तु साहित्यिक सृजन का आधार अवश्य बन सकती है किन्तु यह जनता के हृदय को भावोद्वेलित नहीं कर सकती। ‘कबीर’ के ‘प्रेम के ढाई आखर’ हो, ‘तुलसी’ का ‘साँच रूपी प्रेम’ या ‘मन का होने वाला प्रबोध’ हो अथवा ‘अज्ञेय’ की ‘भावना नहीं है सोता’ हो; सभी कहीं न कहीं जनोन्मुखीयता और लोकचेतना तथा परोपकारिता के फलित साहित्य को ही महत्व देते हैं।

सिद्धों-नाथों की वाणियां, विद्यापति की श्रृंगारिकता, आदिकालीन कवियों की राज्याश्रय प्रेरित अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा आदि स्थाई न रह सकी किन्तु अमीर खुसरो की पहेलियों-मुकरियों की तीक्ष्ण मनोरंजनीयता और ज्ञान; कबीर की लोकबद्धता; तुलसी की जनमानस की भावना, लोकरक्षक तथा लोकमंगल की साधनावस्था आदि जनबद्धता के कारण ही शाश्वत प्रकृति को धारण कर सकीं। योग्यतम् और अद्यतन की उत्तरजीविता किसी एक समय का व्यवहार नहीं है बल्कि यह प्रत्येक देश-काल-वातावरण में किसी न किसी रूप में लागू होता है। विषयवस्तु की जनसापेक्षता इसी साहित्य विरोधी अवधारणा को इन्कार कर लोक अभिमुखी व्यवहार को रुपापित करती है।

समीक्षा के प्रतिमानों में रस की व्यावृत्ति ही साहित्य का प्रमुख उपादेय है, और रस प्रायः सभी समीक्षकों की समीक्षा दृष्टि में किसी न किसी रूप में विद्यमान रहा है। वस्तुतः साहित्य कोई दंडात्मक कानून या व्यवहार नहीं है जो अपनी दण्ड प्रकृति के द्वारा सहृदयों को प्रभावित करे बल्कि इसकी ‘स’ ‘हित’ की अवधारणा, मनोद्वेलित करने वाले कांतासम्मित उपदेश, शिवेतर क्षतये आदि से रूपाकार ग्रहणकर व्यवहारविद बनाती है। साहित्य की अभिप्रेरणात्मक शक्ति से सहृदय आकृष्ट होता है और तादात्म्य स्थापित कर रस का अनुभव करता है। नामवर सिंह स्पष्ट मानते हैं कि “प्रतिमान के रूप में रस के पुनरुद्धार अथवा पुनर्व्याख्या का प्रश्न ही अप्रासंगिक हो जाता है; प्रासंगिक रहती है तो आस्वाद की प्रक्रिया, जिसका आधार अर्थ-मीमांसा है।”5 वह मानते हैं कि “आज इस तथ्य पर इतना अधिक बल देने की आवश्यकता इसलिए आ पड़ी है कि छायावाद के आत्मपरक रोमानी संस्कारों से ग्रस्त आलोचकों ने रस-सिद्धांत को आधुनिकता का जामा पहनाने के उत्साह में प्राय: उस सिद्धांत को एक आत्मपरक रोमांटिक सिद्धान्त का रूप दे डाला है।”6 वस्तुतः छायावाद की समाप्ति के बाद इस प्रकार की आत्मपरक व्याख्याएँ केवल कालदोष ही कहलायेंगी “आधुनिक कवि की सामाजिक स्वाधीनता और वैयक्तिक विकास की भावना यदि एक ओर प्राचीन रूढ़ मर्यादाओं के विरोध के रूप में प्रकट हुईं तो दूसरी ओर प्रकृति-प्रेम के रूप में। प्रकृति-प्रेम से सामाजिक स्वाधीनता और वैयक्तिक विकास का क्या संबंध है, यह सहसा समझ में नहीं आता। लेकिन जब हम स्वच्छंदतावादी कवियों के मुख से यह सुनते हैं कि कविता करने की प्रेरणा उन्हें प्रकृति से मिली तो सोचना चाहिए कि प्रकृति में आखिर वह कौन-सी शक्ति थी. जिसने मुक्तिकामी स्वच्छंदतावादी कवि को सबसे अधिक आकृष्ट किया?”7 इस काल में अनुभूति की प्रधानता को आधार बनाकर रस की आत्मपरक व्याख्या का व्यवहार समीक्षा जगत में दिखाई देने लगा और शब्दार्थ मीमांसा के बौद्धिक व्यापार से पृथक रस की व्याख्या की जाने लगी। इस काल की रस व्याखा में विडंबना यह है कि इसी आत्मपरक व्याख्या के द्वारा वे रस को सार्वकालिक और सार्वभौम काव्य-प्रतिमान के रूप में प्रतिष्ठित करने का हौसला रखते हैं। मूल्य निर्णय देने का उत्साह और अर्थ मीमांसा की इस अनभिज्ञता को नामवर सिंह रस की पवित्रधारा की व्युत्पाति में बाधा मानते हैं। वे संस्कृत काव्यशास्त्र के सम्पूर्ण रस सिद्धांत को काव्य के आस्वाद की प्रक्रिया मात्र मानते हैं; मूल्यांकन के प्रतिमान के रूप में वे इसे स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। चूंकि वे रस को मूल्यांकित करने के निश्चित प्रतिमान को ही स्वीकार नहीं करते इसलिए वे इसे आत्मपरक व्याख्या के रूप में देखते हैं और प्रत्येक रचनाकार और सहृदय की सापेक्षता के अनुसार इसे पृथक-पृथक मानते हैं जो कार्यव्यापार और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होता रहता है।

साहित्य की परम्परागत अवधार‌णा रही है कि उत्कृ‌ष्ट साहित्य वही साहित्य है जिसमें नैतिक-सामाजिक-पारिवारिक मूल्यों की स्पष्ट व्याप्ति हो और वे किसी मर्यादित आचरण की ओर साहित्य की सम्पूर्ण धारणा को अग्रेषित करते हों। काव्य में मूल्यों का होना नितान्त आवश्यक भी है क्योंकि यही काव्य की पंक्तियों को साहित्य के ढांचे में रूपायित करता है; किन्तु समस्या तब आती है “जब काव्य-मूल्यों की रक्षा का प्रश्न उठता है तो उसके साथ एक नैतिक दायित्व जुड़ जाता है, जो काव्य-मूल्यों को एक व्यापक मूल्य-प्रणाली से संबद्ध कर देता है।”8 नामवर सिंह जी ने ‘उर्वशी’ विवाद के प्रसंग में उर्वशी के दो समीक्षक ‘राम विलास शर्मा’ तथा ‘मुक्तिबोध’ के हवाले से मूल्यों की साहित्य में व्याप्ति, आवश्यकता और मर्यादा को व्याख्यायित किया है। लक्ष्मीकांत वर्मा के कथन को उद्धृत करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि “यह हिन्दी के लिए बड़े दुर्भाग्य की बात है कि जब कभी भी कोई बात तीव्र एवं तीक्ष्ण ढंग से कही जाती है तो लोग बराबर उसका अर्थ व्यक्तिगत राग-द्वेष से जोड़कर उसके महत्व को कम कर देते हैं। बात जो कही गई है मीठी है या कड़वी है, तेज है या कुंठित है, उसका विश्लेषण तो होने लगता है किन्तु यह प्रश्न उठाना लोग भूल जाते हैं कि बात गलत है या सही है, सप्रमाण है या गैरजिम्मेदार है। .... सत्य की परख जब छूट जाए या उसकी क्षमता न रह जाए और उसके बदले शराफत की दुहाई देकर सत्य का गला दबाने का प्रयास किया जाए, तो वह घातक सिद्ध होता है।”9

यह साहित्यिक विकास की गति में बाधा बनते हैं जिससे विकास की गति धीमी पड़ती है, साथ ही मूल्य भी कृत्रिमता का रूप धारण करने लगते हैं। मूल्य विषयक मान्यता के पक्ष में नामवर सिंह ने मुक्तिबोध की अवधार‌णा की दिशा को ही ठीक माना है जिसमें वे सामाजिक व्याधि के रूप में, मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी के आत्मसंघर्ष के सामाजिक मूल्य के रूप में व्याख्यायित करते हैं। वह ‘सामाजिक प्रतिष्ठा के जोर से साहित्यिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के आडंबरपूर्ण दृश्य’ के हितैषी नहीं। जिसे जैनेन्द्र, अज्ञेय आदि ने मनोवैज्ञानिक व्याधि के रूप में अंकित किया है और मुक्तिबोध ने सामाजिक व्याधि के आत्मचेतस और विश्वचेतस' मन के मध्य की टकराहट में पिसते व्यक्ति की ट्रैजिडी के रूप में व्याख्यायित किया है। मूल्यों का वर्णन करते हुए उसी सन्दर्भ में नामवर सिंह को मूल्यों की चिर परिवर्तनीयता का पक्ष अच्छा लगता है और वे लिखते हैं- “कम से कम इस बात में सभी सतर्क हैं कि काव्य-कृति की समीक्षा काव्य-मूल्यों से ही की जाए, किसी काव्येतर मूल्य से नहीं।”10 सामाजिक, नैतिक, पारिवारिक आदि मूल्यों की मर्यादा की बंदिशें उन्हें साहित्य की उन्मुक्त व्याख्या और प्रभाविता तथा लोकग्राह्यता के लिए स्वीकार नहीं। मसलन नामवर सिंह काव्य में मूल्यों की व्याप्ति के विरोधी नहीं बल्कि इसे वे सहज और सजग कवि की अनिवार्य विशिष्टता तथा साहित्य को साहित्यिक कसौटी का प्राथमिक मानक मानते हैं। किंतु इन मूल्यों के काव्य-मूल्य होने की सीमा तक ही यह उन्हें स्वीकार हैं, वह इन पर समाज के बाह्य मूल्यों को आरोपित करने के पक्षधर नहीं हैं। कांतासम्मित उपदेश की अवधार‌णा के पक्ष में साहित्य के होने का तो वे समर्थन करते है किन्तु वे इसकी कर्कशता को इंकार कर सिर्फ मधुरता और सुखात्मकता को स्वीकार नहीं करते।

भाषा साहित्य की वह व्यवस्था होती है जिसके माध्यम से भावों को वास्तविक शाब्दिक धरातल प्राप्त होता है। भाषा ही यह कारक भी बनती है जिसके माध्यम से विभिन्न आलंकारिक प्रयोग कर साहित्य को अलंकृत किया जाता है तथा साहित्य की रमणीयता के प्राथमिक प्रतिमान सौंदर्य से विभूषित कर सहृदयों को आकृष्ट करते हैं। अज्ञेय ने रघुवीर सहाय के काव्य संकलन 'सीढियों पर धूप में' की भूमिका में तो यहाँ तक कहा है कि “काव्य के जो भी गुण बताए जाते या बताए जा सकते हैं, अंततोगत्वा भाषा ही के गुण हैं।”11 अपनी इसी धारणा का स्पष्ट समर्थन करते हुए उन्होंने लिखा है “काव्य सबसे पहले शब्द है। और सबसे अंत में भी यही बच जाती है कि काव्य शब्द है। सारे कवि-धर्म इसी परिभाषा से निःसृत होते हैं। शब्द का ज्ञान- शब्द की अर्थवत्ता की सही पकड़- ही कृतिकार को कृती बनाती है। ध्वनि, लय, छंद आदि के सभी प्रश्न इसी में से निकलते हैं और इसी में विलय होते हैं।”12 “किंतु आधुनिक युग में कुछ कारणों से यह परम्परा विच्छिन्न हो गई और काव्य-भाषा का विश्लेषण काव्य के मूल्यांकन का आधार न रहकर भाव-विवेचन के बाद कला-विवेचन के रूप में पीछे से जोड़ दिया जाने वाला एक गौण कार्य रह गया।”13 यह नवीन प्रयास अपने प्राचीन प्रयासों से भिन्न थे।

बदलते हुए संदर्भों में साहित्य की युग-अनुकूलता के अनुसार नवीन भाषिक प्रतिमानों को प्रस्तुत किया गया। जिनमें शब्दों का विदेशज और मिश्रित रूप, भूमण्डलीकरण के दौर में विकसित संकर भाषा, नवीन अलंकार-मुहावरे तथा अन्य प्रयोग, नवीन वैचारिक मान्यताओं की व्याख्या करने वाले शब्द, नैतिकता की बदलती परिभाषा में वर्जित शब्दों का साहित्य में आगमन आदि प्रमुख प्रतिमान के रूप में सामने आए और समीक्षक इनके बिना साहित्यिक समीक्षा को निरर्थक समझने लगे। नामवर सिंह ने इन नवीन प्रति-प्रतिमानों के साथ प्रयोग होने वाली भाषा के अंध मोह के प्रति स्थापित होते प्रतिमानों की नवीन स्थापना को यूँ ही स्वीकार नहीं कर लिया है बल्कि वे इस बात के हितैषी हैं कि- “संदर्भ बदल जाने के कारण पूर्ववर्ती कवियों की 'काव्य-भाषा' आज के कवि को अपने सृजन के लिए अनुपयोगी लग सकती है, किंतु प्राचीन काव्य के नए आलोचक को यदि प्राचीन काव्य का मूल्यांकन करना है तो उसे प्राचीन काव्य-भाषा को तिरस्कृत करने का कोई हक नहीं, बल्कि उसे प्राचीन काव्य-भाषा को समूचे संदर्भ के साथ आधार बनाना होगा। नया आलोचक अधिक-से-अधिक आलोचना की प्राचीन भाषा को तिरस्कृत कर सकता है, जैसे कि नया कवि प्राचीन काव्य-भाषा को तिरस्कृत करता है।”14 चूंकि भाषा ही कवि के अनुभव और ज्ञान को पाठक के समक्ष प्रस्तुत करने का साधन होती है और कवि की अनुभव शक्ति को द्योतित करती है; ऐसे में इसे एलियट के 'वस्तुनिष्ठ समीकरण' की समस्या के हल के रूप में भी देखा जाता है। अतः काव्य भाषा के रूप में स्पष्ट रूप से दिखने वाले शब्द व्यवहार, प्रतीक, बिम्ब, अलंकार, मुहावरों के साथ ही मौन की भाषा को महत्व तो दिया ही जाना चाहिए तथा साहित्य में अमूर्त किस्म की रह जाने वाली अंगों-प्रत्यंगों और बाह्य वातावरण की चेष्टागत अभिव्यक्तियों की अतल गहराइयों को भी समीक्षा के प्रतिमान रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

ध्यातव्य है भाषा में जीवंतता काव्य बिम्ब के माध्यम से तथा सहजता और बोधगम्यता सपाटबयानी के द्वारा आती है। साहित्य को समाज की अधिकतम पहुँच प्रदान करने के लिए भाषा की यह अभिव्यक्ति आवश्यक समझी जाती है। छायावादी समय के रहस्यवादी साहित्यिक कलेवर ने एक तरफ तो प्रतीकों और नवीन अलंकारों का प्रयोग कर जटिलता उत्पन की तो वहीं जिन थोड़े बहुत बिम्बों का प्रयोग किया भी, वे संश्लिष्ट, उपार्जित या फिर विराट बिम्ब होने की वजह से सहृद‌यों की सहज स्वीकार्यता से दूर रहे हैं। प्रगतिवाद और प्रयोगवाद ने प्रतीकों की शैली को महत्व प्रदानकर क्रमशः भाषिक सहजता और मौलिकता भले ही प्रदान की हो किन्तु जनोन्मुखीयता प्रदान नहीं कर सके। तत्कालीन समीक्षकों ने इन प्रयोगों को ही काम्य माना और उत्कृष्ट साहित्य की निशानी के रूप में स्थापित किया। नामवर सिंह ने कविता में बिम्बों की आवृत्ति और समीक्षा के इन प्रतिमानों को प्रश्नांकित किया और निष्कर्ष रूप प्रदान किया कि “कविता बिम्ब का पर्याय नहीं है, सामान्यतः जिसे ‘बिम्ब’ कहा जाता है उसके बिना भी कविताएं लिखी गई हैं और वे बिम्ब-धर्मी कविताओं से किसी भी तरह कम अच्छी नहीं कही सकतीं। कविता में बिम्ब-रचना सदैव वास्तविकता को मूर्त ही नहीं करती, कभी-कभी वह वास्तविकता का अमूर्तन भी करती है ... काव्य-भाषा के लिए भी प्रायः बिम्ब-योजना हानिकारक सिद्ध हुई है। बिंबों के कारण कविता बोलचाल की भाषा से अक्सर दूर हटी है, बोलचाल की सहज लय खंडित हुई है, वाक्य-विन्यास की शक्ति को धक्का लगा है, भाषा के अंतर्गत क्रियाएं उपेक्षित हुई हैं, विशेषणों का अनावश्यक भार बढ़ा है काव्य-कथ्य की ताकत कम हुई है।”15 नामवर सिंह ने बिम्ब प्रयोग की इस अक्षमता को समाप्त कर सपाटबपानी को महत्व दिया है और माना है कि चाहे यह सपाटबयानी भाषिक प्रयोगों की दृष्टि से नवीन न हो किन्तु यह कबीर, तुलसी, रहीम आदि की भाषा के समान भाव सम्प्रेष्य, बोधगम्य अवश्य होगी। अतः ऐसी किसी अर्ध-विस्मृत भाषा को पुनर्जीवित करना सार्थक है; जो सपाट हो, सरल हो, सहज हो और भावों को सम्प्रेषित करने में समर्थ हो।

कविता की श्रेष्ठता का मूल्यांकन करने में ‘काव्य-संरचना’ का महत्व भी कमतर नहीं कहा जा सकता। काव्य संरचना काव्य की छंद योजना या व्याकरणिक नियम बद्धता का क्रम भंग होती है, जिससे कविता में लय, तुक या धन्यात्मक अभिव्यक्ति होती है। नामवर सिंह ने पहले से चली आ रही उस परिपाटी को आलोचना की कमजोरी माना जो कविता में छंद योजना, खण्ड दृष्टि या फुटकल चमत्कारों की सजावट को कविता का प्रमुख गुण मानती थी। इसे उन्होंने समीक्षक के लिए आसान और कवि को यशप्राप्ति के लिए सहज अवश्य माना किन्तु इसके द्वारा कविता की प्रभावोत्पादकता को संदेहास्पद बताया। नए प्रतिमान के रूप में नामवर सिंह कविता की उस संरचना के शुभेच्छु हैं जो कविता के कलेवर में होकर भी आंतारिक संरचना में एकात्मक रूप से अन्स्यूत हो तथा उसके किसी भी अंश को पृथक कर पूरी कविता की व्याख्या कर पाना संभव न हो। कविता की संरचना इसकी अर्थ अभिव्यक्ति को रूपाकार करती हो; वह खण्डित रूप में न होकर तार्किक अन्विति का प्रतिनिधित्व करती हो; कविता के गूढ़तम अर्थ की व्यंजक हो; यदि शब्दों, ध्वनियों या वाक्यांशों की पुनरावृत्ति हो तो यह सिर्फ संरचना को ठीक करने के लिए नहीं बल्कि भाव व्यंजक हो।

स्वातंत्र्योत्तर साहित्य में कुछ हद तक वैश्विक साहित्यिक वैचारिकी ने तो कुछ हद तक देश में उत्पन्न विभिन्न स्थितियों ने कविता के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन के लिए समीक्षा के नए मुहावरों को आवश्यक बनाया; जैसे विसंगति, विडंबना, संत्रास, अजनबीयत, अस्तित्व का संकट, अनुभूति की प्रामाणिकता, तनाव, ऑयोरनी आदि। नामवर सिंह ने नवलेखन आन्दोलन पूर्व के आलोचना के प्रतिमानों में इन पारिभाषिक अभिव्यक्तियों को शामिल करने की सलाह दी। उनका मानना था कि इन तत्त्वों को शामिल करती रचनाएँ रोमानी सुरुचि के लिए ज़्यादा तीव्र होंगी और पाठकों के अपने वातावर‌ण से अधिकतम जुड़कर आत्मीयता सम्प्रेषक हो सकेंगी। “संरचना की सघनता, शब्दों की मितव्ययिता, भावों की विडम्बना-निर्मित जटिलता, भाववेश-हीनता एवं विचारों की तीक्ष्णता आदि काव्य-गुणों के कारण ही इस प्रकार की कविताएं आज के काव्य में महत्वपूर्ण स्थान की अधिकारी हो जाती हैं।”16

कविता के प्रतिमान के रूप में काल्पनिकता और अनुभूति की प्रामाणिकता तथा ईमानदारी भी पर्याप्त महत्व के घटक हैं। वस्तुतः कल्पना और वायवीयता सृजन को अवास्तविकता की तरफ ले जाती है जबकि अनुभूति की प्रामाणिकता युग-परिवेश में बंधकर साहित्य को समाज का प्रतिबिम्ब बनाती है। स्वतंत्रतापूर्व की “कविता के पिछले पचास वर्षों के इतिहास से स्पष्ट है कि हर नए उन्मेष के मूल में ईमानदारी की आवाज है, किंतु हर दौर की ईमानदारी की अपनी भाषा है। छायावाद की ईमानदारी ‘आत्मानुभूति’ है तो उत्तर-छायावादी ईमानदारी ‘नीयत’; प्रगतिवाद की ईमानदारी का आधार ‘वर्ग-चेतना’ है तो प्रयोगशील नई कविता की ईमानदारी ‘प्रामाणिक अनुभूति’; और अब सातवें दशक में ‘विसंगति-बोध’ ही ईमानदारी का पर्याय है। साहस और विद्रोह किसी-न-किसी रूप में हर दौर की ईमानदारी के साथ हैं, चाहे उस साहस का रूप जो भी हो।”17 किन्तु यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि ‘ईमानदारी’ और ‘अनुभूति की प्रामाणिकता’ के उपयोग की सर्वाधिक आवश्यकता तो आत्मपरक कविताओं में पड़ती है और उनमें भी विशेष रूप से आत्म-स्वीकृतियों में। आत्म-स्वीकृति की कविताएँ सामान्यत: ईमानदारी का असंदिग्ध दस्तावेज मानी जाती हैं। किन्तु इस सम्पूर्ण वार्ता का “तात्पर्य यह है कि ईमानदारी जरूरी है, लेकिन कवि के लिए कविता भी जरूरी है और इस जरूरत के लिए ईमानदारी काफी नहीं है, न रचना के क्षेत्र में और न आलोचना के।”18 अर्थात कविता की भावना को महत्व देते हुए ईमानदारी का निर्वाह हो, तर्क और अनुभूति की प्रामाणिक प्रस्तुति सम्भव हो तो यह श्रेयस्कर है अन्यथा की स्थिति में काव्य की आत्मा की वरीयता ही काव्य के प्रतिमान में शामिल होना चाहिए।

ध्यातव्य है कि समीक्षा जगत को प्राचीन प्रतिमान छोड़कर नवीन प्रतिमान अपनाने चाहिए जिसमें साहित्य की युग अनुकूलता और जीवंतता के साथ ही लोकोन्मुखीयता बनी रह सके। आधुनिक समीक्षकों की विडम्बना है कि वे नवीन प्रतिमानों की खोज न कर साहित्य को पुरानी कसौटी पर ही कसने का कार्य करते हैं। श्री ‘कुँवर नारायण’ ने ‘हिन्दी आलोचना और रचनात्मक साहित्य’ में इस समस्या की ओर संकेत किया है कि “आज भी हिन्दी समीक्षा के सिद्धांत-पक्ष और व्यवहार-पक्ष में विषमता बनी हुई है। अधिकांश समीक्षक के पीछे विल्कुल व्यक्तिगत रुचि और काव्यानुभव रहता है- समीक्षा के सुनिश्चित मानदंड या तो होते ही नहीं, या ऊल जलूल होते हैं।”19 आज की आवश्यकता है कि किसी नई कविता है प्रतिमानों के बदले कविता के नए प्रतिमानों पर विचार किया जाए। वस्तुत: कोई भी कविता भावनाओं की तीव्रता और अक्रमबद्धता के कारण पूर्व निर्धारित प्रतिमानों का पूर्णरूपेण पालन नहीं कर सकती, वह उनकी सीमा का उल्लंघन करेगी अथवा भावनाओं की परिपक्व सम्प्रेषणीयता से समझौता करना पड़ेगा। आधुनिक जटिलतापूर्ण भावों के युग में जब भाव-पृथकता लगभग असंभव सी हो गई है तब मानकों का निर्वहन हो और भी बेमानी प्रतीत होता है।

श्री ‘नामवर सिंह’ के द्वारा कविता के नए प्रतिमानों के प्रश्न उठाने के समय कविता के समक्ष छायावाद की अमूर्तता, रहस्यवादिता; प्रगतिवाद की यांत्रिकता और सपाटबयानी तथा प्रयोग‌वाद की कोरी बौद्धिकता से पृथक नवीन प्रतिमान स्थापित करने का प्रश्न विद्यमान था; ऐसे में प्रतिमानों की एक नवीन किन्तु अस्पष्ट कसौटी बनती प्रतीत है। किन्तु मूल रूप वहां भी प्रतिमान हीनता का ही बना रहा; जहां समरूप प्रतिमान सब पर लागू न होकर पृथक-पृथक प्रतिमानों के आधार पर रूप में प्रत्येक रचना महत्वपूर्ण हो सकी है। इक्कीसवीं सदी की गतिशीलता, परिवर्तनीयता और जटिलता के आलोक में प्रतिमानों की नवीन कसौटी प्रत्येक रचना के लिए अलग-अलग होगी, किसी एक रचना के मूल्यांकन के प्रतिमान दूसरे पर लागू न हो सकेंगे; प्रत्येक रचना अपने प्रतिमान स्वयं निर्मित करेगी और स्वयं ही उन कसौटियों का अनुसरण भी। नामवर सिंह की प्रतिमानों की नवीनता प्रत्येक रचना के लिए नव प्रतिमान निर्मित करती है। प्रतिमानों की नवीन उद्भावना का नामवर सिंह का प्रश्न तब तक प्रासंगिक बना रहेगा जब तक कि साहित्य की जीवंतता बनी रहेगी और साहित्य युग प्रवृतियों से संचालित होता हुआ समीक्षा की मौलिकता को सम्मिलित करता रहेगा। मूल्यांकन के प्रतिमान भी तभी अधिक प्रासंगिक हो सकेंगे जब वह साहित्य का मूल्यांकन साहित्यिक दृष्टि से करेंगे; अन्य विशिष्टताओं का आरोपण कर साहित्यिक योगदान को विस्मृत नहीं कर देंगें। नामवर सिंह की सकारात्मक दृष्टि समीक्षकों के प्रति इस रूप में है कि नवसमीक्षक प्रतिमानों की मौलिकता को अधिक महत्व देते हैं; साहित्य के साहित्येतर दायित्वों की खोज उसकी अंतः-संवेदना को बनाए रखते हुए करते हैं। साहित्यिक समीक्षा की मौलिकता की यह परम्परा किसी एक समीक्षक तक सीमित न होकर एक विस्तृत आधार पर आधार ग्रहण करती है। नामवर सिंह के बाद प्रतिमानों की नवीनता की सशक्त अभिव्यक्ति ‘कामायनी के अध्ययन की समस्याएँ’ (डॉ. नगेन्द्र), साहित्येतिहास लेखन की नव दृष्टियों, अस्मिता मूलक विमर्श साहित्य आदि में स्पष्ट देखी जा सकती हैं।

संदर्भ :
  1. नामवर सिंह : छायावाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, इक्कीसवां संस्करण 2019, पृष्ठ संख्या- 93
  2. भारती शर्मा : कविता के नए प्रतिमान और स्वातंत्र्योत्तर प्रमुख आंदोलन, ‘सेतु’(मासिक) अगस्त 2019, ISSN 2475-1359 (https://share.google/FQqK2JjS27oxlP67R)
  3. नामवर सिंह : कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, बीसवां संस्करण 2020, पृष्ठ 25
  4. सं. समीक्षा ठाकुर : बात बात में बात (नामवर सिंह), वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, द्वितीय संस्करण 2013, पृष्ठ संख्या- 235
  5. नामवर सिंह : कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, बीसवां संस्करण 2020, पृष्ठ 54
  6. वही, पृष्ठ 53
  7. नामवर सिंह : छायावाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, इक्कीसवां संस्करण 2019, पृष्ठ संख्या- 35
  8. नामवर सिंह : कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, बीसवां संस्करण 2020, पृष्ठ 67
  9. वही, पृष्ठ 68
  10. वही, पृष्ठ 67
  11. वही, पृष्ठ 97
  12. सं. अज्ञेय : तार सप्तक, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्ली, 1968, वक्तव्य से
  13. नामवर सिंह : कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, बीसवां संस्करण 2020, पृष्ठ 97
  14. वही, पृष्ठ 100
  15. वही, पृष्ठ 131
  16. वही, पृष्ठ 165
  17. वही, पृष्ठ 191
  18. वही, पृष्ठ 202
  19. भारती शर्मा : कविता के नए प्रतिमान और स्वातंत्र्योत्तर प्रमुख आंदोलन, ‘सेतु’(मासिक) अगस्त 2019, ISSN 2475-1359 (https://share.google/FQqK2JjS27oxlP67R)

नीलम वर्मा 
शोध छात्रा, हिन्दी विभाग, डी. ए-वी. कॉलेज, कानपुर
(संबद्ध- छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्याल, कानपुर)

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक  सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव 

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