डायरी : जुलाई-अगस्त 2025
- सत्यनारायण व्यास
मिथ्या नहीं जगत (26.07.2025)
यहाँ शांकर अद्वैत में ‘मिथ्या’ शब्द कुछ ज़ालिम है, धोखेबाज़ है। मिथ्या के रूढ़ अर्थ से हटकर शंकर ब्रह्मज्ञान या आत्मज्ञान हो जाने पर उसे (जगत को) स्वप्नवत मिथ्या कहते हैं, जो इस नाचीज़ को अस्वीकार है। स्वप्न भी मिथ्या नहीं, अपितु मानवीय निद्रा का अचेतन सत्य है।
स्वप्न सत्य है निद्रा का। निद्रा है जीवन का सत्य। सो, न स्वप्न मिथ्या है, न निद्रा और न ही जगत। शब्दों की बाज़ीगरी में सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता। शंकर संन्यासी थे। न स्त्री, न घर, न बाल-बच्चे। जो घनघोर ध्यान से भी नहीं दिखता, जो मन-वाणी से परे, अपरिभाषेय और लोकोत्तर तुरीयावस्था का प्रकाश है- वह तो हो गया ‘ब्रह्मसत्य’ और इधर हमारी यह जीती-जागती, हरी-भरी, हँसी-रोदन, ममता के आँसुओं से आप्लावित, प्रत्यक्ष और स्वतः प्रमाणित भावाकुल दुनिया हो गई झूठी? कैसे मानें? क्यों? खिलखिलाता बच्चा, स्तनपान कराती माँ, शृंगार में प्रमुदित और विरह में सिसकती प्रिया या पत्नी, माता-पिता, अग्नि, प्रज्वलित सूर्य, बहती हवा, प्राणों में स्पंदित और गतिशील जीवन और जगत मिथ्या हो गए ?
जो नहीं दिखता वह तो सत्य और जो आँखों के सामने है धड़कता जीवन, मिथ्या? खुद शंकर ‘विवेक चूड़ामणि’ में अपने ही सिद्धांत को अन्यथा, शब्दों के इंद्रजाल की स्वीकृति दे गए हैं-
शब्दजालं महारण्यं चित्तभ्रमण कारणम्।
तस्माद् प्रयत्नाद् ज्ञातव्यम् तत्त्वज्ञात्तत्त्वमात्मन:।।
अर्थात् शब्दों का जाल, चित्त को भटकाने वाला घोर जंगल है। अतः तत्त्व की बात किसी महाज्ञानी के पास बैठकर समझनी चाहिए।
सो, हम मानते हैं कि परमात्मा कहो या आत्मज्ञान तो सत्य है ही, पर इस जीते-जागते भाव-सजल संसार को मिथ्या कहने का किसी को अधिकार नहीं। ईश्वर सत्य है तो हमारा जीवन, हमारी दुनिया भी सत्य है।
वाक् (28 जुलाई, 2025)
कविता का मंच हो या संगोष्ठी का, कवि या वक्ता पाँच प्रकार के होते हैं-
- वाग्दूषक
- वाचाल
- वाक्पटु
- वाग्मी
- वागीश
इनमें से ‘वाग्दूषक’ वो, जो द्वयर्थक शब्दों में अश्लील, फूहड़, भदेस और घृणास्पद बातें बोलता हो। वह वक्ता नहीं बकता है। वाणी का कलंक है। भाषा का अपराधी है। वह कर्ण-शत्रु है। विक्षिप्त का सगा भाई है। उसका वश चले तो गालियाँ भी बक सकता है। जूते भी खा सकता है। इसके बावज़ूद उसको चाहनेवाले श्रोता भी होते हैं। जिनका स्तर उससे भी घटिया। दोनों मनोरोगी।
अगला है वाचाल, कवि हो या वक्ता। पानी पर तेल की बूँद जैसा फ़ैल जाता है। उसे शब्दों की दस्त लगी होती है। सज्जनों-विद्वानों का जानी दुश्मन। बोलने के लिए बोलता है, न आशय, न उद्देश्य। बोलना उसकी खुराक है। न बोले तो बीमार पड़ जाए। हर विषय का ज्ञाता। जनरल नॉलेज का अभिशाप। माइक को कसकर पकड़े रहता है। हुर्रिया लगने, अंडे-टमाटर फेंके जाने पर रुकने-बैठने की सोचता है। कभी बुरा नहीं मानता।
फिर आता है वाक्पटु। वाणी का चतुर प्रयोक्ता। तालियों का शौकीन। मंच और महफ़िल लूटने की टेक्नीक में माहिर। सुनकर सुनकर विद्वान और ज्ञानी सिर पीटते हैं। चुटकुलों को वक्तव्य में ढाल देता है। संस्कारहीन-कुपढ़ मध्यवर्ग का हीरो बन बैठता है। उसकी विदेशों तक में डिमांड होती है। उस पर एनआरआई लोग फ़िदा होकर जी-जान वारते हैं। कविता पहाड़ जितनी और अर्थ चने जितना। शुद्ध जुमलेबाज़ी का सरताज़।
अब आते हैं वाणी के आराधक और उपासक- वाग्मी। जिह्वा पर सरस्वती। वाग्मी के श्रोताओं में संस्कार, पात्रता और विदग्धता ज़रूरी। लोग तालियाँ बजाना भूल जाएँ। उनके रोम-रोम कान हो जाएँ। जीवन और समाज को सन्मार्ग पर चलने को उत्कट उत्साहित कर दे। श्रोताओं को सात्त्विकता में सम्मोहित कर दे। प्रवचन और अपने काव्यत्व में काल-बोध को लुप्त कर दे। कृष्ण की बाँसुरी जैसा चुंबकीय आकर्षण। बड़े और आदर्श नाम है- विवेकानंद, गाँधी, रवींद्रनाथ टैगोर जैसे शलाका पुरुष। मंच न सही, अपने सृजन से वाणी को गौरव-गरिमा देनेवाले अरविन्द, दयानंद, जयशंकर प्रसाद, कबीर, तुलसी इत्यादि।
अंतिम और वाणी के शिरोमणि वाग् अवतार पुरुष- वागीश। यह सर्वोच्च कोटि है। ये सिद्धवाक् होते हैं। जैसा बोलेंगे, वैसा होगा। वरदान और शाप की ताक़त। सृष्टि और जीवन के रहस्यों के पारद्रष्टा। परावाणी के मूक और मुखर ज्ञाता। इनमे अग्रगण्य हैं- वेद-उपनिषद् के ऋषि, गौतम बुद्ध, वेदव्यास, महावीर, आदि शंकराचार्य और वर्तमान युग के रामकृष्ण परमहंस और महर्षि रमण। सारांश, वाणी ज्ञानरूपा महामाया है। शब्द, चेतना की भट्टी से निकले अंगारे हैं। इनसे बदतमीज़ी वक्ता और श्रोता दोनों का नाश कर देती है। इति।
महाप्रश्न (29 जुलाई, 2025)
शरीर, पदार्थ और जगत में व्याप्त परमाणुओं को कौन जोड़ता है, कब जोड़ता है, कैसे जोड़ता है और काल की मध्यस्थता से कब, कैसे और क्यों बिखेर देता है?
कोई नहीं बता सकता। कभी नहीं बता सकता। क्या ये सब अपने आप जुड़ते और बिखरते हैं?
माँ के गर्भस्थ भ्रूण में प्राण कहाँ से आ जाता है?
अग्नि में उष्णता किसने डाली? चेतना, प्राण, जन्म, विकास और नाश का कोई नियंता है या नहीं?
देह में प्राण कहाँ से आता है और कहाँ चला जाता है? आया क्यों और गया भी क्यों?
मैं ये सब सोच रहा हूँ, क्यों?
अन्न से आत्मा (30 जुलाई, 2025)
मज़े की बात है। दो शब्द हैं। अन्न और आत्मा। दोनों की माँ एक ही है। दोनों सगे भाई हैं। दोनों की जननी एक ही है- अत् नामक धातु। दोनों का मूल धातुज अर्थ है- भक्षण करना, सेवन करना।
पहले अन्न पर आएँ। इसका व्याकरणिक और शास्त्रीय अर्थ है- जो लोगों द्वारा खाया जाता है और जो लोगों को खा जाता है। तैत्तिरीय उपनिषद् और उसके शांकर भाष्य में परिभाषाएँ हैं- अद्यते अत्ति च मनुष्यान् तद् अन्नम्। अद्यते जो खाया जाता है, अत्ति = जो खा जाता है। यह संयोग नहीं हक़ीकत है।
विषयांतर नहीं करूँगा। पर इतना कहना ज़रूरी है कि प्राचीन साहित्य में प्राणवायु, जल, सभी वनस्पतियाँ, फल, दूध और सारे अनाज “अन्न” कहलाते रहे। बाद में अन्न केवल गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा, ज्वार और दालों तक सीमित अर्थ में रह गया। खैर।
अद्यते- जो खाया जाता है हमारे द्वारा। यहाँ तक ठीक। पर जो हमें खा जाता है, वही अन्न। पचास की आयु तक अन्न हमारा पोषण, ऊर्जा, विकास करता है। इसके बाद वही अन्न हमारे भीतर मंदविष(Toxic) पैदा करने लगता है। मेडिकल साइंस का कहना है कि दस साल के बच्चे तक में कोलेस्ट्रोल के साथ हृदय की नसों में ब्लॉकेज की महीन परत जमने लगती है। यो अत्ति च- जो हमें खाने लगता है। सो अन्न ही जीवन है और अन्न ही मृत्यु। इसमें हमारा ‘काल’ घुसा रहता है। काल आने पर अन्न की प्रवृत्ति क्षय करनेवाली हो जाती है। स्वाद भले ही बना रहे। मेवाड़ी कहणात है- ज्यां को अन्न छूटै, वांको तन छूटै। एकदम सही है। यह पूर्वजों का अनुभव था, जो प्रामाणिक है। मनुष्य जाति के अनुभवों का लिपिबद्ध रूप ही ज्ञान और साहित्य है।
अब रही आत्मा, जो भले ही अजर-अमर हो, अपने सहोदर ‘अन्न’ से उसकी नसें जुडी हुई हैं। कैसे?
आत्मा के सारे दिव्य लक्षण- चेतन, अविनाशी, सर्वव्यापी, ज्योतिस्वरूप आदि सब बाद में जोड़े गए। इसका प्राचीनतम अर्थ और स्वभाव था- ‘श्वास लेना।’ धरती के जो भी जीवित प्राणी हैं, श्वास लेते हैं और जीवित रहते हैं। वैदिक ऋषि ने ध्यानपूर्वक यह नोट किया कि प्राणी की श्वसन-प्रक्रिया ही उसका जीवन है। यहाँ न प्राणी का महत्त्व है और न ही प्राणवायु का। महत्त्व साँस लेने की प्रक्रिया में छिपी इसी रहस्मयी दिव्य सत्ता का है। साँस बंद तो प्राणी ख़त्म। देह मृत और श्वास वायु में विलीन। जब तक साँस, तब तक आस। साँस नहीं, शरीर नहीं- इन्हें जीवन देनेवाली जो आदिशक्ति श्वसन-प्रक्रिया है- वही है आत्मा।
सो, वेद को पढ़ने-समझने के षट्अंगों- शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छंद और ज्योतिष में से वैयाकरण ऋषि ने शब्द की धातु और उसका प्राचीनतम अर्थ लिखा- अत् श्वसने। अत् यानी श्वास लेना। श्वास बाहर से शरीर के अंदर ली जाती है या ग्रहण की जाती है उस चिद्शक्तिरूपा श्वसन-प्रक्रिया का नाम हुआ- “आत्मा।”
श्वास लेने की प्रक्रिया ‘आत्मा’ हो गई और देहधारणार्थ शरीर में भीतर लिए जाने वाला पदार्थ ‘अन्न’ हो गया।
शब्दों के भीतर हज़ारों बरसों पुरानी कैसी रोचक अर्थ-मीमांसा भरी पड़ी है।
सारांश यह है कि अन्न(अन्नं ब्रह्म) आत्मा से कम महत्त्व का नहीं है। छह साल तक सिद्धार्थ ने भूखे रहकर तपस्या की, पर आत्मज्ञान नहीं हुआ। फिर सुजाता की खीर खाई और तथागत बुद्ध हो गए। यह है अन्न से आत्मा तक की यात्रा।
महाभारत में धर्म (31 जुलाई, 2025)
भारतीय वांग्मय में धर्म के मुख्यतः बारह अर्थ हैं- सत्य, कर्तव्य, स्वभाव, नैतिकता, पवित्रता, परोपकार, प्रथा, न्याय, औचित्य, आस्था, शपथ और पूजा-आरती। ये तो वे जो ख़ास-ख़ास हैं।
यहाँ तो, आप भोजन किस दिशा में मुँह करके करेंगे और शौच-समय लोटा दायें या बायें कहाँ रखेंगे, हाथ कितनी बार धोएँगे- जैसी रोज़मर्रा की बातों में भी धर्म घुसा हुआ है। इतना हस्तक्षेप कि पालना करें तो जीना मुश्किल हो जाए।
धर्म को लेकर महाभारत में काफी विस्तार और विविधता से चिंतन और विमर्श मिलता है। कुछ झलकियाँ हैं-
सबसे पहले महाभारत के लेखक खुद वेदव्यास की पीड़ा को ही ले लें। वे कहते हैं कि अरे दुनियावालो, मैं हाथ ऊँचे करके तुम्हें पुकार रहा हूँ, मेरी सुनो, उधर मत जाओ। वह रास्ता ठीक नहीं है। मगर मेरी कोई सुनता ही नहीं है। धर्म से कमाया(नीतिपूर्वक) हुआ जो अर्थ और काम है तुम लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते?’ श्लोक ये है-
ऊर्ध्वबाहू विरोम्येष, न हि कश्चित् शृणोति मे।
धर्माद् अर्थश्च कामश्च, तद्धर्म: किं न सेव्यते।।
पर अफ़सोस, दुनिया मानती है क्या? आज भी पूरी दुनिया केवल ‘मनी एंड सेक्स” की धुरी पर ताबड़तोड़ घूम रही है। धर्म की आत्मा तो गई आकाश में, उसका शव गंधा रहा है और बदबू चारों तरफ़ व्याप्त है।
दूसरी, धर्म की प्रचलित परिभाषा भी, जो विद्वानों के मुँह पर है, वह यह कि जिसे धारण किया जाए और जो प्रजा या लोक को धारण करता है-
धारणाद् धर्ममित्याहु:, धर्मो धारयति प्रजा:।
ईमान पर चलने, नैतिक मूल्यों को धारण करने से धर्म, लोक(प्रजा) को थामे रहता है। अब हाल ये है कि ईमान पर कोई चल नहीं रहा और बेचारा धर्म बेईमानों से बोझे मर रहा है। धर्म की कमर टूट रही है। जो टूटती रहे।
तीसरा संदर्भ, निहायत ही प्रासंगिक और धार्मिक झगड़ों तथा दंगा-फसादों के शांतिपूर्ण समाधान को लेकर है, जिसे राजनीति और शासन ने ‘डस्टबिन’ में डाल रखा है।
चर्चा, भीष्म और युधिष्ठिर के बीच धर्म की चल रही है और भीष्म, धर्मराज को समझाते हुए कहते हैं कि “हे सत्यविक्रम युधिष्ठिर! जो धर्म, दूसरे धर्म को विघ्न-बाधा पहुँचाता है, उसे बुरा बताता है वह धर्म नहीं अपितु ‘कुधर्म’ है। लेकिन जो धर्म किसी भी धर्म से विरोध नहीं करता, वही सच्चा धर्म है। प्रमाण-
धर्मं यो बाधते धर्मः, न स धर्मः कुधर्म तत्।
अविरोधी तु यो धर्मः, स धर्मः सत्यविक्रम:।।
धर्म और राजनीति के गठजोड़ से आज क्या हो रहा है, यह बताने की ज़रूरत नहीं। राजनीति, धर्म का दुरुपयोग नहीं छोड़ेगी और दंगे-फसाद कभी बंद नहीं होंगे।
चौथा प्रसंग है धर्म और सत्य के रिश्ते को लेकर। वह सभा नहीं, जिसमें ज्ञानवृद्ध न हों। वे कभी भी ज्ञानवृद्ध नहीं जो ‘धर्म’ की बात नहीं कहते। वह धर्म धर्म नहीं जिसमें सत्य न हो। और वह सत्य नहीं, जिसमें छल-कपट छिपा हो। देखें-
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः, वृद्धाः न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
धर्मं न तद् यत्र न सत्यमस्ति, सत्यं न तद् यच्छलनानुविद्धम्।।
पुरखों का आशय है कि धर्म का प्राण है सत्य और सत्य का प्राण है- मानव-हित। एक-दूजे की गर्भनाल जुड़ी हुई है।
ऐसी तमाम जटिलताओं से दुर्बोध हो गए धर्म को वेदव्यास ने परेशान होकर गुफा में छिपा हुआ तत्त्व घोषित कर दिया। धर्म की दुर्बोधता के पीछे कारण अनेक हैं- तर्क की मदद लें तो उसका अंत नहीं। वेदों का सहारा लें तो वहाँ भी मतभेद और विरोधाभास हैं। ऐसा एक भी आचार्य नहीं, जिसका मत प्रामाणिक मानें। भाई, सच तो यह है कि धर्म का तात्पर्य किसी गुफा में छिपा हुआ है, जिसे ढूँढना कठिन है। अतः एक ही उपाय बचता है कि पहले के महान् संत और महापुरुष जिस मार्ग पर चले हों, उसे ही क्यों न धर्म मान लिया जाए? मूल पाठ है-
तर्कोsप्रतिष्ठ: श्रुतयो विभिन्ना:, नैको मुनिर्यस्य मतः प्रमाणम्।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम्, महाजनो येन गतः स पन्था:।।
और वे क्या करते? महापुरुषों का आचरण ही प्रमाण। शास्त्र को डालो एक तरफ़। बी प्रैक्टिकल।
अंत में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रसिद्ध उपन्यास “बाणभट्ट की आत्मकथा” में अघोर भैरव, बाणभट्ट से कहते हैं कि “वत्स, जब तुम धर्म में छिपे अधर्म को और अधर्म में छिपे धर्म को पहचान लोगे, उस दिन तुम्हें धर्म का मर्म ज्ञात हो जाएगा।
हत्यारों से बचकर कोई मुस्लिम बच्चा, कट्टर पंडित के घर में आ घुसे और वह पंडित उसे अपना ही पौत्र बताकर बचा ले, तो वह अधर्म नहीं, बल्कि सच्चा धर्म सिद्ध होगा। ज्ञानीजन को इशारा काफ़ी है। वरना, हरि अनंत हरिकथा अनंता।
तत्त्वज्ञान की जय हो!
कविता की कुंडली (01 अगस्त, 2025)
कविता कोई हँसी-खेल नहीं है। यह एक गंभीर सामाजिक दायित्व है। आत्मानंद में उपजी कविता जनसमाज को आनंदित करती है और संस्कारित भी। कविता के नाम पर कचरा बढ़ानेवाले और कविता को तमाशा बनानेवाले आजकल बहुत बढ़ गए हैं। और कवि कहलाने की ग़लतफ़हमी में ज़िंदा हैं। खासकर मंचीय कविता में वाचिक पाखंड और आंगिक हाव-भाव की नाटकबाज़ी बहुत बढ़ गई है। सब जानते हैं। यह कुकवियों की बीमारी प्राचीनकाल से चली आ रही है। इससे क्षुब्ध होकर रीतिकाल के कवि को कहना पड़ा-
ढेल सो बनाय लाय, मेलत सभा के बीच।
लोगन कवित्त कीबो, खेल करि जानो है।। (कवि ठाकुर)
कविता के नाम पर एक ढेला लाकर सभा के बीच पेश कर देते हैं। प्रायः यही हो रहा है। एक वह कविता थी जो अर्जुन का रथ हाँकते हुए कृष्ण के मुख से निकली थी और आज की ये कविताएँ ‘कचरागाड़ी’ की कर्णकटु आवाज़ें हैं। क्या करें? स्याणा हाथी अंकुश से संभलता है, पागल हाथी किसी के बस में नहीं आते। अस्तु।
अपने काम से काम रक्खें। यदि मूल को तलाश करें तो कविता की धातु में ‘कु’ अक्षर है, जिसका ‘कवनम्’ रूप होकर ‘शब्द करना’ अर्थ निष्पन्न होता है। ‘कु’ एक अव्यय भी है, जो उस ‘कु’ धातु से भिन्न है। मज़ाक और विडंबना तो जड़ से ही चल रही है कि दोनों कोटियों के कु व सु कवि शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। महान् भी और घटिया भी। कवीश्वर वाल्मीकि, तुलसी भी और सुरेंद्र शर्मा, शैलेश लोढ़ा और दीपक पारीक भी। संविधान की आज़ादी है। कौन रोकनेवाला है? जनता उनकी मुरीद है, उन पर फ़िदा है।
वेद, उपनिषद्, गीता के रचयिता तो कवि थे और उन फूहड़ बड़बोलों को यह उपाधि देना घोर अपराध है। शब्द और ध्वनि तो कोयल भी करती है और कव्वे भी। उनका स्तर और अंतर किससे छिपा है? खैर। होगा।
कविता को लेकर खास-खास बातें कहनी हैं। पहली तो यह कि कविता और पद्य में अंतर है। पद्य का रिश्ता तो छंद से है और कविता का रिश्ता भाव और रस से है। हमारे अनेक ग्रंथ आयुर्वेद, ज्योतिष, धनुर्विद्या आदि पद्यबद्ध हैं, उनमें कहीं काव्यत्व नहीं है। यहाँ तक कि गुप्तजी का विख्यात काव्य ‘भारत-भारती’ भी मात्र सांस्कृतिक मूल्यों का पद्यबद्ध इतिहास है। उसमें कहीं कविता नहीं, सरस-विधान नहीं।
यही नहीं, ‘गोदान’ और ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ कहने को, दिखने में भले ही गद्यात्मक उपन्यास हैं; पर सच पूछो तो ये दोनों अपने ढंग के “महाकाव्य” हैं। नतीज़ा यह कि कविता की आत्मा पद्य और गद्य से ऊपर है। कविता की कली भाव और रस में खिलती है। इन भाषा और विधा के सीखचों में नहीं।
अगली बात है- मुक्त छंद कविता की। जिन्होंने छंद को छुआ ही नहीं वे तो हमेशा ही छंद की तरफ़ से मुक्त हैं। कुछ भी लिख मारें। लेकिन, जो छंदसिद्ध रहे हों, वे ही छंद मुक्त होने के अधिकारी हैं। मुक्तछंद तो पटेलों की पोळ हो गया, जहाँ हर कोई ऐरा-गैरा आकर बैठ गया और कविता का हुक्का गुड़गुड़ा रहा है। हिंदी का हर एम ए पास अब कवि है। छंद-फंद, काव्यशास्त्र को वह नहीं मानता।
निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध छंदसिद्ध थे फिर मुक्त छंद में आए। उन्हें पता था कि छंद छोड़ने के बाद भी स्वर-ध्वनिमूलक वर्ण-विधान और अर्थ में भी एक लय होती है। अब कोई महावीर प्रसाद द्विवेदी कहाँ है, जो इन निरंकुशों को सुधारे।
अब है कविता पाठ। बहुत महत्त्वपूर्ण। राजशेखर संस्कृत में अपने ग्रंथ ‘काव्य-मीमांसा’ में लिखते हैं कि जो भी सुसंस्कृत शास्त्र-पारंगत व्यक्ति है, प्रायः वह ठीक-ठाक कविता रच लेता है। लेकिन कविता का प्रभावोत्पादक पाठ तो, सरस्वती जिन्हें सिद्ध हो, वे ही अच्छा कर सकते हैं। आरोह-अवरोह, काकु-प्रयोग, अंदाज़ेबयां, स्वर-बलाघात जिन्हें आता है, वे कविता पाठ में प्राण-प्रतिष्ठा कर देते हैं। सो, कविता से उसका पाठ कम महत्त्व का नहीं है। यहाँ दो धारणाएँ हैं- गीत गाया जाता है, कविता का पाठ होता है। यदि प्रदीप का गीत “ऐ मेरे वतन के लोगो” किताब में छपा हुआ पढ़ें और उसी को लताजी की आवाज़ में सुनें तो फ़र्क साफ़ है।
राजशेखर का वह श्लोक इस प्रकार है-
काव्यं करोति प्रायेण, संस्कृतात्मा यथा-तथा।
पठितुं वेत्ति स परम्, यस्य सिद्धा सरस्वती।।
कविता तो समाधि की भाषा है। अपने में डूबे, भाव-सागर में विदेह होकर नहीं तैरे तो कविता कैसे होगी? कविता को रचने और सुनने की प्रकृति है- रस निमग्नता। सुनी, एकबार फिर से और फिर से- Once more। जबकि कहानी की प्रकृति है- उत्कंठा। यहाँ तक सुन ली, फिर आगे क्या हुआ?
कालजयी कविता के तीन आधार-तत्त्व हैं- भाव, विचार और ऐन्द्रिक आस्वादन (फोटोग्राफिक)। कालिदास का ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’, तुलसी का ‘मानस’ और प्रसाद की ‘कामायनी’ ये तीन उदाहरण काफ़ी हैं।
एक और मुद्दा है, कविता और विचारधारा का। मार्क्सवाद, हिंदुत्ववाद, गांधीवाद, कलावाद, मनोवैज्ञानिकवाद जैसी विचारधाराओं से कविता का घेरा संकीर्ण हो जाता है। फिर वह कविता नहीं, आस्था की वकालत हो जाती है। कविता की आज़ादी समाप्त। सबसे अच्छी और दीर्घायु गीत-कविता वह, जो सभी विचारधाराओं और वादों से मुक्त हो। जैसे रवींद्रनाथ टैगोर, प्रसाद और निराला आदि। कविता सीधे मनुष्य के दुःख-सुख से जुड़ी हो। धर्म, नस्ल और वाद के बज़ाय उसमें इंसानियत हो।
कवि में सर्वोपरि आवश्यक है- लोक और शास्त्र पर पकड़। लोक-मानस का ओबजर्वेशन और साहित्य का गहन अध्ययन। वरना कविता पोची रहेगी।
यह सही है कि कविता से यश और धन मिलता है, जो स्वार्थ है, पर इसीके साथ सामाजिक दायित्व भी जुड़ा है कि कविता शिवेतर का क्षय करे। मंगल का विधान और अमंगल का नाश भी कवि पर लागू होता है।
यह चर्चा एक बड़े ग्रंथ का विषय है, सो इस जाल को समेटते हुए केवल शास्त्रोक्त कवि-कोटियों का उल्लेख यहाँ उचित होगा। कवियों के तीन प्रकार-
- प्रातिभ
- व्युत्पन्न
- अभ्यासी।
पहला जन्मजात(By birth) और उद्भट कवि होता है- कबीर, तुलसी, सूर, मीरा। जो बोला, सो कविता हो गई। दूसरा है जो काव्यशास्त्र में पारंगत होकर काव्य रचे। वह मध्यम कोटि का होगा। संस्कृत में माघ, श्रीहर्ष और भारवि ऐसे ही प्रसिद्ध कवि हो गए हैं।
तीसरी श्रेणी में कवियों की भरमार है, जो जीवनभर क़लम घिसते रहते हैं। लोग मानें या नहीं, वे खुद को कवि मानते हैं और इसी ग़लतफ़हमी में वे और उनकी कविता खोटे सिक्के की तरह सहृदयों और विदग्धजन को अस्वीकार्य हो जाती है।
सत्यनारायण व्यास
(राजस्थान के वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि)
नीलकंठ, छतरी वाली खान के पास, सेंथी (चित्तौड़गढ़) 312001
9461392200
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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