शोध आलेख : पितृसत्ता का सवाल और दलित स्त्रीवाद का मुद्दा / भगवान साहु

पितृसत्ता का सवाल और दलित स्त्रीवाद का मुद्दा
- भगवान साहु

शोध सार : ‘पितृसत्ता का सवाल और दलित स्त्रीवाद का मुद्दा’ दलित साहित्य विमर्श में विमर्श के भीतर एक और विमर्श की अवधारणा को सामने लाता है। दलित आलोचना के भीतर इस स्त्रीवादी विमर्श ने एक गहन सैद्धांतिक अन्तर्दृष्टि और साहित्यिक नवाचारों को जन्म दिया है। जाति और लिंग कैसे एक-दूसरे से जुड़ते हैं, इसकी जांच करके द‌लित स्त्रीवादी आलोचकों ने यह समझाने के लिए परिष्कृत रूप‌रेखा विकसित की है कि उत्पीड़न के विभिन्न रूप एक साथ कैसे काम करते हैं। अंतर्संबंधित दृष्टिकोण सामाजिक अनुभव की जटिल वास्तविकताओं को समझने में हमारी मदद करती है।

दलित आलोचना और नारीवादी दृष्टिकोण के बीच के अंतर्संबंधों ने विशेष रूप से समृद्ध बहस को जन्म दिया है। दलित नारीवादी आलोचकों ने दिखाया है कि लिंग और जाति उत्पीड़न कैसे एक साथ काम करते हैं, पारंपरिक पितृसत्तात्मक संरचनाओं और सामाजिक आलोचना के सरलीकृत दृष्टिकोणों दोनों को चुनौती देते हैं। ये हस्तक्षेप इस बारे में महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं कि उत्पीड़न के विभिन्न रूप कैसे एक दूसरे से जुड़ते हैं और साहित्य सामाजिक अनुभव की कई परतों को कैसे संबोधित कर सकता है।

बीज शब्द : स्त्रीवादी विमर्श, पितृसत्तात्मक संरचना, लैंगिक उत्पीड़न, ब्राह्मणवाद, दुहरा शोषण, 'दोहरा अभिशाप, सामाजिक न्याय, भीमस्मृति, मनुस्मृति, पुरुषत्व, दलित महिला, सैद्धांतिकी।

मूल आलेख : पितृसत्ता का सवाल और दलित स्त्रीवाद का मुद्दा हिंदी दलित आलोचना का सबसे जटिल और संवेदनशील मुद्दा है। संवेदनशील इसलिए कि दलित साहित्य जो मुख्यतः पुरुष लेखकों द्वारा लिखा गया है, वह ब्राह्मणी सत्ता ब्राह्मणवाद का विरोध तो करता है लेकिन अपने समाज के भीतर मौजूद पितृसत्ता और महिलाओं पर होने वाले लैंगिक अत्याचार पर चुप्पी साध लेता है। वह ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का विरोध तो करता है, लेकिन दलित पितृसत्ता -पुरुष वर्चस्व का हिमायती बना रहना चाहता है। यह दलित लेखकों की नियंत्रण की मानसिकता है। दलित प्रश्नों पर आधिकारिक हस्तक्षेप रखने वाले आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी ने दलित लेखकों के इस अंतर्विरोध को उजागर करते हुए लिखा है -

"दलित साहित्य में इधर जिन नये विषयों पर फ़ोकस किया गया है उनमें दो प्रमुख हैं पहला दलित स्त्री का सवाल, दूसरा भूमंडलीकरण का मुद्‌दा। दलित स्त्री के सवाल को प्रमुखता मिलने की शुरुआत तब हुई जब स्वयं दलित स्त्रियों ने लिखना आरंभ किया, एक्टिविस्ट के रूप में सक्रिय हुईं। दलित स्त्रियों पर अंदर-बाहर सब तरफ़ से हमले हुए। सारी क़ायनात उनके ख़िलाफ़ खड़ी हो गयी। ग़ैर दलितों ने तो उनकी भरसक उपेक्षा की। दलित लेखकों के लिए वे तब तक रास्ते पर थीं जब तक जाति के विरुद्ध बोल रहीं थीं, लेकिन पितृसत्ता पर उंगली रखते ही आलोचना के केंद्र में आ गयीं। आरोप लगाया गया कि इस प्रवृत्ति से व्यापक दलित एकता टूटेगी, 'मूल लक्ष्य' से ध्यान हटेगा। दलित स्त्रियों ने इस आलोचना की ज्य़ादा परवाह नहीं की और पितृसत्ता को उन्होंने बहस का विषय बना दिया। उन्हें एक स्वतंत्र कैटेगरी के रूप में भी मान्यता मिलनी शुरू हुई। प्रमुख दलित लेखिकाओं में मराठी की बेबी कांबले, कुमुद पावड़े, ज्योति लांजेवार, प्रज्ञा लोखंडे तथा सुलभा पटोले; तेलुगु की चल्लापल्ली स्वरूपारानी, दारिशे शशि निर्मला, जाजुला गौरी, विनोदिनी, विजयश्री; तमिल की बामा, पी. शिवकामी, सुगिर्त रानी; गुजराती की ऊषा मकवाणा, प्रियंका कल्पित, दक्षा दामोदरा; बांग्ला की मंजूबाला, कल्याणी ठाकुर, सुषमा मैत्रा सरकार, सुजाता विस्वास; उड़िया की अंजूबला जेना, स्मृतिप्रभा जेना; हिंदी की सुशीला टाकभौरे, कुसुम मेघवाल, विमल थोरात, रजनी तिलक, रजतरानी मीनू, अनिता भारती आदि ने पितृसत्तात्मक जातिवादी समाज का अछूता सच उजागर किया है।"1

उल्लेखनीय है कि दलित स्त्रीवादी आलोचना दलित पुरुष लेखन की इस प्रवृत्ति को पितृसत्ता की चरम स्थिति मानती है और इसे अपने लिए ‘दुहरा शोषण’, ‘दोहरे अभिशाप’ के रूप में स्वीकार करते हुए अपने अनुभव को साहित्य विमर्श के केंद्र में स्थापित करने हेतु संघर्ष करती हैं। इससे विमर्श के भीतर एक नया विमर्श पैदा हुआ है। स्त्री सरोकारों के लिए निरंतर सक्रिय रहने वाली ख्यात प्राप्त रचनाकार प्रोफेसर निर्मला जैन ने स्त्री की हैसियत और स्त्री पात्रों के चित्रण में दलित चिंतकों के इस रवैया पर कड़ा ऐतराज किया था और दलितों में इस दलित वर्ग के बारे में अलग से ध्यान दिए जाने की वकालत की थी - "दलित साहित्य और आलोचना में एक दिक्कत तलब बात स्त्रियों की हैसियत को लेकर भी है। दोहरे शोषण की शिकार-सवर्णों के हाथों और अपने ही वर्ण के पुरुषों के हाथों। स्त्री पात्रों के बारे में दलित चिन्तकों का रवैया पर्याप्त विवादास्पद है। इस समुदाय की स्त्रियाँ पितृसत्तात्मक समाज के मेहनतकश/श्रमिक वर्ग में आती है। श्रम वे करती है और कमाई पर अधिकार शराबी, जुआरी, नशेडी पुरुष का होता है। इसके अलावा परिवार में उसकी भूमिका के बारे में इस वर्ग का सोच सवर्णों से अलग नहीं है। दलितों में इस 'दलित' वर्ग के बारे में अलग से ध्यान दिया जाना बहुत जरूरी है।”2

वरिष्ठ दलित चिंतक मोहनदास नैमिसराय ने दलित साहित्य के इस अंतर्कलह को आत्मसात करते हुए ‘दोनों गालों पर थप्पड़’ शीर्षक लेख में दलित महिलाओं के दोहरे शोषण और दुहरे संघर्ष को उजागर किया है - “दलित समाज जहां एक ओर अपने अंदर एक मध्य वर्ग के उदय से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहा है वहीं उसे दलित आंदोलन के भीतर एक और आंदोलन की आहटें भी सुनाई पड़ रही है। यह है दलित महिलाओं का आंदोलन जो समग्र महिला समुदाय के मुक्ति आंदोलन का हिस्सा होने के साथ-साथ दलित समाज में पितृसत्ता का प्रश्न उठाता है। दलित महिलाओं की त्रासदी यह है कि उन्हें एक गाल पर ब्राह्मणवाद तो दूसरे गाल पर पितृसत्ता का थप्पड़ खाना पड़ता है। साहित्य, इतिहास, राजनीति और समाजशास्त्रीय स्रोतों को खंगालने से दलित महिलाओं के संदर्भ में मुक्तिकामी भीमस्मृति और दासता की प्रतीक मनुस्मृति के सह अस्तित्व के तथ्य सामने आ सकते हैं।"3

पितृसत्ता का अर्थ और स्वरूप :

विभिन्न समाजशास्त्रीय सिद्धांतों द्वारा पितृसत्ता शब्द का प्रयोग सामाजिक संबंधों, मूल्यों, मानदंडों और व्यवहार प्रतिमानों की प्रणाली विशेष के वर्णन के लिए किया जाता है जो मुख्य रूप से पुरुष सत्ता में ‘पुरुषत्व’ की अवधारणा को सामने लाता है। इसे "सामाजिक संरचना और क्रियाओं की एक ऐसी व्यवस्थाओं के रूप में परिभाषित किया जाता है जिनमें पुरुषों का स्त्रियों पर वर्चस्व रहता है और वह उनका शोषण और उत्पीड़न करते हैं।"4

वस्तुत भारतीय सामाजिक संरचना में पितृसत्ता एक मजबूत व्यवस्था के रूप में जाति धर्म और अर्थव्यवस्था के साथ गहराई से जुड़ी हुई है। एक अखंड ढांचे के रूप में यह हमारे परिवार, संस्थाओं, संस्कृति, यहाँ तक कि भाषा में भी समाई हुई है। स्त्री पुरुषों के संबंधों में शक्ति संतुलन का केंद्र यहाँ पुरुष ही है। इसलिए स्त्री के अस्तित्व और अस्मिता का निर्धारण भी यहाँ पुरुष ही करता है -

“पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने
रक्षन्ती स्थाविरे पुत्र:, न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति ।।”5

उल्लेखनीय है कि मनु की इस व्यवस्था परक सोच जिसने पितृ सत्तात्मक संस्कृति को जन्म और बढ़ावा दिया है के विरुद्ध प्रतिरोध की अनेक धाराएँ सामने आई हैं। दलित स्त्रीवाद की धारा इन सभी में महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि ब्राह्मणवाद के तथाकथित मूल्य नैतिकता और विचार मूलतः पितृसत्तात्मक व्यवस्था और ब्राह्मण व्यवस्था पर टिकी हुई है, दलित चिंतन ने इसे चुनौती दिया है। लेकिन जाति और पितृसत्ता दोनों से एक समान उत्पीड़न के दंश दलित स्त्री को ही मिली है। इसलिए पितृसत्ता को सबसे बड़ी चुनौती दलित स्त्रीवाद ने दी है।

दलित स्त्रीवाद: सैद्धांतिकी एवं साहित्यिक अभिव्यक्ति :

‘दलित स्त्रीवाद’ हिंदी दलित आलोचना में प्रतिरोध की वह क्रांतिकारी धारा है जो स्त्री शोषण के लिए जिम्मेदार पितृसत्तावादी मानसिकता – जाति, लिंग और वर्ग पर आधारित सभी प्रकार के दमन को चुनौती देता है और भारतीय सामाजिक संरचना में महिलाओं के दमन के सबसे गहरे स्तर को सामने लाता है। दलित स्त्रीवाद का मूल तर्क यह है कि दलित महिलाओं के अनुभव दलित पुरुषों और उच्च जाति की महिलाओं दोनों से भिन्न होने से उनके अनुभवों की अभिव्यक्ति भी भिन्न है। इसलिए उनकी अभिव्यक्ति न तो मुख्य धारा के स्त्रीवादी आलोचना में जो मुख्यतः लिंग पर केंद्रित है, में समाहित हो सकती है और न दलित आंदोलन जो मुख्य रूप से जाति पर केंद्रित है, में समाहित हो सकती है। यही कारण है कि दलित स्त्रीवादी आलोचना दृष्टि जाति व्यवस्था के माध्यम से पितृसत्ता की व्यवस्था को बनाए रखने वाली ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के साथ-साथ दलित समुदाय के भीतर मौजूद पितृसत्ता, जहां दलित पुरुषों द्वारा महिलाओं के खिलाफ पितृसत्तात्मक व्यवहार किया जाता है, दोनों का एक साथ विरोध करती है। सवर्ण पुरुषों और सवर्ण पितृसत्ता द्वारा अपने ऊपर हुए शोषण को दलित स्त्रीवादी आलोचना जातिगत शोषण के रूप में परिभाषित करती है। वहीं दलित पुरुषों और सामान्य पितृसत्तात्मक संरचना को वह लैंगिक परिभाषा के दायरे में परिभाषित करती है।

उल्लेखनीय है कि दलित महिलाओं को सवर्ण और दलित पुरुषों के साथ-साथ कभी-कभी सवर्ण महिलाओं से भी जाति और लिंग के आधार पर शोषण और हिंसा का सामना करना पड़ता है। सवर्ण नारीवादी आलोचना में दलित महिलाओं के इन जातिगत अनुभवों और उनके मुद्दों को नजर अंदाज कर दिया गया है। इन लैंगिक प्रश्नों के नींव में दलित महिलाओं का दोहरा हाशिए पर होने का भाव निहित है। पुरुष दलित लेखकों ने जाति उत्पीड़न की शक्तिशाली आलोचनाएं विकसित करते हुए भी अक्सर पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण बनाए रखा है। दूसरी तरफ मुख्य धारा के नारीवादी आंदोलन ने मुख्य रूप से उन मुद्दों पर ही ध्यान केंद्रित किया है जो उच्च जाति की महिलाओं को प्रभावित करते हैं। दलित स्त्रीवादी आलोचना ने इस बहिष्कार को व्यवस्थित रूप से चुनौती दी है और महिलाओं के मुद्दों में क्या शामिल हो, इस पर व्यापक पुनर्विचार करने के लिए बाध्य किया है। दलित स्त्रीवाद ने मुखर रूप से इस धारणा को ही चुनौती दी है कि ‘सभी महिलाओं के दुख एक समान होते हैं। दलित लेखिकाएं कहती हैं कि हमारी पीड़ा की भाषा अलग है क्योंकि हम सिर्फ महिला नहीं बल्कि दलित महिला हैं।

क्या स्त्रीवाद से पृथक दलित स्त्रीवाद की अवधारणा विकसित हो रही है? अरुण कुमार प्रियम के इस प्रश्न के उत्तर में दलित स्त्रीवाद की सशक्त प्रवक्ता, प्रख्यात दलित लेखिका रजनी तिलक कहती हैं - "स्त्रीवाद से अलग दलित स्त्रीवाद विकसित हो रहा है। दलित स्त्रीवाद अफ्रीकन-अमेरिकन व्हाइट-फेमिनिज्म के समांनातर ब्लैक-फैमिनिज्म की तरह उच्च वर्गीय सवर्ण स्त्रीवाद के बरक्स भारत में अपनी जड़ें जमा रहा है।"6

‘स्त्रीकाल’ के स्त्रीवाद और दलित स्त्रीवाद स्तंभ में ही ‘रजनी तिलक का स्त्री चिंतन: जाति, लिंग, पितृसत्ता और यौनिकता के प्रश्न’ शीर्षक आलेख में डॉ. अरूण प्रियम एवं रजनी तिलक के साक्षात्कार के अंश के उद्धरण एवं निष्कर्ष से स्त्रीवादी चिंतन के विस्तृत फलक को बखूबी समझा जा सकता है। रजनी जी कहती हैं, “दलित स्त्रीवाद पितृसत्ता और जाति के ढाँचागत शोषण के विरूद्ध अपनी आवाज उठाता है और विवाह संस्था में लोकतांत्रिकता चाहता है। दलित स्त्रीवाद, राज्य-समाज और परिवार में पितृसत्तात्मक सत्ता की जकड़न से मुक्ति चाहता है और सभी संस्थाओं में ढाँचागत लोकशाही एवं व्यावहारिक बराबरी चाहता है। घरेलू कामों, श्रमाधिरत कार्यों के लिए सम्मान एवं सम्मानजनक वेतनमान चाहता हैं। दलित स्त्रीवाद पितृसत्ता के बहुस्तरीय शोषण और लिंग-विभेद के विभिन्न रूपों से घर, कार्यस्थल, वर्ण आधारित समाज, सड़कों और ब्राह्मणवादी राज्यसत्ता के विभिन्न फलकों पर संघर्षरत हैं।”7

दलित स्त्रीवाद और गैर दलित स्त्रीवाद में मुख्य अंतर को प्रखर दलित स्त्रीवादी आलोचक अनिता भारती के इस कथन से और अधिक बल मिलता है- "दलित और गैर-दलित स्त्रीवाद में बहुत फर्क है। दलित स्त्रीवाद बुद्ध, जोतीराव फुले, सावित्रीबाई फुले और डॉ. आंबेडकर तथा अन्य समाज सुधारकों, जिन्होंने जातिगत असमानता तथा अन्य किसी भी तरह की असमानता और शोषण, अन्याय के खिलाफ समानता, समता और सामाजिक न्याय के लड़ाई लड़ी, उनको अपना आदर्श मानता है। दलित स्त्रीवाद ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के खिलाफ है, जबकि गैर-दलित स्त्रीवाद पितृसत्ता के खिलाफ है। दलित स्त्रीवाद की अगुआ स्वयं दलित स्त्रियां, दलित सामाजिक कार्यकर्ता व लेखिकाएं हैं। दलित स्त्रीवाद का वैचारिक स्तंभ आंबेडकरवाद है तथा इसका उद्देश्य अपने ही विचारधारात्मक साथियों के साथ मिलकर जातिविहीन समानता आधारित समाज की रचना करना है। दलित स्त्रीवाद, स्त्रियों के साथ होने वाले घरेलू हिंसा के साथ-साथ सामाजिक हिंसा के खिलाफ़ मुखर रूप से आवाज उठाता है, जबकि सवर्ण स्त्रीवाद का स्वर घरेलू हिंसा पर अधिक मुखर है। दलित स्त्रीवाद भारतीय संविधान, उसकी लोकतांत्रिक अवधारणा, लोकतांत्रिक समाज, लोकतांत्रिक परिवार को महत्व देता है। दलित स्त्रीवाद परिवार में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास करता है, जिसमें बच्चों व घरेलू काम व अन्य उत्तरदायित्व के साथ स्त्री-पुरुष दोनों का सम्पत्ति पर समान अधिकार व कर्तव्य निश्चित हो। दलित स्त्रीवाद धर्म, वर्ग व जाति रहित समाज की रचना के साथ दलित स्त्री की मुक्ति को अकेले की मुक्ति न मानकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक रुप से सामूहिक मुक्ति के रूप में देखता है।"8

अनिता भारती स्पष्ट कहती हैं कि दलित स्त्रीवाद को सवर्ण वर्चस्व के स्त्रीवाद से अलग समझने की जरूरत है। वस्तुत दलित स्त्रीवाद का यह आंदोलन जहां एक तरफ पितृसत्तात्मक समाज में पल रहे स्त्री संबंधी पूर्वाग्रहों के खिलाफ है वहीं दूसरी तरफ मुख्य धारा के स्त्रीवाद के विरोध में भी है। इसलिए पितृसत्ता से चुनौती के लिए दलित स्त्रीवादी लेखन का सम्यक मूल्यांकन बेहद जरूरी है। इस दिशा में आलोचक बजरंग बिहारी तिवारी का यह मूल्यांकन उल्लेखनीय है। बजरंग बिहारी ने दलित स्त्रीवाद को ‘डॉ अंबेडकर की पुनर्प्राप्ति का आंदोलन’ मानते हुए दलित स्त्रीवादी लेखन को आंदोलनधर्मी लेखन कहा है और दलित स्त्रीवाद के साहित्यिक महत्व का प्रतिपादन करते हुए लिखा है – “सुनने में अटपटा भले लगे, पर दलित स्त्रीवाद का आगमन कुछ अवधारणाओं के अंत की सूचना देता है। इस कथन को नरम और ग्राह्य बनाने के लिए ऐसे भी कहा जा सकता है कि दलित स्त्रीवाद उन अवधारणाओं के वर्तमान स्वरूप की समाप्ति का सूचक है। ये अवधारणाएं हैं दलितवाद और स्त्रीवाद। अब अगर स्त्रीवाद और दलितवाद को प्रासंगिक बने रहना है, तो उन्हें दलित स्त्रीवाद की वैचारिकी को स्वीकार कर उसके अनुरूप ढलना होगा। विषमता-पीड़ित दुनिया के लिए जो महत्त्व कम्युनिस्ट घोषणापत्र का है, कम से कम भारत के लिए कुछ वैसा ही महत्त्व दलित स्त्रीवाद का है। सूक्ष्म भाषिक अभिव्यक्तियों से लेकर स्थूल जीवन व्यवहार में हिंसा की जैसी व्याप्ति इस समाज में है उसकी माकूल चिकित्सा दलित स्त्रीवाद के पास है।"9 दलित स्त्रीवाद के साहित्यिक महत्व का प्रतिपादन करते हुए बजरंग बिहारी तिवारी लिखते हैं – “इतिहास के परिप्रेक्ष्य में यह विचित्र किंतु सुखद संयोग है कि जिस वर्ष 1848 में कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो आया उसी वर्ष महात्मा जोतीराव फुले ने प्रथम स्त्री विद्यालय खोला। स्त्री शिक्षा के इस प्रयास पर जिस तरह से हमले हुए, जितने सामाजिक कोनों से हमले हुए उससे वर्चस्व की प्रकृति और पकड़ का अनुमान किया जा सकता है। अपने उदय के साथ दलित स्त्रीवाद ने कुछ मिथकों को ध्वस्त किया है। ध्वस्त हुए मिथक मुख्यतः तीन वर्गों में रखे जा सकते हैं। एक, सभी स्त्रियों के दुख एक जैसे होते हैं। दो, सभी दलितों की पीड़ा एक-सी होती है। तीन, घर से बाहर निकलना, कामकाजी होना सशक्तीकरण का एकमात्र तरीका है। 'सामान्य' स्त्रीवादियों में जाति और वर्ग बोध की जैसी जकड़बंदी है उसका ठीक से खुलासा मुश्किल था, अगर दलित स्त्रियों ने अपनी आवाज बुलंद न की होती। दलितवाद समता के अपने दावे में पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रहों और मूल्यों को किस तरह संजोए हुए है इसका प्रत्यक्षीकरण कठिन था। अगर आंदोलन में दलित स्त्री की भागीदारी न हुई होती। दलित स्त्रियां तो पहले से घर से बाहर जाकर काम करती रही हैं, फिर भी उनकी हालत बदतर बनी रही है। इससे कुलीन विचारकों की यह मान्यता संदिग्ध हो जाती है कि घर से बाहर निकलना और काम करना बेहतर जीवन की अनिवार्य पूर्वशर्त है।"10

वस्तुतः दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी एक समावेशी, संघर्षशील और अनुभव आधारित विमर्श है जो भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े अर्थात हाशिए पर खड़े दलित स्त्रियों की आवाज को केंद्र में लाती है। यह न केवल सवर्ण पितृसत्ता की मानसिकता को चुनौती देती है, बल्कि जाति आधारित स्त्री दमन की संरचना को भी चुनौती देती है। दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी की नींव मुख्य रूप से तीन आलोचनाओं पर टिकी हुई है -

1. मुख्यधारा के भारतीय स्त्रीवाद की आलोचना
2. दलित आंदोलन की आलोचना
3. ब्राह्मणवादी पितृसत्ता अवधारणा की आलोचना

उल्लेखनीय है कि दलित स्त्री की दोहरी परतों में बंधी पीड़ा, एक ओर जाति का दमन तो दूसरी ओर पितृसत्ता का उत्पीड़न हमारी लेखिकाओं को काफी उद्वेलित किया है। यही कारण है कि सामंती ब्राह्मणवादी संरचनात्मक मूल्यों के विरोध के साथ-साथ दलित समाज के भीतर व्याप्त पितृसत्तावादी मानसिकता पर प्रहार स्त्रीवादी आलोचना में हर लेखिकाओं ने किया है। इस दृष्टि से डॉ. रजनी दिसोदिया की ‘साहित्य और समाज कुछ बदलते सवाल’, डॉ. हेमलता महिश्वर का ‘स्त्री लेखन और समय का सरोकार’ तथा ‘समकालीन साहित्य और विमर्श’, ‘डॉ. रजत रानी ‘मीनू’ की ‘भारतीय साहित्य में दलित स्त्री और जाति स्त्री और साहित्य’, डॉ. रजनी अनुरागी का ‘वर्जनाओं के पार खिलता फूल’, नवोदित प्रतिभा सुजाता का ‘आलोचना का स्त्री पक्ष’, पूनम तुषामड़ का ‘जातिवादी समाज और पितृसत्ता की जड़ों की पड़ताल करती वैचारिकी’ के साथ-साथ अनेक सृजनधर्मी प्रतिभा, दलित स्त्रीवादी दृष्टि के साथ हिंदी दलित स्त्री आलोचना को समृद्ध कर रही है, जिससे दलित स्त्रीवादी आलोचना का वैचारिक फलक विस्तृत हुआ है।

इन अवधारणाओं के विकास में प्रखर दलित स्त्रीवादी आलोचकों उमा गुरु, गोपाल गुरु एवं शर्मिला रेगे की भूमिका भी काफी महत्त्वपूर्ण रही है। दलित स्त्रीवाद के सैद्धांतिकी गढ़ने में ये आलोचक बेहद महत्त्वपूर्ण रहे हैं।

दलित स्त्रीवाद की औपचारिक अभिव्यक्ति एक आंदोलन के रूप में 1980 के दशक के उत्तरार्ध में गति पकड़ती है। यद्यपि कि इनका वैचारिक आधार अंबेडकरवादी दर्शन और फुले दंपति का समाज सुधार आंदोलन है। इस अवधि में दलित महिलाओं के अनुभवों की सैद्धांतिक आत्म अभिव्यक्ति दलित महिलाओं के महत्त्वपूर्ण आत्मकथाओं के प्रकाशन के माध्यम से सामने आती है। बेबी कांबले की ‘द प्रीजन्स वी ब्रोक’ (मूल मराठी 1986), बामा की ‘करुक्कु’ (1992) उर्मिला पंवार की ‘द वीव ऑफ माय लाइफ’(2008) ने दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिक अंतर्दृष्टि विकसित की है। हिंदी में दलित स्त्रीवाद पर कुछ गंभीर और महत्त्वपूर्ण लेख और पुस्तकें सामने आई हैं, पर दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी और अवधारणा पर गंभीर और समग्रता के साथ अभी तक कोई सार्थक बहस या उल्लेखनीय रचना दृष्टिगोचर नहीं हुआ है। प्रखर स्त्रीवादी चिंतक उमा गुरु, गोपाल गुरु, शर्मिला रेगे के साथ-साथ वीणा मजूमदार, उमा चक्रवर्ती, निवेदिता मेनन, मीनाक्षी मून एवं बजरंग बिहारी तिवारी जैसे स्त्रीवादी आलोचकों के महत्त्वपूर्ण लेखों ने दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी की समझ विकसित की है।

समकालीन साहित्य में दलित स्त्रीवाद के सैद्धांतिकी का बहुत कुछ लेखन, जिसमें दलित स्त्रीवाद की संपूर्ण विशेषताएं और पितृसत्ता और शोषण के सभी रूप मौजूद है, चर्चित स्त्रीवादी लेखिका अनिता भारती के लेखन में आकार ग्रहण कर पाया है। ‘समकालीन नारीवाद और दलित स्त्री का प्रतिरोध’ अनिता जी की बहुचर्चित एवं उल्लेखनीय रचना है। दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी निर्मित करने की दिशा में हिंदी की यह पहली किताब मानी जाती है। अनिता जी के साथ- साथ दलित स्त्रीवादी विमर्श को एक सैद्धांतिक विमर्श की ओर ले जाने में विमल थोरात, सुशीला टाकभौरे, हेमलता महिश्वर, रजनी तिलक, पूनम तुषामड़, रजनी अनुरागी, कौशल पवार, रजनी दिसोदिया, पुष्पा विवेक आदि समकालीन स्त्रीवादी लेखिकाएं अपने रचनात्मक लेखन और चिंतनपरक लेखों में दृढ़ता के साथ अस्मितावादी विमर्श में पितृसत्ता की विकृतियों को उजागर कर रही हैं और जातीय तथा लिङ्गीय उत्पीड़न के खिलाफ विद्रोह करती हुई दलित स्त्रीवाद के वैचारिक हस्तक्षेप को स्थापित करने का सार्थक प्रयास कर रही हैं।

चर्चित लेखिका विमल थोरात द्वारा संपादित ‘स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण’ पुस्तक में समाज और पितृसत्तात्मक की जड़ों की पड़ताल की गई है। “आखिर इस नैतिकता की परिधि क्या है? नैतिकता के बंधन का तालिबानी फतवा सिर्फ औरतों के लिए ही क्यों? नैतिकता सिर्फ विवाह और सैक्स के लिए ही क्यों? दिन-रात खटती स्त्री के श्रम के लिए नैतिकता क्यों नहीं? बच्चों के पालने पोसने में नैतिकता कहाँ कुएँ में पानी भरने चली जाती है? पुरुषों द्वारा तैयार की गई नैतिकता पर मात्र स्त्रियों के लिए बंधना, मर्यादा, बस इसलिए कि पुरुषों को 'जूठन' पसंद नहीं, फिर पुरुष चाहे जहाँ मुंह मारे पर सारे बंधन सिर्फ दलित स्त्री के लिए। नैतिकता के तालिबानीकरण का फरमान पुरुषों के लिए क्यों नहीं?”11

साहित्यिक और शैक्षणिक संस्थानों से आगे बढ़कर समकालीन दलित स्त्रीवाद सामाजिक मुद्दों की एक विस्तृत शृंखला से जुड़कर विकास की ओर अग्रसर है। 1995 में स्थापित ‘नेशनल फेडरेशन आफ दलित वूमेन’ जैसे संगठनों ने इन दृष्टिकोणों को विकसित करने के लिए संस्थागत स्थान प्रदान किए हैं। ठीक उसी तरह ‘अखिल भारतीय दलित महिला अधिकार मंच’ जैसे संगठनों ने जातिगत आयाम के परिप्रेक्ष्य में महिलाओं के खिलाफ हर तरह के हिंसा को रोकने के लिए नए दृष्टिकोण से नई सैद्धांतिक ढांचा का विकास किया है जो सामाजिक न्याय के लिए प्रभावी सिद्ध हुआ है। ‘दलित स्त्रीवाद पर बहस’ शीर्षक आलेख में अनिता भारती ने ठीक ही कहा है – “पिछले कुछ वर्षों से दलित स्त्रीवाद के मुद्दे और प्रश्न अब धीरे-धीरे अपनी स्थिरता, स्पष्टता और स्पष्ट रूप में हमारे सामने आ रहे हैं। अब दलित स्त्रीवाद को लेकर बहस करने वालों में, उनका एक दर्शन और सांस्कृतिक रूप से सैद्धांतिक स्वागत के स्वर भी शामिल हैं। दलित स्त्रीवाद के पक्ष में, उनकी सैद्धांतिकी पर पिछले कुछ वर्षों में कुछ चिंतकों द्वारा विशेष रूप से काम किया गया है। जिनमें प्रखर स्त्रीवादी चिंतक उमा गुरु, गोपाल गुरु, शर्मिला रेगे के नाम उल्लेखनीय हैं। इस धारा के लेखन और उसके अधिकार के पक्ष में खड़े साथियों ने भी दलित नारीवाद को स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।”12

स्पष्ट है कि दलित लेखन का नया दौर परिवर्तनकामी चिंतकों को आश्वस्त करते हुए भविष्य के लिए चल रहे संघर्ष में साझेदारी के आह्वान के साथ तेजी से विकास की और गतिशील हो रही है।

निष्कर्ष : शोध आलेख में समाहित ‘पितृसत्ता का सवाल और दलित स्त्रीवाद का मुद्दा’, दलित साहित्य विमर्श के भीतर एक और विमर्श की अवधारणा को सामने लाया है। दलित साहित्य का अस्तित्व ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के विरोध में है। अध्ययन से यह बात सामने आई है कि वह ब्राह्मणीसत्ता - ब्राह्मणवाद का विरोध तो करता है, लेकिन अपने ही समाज के भीतर मौजूद पितृसत्ता और महिलाओं पर होने वाले लैंगिक अत्याचार पर चुप्पी साध लेता है। दलित स्त्रीवादी लेखिकाएं, पुरुष लेखकों की इस प्रवृत्ति को पितृसत्ता की चरम स्थिति मानती हैं और इसे अपने लिए 'दुहरा शोषण' और 'दोहरा अभिशाप' मानती हुई ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के साथ-साथ दलित पितृसत्ता को भी चुनौती देती है। इस क्रम में वह मुख्यधारा की स्त्रीवादी आलोचना से खुद को अलग करती हुई दलित स्त्रीवाद को समझने के लिए स्त्रीवादी सैद्धांतिकी विमर्श को सामने लाती है। आलेख में दलित आलोचना के इस महत्त्वपूर्ण स्वरूप को भी स्पष्ट किया गया है।

दलित स्त्रीवादी आलोचना के विकास ने पद्धतिगत नवाचारों को भी जन्म दिया है। आलोचनात्मक दृष्टिकोण जाति और लिंग दोनों को एक दूसरे से अलग किए बिना कैसे समझ सकते हैं? हाशिए पर पड़े विभिन्न रूपों से उभरने वाले साहित्य को समझने के लिए कौन से नए विश्लेषणात्मक उपकरणों की आवश्यकता है? इन सवालों ने दलित आलोचना को और अधिक परिष्कृत सैद्धांतिक रूपरेखा विकसित करने के लिए प्रेरित किया है।

संदर्भ :
1. बजरंग बिहारी तिवारी: ‘भारत के दलित लेखन का मौजू‌दा परिदृश्य’ (लेख) नयापथ के अप्रेल जून, 2009
2. हरिनारायण (सं): दलित प्रसंग: विमर्श और साहित्य, कथादेश, अक्टूबर-2005, पृष्ठ-33-34
3. अभय कुमार दुबे (सं०) आधुनिकता के आईने में दलित, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2009 पृष्ठ - 230
4. साधना आर्य, निवेदिता मैनन (सं०) नारीवादी राजनीति: संघर्ष और मुद्दे, हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली वि०वि०, पृष्ठ-01
5. मनुस्मृति - अथ नवमो अध्याय, श्लोक 9.3 पृष्ठ - 486
6. स्त्रीकाल: रजनी तिलक से अरुण कुमार प्रियम की बातचीत का अंश, 6 अप्रैल, 2018
7. स्त्रीकाल: रजनी तिलक से अरुण कुमार प्रियम की बातचीत का अंश, 6 अप्रैल, 2018
8. फॉरवर्ड प्रेस: अनिता भारती से डॉ० कार्तिक चौधरी की बातचीत का अंश, सितम्बर 30, 2021
9. दैनिक जनसत्ता, मई 29, 2016
10. दैनिक जनसत्ता, मई 29, 2016
11. रमणिका गुप्ता, विमल थोरात(सं) स्त्री नैतिकता का तालिबानीकरण, नवचेतन प्रकाशन, दिल्ली, 2009, कवर पृष्ठ
12. सब-रंग इंडिया, 11 दिसम्बर, 2015

भगवान साहु - सह आचार्य, हिन्दी,
डॉ. भीमराव अंबेडकर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, निंबाहेडा (राजस्थान) )312601
9413047586

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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