सम्पादकीय : इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता से उभरते कुछ प्रश्न / जितेन्द्र यादव

इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता से उभरते कुछ प्रश्न
- जितेन्द्र यादव

 

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता की प्रसिद्धआलोचनात्रैमासिक पत्रिका में इधर के युवा कवियों की कविता और उनका मंतव्य पढ़ते हुए रचनाशीलता में सक्रिय कई युवा कवियों की रचनाओं से गुजरने का अनुभव मिला। कविता लेखन में क्षितिज का विस्तार हुआ है अधिकांश युवा कवि, कवयित्री, मुस्लिम, दलित, आदिवासी कवि अपनी सामाजिक अस्मिता के साथ कविता में मौजूद हैं। कविता की जनतांत्रिकरण को देख कर मन आश्वस्त हुआ है। 

इन कविताओं को पढ़ते हुए मन में कई प्रश्न भी उठे कि कविता की शिल्प ,अर्थग्रहणशीलता सम्प्रेषणशीलता और अंतर्दृष्टि में नयापन कहाँ है? कई चर्चित कवियों की कविताएं पढ़कर तो और भी निराशा हुई कविता में प्रयोग और शिल्प के नाम पर कविता का रूप एकदम गद्य हो गया है। गद्य और पद्य का भेद बिल्कुल मिट गया है। कविता के नाम पर गद्य को पढ़ना मन कोफ्त से भर गया। मुझे नामवर सिंह का कथन याद आता है कि कविता छंद मुक्त हो सकती है लेकिन लय मुक्त नहीं। किंतु प्रयोग और शिल्प के नाम पर कविता को नितांत गद्य का रूप दे देना और उसे कविता के नाम पर पढ़ना, मन एक विचित्र नीरसता के उधेड़ बुन में फंस जाता है। 

कुछ कवियों की कविताओं में शब्द का आडंबर इतना अधिक है कि कविता का कोई भी ओर -छोर पकड़ में ही नहीं आता है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण कविता का अमूर्त और वायवीय हो जाना है। कविता का अमूर्तिकरण कविता को समझ के दायरे से बाहर कर देती है। कविता बौद्धिक विलास और पहेली बुझाने की तर्ज पर लिखी जाएगी तो वह आम पाठक से कैसे जुड़ पाएगी? कविता किसीराकेट साइंसकी तरह हो गई है, जिसका अर्थग्रहण करने के लिए दिमाग की नसें फटने लगती हैं। शुष्कता और नीरसता इतना कि काव्य की मूल रसात्मकता ही गायब हो गई है। कवि बोधिसत्व भी अपने मंतव्य में इस बात को मानते हैं किलिरिकल होना हिन्दी कविता के लिए अभिशाप बनकर आया है.... आज कवियों और कविता का सबसे बड़ा संकट पक्षधरता नहीं बल्कि नीरस कविताओं का उत्पादन है। हिंदी कविता की विडम्बना है कि बिना कवित्वशक्ति के हर कवि मुक्तिबोध बनना चाहता है। वह सोचता है कि वह जितना जटिल और कठिन कवि होगा अपनी बात को जितना जटिल तरीके से कहेगा उतना बड़ा कवि समझा जाएगा। यहीं से हिंदी कविता का क्षरण शुरू होता है। कविता अपनी संप्रेषणशीलता खो रही है और अर्थग्रहण के स्तर पर जटिल से जटिलतर होती जा रही है। इसीलिए आम पाठक से उसका अलगाव होता जा रहा है। आई..रिचर्ड्स का भी मानना था कि कवि की अनुभूतियाँ और भावों को पाठक तक उसी रूप में पहुँचाना ही कविता का सही सम्प्रेषण है। हिंदी कविता में इधर की पीढ़ी में कोई भी कवि जनमानस में उतना लोकप्रिय नहीं हुआ जितना की दिनकर, नागार्जुन, पंत, निराला, बच्चन इत्यादि कई हुए। इसके पीछे तटस्थ आलोचना का अभाव भी एक बड़ा कारण है। कवियों का अपना क्लब और गुट है। आपस में ही एक दूसरे की तारीफ के पुल बांधते हैं। सोशल मीडिया पर भी एक दूसरे को लाइक, कमेन्ट करके एक दूसरे को महान घोषित करने की होड़ लगी है। दरअसल वह भ्रांति के शिकार हैं कि जनता की चेतना उनकी कविता को समझने के स्तर की अभी नहीं है। वह अपनी कविता को यदि संप्रेषणशील बनाएंगे तो पाठक के पास सोशल मीडिया और डिजिटल के जमाने में स्वत: चली जाएगी। अभी एक युवा कवि बच्चा लालउन्मेषकी कवितातुम कौन जात हो भाईअपने कथ्य, शिल्प और संप्रेषणशीलता के कारण इतनी लोकप्रिय हुई कि आम पाठक की जिह्वा तक स्वतः उसकी पहुंच हो गई। नेताओं ने भी उस कविता को मंच और सदन से उद्धृत किया। 

इक्कीसवीं सदी हिंदी कविता को उसके शाब्दिक जाल और अमूर्त्तता से बाहर निकालकर उसकी नवीन कथ्य शैली, पठनीयता, आंतरिक लय, अर्थबोधगम्यता को कविता में बचाना होगा। शब्दों की बाजीगरी को कविता कहना बंद करना पड़ेगा। यदि कविता पढ़ते समय हमारे ह्रदय के तार नहीं झंकृत होते हैं, कविता अपने भाव और संवेदन से हृदय को स्पर्श नहीं करती है बिना सिर पैर का सिर्फ बौद्धिक वाक् विलास है। ऐसी कविताएं दिमाग़ को घनचक्कर बना देती हैं। इस तरह की कविता मन और मस्तिष्क को उत्तेजित करने के बजाय अजीब तरह की चिड़चिड़ाहट पैदा करती हैं। ऐसी कविता पूरा पढ़ने से पहले ही मस्तिष्क विद्रोह कर देता है और पन्ना पलटकर हमें आगे बढ़ना पड़ता है। ऐसे लोगों के लिए ही रीतिकाल के कवि ठाकुर की पंक्ति सटीक बैठती हैलोगन कवित्त कीबो खेल करी जानो है 

कविता का अंतिम लक्ष्य पाठक ही है। इसलिए उसकी बोधगम्यता का विशेष ध्यान रखना होगा। अपनी आत्ममुग्धता के कारण पाठक की समझ और काव्य विवेक का मज़ाक नहीं बनाना चाहिए कि पाठक की समझ स्तरहीन है। यह भी हो सकता है कि आपकी कविता स्तरहीन हो। लेकिन कौन कहेगा? तटस्थ आलोचना का अभाव है। जो कवि है वही कविता का आलोचक है, जो आलोचक है वहीं दूसरी जगह कवि भी है। कविता लेखन में ज्यादातर हिंदी कवि पेशे से अध्यापक या शोधार्थी हैं। किन्तु कविता का पाठक यदि शोधार्थी है तो वह भी उसके रसात्मक अर्थबोध तक नहीं पहुंच पा रहा है। उसका भावबोध शब्दों के तिलिस्म में खो जा रहा है। रसात्मकता और अर्थग्रहण करना, किसी अँधेरे बंद कमरे में चक़्कर लगाने जैसा ही है। 

हिंदी कविता में कुछसिंडिकेटहैं। वह जिसे चाहेंगे उसे कवि का तमगा मिल जायेगा। उनकी मित्र मंडली ख़राब कविता को सराह देगी, उसे मंच दिलवा देगी और युवा कवि और कवयित्री फिर अगली पंक्ति में नजर आएंगे। इस तरह साहित्य में उसे जबरदस्ती थोप दिया जायेगा। जब वह किसी पत्रिका में अपनी कविता भेजेंगे तो सम्पादक को कविता समझ में आए या आए उसे छापना मज़बूरी है क्योंकि साहित्य के सिंडिकेट उसे युवा कवि और कवयित्री का तमगा जो दे चुके हैं। यही से समकालीन हिंदी कविता रसातल की ओर प्रस्थान करती है।

जो समकालीन हिंदी कवि अपनी कुछेक कविताओं से प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके हैं। उन्हें भी सतर्क होकर कविता लिखनी चाहिए। जब हृदय किसी विषय पर घनीभूत होकर प्रेरित करे तभी कविता बाहर आनी चाहिए। कविता लिखने के लिए कविता नहीं लिखनी चाहिए अन्यथा वह कविता नहीं बल्कि अनर्गल प्रलाप बन जाती है। पाठक आपकी चर्चित कविता वाली तेवर खोजता है और वह नहीं मिलने पर वह निराश होता है। धूमिल ने भी तो कम ही कविता लिखी लेकिन सार्थक लिखी। अब तो धूमिल से ज्यादा काव्य संग्रह नए कवियों के जा रहे हैं लेकिन अफ़सोस कि कहीं कविता रेखांकित करने के योग्य नहीं हैं।

इधर हिंदी कविता के युवा कवि अदनान कफ़िल दरवेश और विहाग वैभव की कविता गैर साहित्यिक नामचीन व्यक्तित्व योगेंद्र यादव ने इनकी कविता की प्रशंसा करते हुए उद्धृत किया। हम साहित्य से जुड़े लोगों को यह देखकर सकारात्मक ऊर्जा मिलती है कि हिन्दी कविता का अपने परिधि से बाहर विस्तार हो रहा है। ये युवा कवि निर्विवाद रूप से कविताई तेवर से पहचान बना चुके हैं। इसलिए इनकी पहचान साहित्य के सिण्डिकेट की मोहताज नहीं है।

आलोचना पत्रिका का विशेषांक भाग 2 एवं 3 पढ़ने के दौरान कवियों की कविता और उनका मंतव्य भी पढ़ने को मिला। ज़्यादातर एक विचारधारा से संबद्ध कवि हैं। कविता के संकट के सवाल पर अधिकांश ने बाजार और पूंजीवाद को दोषी ठहराया है। यह सही भी है लेकिन क्या यह सार्वभौमिक सत्य है? जब इसी बाजार और पूंजीवाद में आदमी सांस ले रहा है तो कविता क्यों नहीं सांस ले सकती। यहाँ जर्मन कवि नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त की प्रसिद्ध पंक्ति याद आती है- ‘क्या अंधेरे समय में भी गीत गाए जाएंगे ? हाँ अंधेरे समय के ही गीत गाए जाएंगे’  ऐसे वक्त में कविता की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। 

आलोचना के इस अंक में पंकज चतुर्वेदी की कविता अपने कलेवर में छोटी लेकिन मारक हैं। कविता हृदय और मस्तिष्क को एक साथ स्पर्श करती है। अयोध्या मंदिर पर उनकी कविता की बानगी देखिये

एक भव्य मंदिर 
जिसे देखकर 
याद आए :
एक प्रार्थना- गृह को गिराकर 
यह बनाया गया था 
राम!
यह तुम्हें उपहार है 
या तुम्हारी हार है ?

इसी तरह कई उनकी छोटी -छोटी कविता भाव और संवेदन के स्तर पर बहुत मार्मिक बन पड़ी हैं। उपचार नहीं, वहां से देखो, असाधारण, मैं चाहता हूँ इत्यादि शीर्षक की कविता है। कवयित्री कविता कादंबरी की रचना प्रकिया अनुभवजन्य है। कविता जी में बड़बोलापन नहीं है। बहुत शांत भाव से अपने यथार्थ को दर्ज करती हैं। विरासत' कविता में स्त्री जीवन की सीमाओं को रेखांकित करती हैं-

नानी बीमार है 
उन्हें देखने जाना है 
यह बात हमारी माँऐं 
खुद कह सकी हमारे पिताओं से 
बेटियों से कहलवाया 

इनकी कविता भविष्य के प्रति हमें आश्वस्त करती है। इसी तरह युवा कवि केतन यादव की कवितातुम्हारा कठकरेज देवभारत की वर्णव्यवस्था की गहरी पड़ताल है। जाति के क्रूर सच्चाई को कविता में पिरो देना अद्भुत कवित्व है। कविता की बानगी देखिये

देह को चूर करने से पहले धोका देने के लिए
मल सीवर टंकी में उतरने से पहले कलुआ ने देशी शराब मांगी 
कुछ मनुष्य जितने ऊंचे अन्तरिक्ष में गए कुछ उतने नीचे 
गटर में 
और गटर में उतरने वाले की जाति होती है 
कुछ लोग कह सकते हैं अन्तरिक्ष में जाने वाले की भी 
जैसे उनके गगनचारी देवताओं की होती रही
जिन्होंने उनका खेत जोता 
उनकी स्त्रियों का पहला कौमार्य भी जोता गया

                इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता को देखकर कई कवियों जिनका नाम उल्लेख नहीं कर पा रहा हूँ उनकी कवित्वशक्ति निःसंदेह भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है कि उनका लेखन दिन प्रतिदिन आगे बढ़ेगा। हिन्दी कविता को उनसे बहुत उम्मीद है। बस जरूरत है अपनी लौ को ऐसे ही जलाए रहना। साथ ही इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता के लिए निष्पक्ष समालोचन की जरूरत भी रहेगी। तभी कविता की दिशा तय होगी। 

अपनी माटी पत्रिका का अंक 64 सामूहिक परिश्रम का परिणाम है। पूरी संपादकीय टीम अपने -अपने हिस्से की भूमिका निभाती है तब जाकर एक अंक आकार लेता है। रचनात्मक लेखन, शोध आलेख का वैविध्य इस अंक में मिलेगा। हमें खुशी है कि युवा रचनाकारों का सुखद सहयोग बराबर मिल रहा है। अभी हाल ही में संगीत की दुनियाँ की मधुर आवाज आशा भोसलें जी हमारे बीच नहीं रहीं। उन्हें विनम्र श्रद्धांजली। उनकी आवाज की मिठास श्रोताओं में हमेशा जिंदा रहेगी। 

 

संपादक

जितेंद्र यादव

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग

सकलडीहा पी. जी. कॉलेज सकलडीहा चंदौली


अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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