- विंध्याचल यादव
“राजेंद्र
कुमार
बेहद
आत्मलोपी
व्यक्ति
हैं।..
उन्हें
न
कभी
इतराते
देखा,न
दीन-हीन।सदैव
वही
आत्मीय
हॅंसती
छवि।
ज्यों-ज्यों
जानते
जाओगे,
त्यों-त्यों
उनके
असाधारण
मामूलीपन
के
कायल
होते
जाओगे।”1
यद्यपि
राजेन्द्र
कुमार
के
पहले
कविता
संग्रह
‘ऋण
गुणा
ऋण’(1978)
के
अलावा
उनका
अधिकांश
लेखन
नब्बे
के
बाद
प्रकाश
में
आया।
कदाचित
उनका
उक्त
‘आत्मलोपी’
स्वभाव
इसका
अधिकांश
जिम्मेदार
हो!लेकिन
वे
सातवें
दशक
में
इलाहाबाद
की
मिट्टी
में
गड़
चुके
थे।उनके
स्वप्न
और
संघर्ष
का
यही
दौर
है।
बात
हो
रही
है
‘70 के
दशक
और
उसके
बाद
के
इलाहाबाद
की।उस
साहित्यिक
शहर
इलाहाबाद
की
जिसकी
सांस्कृतिक
हैसियत
‘साहित्यिक
राजधानी’
की
थी।
जिसके
लिए
ज्ञानरंजन
ने
अपने
एक
इंटरव्यू
में
कहा
है
कि
“इलाहाबाद
साहित्यकारों
का
एक
जीवित
कुंभ
था।”
यदि
हिंदी
साहित्य
के
पहले
स्वर्ण
युग
‘भक्ति
काल’
का
मुख्य
केंद्र
बनारस
था,तो
दूसरे
स्वर्ण
युग
‘छायावाद’
का
मुख्य
सेंटर
इलाहाबाद
था।
प्रसाद
के
अलावा
सारे
बड़े
छायावादी
कवि
इलाहाबाद
में
थे।
छायावाद
ही
क्यों;
उसके
उत्तर-संस्करण
‘हालावाद’
के
भी
ज्यादातर
कवि
यहीं
हुए।
बच्चन,
भगवतीचरण
वर्मा,
अंचल,
नरेंद्र
शर्मा
सब।
छायावाद,नई
कविता
और
नयी
कहानी
ये
तीन
बड़े
आंदोलन
इसी
शहर
में
हुए।
राजेन्द्र
कुमार
1967 ई.
में
कानपुर
से
इलाहाबाद
आ
चुके
थे।पहला
ठिकाना
था
‘धूपछॉंह’।अमृतराय
का
घर।तब
निराला
तो
नहीं,लेकिन
पंत
और
महादेवी
इलाहाबाद
में
थे
और
सक्रिय
थे।इन
तीनों
छायावादी
कवियों
का
प्रगतिवाद
की
तरफ
परवर्ती
झुकाव
सर्वविदित
है।पंत
में
सायास।
‘रूपाभ’
और
‘युगांत’
की
घोषणा
के
साथ।
निराला
में
अनायास।
स्वाभाविक
रूप
से
अभिव्यक्त।
कुकुरमुत्ता
और
नये
पत्ते
की
कविताएं
कुछ
अधिक
उभरकर
प्रगतिवाद
की
तरफ
झुक
गईं
थीं।
महादेवी
भी
अपनी
तमाम
आध्यात्मिकता
के
बावजूद
‘सांध्यगीत’
(काव्य
) ‘श्रृंखला
की
कड़ियां’
(वैचारिक
गद्य)
और
‘दीपशिखा’
के
गीतों
तक
आते-आते
प्रगतिशील
चेतना
की
तरफ़
झुकती
चली
गईं।
इलाहाबाद
शहर
के
आगामी
साहित्यिक
विकास
की
दृष्टि
से
यह
देखना
बेहद
दिलचस्प
है
कि
‘पल्लव’
में
‘छायावाद
का
घोषणापत्र’
लिखा
पंत
ने
और
सबसे
पहले
‘युगान्त’
आदि
की
घोषणा
भी
उन्होंने
ने
ही
की,पर
बाद
के
इलाहाबाद
ने
उन्हें
छायावादी
डिबिया
के
बाहर
स्वीकार
नहीं
किया।
लेकिन
वहीं
निराला
के
लिए
प्रगति
और
प्रयोग
के
अद्भुत
संगम
‘कवियों
के
कवि’
शमशेर
ने
लिखा
कि
“जब
कभी
मैं
राह
भूला
हे
महाकवि/तुम्हीं
झलके
सघन
तम
की
ऑंख
बन
मेरे
लिए।”
तो
राजेन्द्र
कुमार
ने
उसी
इलाहाबाद
में
लिखा
कि,
“निराला
छायावाद
के
रूपायन
के
ही
नहीं,
छायावाद
के
रूपांतरण
के
भी
कवि
हैं।”2
इन
सबसे
बड़ी
और
दिलचस्प
बात
जो
इलाहाबाद
में
हुई
थी,वह
‘परिमल’
संस्था
(1944) और ‘यामा’ संस्था
(1954-55) की स्थापना;जो
क्रमशः
निराला
और
महादेवी
वर्मा
की
काव्य-कृतियों
पर
आधृत
थी।
‘परिमल’
प्रगतिशील
लेखक
संघ
के
समांतर
एक
मंच
था
जहां
साहित्य
को
किसी
राजनीतिक
विचारधारा
के
कठोर
बंधन
से
मुक्त
रखकर
उसके
साहित्यिक
व
कलात्मक
मूल्यों
के
प्रति
प्रतिबद्धता
का
आग्रह
था।जिसे
साही
जी
ने
‘रचना
को
विचारधारा
की
शूली
पर
टाॅंगना’3 कहा था। यह
संगठन
मूलतः
कविता
केंद्रित
था।
धर्मवीर
भारती,
विजयदेवनारायण
साही,
लक्ष्मीकांत
वर्मा,नरेश
मेहता,रामस्वरूप
चतुर्वेदी,
रघुवंश,जगदीश
गुप्त,
ब्रजेश्वर
वर्मा
और
अंतिम
‘परिमली’
केशवचन्द्र
वर्मा
आदि
परिमल
वृत
के
प्रमुख
कवि-लेखक
थे।
छठे
दशक
में
प्रगतिवादियों
के
साहित्य
की
विचारधारा
और
सामाजिकता
के
विशेष
आग्रह
के
खिलाफ
परिमलवादियों
ने
साहित्य
की
कला
और
साहित्यिकता
का
बिगुल
फूॅंका।साही
की
‘छठवॉं
दशक’4 और नामवर सिंह
की
‘इतिहास
और
आलोचना’5 जैसी किताबें इसी
बहस
की
पैदाइश
हैं।
नामवर
सिंह
ने
अपनी
इस
किताब
की
‘विज्ञप्ति’
में
यूं
ही
नहीं
लिखा,
“कि
यह
पुस्तक
छठे
दशक
के
वैचारिक
संघर्ष
का
एक
विवादमूलक
दस्तावेज
है।”6 कुछ ऐसे ही
तेवर
विजयदेव
नारायण
साही
के
भी
थे।
उन्होंने
अपने
इन
लेखों
को
‘हिंदी
के
छठे
दशक
की
आत्मा
कहा
है।’और
लिखा
है
कि
“चूॅंकि
‘छठवें
दशक’
के
पिघलाने
वाले
ताप
में
ये
लेख
लिखे
गए
थे,
इसलिए
इनमें
उस
वक्त
की
गर्मी
मौजूद
है।”7
इस
गर्मा-गर्मी
के
बीच
यह
समझा
जा
सकता
है
कि
निराला
प्रगतिशीलों
की
‘साहित्य
साधना’
के
सुफल
तो
थे
ही,
परिमल
वृत
जैसे
कलावादियों
को
भी
रास्ता
दिखा
रहे
थे।
रोचक
है
कि
प्रगतिशील
लेखक
संघ
और
जन
संस्कृति
मंच
जैसे
मार्क्सवादी
संगठनों
के
प्रति
अपनी
गहरी
प्रतिबद्धता
के
बावजूद
राजेन्द्र
कुमार
परिमलवादियों
के
बड़े
प्रशंसक
रहे;खासकर
साही
जी
और
रघुवंश
के।
रघुवंश
तो
उनके
गुरु
ही
थे।
उन्हीं
के
‘अण्डर’
राजेन्द्र
जी
ने
‘सृजनात्मक
साहित्य
के
आयाम
और
विज्ञानवादी
दृष्टि’
विषय
पर
पी-एच०डी०
की
थी।
राजेंद्र
जी
ने
साहित्य
अकादमी
के
लिए
इलाचंद्र
जोशी
पर
जो
मोनोग्राफ(1993ई.में)
लिखा
उसे
अपने
गुरू
डॉ.
रघुवंश
को
ही
समर्पित
किया
है-
“आदरणीय
रघुवंश
जी
को,जिनसे
सीखा
कि
साहित्य
का
मर्मज्ञ
होने
के
दावे
से
कहीं
ज्यादा
अर्थवान
होती
है
साहित्य
के
प्रति
ममतालू
होने
की
अनुभूति।”
उन्होंने
अपनी
चर्चित
पत्रिका
‘अभिप्राय’
में
‘साही
के
बहाने
समकालीन
रचनाशीलता
पर
एक
बहस’(1985)
शीर्षक
से
विशेषांक
निकाला।
साही
पर
भी
और
लक्ष्मीकांत
वर्मा
पर
भी
अभी
हाल
में
मृत्यु
से
कुछ
वर्ष
पहले
अपनी
अस्वस्थता
के
बीच
उन्होंने
‘तद्भव’
पत्रिका
के
लिए
लिखा
था।8 इसके पहले भी
उन्होंने
लक्ष्मीकांत
वर्मा
पर
‘हिंदुस्तान’में
बड़ी
आत्मीयता
से
लिखा
था
कि-
“उनके
कई
मित्र
जैसे-साही,
नरेश
मेहता,
धर्मवीर
भारती
सप्तक
के
कवियों
के
रूप
में
अज्ञेय
द्वारा
चुने
गए,लेकिन
लक्ष्मीकांत
वर्मा
को
इस
बात
का
मलाल
शायद
ही
रहा
हो
कि
उन्हें
किसी
सप्तक
में
क्यों
नहीं
स्थान
मिला।”9 राजेन्द्र कुमार
ने
परास्नातक
की
कक्षाओं
में
पढ़ाया
था
कि
लक्ष्मीकांत
वर्मा
के
‘नयी
कविता
के
प्रतिमान’(1957ई.)
और
नामवर
जी
की
‘कविता
के
नये
प्रतिमान'
(1968ई.)
के
बीच
यह
शीर्षक
साम्य
महज़
संयोग
नहीं
है;यह
प्रगतिशील
लेखक
संघ
और
परिमल
वृत
के
दो
साहित्यिक
दृष्टिकोणों
के
उस
वैचारिक
संघर्ष
का
ही
परिणाम
है।
जाहिर
है
इस
संघर्ष
का
केंद्रीय
अखाड़ा
इलाहाबाद
ही
था।
राजेंद्र
जी
ने
‘शहरनामा’(2011)
में
बदलते
इलाहाबाद
के
बारे
में
लिखा
भी
है
कि,
“लेकिन
अब
वहां
काफी
हाउस
में
गर्म
काॅफी
तो
आपको
मिल
जाएगी
पर
वह
गर्मा-गर्म
बहसें
कहाॅं?
अगर
हम
साहित्यिक
गतिविधियों
को
याद
करें
तो
‘परिमलियों’
और
‘प्रगतिशीलों’
कि
वह
भिड़ंत
कहाॅं?”10
उस
दौर
के
इलाहाबाद
की
दूसरी
महत्वपूर्ण
संस्था
‘यामा’
की
स्थापना
कथाकार
अमरकांत
ने
मार्कण्डेय
और
शेखर
जोशी
के
साथ
मिलकर
महादेवी
के
काव्य-संग्रह
का
आदर्श
लेकर
किया।
‘यामा’
मूलतः
परिमलवादियों
के
कलावाद
और
कविता
केंद्रीयता
के
खिलाफ
अलग
पहचान
और
विमर्श
की
जमीन
तलाशते
हुए
गठित
हुआ
था।यामा
की
बैठकों
में
यथार्थवादी
कहानियों
और
आम
आदमी
के
संघर्ष
पर
चर्चा
होती
थी।यामा
संस्था
का
ऐतिहासिक
योगदान
यह
है
कि
इसने
नई
कहानी
आंदोलन
को
कुंठा,
सेक्स,महानगरीपन
और
दूसरी
तमाम
व्यक्तिवादी
प्रवृत्तियों
से
ही
संवलित
नहीं
रहने
दिया,वरन्
उसे
गांव
और
कस्बों
के
जीवन-संघर्ष
तथा
जनवादी
रूझान
की
ओर
मोड़
दिया;न
केवल
नई
कहानी
जैसे
आंदोलन
में
प्रेमचंद
की
परंपरा
का
रास्ता
फूटा
बल्कि
उसी
इलाहाबाद
में
अकहानी
आंदोलन
से
निकले
दूधनाथ
सिंह
ने
‘रीछ’
और
‘आइसबर्ग’
जैसी
कहानियां
लिखने
के
बाद
‘माई
का
शोकगीत’और
‘धर्मक्षेत्रे
कुरुक्षेत्रे’
जैसी
कहानियां
लिखीं।
परंपराएं
इसी
तरह
कहीं
दबती
कहीं
उभरती
हुई
संक्रमित
होती
हैं।
यह
परंपरा-ग्रहण
का
कैसा
वक्र-प्रवाह
है
कि
छायावाद
के
इन
दो
कवियों
और
उनके
कविता-संग्रहों
(जबकि
ये
दोनों
बड़े
गद्यकार
भी
थे)
का
नाम
सुमिरन
कर
इलाहाबाद
ने
हिंदी
आलोचना
और
नई
कहानी
आंदोलन
का
इतना
गुणात्मक
व
सघन
विकास
किया!
वहीं
पन्त
जी
को
लेकर
काशी
में
अभी
बीस
बरस
पहले
नामवर
सिंह
ने
‘कूड़ा
विवाद’11 खड़ा किया;जबकि
वे
उन्हें
छायावाद
के
चार
स्तंभों
में
बहुत
पहले
अपनी
‘छायावाद’(1954)
पुस्तक
में
स्थापित
कर
आए
थे।
तो
परिमलवादियों
की
तरफ
से
इलाहाबाद
में
साही
ने
‘विवेचना’
की
एक
गोष्ठी
में
श्रोतादीर्घा
से
खड़े
होकर
पन्त
जी
की
उपस्थिति
में
यह
घोषणा
कर
दी
थी
कि
“मैंने
लोकायतन
पढ़ा
नहीं
है,और
न
पढ़ूंगा।”12 हालॉंकि
आपत्ति
करने
पर
उन्होंने
तुरंत
अपने
वाक्य
का
अंतिम
अंश
वापस
ले
लिया
था।13
1960 ई. और इसके
आसपास
इलाहाबाद
के
साहित्यिक
परिदृश्य
में
इन
छायावादी
स्तंभों
के
बाद
केदारनाथ
अग्रवाल,शमशेर
बहादुर
सिंह,
सर्वेश्वरदयाल
सक्सेना
और
अज्ञेय
जैसे
प्रगतिशील
और
प्रयोगवादी
कवियों
के
साथ
रामविलास
शर्मा,अमृतराय,भैरव
प्रसाद
गुप्त
और
प्रकाशचंद्र
गुप्त
जैसे
लेखकों
की
उपस्थिति
देखी
जा
सकती
है।परिमलवृत्त
के
लेखकों
से
अज्ञेय
और
सर्वेश्वर
के
बड़े
गहरे
रब्त-जब्त
थे,वे
परिमल
की
गोष्ठियों
में
शामिल
होते
रहे।
अज्ञेय
ने
तो
‘प्रतीक’
के
माध्यम
से
उन
लेखकों
की
एक
पीढ़ी
तैयार
की
थी,जो
आगे
चलकर
परिमल
वृत्त
और
नयी
कविता
के
महत्वपूर्ण
कर्ता-धर्ता
हुए।
धर्मवीर
भारती
और
विजयदेवनारायण
साही
से
अज्ञेय
के
संबंध
विशेषकर
बहुत
मधुर
थे।
यहां
तक
कि
तमाम
वैचारिक
तिक्तता
और
बहस
के
बावजूद
रामविलास
शर्मा
को
‘तार
सप्तक’
में
अज्ञेय
ने
छापा
था।
बौद्धिक
गरिमा
का
यह
वातावरण
इलाहाबाद
की
खास
पहचान
रही
है।
अज्ञेय
और
‘चौथा
सप्तक’(जिसे
बाद
में
‘थोथा
सप्तक’
भी
कहा
गया)
को
लेकर
राजेन्द्र
कुमार
एक
रोचक
प्रसंग
सुनाते
थे।लिखा
भी
है
इस
बारे
में
उन्होंने।
कानपुर
में
रहते
हुए
राजेन्द्र
जी
ने
अज्ञेय
को
खूब
पढ़
रखा
था,
बहुत
प्रभावित
हुए
थे।
अपनी
कविताएं
उन्हें
डाक
से
भेजी
थीं।और
अज्ञेय
ने
भी
प्रोत्साहित
कर-करके
राजेन्द्र
जी
को
कई
बार
‘नया
प्रतीक’
में
छापा
भी
था।
पर
उनकी
पहली
मुलाक़ात
इलाहाबाद
के
हिंदी
साहित्य
सम्मेलन
के
हीरक
जयंती
समारोह
में
हुई।
राजेन्द्र
जी
लिखते
हैं
कि,
“फिर
तो
मैं
उनका
और
भी
स्नेह
भाजन
बनता
गया।
‘चौथा
सप्तक’(1979)
की
योजना
से
अवगत
कराते
हुए
उन्होंने
पत्र
लिखकर
मुझे
भी
एक
कवि
के
रूप
में
शामिल
करने
की
बात
लिखी।
उन्होंने
उसके
लिए
मुझे
एक
आत्मवक्तव्य
लिखकर
भेजने
को
भी
कहा।
कविताएं
उन्होंने
पहले
ही
चुन
ली
थीं,
वही
जो
उन्होंने
छापी
थीं
अपनी
पत्रिका
में।मेरा
आग्रह
था,उचित
यह
होगा
कि
मेरी
कुछ
दूसरी
नयी
कविताओं
को
भी
देख
लें
वात्स्यायन
जी,ताकि
चयन
में
थोड़ी
व्यापकता
रहे।
लेकिन
वात्स्यायन
जी
इस
मामले
में
बड़े
दृढ़
थे।
अपनी
योजनानुसार
ही
काम
करते
थे।
बहरहाल
मैंने
भी
वक्तव्य
नहीं
भेजा।
बस
यहीं
से
थोड़ी
खिन्नता
उनके
मन
में
व्याप
गई
होगी,
मेरे
मन
में
भी
।
वात्स्यायन
जी
का
वह
अंतिम
पत्र
था,
जो
आज
भी
मेरे
पास
सुरक्षित
है,जिसमें
उन्होंने
खिन्नता
व्यक्त
की
थी।आज
सोचता
हूं
तो
मेरा
मन
भी
भीग
जाता
है
कि
मैंने
उन्हें
शायद
आहत
किया
था।
लेकिन
फिर
यह
भी
कि
अच्छा
ही
हुआ
कि
बच
गया।
नहीं
तो
मैं
भी
‘थोथा
सप्तक’
का
एक
बेचारा
कवि
कहलाता।…
ऐसा
नहीं
है
कि
अज्ञेय
के
प्रति
मेरे
मन
में
एकदम
ही
भाव
बदल
गए
हों।लेकिन
जैसा
उनकी
भक्त
मंडली
का
आकलन
रहा
वह
मेरे
गले
कभी
नहीं
उतरता।
अज्ञेय
का
दुर्भाग्य
है,
उन्हें
भक्त
एक
से
बढ़कर
एक
मिले-
रामस्वरूप
चतुर्वेदी,
चंद्रकांत,
रामकमल
राय,
लेकिन
क़ायदे
का
आलोचक
उनको
एक
भी
नहीं
मिला।”14
इलाहाबाद
के
जिस
साहित्यिक
परिवेश
में
राजेंद्र
कुमार
उगे-खिले
उसके
निर्माण
में
भैरव
प्रसाद
गुप्त
का
नाम
युगान्तकारी
है।नामवर
जी
ने
कहा
था
कि,
“हिंदी
संपादकों
में
आचार्य
महावीर
प्रसाद
द्विवेदी
के
बाद
भैरव
प्रसाद
गुप्त
का
नाम
साहित्यिक
संपादकों
में
दूसरा
लिया
जा
सकता
है।…इसी
क्रम
में
कहानी
के
लिए
‘कहानी’(पत्रिका)
ने
वही
काम
किया
जो
‘सरस्वती’
और
‘हंस’
ने
किया।..
सच
पूछिए
तो
बिना
बहस
के
उन्होंने
यह
काम
किया
कि
जहां
साहित्य
के
केंद्र
में
कविता
थी
वहां
चुपके
से
बिना
हल्ला
मचाए
‘कहानी’
पत्रिका
के
आते
ही,
56-57 के आसपास, सहसा,
साहित्य
के
केंद्र
में
कहानी
को
ले
आए।
इसी
इलाहाबाद
में
‘परिमल’
और
वात्स्यायन
की
रहते
हुए।”15 उन्होंने जिस
पीढ़ी
को
तैयार
किया
उसमें
अमरकांत,
मार्कण्डेय
और
शेखर
जोशी
तो
थे
ही,उस
समय
के
युवा
कहानीकार
ज्ञानरंजन,
दूधनाथ
सिंह और रविंद्र
कालिया
का
उभार
और
लेखन
विशेष
रूप
से
महत्वपूर्ण
है।नामवर
सिंह
जैसे
कविता
के
आलोचक
से
भैरव
प्रसाद
गुप्त
ने
अपने
प्रताप
से
‘कहानी
नयी
कहानी’(1966)
लिखवाई।16 जिसे भले ही
नामवर
जी
ने
‘दुधमुॅंहा
प्रयास’
कहा
हो,
लेकिन
सबको
पता
है
कि
कथालोचना
के
क्षेत्र
में
यह
पुस्तक
मील
का
पत्थर
साबित
हुई।
राजेंद्र
कुमार
को
आलोचक
बनाने
में
भैरव
जी
का
बड़ा
योगदान
था।
1970 और
राजेन्द्र
कुमार
के
दौर
में
इलाहाबाद
जिन
लेखकों-कवियों
से
आबाद
और
जिंदाबाद
रहा,उनमें ज्ञानरंजन, दूधनाथ
सिंह,
रवीन्द्र
कालिया,ममता
कालिया,
सतीश
अग्रवाल,
सतीश
जमाली,
मंगलेश
डबराल,वीरेन
डंगवाल,
गंगा
प्रसाद
पाण्डेय,राजेन्द्र
कुमार,
सत्यप्रकाश
मिश्र,नीलाभ
और
नीलकांत
जैसे
उनकी
पीढ़ी
के
लेखक
थे।
पुरानी
पीढ़ी
के
भी
कई
लेखक
इस
दौर
में
सक्रिय
थे।
धर्मवीर
भारती,जगदीश
गुप्त,
लक्ष्मीकांत
वर्मा,
रामस्वरूप
चतुर्वेदी,
धीरेंद्र
वर्मा,
डॉ.
रघुवंश,
अमृतराय,
एहतेशाम
हुसैन,उपेन्द्र
नाथ
अश्क
तथा
अमरकांत
आदि।
यहां
तक
कि
पंत,
महादेवी,
बच्चन,
रामकुमार
वर्मा,इलाचंद्र
जोशी,और
फ़िराक़
साहब
तक
कि
वयोवृद्ध
पीढ़ी
भी
किसी
न
किसी
रूप
में
इलाहाबाद
से
जुड़ी
रही।इस
तरह
इस
ऐतिहासिक
और
सुदीर्घ
रिक्थ
के
हिस्से
थे
राजेंद्र
कुमार।धीरे-धीरे
कई
लोगों
ने
अपने-अपने
कारणों
से
शहर
बदले।
कईयों
की
उम्र
पूरा
हो
गई।
क्रमशः
शहर
खाली
होता
गया।
दूधनाथ
सिंह,नीलाभ
और
राजेंद्र
कुमार
अंत
तक
इलाहाबाद
में
रहे
और
सबसे
अंत
में
जीवन
से
विदा
लिया
राजेन्द्र
कुमार
ने।
16 जनवरी
2026 की
भोर
होने
से
पहले
राजेन्द्र
जी
ने
एक
लंबी
बीमारी
के
बाद
अपनी
आंखें
मूॅंदीं
लीं।
इसी
के
साथ
उस
साहित्यिक
शहर
इलाहाबाद
के
अंतिम
शहरी
का
जाना
एक
अपूर्णनीय
रिक्तता
छोड़
गया।मानो
उस
साहित्यिक
क़िले
की
आखिरी
दीवार
ढह
गई
हो!
राजेंद्र
जी
के
जाने
के
साथ
एक
युग
का
अवसान
हो
गया।
इलाहाबाद
थोड़ा
और
सूना
हो
गया।17 ज्ञानरंजन ने
पहले
कभी
कहा
था
कि
यह
शहर
अब
“मरी
हुई
आंख
की
पुतली
की
तरह
विजड़ित
और
विस्फारित
लगता
है।”18 राजेन्द्र कुमार
के
जाने
के
बाद
ज्ञानरंजन
की
बात
साक्षात
हुई
जाती
है।
राजेंद्र
कुमार
को
इलाहाबाद
ने
बड़े
मान
से
विदा
किया।आज
के
कुसमय
में
हिंदी
के
किसी
लेखक
की
अर्थी
को
उमड़े
हुए
शहर
की
ऐसी
संतप्त
विदाई
दुर्लभ
घटना
ही
है।12बी/1,बंद
रोड,एलनगंज
स्थिति
उनके
आवास
से
जब
उनकी
अर्थी
निकली
तो
उनके
प्रिय
लेखक
प्रेमचंद
की
अर्थी
की
तरह
किसी
ने
यह
नहीं
कहा
कि,
“मालूम
होता
है
कोई
मास्टर
मर
गया
है।”19 इस मामले में
राजेन्द्र
जी
प्रेमचंद
से
भाग्यशाली
निकले।
हिंदी
अकादमिया
में
पद,
पुरस्कार,
प्रसिद्धि
और
अमरता
के
लिए
लालायित
लोगों
को
दांव-पेंच
खेलते
देखकर
वे
अक्सर
कहा
करते
थे
कि
“इतना
क्या
परेशान
होना,इन
सब
चीजों
से
कोई
प्रेमचंद
और
गॉंधी
तो
नहीं
हो
जाएगा!”
प्रेमचंद
और
निराला
उनके
मानक
थे।
साहित्यिक
प्रतिमान
भी।
उनके
अंतिम
दर्शन
के
लिए
सैकड़ों
की
संख्या
में
विद्यार्थी,
शोधार्थी,
शिक्षक,नागरिक,
परिजन,
पड़ोसी,
उनकी
कविताओं
के
प्रशंसक,
कई
संस्थाओं
के
प्रमुख,प्रशासनिक
अधिकारी
और
मीडिया
कर्मी
मौजूद
थे।सबकी
आंखें
भरी
हुई
थीं।
कुछ
लोग
सुबक
रहे
थे,कुछ
फफक
कर
रो
पड़े
थे।
उन्होंने
अपना
देह
दान
मरने
से
10 साल
पहले
कर
दिया
था।
अतः
कमला
नेहरू
मेडिकल
कॉलेज
के
चिकित्सकों
ने
उनकी
ऑंखें
उन
लोगों
के
लिए
संरक्षित
कीं,जिन्हें
रोशनी
की
सख्त
आवश्यकता
थी।
इस
तरह
राजेंद्र
कुमार
जी
ने
जीते
जी
बहुतों
को
‘दृष्टि’
दी
और
मृत्यु
का
वरण
करने
के
बाद
भी
उन्होंने
दृष्टि
दी।
‘दृष्टिदान’
के
इस
प्रसंग
से
याद
आती
है
निराला
की
मृत्यु
के
पहले
के
किसी
साल
की
उनकी
पहली
इलाहाबाद
यात्रा,जो
उन्होंने
निराला
जी
के
दर्शनार्थ
रामानंद
दोषी
के
साथ
की
थी।
वे
बताते
थे
कि,
“निराला
जी
की
वह
छवि
मन
में
अब
तक
अंकित
है।
अस्वस्थ
लेकिन
सतेज।
हम
उसी
दिन
कानपुर
लौट
गये
थे।लौटकर
एक
कविता
लिखी
थी
‘निराला
का
दृष्टि-दान’।”
“जहाॅं-जहाॅं
हम
देख
सके
अपनी
ऑंखों
तुमको,
देखा,
तुम
हो
दिखलाते
वहाॅं-वहाॅं
दुख
की
दिपती
ऑंखें,
ऐंठीले
सुख
की-
जिन्हें
देख,छिपती
ऑंखें”
20
उनकी
निकलती
हुई
अर्थी
का
जिंदा
(Live) व मनोहारी वर्णन
उनके
प्रिय
छात्र
प्रो.कुमार
वीरेंद्र
ने
करते
हुए
लिखा
है
कि
- “ ‘चाहता
हूं
हम
सब
बेचैन
रहें’
जैसी
उनकी
सिग्नेचर
काव्य
पंक्तियां
लिखे
बैनर,
रचनारत
फोटो-फ्रेम
और
गेंदे
के
फूलों
से
बनी
माला
से
सुसज्जित
एंबुलेंस
से
मेडिकल
कॉलेज
के
लिए
जब
उनकी
अंतिम
यात्रा
शुरू
हुई
तो
‘राजेंद्र
कुमार
जिंदाबाद!’के
नारे
लगे।
मेडिकल
कॉलेज
में
एनाटॉमी
विभाग
के
अध्यक्ष,
अध्यापक,
चिकित्सक
और
विद्यार्थी
सफेद
एप्रन
पढ़ने
कतारबद्ध
थे।पहली
बार
देखा
गया
की
मेडिकल
कॉलेज
ने
किसी
को
इस
तरह
सम्मान
दिया।
मेडिकल
कॉलेज
के
विद्यार्थियों
ने
खुद
कंधा
दिया।
‘राजेंद्र
कुमार
अमर
रहें!’
के
नारे
लगे
और
उनके
पार्थिव
शरीर
को
प्रथम
तल
स्थित
हॉल
में
ले
गए।
वहां
सभी
ने
बारी-बारी
से
पुष्प
अर्पित
किए
और
अंतिम
प्रणाम
किया।
एनाटॉमी
विभाग
के
अध्यक्ष
ने
अपने
संबोधन
में
कहा
कि
राजेंद्र
कुमार
जी
ने
देहदान
कर
हमारे
ऊपर
उपकार
किया
है
।हम
उनके
प्रति
कृतज्ञता
प्रकट
करते
हैं।”21 फफक कर रोते
हुए
कुमार
वीरेंद्र
की
अगुवाई
में
सबने
उनकी
‘साबुत
दिल
के
वारिस’
कविता
का
समवेत
पाठ
किया;वह
दृश्य
मर्मांतक
था।अंतस्तल
को
चीरता
एक
विप्लव।
हृदयविदारक।
“हम
हों,
न
हों
साबुत
दिल
के
वारिस
हरदम
रहेंगे
दुनिया
में!”
(‘हर
कोशिश
है
एक
बगावत'
से)
राजेन्द्र
कुमार
की
छवि
हमारी
पीढ़ी
की
जेहन
में
साक्षात्
निराला
के
रूप
में
बिंबित
है।वे
न
तो
निराला
की
तरह
तगड़े
व
अक्खड़
थे।
न
तो
उनके
बाल
और
दाढ़ी
पर
निराला
की
राविन्द्रिक
शैली
का
असर
था
और
न
ही
उनके
कंठ
में
निराला
की
तरह
का
‘नव
जलद-मन्द्र
रव’
था।बस
उनका
सॉंवला
रंग
ही
निराला
से
मिलता
था।यद्यपि
आवाज
साफ़
और
तुन्द
थी;
लेकिन
थोड़ी
महीन।
निराला
और
पन्त
के
बीच
की
आवाज़।22 उनके
व्यक्तित्व
के
अनुरूप
ही
रौब-रहित
सारल्य
से
युक्त
व
विश्वास
पैदा
करती
हुई।
लेकिन
हम
लोग
फिर
भी
उन्हें
निराला
ही
मानकर
चलते
थे।
एक
तो
परास्नातक
में
वे
निराला
पढ़ाते-पढ़ाते
हमारे
लिए
निराला
हो
गये
थे,दूसरे
वे
निराले
थे
भी।एक
स्वाभाविक
मामूलीपन
के
भीतर
अपने
ज्ञान,स्वाभिमान
और
व्यवहार
की
असाधारणता
को
समेटे
हुए।
कोई
तड़क-भड़क
नहीं।वही
चिपकू
केश-विन्यास।
साधारण
फ्रेम
का
चश्मा।(वे
चश्मा
कम
पहनते
थे,
केवल
नज़दीक
के
अक्षर
वगैरह
पढ़ने
के
लिए।
किताबें
हैंड-लेंस
से
पढ़ते
थे।)
बहुत
ढ़ीला-ढाला
बैगी
शर्ट
और
कंफर्टेबल
पैंट
उनकी
प्रचलित
पोशाक
थी।
विशेष
अवसरों
पर
कुर्ता-पायजामा
भी
धारण
करते
थे।
लेकिन
उन्हें
रंग-बिरंगे
कपड़े
पहने
कभी
हमने
नहीं
देखा।
प्रायः
गोल
गले
का
कॉलर
विहीन
कुर्ता
वे
पहनते
थे।पर
वह
भी
सादा
ही।वही
क्रीम
कलर;
बहुत
हुआ
तो
कोई
लाइट
कॅलर
या
स्काई
ब्लू।
हम
लोग
(उनके
छात्र)
मज़ाक
करते
थे
कि
लगता
है
राजेंद्र
सर
ने
जब
से
प्रोफेसरी
शुरू
की
है
एक
ही
थान
से
कपड़ा
कटवा
कर
रहे
हैं।
जैसे
द्रौपदी
का
चीर
कृष्ण
अपनी
हथेलियों
से
बढ़ाते
जाते
थे,
वैसे
ही
उस
थान
का
कपड़ा
मानो
खत्म
ही
नहीं
हो
रहा
है
जिससे
सर
का
शर्ट
सिला
जाता
है।
कुछ
साथी
कहते
थे
कि
“थाह
लग
जाता
कि
‘बजजवा
कउन’
है,तो
‘साले’
की
दुकान
में
आग
रख
आते!”
उनका
व्यक्तित्व
किसी
को
डराता
नहीं
था,जैसे
कि
गुरुवर
सत्यप्रकाश
मिश्र
से
हम
लोग
थरथर
कांपते
थे।
लोकतांत्रिकता,सर्वसुलभता
और
संवादीपन
उनके
निरालेपन
के
ही
हिस्से
थे।वे
जिसको
बहुत
करीब
कर
लेते
थे,
उसके
साथ
‘साले’
वगैरह
की
गाली
भरे
संवाद
भी
करते
थे।हम
लोग
उस
श्रेणी
में
कभी
नहीं
पहुंच
पाए।
डॉ.एहसान
हसन
आदि
इस
श्रेणी
में
दर्जा
प्राप्त
कर
चुके
थे।
विश्वनाथ
त्रिपाठी
ने
एक
संस्मरण
में
लिखा
है
कि,
“वे
अपने
बारे
में
कम
बातें
करते
हैं
लेकिन
करते
हैं
तो
खुलकर।
पिछली
दफा
घर
आए
तो
बताया
कि
घर
से
कई
बार
बचपन
में
निकल
भागे
हैं।
एक
बार
लोगों
ने
समझ
लिया
कि
वह
गंगा
में
डूब
चुके
हैं।
..उनका
जीवन
ऐसे
कौतुकों
और
दुस्साहसों
से
भरा
होगा।
एक
बार
मैंने
प्रेम
के
बारे
में
पूछा,
कुछ
नहीं
बताया,थोड़ा
शरमा
कर
रह
गए।”23
राजेंद्र
जी
के
निरालेपन
के
बारे
में
प्रो.
प्रणय
कृष्ण
ने
लिखा
है
कि
“राजेंद्र
जी
के
जीवन
के
कई
रंग
ऐसे
हैं
जो
उन्हें
सिर्फ
औपचारिक
रूप
से
जानने
वालों
को
चकित
कर
सकते
हैं।हालांकि
हम
लोगों
को
भी
वे
समय-समय
पर
आश्चर्यचकित
कर
ही
देते
हैं।मुझे
कवि
अंशु
मालवीय
ने
बताया
है
कि
कैसे
कई
साल
पहले
होली
के
दिन
राजेंद्र
जी
ने
उनके
घर
की
छत
पर
सर
पर
तौलिया
या
चादर
डालकर
‘मैं
नीर
भरी
दुःख
की
बदली’
पर
डांस
किया
था।
अमित
सिंह
परमार
अनौपचारिक
गोष्ठियों
में
बुंदेलखंडी
में
तरह-तरह
की
हास्य-वार्ता
प्रस्तुत
करते
हैं।
ऐसे
ही
एक
मौके
पर
राजेंद्र
जी
भी
उपस्थित
थे।
वे
अमित
की
वार्ता
के
बीच-बीच
में
बाई
हथेली
पर
दायीं
के
पिछले
हिस्से
से
ताल
देकर
‘हां’
कहते
थे
और
उनका
यह
ताल
देना
वार्ता
को
और
रोचक
बनाए
दे
रहा
था।
एक
बार
इन्होंने
नाटक
में
अभिनय
भी
किया।
भोपाल
त्रासदी
पर
डॉ.
लालबहादुर
वर्मा
ने
एक
नाटक
लिखा
है
‘एक
दिन
जिंदगी
ने
कहा’।
नाटक
की
स्क्रिप्ट
राजेंद्र
जी
को
दी
गई
कि
वे
अपने
लायक
भूमिका
चुन
लें।राजेंद्र
जी
ने
‘दलाल
नेता’
की
भूमिका
की
चुनी।”24
दलाल
नेता
वाली
इस
भूमिका
के
बारे
में
हमारी
कक्षा
में
‘अरस्तू
की
त्रासदी’
पढ़ाते
हुए
एकबार
उन्होंने
अभिनय
की
बारीकी
को
समझाने
के
क्रम
में
बताया
था
कि
किसी
के
घर
मिलने
गया
दलाल
नेता
घर
के
मालिक
की
नज़र
बचाकर
प्लेट
में
रखी
मिठाई
खास
ललचाती
भंगिमा
के
साथ
चुरा
लेता
है;
जबकि
यह
स्क्रिप्ट
में
नहीं
था।
उन्होंने
अपनी
प्रत्युत्पन्नमति
से
दलाल
नेता
के
कैरेक्टर
को
और
गाढ़े
रंगों
में
उभार
दिया
था;जिसकी
बाद
में
सबने
बहुत
तारीफ़
की
थी।
आत्मविज्ञापन
और
आत्म-प्रकाशन
से
वे
इतने
दूर
थे
कि
उन्होंने
अपनी
पत्रिका
‘अभिप्राय’
के
26 अंकों
में
एक
भी
पैसे
का
विज्ञापन
किसी
भी
अंक
में
नहीं
छापा।इस
तरह
वे
विज्ञापन
मात्र
की
संस्कृति
से
खासी
दूरी
बरतते
रहे।
उनकी
इसी
संकोची
प्रवृत्ति
का
ही
परिणाम
है
कि
1978ई. में उनका
पहला
कविता
संग्रह
आने
के
लगभग
35 वर्ष
बाद
दूसरा
काव्य-संग्रह
‘हर
कोशिश
है
एक
बग़ावत’
अंतिका
प्रकाशन
से
कवि
शैलेय
के
संपादन
में
2013ई.में आया।
शैलेय
जी
ने
जिद
नहीं
की
होती
तो
शायद
वह
और
देर
स्थगित
रहता।
कदाचित
इसीलिए
रचना-काल
की
दृष्टि
से
इस
संग्रह
की
कविताएं
वर्ष
1963 से
2011 तक विस्तृत हैं।शैलेय
ने
संग्रह
के
संपादकीय
में
लिखा
है
कि
“आत्मप्रकाशन
की
हड़बड़ी
के
इस
दौर
में
ऐसा
आत्म-संकोच
मुझ
जैसों
के
लिए
एक
विरल
अनुभव
है।”25
राजेंद्र
जी
स्कूटर
तो
छोड़िए
साइकिल
भी
चलाना
नहीं
जानते
थे।वे
कहते
थे
कि,
“अपनी
तो
बस
11 नंबर
की
बस
थी।यानी
पैदल
ही
चलता।पैदल
चलते
देखकर
परिचित
मित्र
मुझे
सिर
से
मार्क्सवादी,पैर
से
गॉंधीवादी
कहते।”
हमने
उन्हें
हमेशा
पैदल
ही
एलनगंज
से
यूनिवर्सिटी
जाते
हुए
देखा
था।बाद
में
अपने
अभिन्न
शिष्य
डॉ.अंशुमान
कुशवाहा
की
मोपेट
पर
बैठकर
सभा-गोष्ठियों
में
जाते
देखा।सन्
2000 के
बाद
आखिरी
सॉंस
तक
अंशुमान
जी
उनके
साथ
थे।
एकबार
अंशुमान
जी
के
कहने
पर
मैं
स्वरूपरानी
अस्पताल
रक्तदान
करने
पहुंच
गया;(तब
मैं
सर
के
अण्डर
डी०फिल्०
में
नया-नया
आया
था)
जहां
माता
जी(राजेंद्र
सर
की
पत्नी
श्रीमती
शशि
जी)
भर्ती
थीं।वे
अक्सर
बीमार
रहतीं
थीं।
उन्हें
लिवरसिरोसिस
जैसी
असाध्य
बीमारी
थी।इस
बीमारी
में
प्रायः
रक्त
अल्पता
हो
जाती
है।
तो
उन्हें
खून
चढ़ना
था।
हमने
रक्तदान
किया।
यद्यपि
अंशुमान
जी
ने
हमें
आगाह
किया
था
कि
सर
को
पता
न
चले
कि
तुम
लोगों
ने
खून
दिया
है।
नहीं
तो
मुझे
बड़ी
डॉंट
पड़ेगी।
मैं
और
मेरे
एक
साथी
ने
यह
सोचा
कि
जब
अस्पताल
आए
ही
हैं
तो
चलकर
माता
जी
को
देख
भी
लिया
जाए।
सर
को
बता
देंगे
कि
हम
लोग
कहीं
से
पता
चल
जाने
पर
माता
जी
की
हाल-चाल
लेने
आए
हैं।
जब
हम
लोग
उस
कमरे
में
पहुंचे
जहां
माता
जी
भर्ती
थीं,तो
वहां
ऋचा
भाभी(सर
के
बड़े
बेटे
प्रियम
जी
की
पत्नी)
अकेले
थीं,और
संकेत
करते
हुए
बताया
कि
“पापा
बाथरूम
में
मम्मी
जी
का
कपड़ा
चेंज
कर
रहे
हैं।”
मैं
ठहरा
गॅंवईं
ठेठ।
पुरुषों
की
मर्दानी
ठसक
ही
हमने
देखी
थी।अचरज
में
पड़
गया।मेरा
सोचना
था
कि
यह
तो
बहू
का
कर्तव्य
है।और
फिर
स्त्री
का
कपड़ा
स्त्री
पहनाएं!
मर्द
यह
काम
कैसे
कर
सकता
है।यह
उसकी
शान
और
कौशल
दोनों
के
विरूद्ध
है।
फिर
मैंने
भाभी
से
पूछा,
“आपके
रहते
सर
क्यों?”
भाभी
ने
सहज
भाव
से
उत्तर
दिया,
“मम्मी
का
कोई
काम
वे
खुद
करते
हैं,किसी
को
करने
नहीं
देते।”
तब
तक
सर
माता
जी
को
लेकर
निकल
आए
और
बोला
कि
बेटा
पत्नी
मेरी
हैं,तो
कपड़े
बहू
या
दूसरा
कोई
क्यों
बदलेगा!
वह
मुझे
ही
करना
चाहिए।”
पत्नी
को
अपनी
संपत्ति
और
सेविका(जो
मां
और
चाचियों
को
सहज
स्वीकार
भी
था)
समझते
पुरूषों
के
बीच
पलकर
बड़ा
हुआ
मैं
पहली
बार पति-धर्म
के
बारे
में
जान
पाया
और
मन
ही
मन
इस
रास्ते
चलने
का
संकल्प
लिया।
प्रणय
कृष्ण
जी
ने
उनके
जोड़े
को
दुनिया
का
सबसे
खूबसूरत
जोड़ा
कहा
है।अनमोल
संबंध।ऐसा
अनमोल
संबंध,ऐसा
प्रीतिकर
दाम्पत्य
जिसके
दम
पर
लिवर
सिरोसिस
के
साथ
दो
दशकों
से
भी
अधिक
माता
जी
किसी
‘मेडिकल
मिरैकल’
की
तरह
स्वस्थ
रह
सकीं।जिस
कोविड
महामारी
ने
उन्हें
हमसे
छीना,उसमें
भी
राजेंद्र
सर
बेली
जिला
अस्पताल,प्रयागराज
में
माता
जी
के
साथ
भर्ती
हुए
थे।
दोनों
को
कोरोना
इंफेक्शन
हो
गया
था।उस
हाहाकार
के
समय
अगल-बगल
के
विस्तारों
पर
पड़े
ये
दोनों
एक-दूसरे
के
स्वास्थ्य
की
शुभकामनाएं
कर
रहे
थे।
लेकिन
माता
जी
को
बचाया
नहीं
जा
सका।
राजेंद्र
सर
शेर
दिल
आदमी
थे।
पत्नी
को
दम
तोड़ते
देखने
के
बाद
भी
ठीक
होकर
वापस
लौटे।इस
शेर
दिल
आदमी
ने
अपने
पहले
संग्रह
'ॠण गुणा ऋण'
में
लिखा
था-
“यह
बात
नहीं
कि
मैं
जीवन
से
ऊब
गया
हूं
बात
यह
है
कि
मैं
जीवन
में
इतना
डूब
गया
हूॅं
कि
मौत
मुझे
सतह
पर
नहीं
पा
सकती।”
(‘स्पष्टीकरण’
कविता
से)
इसी महामारी
की
दिल
तोड़
देने
वाली
विपदा
के
खिलाफ
उनका
अंतिम
कविता-संग्रह
‘उदासी
का
ध्रुपद’(2023)आया,
जिसको
विश्वनाथ
त्रिपाठी
ने
‘दिवंगता
पत्नी
की
स्मृति-विह्वलता
के
आंतरिक
चित्र-खण्ड’
कहा
है;
विशेषकर
इस
संग्रह
की
कविता-श्रृंखला
‘न
होने
में
होना’
के
संदर्भ
में।
“तुम
मुझसे
दूर
हो
अलंघ्य
अनंत
दूरी-
न
जाने
कितने
प्रकाशवर्षों
की
मैं
तुम्हारे
एकदम
पास
हूॅं
इतने
पास
कि
तुम
दिखती
ही
नहीं:
नहीं-सी
दिखती
हो
कैसे
पूछूॅं
तुमसे
क्या
तुम्हें
मैं
दिखता
हूॅं?”2
राजेंद्र
जी
के
निरालेपन
में
एक
खास
बात
यह
भी
थी
कि
वे
अन्य
लोगों
के
सारे
तिकड़मों
और
चालाकियों
को
समझते
हुए
भी
चुपचाप
सह
लेते
थे।वे
अपनी
लड़ाई
खुद
लड़ने
में
विश्वास
करते
थे,उसमें
किसी
दूसरे
को
तकलीफ़
देना
उन्हें
गॅंवारा
नहीं
था।इस
‘सह
लेने’
में
उनकी
कमजोरी
नहीं,उनका
बड़प्पन
ही
कारण
होता।एक
बार
किसी
अकादमिक
जुटान
में
रुकने-ठहरने
और
दूसरी
हास्पिटैलिटीज
को
लेकर
गुरुवर
श्रीप्रकाश
शुक्ल
(जिनके
अण्डर
मैंने
अपनी
पी-एच०डी०
पूरी
की)
ने
आयोजकों
को
खरी-खोटी
सुना
दी
और
उपलब्ध
कराई
गई
स्तरहीन
सुविधाओं
में
रहने
से
मना
कर
दिया।उस
कार्यक्रम
में
राजेंद्र
कुमार
भी
अतिथि
के
रूप
में
गये
हुए
थे।यह
सर्वविदित
है
कि
श्रीप्रकाश
शुक्ल
राजेंद्र
जी
के
छात्र
रहे
हैं।
लेकिन
अव्यवस्था
वगैरह
उनको
असह्य
है।
वे
अपने
लेखक
होने
का
नामवर
आदि
की
तरह
एक
औरा
समझने
के
हामी
हैं।
राजेंद्र
जी
ठहरे
सहज
आदमी।
पुराने
भी।
ऐसी
स्थितियों
को
सह
लेने
को
हेठी
की
जगह
बड़प्पन
समझते
थे।इसी
कहा-सुनी
में
श्रीप्रकाश
जी
से
संभवतः
ऐसा
कुछ
कहा
गया
कि
मेरे
दोनों
गुरुओं
के
बीच
थोड़ी
खटास
पैदा
हो
गई।
जिसकी
अभिव्यक्ति
शुक्ल
जी
ने
कई
बार
मुझसे
व्यक्तिगत
रूप
से
की।
जिसकी
ध्वनि
यह
रहती
कि
सीनियर
लोग
हैं,फिर
भी
अपने
स्तर
का
ध्यान
नहीं
रखते,जिसकी
वजह
से
हम
नये
लेखकों
को
संघर्ष
करना
पड़ता
है।
एक
बार
मिलने
पर
मैंने
श्रीप्रकाश
शुक्ल
की
नाराज़गी
का
जिक्र
राजेंद्र
जी
से
इस
गरज
से
कर
दिया
कि
दोनों
के
बीच
का
‘डैश’
खत्म
हो!
क्योंकी
मेरे
लिए
भी
यही
सहज
स्थिति
होती।
सुनकर
राजेंद्र
जी
मुस्कराए।और
‘विनयपत्रिका’
की
ये
पंक्तियां
पढ़ने
लगे:
“तुलसी ज्यों
पात
माथ
चढ्यौ
जल
नीचो
बोरत
न
वारि
ताहि
जानि
आप
सींचो।”
फिर
बोले,
“जैसे
हल्के
व्यक्तित्व
वाला
सूखा
पत्ता
जलधार
के
सिर
पर
चढ़कर
इतराता
है।
लेकिन
वह
नदी
की
जलधार
यह
समझकर
ही
पत्ते
को
नहीं
डुबोती
(बोरत)
कि
यह
पत्ता
मेरे
किनारे
पर
खड़े
उस
पेड़
का
है,जिसे
सींचकर
मैंने
ही
बड़ा
किया
था।
जिसे
सींचकर
बड़ा
किया
हो,उसको
क्या
डुबोना?”
उन्होंने
बताया
कि
मुझे
उस
समय
थोड़ा
बुरा
लगा
था,लेकिन
वह
सब
मैं
उसी
समय
भूल
गया।
उनके
प्रति
मेरे
मन
में
वही
पुरानी
छात्र
वत्सलता
है।
प्राध्यापक
के
तौर
पर
मेरे
बीएचयू
आ
जाने
के
बाद
गुरुवर
श्रीप्रकाश
शुक्ल
के
भीतर
से
भी
वह
परिस्थितिजन्य
‘डैश’
कब
डह
गया,न
उन्हें
पता
चला
न
हमें
पता
चला।
तो
इस
तरह
के
निराले
व्यक्ति
थे
राजेंद्र
कुमार।एक
कंठ
विषपायी।
राजेंद्र
जी
खुद
को
मूलतः
कवि
ही
क्लेम
करते
थे।
आपातकाल
के
आसपास
उभरी
हिंदी
कवियों
की
पीढ़ी
के
वे
सशक्त
कवि
थे।मंगलेश
डबराल,वीरेन
डंगवाल,राजेश
जोशी,
हरीशचंद्र
पाण्डेय
आदि
उनकी
पीढ़ी
के
महत्वपूर्ण
कवि
हैं।
हालांकि
उनको
ख्याति
सबसे
अधिक
अध्यापक
और
आलोचक
के
रूप
में
मिली।
उन्होंने
कहानियां
भी
लिखीं।
अभिप्राय
और
बहुवचन
जैसी
पत्रिकाओं
का
संपादन
भी
किया।
संगठनों
में
काम
किया।
संगठन
बनाए
भी।
प्रगतिशील
लेखक
संघ
और
जन
संस्कृति
मंच
में
सक्रिय
रहे।जसम
के
तो
लंबे
समय
तक
अध्यक्ष
भी
रहे।
एक
पब्लिक
स्पीकर
के
रूप
में
उनकी
जरूरत
मानवाधिकार
संगठनों,
वामपंथी
सांस्कृतिक
-राजनीतिक
संगठनों
तथा
अकादमिक
मंचों
से
लेकर
आत्मीय
घरेलू
गोष्ठियों
में
लगातार
बनी
रहती।
उन्होंने
लिखा
है
कि
“श्रीपत
जी
और
वात्स्यायन
जी
ने
ही
मुझे
आलोचनात्मक
लेखन
की
ओर
प्रवृत्त
किया।बाद
में
इस
सूची
में
भैरव
जी
और
मार्कण्डेय
जी
का
नाम
भी
आ
जुड़ा।
वैसे
साहित्य
का
अध्यापक
होने
के
नाते
भी
आलोचना-कर्म
से
बचना
कहां
संभव
था।यह
भी
कह
सकता
हूं
कि
मेरा
आलोचना
कर्म
एक
तरह
से
मेरे
अध्यापन
कर्म
का
बाई-प्रोडक्ट
रहा।”27 वे अध्यापन कर्म
को
भी
सृजनात्मक
काम
ही
मानते
थे।
उनके
अध्यापक
पर
इलाहाबाद
केन्द्रित
वीरेन
डंगवाल
की
सुप्रसिद्ध
कविता
‘ऊधौ
ब्रज
मोहिं’
की
ये
पंक्तियां
खूब
बैठती
हैं:
“ वो जोश
भरे
नारे
वह
गुत्थमगुत्था
बहसों
की
वे अध्यापक
कितने
उदात्त
और
वत्सल
वह कहवाघर
जिसकी खुशबू
बेचैन
बुलाया
करती
थी
हम कंगालों
को”
कवि
राजेंद्र
कुमार
को
पहली
‘कविशिक्षा’
(इस्लाह)
ननिहाल
इटावा
में
उनकी
विंध्यवासिनी
मौसी
ने
दी।स्कूल
की
प्रार्थना
की
दूसरी
पंक्ति
बदलकर।
‘हे
प्रभु
आनंद
दाता
ज्ञान
हमको
दीजिए/शीघ्र
सारे
दुर्गुणों
को
दूर
हमसे
कीजिए’-
यह
थी
प्रार्थना।
मौसी
ने
कहा,
“हाय
लला,
तुममैं
ऐसो
कोउ
दुरगुन
तो
होय
नॉंय
सकत,जाके
लाने
तुमैं
ऐसी
प्रारथना
करै
को
पड़ो।
तुम
जा
प्रारथना
ऐसी
करी
करौ-
‘शीघ्र
सारे
सदगुनन
को
पास
हमसे
कीजिए’।”
कविता
का
प्रारंभिक
संस्कार
उन्हें
अपने
पितामह
से
मिला।पितामह
की
आंखें
जा
चुकी
थीं।
उनके
हुक्के
की
चिलम
बालक
राजेंद्र
कुमार
भरते!
हुक्के
की
कश
के
साथ
बाबा
की
स्मृति
और
कंठ
में
मीर,
ग़ालिब,
हाफिज,सादी,
फिरदौसी
और
तुलसीदास
फूटने
लगते।
राजेंद्र
कुमार
बताते
थे
कि
“कविता
का
संस्कार
मुझे
इन
दो
बाबाओं
से
मिला।
एक
मेरे
बाबा।
दूसरे
तुलसी
बाबा।
मेरे
बाबा
ने
मुझे
फारसी,हिंदी,उर्दू
की
पता
नहीं
कितनी
काव्य
पंक्तियां
तोते
की
तरह
रटवा
दी
थीं
और
वह
रामचरितमानस
वाले
बाबा
ने
तो
मेरे
सामने
मानो
हिंदी
की
शब्द
संपदा
ही
खोल
कर
रख
दी।
उन
पर
आज
भी
बहुत
रीझता
हूं।
यह
बात
अलग
है
कि
उन
पर
खींझता
भी
कम
नहीं
हूं।”
यह
दिलचस्प
है
की
राजेंद्र
कुमार
अपनी
कक्षाओं
में
पढ़ते
हुए
अक्सर
कहा
करते
थे
कि
“तुलसीदास
जितने
बड़े
कवि
हैं
उतने
ही
खतरनाक
कवि
भी।”
इलाहाबाद
के
ही
उनके
समकालीन
लेखक
दूधनाथ
सिंह
तो
अमर
उजाला
में
मनोज
मिश्र
को
दिए
गए
अपने
एक
इंटरव्यू
में
यहां
तक
कह
दिया
था
कि
“सच
तो
यह
है
कि
अगर
रामचरितमानस
नहीं
होता
तो
बाबरी
मस्जिद
जैसा
हादसा
भी
नहीं
होता।
रामचरितमानस
हमारे
उत्तर
भारतीय
हिंदी
समाज
के
मानसिक
पिछड़ेपन
के
लिए
जिम्मेदार
है।”28 दोनों का तर्क
वही
है
जो
‘कामायनी’
के
बारे
में
मुक्तिबोध
ने
दिया
था।
महान
रचना-विधान
में
छुपकर
जन-विरोधी
व
रूढ़िवादी
विचारों
के
अधिक
संप्रेषित
हो
जाने
का
खतरा
होता
ही
है।रचना
कमजोर
हो,तो
खतरा
उतना
नहीं
होता।पर
रचना
अगर
रामचरितमानस
और
कामायनी
की
तरह
सशक्त
हो
तो
उनमें
संसक्त
प्रतिगामिता
का
संक्रमण
बहुत
तेज
हो
जाता
है।
उनके
अनुभव
और
बनती
हुई
रचनात्मक
चेतना
में
घर
के
बिल्कुल
पास
कानपुर
के
परेड
ग्राउंड
और
फूलबाग
मैदान
की
राजनीतिक
सरगर्मियां
और
नेताओं
की
सभाओं
तथा
म्योर
मिल
के
गेट
पर
होने
वाले
मजदूरों
के
जमावड़ो,
हड़तालों
और
जोशीले
भाषणों
ने
सांस्कृतिक
अभिक्रिया
करना
शुरू
किया।
उनकी
‘बदलू
मिस्त्री’(
कविता)
और
‘अनंतर’
जैसी
कहानी
उन्हीं
दिनों
लिखी
गई।
उन्हीं
दिनों
कानपुर
के
वरिष्ठ
लेखकों
शील
जी
और
सुदर्शन
चक्र
जी
की
संगत
में
आकर
राजेंद्र
कुमार
कामरेड
सुल्तान
नियाजी
के
घर
आने
जाने
लगे,जहां
कम्युनिस्ट
पार्टी
और
मजदूर
संगठनों
की
बैठकें
होती
थीं।
वहीं
से
आपका
सीपीआई
और
प्रगतिशील
लेखक
संघ
से
जुड़ाव
होता
चला
गया।
लेकिन
उन्होंने
विचारधारा
और
अनुभव
में
हमेशा
अनुभव
को
ऊपर
रखा।
उन्होंने
अपनी
पत्रिका
‘अभिप्राय'
के
प्रवेशांक
में
लिखा
है
कि,
“विचारधारा
जब
अनुभव
से
एकात्म
होकर
उभरेगी
तभी
वह
एक
जीवंत
समाज
की
प्रेरणा
बनेगी।”29 विचारधारा
के
शख्त
सीखचों
में
वे
जकड़ने
वाले
यांत्रिक
मार्क्सवादी
कभी
नहीं
रहे।
इसीलिए
गांधीवाद
के
प्रति
उनका
बहुत
गहरा
झुकाव
था।
लोहियावादी
परिमलियों
से
इतने
घनिष्ठ
संबंध
थे
कि
मैंने
कहीं
लिखा
पढ़ा
था
कि
राजेंद्र
कुमार
लोहियावाद
की
तरफ
झुके
हुए
मार्क्सवादी
थे।
बाद
के
दिनों
में
गांधी
के
प्रति
उनका
भरोसा
बहुत
मुखर
हो
चला
था।वे
‘सृजन
सरोकार’
पत्रिका
के
गांधी
विशेषांक
के
अतिथि
संपादक
भी
रहे।वे
हमेशा
वैचारिक
कठमुल्लापन
से
मुक्त
रहे।
इलाहाबाद
भाषाओं
और
तहज़ीब
का
पुराना
संगम
रहा
है।
राजेंद्र
जी
हिंदी
और
उर्दू
के
बीच
एक
पुल
थे।
इलाहाबाद
शहर
की
यह
साहित्यिक
रवायत
रही
है
कि
हिंदी
के
तमाम
साहित्यकार
उर्दू
में
गहरी
पकड़
रखते
थे,जैसे-
उपेंद्रनाथ
अश्क,अमृतराय,
बलवंत
सिंह,
शमशेर
बहादुर
सिंह,
रामकुमार
वर्मा,
दूधनाथ
सिंह
और
राजेंद्र
कुमार।
राजेंद्र
जी
इस
परंपरा
की
आखिरी
कड़ी
थे।
उन्होंने
उर्दू
में
गजलें
भी
खूब
कहीं
हैं।एक
बार
गुवाहाटी
में
मीर
तकी
मीर
पर
हो
रहे
सेमिनार
में
उन्होंने
इतनी
खालिस
उर्दू
में
तकरीर
की
कि
उर्दू
वाले
भी
हैरान
रह
गए।
वह
मीर,
ग़ालिब,
फ़िराक़,
फ़ैज़,
मंटो
और
प्रेमचंद
पर
साधिकार
बात
कर
सकते
थे।राजेंद्र
जी
की
श्रद्धांजलि
सभा
की
अध्यक्षता
करते
हुए
अली
अहमद
फातमी
साहब
ने
बताया
था
कि
“राजेंद्र
कुमार
उर्दू
के
कल्चर
और
ज़ुबान
से
गहरे
वाक़िफ
थे।
वे
पहले
अक़ील
रिज़वी
साहब
और
शम्सुर्रहमान
फारुकी
जी
से
उर्दू
के
शब्दों
के
अर्थ
पूछा
करते
थे।उनके
ना
रहने
पर
उन्होंने
यह
काम
मुझसे
लिया।
उन्होंने
एकबार
फ़ोन
करके
मुझसे
‘इंसान’
और
‘आदमी’
तथा
‘घर’
और
‘मकान’
का
फ़र्क
पूछा
था।”30 राजेंद्र जी
घर
जाने
पर
कई
बार
अपनी
ग़ज़लों
के
शे’र
बड़ी
तरंग
से
सुनाते
थे।उनका
एक
ऐसा
ही
शे’र
याद
रह
गया
है:
क्या
जाने
मौत
ए
मुंतज़िर
भी
कम
हसीं
न
हो
तैयार
हो
ले
तू
भी
जरा बन संवर
ले
यार।
उनके
साहित्यिक
निर्माण
में
जिन
दो
बड़े
साहित्यकारों
का
बहुत
महत्वपूर्ण
योगदान
है
उनमें
कानपुर
में
देवीशंकर
अवस्थी
और
इलाहाबाद
में
अमृतराय
प्रमुख
थे।
देवीशंकर
अवस्थी
से
उनकी
निकटता
तब
हुई
जब
वह
बीएससी
करने
डीएवी
कॉलेज
कानपुर
गए।
अवस्थी
जी
वहीं
हिंदी
विभाग
में
अध्यक्ष
थे।एक
कविता
लिखने
वाले
युवा
के
रूप
में
मित्रों
ने
उन्हें
अवस्थी
जी
से
मिलवाया
था;जो
शीघ्र
ही
प्रगाढ़ता
में
बदल
गया।
राजेंद्र
जी
ने
तो
यहां
तक
लिखा
है
कि
“मैं
अपनी
साहित्यिक
समझ
और
काव्य
दीक्षा
में
उनके
योग
को
भूल
नहीं
सकता।”
बाद
में
राजेंद्र
जी
ने
‘आलोचना
का
विवेक’
शीर्षक
से
देवीशंकर
अवस्थी
पर
केंद्रित
किताब
भी
लिखी।
इलाहाबाद
में
अमृतराय
के
घर
ही
उर्दू
के
प्रसिद्ध
लेखक
आलोचक
व
उन
दिनों
इलाहाबाद
यूनिवर्सिटी
में
उर्दू
विभाग
के
अध्यक्ष
और
कला
संकाय
के
डीन
एहतेशाम
हुसैन
साहब
से
उनकी
मुलाकात
हुयी।
एहतेशाम
हुसैन
साहब
तरक्कीपसंद
तहरीक
के
प्रतिष्ठित
व्यक्तियों
में
थे।
उन्हीं
की
प्रेरणा
और
आदेश
पर
राजेंद्र
कुमार
ने
एम०ए०
हिंदी
में
दाखिला
लिया।1970 में उन्होंने इलाहाबाद
यूनिवर्सिटी
में
प्रथम
श्रेणी
में
एम.ए.
किया
और
तभी
वे
इलाहाबाद
यूनिवर्सिटी
से
संबद्ध
कॉलेज
सीएमपी
डिग्री
कॉलेज
में
हिंदी
के
प्राध्यापक
नियुक्त
हुए।बाद
में
1979 में
हिंदी
विभाग
इलाहाबाद
यूनिवर्सिटी
में
अध्यापक
बनकर
आए
और
2000 से
2002 तक
हिंदी
विभाग
के
अध्यक्ष
भी
रहे।
24 जुलाई 1943ई.
को
कानपुर
में
जन्मे
राजेंद्र
कुमार
ने
16 जनवरी
2026 को
लगभग
83 साल
की
उम्र
में
प्रयागराज
में
अपनी
अंतिम
सांसें
लीं।
गीतकार
यश
मालवीय
ने
अपनी
शोक
संवेदना
में
लिखा
था
कि
“राजेंद्र
कुमार
अजातशत्रु
थे।
वह
जितने
बड़े
लेखक
थे,उतने
ही
बड़े
मनुष्य
भी
थे।वह
हिंदी
के
अनन्य
सिपाही
थे।
उन्हें
साहित्य
का
ऐक्टिविस्ट
भी
कहा
जा
सकता
है।”
उनकी
स्मृति
में
अपनी
तरफ
से
मैं
सिर्फ
इतना
ही
कह
सकता
हूं
कि
“मैं
उन
पूरे
गुरु
का
अधूरा
शिष्य
ही
रहा।अपनी
पी-एच०डी०
भी
आपके
साथ
पूरी
न
कर
सका।
आप
ही
के
शब्द
लेकर
कहूं
कि
“क्या
यह
मुमकिन
है,दिल
में
आप
हों
औ’
दर्द
न
हो?”
वामिक
जौनपुरी
साहब
का
शे’र
याद
आ
रहा
है
-
“थे
पास
जब
तो
क़यामत
का
लुत्फ़
आता
था
हुए
जो
दूर
तो
यादों
का
हश्र
बरपा
है।”
“ उनका अलंकरण
मुश्किल
है।
उनके
बारे
में
अतिशयोक्ति संभव
नहीं।
ध्यान
से
देखें
तो
उन्होंने अपने
जीवन
और
अपनी
रचना
में
कुछ भी
अतिरिक्त,
कुछ
भी
‘सरप्लस’
बचा
कर रखा
नहीं
है।…सामाजिक
सक्रियताओं,
लेखकीय प्रतिबद्धताओं,अध्यापकीय
और
पारिवारिक जिम्मेदारियों
के
दरम्यान
उनका
सारा अर्जन
मानो
खुशबू
की
तरह
बिखर
गया
है,
उसे वापस
खींचकर,
इकट्ठा
कर
‘मेजर’
करने
की
सुविधा किसी
को
नहीं
है।”31
संदर्भ :
3.’लघुमानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ में साही
जी ने इस पद का प्रयोग किया है;जो उनकी पुस्तक
‘छठवां दशक’ में अंतिम निबंध के रूप में संकलित हैं।
4.साही की पुस्तक ‘छठवां दशक’ का संपादन बहुत बाद में
1987 में उनकी पत्नी कंचनलता साही जी ने किया और
हिंदुस्तानी एकेडमी,प्रयागराज से यह पुस्तक छपी; लेकिन
ये सारे निबंध 1950 से 1964 के बीच लिखे गए हैं।
5. ‘इतिहास और आलोचना’ प्रकाशित तो हुई 1957ई.में
लेकिन इसमें संकलित नामवर सिंह के सारे निबंध
1952-1956 के बीच के हैं।केवल आख़िरी दो निबंध
1961ई. के हैं।
6. विज्ञप्ति, इतिहास और आलोचना,नामवर सिंह, राजकमल
प्रकाशन,दिल्ली,1978(तीसरा संस्करण)
7. इन लेखों के बारे में, छठवां दशक,साही, हिंदुस्तानी
एकेडमी, प्रयागराज,2007(दूसरा संस्करण)
8. तद्भव,48,जनवरी 2024 में ‘प्रश्नों की नोंक पर सधी
प्रतिभा’ शीर्षक से साही जी पर राजेंद्र जी ने लिखा है।
तद्भव,44, जनवरी 2022, में ‘लक्ष्मीकांत वर्मा:नयी
कविता संबंधी बहसों के लांच पैड’ शीर्षक से राजेंद्र कुमार
ने लिखा है;जिनमें प्रगतिशीलों और परिमलियों
(कलावादियों) के बीच के उस दौर की जबर्दस्त बहसों को
समेटे हुए है।
9. शब्द घड़ी में समय, राजेंद्र कुमार, साहित्य भंडार प्रकाशन,
समापन भाषण देते हुए नामवर सिंह ने पंत और महादेवी
की तुलना के क्रम में यह टिप्पणी कर दी कि, “पंत जी का
जितना अच्छा है,तीन चौथाई कूड़ा है।”
(स्रोत:नामवर की धरती, श्रीप्रकाश शुक्ल,आधार
प्रकाशन, हरियाणा,2007, पृष्ठ-116)
परिप्रेक्ष्य;भारत भारद्वाज (संपादक)नयी किताब
प्रकाशन, दिल्ली 2021,पृष्ठ-232
श्री गंगा प्रसाद पाण्डेय और श्री प्रभात शास्त्री के आपत्ति
करने पर उन्होंने (साही जी ने)अपने वाक्य का अंतिम
अंश वापस ले लिया था।
14. ‘लेखक होना, यानी बिगड़ना आदमी का’, राजेंद्र कुमार
प्रयाग पथ, पूर्णांक-7,अक्टूबर 2019, पृष्ठ-1
-07/04/1996 को जलेस और एस.एफ.आई. द्वारा
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ भवन में आयोजित
स्मृति सभा में नामवर सिंह द्वारा दिया गया भाषण
(स्रोत:कथा पत्रिका,अंक-8, मार्च 1997,प्रस्तोता- सुधीर
कुमार सिंह)
16. वहीं
17.सूर्यनारायण सिंह (राजेंद्र कुमार की स्मृति में प्रकाशित
पुस्तिका ‘लघुता में आकाश’, संपादक-प्रणयकृष्ण,अजय
जैतली एवं अन्य, प्रकाशन सहयोग-राजकमल,
19.जयशंकर प्रसाद, नंददुलारे वाजपेयी,लोकभारती
प्रकाशन,प्रयागराज,2009,पृष्ठ-19
बगावत, राजेंद्र कुमार,अंतिका प्रकाशन, गाजियाबाद
2013, पृष्ठ-164
22. लौट आ ओ धार(संस्मरण) में दूधनाथ सिंह ने
सुमित्रानंदन पंत की आवाज़ व व्यक्तित्व में एक स्त्रैणता
की प्रतीति को रेखांकित किया है।
23. प्रयाग पथ, पूर्णांक-7,अक्टूबर 2019, पृष्ठ-15
आकाश (संदर्भ:उपरिवत्) पृष्ठ-15
गाजियाबाद, 2013
2010 ई.
29. अभिप्राय(संपा०-राजेंद्र कुमार),पहला अंक, अक्टूबर
1981,पृष्ठ -18
स्मृति सभा की रिपोर्ट,08 फरवरी 2026,अंजुमन रूहे
अदब,मेयो हॉल चौराहा, इलाहाबाद।
31. राजेंद्र कुमार:जैसा मैंने देखा;प्रणय कृष्ण,लघुता में
आकाश (संदर्भ:उपरिवत्) पृष्ठ-12
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, बीएचयू,वाराणसी
vindhyachalydvbhu@gmail.com, 8004130639

एक टिप्पणी भेजें