शोध आलेख : मुक्तिबोध बंधुओं का काव्य : एक आलोचनात्मक अध्ययन / मनोहर गंगाधरराव चपळे

मुक्तिबोध बंधुओं का काव्य : एक आलोचनात्मक अध्ययन
- मनोहर गंगाधरराव चपळे

शोध सार : मुक्तिबोध प्रगतिशील काव्यधारा का बहुत बड़ा नाम हैं। वह अज्ञेय द्वारा संपादित तारसप्तक के पहले एवं प्रमुख कवि हैं। महज 47 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी रचनाओं द्वारा पाठकों पर गंभीर प्रभाव डाला। मुक्तिबोध की प्रसिद्धि कवि के रूप में अधिक है परंतु वह एक बेहतरीन कहानीकार और आलोचक भी रहे हैं। उनकी कहानियों और कविताओं में अनोखा सामंजस्य दिखाई देता है। कई बार तो उनकी कहानियाँ उनकी कविताओं का विस्तार प्रतीत होती हैं। प्रस्तुत शोधपत्र में इसको विस्तार से जानेंगे।

बीज शब्द : मुक्तिबोध, कविता, कहानी, नई कविता, अंतर्संबंध, अंधेरे में, ब्रह्मराक्षस, एक साहित्यिक की डायरी, आलोचना, आत्मभर्त्सना

मूल आलेख : प्रत्येक रचनाकार जो विभिन्न विधाओं में रचना करता है उसकी प्रत्येक विधा की रचना में कुछ न कुछ विशेषताएँ समान अवश्य पाई जाती हैं परन्तु वह इतनी अंतर्संबंधित नहीं होती की एक दूसरे की पूरक एवं विशेषता बन जायें। मुक्तिबोध की कवितायें और कहानियाँ कुछ इसी तरह अंतर्संबंधित हैं। इसके अलावा भी मुक्तिबोध की कविताओं और कहानियों में कई तरह की समानता पायी जाती है फिर चाहे वह नामकरण के आधार पर हो, शिल्प के आधार पर हो या संवेदना के आधार पर। नामकरण के आधार पर 'अंधेरे में ' शीर्षक से मुक्तिबोध की कहानी एवं कविता दोनों ही है और मुक्तिबोध की 'ब्रह्मराक्षक का शिष्य ' शीर्षक कहानी 'ब्रह्मराक्षस' कविता का अगला भाग प्रतीत होती है। इसी प्रकार कथा संवेदना और शिल्प के आधार पर भी कई समानतायें और असमानतायें मुक्तिबोध की कहानियों और कविताओं में मिलती हैं।

मुक्तिबोध हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध रचनाकार हैं। कहानीकार, आलोचक, निबन्धकार होते हुए भी मुक्तिबोध सबसे अधिक प्रसिद्ध अपनी कविताओं के लिये हुए। कवि के रूप में मुक्तिबोध के दो कविता संग्रह चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964 ) और भूरी भूरी खाक धूल (1980 ) तथा कहानीकार के रूप में भी मुक्तिबोध के दो कहानी संग्रह काठ का सपना (1967 ) और सतह से उठता आदमी (1971) प्रकाशित हैं।

मुक्तिबोध सबसे अधिक कवि के रूप में विख्यात हैं अतः उनकी कविताओं पर हिन्दी सहित अन्य भाषाओं में भी अनगिनत काम हुए हैं। हालांकि मुक्तिबोध का कथाकार रूप प्रायः उपेक्षित है परन्तु उस पर भी कुछ शोधार्थियों ने शोध किया है, मसलन -

मुक्तिबोध के कथा साहित्य में मध्यवर्गीय चेतना, मुक्तिबोध की कहानियों में फैंटसी का उपयोग मुक्तिबोध की सामाजिक चेतना, मुक्तिबोध के साहित्य में परम्परा का मूल्यांकन, मुक्तिबोध का गद्य साहित्य एक विवेचनात्मक अध्ययन मुक्तिबोध के साहित्य और रचनाकर्म पर लगातार काम होते हुए भी उनका रचना संसार इतना विस्तृत एवं वैविध्यपूर्ण है कि बहुत कुछ रह जाता है और उसमें सबसे विचारणीय एवं महत्वपूर्ण विषय है मुक्तिबोध की कहानियों और कविताओं के अंतर्संबंध का।

यह विषय मुक्तिबोध के रचना संसार और रचना कर्म को समझने के लिये बेहद महत्वपूर्ण है। मुक्तिबोध कहानियाँ कम लिखते थे और जो कहानियां उन्होंने लिखी उनका प्रमुख उद्देश्य अर्थोपार्जन रहा और साथ ही पत्नी के दबाव में भी कुछ कहानियाँ लिखीं। परन्तु ऐसा नही था कि मुक्तिबोध की कहानी लेखन में रुचि नहीं थी। मुक्तिबोध कहतें हैं "मैंने सोचा है कि मैं अपनी हर कविता पर एक कहानी लिखूं क्या यह असम्भव है?" यह बिल्कुल भी असम्भव नहीं था, यह मुक्तिबोध ने स्वयं साबित किया है। मुक्तिबोध की कहानियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं।

मुक्तिबोध की अंधेरे में, ब्रह्मराक्षस का शिष्य, खलील काका, जंक्शन, समझौता आदि सभी कहानियाँ उनकी कविताओं पर ही आधारित हैं। अपनी कविताओं पर कहानियाँ लिखने वाले मुक्तिबोध अपनी तरह के इकलौते लेखक हैं। ये सारे बिंदु विषय की उपयोगिता को बढ़ा देते हैं। आख़िर क्यों मुक्तिबोध कविताओं पर कहानियाँ लिखते है? उनकी कहानियों और कविताओं में इतनी समानता कैसे है? कहीं ऐसा तो नहीं कि मुक्तिबोध अपनी कहानियों के माध्यम से अपनी कविताओं को समझाने की कोशिश कर रहे थे? इन सारे सवालों के जवाब की अपेक्षा इस विषय की उपयोगिता को सिद्ध करते हैं।

नामंजूर उसको जिंदगी की शर्म की सी शर्त -

मुक्तिबोध के पात्रों को जिंदगी की शर्म की सी शर्त मंजूर नहीं। मुक्तिबोध के पात्र चाहे कहानी के हों या कविता के या मुक्तिबोध का स्वयं का व्यक्तित्व वह बेहद स्वाभिमानी है इसी कारण वह कभी जिंदगी की कतरन के नायक की तरह मौत को गले लगा लेता है तो कभी प्रश्न के बालक की तरह माँ से कठोर प्रश्न करता है।

समझौता में भी नायक का कुछ ऐसे ही प्रश्नों से सामना होता है क्लॉड ईथरली का क्लॉड ईथरली इस तरह के समझौते न कर पाने की वजह से ही पागल करार कर दिया जाता है। मुक्तिबोध की कहानियों के ये पात्र उनकी कविताओं से ही प्रेरित हैं। आत्मसम्मान का यह बीज हमें उनकी अनेकों कविताओं जैसे एक भूतपूर्व विद्रोही की आत्मकथा, भूल गलती, अंतः करण का आयतन, अंधेरे में आदि कविताओं में नायक के स्वाभिमानी व्यक्तित्व द्वारा उजागर होते हैं। यही नहीं मुक्तिबोध का निजी व्यक्तित्व भी शर्म की शर्त को नामंजूर करता है। प्रसिद्ध लेखक अशोक वाजपेयी मुक्तिबोध के विषय में कहते हैं- "मुक्तिबोध अपनी लम्बी कविताओं को किसी पत्रिका में नहीं देते थे क्योंकि उन्हें डर था कि पूरी कविता का अधिकांश भाग उनकी कविता के लेने की वजह से कहीं सम्पादक की पत्रिका डूब न जाये"

फैंटसी में विचरण -

मुक्तिबोध की कविता हो या कहानी फैंटसी उसमें सदा विद्यमान रहती है। फैंटसी एक ऐसी कल्पना है जो तर्क सिद्ध नहीं है और एक प्रकार की रहस्यात्मक अंतर्दृष्टि का परिणाम है। फैंटसी के विषय में मुक्तिबोध स्वयं लिखते हैं- "फैंटसी मन की निगूढ़ वृत्तियों का अद्भुत जीवन समस्याओं का और इच्छित जीवन स्थितियों का प्रक्षेप होता है।" मुक्तिबोध ने जटिल बहुआयामी एवं गतिशील यथार्थ को सघनता से पकड़ने के लिये फैंटसी शिल्प का प्रयोग किया है। इससे वे वास्तविकता के अनावश्यक वर्णन से बच सके हैं और अपनी बात को सीधे व्यक्त कर पाए हैं। उदहारण के लिए तमाम बुद्धिजीवियों के त्रासद अंत की कल्पना मुक्तिबोध इस प्रकार करते हैं-

वह कोठरी में किस तरह
अपना गणित करता रहा
और मर गया,,,,,,,,

यह फैंटसी मुक्तिबोध की कहानियों में भी व्यापक रूप से पायी जाती है। ब्रह्मराक्षस का शिष्य कहानी से एक अंश -

"शिष्य उठने ही वाला था कि गुरु ने कहा नहीं नहीं उठो मत और उन्होंने अपना हाथ इतना बढ़ा दिया कि वह कक्ष पार जाता हुआ अन्य कक्ष में प्रवेश कर एक क्षण के भीतर घी की चमचमाती लुटिया लेकर शिष्य की खिचड़ी में उड़ेलने लगा।"

दरअसल, ब्रह्मराक्षस, अंधेरा साँवला पानी एवं बरगद का पेड़ आदि मुक्तिबोध की फैंटसी के ही चित्रण हैं जो उनकी कहानियों और कविताओं में हर जगह व्याप्त हैं। ब्रह्मराक्षस का उल्लेख सबसे पहले मुक्तिबोध ने अपनी डायरी में 1945 से 1954 के बीच किया। ब्र्ह्मराक्षस का शिष्य कहानी मुक्तिबोध की पत्रिका ‘नया ख़ून’ में छपी इसके बाद ब्रह्मराक्षस कविता अप्रैल 1957 में प्रकाशित हुई। इस प्रकार, हम यह तो नहीं कह सकते कि मुक्तिबोध ने कहानी पहले लिखी या कविता परन्तु इनका कथानक और विकास निश्चित रूप से कविता के द्वारा कहानी के परिचालित होने की तरफ इशारा करते हैं।

प्रकट होकर विकट होने की समस्या -

मुक्तिबोध की कहानियों एवं कविताओं दोनों में ही समस्या ये नहीं कि सच्चाई प्रकट नहीं है बल्कि, समस्या यह है कि सच्चाई प्रकट होने के बाद विकट रूप धारण कर लेती है। मुक्तिबोध की रचनाओं में सच्चाई प्रकट होने के साथ 'बहुत शर्म आती है' ही नहीं बल्कि उनके सामने यह भी प्रकट था कि उनका विद्रोह बेहद छोटा था -

लेकिन हम इसलिये
मरे कि ज़रूरत से
ज़्यादा नहीं, बहुत बहुत कम
हम बागी थे।

यही नहीं कई बार तो यह समस्या इतनी विकट हो जाती है कि कथावाचक को स्वयं समझ में नहीं आता कि यह स्वप्न है या जागृति:

समझ नहीं पाया कि चल रहा स्वप्न या
जागृति शुरू है,
पितलोक प्रसार में काल गल रहा है

ज्ञान के प्रकट होकर विकट हो जाने की यह स्थिति भूल गलती, अंतः करण का आयतन, एक भूतपूर्व विद्रोही की आत्मकथा आदि कविताओं में भी पायी जाती है। स्थितियों का इस तरह विकट होना वास्तविक रूप में किसी समस्या को नहीं उत्पन्न करता अपितु समस्या के समाधान के लिये पहले कदम तथा समस्या की विकटता को व्यक्त करते हैं। मुक्तिबोध की कहानियों जिंदगी की कतरन, जलना, क्लाड ईथरली और विपात्र आदि कहानियों में भी यही स्थिति मुख्य रूप से है।

पिस गया वह भीतरी और बाहरी दो कठिन पाटों के बीच -

व्यक्ति और समाज का द्वन्द हमेशा से साहित्य का प्रमुख विषय रहा है परन्तु, मुक्तिबोध की कविता एवं कहानियों में यह अधिक उभर कर आया है। मनुष्य अपने भीतरी ( व्यक्ति ) और बाहरी (समाज ) में अक्सर सामंजस्य नहीं बैठा पाता।

मुक्तिबोध व्यक्ति के महत्व के प्रति अत्यधिक जागरुक होते हुए भी अपने इस आग्रह को आरोपित ढंग से लागू नहीं करके व्यक्ति और समाज के पारस्परिक सम्बन्धो को मानवीय हित के संदर्भ में यथार्थपरक ढंग से विश्लेषित करते हैं। हिरोशिमा पर बम गिराने वाला विमान चालक क्लॉड ईथरली अपने जघन्य अपराध के लिए सजा चाहता था पर वार हीरो बनाकर पेश किया गया। जब उसने इस सम्मान को लेने से इंकार किया तो उसे पागल का दर्जा दिया गया। परमाणु युद्ध का विरोध करने वाली आत्मा का नाम ही क्लॉड ईथरली है। दरअसल, यह कहानी मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में, अंतःकरण का आयतन आदि कविताओं की तरह व्यक्ति और समाज के द्वन्द को पुरज़ोर तरीके से दर्शाता है -

"मैं किसी शब्द से नहीं डरता लेकिन मैं अब सरकारी नौकर हूं। पेट की गुलामी कर रहा हूं आत्मा बेचकर।"

व्यक्ति और समाज का द्वन्द मुक्तिबोध की रचनाओं का केंद्र बिंदु है इसी कारण इसका वर्णन मुक्तिबोध की प्रायः सभी कविताओं के अलावा जंक्शन, जिंदगी की कतरन, पक्षी और दीमक, विपात्र, समझौता, सतह से उठता आदमी आदि कहानियों में भी केंद्रीय रूप में विद्यमान है।

ज्ञान जो अपराध बना -

मुक्तिबोध की कहानियाँ और कविताएं ज्ञान के स्तर पर भी समान हैं उनका कथा नायक हो या काव्य नायक वह बहुत ज्ञानी होता है। वह शिष्य होता है या शोधार्थी होता है। वह गणित, विज्ञान, राजनीति, इतिहास और साहित्य की सभी शाखाओं का विद्वान होता है और उसका यही ज्ञान उसकी पीड़ा का कारण, उसका अपराध बन जाता है। इसी कारण कविता पूंजीवादी समाज के प्रति में सब कुछ को व्यर्थ ठहरा दिया जाता है। एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्मकथन' में कवि कहता है-

क्योंकि हमे ज्ञान था,
ज्ञान अपराध बना

मुक्तिबोध का नायक अपने ज्ञान को निरर्थक मानता है कहानी ब्रह्मराक्षस का शिष्य का ब्रह्मराक्षस ज्ञान को औरों तक न पहुंचा पाने के कारण श्राप भुगतता है। क्लॉड ईथरली का नायक अपने ज्ञान को दुनिया की बर्बादी का कारण पाता है। विपात्र का नायक ज्ञान का भूखा है और ज्ञानी भी है परन्तु उसका ज्ञान ही उसे समाज में फिट नहीं होने देता।

आत्मभर्त्सना या आत्मसम्मान -

मुक्तिबोध हिन्दी साहित्य के इकलौते ऐसे लेखक है जो हर बात के लिए स्वयं को दोष देते हैं। उनके पत्रों में हज़ारों जगह इसके दर्शन होते हैं। मुक्तिबोध की कहानियाँ और कविताएं भी इससे अछूते नहीं है। परन्तु क्या यह सच में उनकी आत्मभर्त्सना ही है ? पक्षी और दीमक, समझौता से लेकर विपात्र तक इन सारी कहानियों को पढ़ें तो कहीं गहरे अवसाद के धूसर चित्र मिलेंगे। कंहीं अपनी पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों को न निभा पाने की वजह से प्रकारांतर से व्यवस्थागत अन्याय का साधन बनने का अपराध - बोध मिलेगा, कहीं अपनी स्वतंत्रता को बेच खाने की ग्लानि और निरुपायता का अहसास, तो कहीं स्वतंत्रता को बचाने की पीड़ा भरी जद्दोजहद।

मुक्तिबोध की कविताओं में भी इसके स्वर मिलते है भूल गलती, अंधेरे में, एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्मकथन इस दृष्टि से उल्लेखनीय कविताएं हैं। परन्तु यह उनकी आत्मभर्त्सना की नहीं अपितु उनके कर्तब्य बोध की सूचक है। साथ ही उनके आत्मसम्मान की भी सूचक है जो मुक्तिबोध ने स्वयं अपने लिए निर्मित किये थे जो उन्हें उनके कर्तब्यों एवं गलतियों का अहसास दिलाते हैं -

लेकिन हम इसलिए
मरे की जरूरत से
ज्यादा नहीं, बहुत बहुत कम आ
हम बागी थे

पूर्णता से अपूर्णता की ओर -

मुक्तिबोध की बहुत सी कहानियाँ और कविताएँ अपूर्ण हैं। मुक्तिबोध का पूरा कथा साहित्य मुक्तिबोध रचनावली खण्ड- 3 के 360 पृष्ठों में संकलित हैं। लगभग 120 पृष्ठों यानी एक तिहायी हिस्से में उनकी अपूर्ण कृतियां हैं। छोटी बड़ी कुल 21 कहानियाँ हैं जो अधूरी हैं। एक अधूरा उपन्यास है। शेष दो तिहायी हिस्से में भी एकाधिक बार पूर्णता का मामला संदिग्ध है। चाबुक शीर्षक कहानी तो पूर्णत: एक अधूरी कहानी है। इस कहानी के एक बड़े हिस्से का कहानी की शुरुआत के साथ कोई तालमेल न देख उसे उपसंहार शीर्षक कहानी के साथ अलग से छापा गया है। उपसंहार कहानी के अंत में स्वयं सम्पादक ने लिखा है -"सम्भवत: किसी अपूर्ण कहानी का अंश।" विद्रूप कहानी के अंत में लिखा है "सम्भवतः किसी लम्बी कहानी का अंश।” इसी तरह एक दाखिल दफ्तर सांझ कहानी के अंत में भी पांडुलीपि का एक टुकड़ा मिला है जो रचनावली में संकलित है। विपात्र ज्ञानोदय में कहानी के रूप में प्रकाशित हुई थी और फिर यथावत काठ का सपना कहानी संग्रह में प्रकाशित हुई थी। "उपन्यास की शक्ल में शाया होने पर उसमें एक बड़ा हिस्सा जुड़ा बाकि उन्हीं पात्रों और परिवेश को लेकर एक अलग तरह का बर्ताव और मिजाज़ के साथ आगे चलता है।" रचनावली के सम्पादक नेमिचंद जैन के मतानुसार "ऐसा जान पड़ता है कि यह इसी लम्बी कथा का एक अन्य प्रारूप है।… इसे मिलाकर विपात्र को एक लघु उपन्यास मानने के बजाये उसी कथा का एक अन्य रूप मानना अधिक समीचीन होगा"

इसके अलावा मुक्तिबोध अपनी कविताओं के विषय में कहते हैं कि "मैं कभी छोटी कविताएँ नहीं लिख पाता .... जो कवितायें छोटी होती हैं वह छोटी न होकर अधूरी होती हैं।" अर्थात मुक्तिबोध की कविताओं में भी यह अधूरापन व्याप्त है जो पूरा होने की प्रक्रिया का अंग बन पूर्णता के नाम पर स्थापित हो गया है।

निष्कर्ष : इस प्रकार हम देखते हैं कि कथ्य एवं संवेदना दोनों ही स्तरों पर मुक्तिबोध की कविताओं और कहानियों के बीच अंतर्संबंध दिखाई देता है। अंधेरे में, ब्रह्मराक्षस-ब्रह्मराक्षस का शिष्य इनमें ऊपरी तौर पर शीर्षक की समानता तो दिखाई देती ही है साथ ही इनमें संवेदनात्मक समानता भी है। ब्रह्मराक्षस का शिष्य कहानी, ब्रह्मराक्षस कविता का विस्तार प्रतीत होता है। इसी प्रकार, क्लाड ईथरली, अंत:करण का आयतन, पक्षी और दीमक, भूल गलती, एक भूतपूर्व विद्रोही की आत्मकथा आदि रचनाओं में भी अंतर्संबंध दिखाई देता है।

संदर्भ :
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  2. नेमीचंद जैन सम्पादक, मुक्तिबोध रचनावली भाग -3 ,राजकमल प्रकाशन, दिल्ली ,1985
  3. अपूर्वानंद सम्पादित आलोचना, मुक्तिबोध पर केंद्रित सहस्त्राब्दी अंक 55, त्रैमासिक, जुलाई - सितम्बर 2015, राजकमल प्रकाशन
  4. अशोक वाजपेयी सम्पादित, गजानन मा. मुक्तिबोध प्रतिनिधि कवितायें, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली , 2013
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  10. शर्मा जनक, गजानन माधव मुक्तिबोध ब्यक्तित्व और कृतित्व, पंचशील प्रकाशन, 1983
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  12. भरत सिंह, कवि कहानीकार अज्ञेय और मुक्तिबोध
  13. माचवे प्रभाकर, मुक्तिबोध का रचना संसार
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  15. शर्मा, रामविलास, नयी कविता और अस्तित्ववाद, राजकमल प्रकाशन , नई दिल्ली , आवृत्ति 2003 , पृष्ठ -138
  16. सिंह, नामवर, अंधेरे में, पुनश्च, कविता के नये प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 1982, पृष्ठ - 231
मनोहर गंगाधरराव चपळे

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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