संस्मरण : मेरी पहली बेटिकट यात्रा / दिव्या विजय

मेरी पहली बेटिकट यात्रा
- दिव्या विजय

नवंबर २०२५ में संगमन में शिरकत करने का अवसर मिला और उसी बहाने शांति निकेतन जाना हुआ। साथी लेखकों के साथ सुंदर, स्वप्निल दो दिन बिताकर अब लौटने का समय आ गया था। शांति निकेतन की मिट्टी में इतिहास और कला इस तरह घुले-मिले हैं कि मैं ही क्या कला से वास्ता रखने वाला कोई भी व्यक्ति वहाँ से इतनी जल्दी लौटना नहीं चाहेगा। जहाँ अतीत अब भी अपनी धीमी, गरिमामयी चाल से चलता हो, वहाँ ठहर कर कौन उस समय की इबारत नहीं पढ़ना चाहेगा? पर औचक किसी जगह ठहर जाना सबके लिए संभव नहीं होता इसलिए लौटने का कार्यक्रम पहले से ठीक था। वहाँ की मीठी ठंड में आख़िरी सुबह थी और सारी पैकिंग हो चुकी थी। अलस-सुबह साइकिल पर सवार औरतों को देखते हुए, गत दो दिनों की स्मृतियों को समेटते हुए, मैं सामान गाड़ी में रख चुकी थी। अल्पकालिक निवास को, जहाँ पता नहीं फिर कभी लौटना हो न हो, विदा कहा और कार्यक्रम-स्थल पर पहुँच गई।

चंदन पांडेय जी से बात करके तय हुआ था कि बोलपुर स्टेशन से बारह बजे छूटने वाली ‘कुलिक एक्सप्रेस’ में सीट पक्की करवा ली जाए जिससे समय से कोलकाता एयरपोर्ट पहुँच कर जयपुर की फ़्लाइट ली जा सके। ट्रेन में सीट मिल गई थी। आलोक ने भी उसी ट्रेन में रिज़र्वेशन करवा लिया था कि ‘एक से भले दो।’ अगले तीन घंटे तक हम कहानियों को घड़ी की तरह बरतने वाले थे। हम उत्साहित थे कि लौटते में शांति निकेतन में प्राप्त हुए अनुभवों पर चर्चा करेंगे। चंदन जी और प्रियंवद जी ने हमें वक़्त से रवाना कर दिया कि ट्रेन न छूटने पाए। हालाँकि एक-दो वक्ताओं को सुनना बाकी रह गया था और इसका मलाल भी बहुत था किंतु यात्राओं का समय और नियति दोनों तय होते हैं। यात्राएँ प्रायः हमारे मन से नहीं, अपनी हड़बड़ी से चलती हैं। रास्ते में एक जगह रुक कर गुड़ के रसगुल्ले खाने के पश्चात हम शांति निकेतन को आँखों में भरते हुए, समय से स्टेशन पहुँच गये।

बोलपुर स्टेशन, प्लेटफ़ॉर्म नंबर दो। सुबह वाली मीठी ठंड को दोपहर की धूप निगल चुकी थी। छाँव की तलाश में सामान घसीटते हुए हम आगे बढ़े जा रहे थे। गर्मी और प्यास से बेहाल मैं पानी खोज रही थी पर पानी की दुकान तो मुख्य प्लेटफार्म पर रह गई थी। हम सोच ही रहे थे कि दोनों में कोई एक जाकर पानी ले आए कि कहीं से एक तीखी आवाज़ आयी ‘कुलिक एक्सप्रेस’ लेट है। सुनते ही मेरे कान खड़े हो गए। उस एक सूचना ने मेरे दिन को मुट्ठी में भर लिया। फ़्लाइट, जयपुर और वहाँ पहुँचकर किए जाने वाले काम एक साथ आँखों के आगे घूम गए। कोई और मौक़ा होता तो फ़्लाइट छूटने पर मुझे ख़ुशी होती कि निर्धारित यात्राओं में फेरबदल का रोमांच बेजोड़ होता है पर इस बार भारत में गिनती के दिन थे और किए जाने वाले कामों का एक पहाड़ सामने खड़ा था।

मैंने आलोक को देखा। उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था। उनकी फ़्लाइट मेरी फ़्लाइट के बाद थी। उनकी जगह मैं होती तो मेरी प्रतिक्रिया भी यही होती। मनुष्य की चिंताओं की चौहद्दी अमूमन वहीं तक होती है, जहाँ तक उसके स्वयं के जीवन पर असर पड़ता हो। आलोक फ़ोन में डूबे थे और मैं अपने भय में, हम दोनों के मन अलग-अलग प्लेटफार्म पर खड़े थे। मैंने तुरंत फ़ोन निकाला और पुष्टि की कि क्या ट्रेन वाक़ई देर से चल रही है। ट्रेन मात्र पंद्रह मिनट विलंब से चल रही थी किंतु मनुष्य का स्वभाव होता है कि नियोजित से कुछ अलग घटते ही अपनी कल्पना में घटनाओं के नकारात्मक चरम तक पहुँच जाता है।

मैं चिंता में पड़ गई कि फ़िलहाल पंद्रह मिनट विलंब से चलती ट्रेन और भी लेट हो सकती है। ऐसा होना नामुमकिन भी नहीं। हालाँकि कई दफ़ा देर से चलती ट्रेन गति बढ़ाकर समय से पहुँच जाती है किंतु भय तर्कों को काट देता है। मैंने ऊपर लिखे सिद्धांत का अनुसरण करते हुए पहला विकल्प चुना। मैं मान चुकी थी कि ट्रेन अपने निर्धारित समय से बहुत पीछे है और जिस विमान में मुझे बैठना है वह मुझे लिये बग़ैर ही उड़ जाने वाला है।

तो क्या किया जाए? क्या टैक्सी बुक करवा कर एयरपोर्ट चला जाये? तब तक आलोक मेरी परेशानी और उसका सबब दोनों जान चुके थे। टैक्सी वाले विचार पर वे मुझे ऐसी दृष्टि से देख रहे थे जैसे मैं अपने होश में नहीं हूँ। इसीलिए सिर्फ़ पंद्रह मिनट विलंब से चलने वाली ट्रेन में रिज़र्व्ड सीट छोड़कर टैक्सी लेने का सोच रही हूँ।

“यह बताओ अभी टैक्सी कहाँ मिलेगी? मिल भी गई तो ट्रेन से ज़्यादा समय लेगी।”

वे मुझे समझा रहे थे कि ट्रेन अगर आधा घंटा देरी से भी आती है तब भी मैं आराम से फ़्लाइट पकड़ सकती हूँ। इतना अंतराल है। यह मालूम तो मुझे भी था किंतु अगर ट्रेन और लेट हुई तो। जो नहीं हुआ था, उसके हो सकने के अंदेशे ने मुझे जकड़ लिया था। मैं आलोक को समझाईश दे रही थी कि इसे बेवक़ूफ़ी नहीं, ‘सेफ़ साइड’ पर होना कहते हैं। हमारा विचार-विमर्श अपने उठान पर था कि पूरी गरिमा और भव्यता के साथ आकर ‘शताब्दी’ रुकी। यह रेल मेरी स्मृतियों में न सिर्फ़ सबसे बेहतरीन रेल की तरह बल्कि सबसे तीव्र गति की रेल की तरह भी दर्ज है। इस रेल में दर्जनों बार अलवर-जयपुर यात्रा की है। परिचय के साथ एक विश्वास साथ चलता है कि यहाँ विश्वासघात नहीं मिलेगा। यह हमेशा सच नहीं होता पर सामने खड़ी ट्रेन मेरे लिये ‘कम्फर्ट कॉर्नर’ के समान थी, जैसे भीड़ में मिला कोई परिचित।

मैंने आलोक की ओर यूँ देखा ज्यों मेरी परेशानी का समाधान मिल गया। उनके चेहरे पर आश्चर्य आ ठहरा जो तुरंत अविश्वास में बदल गया। चूँकि दोस्ती पुरानी है, सो उन्हें अंदाज़ा लगाने में क्षण भर भी नहीं लगा कि मैं क्या सोच रही हूँ। उन्होंने मेरे सूटकेस का हैंडल पकड़ा और कहा, “नहीं, ऐसा सोचना भी मत। अव्वल तो यह ग़ैर क़ानूनी है और दूसरा पता भी है कि कितना जुर्माना भरना होगा?”

वे मित्र होने का फ़र्ज़ निभा रहे थे और मैं छूट सकने वाली फ़्लाइट के गणित में उलझी थी। हम दोनों कुछ क्षणों तक किंकर्तव्यविमूढ़ हो खड़े रहे। यात्रियों की अफ़रा-तफ़री ने हमारी तंद्रा भंग की। मैंने कहा, “ठीक है। मैं इस ट्रेन में नहीं चढ़ती किंतु अगर फ़्लाइट मिस हुई तो मेरी अगली फ़्लाइट का टिकट आप करवाएँगे।” कहने भर की देर थी उन्होंने अपना सामान मय मेरे सामान के ट्रेन में रख दिया। “मैं फ़्लाइट का टिकट नहीं करवाऊँगा। इसी ट्रेन से चलते हैं।” उनकी गति देखकर मैं हतप्रभ।

“भाई! हमारे पास टिकट नहीं है। ट्रेन में चढ़ जाएँ क्या?” एक पाँव ट्रेन की सीढ़ी पर और एक पाँव ज़मीन पर रखे, आलोक ने सामने खड़े ट्रेन अटेंडेंट से पूछा। “हमारी ट्रेन लेट है, आगे फ़्लाइट छूट जाएगी।”

“हाँ, हाँ क्यों नहीं। आ जाइए।” मेहमाननवाज़ी के-से भाव से अटेंडेंट ने मुस्कुरा कर जवाब दिया।

अब हम दोनों ट्रेन के भीतर थे। कुछ क्षण पहले मुझे फ़्लाइट छूटने की चिंता सता रही थी और अब कुछ क्षण बाद आलोक को अर्थदंड का भय सता रहा था। वे मेरे स्थान पर थे और मैं उनके। उन्होंने कहा, “मैं तुम्हारे साथ आ रहा हूँ लेकिन हम दोनों के जुर्माने की रक़म तुम भरोगी।” मुझे मालूम नहीं था यह रक़म कितनी होगी। आलोक ने जो संख्या बतायी वह ना-क़ाबिल-ए-यक़ीन थी। सचमुच इतना ही जुर्माना हुआ तो फ़्लाइट का छूट जाना ही बेहतर है। “हम दोनों ही फ़ाइन नहीं भरेंगे, ज़रूरत पड़ी तो टिकट के पैसे दे देंगे।” मैंने नक़ली साहस के साथ कहा।

“यह कैसे मुमकिन होगा? क्या टीटी आपके सगे-संबंधी हैं जो वे आप पर फ़ाइन नहीं लगाएँगे?”

उन्हें मेरी बात पर यक़ीन नहीं हुआ। यक़ीन तो मुझे भी नहीं था। बस कहने भर को कह दिया था। इसीलिए मैंने आगे जोड़ा,

“लेकिन फ़ाइन भरना ही पड़ा तो अपना-अपना फ़ाइन भरेंगे।”

कुछ पल वे एकदम चुप। फिर उन्होंने कहा, “उस ट्रेन के टिकट के साथ इस ट्रेन का फ़ाइन भी भरूँ जबकि मेरी फ़्लाइट छूटने का डर भी नहीं, यह कहाँ तक उचित है।” बात उनकी सोलह आने सही थी।

“मैं यहीं उतर रहा हूँ। कुलिक एक्सप्रेस से आता हूँ। आप जाइए इसी ट्रेन से।”

उन्हें शायद लगा हो कि अकेले यह जोखिम उठाने से मैं इंकार कर दूँ पर मैंने अकेले जाने के लिए हामी भर दी। वे क्षण-दो-क्षण पस-ओ-पेश में खड़े रहे कि अपनी मित्र को इस तरह अकेले छोड़ जाना उचित है या नहीं। वे मेरे लिए चिंतित थे पर मैंने उन्हें यक़ीन दिलाया कि मैं सुरक्षित पहुँच जाऊँगी और उन्हें उतर जाने के लिए प्रोत्साहित किया। अंततः वे उतर गये। प्लेटफार्म पर खड़े लोग यह दृश्य देखकर हँसी से सराबोर हो चुके थे। यह बाद में मुझे आलोक ने ही बताया था।

दोनों सूटकेस थामे मैं ट्रेन में थी और हाथ हिलाकर मुझे विदा करते आलोक प्लेटफार्म पर खड़े थे। कुछ देर पहले दो लोग ठहाके लगाते हुए गुड़ के गर्म रसगुल्ले खा रहे थे और आगे की यात्रा की योजना बना रहे थे। अब वही दो लोग एक दिशा में जाते हुए भी दो अलग रेलों के यात्री हो चुके थे। ट्रेन अपनी गति से खिसक रही थी। स्टेशन, शांति निकेतन, वहाँ घटी घटनाएँ, वहाँ बिताया समय सब अतीत का हिस्सा होने वाले थे।

बेटिकट यात्रा करते हुए मैं अब अपराधी की हैसियत रखती थी और अपराधी मुँह छिपाकर एक कोने में पड़े रहते हैं। मुझे याद आया पुरानी फ़िल्मों में बग़ैर टिकट यात्रा करने वाले अक्सर शौचालय की पनाह लेते थे किंतु मैं अटेंडेंट द्वारा बतायी गई ख़ाली सीट पर पसर कर बैठ चुकी थी। तभी मेरा फ़ोन बजा। गुड्डू भैया का फ़ोन था। सारा हाल सुनकर उन्होंने कहा, “चिंता न करो। एक जनरल टिकट ले लेते हैं। तुम्हें आसानी हो जाएगी।” यह बात मेरे दिमाग़ में क्योंकर नहीं आयी। उन्होंने ऑनलाइन चेक किया। उन्होंने एक नहीं, अलग-अलग स्टेशनों से टिकट लेने का प्रयत्न किया पर कहीं कुछ उपलब्ध नहीं था। “देखो, तुम चिंता न करो। कुछ न कुछ प्रबंध हो ही जाएगा।” कहकर उन्होंने फ़ोन रख दिया था। उधर आलोक का मेसेज था कि वे यह प्रयत्न कर चुके हैं किंतु नतीजा सिफ़र।

अब तक दिल ज़रा कच्चा हो चुका था लेकिन दिमाग़ ने सवालों का ज़ख़ीरा खड़ा कर दिया था। सीट पर बैठे-बैठे मेरी पीठ अपराधबोध से झुक गई। क्या यह करतूत किसी ज़िम्मेदार नागरिक को शोभा देती है? पक्ष और विपक्ष दोनों की दलीलें मैं ही दे रही थी। मजबूरी का हवाला देकर मैं ख़ुद को बरी भी करना चाहती थी और सक्षम होते हुए भी जुर्माना देने से बच निकलने की अपनी सुविधा-प्रियता पर शर्मिंदा भी थी। किसी तीसरे की आँख से इसे देखा जाये तो क्या प्रतीत होगा! मौक़ापरस्ती ही न? फिर मन ने दूसरी ओर से तर्क दिया, भारतीय रेलवे को भुगतान तो मैं कर चुकी हूँ, कुलिक एक्सप्रेस के लिए। क्या टिकट के पैसे समायोजित करने की कोई सुविधा नहीं होनी चाहिए? ट्रेन में बिना टिकट चढ़ने की वजह वाजिब हो और ट्रेन में सीट ख़ाली हो तो सुविधा तो ट्रेन के भीतर टिकट ख़रीदने की भी होनी चाहिए।

इन्हीं विचारों के बीच मेरी दृष्टि ट्रेन की छत पर गई। इतनी चिंता के बीच भी मन खिल गया। छत पर था पारदर्शी काँच जिससे सूरज की रोशनी छन कर आ रही थी। यह तो नया दृश्य था। अब मैंने ट्रेन पर ठीक से नज़र दौड़ाई। साफ़-सुथरी ट्रेन वाक़ई बहुत खूबसूरत थी। सीटें 360 डिग्री घूमने वाली थीं। कुछ लोग अपनी सीट घुमा कर खिड़की की तरफ़ मुँह कर बैठे थे। सामने का नज़ारा देखने के लिए गर्दन मोड़ने की आवश्यकता नहीं। टीवी की भाँति सामने के दृश्य चलायमान थे। मैंने पहली बार ट्रेन को इस रूप में देखा था। कुछ देर के लिए मेरी चिंता ढीली पड़ गई और मेरा अपराध भी पहले जितना भारी नहीं रहा। मन-ही-मन मैं रेल की इस नई क़ाबिलियत की दाद दे रही थी कि मेरी ख़ुशी पर घड़ों पानी पड़ गया। आलोक ने मेरा हाल पूछने के लिए फ़ोन किया था। मैं बच्चों-से उत्साह के साथ उन्हें डब्बे का विवरण दे रही थी कि उन्होंने बीच में मुझे टोक दिया।

“देखिए, आप हैं एग्जीक्यूटिव डब्बे में। जो भी फ़ाइन बनेगा, चेयर कार से दुगुना बनेगा।” अपनी चिरपरिचित हास्य में लिपटी गंभीरता के साथ उन्होंने कहा।

सुनकर मैं स्तब्ध। मेरा जी फूल गया। डब्बे की ख़ूबसूरती धुँधली पड़ गई।

“अब घबराने से क्या होगा। जो करना था वह आप कर चुकी हैं। देखता हूँ कुछ हो सके तो।” उनके शब्द कोड़े की तरह बरस रहे थे।

मैंने फ़ोन रखा और सिमट कर बैठ गई। जाने कौन-से जंजाल में आ फँसी। मेरा गला सूख रहा था। पानी की बोतल स्टेशन से ले नहीं पायी थी। क्या करूँ? पानी माँगना चाहिए या चुपचाप बैठे रहना चाहिए। इसी ऊहापोह में थी कि अटेंडेंट आया और पूछा, “आपके लिये सूप ले आएँ?” आसपास के यात्री, ब्रेड के कुरकुरे टुकड़ों वाले गर्म टमाटर सूप में डूबे थे, जिसे मैं अब तक नज़रअंदाज़ कर रही थी। लेकिन अगर ट्रेन के सूप की ख़ुशबू पेट में खदबद मचाने लगे तो समझ लेना चाहिए कि भूख शिष्टाचार से बड़ी हो चुकी है। मैं अभी-अभी प्राप्त हुई जानकारी के सदमे से उबरी नहीं थी इसलिए इच्छा होते हुए भी सूप के लिए इनकार कर दिया। मैं भारी मन से सूप का प्याला लौटते हुए देखती रही। फिर अचानक अपनी सारी हिम्मत बटोर कर उन्हें आवाज़ लगायी,

“सूप नहीं चाहिए लेकिन पानी मिल सकता है क्या?”

फिर ख़ुद को मन ही मन लताड़ा कि पानी के साथ सूप भी ले लेती तो क्या होता! पर तब तक याद आ गया था कि मेरे पास टिकट नहीं है इसलिए मुझे अपनी जीभ पर क़ाबू रखना चाहिए और नियति के अगले स्टेशन का इंतज़ार करना चाहिए। अटेंडेंट ने एक की बजाय दो बोतलें पकड़ा दीं। मैं गटागट एक बोतल पी गई। अटेंडेंट ने सब्र के साथ पानी ख़त्म होने की प्रतीक्षा की और फिर बड़ी मीठी आवाज़ में कहा,

“आपके लिये लंच ले आते हैं।”

अहा! इतने प्रेम से कब किसी ने खाने के लिए कहा था याद नहीं पड़ता। रोज़मर्रा में ख़ुद ही खाना परोसो और खाओ। देर-सवेर हो जाये तो कोई याद दिलाने वाला नहीं। खाना काम निबटाने की क़वायद अधिक हो गया है। मैं इस स्नेह जाल में फँसने को थी कि बिना टिकट यात्रा करने पर हो सकने वाली जेल याद आ गई, जिसकी अवधि संभवतः छह महीने होती है। बचपन में ऐसी पंक्तियाँ कई जगह लिखी देखी थीं। जेल के सींखचों ने भूख ख़त्म कर दी। लंच के लिए मैंने साफ़ मना कर दिया और पर्स में रखी चॉकलेट कुतरने लगी।

अटेंडेंट साहब मान जाते तो बात ख़त्म हो जाती। एक बार गर्दन हिला कर वे चले गये लेकिन मिनट भर में खाना लेकर फिर हाज़िर। बोले, “सब खा रहे हैं, आपको भी भूख लगी होगी। खा लीजिए।” क़रीने से सजी हुई प्लेट मेरे सामने थी।

मनुष्य होता है मनुहार का भूखा। कोई इतने प्रेम से ख़ाना परोसे तो व्यक्ति भला क्या हील-हुज्जत करेगा। प्रेम-प्यार से ही तो दुनिया का कारोबार चलता है। जब खाना आ ही गया, वह भी स्नेह से पगा तो खाने में हर्ज नहीं था। अब बाग़ी मन ऐलान कर चुका था कि होगा जो देखा जायेगा। इतने स्वादिष्ट दाल-चावल अरसे बाद खाये थे। ख़ाना ख़त्म होने के बाद भी स्वाद जीभ पर बना रहा। खाने के बाद मैंने आइसक्रीम भी मुस्कुराते हुए स्वीकार कर ली और धीरे-धीरे स्वाद लेकर खाने लगी। हालाँकि वह आइसक्रीम कम और जमा हुआ मीठा पानी अधिक लग रहा था पर प्यार में आँखों पर पट्टी पड़ ही जाती है। इस मामले में जीभ पर पड़ गई थी। खाकर तनतोड़ अंगड़ाई ली और सोने का विचार बना ही रही थी कि आलोक का फ़ोन फिर से आया, यह बताने के लिए कि कुछ इंतज़ाम न हो सका। मैंने कहा, “कोई बात नहीं। अब इसकी ज़रूरत भी नहीं लग रही। यहाँ मेरी ख़ातिरदारी चल रही है।” सुनकर वे हँसने लगे और बोले, “ख़ातिरदारी नहीं, तुम्हारी जेब काटने की तैयारी चल रही है। सब तुम्हीं से वसूला जायेगा।” हँसते हुए उन्होंने फ़ोन रखा और मैं सोच में पड़ गई कि क्या वाक़ई बकरे को जिबह किया जाने वाला है? नहीं, नहीं यह प्रेम दिखावटी नहीं प्रतीत हो रहा। मैंने आइसक्रीम बाँटते अटेंडेंट को एक नज़र देखा और अपने स्टोल को कस कर लपेट लिया। जो भी होना होगा, जल्द ही होगा। स्टेशन आने में अधिक समय नहीं बचा है। मैं हाथ में बँधी घड़ी की सुई को देखते हुए इंतज़ार करती रही पर कोई हलचल नहीं। जैसे था सब वैसे ही शांत। जब प्रतीक्षा का धीरज चुकने लगा तो मैं डब्बे के बाहर गई और अटेंडेंट से पूछा टीटी कब आएँगे। अटेंडेंट ने व्यस्त भाव से उत्तर दिया, “नहीं आएँगे। इस रूट पर नहीं आते।”

इतने समय से जिस डर से भरी मैं बैठी थी यह सुनकर क्या उस डर को उतार फेंकना चाहिए था या किसी नयी अनदेखी बात से डरना चाहिये था? स्टेशन लगभग तीन मिनट दूर था। आगे क्या हुआ? क्या मैंने पूरा जुर्माना भरा, अटेंडेंट से मोलभाव कर उन्हें रिश्वत दी और अपने ईमान से डिगी अथवा सरकार के पैसों से चोरी कर अपने मूल्यों से दग़ाबाज़ी की। इनमें से कोई भी बात संभव है पर बात उस बात की थी ही नहीं। मैं बेटिकट थी पर व्यवस्था भी कोई टिकट लेकर नहीं चल रही थी, न नियम का न जवाबदेही का।

बहरहाल मैं एक बार फिर रेल के दरवाज़े पर अपने सामान के साथ खड़ी थी। अटेंडेंट साहब हाथ हिलाते हुए कह रहे थे, “बेटा, अगली बार ट्रेन और फ़्लाइट में थोड़ा अंतर रखना।” मैंने आज्ञाकारी बच्चे की तरह गर्दन हिला दी और उन्हें बाय कहकर उतर गई।

पुनःश्च -आगे की कहानी यह रही कि कुलिक एक्सप्रेस अपने समय से पहुँच गई थी। मेरी फ़्लाइट लेट हो गई थी। अंततः मैं और आलोक एयरपोर्ट के लाउंज में बैठ कर कॉफ़ी पी रहे थे। इसके बाद आलोक अपनी फ़्लाइट से दिल्ली चले गये और मैं जयपुर की फ़्लाइट के इंतज़ार में एयरपोर्ट पर ऊँघती रही।

दिव्या विजय

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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