आलोचना के नामवर : आलोचना की भाषा, सृजनात्मकता और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
- शशि भूषण मिश्र
“यह सवाल मेरे भीतर हमेशा से उठता रहा है कि क्या सर्जनात्मकता के बिना सार्थक आलोचना संभव है! और अगर संभव है तो उस आलोचना का स्वरूप क्या होगा!” नामवर सिंह
नामवर सिंह उन विरले आलोचकों में थे जिन्होंने असहमति, साहस और तार्किकता से अपनी पूर्ववर्ती आलोचना परंपरा का सम्यक मूल्यांकन करते हुए हिंदी आलोचना को वाद-विवाद और संवाद के प्रस्थान बिंदु पर खड़ा किया। नामवर जी ने ‘आलोचना की सर्जनात्मकता’ के सवाल से मुठभेड़ करते हुए स्थापना दी कि सर्जनशील आलोचक किसी एक कृति अथवा एक के बाद अन्य कृतियों के साक्षात्कार की प्रक्रिया में उत्पन्न विशिष्ट काव्यानुभूति का वर्णन और मूल्यांकन करते हुए धीरे-धीरे, एक प्रणाली तथा उससे संबद्ध एक विशिष्ट शब्दावली का विकास करता चलता है। यह प्रणाली कभी खुले, कभी छिपे रूप में उसकी जीवन और साहित्य-संबंधी धारणाओं का प्रतिरूप होती है। इसे अधिक-से-अधिक सुसंगत, व्यवस्थित और यथासंभव व्यापक बनाने के लिए आलोचक में सर्जनात्मकता का होना ज़रूरी है। अपनी कल्पना, अंतर्दृष्टि और सर्जनात्मकता के द्वारा एक आलोचक के सामने सबसे बड़ी चुनौती 'युक्तता' की होती है। आलोचना यदि मूल्यांकन है तो आलोचक का प्रत्येक मूल्य-निर्णय युक्तता की जाँच के लिए खुला हुआ है- “कहना न होगा कि मूल्यों की उपयुक्तता के लिए भी आलोचना को निर्मम संघर्ष करना पड़ेगा क्योंकि वह संघर्ष भी आलोचनात्मक संवाद का एक अंग है।”[1]
नामवर जी समकालीनता पर बहुत जोर देते थे, मसलन वह आलोचना से उम्मीद करते थे कि उसमें समकालीन रचनाओं को जाँचने-परखने और मूल्य-निर्णय देने का साहस हो। वह मानते थे कि आलोचना का यह दायित्व है कि वह अतीत की रक्षा करते हुए, अतीत की पुनर्व्याख्या करे और उस पुनर्व्याख्या में समकालीनता की दृष्टि भी विकसित करे। 'आलोचना की परम्परा में हम कहाँ हैं और हमारा समय कहाँ है' नामक शीर्षक के माध्यम से वह समकालीनता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि “आलोचना की मुख्य चुनौती समकालीन रचनाएँ ही होती हैं। जब आलोचना सिद्धान्त से नहीं पैदा होती, बल्कि अपने पर्यवेक्षण से, अपने देखने-दिखाने से पैदा होती है, तो यह सारा देखना-दिखाना साहित्य के अन्दर ही होता है। मेरी पक्की धारणा है कि आचार्य शुक्ल जिस समय कविता की परिभाषा कर रहे थे उस समय उनकी दृष्टि में कोई शास्त्र नहीं था, कोई परम्परा नहीं थी, बल्कि बीसवीं सदी का लिखा हुआ साहित्य था और उस साहित्य से उन्हें जो काव्य-दृष्टि मिली उसी के आधार पर उन्होंने परिभाषा गढ़ी।”[2]
आलोचना की भारतीय परंपरा पर बात करते हुए नामवर जी आचार्य रामचंद्र शुक्ल के योगदान को रेखांकित करते हैं किंतु उनके प्रति नतमस्तक होकर नहीं बल्कि बहुत तार्किक अंदाज में उनकी सीमाएं भी बताते हैं। रामचन्द्र शुक्ल जब हिन्दी साहित्य का इतिहास लिख रहे थे तब उनकी निगाह अपनी परम्परा के सर्वश्रेष्ठ पर थी, जैसे सूर,तुलसी और जायसी। उनकी इस बात से सहमत होना थोड़ा कठिन है कि ' यदि शुक्ल जी स्वयं कबीर पर लिख गये होते तो हजारी प्रसाद द्विवेदी की क्या आवश्यकता थी।' किसी का लिखा अंतिम नहीं होता अन्यथा तुलसीदास पर शुक्ल जी के बाद अभी तक इतना अधिक न लिखा गया होता और आज भी लगातार लिखा ही जा रहा है। यहां तक कि कबीर पर भी ख़ूब सबसे लिखा गया है, जबकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक हिंदी समाज को दी। बहरहाल नामवर जी लिखते हैं कि आलोचना-परंपरा के क्षेत्र में पहला और बुनियादी कार्य आचार्य शुक्ल जी ने किया। ध्यान रहे कि इस देश में आलोचना की शुरुआत हिन्दी से ही तो नहीं हुई, इसके पूर्व डेढ़ हज़ार वर्षों के दौरान आलोचना का विकास हो चुका था लेकिन वह संस्कृत में लिखा जा चुका था, शुक्ल जी ने कहा कि हिन्दी की अपनी आलोचना है, अपनी धरोहर है, वह न तो संस्कृत का अनुकरण है और न ही संस्कृत की विरासत है। यह बहुत जरूरी काम था, संस्कृत की विरासत तो बंगला को मिली है, मराठी, मलयालम को भी मिली है, तमिल वाले दावा करें या न करें, यह अलग बात है, भारत की अन्य भाषाओं को भी मिली है, उसमें हिन्दी की अपनी आलोचना क्या है? शुक्ल जी ने कविता क्या है निबन्ध में बड़ी दृढ़ता से कविता की परिभाषा लिखी है, यह उनका स्वतन्त्र चिन्तन है, संस्कृत या अंग्रेजी का उधार नहीं है। जब वह कविता को हृदय की मुक्तावस्था कहते हैं तो यह जान लेना चाहिए कि किसी आचार्य ने ऐसा पहले नहीं कहा। और फिर उन्होंने कहा कि ज्ञानयोग, कर्मयोग के समान यह भावयोग है, संस्कृत के किसी आचार्य ने कभी ऐसा नहीं कहा। दरअसल यही हिन्दी आलोचना का प्रस्थान बिंदु है।
नामवर जी की आलोचना पढ़ते हुए यह बारम्बार महसूस होता है कि वह आलोचना को एकरस नहीं बनने देते। नंदकिशोर नवल जी की इस बात में बल है कि नामवर के यहां आलोचना एक 'सहयोगी प्रयास' है। नामवर जी की आलोचना जैसे हमें असहमत होने का आमंत्रण देती है। हम गौर करेंगे, तो पाएंगे कि उनकी आलोचना में शुरू से ही एक खुलापन रहा है, जो स्वयं कुछ मार्क्सवादियों को रास नहीं आता। नामवर जी मानते थे कि, “वह संवाद क्या जिसमें कुछ वाद-विवाद न हो। लेकिन हिंदी संस्कृति में वाद-विवाद को अच्छा नहीं समझा जाता। कबीर तक से कुछ लोग इसीलिए बिदकते हैं कि उनमें खंडन-मंडन है। अब कौन समझाए कि 'सुनो भाई साधो' की रट लगानेवाला संत साधो से संवाद के लिए भी उतना ही व्याकुल रहता था।”[3]
आलोचना की भाषा पर विद्वान लगातार विचार करते रहे हैं। अशोक वाजपेयी के हवाले से नामवर सिंह रेखांकित करते हैं कि आलोचना का अधिसंख्य हिस्सा अपने समय और साहित्य के ज्वलंत सवालों से कटकर सामान्य आलोचना-बुद्धि और स्तर की गिरावट को सूचित करता है। नामवर सिंह लिखते हैं कि 'सामान्य आलोचना-बुद्धि और स्तर की यह गिरावट' सबसे पहले भाषा के स्तर पर दिखाई पड़ती है। जैसा कि रामस्वरूप चतुर्वेदी ने संकेत किया है कि आलोचना में पत्रकारिता की भाषा का प्रभाव बढ़ा है, इससे 'विश्लेषण' की अपेक्षा 'वक्तृत्व' और नाटकीयता' का अंश उसमें अधिक बढ़ा है। नामवर जी का अभिमत है कि “आलोचक, कवि या पाठक के लिए नहीं लिखता, किसी कृति पर लिखना उसका ऐतिहासिक दायित्व है, प्रसंगवश उससे कवि या पाठक प्रभावित भले ही हो जाएँ, लेकिन उस एक सांस्कृतिक प्रक्रिया में अपनी भूमिका अदा करने के लिए प्रथमतः वह रचनाकार के समान ही अपने लिए लिखता है, क्योंकि किसी और के लिए लिख ही नहीं सकता- चाहे भी तो नहीं। यदि वह किसी और के लिए लिखता है तो अपने साथ ही दूसरे को भी छलता है। इस दृष्टि से आलोचक मूलतः उक्त सांस्कृतिक प्रक्रिया के अंतर्गत अपने अनुभवों, विचारों और सपनों को ही सुस्पष्ट एवं व्यवस्थित करने के लिए संघर्ष करता है। आलोचक का आत्मसंघर्ष भी रचनाकार के समान ही महत्त्वपूर्ण है-बल्कि व्यवहार में वह आत्मसंघर्ष और भी पेचीदा होता है, क्योंकि वह दुहरा होता है। इसीलिए रचनाकार के समान ही आलोचक के सामने भी माध्यम की समस्या उपस्थित होती है। 'आलोचना की भाषा' की समस्या, इस प्रकार, माध्यम की ही समस्या है। माध्यम की वास्तविक समस्या का सामना वे आलोचक करते हैं जिनके लिए आलोचना एक सर्जनात्मक प्रयास है। इसी प्रयास में नया आलोचक भाषा का साक्षात्कार करता है।”[4]
नामवर जी मानते थे कि आलोचना को शास्त्र के रूप न देखा जाए क्योंकि आलोचना का अपना मूल्य-निर्णय होता है जबकि शास्त्र लक्षण गिना सकता है, उदाहरण दे सकता है कहाँ लक्षणा है, कहाँ व्यंजना है। 'आलोचना की स्वायत्तता' पर विचार करते हुए नामवर जी लिखते हैं कि सवाल दरअसल आलोचना की स्वायत्तता का उतना नहीं, जितना आलोचना की 'सांस्कृतिक केंद्रीयता' का है। वैसे अपनी स्वायत्तता की रक्षा करते हुए भी आलोचना 'सांस्कृतिक केंद्रीयता' प्राप्त कर सकती है, यदि परिप्रेक्ष्य का बोध स्पष्ट हो। इसी प्रकार आलोचना के स्वधर्म के प्रति गहरी निष्ठा हो तो 'सांस्कृतिक केंद्रीयता' प्राप्त कर लेने पर भी आलोचक आलोचना की स्वायत्तता बनाए रख सकता है। रही बात आलोचना की भाषा की तो वह शून्य में निर्मित नहीं होती; वह पहले ही से विविध सांस्कृतिक परतों से छनती हुई आती है और उस पर उन स्तरों की छाप भी होती है। अंग्रेजी-अमेरिकी 'नई आलोचना भी', जो अपने आपको शुद्ध साहित्यिक आलोचना समझने का भ्रम पाले रही, अनेक ऐसे पारिभाषिक शब्दों का सहारा लेने के लिए विवश थी जिनके गैर-साहित्यिक अनुषंग हैं। 'टेंशन', 'जेश्चर', 'काम्प्लेक्सिटी' आदि शब्द इसी प्रकार के शब्द हैं। खास बात तो यह है कि 'नई आलोचना' के ये पारिभाषिक शब्द स्वयं साहित्यिक आलोचना की प्रोक्ति के अंतर्गत भी गैर-साहित्यिक प्रयोजनों की सिद्धि करते रहे हैं। विडंबना (आइरनी), बहुलार्थकता (एबिग्युटी) जैसे शब्द कोरे काव्य-वैशिष्ट्य बोधक न थेः शीतयुद्ध से ग्रस्त अमेरिकी समाज में इन शब्दों ने राजनीतिक भूमिका भी निभाई थी। यह बात उस समय भले ही प्रकाश में न आई हो, आज स्वयं अमेरिकी आलोचना में खुलकर कही जा रही है।
नामवर जी हिंदी के उन आलोचकों में अपनी विशिष्ट पहचान रखते थे जिनकी आलोचना के भीतर गहरा इतिहासबोध मौजूद है। उनकी एक पुस्तक भी 'इतिहास और आलोचना' नाम से है। इस पुस्तक में नामवर जी साहित्य की 'व्यापकता और गहराई' के साथ उसके कलात्मक सौन्दर्य के आधारों पर ज़रूरी बात करते हैं। इस पुस्तक में वह ‘सामाजिक संकट और साहित्य' और ‘समाज, साहित्य और लेखक व्यक्तित्व' जैसे विषयों पर बहस के लिए आमंत्रित करते हैं। नयी कविता में लोकभाषा, छायावादी आलोचना,प्रसाद की काव्य-भाषा, कामायनी के प्रतीक, इतिहास में लोक-साहित्य,इतिहास का नया दृष्टिकोण, ‘हिंदी साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार’ एवं ‘इतिहास और आलोचना’ जैसे वैचारिक -तार्किक लेखों से गुजरकर ही नामवर जी की आलोचनात्मक तितीर्षा को समझना संभव हो सकता है। वह लिखते हैं की साहित्यिक मूल्यों को लेकर मतभेद होना स्वाभाविक है लेकिन केवल 'मतभेद' अराजकता नहीं है। प्रबुद्ध से प्रबुद्ध समाज में भी मतभेद रहता है और सर्वमान्य कृति का मूल्य भी सापेक्षिक होता है। लेकिन प्रबुद्ध साहित्यिक वातावरण में मतभेद का आधार ज्ञातव्य रहता है और लोगों को बराबर यह पता होता है कि मतभेद का निश्चित बिंदु क्या है। मूल्य सर्वसम्मत भले ही ना हो लेकिन उनकी सापेक्षता सर्वसम्मत होती है और इस प्रकार मतभेद का बिंदु सर्वसम्मत होता है। उत्तर भले ही अनिश्चित हो लेकिन प्रश्न निश्चित होते हैं और जिन तथ्यों से ये प्रश्न निकलते हैं वे तथ्य देखने - दिखाने तथा समझने-समझाने की पहुंच में होते हैं- “कहना न होगा कि आज साहित्यिक प्रतिमान का संरक्षक वही समुदाय कर सकता है, जिसमें परम्परा का जीवित बोध है, जिसमें अतीत की जीवन्त स्मृति के साथ ही परिवर्तनशील वर्तमान के प्रति सतत जागरूकता भी है। आज आलोचना का कार्य इसी 'संश्लिष्ट समसामयिक बोध' को परिभाषित और संगठित करना है- स्वयं अधिक-से-अधिक लोगों को इस आत्मबोध के प्रति सतर्क करते हुए उसके निर्माण में सहायता देना है। आलोचना का ठोस, मूर्ति-मान एवं व्यावहारिक प्रतिमान यही है- एक प्रकार से यही साहित्य का प्रतिमान भी है और साहित्य का इतिहास भी।”[5]
जो लोग साहित्यकारों और कृतियों के लेखे-जोखे को साहित्य का इतिहास मानते हैं, उनसे नामवर जी असहमत हैं। वह कहते हैं कि साहित्यकारों तथा साहित्यिक कृतियों का लेखा-जोखा ही इतिहास नहीं है, बल्कि किसी एक साहित्यकार अथवा एक साहित्यिक कृति का समुचित मूल्यांकन भी इतिहास हो सकता है, क्योंकि मुख्य प्रश्न ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का है। वास्तविक आलोचक किसी एक कृति का मूल्यांकन करते समय परोक्ष रूप से साहित्य की समस्त कृतियों का मूल्यांकन करता है, यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह मूल्यांकन ही नहीं है, और उसके अंतर्निहित प्रतिमान में कहीं-न-कहीं असंगति है। जो हर रचना के मूल्यांकन के लिए एक नया प्रतिमान इस्तेमाल करता है अथवा किसी कृति का मूल्यांकन उस कृति के अनुरूप प्रतिमान से करता है और दूसरी कृति के समय उसे भूल जाता है उसे 'गंगा गये गंगादास और जमुना गये जमुनादास' ही कहा जायेगा। “कहना न होगा कि हिन्दी के बहुत से इतिहास इसी तरह के हैं और यदि इतिहास किसी साहित्य का कुछ भी पता देते हैं तो हिन्दी के ये इतिहास हिन्दी आलोचना की अराजकता के दर्पण हैं। बल्कि यहाँ तक कहा जा सकता है कि हिन्दी आलोचना को अराजकता की स्थिति तक ले जाने में इन इतिहासों का भी बड़ा हाथ है।”[6]
उनकी चिंता लगातार इस बिंदु पर बनी रही कि हिन्दी आलोचना ने जीवन्त समसामयिक बोध को परिभाषित और संगठित करने का प्रयत्न नहीं किया- यहाँ तक कि इस तथ्य की वास्तविकता की ओर भी अधिकांश आलोचकों की दृष्टि नहीं गयी। यह समसामयिक साहित्य से ही नहीं, बल्कि जीवन से भी विच्छिन्नता है। जहाँ ऐसी विच्छिन्नता घटित होती है, वहाँ आलोचना का प्रतिमान ही नहीं गिरता बल्कि चिन्तन के स्तर में भी गिरावट आती है - आलोचना की भाषा में गिरावट आती है, लफ्फाजी बढ़ती है, गोलमोल भाषा में हवाई बातें कही जाती हैं, उधार के पारिभाषिक शब्दों से कारोबार चलाया जाता है, जिनका सम्बन्ध अपने यहाँ की वास्तविकता से कतई नहीं होता।
नामवर जी की कई अचूक खूबियों में एक खूबी यह भी थी कि उनके अध्ययन चिंतन को किसी खास खांचे में कैद नहीं किया जा सकता। हिंदी के साहित्यिक अकादमिक समाज में उनकी स्वीकार्यता एक बड़े आलोचक - बौद्धिक के रूप में तो थी ही , साहित्येतर समाज में भी उन्होंने अपनी विस्वसनीय स्वीकार्यता बनाई। नामवर जी के व्याख्यानों, संवादों को संपादित कर पुस्तकाकार रूप में उपलब्ध कराने वाले हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि-आलोचक आशीष त्रिपाठी ने बिल्कुल सही लिखा है कि नामवर जी साहित्येतर अनुशासनों के संवेदनशील, शिक्षितों और बौद्धिकों के बीच सहज ही अपनी छाप छोड़ सके तो इसके पीछे उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता, जनपक्षधरता और अकुंठ प्रतिभा है- "साहित्य की सीमित साहित्यिक व्याख्या से बाहर निकालकर उसे सामाजिक सम्बद्धता के वृहद् परिप्रेक्ष्य में देखने की प्रवृत्ति, जो प्रगतिशील साहित्य-धारा की प्रमुख पहचान है, को उन्होंने व्यापक रूप से फैलाने में प्रायः एक बुद्धिजीवी कार्यकर्ता की तरह कार्य किया। इस क्रम में उन्होंने ठेठ स्थानीय स्थितियों से लेकर वैश्विक परिदृश्य की अपनी भ्रमहीन समझ का परिचय दिया। समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, दर्शन, इतिहास, अर्थशास्त्र जैसे अनेक अनुशासनों की नवीनतम हलचलों की जानकारी और उन्हें जनता के दीर्घकालिक हितों के परिप्रेक्ष्य में कसने का विवेक उन्हें भारतीय लोक और मार्क्सवाद की सच्ची समझ से प्राप्त हुआ।”[7]
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि “यदि प्रगतिशील आलोचना को जातीय और हिन्दी पाठकों की दृष्टि में विश्वसनीय बनाने का कार्य डॉ. रामविलास शर्मा ने किया है तो उसे सक्रिय आन्दोलन के रूप में जीवित रखने और हिन्दी भाषी बुद्धिजीवी-युवकों में तत्संबंधी रुचि जाग्रत करने का कार्य डॉ. नामवर सिंह ने किया है ।”[8]
सन्दर्भ :
[1] सिंह नामवर, वाद विवाद संवाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं.1989, पृ. 29
[2] सिंह विजय प्रकाश, संपादक, आलोचना और जनतंत्र, वाणी प्रकाशन,दिल्ली, प्र.सं. 2023, पृष्ठ, 35
[3] सिंह नामवर,वाद-विवाद-संवाद, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1989, भूमिका से
[4] उपर्युक्त,पृ. 22
[5] सिंह नामवर,इतिहास और आलोचना, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं.1978,पृष्ठ,176
[6] उपर्युक्त, पृ.177
[7] त्रिपाठी आशीष,संपादक,भक्ति काव्य परंपरा और कबीर, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2023, पृ. 9-10
[8] त्रिपाठी विश्वनाथ, हिंदी आलोचना, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं. 2000, पृ.198
शशि भूषण मिश्र
सहायक आचार्य हिंदी, राजकीय महाविद्यालय, समथर, झाँसी(उ.प्र.)
9457815024
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
नामवर सिंह 'जन्मशताब्दी विशेषांक'
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-63, मार्च 2026
सम्पादक : बृजेश कुमार यादव एवं माणिक सम्पादन सहयोग : स्तुति राय एवं संजय साव

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