राजस्थान के दलित कवियों की काव्य साधना में अनुभूत, अंतर्वेदनाएं
- अनिल कुमार
बारिया
शोध
सार
: अतीत से वर्तमान
तक
भारतीय
जनमानस
की
चित्तवृत्ति में परिवर्तन
आया
या
नहीं
प्रश्न
वाचक
चिह्रन
अभी
भी
अवस्थित
है।
पर
साहित्य
में
परिवर्तन
की
गूंज
पूर्ण
जोर
- शोर से ध्वनित
हो
रही
है।
स्वानुभूति
के
सहारे
मेला
उठाने
वाले,
थापी
पीटने
वाले,
जूठन
से
उदरपूर्ति
करने
वाले,
उतरन
पहनने
वाले
और
समस्त
अत्याचारों
को
सहने
वाला
वर्ग
बुद्ध
और
अंबेडकर
के
आदर्श
समाज
की
संकल्पना
को
लेकर
समता
मूलक
समाज
की
प्रस्थापना
चाह
अवश्य
रहा
है।
महाराष्ट्र
की
धरा
से
उत्पन्न
दलित
साहित्य
आज
वट
वृक्ष
बनाकर
अपनी
जड़े
संपूर्ण
हिंदुस्तानी
धरती
पर
प्रसारित
कर
चुका
है।
राजस्थान
भी
इससे
अछूता
नहीं
है।
डी.आर.जाटव,
रत्न
कुमार
सांभरिया,
जयप्रकाश
वाल्मीकि,
श्याम
निर्मोही,
कुसुम
मेघवाल,
रामनिवास
बायला,
टीकमचंद
बोहरा,
अनीता
वर्मा,
प्रेमचंद
गांधी
आदि
साहित्यकार
राष्ट्रीय
स्तर
पर
साहित्यिक
चर्चा
में
प्रत्यक्ष
होने
लगे
हैं।
राजस्थान
के
दलित
साहित्यकार
केवल
अपने
गौरवशाली इतिहास का
अनुसंधान
कर
व्याख्यायित ही नहीं
कर
रहे
हैं
अपितु
मानवतावादी
सोच
रखकर
अंबेडकर
दर्शन
के
तले
इतिहास
और
भविष्य
को
पूर्ण
ऊर्जा
से
रुपायित
कर
नई
पीढ़ी
का
पथ
प्रशस्त
भी
कर
रहे
हैं।
बीज
शब्द
: जाति, असमानता, अंतर्संबंध,
विद्रूपता,
झाड़ू,
थापी
,जूठन, उतरन, शोषण,
आरक्षण,
साम्राज्यवाद,
एकलव्य,
आप्लावित,
चेतना
, दलित, घोड़ी, अहंकार,
क्रूर,
विसंगतियां,
सलवट,
मिथक,
संवेदना।
साहित्य
और
समाज
के
अंतर्संबंधों
की
उपेक्षा
नहीं
की
जा
सकती।
साहित्यकार
के
चेतन
मन
पर
देश,
काल
और
परिस्थितियों
के
संस्कार
अवचेतन
मन
में
संग्रहित
होते
रहते
हैं
।
यथा
उचित
समय
पर
अवचेतन
मन
के
अनुभव
अनेक
तरह
से
अभिव्यक्ति
पाते
हैं
जिसमें
साहित्य
भी
एक
माध्यम
है।
सच्चा
साहित्यकार
भी
वही
है
जो
प्रत्येक
स्थिति
में
सामाजिक
उपादानों
द्वारा
चेतन
मन
पर
पड़े
संस्कारों
को
अनुभव
व
अनुकरण
प्रक्रिया
के
तहत
भाव
व विचारों का
विरेचन
कर
पुनः
समाज
को
लौटाकर
नव
सृजन
के
महान
कार्य
में
संलग्न
होता
है।
साहित्य
ही
प्रबोधन
प्रकिया
का
सूत्रपात
कर
समाज
को
व्यापक
रूप
से
प्रभावित
करता
है।
सहित
की
भावना
से
परिपूर्ण
साहित्य
जनमानस
को
प्रेरित
करने
का
कार्य
करता
है।
समाज
को
दिशाबोध
प्रदान
कर
गलत
और
सही
की
व्याख्या
करता
है।
साथ
ही
समाज
को
संस्कृत
बनाने,
जीवन
मूल्यों
की
शिक्षा
देने,
कालखंड
की
विसंगतियों,
विद्रूपताओं,
असमानताओं,
असभ्यताओं,
अमानवीयता
आदि
को
चिह्नित
कर
अपेक्षित
परिवर्तनों
को
साहित्य
में
स्थान
देता
है।
साहित्य
की
सार्थकता
भी
इसी
में
है
कि
वह
कितनी
सूक्ष्मता
और
मानवीय
संवेदना
के
साथ
सामाजिक
अवयवों
को
उद्घाटित
करता
है।
जन
जीवन
को
साहित्यकार
कितनी
ईमानदारी
से
अभिव्यक्त
करता
है।
इसका
ज्ञान
पूर्व साहित्य से
ज्ञात
हो
ही
जाता
है।
आज
समय
बदल
गया
है।
हम
20वीं सदी में
है।
आज
पूर्व
सामाजिक
जीवन
के
साथ-साथ
साहित्यिक
मानदंड
भी
बदल
गए
हैं।
साहित्य
की
आदर्शमयी
बातें
करना
और
यथार्थ
को
परे
रखना
समकालीन
लेखकों
को
स्वीकार
नहीं
है।
साहित्यकार
झाड़ू,
धोबी-
थापी,
जूठन,
उतरन
,मेला आदि के
अनुभव
से
गुजर
चुके
हैं।
अब
कलम
की
थापी
लेकर
समाज
के
मनोमालिन्य रूपी कपड़ों
को
धोने
को
तत्पर
है।
साथ
ही
मन
मस्तिष्क
की
सलवटे
निकालने
के
लिए
साहित्यिक
प्रेस
का
तापमान
उच्च
रख
रहा
है।
अब
सामाजिक
ताने-बाने
के
लिए
पौराणिक
मिथकों
के
चरित्रों
को
ना
उठाकर
धोबी,
पासी,
चमार
,हरिजन आदि जातिवाचक
संज्ञा
को
सीधे-सीधे
समकालीन
साहित्य
में
यथावत
अभिव्यक्त
कर
रहा
है।
इस
सन्दर्भ
में
डॉ.
विवेक
कुमार
की
कविता
‘मैं
धोबी
हूँ
को
देखा
जा
सकता
है-
मै
धोबी
हूँ।
/ बहुत
दिन
मैंने
धोई
तुम्हारी
गन्दगी
ताकि
तुम
साफ
रहो
/ भीषण
गर्मी,
मूसलाधार
बारिश
या
फिर
रही
हो
कटकटाती
सर्दी
/ उफ
नहीं
किया
मैंने
फिर
भी,
ताकि
तैयार
कर
सकूँ
आपकी
वर्दी.............................................................
जिनकी
धुलाई
का
कर्ज
आज
भी
तुम
पर
बाकी
है
।1
20वीं
सदी
के
नवें
दशक
में
हिंदी
साहित्य
के
समृद्ध
होने
के
बावजूद
दलित
साहित्य
ने
हिंदी
साहित्य
के
रूपों,
आकारों,
भाषिक
संरचना,
काल्पनिक
शिष्टता
और
संवेदनाओं
के
पारंपरिक
तरीके
में
में
सेंध
लगाते
हुए
तूफानी
आगाज
किया
है।
स्वानुभूति के आधार
पर
भारत
के
समस्त
दलित
लेखकों
ने
अपनी
भाषा
में
दलित
साहित्य
का
सृजन
किया।
आज
आत्मकथा,
कहानी,
उपन्यास,
नाटक,
संस्मरण
व
काव्य
आदि
विधाओं
में
दलित
साहित्य
पल्लवित,
पुष्पित
और
विकसित
हो
रहा
है।
सुरक्षा
के
लिए
उनके
साहित्यिक
शब्दों
में
कांटे
भी
है
और
वक्त
पड़ने
पर
लावा
भी
ताजा
-ताजा
है,
जिससे
उलझने
पर
स्वाहा
ही
एक
पथ
बचता
है।
समय
आधुनिक
से
उत्तर
आधुनिक
हो
गया।
गांव,
ग्लोबल
हो
गए।
बाजार,
बाजार-
वाद
में
परिवर्तित
होकर
साहित्य
के
नए
स्वरूपों
में
रुपायित
हो
रहा
है।
समय
के
साथ
साहित्य
ने
भी
परिवर्तन
की
हुंकार
लगायीं
तो
लेखक
भी
बदल
गए
और
नायक
नायिकाएं
भी।
भाव
बदल
गए
तो
भाषा
की
शिष्टता
भी।
अब
आल्हा-
ऊदल,
नल
-नील,
शंबूक,
मातादिन
भंगी,
राजाराम
मेघवाल,
बीरबलसिंह
ढालिया,
पीरु
धोबी
, झलकारी बाई आदि
ऐतिहासिक
वीर
पात्रों
पर
जो
धूल
जम
गई
थी,
समकालीन
साहित्यकारों
ने
केवल
धूल
ही
नहीं
हटाई
वरन
समकालीन
साहित्य
,पत्र -पत्रिकाओं, अभिमंचित
नाटकों,
सिनेमा,
मीडिया
आदि
में
नायक
की
भूमिका
में
उतार
कर
,पूर्व इतिहासकारों की
त्रुटि
सुधार
करके
वास्तविक
श्रद्धांजलि
दे
रहे
हैं।
साहित्य
की
अनेक
विधाओं
में
नित्य
नवीन
अनुभूत
विषयों
के
द्वारा
हिंदी
साहित्य
की
दिशा
और
दशा
को
मार्ग
प्रदान
कर
रहे
हैं।
हिंदी
साहित्य
का
इतिहास
में
आचार्य
रामचंद्र
शुक्ल
ने
साहित्य
के
सरोकारों
को
निर्दिष्ट
किया
है-
‘ जबकि
प्रत्येक
देश
का
साहित्य
वहां
की
जनता
की
चित्तवृत्ति
का
संचित
प्रतिबिम्ब
होता
है,
तब
यह
निश्चित
है
कि
जनता
की
चित्तवृत्ति
के
परिवर्तन
के
साथ-साथ
साहित्य
के
स्वरूप
में
भी
परिवर्तन
होता
चला
जाता
है।‘2 समकालीन
दौर
में
आदि
से
अब
तक
जनता
की
चितवृत्ति
बदली
या
ना
बदली
अभी
भी
संदेह
में
है।
पर
साहित्य
का
स्वरूप
जरूर
परिवर्तित
हो
गया
है।
विमर्शों
का
सैलाब
साहित्य
में
आ
गया
है।
जिसमें
सब
स्वानुभूति
के
सहारे,
अपने
अतीत
पर
हुए
अत्याचारों
को
व्याख्यायित
कर,
बुद्ध
और
अंबेडकर
के
आदर्श
समाज
की
संकल्पना
को
लेकर,
समता
मूलक
समाज
की
प्रस्थापना
की
चाह
कर
रहे
हैं।
दलित
समाज
से
आए
दलित
कवियों
और
आलोचकों
ने
समाज
के
ऐसे
पाखंडों
का
पुरजोर
विरोध
किया
जिसने
अब
तक
उनका
शोषण
किया
और
कर
रहे
हैं।
समाज
में
जातिवाद,
धार्मिक
पाखंड,
ईश्वर
के
नाम
से
व्यवसाय,
राजनीतिक
कुटिलताओं
,धर्म शास्त्रों की
आड़
में
मनुस्मृति
विधान,
छुआ-छूत
इत्यादि
के
विरुद्ध
जंग
छेड़
दी
है।
महाराष्ट्र
से
प्रारंभ
हुई
इस
साहित्यिक
धारा
ने
समस्त
भारत
में
एक
विराट
विमर्श
चला
दिया
है।
जिसमें
प्रत्येक
प्रांत
के
पीड़ित,
शोषित,
दलित
स्वयं
लिखकर
इतिहास
के
क्रुर
पन्नों
को
उजागर
कर
भीम
की
थीम
के
सहारे
मानवता
की
गुहार
लगा
रहे
हैं।
किसी
भी
देश
की
सभ्यता
और
संस्कृति
का
संवाहक
होता
है,
साहित्य।
इसलिए
दलित
साहित्यकारों
ने
स्वयं
कलम
उठाकर
दलितों
पर
अत्याचार
में
प्रयोग
होने
वाले
समस्त
साध्य
और
साधनों
पर
निरंतर
प्रहार
कर
हमेशा
के
लिए
उसका
दाह
संस्कार
करना
चाहता
है।
जातीयता
को
समूल
नष्ट
करने
का
काव्यमय
क्रांतिकारी
आह्वान
कर
रहे
हैं।
दलित
लेखन
केवल
दलितों
के
अधिकार
एवं
मूल्यों
तक
ही
सीमित
नहीं
हैं
बल्कि
सामाजिक
सन्दर्भो
के
साथ
जुड़कर
समूचे
समाज
की
अस्मिता
और
मूल्यों
की
पहचान
बनता
हैं।
राष्ट्रीय
स्तर
की
तरह
राजस्थान
में
भी
कई
दलित
लेखक,
साहित्यकार
प्रत्यक्ष
होने
लगे
हैं।
जिन्होंने
अपनी
अंतर्भुत
आत्मीय
पीड़ाओं
,जातिवाद को अपनी
रचनाओं
में
उकेर
रहे
हैं।
राजस्थान
के
दलित
साहित्यकारों
ने
भी
अपने
गौरवमय
इतिहास
का
अनुसंधान
कर
सतत
रूप
से
उसे
व्याख्यायित
कर
रहे
हैं।
मानवतावादी
सोच
रखने
वाले
राजस्थान
के
दलित
लेखक
पढ़
लिखकर
आगे
बढ़
गए
हैं
।
अब
इनकी
पीढ़ियां
लेखन
को
सुरक्षा
देने
में
सक्षम
है।
आज
के
लेखक
बड़े-बड़े
पदों
पर
बैठे
हैं
और
अंबेडकर
के
दर्शन
तले
इतिहास
के
जुल्मों
को
पूर्ण
ऊर्जा
से
रुपायित
कर नई पीढ़ी
का
पथ
प्रशस्त
कर
रहे
हैं।
कविता
की
शक्ति
से
परिचित
दलित
साहित्यकारों
ने
अपने
अभिव्यक्ति
का
प्रमुख
आधार
कविता
को
ही
बनाया
है
।
कविता
के
यशस्वी
रचनाकार
तेज
सिंह
का
कहना
है
कि-
‘ दलित
साहित्य
की
शुरुआत
कविता
से
होती
है
,आज भी कविता
प्रमुख
विधा
है।‘3 दलित कवियों ने
वह
सब
कुछ
देखा
,अनुभव किया और
उसे
दौर
से
गुजरे
हैं
,जहां मानव जीवन
पशुओं
से
भी
बदतर
था
और
शायद
आज
भी
ग्रामीण
संस्कृति
में
विद्यमान
है।
यथा
उनकी
कविताओं
में
आक्रोश,
संघर्ष,
नकार,
विद्रोह,
अनास्था
है,
फिर
भी
प्रेम
,समता, बंधुता, मानवीयता
आदि
भी
उनकी
कविताओं
में
पूर्णता
के
साथ
उपस्थित
है।
कविता
की
सार्थकता
को
स्वीकार
करते
हुए
दलित
साहित्य
के
स्थापित,
अपनी
रचनाओं
से
समाज
को
झकझोरने
वाले,
अमर
रचनाकार
ओमप्रकाश
वाल्मीकि
कहते
हैं-
‘ जीवन
संघर्ष
में
आदमी
का
सहारा
बनकर
जो
हौसला
दे
वही
कविता
है,
कविता
कल
से
ज्यादा
जीवन
की
अदम्य
लालसा
गतिशीलता
की
संवाहक
है।’4
पूर्व
में
राजपूताने
के
नाम
से
पहचान
रखने
वाला
यह
प्रदेश
30 मार्च
,1949 को
राजस्थान
नाम
से
अस्तित्व
में
आया।
राजस्थान
का
राजनीतिक
परिवेश
ग्रह
कलेश,
लड़ाई
-झगड़ा
तथा
सामाजिक
परिदृश्य
राजसी,
सामंती
और
ब्राह्मणवादी
रहा
है- ‘ यहाँ का
सामाजिक
परिवेश
राजसी,
सामंती
और
ब्राह्मणवादी
रहा।
सामंतवाद
ब्राह्मणवाद
के
प्रश्रय
के
बगैर
नहीं
पनपता
और
ब्राह्मणवाद
सामंतवादी
के
संरक्षण
के
बिना
विकराल
नहीं
बनता
ये
दोनों
ही
तत्व
यथा
स्थितिवाद
के
पोषक
हैं
और
इनकी
एक
जुटता
अंधविश्वास,
अशिक्षा
और
अस्पृश्यता
को
बनाये
रखती
है।
जिस
क्षेत्र
में
अंधविश्वास,
अशिक्षा
और
अस्पृश्यता
की
त्रिवेणी
अविरल
बहती
रही
हो,
वहाँ
दलित
विमर्श,
दलित
अस्मिता
और
दलित
अस्तित्व
की
चर्चा
अस्वाभाविक
थी।
इस
तरह
का
वातावरण
ऊँची
आवाज
और
कहते
शब्द
को
भी
बर्दाश्त
नहीं
करता।‘5 ऐसी सामंतवादी व्यवस्था
के
विरुद्ध
राजस्थान
में
भी
चेतना
की
अलख
जगी।
सामंतवादी
परिवेश
में
पली-
बढ़ी
राजकुमारी
मीरा
ने
सर्वप्रथम
चमार
जाति
के
संत
रविदास
को
अपना
गुरु
बनाकर
समाज
में
विद्रोह
और
क्रांति
की
चिंगारी
का
प्रस्फुटन
किया।
सत्य
है
कि
जहां
जितना
दबाव
होता
है
विस्फोट
भी
उतना
ही
जोरदार
होता
है।
राजस्थान
में
भी
इस
विस्फोट
का
प्रारंभ
हो
गया
है।
सर्वप्रथम
आत्मकथाओं
के
रूप
में
श्यामलाल
की
‘एक
भंगी
कुलपति
की
अनकही
कहानी‘डॉ.
डी.आर.जाटव
की
‘मेरा
सफर
-मेरी
मंजिल
आदि
आत्मकथाएं
बाबा
साहब
के
विचारधारा
से
प्रेरित
और
लिपिबद्ध
है।
नवोदित
कथाकार,
काव्यकार
अपनी
पूर्ण
ऊर्जा
से
संवलित
होकर
साहित्य
में
उतर
रहे
हैं।
जयप्रकाश
वाल्मीकि
राजस्थान
के
प्रसिद्ध
साहित्यकारों
में
अपना
नाम
दर्ज
कर
चुके
हैं।
वाल्मीकि
जी
ने
महर्षि
वाल्मीकि
प्रकाश,
त्रासदी,
कब
सुधरेगा
वाल्मीकियों
की
हालत,
कहां
है
ईश्वर
के
हस्ताक्षर,
कसक,
(कहानी
संग्रह)
जय
प्रकाश
वाल्मीकि
की
प्रतिनिधि
कविताएं,
आदि
रचना
कर्म
से
साहित्यिक
सेवा
कर
रहे
हैं।
‘लहू
के
फूल’,
उनकी
ख्याति
का
अक्षय
- स्रोंत
है।
उनके
काव्य
में
वेदना
की
तीव्रता,
दलितों
की
स्थिति
तथा
उनके
मूल्यों
का
यथार्थपरक
तीव्र
अभिव्यक्ति
मुखरित
हुई
है।
‘लहू
के
फूल’
में
127 कविताएं
हैं
जो
मार्मिक
और
प्रभावी
है। ‘घोड़ा बनने
से
इंकार’
कविता
बड़ी
ही
हृदय
स्पर्शी
है-
अज्ञानता
की
पट्टियां
बांध
कर
/ सरपट
दौड़ाते
रहे
,हमें तुम। / शिक्षा,
संगठन
और
संघर्ष
का मंत्र
सुनकर
/ घोड़ा
बनने
से
करने
लगे
इनकार
/ तुम्हारे
चाबुक
की
मार
तेज
हो
गई।
/ कहीं चकवाडा
’1 / कहीं बेणेश्वर ’2
/ जैसे
अत्याचारों
की बौछार हो
गई।6
यथार्थ
घटनाओं
पर
आधारित
कविता
में
कवि
ने
संदर्भ
भी
दिए
हैं।
घोड़े
की
आंख
से
पट्टियां
व
दलितों
को
अज्ञान
की
पट्टियां
उतार फेंकने का
आह्वान
किया
है।
‘कौन
हूं
मैं’
कविता
में
जातिगत
शिकार
मानवता
पर
भी
प्रश्नवाचक
चिह्न
लगाते
हैं।
वाल्मीकि
जी
ने
दलित
जीवन
के
कई
स्याह
पृष्ठ
एक
साथ
खोले
हैं-
वह
उठ
जाती
थी
/ भोर
में
/ मुर्गे
की
बांग
के
साथ
/ और
ढोती
रहती
/ दिनभर
मल
की
निचुड़ती
परात।
/ बदले में
मिलती
उसे
/ खाने को
जूठन
/ पहनने को
उतरने।
/ उसके
पुरखों
को
/ समझा
दिया
था
/ युगों
पूर्व
ठाकुरों
के
रावले
में
कि
/ मल
उठाना
उनका
काम
है
/ यही
उनका
धर्म
है।
7
कविता
में
जूठन
,बेगार , मल
उठाने
आदि
के
द्वारा
आक्रोश
व्यक्त
किया
है।
लेखक
ने
बाबा
साहब
के
कथनों
को
शिरोधार्य
कर
समाज
के
लोगों
को
गुलामी
का
एहसास
कराकर
स्वाभिमान
की
लौ
जगाई
है।
‘मान
गए
तुम्हें
भाई‘
कविता
के
शब्द
जागृति
के
शंखनाद
हैं-
बाबा
साहब
अंबेडकर
ने
कहा
/ गुलाम
को
उसकी
गुलामी
का
एहसास
करा
दो
/
वह
स्वयं
विद्रोह
कर
देगा।
/ यही
प्रेरणा
पाकर / मैं उनसे
कहा
/ सुनो
भाई
! / गंदगी
साफ
करना
/ सदियों
की
गुलामी
को
बनाए
रखना
है।8
‘कौम
के
दलाल’
कविता
में
नेताओं
के
झांसे
से
बचने
व
कौम
के
सच्चे
रहनुमा
बनने
का
संदेश
प्रेषित
करते
हैं।‘अब
कमल
खिलाएगा
कौन’
रचना
में
संघर्ष
की
मिसाल
थमेगा
कौन,
कहकर
सोए
हुए
समाज
को
जागृत
करने
का
अथक
प्रयास
है
।
‘क्रांति
रथ‘
कविता
में
शिक्षा,
संगठन
और
संघर्ष
के
क्रांतिरथ
को
निरंतर
आगे
बढ़ने
का
आह्वान
करते
हैं
।
‘अहिंसा
का
भावार्थ’
कविता
में
अहिंसा
का
अर्थ
समझा
कर
कवि
समता
मूलक
समाज
की
स्थापना
करना
चाहता
है।
‘अब
नहीं
तो
कब
उठोगे’
कविता
खुले
रूप
में
चेतना
की
मशाल
है।
ईश्वर
पर
एकाधिकार
,धर्म शास्त्रों के
आदेश,
पाप
-पुण्य
की
परिभाषा,
जाति
आदि
के
प्रमाणीकरण
के
लिए
कविराज
‘कहां
है
ईश्वर
के
हस्ताक्षर’
कविता
में
ईश्वर
के
हस्ताक्षर
की
मांग
करते
हैं-
धर्म
व्यवस्था
में
/तुम
पावन,
वे
पतित
/ तुम
स्वामी
वे
दास
/ किस
शास्त्र
के
पृष्ठ
पर
/ इस
व्यवस्था
के
पक्ष
में
/ ईश्वर
के
हस्ताक्षर
है
? ़़़़़़़़़़़़
अपनी धूल-धूसरित / प्रतिष्ठा को
जमाने
वालों
/ ढूंढो
यह
दस्तावेज
/ वेदों
में
पुराणों
में। / मिल जाए
तो
फोटो
प्रति
करवा
लो
/ यदि
नहीं
मिले\तो
यह
दस्तावेज
तो
/ स्वर्ग
का
ही
नक्शा
खोजो
/वहां
जाकर
नकल
बनवा
लो।
9
गांवों
में
भारत
की
आत्मा
,मरघट का आरक्षण
,वह कबीर था,
आप
जानना
चाहते
हैं
- वाल्मीकि
कौन
थे
,दलित रस और
दीपक
राग
आदि
के
द्वारा
नए
प्रश्न
समाज
के
समक्ष
रखते
हुए
दलित
उत्पीड़न
की
समाप्ति
का
इंतजार
करते
हुए
समता
मूलक
समाज
के
आशा
लिए जय प्रकाश
वाल्मीकि
निरंतर
लेखन
कार्य
में
संलग्न
है।
वर्तमान
दलित
कवियों
की
युवा
पीढ़ी
अपनी
रचनाशीलता
से
प्रभावित
कर
रही
है।
20 जुलाई,
1978 को बीकानेर में
जन्मे
,श्याम निर्मोही युवा
कवियों
में
महत्वपूर्ण
हस्ताक्षर
है।
आपने
अनेक
पुस्तकें
संपादित
की
है।
कई
सम्मान
प्राप्त
कर
चुके
हैं।
पर
इनकी
पहचान
2022 में,
कलमकार
पब्लिकेशन
से
प्रकाशित
मौलिक
कृति
‘ रेत
की
कश्तियां’
ने
इनको
चर्चित
दलित
साहित्यकारों
की
अग्रिम
पंक्ति
में
बैठा
दिया
है।
इस
काव्य
संग्रह
में
विषयों
की
विविधता
है
।
मात-पिता,
स्त्री,
पूर्व
लेखकों
की
काव्य
समीक्षा
यथा
मुख्यतः
दलित
विषय
पर
ही
केंद्रित
है।
निर्मोही
समानता
के
गुजरते
नारों
के
गौरव
धंधों
पर
पैनी
नजर
रखते
हैं।
दलित
समाज
कहीं
भटक
नहीं
जाए
अपने
पथ
से,
इसलिए
गौतम
बुद्ध,
अंबेडकर
आदि
का
मार्ग दिखाते है
।-
आओ,
/ फिर
से
/ हम
भी
चल
/ उन
रास्तों
पर
/ उन पगडंडियों
पर
/ उन
पद
-चिह्नों
पर
/
जिन पर
/कभी
हमारे
पुरखे...........
/ गौतम बुद्ध, बाबा
साहेब,
दीनाभाना व / काशीराम
चले
थे।10
‘गूंगा
नहीं
हूं
मैं
‘ में
कवि
आक्रोश
की
स्थिति
में
है
और
प्रति
उत्तर
की
पूर्ण
तैयारी
में
भी-
ये / कुंठा
/ ये
घृणा
/ ये
नफरत
/ ये
छुआछूत
/ ये
भेदभाव
/ ये
अलगाव
/
सब दिखाई
देता
है
मुझे
/अंधा
नहीं
हूं
मैं।
11
अक्सर
अशिष्ट
भाषा
और
सौंदर्यशास्त्र
के
तरकश
दलित
साहित्य
पर
चलाए
जाते
हैं।
श्याम
निर्मोही
ने
प्राचीन
व
दलित
कविता
के
सौंदर्य
शास्त्र
को
रुपायित
कर
तार्किक
शैली
में
प्रति
उत्तर
दिया
है-
तुम
कभी
भी
/ न
तो
हमें
और
ना
ही
हमारे
/ लिखे
हुए
को
स्वीकार
कर
पाए
हो/
क्यों
कि
/
हम तुम्हारी
तरह
/ प्रकृति
के
सौंदर्य
के
बहाने
/ नारी
के
अंग-प्रत्यंग
का
/ वर्णन
नहीं
करते
हैं / हम
तुम्हारी
तरह
कल्पित
अवतारों
की
/ गाथा
नहीं
गाते
हैं........
/ हम
भोगे
हुए
/ यथार्थ
की बात
करते
हैं
/ हम
अपनी
पीड़ा
और
अपमान
से
/ उपजे
आक्रोश
को
शब्दों
में
ढालते
हैं
/ और
यही
हमारा
सौंदर्य
शास्त्र
है।12
‘ मैं विप्लव
रखता
हूं‘
कविता
दलित
साहित्य
को
विप्लवकारी
और
क्रांतिकारी
सिद्ध
करती
है
।
‘मैं
भारत
हूं‘
में
कवि
ने
आतंकवाद,
भ्रष्टाचार,
धर्मवाद,
जातिवाद,
वर्णवाद
पर
करारा
प्रहार
कर
भारत
को
गौतम
बुद्ध
का
भारत
बनाने
की
ठानी
है।
‘सलगते
शब्द‘ दबे हुए
आक्रोश
को
बाहर
लाने
व
स्वाभिमान
जागृत
करने
के
लिए
भीमास्त्र
है।
‘सत्य
की
आहट‘
भारतीय
समाज
पर
व्यंग्यात्मक
भावों
से
परिपूर्ण
‘सत्य
मिला
मुझे‘
कविता
प्रत्येक
हृदय
को
द्रवित
करने
में
सक्षम
है
सत्य
मिला
मुझे
/ सड़क
किनारे
/ तहस-नहस
/ जीवन
से
जूझते
हुए
/ कुड़े में रोटी ढूंढते
हुए।
13
साहित्य शिल्पी
श्याम
निर्मोही
केवल
शाब्दिक
बातें
ही
नहीं
करते
वरन्
पूर्व
के
प्रतिष्ठित
साहित्यकारों
द्वारा
दलितों
की
गलत
छवि
बनाने
की
प्रवृत्ति
का
जोरदार
ढंग
से
विरोध
करते
हुए
प्रेमचंद
से
सवाल
करते
हैं-
मैंने
ऐसे
घीसू
और
माधव
नहीं
देखें
/ जब
घर
में
शव
पड़ा
हो
और
वह
समोसे
खाएं
/
मैंने
ऐसे
अमानवीय,
बेशर्म
बाप
बेटे
नहीं
देखे
/जो
अपनी
पुत्र
वधू
और
पत्नी
के
/ कफन
के
पैसों
से
शराब
पी
जाए.................
फिर
मुंशी
जी
आपने
निकृष्ट
कल्पना
कैसे
कर
दी
? 14
महात्मा
गांधी
ने
गांव
को
भारत
की
आत्मा
कहा
था
वहीं
अंबेडकर
ने
गांव
को
दलितों
के
लिए
कठोर
कारगार
बताया। निर्मोही गांव
और
शहरों
के
यथार्थ
की
अभिव्यंजना
करते
हुए
लिखते
हैं-
शहर से
नहीं
/ गांव
से
डर
लगता
है
साहब!
/ दलित
हूं
ना
/ इसलिए.......शहर
में
शादी
होगी तो
/ शान
से
घोड़ी
पर
बैठूंगा
/ शान
से
बिंदोली
निकलेगी
/ और गांव में
/ भूल से
घोड़ी पर
बैठ
गया
तो
/ पाखंडियों
के
अहंकार
को
चोट
पहुंचेगी
/ और
फिर
उनके
हाथों
/ मार दिया
जाऊंगा
/ दलित
हूं
ना,
साहब
! इसलिए....
15
आज चारों
ओर व्याप्त है
कि
जातिवाद
कम
हुआ
है
,मनुवादी विचारधारा सिकुड़
रही
है
परंतु
ऐसा
यथार्थ
से
परे
है। निर्मोही भीम
की
विचारधारा
से
संवलित
होकर
भीम
होने
का
अर्थ
बताते
हुए
कहते
हैं-
‘ जब
कभी
नन्ही-नन्ही / उंगलियों को
थाम
कर
/ दाखिला
करवाने
जाओगे
/
किसी स्कूल
में
तुम
/और
/ तुम्हें चूहड़ा,
चमार
और
महार
/ कहकर
भगा
दिया
जाए
तो
/ तुम्हें
पता
चलेगा
भीम
होने
का
अर्थ!
16
भीम
की
थीम
को
चरितार्थ
कर
भीम
होने
का
वास्तविक
अर्थ
निर्मोही
ने
हीं
बताया
है
।
संग्रह
की
‘जब
ओम
प्रकाश
वाल्मीकि
लिखकर
चला
गया’
में
कवि
ने
नवाचार
के
द्वारा
कवि
ओमप्रकाश
की
दिव्य
आत्मा
को
शब्दों
में
प्रवाहित
कर
व्यंग्य
की
धार
और
तेज
कर
दी
है
।
संग्रह
की
अंतिम
कविता
‘आदमी’
वास्तव
में
आदमी
की
तमीज
से
सिखाती
है।
‘रेत
पर
कश्तियां’ एक आंदोलन
है,
अंबेडकर
ही
चेतना
का
झंडा
फहराती
जुझारू
काव्य
संग्रह
है।
दलित
प्रतिरोध
और
दलित
अस्मिता
से
लबरेज
सामाजिक
वेदना
का
महापुराण
है।
निर्मोही
की
कविताओं
में
अनुभव
और
चिंतन
का
समावेश
है।
समाज
को
‘रेत
की
कश्तियां’ के अनंतर
लेखक
की
आगामी
कृतियों
का
भी
पाठकों को बेसब्री
से
इंतजार
है।
डॉ.
कुसुम
मेघवाल
का
नाम
भारतीय
दलित
साहित्य
के
लिए
अपरिचित
नहीं
है।
महिला
दलित
साहित्यकारों
में
अग्रणी
कुसुम
जी
ने
साहित्य
की
विभिन्न
विधाओं
में
कलम
चलाई
है।
हिंदी
उपन्यासों
में
दलित
वर्ग,
दलित
साहित्य
पर
अनुसंधान
के
लिए
एक
महत्वपूर्ण
शोध
ग्रंथ
है।
इस
नारी
को
पहचानो,
खूब
लड़ी
मर्दानी
वह
तो
लक्ष्मी
नहीं,
झलकारी
थी
।
मेरी
पहली
उड़ान,
लंदन
यात्रा
,कितने क्रूर हो
तुम
,आह से उपजे
वेदना
के
स्वर
आदि
काव्य
संग्रह
प्रकाशित
हो
चुके
हैं।
उनके
पति
बी.एल.मेघवाल
आर.ए.एस
अधिकारी
के
साथ
साहित्यकार
भी
थे।
पीढ़ियों के सवाल,
उजाले
की
अगवानी
दो
महत्वपूर्ण
काव्य
संग्रह
है।
आई.ए.एस.व
इंजीनियर
की
माता
डॉ
कुसुम
मेघवाल
निरंतर
साहित्य
सृजन
में
संलग्न
होकर
संवेदना
और
मानवता
के
स्तर
पर
अंबेडकर
विचारधारा
से
पोषित
होकर
ब्राह्मणी
व्यवस्था
पर
चोट
करती
है-
सकता
है
सफल
? / साम्राज्यवाद, मार्क्सवाद, / समाजवाद,
साम्यवाद।
/ अरे
भोले
पंछियों /नहीं
समझे
तुम
अभी
तक
/ इतनी
छोटी
सी
बात
/ की
जब
तक
जिंदा
है
/
इस देश
में
/ ब्राह्मणवाद
/ तब
तक
नहीं
हो
सकता
/ सफल
/ कोई
अन्य
वाद।17
कुसुम
जी
महिला
के
दर्द
के
कारणों
की
शिनाख्त
भी
करती
है।
उनके
अनुसार
सारी
व्यवस्थाएं
हिंदूवादी
विचारधाराए
हैं
जिसके
कारण
ठाकुर
आदि
ने
महिलाओं
पर
लैंगिक
अत्याचार
किये।
‘मेरा
क्या
कसूर’
कविता
में
अत्याचारी,
शोषक
ठाकुर
की
भयावहता
का
वर्णन
कर
उत्पन्न
होने
वाली
संतान
के
कसूर
के
बारे
में
समाज
से
प्रश्न
करती
है।
शिकागों से निकलने
वाली
पत्रिका
Primaverra में 2003 में the uplift of an
untouchable settlement शीर्षक
छपी
थी
।
At
the neglected edge of village / the like a ripe boil about to burst / there is
/the untouchable settlement .
आह
से
उपजी
वेदना
के
स्वर
काव्य
संग्रह
में
नारी
अस्मिता
का
स्वर
पूर्णतया
उभर
कर
आया
है-
रिश्ता पति-पत्नी
का
/ तो
होता
है
मन
का
/ नहीं है
जरूरत
उसमें
/ कोर्ट
कचहरी जाने
की
/ नहीं होता
है
महत्व
/ उस
कागज
के
टुकड़े
का
।18
कुसुम
जी
इस
नारी
को
पहचानों
काव्य
पुस्तक
में
नारी
का
समग्र
दृष्टि
से
अवलोकन
कर
पुरुष
प्रधान
समाज
को
मानवता
रखने
का
संदेश
देती
है-
वह मारता
है
उसे
/ पीटता है
उसे
/ क्योंकि
वह
है
/ पति
परमेश्वर
उसका
/
और पत्नी है उसकी जोरू / उसकी गुलाम / इस नारी को पहचान।19
5 मई ,1964 सीकर
में
जन्मे
रामनिवास
बांयला
के
काव्य
में
दलित
चेतना
के
प्रति
उत्सुकता
और
संवेदनशीलता
है
।
अपने
सृजन
कार्य
से
अनेकांत
प्रत्यक्ष
चुनौतियों
का
सामना
करने
में
सक्षम
है।
इनका
साहित्य
लेखन
जातिवादी
व्यवस्था,
ऐतिहासिक
वृतांतों,
पौराणिक
आख्यानों
आदि
की
आलोचना
करते
हुए
पूर्व
साहित्य
के
पुर्नमूल्यांकन
की
मांग
करता
है
।
वे
उन
गलत
प्रस्थापनों
की
व्याख्या
करता
है
जो
मानव
विरोधी
है।
हिंदी
शिक्षक
के
रूप
में
सेवा
देते
हुए
भी
आपने
बोनसाई,
अपने
अपने
आईने,
बिसात
काव्य
संग्रह
तथा
हिमायत
,उजास लघु कथा
संग्रह
की
सृजना
कर
निरंतर
साहित्यिक
सेवा
में
रत
है।
धर्म
की
जाति
आधारित
व्यवस्था
समाज
को
खोखला
कर
रही
है
जिससे
स्वच्छ,
सुदृढ़
राष्ट्र
निर्माण
में
अवरोध
उत्पन्न
होता
है।
कवि
का
मानना
है
कि
जातीयता
भारतीय
राष्ट्र
का
बहुत
बड़ा
फेक्टर
है।
आम
आदमी
तो
क्या
महाभारत
व
रामायण
के
आदर्श
काल
में
भी
दलित
,दलित ही रहता
है।
‘बिसात’
काव्य
संग्रह
में ‘सूत -पुत्र
' कविता का भाव
बहुत
हृदय
स्पर्शी
है-
फिर भी
/ है
विविध
-विधा
श्रेष्ठ!
ऐसा
क्या
था
/ कि
‘उत्तम
‘ भी
/ ना
पा
सका
/अपनों
में
सम्मान/
देखा कर्ण
ने
/श्रेष्ठताओं
पर
भी
/भारी
है
ना
/चैाथे
वर्ण
का
पैतृक
परचम/
यह
‘सूत
-पुत्र‘नाम।20
‘बिसात‘
संग्रह
की
कविताएं
जन
कल्याण
की
अपील
करती
हुई
मानव
को
साहसी,
सुदृढ़
बनाते
हुएं
अनावश्यक
सुविधाओं
का
विरोध
करती
है-‘मत
ढूंढो
शीतल
छांव
नहीं
तो
सुस्ताना
पड़ेगा
और
सपने
सपने
ही
रह
जाएंगे।
‘बिसात’
कविता
में
बादशाह,
वजीर,
हाथी,
घोड़े
,ऊंट आदि के
लश्कर
को
देखकर
आम
आदमी
की
चिंता
व्यक्त
करते
हुए
लिखते
हैं-‘बादशाहों
के
हार-
जीत
के
युद्ध
में
मरते
हैं
सिर्फ
प्यादे
।‘गड्ढा’
में
कवि
एकलव्य
के
साथ
हुए
अन्याय
में
उसके
साथ
खड़े
हैं-
मेरा एकलव्य
/ जब उठाता
है
तरकस
/ भेदता है
कुत्ते
का
मुँह /तो फिर कोई
द्रोण / मांग
लेता
है
अँगूठा/ स्थापित करने / अपने ही
/ अर्जुन
का
एकाधिकार।21
बोनसाई
काव्य
संग्रह
में
ईर्ष्या,
दामन
का
दाग
,बदलाव, प्रकृति पेड़
की,
स्वच्छंद
विचरण,
गड्ढा,
धन्य
है
समीर-
समीर
,नाम की तख्ती
,मातृत्व विवशता, अनेक
भावबोध
से
सरोबार
काव्य
है।
‘अपने
अपने
आईने
’में
रामनिवास
जी
ने
मीरा
-कबीर
की
मार्मिक
अभिव्यंजना
की
है-
मीरा
/ परिजनों के
/ प्रयास
/ और प्रताडन
और
विलास
/ ना
बना
सके / एक की
जो
/
एक की
हुई
/ मीरा -/ जमाने की
हो
गई
।--------‘‘कबीर
/ मृत्यु
शैय्या
पर
/ अपनों
ने
ही
/कुरेद दिया
मजहब
/ कबीर
का
जो
/ ताउम्र
/ मानवता
से
/ मजहब
को
/ ढांकता
रहा।22
कविताओं
के
द्वारा
भेदभाव
पूर्ण
औरअन्याय
पद्धति
की
तीक्ष्ण
व्यंजनाओं
के
साथ
इनका
काव्य
संग्रह
अनेक
स्वादों
से
परिपूर्ण
है।
अंबेडकरवादी
चिंतन
धारा
व
सामाजिक
सरोकारों
के
कवि
भाई
सतीश
खनगवाल
राजस्थानी
साहित्यकारों
में
अपना
अप्रतिम
स्थान
रखते
हैं।
इनका
साहित्य
बुद्ध
और
अंबेडकर
के
चिंतन
से
आप्लावित
होकर
बदलते
समाज
की
तस्वीरों
का
महत्वपूर्ण
दस्तावेज
है।
युवा
कवि
सतीश
का
अपना
दर्शन
है
जिसमें
समाज,
जाति
व्यवस्था,
स्त्री
चेतना,
सामाजिक
यथार्थ,
राष्ट्र,
राजनीति
के
परखने
की
अपनी
दृष्टि
है।
अव्यवस्थाओं
के
प्रति
कवि
का
आक्रोश
सामाजिक
विद्रूपताओं,
शोषण,आडंबर,
भ्रष्टाचार
आदि
के
विरुद्ध
सशक्त
रूप
से
उभर
कर
आता
है।
कवि
कविताओं
के
द्वारा
गौतम
बुद्ध,
महावीर
स्वामी,
नानक
और
कबीर
को
याद
कर
स्वच्छ,
सुदृढ़
राष्ट्र
का
निर्माण
करना
चाहते
हैं-
इसी
देश
में
पैदा
हुए
/ गौतम और
महावीर
/ इसी भूमि
में
जन्मे
/ नानक और
कबीर
/
आडंबरों पर
चलाएं
/ जिन्होंने नुकीले
तीर
/ वह
साधु-
संतों
का
देश
/ कहां
खो
गया
है
/
ऐ हिंद,
मेरे
देश
तुझे
/ यह क्या
हो
गया
है?
23
सतत्
साहित्य
के
यात्री,
लोकतांत्रिक
व्यवस्था
के
हिमायती
कवि
सतीश
खनगवाल
का
‘सुलगता
हुआ
शहर’
युवा
आक्रोश
की
अभिव्यक्ति
है।
जिसमें
बदलते
समाज
की
बेचैनी
महसूस
की
जा
सकती
है।
अनेक
प्रतियोगी
परीक्षा
में जो चयनोपरांतआज
टीकमचंद
जी
बोहरा राजस्थान कैडर
के
2012 बैच
के
आई
ए
एस
अधिकारी
हैं जो वर्तमान
में
राजफैड
प्रबंध
निदेशक
के
रूप
में
कार्यरत
हैं।
वे
पूर्व
में
विशिष्ट
शासन
सचिव वित्त विभाग, अतिरिक्त
महानिदेशक
एवं
संयुक्त
शासन
सचिव,
प्रशिक्षण
एचसीएफ,
रिपा,
ओटीएस
,जयपुर के पद
पर
कार्यरत
रहे
हैं। भारतीय प्रशासनिक
सेवा
के
साथ
आप
टीकम
‘अनजाना’
नाम
से
साहित्य
सृजन
कर
रहे
हैं।
अब
तक
आपके
पांच
काव्य
संग्रह
प्रकाशित
हो
चुके
हैं
।
‘मां
से
प्यारा
नाम
नहीं’
जो
मां
के
चरणाविंद
में समर्पित है।
‘माटी
हिंदुस्तान’
काव्य
संग्रह
राष्ट्रीयता
व
देशभक्ति
भावना
से
ओत-प्रोत
है।
महाबली
पन्नाधाय,
मन
मेरा
गुलमोहर
तीसरा
और
चोथा
काव्य संग्रह है।
2022 में
इनका
पांचवा
काव्य
संग्रह
‘अपनी
धरोहर
अपनो
गौरव’
प्रकाशित
हो
चुका
है।
इनका
काव्य
लेखन
विविधता
से
भरा
-पूरा
है
,फिर भी दलित
चिंतन
पर
भी
आपने
कविताएं
लिखी
है
।
आंसू
सबके
खारे
हैं,
कविता
में
कवि
की
संवेदना
महसूस
की
जा
सकती
है-
लहू
सभी
का
लाल,
और
आँसू
सबके
खारे
हैं।/
जाति
धर्म
की
दीवारें,
फिर
क्यों
बीच
हमारे
हैं
।24
दलित लेखन
का
प्राण
तत्व
है
अंबेडकर
दर्शन
।
बाबा
साहब
को
टीकम
जी
ने
श्रद्धा
सुमन
अर्पित
किए
हैं-‘वीर
विजय
कालजयी
बाबासाहब’
में
टीकम
जी
के
बहाने
हर
भारतीय
की
आत्मा
कह
रही
है-
शोषित पिछड़े
लोगों
को,
सबके
सम
अधिकार
दिया / उन्हें मानव
का
सम्मान
दिया,और
बड़ा
उपकार
किया
/ पाखंड
और
आडंबर
पे,उसने
प्रबल
प्रहार
किया
/ शोषण
के
षड्यन्त्रों
को,
कभी
नहीं
स्वीकार
किया
/ बुदध
धम्म
की
राह
थामके,
व्यवस्था सारी
विलोड़
गया
/ वीर
विजयी
वो
कालजयी,
रूख
धारा
का
मोड़
गया
।25
कवि अनजाना ने
शिक्षा
के
प्रति
दलितों
में
अलख
जगाई
है।
जिसके
निमित्त
शिक्षा
की
साकार
मूर्ति
महात्मा
ज्योतिबा
फुले
को
काव्य
रूपी
माला
अर्पित
कर
दलितों
में
जागृति
लाने
का
काव्यमय
प्रयास
किया
है-महात्मा
फूले
ज्योतिबा
ने,
भेद
जाति.वर्ण
का
भुलाया
था।
सावित्रीबाई
के
साथ
मिलके,
शिक्षा
का
अलख
जगाया
था
।26 कुल मिलाकर टीकम
जी
की
श्रेष्ठ
साहित्य
कर्म
करके
जन
जागृति
का
शंखनाद
कर
रहे
हैं
और
भारतीय
प्रशासनिक
सेवा
में
सेवारत
होकर
उन
ऐतिहासिक
द्रोणाचार्य
को
करारा
जवाब
है
जो
निर्योग्यता
के
व्यंग्य
बाण
से
दलितों
को
आहत
करते
हैं
।
समकालीन
दौर
में
रजक
समाज
के
नंदलाल
जी
पंवार
ने
लेखन
कर्म
की
शुरुआत
की
है
आप
पुलिस
महकमे
में
बड़े
पद
पर
रहते
हुए
सेवानिवृत
हुए
हैं।
आपके
पुत्र
संभागीय
आयुक्त
नीरज
के
पवन
के
प्रशासनिक
कार्यों
से बीकानेर विकास के
पर्याय रूप में
पहचाने
जाते
हैं
।
आपने
यदि
यपि
लेखन
की
शुरुआत
की
है
और
आप
बाबा
साहब
के
भक्त
और
बुद्ध
दर्शन
के
ज्ञाता
है
परंतु
आपके
लेखन
में
आम
आदमी
की
पीड़ा
है।
आपका
काव्य
व्यंग्य
से
परिपूर्ण
तीक्ष्णता
की
मारक
क्षमता
से
व्यक्ति
को,समाज
सोचने
के
लिए
मजबूर
करता
है-
‘आदमी’कविता
में
आदमी
की
मनोदशा
का
आकलन
वास्तव
में
सराहनीय
है-
आदमी
डरा
है
,आदमी से, / एक
दिन,एक
आदमी
ने/ दूसरे आदमी
से
कहा……………….. / संभल
कर
- कर
जाना
आगे
आदमी
हैं
।27
डॉ.
अनिता
वर्मा
बहुमुखी
प्रतिभा
की
धनी
,साहित्यकारा, राजकीय के
महाविद्यालय,
कोटा
में
सह
आचार्य
पद
पर
कार्यरत
है
।
‘बोलती
आंखें’
काव्य
संग्रह
हंस
प्रकाशन
,दिल्ली से 2021 में प्रकाशित हुआ
है।
कविता
करना
उनका
उद्देश्य
नहीं
है
वरन्
जीवन
की
पुर्न
यात्रा
है।
अपने
काव्य
यात्रा
में
अनिता
जी
अपने
परिवेश
को
आत्मसात
कर
कविताएं
समाज
के
समक्ष
परोसती
है।
इनकी
काव्य
यात्रा
में
अनेक
ज्वलंत
विषय
है।
‘बोलतीं
आंखे‘
की
समस्त
कविताएं
प्रकाशमान
व
सकारात्मक
विचारों
से
आप्लावित
है।
‘सुबह
का
सूरज
अवश्य
निकलेगा’कविता
में
कवयित्री
कहती
है-
सुबह
की
ये
किरणें /लेकर आती
शुभ
संदेशों
की
पाती
/ मेरे
लिये,
रोशनदान
से
झाँकती
हुई / आड़ी
तिरछी
किरणें
/ प्रवाहित
कर
देती
उत्साह
का
संचार / कुछ पलों
के
लिये!!
28
प्रेमचंद गांधी
संभावनाओं
से
परिपूर्ण
साहित्यकार
है।
उनका
काव्य
संग्रह
‘सिंफनी’
चर्चित
रहा
है।
डर
कविता
में
लिखते
हैं-
वे प्रगतिशील
नहीं
प्रगति
कामी
है
/ जिसने सदियों पुरानी
वर्चस्व
की
परंपरा
/
कुछ के
हाथों
में
ही महफूज रहे
रखी
/ यहीं
उनका न्याय है।29
राजस्थान
वहीं
क्षेत्र
है
जहां
हिंदी
साहित्य
का
शुभारंभ
हुआ
था।
आज
अनेक
साहित्यकारों
के
साथ
दलित
साहित्यकार
भी
पूर्ण
जोश
और
ऊर्जा
से
साहित्यिक
कर्म
में
संलग्न
है।
रामस्वरूप
किसान
दलित
मेरी
जान
, अंबेडकर के सपने
लिखकर
समानता
की
लड़ाई
लड़
रहे
है।
भंवर
मेघवंशी
कि
‘मैं
एक
दलित
हूं’
में
दलित
जीवन
के
यथार्थ
से
प्रत्यक्ष
हुआ
जा
सकता
है।
‘सामाजिक
चेतना
की
खोज’
लिखकर
हरि
नारायण
दुबे
ने
हाशिए
के
दलितजन
के
संघर्ष
को
विश्लेषित
किया
है।
कन्हैया
लाल
डूंगर
ने
अनेक
साहित्यिक
रचनाओं
द्वारा
दलित
विषयों
पर
कलम
चलाई
है।
राजस्थान
के
सबसे
अधिक
प्रतिभाशाली,
यशस्वी,
महान
कथाकार रत्नकुमार सांभरिया
जिनके
साहित्यिक
अवलोकन
के
बिना
रचना
कर्म
करना
व
समीक्षा
करना
दुष्कर
कार्य
है।
उनके
साहित्य
में
अंबेडकर
का
नाम
न
होते
हुए
भी
सबसे
अधिक
तीव्र
अंबेडकरवादी
चेतना
सतत्
रूप
से
प्रवाहित
होती
है।
आज
दलित
साहित्य
भारत
की
सभी
भाषाओं
में
लिखा
जा
रहा
है।
राजस्थान
के
साहित्यकार
भी
दलित
कविताओं
द्वारा
सामाजिक
परिवर्तन
के
लिए
उर्वर
भूमि
तैयार
कर
रहे
हैं।
दलित
साहित्यकारों
की
लेखनी
ने
अंबेडकर,
बुद्ध
व
ज्योतिबा
फुले
के
दर्शन
तले
हिंदी
की
काव्य
परंपरा
को
यथार्थ
से जोड़कर अधिक
सशक्त
और
जीवंत
बनाया
है।
भारत
के
अन्य
कवियों
के
समक्ष
राजस्थान
के
दलित
कवि
भी
विश्व
फलक
पर
दस्तक
देने
को
बेताब
है।
कुल
मिलाकर
राजस्थान
में
दलित
साहित्य,
दलित
समुदाय
के
अनुभवों,
संघर्षों
आदि
के
द्वारा
जाति
आधारित
उत्पीड़न
, भेदभाव तथा सामाजिक
सांस्कृतिक,
राजनीतिक
व
ऐतिहासिकता
को
चुनौती
देता
हुआ
पूर्ण
ऊर्जा
से,
निर्भय
होकर
काव्य
कर्म
द्वारा
मानवता
की
जीत
का
परचम
फहराने
को
तत्पर
है।
निष्कर्ष
: उक्त
विवेचन
के
अनुशीलन
से
स्पष्ट
है
कि
राजस्थान
के
दलित
कवियों
की
वेदना
केवल
शब्दों
का
चयन
न
होकर
सदियों
के
संताप
की
साक्षात्
अभिव्यक्ति
हैं।
इन
काव्यकारों ने सामंती
संरचना,
जातिगत
भेदभाव,बेगार
और
सामाजिक
बहिष्कार
की
कड़वी
सच्चाई
को
कविता
में
उकेरा
हैं।
राजस्थान
के
अंचल
विशेष
के
संदर्भ
में
राजस्थानी
दलित
चेतना
की
प्रतिनिधि
पंक्तियों
को
देखा
जा
सकता
है-“रेत
के
टीलों
ने
कभी
भेद
नहीं
किया
पांवों
में,
पर
थारी
मरुधरा
री
रीत बड़ी न्यारी
हैं,
यहां
प्यास
भी
जाति
पूछ
कर
बुझाई
जाती
हैं।“
जहां
उनकी
कविताओं
में
दर्द
का
सागर
हिलोरे
ले
रहा
है
वहीं
इनमें
बुद्ध,
कबीर,
अंबेडकर,
ज्योतिबा
फुले
की
वैचारिकी
से
उपजा
प्रतिरोध
भी
विद्यमान
हैं।
राजस्थान
के
दलित
कवियों
की
’अनुभूत
अंतर्वेदना’केवल
व्यक्तिगत
नहीं
है
अपितु
सामाजिक
और
ऐतिहासिक
अन्याय
की
उपज
हैं।
इनकी
कविताएं
केवल
रोना
धोना
नहीं
है
बल्कि
यथा
स्थिति
के
खिलाफ
एक
हुंकार
और
बदलाव
की
मांग
हैं।
निष्कर्षतः यही कहा
जा
सकता
है
कि
राजस्थान
का
दलित
लेखन
थप-थपी
या
सहानुभूति
की
अपेक्षा
नहीं
करता
बल्कि
समतामूलक
समाज
का
सपना
अवश्य
देखता
हैं।
अपनी
अनुभूतियों
के
माध्यम
से
इन
कवियों
ने
स्वयं
को
नए
प्रतीकों,
नए
बिंबो
और
नवीन
कल्पनाओं
से
अपने
अनुभवों
को
मुखरित
करते
हुए
राजस्थान
के
समकालीन
साहित्य
की
नई
दिशा
अवश्य
तय
कर
दी
हैं।
अब
हिंदी
काव्यधारा
में
इनका
स्थान
मिलने
लगा
हैं।
इनकी
प्रतिनिधि
रचनाएं
अनेक
विश्वविद्यालयों
के
पाठ्यक्रम
में
सम्मिलित
की
जा
रही
हैं
और
इनके
लेखन
कर्म
की
सराहना
भी
की
जा
रही
हैं।
ओमप्रकाश
वाल्मीकि,
जयप्रकाश
कर्दम,
श्योराज
सिंह
बेचैन
आदि
दलित
साहित्य
के
प्रतिनिधि
कवियों
की
तरह
रत्न
कुमार
सांभरिया,
श्याम
निर्मोही,
जयप्रकाश
वाल्मीकि,
टीकमचंद
बोहरा,
अनीता
वर्मा
आदि
भी
समकालीन
साहित्य
के
अग्रदूत
बनकर
उभरे
हैं।
संदर्भ :
6. जय प्रकाश वाल्मीकि, लहू के फूल ,न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशंस, नई दिल्ली ,पृष्ठ 15
19. डॉ. कुसुम मेघवाल, आह से उपजे वेदना के स्वर, मूल निवासी प्रकाशन, उदयपुर, पृष्ठ 81
26. टीकमचंद बोहरा , कविता-संग्रह, ‘रज भारत की चंदन-सी’अनुकृति प्रकाशन, जयपुर
27. टीकमचंद बोहरा , कविता-संग्रह, ‘ माटी हिंदुस्तान की ,बोधि प्रकाशन, जयपुर
27. नंदलाल पंवार -आदमी कविता से उद्घृत
28. डॅा .अनिता वर्मा ,बोलती आँखें,काव्य-संग्रह ,हंस प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 105
सहायक आचार्य-हिंदी, राजकीय डूंगर महाविद्यालय, बीकानेर
anilkumarbaria@gmail.com, 9460101179

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