- संगीता कुमारी
भक्तिकाव्य
सांस्कृतिक
संवाद
का
काव्य
है।
यहाँ
ज्ञान
और
भक्ति
का
समन्वय,
गार्हस्थ्य
और
वैराग्य
का
समन्वय,
लोक
और
शास्त्र
का
समन्वय,
लोक
भाषा
और
संस्कृत
भाषा
का
समन्वय
निहित
है।
यानी
यहाँ
सभी
का
द्वंद्व
भी
है
और
समाहार
भी।
नामवर
सिंह
के
भक्ति
चिंतन
को
मुख्यतः
उनकी
पुस्तक
‘दूसरी
परंपरा
की
खोज’
एवं
‘भक्ति
काव्य
परंपरा
और
कबीर’
(संपा.
आशीष
त्रिपाठी)
के
संदर्भ
में
देखा
जा
सकता
है।
इस
पुस्तक
में
नामवर
जी
द्वारा
भक्ति
से
संबंधित
सभी
लेखों
और
उनके
व्याख्यानों
का
संग्रह
है।
इसी
प्रकार
‘दूसरी
परंपरा
की
खोज’
में
परंपरा
के
पूर्व
पक्ष
या
उत्तर
पक्ष
की
जगह
इसे
समग्रता
में
देखने
की
कोशिश
की
गई
है।
दूसरी
परम्परा
यहाँ
एक
प्रकार
से
पहली
परंपरा
की
पूरक
है।
जहाँ
एक
तरफ़
संस्कृति
के
गतिमान
तत्व
निहित
हैं
वहीं
दूसरी
तरफ़
धार्मिक
कुरीतियां’
अन्धविश्वास,
असमानता,
आदि
से
मुक्ति
का
स्वर
है।
विचारों,
भावों
के
आदानप्रदान
ने
भक्ति
की
जो
भूमि
तैयार
की
वहाँ
सर्जनात्मकता
और
सनातनता,
परंपरा
और
नवीन
तत्वों
का
गहरा
समन्वय
हैं।
नामवर
जी
के
विचार
में
दूसरी
परंपरा
की
बात
ही
द्विवेदी
जी
ने
इसलिए
की
है
क्योंकि
सही
मायने
में
आज
जिसे
हम
‘भारत
बोध’
की
संकल्पना
से
जोड़ते
हैं
वह
सिर्फ़
शास्त्रीयता
को
धारण
किये
हुए
नहीं
है।
‘लोक’
की
वह
प्रताड़ना
जो
पालि
भाषा
में
यदि
‘थेरीगाथा’
में
भिखुनियों
के
दुख
और
उनका
आत्मप्रक्षेपण
है
तो
प्राकृत
भाषा
में
छद्म
नाम
से
लिखी
गई
सातवाहन
शासक
‘हाल’
की
गाथा
सप्तसती
है
जो
संस्कृत
से
लोकभाषा
की
यात्रा
का
अद्वितीय
उदाहरण
है।
‘भारत’
शब्द
की
जो
परिकल्पना
है
वह
सिर्फ़
‘वेद’,
उपनिषद,
स्मृतियां,
और
वेदान्त
में
निहित
नहीं
है।
वह
वैष्णव
परंपरा,
द्रविड़
संस्कृति
और
संगम
साहित्य
एवं
तमिल,
तेलुगु,
कन्नड़,
मलयालम
जैसी
दक्षिण
भारत
की
क्षेत्रीय
भाषाओं
और
संस्कृति
को
भी
धारण
किये
हुए
हैं।
भक्ति
काव्य
इसलिए
भी
नवजागरण
का
काव्य
है
क्योंकि
यहाँ
सिर्फ़
लोक
और
शास्त्र
का
द्वंद्व
नहीं
है
यहाँ
वह
जीवंत
परंपरा
है
जो
स्त्रियों
के
दुख
उनकी
सामान्य
संवेदना
और
प्रश्नों
को
धारण
किये
हुए
हैं।
शुरुआत
की
जितनी
भी
भक्त
कवयित्री
हैं
जैसे
कराइक्वल
अम्माईयार,
आंडाल
इनकी
रचनाएँ
जीवनीपरक
हैं।
चूंकि
इनकी
सामाजिक
भागीदारी
पुरुषों
की
तुलना
में
नगण्य
थी
इसलिए
इनकी
पीड़ा
आत्मपरक
ही
होंगी।
ऐसे
में
महत्वपूर्ण
यह
है
कि
भक्तिकाल
की
रचनाओं
में
कम
से
कम
यह
सम्मिलित
हैं।
“शैव
स्त्री
भक्त
कराइक्वल
अम्माईयार
के
अलावा
वैष्णव
भक्त
अंडाल
का
पहली
सहस्राब्दी
में
धार्मिक
व्यवस्था
को
चुनौती
देना
भक्ति
संसार
की
एक
बड़ी
घटना
है।
अंडाल
ने
वैष्णव
भक्ति
को
अपनी
स्त्री
संवेदना
की
विशिष्टता
की
वजह
से
विलक्षणता
दी।
देखने
की
जरूरत
है
कि
किस
तरह
उनकी
आध्यात्मिक
मुक्ति
की
आवाज
उनकी
पराधीन
स्त्री-दशा
से
भी
मुक्ति
की
आवाज
है।
ऐसे
स्त्री
भक्तों
का
अस्तित्व
इसका
प्रमाण
है
कि
वे
शिक्षित
थी।
उनमें
पर्याप्त
साहित्यिक
क्षमता
थी।
उन्होंने
वैयक्तिक
अनुभूति
को
महत्व
दिया
था
तथा
ब्राह्मण
पुरोहितों
द्वारा
रचे
गए
सामाजिक
बंधनों
तथा
धार्मिक
कर्मकांड
की
उपेक्षा
की
थी।
हम
यह
भी
देख
सकते
हैं
कि
अंडाल
सहित
प्रायः
सभी
स्त्री
भक्त
कवियों
ने
पितृसत्तात्मक
वर्चस्व
को
अपनी
सीमा
में
चुनौती
दी
थी,
उन्हें
‘नीचे
से
उठी
आवाज़’
के
रूप
में
समझने
की
जरूरत
है।”
यह
अनायास
नहीं
है
कि
दक्षिण
भारत
में
स्त्री
भक्त
संत
कवयित्री
हैं,
वहीं
कृष्ण
काव्यधारा
में
मीरा
के
पद
हैं
और
सूरदास
की
रचनाओं
में
गोपियों
के
माध्यम
से
स्त्री
स्वातंत्र्य
की
चेतना
का
प्रस्फुटन।
कुल
मिलाकर
यह
जो
पूरा
भक्तिकाव्य
है
यह
भाषा,
प्रकृति,
समानता
की
पूरी
संवेदना
को
धारण
किये
हुए
हैं।
इसे
सगुण-निर्गुण
धारा
में
विभाजित
करने
की
जगह
समग्रता
में
देखने
की
आवश्यकता
है।
गोस्वामी
तुलसीदास
के
रामचरितमानस
में
हनुमान,
बाली,
सुग्रीव,
जटायु,
काग
भूषुण्डि
की
अविस्मरणीय
छवि
है
जो
हमें
जोड़ती
है
मनुष्यता
और
जीव-जगत
की
समस्त
सत्ता
से।
यह
तत्व
अंतर्गुर्फित
है
दायित्व
की
एक
पूरी
श्रृंखला
से,
मिथकों
से,
पौराणिक
कथाओं
से
जहाँ
माया
और
यथार्थ
के
द्वंद्व
में
मनुष्य
का
संपूर्ण
जीवन
आकार
ग्रहण
करता
है।
कह
सकते
हैं
कि
एक
ओर
यदि
भक्ति
काव्य
में
संस्कृति
के
संरक्षण
का
तत्व
है
तो
दूसरी
तरफ़
परम्परा
या संस्कृति के
नाम
पर
रूढ़ियों
के
संरक्षण
का
विरोध।
और
यही
कारण
है
कि
नामवर
जी
का
भक्ति
क़ालीन
चिंतन
हज़ारी
प्रसाद
द्विवेदी
के
निकट
कहें
या
उनकी
भक्ति
चिंतन
की
आलोचना
या
विकास
है।
नामवर
जी
के
शब्दों
को
लें
तब-
“उल्लेखनीय
है
कि
14-15वीं सदी के
इस
विशाल
भक्ति
आंदोलन
के
दौरान
बड़ी
संख्या
में
स्त्री
संत
कवि
भी
हुए-
इतनी
संख्या
में
कि
जिसकी
मिसाल
न
पहले
मिलती
है,
न
पीछे-
स्त्री
शिक्षा
के
व्यापक
प्रचार-प्रसार
के
युग
में।
इस
व्यापक
भक्ति
आंदोलन
के
युग
में
यह
उल्लेखनीय
तथ्य
है
कि
इसी
के
द्वारा
आधुनिक
भारतीय
भाषाओं
को
अपनी
अस्मिता
प्राप्त
हुई
और
असमिया,
बंगाली,
उड़िया,
मराठी,
गुजराती,
पंजाबी,
सिंधी,
कश्मीरी
तथा
उससे
पहले
तमिल,
आन्ध्र,
कन्नड़िया,
केरलीय,
आदि
जातियाँ
एक
नई
सांस्कृतिक
इकाई
के
रूप
में
अस्तित्व
में
आयी।” उपरोक्त कथन
से
स्पष्ट
है
कि
क्यों
भक्ति
काव्य
सांस्कृतिक
जागरण
का
काव्य
हैं।
सामान्यतया
साहित्य
की
अपील
सार्वभौमिक
होती
है
और
यह
सार्वभौमिकता
किसी
भी
रचनाकार
की
विशिष्टता
होती
है।
नामवर
जी
की
दृष्टि
में
आचार्य
हज़ारी
प्रसाद
द्विवेदी
की
रचना
यात्रा
भी
इन्हीं
प्रामाणिकताओं
को
धारण
किए
हुए
है।
“सूर
साहित्य
से
चलकर
ही
द्विवेदी
जी
‘कबीर’
तक
पहुँचे
थे
यह
तथ्य
है।
और
सच
पूछिए
तो
इस
विचार-यात्रा
में
कोई
विरोध
भी
नहीं
है।
सूर
से
कबीर
तक
की
यात्रा
प्रेम
के
पंथ
की
ही
भाव-यात्रा
है।
सामाजिक
विद्रोह
का
एक
रूप
वह
भी
है
जो
प्रेम
की
भाषा
में
अभिव्यक्ति
पाता
है।
आकस्मिक
नहीं
है
कि
द्विवेदी
जी
के
कबीर
पर
सूर
की
प्रेमभक्ति
का
गहरा
रंग
है।”
स्पष्ट
है
कि
भक्ति
भाव
का
केंद्रीय
तत्व
प्रेम
है।
ईश्वर
से
प्रेम
करते
हुए
संसार
से
प्रेम
और
एक-दूसरे
से
प्रेम।
प्रेम
ही
वह
तत्व
है
जिसने
भक्त
और
भगवान
के
मध्य
के
संबंध
को
एक
बिन्दु
पर
स्थापित
कर
दिया।
यदि
किसी
असीम
सत्ता
के
प्रति
अगाध
आस्था
का
रूपांतरण
भक्ति
है
वहीं
यह
देवत्व
पर
मनुजत्व
की
श्रेष्टता
का
प्रतिपादन
भी
है।
यानी
ईश्वर
और
भक्त
के
बीच
का
संबंध
लौकिक
भी
है
और
पारलौकिक
भी।
लेकिन
धर्म
यहाँ
लोक-कल्याण
की
चिंता
से
जुड़ा
है
अर्थात
धर्म
यहाँ
समाज
के
पथ-प्रदर्शक
के
रूप
में
है।
और
इसलिए
यहाँ
काव्य
कर्म-सौंदर्य
का
काव्य
है
और
पूरा
भक्ति-काव्य
लोक
की
चिंताओं
से
सम्बद्ध
है।
हालाँकि
इस
लोक
की
व्याख्या
भी
अलग
अलग
रचनाकारों
के
लिए
भिन्न
है।
आचार्य
शुक्ल
के
लिए
लोक-धर्म
मानव
धर्म
है।
जिस
धर्म
से
समाज
चलता
है
वहीं
धर्म
लोक-धर्म
है
और
उसका
आधार
है
प्रेम।
प्रेम
ही
वह
राह
है
जिस
पर
जनता
बिना
किसी
भेदभाव
के
चल
सकती
है।
उनके
लिए
भक्ति
मार्ग,
भाव-मार्ग
या
प्रेम-मार्ग
ही
है
और
प्रेम
प्रस्फुटन
है
रागात्मक
वृत्ति
का।
आचार्य
हज़ारी
प्रसाद
द्विवेदी
की
राय
में
लोक
धर्म,
लोक-विश्वास
है।
उनके
लिए
लोक
का
अर्थ
हिन्दू
धर्म
में
हाशिए
पर
पड़ी
जनता
और
इसलिए
वे
लोक-धर्म
को
शास्त्रीयता
के
विरुद्ध
लोक-विश्वास
के
उत्थान
के
रूप
में
देखते
हैं।
“शास्त्र
और
लोक
के
बीच
द्वंद्व
की
इस
प्रक्रिया
का
आकलन
करते
हुए
द्विवेदी
जी
ने
भारतीय
इतिहास
की
एक
और
विशेषता
की
ओर
संकेत
किया
है,
वह
यह
है
कि
लोक
के
दबाव
में
शास्त्र
ने
कभी-कभी
अपने-आपको
लचीला
बनाकर
लोक
की
बहुत-सी
विशेषताओं
को
अंतर्भुक्त
कर
लिया
है।
भारत
में
उच्च
वर्ग
के
इस
वैचारिक
लचीलेपन
और
समझौतावादी
रुख़
का
ही
यह
परिणाम
हुआ
कि
हिंसात्मक
विद्रोह
की
स्थितियां
बहुत
कम
उत्पन्न
हुई।
इस
दृष्टि
से
भारत
की
प्राचीन
मनीषा
अन्य
अनेक
देशों
के
बुद्धिजीवियों
से
अधिक
चतुर
और
व्यवहारकुशल
प्रतीत
होती
है।
किन्तु
यदि
एक
ओर
‘शास्त्र’
ने
झुककर
लोक
की
विशेषताओं
को
अंतर्भुक्त
किया
तो
दूसरी
ओर
शास्त्र-वंचित
लोक
भी
अपने
अनुभव-संचित
विचार-खंडों
को
सुसंगत
और
समृद्ध
बनाने
के
लिए
‘शास्त्र’
का
सहारा
लेता
रहा।
इस
दुहरी
प्रक्रिया
में
कभी-कभी
ऐसे
‘लोकधर्म’
का
निर्माण
हुआ
जो
व्यापक
जन-विद्रोह
के
लिए
वैचारिक
आधार
का
काम
करता
रहा
है।”
दरअसल,
लोक
धर्म
लोक
मंगल
का
ही
दार्शनिक
नाम
है।
सभी
भक्त
कवियों
ने
प्रेम
पर
बल
देकर
उस
समय
के
जातीय
सांप्रदायिक
झगड़े
को
समाप्त
करने
की
कोशिश
की।
संपूर्ण
कृष्ण
भक्ति
काव्य
इस
दृष्टि
से
अत्यंत
महत्वपूर्ण
है,
यहाँ
प्रेम
के
माध्यम
से
हर
वैमनस्य
का
समाधान
है।
“मीरा
के
साहित्य
में
प्रेम
सबसे
महान
जीवन-मूल्य
के
रूप
में
चित्रित
है।
यह
प्रेम
कालिदास
की
परंपरा
का
अवदान
नहीं
है
जिनके
यहाँ
प्रेम
अधिकांशतः
रत्यात्मक
एवं
श्रृंगारिक
है।
…अगर
प्रेम
को
एक
जीवन
मूल्य
के
रूप
में
प्रस्तुत
किया
जाए
तो
वह
निश्चित
तौर
पर
भक्तों
एवं
सूफ़ियों
का
योगदान
है।” यही नहीं
प्रेमाख्यानक
कवियों
ने
भी
प्रेम
को
ही
केंद्रीय
विषय
बनाया।
जायसी
के
यहाँ
भी
मनुष्य
मात्र
के
प्रति
प्रेम
ही
सर्वोपरि
है।
जायसी
यूँ
ही
नहीं
कहते-
मानुस
प्रेम
भएउ
बैकुंठी।
नाहि
त
काह
छार
भरि
मूठी।।
भक्ति
काल
के
“भक्तों
ने
एक
काम
यह
भी
किया
कि
भक्ति
के
लिए
प्रमाणांतर
की
आवश्यकता
नहीं
है।
भाव
ही
प्रमाण
है।
इसके
लिए
और
किसी
प्रमाण
की
आवश्यकता
नहीं
है।
इस
भक्ति
का
अनुभव
ही
प्रमाण
है।
इस
आधार
पर
दुख
की
गहरी
अनुभूति
के
द्वारा
कवि
यही
कर
सकता
है।
कलाकार
की
क्रिएटिविटी,
रचनाकार
की
सर्जनात्मकता
इसी
बात
में
है
कि
दुख
हो
या
सूख
हो,
पूर्ण
अनुभव
के
द्वारा
ही
आप
उसका
अतिक्रमण
कर
सकते
हैं।
वह
अतिक्रमण
होता
है
सर्जनात्मक
कृतित्व
के
द्वारा,
गान
लिखकर
या
नाट्य
से।
दुख
से
मुक्ति
होती
है-
दुख
को
संगीत
में
ढालकर,
कविता
में
ढालकर,
स्थापत्य
में
ढालकर!
इसलिए
समूचे
दुख
को
अनुभव
में
उतारकर
सर्जनात्मक
रूप,
मूर्त
रूप
देने
में
ही
दुख
का
निवारण
होता
है।”
एक
सृजनकर्ता
अपनी
सृजनात्मकता
की
पूरी
यात्रा
में
कई
चरणों
से
गुज़रता
है।
और
इस
यात्रा
में
वह
अपने
ही
अनुभव
को
कभी
ख़ारिज
करता
नज़र
आता
है
तो
कभी
नई
स्थापनाएँ
गढ़ता
चलता
है।
नामवर
जी
के
अनुसार
कबीर
की
रचनात्मकता
ऐसे
ही
स्थापनाओं
का
निरूपण
है।
“कबीर
के
विषय
में
अनावश्यक
व
भ्रामक
प्रश्न
उछाले
जा
रहे
हैं
कि
कबीर
भक्त
थे?
समाज-सुधारक
थे?
कवि
थे?
या
ईश्वर
थे?
कबीर
कवि
थे,
ईश्वर
नहीं
थे,
क्योंकि
ईश्वर
कवि
नहीं
हो
सकता।
कबीर
और
अंबेडकर
को
भी
आमने-सामने
खड़ा
करना
उचित
नहीं
है।
कबीर
कवि
थे
और
अंबेडकर
विद्वान
और
दोनों
के
कर्म
अलग-अलग
थे।
कबीर
विद्वान
कम
थे
लेकिन
उनकी
प्रतिभा
काव्य
के
रूप
में
फूटी।”
कबीर
में
आक्रमकता
या
आक्रोश
सिर्फ़
समाज
की
विद्रूपताओं
को
व्याख्यायित
नहीं
करती।
कबीर
जितना
विरोध
सामाजिक,
धार्मिक,
आर्थिक
असमानता
का
करते
हैं
उतना
ही
विरोध
मनुष्य
की
अकर्मण्यता,
आलस्य
और
निश्चिंतता
पर
भी
करते
हैं।
कबीर
का
वही
दुख
और
समाज
के
लिए
प्रतिबद्धता
उन्हें
भक्त
कवियों
में
श्रेष्ठ
बनाता
है।
“कबीर
के
यहाँ
ऐसे
अनेक
वर्णन
मिलेंगे,
यहाँ
तक
कि
सुख
और
दुख
में
से
सुख
को
छोड़कर
वह
दुख
को
चुनने
के
लिए
तैयार
रहते
थे।
कबीरा
सुख
को
जाये
था
आगे
मिलया
दुःख।
जाहि
सुख
घर
आपने
हम
जाणे
और
दुख।।
सुख
मिला
और
सुख
को
छोड़
दिया
तू
अपने
घर
जा,
अब
हम
और
दुख
दो
ही
हैं।
यह
कबीर
का
वचन
है।”
कबीर
किसी
धारा
में
बँधने
वाले
रचनाकार
नहीं
थे।
और
उनके
दार्शनिक
मत
इन्हीं
उद्देश्यों
को
रेखांकित
करते
हैं।
जीव
को
ब्रहम
का
अंश
मानकर
कबीर
ने
स्पष्ट
शब्दों
में
कहा
कि
समस्त
जीवात्मा
एक
ही
है
किन्तु
अपने
रूपाकार
में
ये
हमें
पृथक-पृथक
दिखाई
देते
हैं।
जैसे
जल
को
यदि
अनेक
पात्रों
में
रखा
जाय
तो
उनमें
रूपाकार
के
कारण
नाम
भेद
होगा।
कलश
का
जल,
गिलास
का
जल,
घड़े
का
जल,
लोटे
का
जल
आदि
व्यवहार
होता
है
किन्तु
जल
तो
एक
ही
है
और
समान
है।
स्वर्ण
का
उदाहरण
देकर
इस
अभेद
को
दर्शाया
गया
है।
स्वर्ण
से
नाना
प्रकार
के
आभूषण
बनते
हैं
किन्तु
मूलतः
स्वर्ण
तो
एक
ही
पदार्थ
है
उसमें
रूप
भेद
होने
पर
भी
पार्थक्य
नहीं
होता।
जीवों
में
भेद
होने
पर
भी
जीवात्मा
एक
ही
है
और
ब्रह्म
की
अंश
हैं-
पानी
ही
ते
हिम
भया,
हिम
द्वै
गया
विलाय।
जो
कुछ
था
सोई
भया,
अब
कुछ
कह्या
न
जाय।।
अपनी
दार्शनिक
विचारधारा
में
कबीर
आदि
संत
अद्वैतवाद
के
समर्थक
रहे
हैं,
यही
कारण
है
कि
वे
आत्मा
और
परमात्मा
की
एकता
स्वीकारते
हैं।
वे
कहते
हैं
कि
जीवात्मा
में
परमात्मा
पूर्णरूप
से
विद्यमान
है।
तभी
तो
आत्मा-परमात्मा
के
संबंध
को
स्पष्ट
करते
हुए
वे
कहते
भी
हैं-
जल
में
कुंभ-कुंभ
में
जल
है,
बाहिर
भीतर
पानी,
फूटा
कुंभ
जल
जलहिं
समाना,
यह
तथ
कह्यों
ग्यानी।
इस
प्रकार,
हम
कह
सकते
हैं
की
भक्ति
काल
का
विकास
एक
क्रमगत
विकास
नहीं
है।
इस
काल
में
साहित्यिक
दृष्टि
से
और
वैचारिक
दृष्टि
से
कई
धाराएं
समानांतर
रूप
से
चल
रही
थी।
एक
तरफ
तुलसी
सगुण
भक्ति
की
बात
करते
हैं
और
राम
को
मर्यादा
पुरुषोत्तम
के
तौर
पर
स्थापित
कर
रामचरितमानस
जैसे
महाकाव्य
की
रचना
करते
हैं
तो
दूसरी
तरफ
सूरदास
वात्सल्य
और
श्रृंगार
की
प्रधानता
से
परिपूर्ण
भ्रमरगीत
सार
की
रचना
करते
हैं।
एक
अनपढ़
जुलाहा
जो
अपने
भोगे
हुए
यथार्थ
को
दोहों
के
माध्यम
से
सामने
लाता
है
जिसे
आगे
आने
वाला
समाज
संत
कबीरदास
का
दर्जा
देता
है,
तो
दूसरी
तरफ
फंतासी
शिल्प
पर
जायसी
पद्मावत
जैसी
रचना
का
लेखन
करते
हैं।
ऐसे
अन्य
उदाहरण
हमें
मिलेंगे
जो
भक्ति
काल
की
महत्ता
को
हिंदी
साहित्य
में
एक
अप्रतिम
स्थान
प्रदान
करते
हैं।
दरअसल,
मध्य
काल
तक
‘व्यक्ति’
विशेषकर
आम
जनता
की
मानसिकता
यही
थी
कि
सर्वोच्च
सत्ता
पर
राजा
है
और
उसके
अधीन
प्रजा।
प्रजा
का
काम
है
राजा
के
आदेश
का
पालन
करना
और
राजा
का
काम
है
प्रजा
को
न्याय,
सुरक्षा
जैसे
उसकी
सभी
ज़रूरतों
का
ख्याल
रखना।
ऐसे
समय
में
भक्ति
आंदोलन
के
संतों,
कवियों
ने
पहली
बार
व्यवस्था
के
विरुद्ध
आवाज़
उठायी।
इन्होनें
साधारण
जनता
को
आत्म-मंथन
के
लिए
मजबूर
किया।
नामवर
जी
अनायास
‘दूसरी
परंपरा’
की
बात
नहीं
करते
और
यूँ
ही
द्विवेदी
जी
के
विचारों
से
सहमति
नहीं
प्रकट
करते
हैं।
वे
परंपरा
के
नाम
पर
अतीत
और
वर्तमान
की
निरंतरता
को
तलाशते
हैं
और
उन
कवियों
को
स्थापित
करते
हैं
जिनकी
संवेदना
मनुष्य
मात्र
की
संवेदना
से
जुड़ी
है।
जहाँ
व्यक्ति
को
उनके
जन्म,
वर्ग,
वर्ण,
जाति,
आदि
के
आधार
पर
विभाजित
नहीं
किया
गया
है।
यही
नहीं
जिन
प्रश्नों
का
हल
आधुनिक
बुद्धिजीवी
आज
तक
नहीं
ढूंढ
पाए;
भक्त
कवियों
ने
उसका
उत्तर
वही
ढूँढ
लिया
था।
जहाँ
वे
अतार्किक
हुए
आस्था
और
ईश्वर
के
प्रति
आध्यात्मिकता
और
समर्पण
में
अपने
को
ढाल
लिया।
और
जहाँ
वे
दुख
और
वेदना
को
नहीं
झेल
पाए
मनुष्य
के
प्रति
प्रेम
में
अपने
को
तिरोहित
कर
लिया
लिया।
भक्त
कवियों
ने
आस्था
और
आध्यात्मिकता
के
द्वंद्व,
धर्म,
अर्थ,
काम
और
मोक्ष
के
चार
पुरुषार्थों
के
बीच
पांचवें
के
रूप
में
‘प्रेम’
की
स्थापना
की।
क्षेत्रीय
भाषाओं
के
उत्थान
की
दृष्टि
से
भक्तिकाल
हिन्दी
साहित्य
के
इतिहास
में
स्वर्णिम
पहचान
रखता
है।
नामवर
सिंह
जी
ने
हिंदी
के
विकास
में
अपभ्रंश
की
महत्ता
को
जिन
रूपों
में
प्रस्तुत
किया
था,
उसका
प्रतिफलन
था
कि
उन्होंने
भक्त
कवियों
द्वारा
लोक
भाषा
के
योगदान
को
रेखांकित
किया।
यही
नहीं
नामवर
जी
इसे
सिर्फ़
काव्य
तक
सीमित
नहीं
मानते
बल्कि
इसे
काव्य
से
बड़ी
सत्ता
मानते
हैं
और
सर्जनात्मक
विस्फोट
की
संज्ञा
देते
हैं।
वह
कहते
हैं
कि-
“भक्ति
के
साथ
एक
नया
संगीत
आया
है।
साथ-साथ
नाट्य
रूपों
का
अद्भूत
विकास
हुआ
है।
सच्चाई
तो
यह
है
कि
भक्ति
एक
तरह
से
कविता
में
भाषा
का
नृत्य
है।”
सदर्भ :
[6] वही, पृ. 53
[8] वही, पृ. 44
[9] वही, पृ. 37
हिंदी विभाग, जगजीवन महाविद्यालय (मगध विश्वविद्यालय), गयाजी, बिहार

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