- जितेंद्र कुमार बिश्वाल, सिद्धार्थ शंकर राय
हिंदी
मार्क्सवादी
आलोचना
में
नामवर
सिंह
का
नाम
जहाँ
शीर्षस्थता
के
साथ
उभरता
है,
वहीं
वे
अनेक
विवादों
के
केंद्र
में
भी
रहे
हैं।
बरहहाल
वे
हिंदी
के
गिने-चुने
प्रमुख
आलोचकों
में
शुमार
हैं।
जिस
प्रकार
आचार्य
रामचंद्र
शुक्ल
से
तमाम
असहमतियों
के
बावजूद
हिंदी
आलोचना
की
धारा
से
जुड़ने
के
लिए
उनके
लेखन
से
गुजरना
अनिवार्य
है,
ठीक
उसी
प्रकार
समकालीन
हिंदी
साहित्य
की
समझ
विकसित
करने
के
लिए
नामवर
सिंह
से
होकर
गुजरना
पड़ता
है।
कहा
जा
सकता
है
कि
हिंदी
आलोचना
की
त्रयी-
आचार्य
रामचन्द्र
शुक्ल,
आचार्य
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
और
डॉ.
रामविलास
शर्मा
के
बाद
यदि
कोई
सर्वाधिक
प्रभावशाली
और
सशक्त
आलोचक
उभरा
है
तो
वह
नामवर
सिंह
ही
हैं।
यद्यपि
उनके
बाद
भी
कई
समर्थ
आलोचकों
का
प्रादुर्भाव
हुआ
है।
अतः
यह
शोध-पत्र
नामवर
सिंह
की
आलोचना-पद्धति
का
समग्र
और
संक्षिप्त
विवेचन
प्रस्तुत
करता
है।
जिससे
उनकी
आलोचना
पद्धति
को
समझने
में
मदद
मिलेगी।
हिंदी
आलोचना
के
इतिहास
में
आचार्य
नामवर
सिंह
ऐसे
आलोचक
हैं,
जिन्होंने
अपनी
आलोचना-दृष्टि
और
पद्धति
के
माध्यम
से
हिंदी
आलोचना
की
धारा
को
नई
दिशा
प्रदान
की
है।
यहाँ
उनको
‘आचार्य’
कहकर
संबोधित
करना
हिंदी
के
विशुद्ध
मार्क्सवादी
और
गैर-मार्क्सवादी
दोनों
वर्गों
को
थोड़ा
बहुत
खटकता
है।
संभवतः
यह
उपाधि
स्वयं
नामवर
जी
को
भी
असहज
करती
होगी।
क्यों
भी
ना
असहज
होंगे-
जिसने
सदैव
तथाकथित
स्थापित
परंपरा
से
प्रतिकूल
अपनी
साहित्यिक
यात्रा
की
है।
फिर
भी
यह
उपाधि
उन्हें
तर्कसंगत
और
न्यायोचित
प्रतीत
होती
है
क्योंकि
उनकी
आलोचना-पद्धति
का
विश्लेषण
यह
स्पष्ट
कर
देता
है
कि
वे
भारतीय
परंपरा
के
मार्क्सवादी
आचार्य
हैं।
जैसा
भी
हो
उनकी
आलोचना
हिंदी
की
प्रगतिशील
आलोचना
की
महत्त्वपूर्ण
कड़ी
है।
विश्वनाथ
त्रिपाठी
का
कहना
है,
“यदि
प्रगतिशील
आलोचना
को
जातीय
और
हिंदी
पाठकों
की
दृष्टि
में
विश्वसनीय
बनाने
का
कार्य
डॉ.
रामविलस
शर्मा
ने
किया
है
तो
उसे
सक्रिय
आंदोलन
के
रूप
में
जीवित
रखने
और
हिंदी
भाषी
बुद्धिजीवी-युवकों
में
तत्संबंधी
रुचि
जाग्रत
करने
का
कार्य
डॉ.
नामवर
सिंह
कर
रहे
हैं।”1 नामवर सिंह की
आलोचना
विचारदर्शी
है।
जिसमें
भारतीय
शास्त्र-ज्ञान,
नई
आलोचना
दृष्टि,
गम्भीरता
तथा
गहराई
समाहित
है।
जैसा
कि
किसी
भी
आलोचक
की
आलोचना
पद्धति
से
अवगत
होने
के
लिए
उसके
आलोचना-कर्म
से
गुजरना
पड़ता
है
एवं
थोड़ा
बहुत
उसकी
आलोचनात्मक
अवधारणाओं
को
जाँच-पड़ताल
करना
भी
पड़ता
है।
अतः
विमर्श
के
पक्षकार
नामवर
सिंह
को
भी
आलोचना
की
आलोचना
नामक
प्रक्रिया
से
गुजरना
पड़ेगा।
इस
प्रक्रिया
से
ही
उनकी
आलोचना
पद्धति
और
आलोचनात्मक
प्रतिमानों
को
भली-भाँति
समझा
और
विवेचित
किया
जा
सकता
है।
नामवर
सिंह
की
आलोचनात्मक
कृतियाँ
हिंदी
साहित्य
के
प्रारंभिक
काल
से
लेकर
समकालीन
युग
तक
फैले
विविध
तर्क-वितर्क
को
अपने
भीतर
समेटे
हुए
हैं।
यानि
उनके
लेखन
के
विस्तृत
भू-भाग
में
अपभ्रंश
काव्य
और
भक्ति
साहित्य
से
लेकर
आधुनिक
काल
के
साहित्य
अनुशासनों
की
उपस्थिति
सहज
ही
परिलक्षित
की
जा
सकती
है।
उनके
आलोचकीय
जीवन
की
पहली
व्यवस्थित
पुस्तक
‘हिंदी
के
विकास
में
अपभ्रंश
का
योग’
है,
जिससे
उनके
आलोचना-कर्म
का
आरंभ
माना
जाता
है।
यह
पुस्तक
उनके
एम.
ए.
के
शोधकार्य
का
प्रतिफलन
है।
लेकिन
इस
पुस्तक
में
उनकी
तर्क-पद्धति
की
तीक्ष्णता
को
देखा
जा
सकता
है।
इस
कृति
में
उन्होंने
अपभ्रंश
साहित्य
पर
अत्यंत
सूक्ष्मदर्शिता,
सहृदयता
और
गंभीरता
के
साथ
विचार
किया
गया
है।
इसमें
उन्होंने
अपभ्रंश
भाषा
से
संबंधित अनेक जटिल
समस्याओं
के
वैज्ञानिक
एवं
ऐतिहासिक
समाधान
प्रस्तुत
किए
हैं। इस पुस्तक
में
उन्होंने
अपभ्रंश
साहित्य
के
महत्वपूर्ण
कवि
और
उनकी
रचनाओं
का
परिचय
देते
हुए,
उन
कविताओं
की
मार्मिक
व्याख्या
के
साथ-साथ
बीज-बीज
टिप्पणियाँ
भी
की
है।
जैसे
कि
आचार्य
रामचंद्र
शुक्ल
ने
रासो
काव्य
की
विशेषताओं
और
रचना
के
परिमाण
के
आधार
पर
हिंदी
साहित्य
के
आदिकाल
को
वीरगाथा
काल
से
नामांकित
करना
नामवर
सिंह
को
संतुष्ट
नहीं
कर
पाया
है।
वे
लिखते
हैं,
“इसमें
कोई
शक
नहीं
कि
‘रासो’
काव्यों
में
कहीं-कहीं
सामंतो
के
शौर्य
का
सुंदर
प्रदर्शन
है
और
उनकी
रसिकता
का
भी
मार्मिक
चित्रण
हुआ
है,
परन्तु
उन
सभी
वर्णनों
में
पुरानी
रूढ़ियों
और
परिपाटियों
का
इतना
संभार
है
कि
उनमें
नवोन्मेष
कम,
प्राचीन
निष्प्राणता
का
संचय
अधिक
दिखाई
पड़ता
है।
एसी
वीरगाथाओं
को
तत्कालीन
जनता
की
चित्त
वृत्ति
का
प्रतिफलन
कैसे
स्वीकार
किया
जाए
जबकि
बख्तियार
खिलजी
ने
केवल
दो
सौ
घोड़ों
से
समूचे
अंग-बंग
के
राजाओं
को
एक
लपेट
में
सर
कर
लिया
और
जनता
के
कानों
पर
जूँ
नहीं
रेंगी।
ज़ाहिर
है
कि
सामान्य
जनता
की
भावना
का
उन
सामंती
वीरगाथाओं
से
कोई
मतलब
नहीं
था।”2 इसके अलावा उन्होंने
अपभ्रंश
और
हिंदी
का
तुलनात्मक
अध्ययन
करके
भाषा-विषयक
संबंधों,
अपभ्रंश
से
हिंदी
व्याकरण
का
संबंध
तथा
अपभ्रंश
और
हिंदी
के
साहित्यिक
संबंध
पर
नवीन
दृष्टिकोण
के
साथ
विचार
किया
है।
यह
प्रायः
कहा
जाता
रहा
है
कि
आचार्य
रामचंद्र
शुक्ल
के
‘हिंदी
साहित्य
का
इतिहास’
से
तमाम
असहमतियाँ
होने
के
बावजूद
नामवर
सिंह
ने
स्वतंत्र
रूप
से
कोई
हिंदी
साहित्य
का
इतिहास
ग्रंथ
नहीं
लिखा
है।
इसके
बावजूद उनकी समस्त
कृतियों
को
ध्यानपूर्वक
साहित्यिक
आंदोलन
और
ऐतिहासिक
क्रम
के
साथ
सँजोया
जाए,
तो
वे
एक
सुव्यवस्थित
और
सुसंगत
हिंदी
साहित्य
का
इतिहास
का
रूप
ग्रहण
कर
लेती
हैं।
नामवर
सिंह
ने
इतिहास
ग्रंथ
लिखने
के
बनिस्पत
इतिहास-दृष्टि
पर
अपनी
पैनी-दृष्टि
डालते
हैं।
जैसा
कि
उन्होंने
इस
प्रश्न
पर
‘केवल
जलती
मशाल’
निबंध
में
रामविलस
शर्मा
पर
विचार
करते
हुए
लिखा
है,
“डॉ.
शर्मा
ने
भारतेंदु
युग,
महावीरप्रसाद
द्विवेदी
और
हिंदी
नवजागरण,
निराला
की
साहित्य
साधना,
नई
कविता
और
अस्तित्ववाद
जैसी
पुस्तकों
के
द्वारा
अनेक
नए
ऐतिहासिक
तथ्यों
के
प्रकाश
में
क्या
आधुनिक
हिंदी
साहित्य
का
एक
नया
इतिहास
प्रस्तुत
नहीं
कर
दिया
है,
और
यदि
आचार्य
रामचंद्र
शुक्ल
और
हिंदी
आलोचना
को
भी
इसके
साथ
जोड़
दें
तो
शुक्लजी
के
इतिहास
के
पुनर्मूल्यांकन
के
द्वारा
समूचे
हिंदी
साहित्य
का
एक
सुसंगत
और
अभिनव
इतिहास
हमारे
सामने
नहीं
आ
जाता?
यह
सही
है
कि
डॉ.
रामविलास
शर्मा
ने
‘हिंदी
साहित्य
का
इतिहास’
नाम
से
कोई
ग्रंथ
नहीं
लिखा,
और
जो
नाम
से
ही
‘इतिहास’
को
पहचानने
के
आदी
हैं
उन्हें
ज़रूर
निराशा
होगी,
लेकिन
उपर्युक्त
कृतियां
समग्रतः
साहित्य
का
इतिहास
नहीं
हैं
तो
क्या
है?
साहित्य
का
इतिहास
और
होता
क्या
है?।”3 क्या यह तर्क
नामवर
सिंह
पर
भी
समान
रूप
से
लागू
नहीं
किया
जा
सकता?
यह
बात
सही
है
कि
उन्होंने
स्वतंत्र
रूप
से
इस
विषय
पर
कोई
ग्रंथ
नहीं
लिखा
परंतु
‘इतिहास
और
आलोचना’
में
‘हिंदी
साहित्य
के
इतिहास
पर
पुनर्विचार’
जैसे
निबंध
उनकी
ऐतिहासिक
चेतना
और
आलोचनात्मक
दृष्टि
को
स्पष्ट
करते
हैं।
जिस
समय
उन्होंने
छायावाद
पर
अपनी
पुस्तक
लिखी,
उस
समय
हिंदी
आलोचना
में
नंददुलारे
वाजपेयी,
शांतिप्रिय
द्विवेदी
और
नगेन्द्र
जैसे
विद्वान
छायावाद
के
सशक्त
पक्षधर
के
रूप
में
सक्रिय
थे।
ऐसे
वातावरण
में
अपेक्षाकृत
कम
आयु
में
छायावाद
जैसे
महत्वपूर्ण
काव्य-आंदोलन
का
साहसपूर्वक
मूल्यांकन
करना
और
उसे
छात्रों
तथा
अध्यापकों
के
बीच
व्यापक
स्वीकृति
दिलाना,
न
केवल
उनकी
प्रतिभा
का
प्रमाण
है,
बल्कि
उनके
आलोचना-कर्म
की
एक
विशिष्ट
उपलब्धि
भी
है।
यह
परिचित
विषय
होते
हुए
भी
साहित्य-प्रेमियों
के
लिए
एक
नए
दृष्टिकोण
और
नवोन्मेषशील
आलोचक
का
परिचय
बन
गया।
नामवर
सिंह
से
पूर्व
अनेक
आलोचकों
ने
छायावाद
को
समझने
का
उपक्रम
किया
और
इसकी
प्रवृत्तियों
को
पहचानने
का
प्रयास
किया।
इन
प्रयासों
में
अन्य
काव्यांदोलनों
की
प्रवृत्तियों
की
‘ओवर
लैपिंग’
और
एक
प्रकार
की
‘रहस्यवादिता’
थी।
नामवर
सिंह
ने
इस
रहस्यमयता
के
आवरण
को
परे
कर
छायावाद
को
स्पष्ट
स्वरूप
प्रदान
किया,
“स्वानुभूति,
कल्पना,
प्रकृति
का
मानवीकरण,
आध्यात्मिक
छाया,
मूर्तिमत्ता,
लाक्षणिक
विचित्रता
आदि
छायावाद
की
विशेषताएँ
कही
जाती
हैं।
किंतु
आलोचकों
के
विवेचन
से
कहीं
यह
स्पष्ट
नहीं
होता
कि
छायावादी
स्वानुभूति
संतों
भक्तों
के
आत्मनिवेदन
से
किस
बात
में
भिन्न
है;
छायावादी
कल्पना
में
प्राचीन
कवियों
की
अप्रस्तुत
विधायिनी
कल्पना
से
क्या
विशेषता
है;
प्रकृति
का
मानवीकरण
करने
में
छायावाद
ने
संस्कृत
कवियों
से
कितनी
अधिक
स्वच्छंदता
दिखलाई
है;
छायावादी
रहस्यवाद
और
संतों
भक्तों
के
अध्यात्मवाद
में
क्या
अंतर
है;
छायावादी
मूर्तिमत्ता
में
प्राचीन
कवियों
के
दृश्यचित्रण
से
क्या
नवीनता
है
और
छायावाद
की
लाक्षणिकता
में
ऐसा
क्या
है,
जो
संस्कृत
काव्यशास्त्र
की
सीमा
में
नहीं
आ
सकता।
इन
प्रश्नों
का
स्पष्ट
उत्तर
दिए
बिना
छायावाद
के
काव्य-सौंदर्य
का
कोई
विवेचन
पूर्ण
नहीं
कहा
जा
सकता।”4 यह विचार छायावाद
संबंधी
विचार-धारणाओं
के
समक्ष
एक
प्रश्न
है
जो
छायावाद
के
आलोचकों
द्वारा
निर्मित
की
गयी
थी।
जिन्होंने
‘भाव
प्रबलता
से
प्रेरित
स्वच्छंद
कल्पना’
को
सम्यक
रूप
में
समझे
बिना
उसकी
व्याख्या
की
है।
एक
सर्जनात्मक
आधुनिक
आलोचक
के
रूप
में
उन्होंने
छायावाद
को
जातीय
वैशिष्ट्य
की
खोज
के
रूप
में
देखने
का
प्रयास
किया।
पुस्तक
के
आरंभ
में
वे
छायावाद
की
ऐतिहासिक
और
सामाजिक
पृष्ठभूमि
प्रस्तुत
करते
हैं
और
अंततः
उसे
राष्ट्रीय
जागरण
की
अभिव्यक्ति
से
जोड़ते
हुए
एक
सुविचारित
और
संतुलित
परिभाषा
देते
हैं।
विश्वनाथ
त्रिपाठी
के
शब्दों
में
“नाम
से
गुण
की
ओर
नहीं
गुण
से
नाम
की
और
बढ़ा
है।”5 इसके अतिरिक्त, छायावादी
कविता
की
‘मैं’
शैली
को
वे
संकीर्ण
व्यक्तिवाद
नहीं
मानते,
बल्कि
उसे
सामाजिक
चेतना
की
ओर
अग्रसर
प्रवृत्ति
के
रूप
में
देखते
हैं
तथा
सामंती
रूढ़ियों
से
मुक्ति
का
संकेत
स्वीकार
करते
हैं।
निस्संदेह,
छायावाद
के
दिग्गज
आलोचकों
की
उपस्थिति
में
एक
युवा
आलोचक
का
यह
हस्तक्षेप
निष्फल
नहीं
रहा।
उसने
न
केवल
छायावाद
की
प्रचलित
समझ
को
चुनौती
दी,
बल्कि
उसके
विवेचन
की
भाषा
और
मुहावरे
को
भी
नई
दिशा
प्रदान
की।
नामवर
सिंह
की
आलोचना-पद्धति
की
एक
प्रमुख
विशेषता
यह
है
कि
वे
अपने
आलोचनात्मक
प्रतिमानों
को
स्थापित
करने
के
लिए
किसी
‘प्रतिनायक’
की
कल्पना
करते
हैं।
इसी
पद्धति
के
आलोक
में
उनकी
बहुचर्चित
कृति
‘दूसरी
परंपरा
की
खोज’
को
समझा
जा
सकता
है।
इस
पुस्तक
में
उन्होंने
आचार्य
रामचंद्र
शुक्ल
की
आलोचना-मान्यताओं
के
प्रतिपक्ष
में
आचार्य
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
को
खड़ा
किया
है।
हालांकि
इस
स्थापना
को
विश्वनाथ
त्रिपाठी
जैसे
आलोचकों
ने
स्वीकार
नहीं
किया
है,
फिर
भी
यह
तथ्य
महत्वपूर्ण
है
कि
नामवर
सिंह
की
आलोचना-दृष्टि
बहस
और
प्रतिपक्ष
की
रचना
के
माध्यम
से
विकसित
होती
है।
इस
संदर्भ
में
पहला
और
बुनियादी
प्रश्न
यह
है
कि
‘दूसरी
परंपरा’
से
अभिप्राय
क्या
है?
क्या
यह
भारतीय
और
अभारतीय,
आर्य
और
अनार्य
तथा
सवर्ण
और
अवर्ण
से
निबंध
अवधारणा
है?
अथवा
तुलसीदास
और
कबीर
के
बहाने
आचार्य
रामचंद्र
शुक्ल
और
आचार्य
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
के
बीच
विद्यमान
वैचारिक
असहमतियों
को
उजागर
कर,
द्विवेदी
जी
की
स्थापनाओं
को
प्रतिष्ठित
करने
का
प्रयास
है?
वस्तुतः
‘दूसरी
परंपरा’
की
अवधारणा
का
आरंभ
नामवर
सिंह
की
छायावाद
पुस्तक
से
ही
हो
जाता
है।
इस
कृति
की
भूमिका
में
ही
उन्होंने
स्पष्ट
कर
दिया
था
कि
छायावाद
की
जो
विशिष्टताएँ
हैं,
वे
पूर्ववर्ती
काव्य
परंपरा
से
किस
प्रकार
भिन्न
हैं।
अर्थात
साहित्य
को
देखने,
समझने
और
मूल्यांकन
करने
की
एक
भिन्न
दृष्टि
का
प्रस्ताव
ही
नामवर
सिंह
की
आलोचना-पद्धति
का
मूल
है।
यही
भिन्न
दृष्टि,
यही
वैकल्पिक
मूल्यांकन
पद्धति
‘दूसरी
परंपरा’
के
रूप
में
सामने
आती
है।
इसी
संदर्भ
में
‘वसुधा’
के
नामवर
सिंह
विशेषांक
में
सुधीर
रंजन
सिंह
का
यह
कथन
अत्यंत
सारगर्भित
प्रतीत
होता
है,
“दूसरी
परंपरा-
यानी
नामवर
सिंह
की
आलोचना-दृष्टि।
... दूसरी
परंपरा
यानी
नामवर
जी
का
लेखन,
लेखन
की
पद्धति
वगैरह,
सब।”6 इस संदर्भ में
यह
भी
स्पष्ट
होता
है
कि
जिस
प्रकार
आचार्य
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
ने
अशोक,
शिरीष
और
नाखून
जैसे
निबंधों
के
माध्यम
से
भारतीय
परंपरा
के
उपेक्षित
और
मानवीय
पक्षों
को
उजागर
किया,
उसी
प्रकार
नामवर
सिंह
ने
‘दूसरी
परंपरा’
के
बहाने
अपने
समकालीन
जीवित
प्रश्नों
को
सामने
रखा।
नामवर
सिंह
की
आलोचना
केवल
अतीत
की
पुनर्व्याख्या
तक
सीमित
नहीं
रहती,
बल्कि
वह
वर्तमान
सामाजिक
और
सांस्कृतिक
संरचनाओं
से
गहरे
रूप
में
जुड़ी
हुई
है।
कबीर
और
सूरदास
के
प्रेम-तत्त्व
के
आलोक
में
वे
मध्यकालीन
साहित्य
में
लोक
और
शास्त्र
के
द्वंद्व
को
रेखांकित
करते
हैं
तथा
तुलसीदास
की
संघर्षशील
चेतना
को
आचार्य
हजारी
प्रसाद
द्विवेदी
की
परंपरा
से
जोड़ते
हुए
समकालीन
सामाजिक
व्यवस्था
के
अंतर्विरोधों
का
प्रतिफलन
प्रस्तुत
करते
हैं।
इस
प्रकार
‘दूसरी
परंपरा’
नामवर
सिंह
के
लिए
केवल
एक
विवादित
साहित्यिक
अवधारणा
नहीं,
बल्कि
अपने
समय
की
वैचारिक
चुनौतियों
से
मुठभेड़
का
माध्यम
है।
कविता
के
नए
प्रतिमान
नामवर
सिंह
की
वही
आलोचना-दृष्टि
है,
जो
‘दूसरी
परंपरा’
में
वैचारिक
स्तर
पर
सक्रिय
दिखाई
देती
है,
किंतु
यहाँ
वह
आधुनिक
हिंदी
कविता
के
संदर्भ
में
अधिक
सघन
और
व्यावहारिक
रूप
ग्रहण
करती
है।
जहाँ
वे
आधुनिक
हिंदी
कविता
के
मूल्यांकन
के
लिए
नए
मानदंड
प्रस्तावित
करते
हैं।
अरूण
कमल
लिखते
हैं,
“जीवन
बदलता
है,
बदलते
जीवन
को
कवि-
चेतना
चिन्हित
करती
है,
तद्नुसार
कविता
बदलती
है,
वह
नयी
बात
कहती
है,
उसके
उपकरण
नये
होते
हैं
और
जो
रुचि
बदली
हुई
नयी
कविता
के
साथ
नहीं
दे
पाती
वह
विरोध
में
खड़ी
होती
है
और
तब
एक
पाठक
जो
इस
नयेपन
को
नये
जीवन
के
साथ
जोड़कर
देख
रहा
होता
है
वह
नयी
कविता
के
पक्ष
में
हाथ
उठाता
है।
कविता
के
नये
प्रतिमान
उसी
नयी
कविता
और
उस
नये
जीवन
के
पक्ष
में
उठा
हुआ
हाथ
है।”7 इस अर्थ में
कविता
के
नए
प्रतिमान
उन
तमाम
रूढ़िगत
सौन्दर्याभिरुचियों
के
विरुद्ध
में
हाथ
उठता
है
जो
कविता
को
जड़
मानदंडों
में
बांधकर
देखती
है।
यह
अवधारणा
नए
प्रतिमान
की
पहचान
करती
है
तथा
उसकी
एक
सैद्धांतिक
व्याख्या
भी
करती
है।
बकौल
नामवर
सिंह
यह
प्रतिमान
अपने
समय
के
सामाजिक
परिवेश,
जीवन-मूल्यों
को
आधार
बनाकर
निर्मित
होते
हैं।
इसी
कारण
वे
मुक्तिबोध
एवं
उनकी
कविताओं
को
इस
आलोचना
के
केंद्र
में
रखते
हैं
क्योंकि
उनकी
कविताएं
स्वतंत्रता
के
बाद
के
सामाजिक-राजनीतिक
वातावरण
का
एक
जलता
हुआ
दस्तावेज
हैं।
उनकी
कविता
में
विद्यमान
आत्म-विस्तार,
वस्तु-सत्य
की
खोज
तथा
जन-पक्षधरता
जैसे
तत्त्व
को
कविता
के
नए
प्रतिमान
मानते
हुए
उसे
नए
आलोचना-पक्ष
का
आरंभ
करते
हैं।
इसके
अतिरिक्त
काव्य
की
भाषा,
सपाटबयानी,
कवि-कर्म
की
ईमानदारी
को
एक
कविता
की
आलोचना
में
केंद्रीय
तत्त्व
मानते
हुए
उसे
आधुनिक
कविता
के
मूल्यांकन
के
लिए
आधार
माना
है।
लेकिन,
चरित्रों
की
टकराहट
की
अवस्था
भी
विद्यमान
है।
यह
प्रवृत्ति
‘कविता
के
नए
प्रतिमान’
में
भी
देखी
जा
सकती
है।
इस
पुस्तक
में
रघुवीर
सहाय
और
केदारनाथ
सिंह
के
बीच
‘सपाटबायानी
और
बिम्बधर्मिता’
का
संघर्ष
है।
जिसमें
‘सपाटबयानी’
नयी
कविता
की
आत्मा
के
रूप
में
स्थापित
है।
यहाँ
यह
उल्लेख
करना
रोचक
है
कि
केदारनाथ
सिंह
के
यहाँ
बिम्ब
पराजित
हैं
और
यहीं
बिम्ब
‘अंधरे
में:
पुनश्च’
में
पुनः
विजयी
हो
उठते
हैं।
बिम्बों
की
संश्लिष्टता
भले
ही
परिलक्षित
न
हो
पायी
है।
लेकिन
आलोचक
का
विवेक
प्रश्नमान
हो
उठता
है।
शंभु
गुप्त
ने
लिखा
है
कि
“हिंदी-कहानी
की
समीक्षा-परंपरा
में
नामवर
जी
का
लगभग
वही
महत्व
है,
जो
काव्य-समीक्षा
की
परंपरा
में
आचार्य
रामचन्द्र
शुक्ल
का
माना
जाता
है।
जैसे
शुक्ल
जी
ने
कविता
की
समीक्षा
को
एक
व्यवस्थित
और
गंभीर
रूप
प्रदान
किया
ठीक
वैसे
ही
नामवर
जी
ने
कहानी
की
समीक्षा
को।”8 यह कथन अनायास
नहीं
है,
बल्कि नामवर सिंह
की
कहानी-समीक्षा
की
व्यापकता,
गहराई
और
पद्धतिगत
स्पष्टता
का
परिणाम
है।
वे
कहानी-समीक्षा
के
प्रतिमानों
पर
इतनी
गहराई
और
व्यापकता
के
साथ
विचार
किया
है
न
केवल
कहानी
और
कहानीकार
का
मूल्यांकन
संभव
होता
है,
बल्कि
उनकी
समकालीन
सामाजिक
परिस्थितियों
और
युगीन
संदर्भों
की
भी
पड़ताल
हो
जाती
है।
उनकी
आलोचना-पद्धति
में
रचना,
रचनाकार
और
देश-काल
का
एक
साथ
मूल्यांकन
होता
है,
जिससे
कहानी
अपने
समय
की
जीवंत
अभिव्यक्ति
के
रूप
में
सामने
आती
है।
इस
दृष्टि
से
कहा
जा
सकता
है
कि
नामवर
सिंह
ने
हिंदी
कहानी
के
लिए
भी
‘नए
प्रतिमानों’
की
खोज
की।
इन
नए
प्रतिमानों
में
वे
कहानी
के
रूप
और
वस्तु
दोनों
पर
विचार
करने
का
आग्रह
करते
हैं
एवं
इन्हीं
के
आधार
पर
कहानी
की
समीक्षा
को
विकसित
करते
हैं।
इस
दृष्टिकोण
को
उन्होंने
अपनी
पुस्तक
‘कहानी:
नयी
कहानी’
की
भूमिका
में
ही
स्पष्ट
कर
दी
थी।
वे
लिखते
हैं,
“अपनी
ओर
से
बराबर
यही
प्रयत्न
रहा
कि
बहस
हवाई
सिद्धांतों
में
न
बहके
और
चर्चा
ठोस
कहानियों
पर
टिकी
रहे।”9 यह कथन उनकी
आलोचना-पद्धति
की
मूल
विशेषता
को
रेखांकित
करता
है।
इसी
आलोचनात्मक
दृष्टि
पर
टिके
रहते
हुए
नामवर
सिंह
ने
निर्मल
वर्मा
को
नई
कहानी
का
पहला
कहानीकार
और
‘परिंदे’
को
नई
कहानी
की
पहली
कहानी
माना।
इस
संदर्भ
में
उन्होंने
निर्मल
वर्मा
की
कहानी-कला
और
कहानी-भाषा
को
केंद्रीय
आधार
के
रूप
में
ग्रहण
किया
है।
साथ
ही,
वे
कहानी
की
पाठ-प्रक्रिया,
फैंटेसी,
रचना-धर्मिता
और
‘अच्छी
कहानी’
की
अवधारणा
पर
विचार
करते
हुए
नई
कहानी
के
अंतर्विरोधों
और
संघर्षों
पर
भी
प्रकाश
डालते
हैं।
इस
प्रकार
नामवर
सिंह
की
कहानी-समीक्षा
पद्धति
हिंदी
कहानी-आलोचना
में
कहानी
के
‘मानवीय
सत्य’,
‘सौंदर्य-बोध’
और
‘जीवन-मूल्यों’
के
विकास
का
मार्ग
प्रशस्त
करती
है।
हिंदी
कहानी-समीक्षा
को
एक
सुसंगत,
वैचारिक
और
समय
सापेक्ष
आलोचना-दृष्टि
प्रदान
करने
का
महत्त्वपूर्ण
श्रेय
निस्संदेह
नामवर
सिंह
को
प्राप्त
है।
अत:
निष्कर्ष
के
रूप
में
यह
कहा
जा
सकता
है
कि
नामवर
सिंह
की
आलोचना-पद्धति
चाहे
वह
अपभ्रंश
साहित्य
का
विवेचन
हो,
छायावाद
का
पुनर्मूल्यांकन
हो,
दूसरी
परंपरा
की
अवधारणा
हो,
कविता
के
नए
प्रतिमान
हों
या
कहानी-समीक्षा-
हिंदी
साहित्य
को
देखने,
समझने
और
मूल्यांकित
करने
की
एक
समग्र
समय-सापेक्ष
दृष्टि
प्रस्तुत
करती
है।
आधुनिक
हिंदी
आलोचना
में
उन्होंने
हिंदी
साहित्य
को
एक
भिन्न,
वैकल्पिक
और
वैचारिक
दृष्टिकोण
से
देखने
की
परंपरा
का
सूत्रपात
किया
है
एवं
उसे
गंभीरता
के
साथ-साथ
विश्वसनीयता
भी
प्रदान
की
है।
नामवर
सिंह
ने
अपनी
संवादधार्मित
से
हिंदी
की
बौद्धिकधारा
को
अन्य
ज्ञानानुशासनों
से
जोड़ने
का
महनीय
कार्य
किया
है।
हिंदी
की
बौद्धिकता
को
समाज-विज्ञान
के
समसामयिक
सिद्धांतों
का
बगलगीर
बनाया
है।
नामवर
सिंह
आलोचना
का
पाठ
उनकी
विचार-भूमि
की
उर्वरता
में
ही
किया
जा
सकता
है,
जिसमें
उनकी
‘लिखित’
और
‘वाचिक’
दोनों
ही
योगदान
समाहित
है।
संदर्भ :
5. त्रिपाठी, विश्वनाथ; हिंदी आलोचना; राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110002; संस्करण-2004; पृ-202.
शोधार्थी, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़-123031
सिद्धार्थ शंकर राय
सह-आचार्य, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़-123031

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