आदिवासी मौखिक साहित्य में सृष्टि की उत्पत्ति संबंधी कथाओं का आलोचनात्मक अध्ययन
- गंगा सहाय मीणा
शोध सार : आदिवासियों का मौखिक साहित्य परंपरा, दर्शन, इतिहास और विज्ञान का अद्वितीय संगम है। भारत में 'आदिवासी' शब्द का अर्थ है 'प्रथम निवासी'—जो इस भूमि के सबसे प्राचीन निवासियों के रूप में जाने जाते हैं। ये समाज सदियों से अपनी सांस्कृतिक विरासत को लिखित माध्यम के बिना, पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप में संरक्षित करते आए हैं। इनकी सृष्टि-कथाएँ इस मौखिक परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण और गूढ़ हिस्सा हैं।
फादर हाफमैन और वेरियर एल्विन से लेकर अब बहुत सारे देसी-विदेशी विद्वानों ने मध्य-भारत के आदिवासियों पर महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने सैंकड़ों विशिष्ट आदिवासी मिथकों का संकलन किया। उनका कार्य यह दर्शाता है कि आदिवासी सृष्टि-कथाएँ केवल सृष्टि-उत्पत्ति की व्याख्याओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के जटिल संबंधों का व्यवस्थित विवरण भी प्रस्तुत करती हैं। इन कथाओं का कोई एकल रचयिता नहीं होता; बल्कि यह संपूर्ण समुदाय का सामूहिक प्रयास होता है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होता रहता है।
यहां हम गुणात्मक शोध पद्धति की मदद से आदिवासी मौखिक साहित्य में सृष्टि-उत्पत्ति संबंधी कथाओं का व्याख्यात्मक और संदर्भपरक विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे। इस दृष्टिकोण के अंतर्गत मिथकों को केवल कथात्मक रूप में ही नहीं, बल्कि उनके भीतर निहित सांस्कृतिक, प्रतीकात्मक और दार्शनिक अभिप्रायों के साथ समझने का प्रयास किया गया है। प्राथमिक स्रोत के रूप में कई किताबों को देखा गया है। वेरियर एल्विन, रमणिका गुप्ता, माधवेन्द्र-श्रुति, डोमन साहु समीर, आदि द्वारा संकलित मिथक-संग्रहों, लोककथाओं तथा क्षेत्रीय अध्ययनों से प्राप्त सामग्री का उपयोग किया गया है, जबकि द्वितीयक स्रोतों में शैक्षणिक लेखों, पुस्तकों और सम्मेलन कार्यवाहियों का सहारा लेकर अध्ययन को सैद्धांतिक आधार प्रदान किया गया है। इस अध्ययन की पद्धति में प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों का विश्लेषण, तुलनात्मक विधि और लेवी-स्ट्रॉस के संरचनावादी मॉडल का अनुप्रयोग शामिल है। तुलनात्मक विधि के माध्यम से विभिन्न आदिवासी समुदायों की सृष्टि-कथाओं के विषयगत और संरचनात्मक पक्षों का विश्लेषण किया गया है, जिससे उनकी समानताओं और भिन्नताओं को स्पष्ट किया जा सके। अंततः, क्लोद लेवी-स्ट्रॉस के संरचनावादी दृष्टिकोण को अपनाते हुए इन मिथकों के भीतर निहित गहरे वैचारिक ढाँचों और द्वैत संरचनाओं को समझने का प्रयास किया गया है।
मौखिक साहित्य में मिथक की अवधारणा -
जैक गुडी अपने कार्य Myth, Ritual and the Oral (2010) में बताते हैं कि मिथक को केवल 'झूठी कहानी' या 'अवैज्ञानिक व्याख्या' के रूप में समझना भ्रामक है। मौखिक साहित्य में मिथक केवल कथात्मक अभिव्यक्ति नहीं होते बल्कि वे सामाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक जीवन के आधारभूत स्तंभ के रूप में कार्य करते हैं। सबसे पहले मिथक एक व्याख्यात्मक कार्य संपन्न करते हैं, जिसके माध्यम से समुदाय प्राकृतिक घटनाओं, सामाजिक रीतियों और सांस्कृतिक प्रथाओं की उत्पत्ति को समझता है। उदाहरणस्वरुप वर्षा, ऋतु-चक्र, जन्म और मृत्यु जैसी घटनाओं को मिथकीय आख्यानों के माध्यम से अर्थ प्रदान किया जाता है, जिससे अज्ञात और जटिल संसार को सहज रूप में समझा जा सके।
इसके साथ ही, मिथक प्रतिमानात्मक कार्य भी करते हैं, क्योंकि वे आदर्श आचरण और नैतिक मूल्यों के प्रतिमान प्रस्तुत करते हैं। मिथकीय पात्रों और घटनाओं के माध्यम से ये बताया जाता है कि समाज में किस प्रकार के व्यवहार स्वीकार्य है और किस प्रकार के नहीं हैं। इस प्रकार मिथक एक प्रकार की अनौपचारिक नैतिक संहिता के रूप में कार्य करते हैं, जो सामाजिक जीवन को नियंत्रित और निर्देशित करती है।
मिथकों की एक महत्वपूर्ण भूमिका सांस्कृतिक पहचान के निर्माण में भी निहित होती है। ये कथाएँ समुदाय को एक साझे अतीत, मूल्य और विश्वास से जोड़ती हैं, जिसके माध्यम से सामूहिकता और एकजुटता की भावना विकसित होती है। विशेष रूप से आदिवासी समाजों में, जहाँ लिखित इतिहास का अभाव होता है, मिथक ही सांस्कृतिक स्मृति और ऐतिहासिक चेतना का प्रमुख माध्यम बनते हैं।
मिथक अनुष्ठानिक आधार भी प्रदान करते हैं क्योंकि वे धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठानों की वैधता को स्थापित करते हैं। अनेक अनुष्ठानों, पर्वों और परंपराओं की उत्पत्ति मिथकीय कथाओं से जुड़ी होती है, जिनके आधार पर उनका पालन किया जाता है। इस प्रकार, मिथक केवल अतीत का वर्णन नहीं करते, बल्कि वर्तमान सामाजिक और धार्मिक व्यवहार को भी अर्थ और औचित्य प्रदान करते हैं।
ओजिब्वा मॉडल: त्रिस्तरीय संतुलन का सिद्धांत -
उत्तर-अमेरिकी ओजिब्वा आदिवासी समुदाय का सृष्टि-मिथक यह समझने में सहायक है कि आदिवासी चिंतन में विश्व-दृष्टि किस प्रकार कार्य करती है। ओजिब्वा मान्यता के अनुसार महान आत्मा किचे मानितू ने एक स्वप्न देखा—एक 'सुंदर, व्यवस्थित और सामंजस्यपूर्ण' विश्व का। यह विश्व वास्तविकता में परिवर्तित हो गया। इस मिथक की केंद्रीय अवधारणा है कि सृष्टि 'अकस्मात्' या 'शून्य से' नहीं उत्पन्न हुई, बल्कि एक चेतन सपने की अभिव्यक्ति है। इस मॉडल में तीन प्रकार के संतुलन की परिकल्पना की गई है:
- प्राथमिक नियम: आकाशीय पिंडों, ऋतुओं, प्रकाश-अंधकार, अग्नि-जल-वायु के नियम—जिनका पालन सभी को करना होता है।
- द्वितीयक नियम: मानव और पशु क्रियाकलापों को नियंत्रित करने वाले नियम, जहाँ विकल्प की संभावना होती है।
- त्रिस्तरीय संतुलन:
- मानव-अमानवीय (दृश्य-अदृश्य) के बीच संतुलन।
- मनुष्यों के आपसी संबंधों में संतुलन।
- व्यक्ति के चेतन-अवचेतन के बीच संतुलन।
यह मॉडल भारतीय आदिवासी सृष्टि-कथाओं के विश्लेषण के लिए एक उपयोगी सैद्धांतिक ढाँचा प्रदान करता है।
भारत की प्रमुख आदिवासी सृष्टि-कथाएँ -
आइए, भारत के प्रमुख आदिवासी समुदायों की सृष्टि कथाओं पर दृष्टिपात करते हैं-
भील सृष्टि-कथा -
पश्चिमी भारत के भील समुदाय की सृष्टि-कथा अद्वितीय है क्योंकि यह सृष्टि को एक कलात्मक क्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है। बाबो पिथोरा ने प्राथमिक महासागर में गोता लगाया और मिट्टी को ऊपर लाया। इस मिट्टी से पृथ्वी बनी। बाबो और रानी काजल ने पृथ्वी को एक चित्रित दीवार की तरह सजाया, उसे रंग और जीवन से भर दिया।
यह कथा अपने भीतर गहन दार्शनिक अर्थ समेटे हुए है, जो आदिवासी विश्वदृष्टि को समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध होती है। प्रथम दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि इसमें सृजन, कला और सौंदर्य का अद्वितीय एकीकरण प्रस्तुत किया गया है। यहाँ ईश्वर केवल स्रष्टा नहीं, बल्कि एक कलाकार के रूप में उभरता है और सृष्टि स्वयं एक कलाकृति का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार सृजन की प्रक्रिया को एक सौंदर्यपरक और रचनात्मक कर्म के रूप में देखा गया है, जहाँ प्रकृति, रंग, रूप और लय का समन्वय दिखाई देता है।
इस कथा में यह व्यक्त किया गया है कि सृष्टि किसी एक तत्व का परिणाम नहीं बल्कि विभिन्न शक्तियों के संतुलन और सहयोग से निर्मित होती है। बाबो (पुल्लिंग) और रानी काजल (स्त्रीलिंग) के सह-सृजन के माध्यम से यह दिखाया गया है कि यह द्वैत केवल लैंगिक विभाजन तक सीमित नहीं है बल्कि व्यापक स्तर पर प्रकृति के उन मूलभूत सिद्धांतों को भी अभिव्यक्त करता है जिनमें संतुलन, पारस्परिक निर्भरता और सामंजस्य निहित होता है।
भील समुदाय की पिथोरा चित्रकला केवल एक कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं बल्कि सृष्टि के उस आदिम क्षण का पुनर्सृजन है जिसे प्रत्येक घर में अनुष्ठान के रूप में दोहराया जाता है। इस प्रकार मिथक और अनुष्ठान के बीच एक जीवंत संबंध स्थापित होता है। जहाँ, कथा केवल स्मृति में नहीं रहती बल्कि निरंतर क्रियान्वित होती रहती है। यह पुनरावृत्ति समुदाय को उसके मूल से जोड़ने के साथ-साथ सांस्कृतिक निरंतरता को भी सुनिश्चित करती है। भील समाज में यह मिथक केवल कथा नहीं बल्कि एक जीवंत परंपरा है जो प्रतिदिन की चित्रकारी, गीतों और नृत्यों में जीवित रहती है।
गोंड सृष्टि-कथा -
गोंड आदिवासी समुदाय मध्य भारत की सबसे बड़े आदिवासी समूहों में से एक है। इनकी सृष्टि-कथा ध्वनि और संगीत को केंद्र में रखती है। भगवान (सृजनकर्ता) ने एक केंचुए को जल के नीचे से मिट्टी ऊपर लाने के लिए भेजा। तब लिंगो बार्ड (गायक-कवि) ने आकर विश्व को संस्कृति के रूप में गाया।
इस कथा का केंद्रीय संदेश है कि सृष्टि तब तक अधूरी है जब तक उसे गाया नहीं जाता। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इस कथा में सृष्टि को दो स्तरों पर समझा गया है। एक स्तर पर मिट्टी और जल जैसे प्राकृतिक तत्वों के माध्यम से भौतिक संसार की रचना होती है, जो जीवन के आधारभूत अस्तित्व को संभव बनाते हैं। इसके साथ ही दूसरा, अधिक सूक्ष्म स्तर भी उपस्थित है, जहाँ संस्कृति, सभ्यता और जीवन के अर्थ का निर्माण केवल भौतिक साधनों से नहीं, बल्कि गायन, कथन और अनुष्ठानों के माध्यम से होता है। इसी संदर्भ में बार्ड या लिंगो का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, जो मानव, देवता और प्रकृति के बीच एक सेतु या मध्यस्थ की भूमिका निभाता है। वह न केवल मिथकों और परंपराओं का संरक्षक है बल्कि उनके संप्रेषण और पुनर्सृजन का माध्यम भी है, जिसके द्वारा समुदाय अपनी सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक संबंधों को जीवित रखता है। वेरियर एल्विन के अनुसार, गोंड मिथकों में शमन-गायक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है— यह वह व्यक्ति है जो दुनियाओं के बीच आवागमन कर सकता है।
संथाल सृष्टि-कथा -
संथाल आदिवासी समुदाय (झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा) की सृष्टि-कथा अन्य कथाओं से भिन्न है क्योंकि यह पारिवारिक और वंश-केंद्रित है। ठाकुर जिउ ने पहले दंपत्ति पिलचू हाडा़म और पिलचू बूढी़ को एक पहाड़ी की चोटी पर रखा। हांस-हांसिल के जो दो बच्चे मानव शिशुओं के रूप में हुए थे। उन्हें पिलचू हाडा़म और पिलचू बूढ़ी कहा जाता है। उस समय संसार में केवल जल और आकाश था। ठाकुर जिउ ने केंचुए और कछुए की सहायता से मिट्टी जल से निकलवाई। जहाँ मिट्टी ज्यादा थी वे पहाड़ बन गए और नीची सतह पर नदी, नाले, झील और समुद्र बन गए। संथाली मानते हैं कि कछुए की पीठ पर पृथ्वी टिकी है। संथाल सृष्टि-कथा की विशिष्टता इस बात में निहित है कि वह पारंपरिक देव केंद्रित मिथकीय संरचना से हटकर एक मानवीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। इसमें सृष्टि का वर्णन देवताओं के चमत्कारिक हस्तक्षेप के रूप में नहीं, बल्कि माता-पिता और संतानों के संबंधों के माध्यम से व्यक्त किया गया है। इस प्रकार कथा का केंद्र मानव जीवन और पारिवारिक संरचना बन जाती है, जिससे यह अधिक अनुभव सिद्ध और जीवन के निकट प्रतीत होती है।
इसके साथ ही, इस कथा में वंशावली का विशेष महत्व है। सृष्टि को किसी एक क्षण में घटित घटना के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह पूर्वजों की निरंतर श्रृंखला के रूप में विकसित होती है। प्रत्येक पीढ़ी अगली पीढ़ी को जन्म देती है, जिससे सृष्टि एक जीवंत और गतिशील प्रक्रिया बन जाती है। यह दृष्टिकोण समुदाय की ऐतिहासिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता को भी सुदृढ़ करता है।
संथाल मिथक में सृष्टि की कल्पना एक जैविक प्रक्रिया के रूप में की गई है, न कि किसी यांत्रिक या ज्यामितीय संरचना के रूप में। यहाँ सृष्टि किसी तैयार ढाँचे के अनुसार निर्मित नहीं होती, बल्कि एक बीज की भाँति धीरे-धीरे विकसित होती है जिसमें वृद्धि, परिवर्तन और विस्तार की स्वाभाविक प्रक्रिया निहित होती है। यह दृष्टिकोण प्रकृति के साथ गहरे सामंजस्य और जीवन की जैविक लय को अभिव्यक्त करता है।
खासी सृष्टि-कथा : ब्रह्मांडीय वृक्ष -
मेघालय के खासी आदिवासी समुदाय की सृष्टि-कथा वियोग और वंचना की करुण कथा है :
सभी मनुष्य एक समय स्वर्ग में रहते थे। स्वर्ग में रहने वाले सोलह परिवारों में से सात परिवारों को पृथ्वी की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी गई। एक पवित्र वृक्ष ‘लुम सोहपेतब्नेंग’ द्वारा वे पृथ्वी से स्वर्ग में आवागमन करते थे। एक दिन, वृक्ष काट दिया गया। स्वर्ग का मार्ग हमेशा के लिए खो गया। खासियों का विश्वास है कि ईश्वर के आदेश से उनकी रचना हुई है। सूर्य, चंद्रमा, वायु, जल और अग्नि आपस में भाई बहन हैं। माधवेंद्र और श्रुति द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘मेघालय की लोककथाएं’ में यह कथा संकलित है।
यह कथा अपनी संरचना और भाव-दृष्टि के कारण अन्य आदिवासी सृष्टि-कथाओं से स्पष्ट रूप से भिन्न प्रतीत होती है। जहाँ अधिकांश आदिवासी मिथक सृष्टि को एकता, सामंजस्य और प्रकृति-मानव के अविभाज्य संबंध के रूप में प्रस्तुत करते हैं, वहीं इस कथा में स्वर्ग और पृथ्वी के पृथक्करण पर विशेष बल दिया गया है। यह विच्छेद केवल भौतिक दूरी का संकेत नहीं है, बल्कि एक गहरे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अलगाव को भी अभिव्यक्त करता है, जिसके परिणामस्वरूप मानव अपने मूल स्रोत से कट जाता है।
इसके साथ ही इस कथा में सृष्टि को केवल आनंदमय या उत्सवधर्मी प्रक्रिया के रूप में ही नहीं देखा गया है, बल्कि इसमें दुःख, हानि और वियोग के तत्व भी समान रूप से उपस्थित हैं। यह दृष्टिकोण जीवन की जटिलता को अधिक यथार्थपरक ढंग से प्रस्तुत करता है, जहाँ सृजन के साथ-साथ क्षति और पीड़ा भी अनिवार्य रूप से जुड़ी होती है। इस प्रकार यह मिथक अस्तित्व के द्वंद्वात्मक स्वरूप को उद्घाटित करता है।
निष्कर्ष : इस कथा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष आध्यात्मिक तड़प की अनुभूति है। सृष्टि के पश्चात् मनुष्य के भीतर ‘खोए हुए स्वर्ग’ की स्मृति बनी रहती है, जो उसे निरंतर अपने मूल, अपने उद्गम की ओर लौटने के लिए प्रेरित करती है। यह तड़प केवल धार्मिक भाव नहीं है, बल्कि एक गहरी अस्तित्वगत चेतना का परिचायक है, जो मानव को उसके वर्तमान और अतीत के बीच संबंध स्थापित करने के लिए प्रेरित करती है।
राभा सृष्टि-अवधारणाएँ -
असम के राभा आदिवासी समुदाय की मौखिक परंपराओं में खगोलीय पिंडों की उत्पत्ति की अद्वितीय कथाएँ मिलती हैं। पारिश्मिता काकति के अध्ययन Sky Gazing through Rabha Folktales (2025) के अनुसार, राभा लोककथाओं में सूर्य, चंद्रमा, तारों और उल्काओं की उत्पत्ति की कहानियाँ मौजूद हैं। इनमें सांस्कृतिक खगोल विज्ञान का स्पष्ट प्रमाण मौजूद है। साथ ही इनमें ब्रह्मांडीय घटनाओं और दैनिक जीवन का गहरा संबंध अभिव्यक्त होता है। राभा कथाएँ यह दर्शाती हैं कि आदिवासी समाज प्रेक्षणात्मक खगोल विज्ञान के ज्ञाता थे और उन्होंने इस ज्ञान को मिथकों के रूप में संरक्षित किया।
अन्य प्रमुख आदिवासियों की सृष्टि-कथाएँ -
भारतीय आदिवासी समुदायों की सृष्टि-कथाएँ उनकी भौगोलिक परिस्थितियों, आजीविका के साधनों और सांस्कृतिक संरचनाओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। विभिन्न आदिवासियों के मिथकों का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि सृष्टि की अवधारणा कोई एकरूपी या सार्वभौमिक मॉडल नहीं है, बल्कि यह स्थानीय अनुभवों और जीवन-परिस्थितियों के अनुसार रूपांतरित होती रहती है।
झारखंड के मुंडा समुदाय की कथा में सिंगबोंगा द्वारा पक्षियों को ब्रह्मांडीय सागर से मिट्टी लाने के लिए भेजा जाना इस बात का संकेत है कि सृष्टि का उद्भव एक सामूहिक प्रयास के रूप में देखा गया है, जहाँ पक्षी जैसे प्राकृतिक जीव भी सृजन प्रक्रिया के सक्रिय सहभागी हैं। यह दृष्टिकोण मानव और अन्य जीवों के बीच सह-अस्तित्व की भावना को रेखांकित करता है।
बंजारा समुदाय की सृष्टि-कथा में मछली या कछुए द्वारा जल से मिट्टी को ऊपर लाने की कल्पना जल-आधारित सृष्टि मॉडल की ओर संकेत करती है, जो कई प्राचीन मिथकों में भी दिखाई देता है। इसके साथ ही, सेवालाल द्वारा व्यापार और भोजन की शिक्षा देने का प्रसंग यह दर्शाता है कि सृष्टि केवल भौतिक निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सामाजिक और आर्थिक जीवन के मूलभूत तत्व भी शामिल हैं।
महाराष्ट्र के ढनगर समुदाय की कथा पशुपालन-आधारित जीवन-दृष्टि को अभिव्यक्त करती है, जहाँ सृष्टि की क्रमिक संरचना में पहले भेड़, फिर चरवाहा और अंतत: स्त्री का प्रादुर्भाव होता है। यह क्रम इस समुदाय की आजीविका और सामाजिक संरचना को मिथकीय रूप में स्थापित करता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनके लिए पशुधन केवल संसाधन नहीं, बल्कि सृष्टि का केंद्र है।
पश्चिमी तट के कोली समुदाय की कथा में मछली के अंडे से मानव की उत्पत्ति का विचार समुद्र के साथ उनके गहरे संबंध को प्रकट करता है। यह मिथक समुद्र को जीवन के मूल स्रोत के रूप में स्थापित करता है और यह दर्शाता है कि इस समुदाय की सांस्कृतिक पहचान समुद्री पारिस्थितिकी से गहराई से जुड़ी हुई है।
नीलगिरी के टोडा समुदाय की सृष्टि-कथा में भैंस को मनुष्य से पहले अस्तित्व में माना गया है और मनुष्य को उसकी सेवा के लिए निर्मित बताया गया है। यह दृष्टिकोण मानव-केंद्रितता को चुनौती देता है और पशु को सृष्टि के केंद्र में स्थापित करता है, जिससे एक वैकल्पिक नैतिक व्यवस्था का संकेत मिलता है, जहाँ मानव की भूमिका संरक्षक की होती है।
कच्छ और गुजरात के रबारी समुदाय की कथा में पार्वती द्वारा ऊँट की रचना और शिव द्वारा उसमें प्राण प्रतिष्ठा का उल्लेख मिलता है, जबकि रबारी समुदाय को ऊँट का मार्गदर्शक बताया गया है। यह मिथक धार्मिक और सांस्कृतिक तत्वों का समन्वय प्रस्तुत करता है तथा यह स्पष्ट करता है कि उनकी जीवन-शैली और पेशा (ऊँट-पालन) सृष्टि की मूल योजना का हिस्सा है।
सिक्किम के लेपचा समुदाय की कथा में कंचनजंघा को प्रथम पर्वत और पिघलती बर्फ से उत्पन्न पहली नदी का उल्लेख मिलता है, जिसके बाद मिट्टी से मनुष्य की रचना होती है। यह मिथक हिमालयी भूगोल और प्राकृतिक परिवेश को सृष्टि के केंद्र में रखता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि प्रकृति के विशिष्ट रूप—पर्वत, हिम और जल—इस समुदाय की विश्वदृष्टि को आकार देते हैं।
निकोबार द्वीप के निकोबारी समुदाय की कथा में एक विशाल केकड़े द्वारा समुद्र से भूमि को बाहर निकालने का उल्लेख मिलता है, जिसके बाद पहले पेड़ की कोमल लकड़ी से मनुष्य का निर्माण किया जाता है। यह मिथक समुद्री और द्वीपीय पारिस्थितिकी की विशेषताओं को अभिव्यक्त करता है तथा यह दर्शाता है कि सृष्टि की प्रक्रिया यहाँ भी प्राकृतिक शक्तियों और जीवों के सहयोग से संपन्न होती है।
समग्रतः, इन विभिन्न जनजातीय सृष्टि-कथाओं का विश्लेषण यह दर्शाता है कि आदिवासी मिथक स्थानीय पर्यावरण, आजीविका और सांस्कृतिक अनुभवों के साथ गहराई से जुड़े होते हैं। वे न केवल सृष्टि की उत्पत्ति की व्याख्या करते हैं, बल्कि यह भी स्पष्ट करते हैं कि प्रत्येक समुदाय अपने अस्तित्व, पेशे और प्रकृति के साथ संबंध को किस प्रकार अर्थ प्रदान करता है।
आदिवासी सृष्टि-कथाओं का तुलनात्मक विश्लेषण -
आवर्ती प्रतीक और आकृतियाँ -
आदिवासी गीतों और कथाओं का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि उनमें निम्नलिखित प्रतीक बार-बार प्रकट होते हैं:
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प्रतीक |
उपस्थिति |
अर्थ |
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जल/महासागर |
भील, गोंड, संथाल, मुंडा, बंजारा |
आदि अवस्था, अव्यक्त, संभावना |
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मिट्टी (पृथ्वी तत्व) |
लगभग सभी |
स्थिरता, सृजन का भौतिक आधार |
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केंचुआ/मछली/कछुआ |
गोंड, बंजारा |
मध्यस्थ, पहले सृजनकर्ता का सहायक |
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पक्षी (हंस) |
संथाल, मुंडा |
आकाश-जल के बीच संचार, पवित्रता |
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वृक्ष |
खासी |
ब्रह्मांडीय अक्ष, जीवन का केंद्र |
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द्वंद्व (पुरुष-स्त्री) |
भील, गोंड, संथाल |
सृजन की पूरक शक्तियाँ |
इन प्रतीकों का संभावित अर्थ ऊपर दिया गया है। आदिवासी कथाओं में व्यक्त मिथकों के स्वरूप को समझने में वेली-स्ट्रॉस का संरचनात्मक विश्लेषण का सिद्धांत भी हमारी मदद करता है।
संरचनात्मक विश्लेषण : लेवी-स्ट्रॉस का मॉडल -
लेवी-स्ट्रॉस के संरचनावादी ढाँचे में मिथक बाइनरी विपरीतताओं के माध्यम से सांस्कृतिक दुविधाओं का समाधान करते हैं। आदिवासी सृष्टि-कथाओं में ये विपरीतताएँ पाई जाती हैं। इन सृष्टि-कथाओं का गहन विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि वे कुछ मूलभूत द्वंद्वात्मक संरचनाओं पर आधारित होती हैं, जिनके माध्यम से आदिवासी समाज संसार की उत्पत्ति और उसके अर्थ को समझता है। सबसे पहले, जल और भूमि के बीच का द्वंद्व विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जल को प्रायः अराजकता, अनिश्चितता और अनियंत्रित अवस्था के रूप में देखा जाता है, जबकि भूमि व्यवस्था, स्थिरता और जीवन के आधार का प्रतीक बनती है। सृष्टि की प्रक्रिया इन दोनों के बीच के तनाव से उत्पन्न होती है, जहाँ किसी प्राणी—जैसे पक्षी, कछुआ या मछली—द्वारा जल से मिट्टी लाकर भूमि का निर्माण किया जाता है। यह प्राणी एक मध्यस्थ के रूप में कार्य करता है, जो अराजकता और व्यवस्था के बीच सेतु स्थापित करता है।
इसी प्रकार, अकेलेपन और संबंध के बीच का द्वंद्व भी इन मिथकों में स्पष्ट रूप से उभरता है। प्रारंभिक अवस्था में अक्सर केवल एक देवता या पहला मनुष्य ही अस्तित्व में होता है, जो अकेलेपन की स्थिति को दर्शाता है। किंतु सृष्टि का वास्तविक उद्देश्य इसी अकेलेपन को समाप्त कर संबंधों का निर्माण करना होता है—चाहे वह पारिवारिक संबंध हों, सामाजिक संरचनाएँ हों या मानव और प्रकृति के बीच के रिश्ते। इस प्रकार, सृष्टि को संबंधों के विस्तार की प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।
निष्कर्ष : जीवन और मृत्यु का द्वंद्व भी इन कथाओं में एक केंद्रीय तत्व के रूप में उपस्थित है। अनेक मिथकों में यह धारणा मिलती है कि प्रारंभिक सृष्टि में मृत्यु का अस्तित्व नहीं था और जीवन एक निरंतर, अविच्छिन्न प्रक्रिया थी। किंतु किसी विशेष घटना—जिसे अक्सर ‘पतन’ या ‘विच्छेद’ के रूप में चित्रित किया जाता है, जैसे खासी मिथक में पवित्र वृक्ष के कटने के परिणामस्वरूप मृत्यु का प्रवेश होता है। इस प्रकार, मृत्यु को सृष्टि की मूल अवस्था का हिस्सा न मानकर एक बाद की, परिवर्तनकारी घटना के रूप में देखा जाता है, जो जीवन की प्रकृति को ही परिवर्तित कर देती है।
विषयगत विविधता: भूगोल और जीविका का प्रभाव -
आदिवासी सृष्टि-कथाएँ अपने भौगोलिक पर्यावरण और आजीविका के तरीकों से गहरे रूप से अंतर्संबद्ध होती हैं। ये मिथक किसी अमूर्त या सार्वभौमिक कल्पना का परिणाम मात्र नहीं हैं, बल्कि वे उस विशिष्ट पारिस्थितिकी और जीवन-प्रणाली का सांस्कृतिक रूपांतरण हैं, जिसमें संबंधित समुदाय जीवन व्यतीत करता है।
तटीय आदिवासियों, जैसे कोली और निकोबारी की सृष्टि-कथाओं में समुद्र को जीवन के मूल स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यहाँ मनुष्य की उत्पत्ति मछली, केकड़े या अन्य समुद्री जीवों से जुड़ी हुई दिखाई देती है, जो यह संकेत देती है कि इन समुदायों का अस्तित्व समुद्री पारिस्थितिकी पर निर्भर है। इसके विपरीत, पर्वतीय आदिवासी समूहों- जैसे लेपचा और खासी की कथाओं में पर्वत, हिम और स्वर्गीय वृक्ष जैसे तत्व केंद्रीय स्थान ग्रहण करते हैं। यह उनके भौगोलिक परिवेश को ही सृष्टि के मूल आधार के रूप में स्थापित करता है।
इसी प्रकार मैदानी और वन्य क्षेत्रों में निवास करने वाले आदिवासियों, जैसे- गोंड और भील, की सृष्टि-कथाओं में मिट्टी, केचुआ और पक्षियों की भूमिका प्रमुख होती है, जो भूमि और वन से उनके घनिष्ठ संबंध को अभिव्यक्त करती है। पिथोरा चित्रकला जैसी परंपराएँ इस संबंध को सांस्कृतिक और अनुष्ठानिक रूप में पुनर्स्थापित करती हैं। दूसरी ओर, पशुपालक आदिवासियों—जैसे टोडा, ढनगर और रबारी—की कथाओं में भैंस, भेड़ या ऊँट को सृष्टि के केंद्र में रखा जाता है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनके लिए पशुधन केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार और सांस्कृतिक पहचान का अंग है।
इस प्रकार, यह कहा जा सकता है कि आदिवासी सृष्टि-मिथकों में एक प्रकार का भौगोलिक-आर्थिक नियतिवाद कार्य करता है, जिसके अनुसार मिथक उस पर्यावरणीय और आर्थिक यथार्थ को अभिव्यक्त करते हैं, जिसमें समुदाय जीवनयापन करता है। अतः ये कथाएँ केवल ‘कल्पना’ नहीं हैं, बल्कि ये पर्यावरणीय अनुकूलन, अनुभवजन्य ज्ञान और सांस्कृतिक स्मृति को संहिताबद्ध करने का एक सशक्त माध्यम हैं।
सांस्कृतिक और पारिस्थितिकीय निहितार्थ -
(i) पारिस्थितिकीय चेतना और जैव-विविधता संरक्षण -
आदिवासी सृष्टि-कथाओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष पारिस्थितिकीय चेतना का निर्माण है, जिसके माध्यम से प्रकृति और मनुष्य के संबंध को केवल उपयोगिता के स्तर पर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक स्तर पर भी परिभाषित किया जाता है। इन कथाओं में प्रकृति के विभिन्न तत्व—जैसे पेड़, पर्वत, नदियाँ और जीव-जंतु—सामान्य भौतिक वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि उन्हें पवित्र सत्ता या आत्माओं के निवास-स्थल के रूप में देखा जाता है। यह दृष्टिकोण वैश्विक आदिवासी परंपराओं, जैसे ओजिब्वा समुदाय के मिथकों के समानांतर है, जहाँ प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान और पवित्रता की भावना निहित होती है।
इस पवित्रता-बोध का प्रत्यक्ष प्रभाव जैव-विविधता के संरक्षण में दिखाई देता है। जब किसी वृक्ष, पशु या प्राकृतिक स्थल को धार्मिक या सांस्कृतिक रूप से पवित्र माना जाता है, तो उसका संरक्षण स्वतः सुनिश्चित हो जाता है। इस प्रकार आदिवासी मिथक संरक्षण की ऐसी स्वाभाविक प्रणाली विकसित करते हैं, जो किसी बाहरी कानून या नियम पर निर्भर नहीं होती, बल्कि समुदाय की आंतरिक आस्था और नैतिकता से संचालित होती है।
इसके साथ ही ये सृष्टि-कथाएँ सीमित और संतुलित दोहन का सिद्धांत भी प्रस्तुत करती हैं। इनमें यह स्पष्ट संदेश निहित होता है कि मनुष्य प्रकृति का स्वामी नहीं बल्कि उसका अभिभावक है, जिसे संसाधनों का उपयोग संयम और जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए। ओजिब्वा मिथक का उदाहरण इस संदर्भ में अत्यंत सार्थक है, जहाँ यह बताया गया है कि जब मनुष्यों ने पशुओं को अपने अधीन करने का प्रयास किया, तो पशुओं ने उनसे दूरी बना ली, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ा। यह कथा स्पष्ट रूप से चेतावनी देती है कि प्रकृति के साथ असंतुलित संबंध अंततः मानव के लिए ही हानिकारक सिद्ध होते हैं।
(II) सामाजिक-सांस्कृतिक संहिताएँ और नैतिक मूल्य -
आदिवासी सृष्टि-कथाएँ केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति का विवरण नहीं देतीं, बल्कि वे एक सुव्यवस्थित नैतिक और सामाजिक संहिता का निर्माण भी करती हैं, जो समुदाय के आचरण को दिशा प्रदान करती है। विभिन्न आदिवासी समुदायों की कथाओं में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कि सृष्टि के स्वरूप के आधार पर ही उनके जीवन-मूल्य निर्धारित होते हैं।
भील समुदाय की सृष्टि-कथा में सृष्टि को एक कलाकृति के रूप में देखा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप उनके जीवन में सौंदर्य-बोध और कला का विशेष महत्व स्थापित होता है। पिथोरा चित्रकला जैसी परंपराएँ इसी दृष्टिकोण का विस्तार हैं, जहाँ कला केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कर्तव्य भी बन जाती है।
गोंड समुदाय की कथाओं में सृष्टि को पूर्णता तभी प्राप्त होती है जब उसमें गायन और अनुष्ठान का समावेश होता है। इस प्रकार, संगीत और अनुष्ठान केवल सांस्कृतिक क्रियाएँ नहीं, बल्कि सृष्टि-प्रक्रिया के अभिन्न अंग बन जाते हैं।
संथाल मिथकों में सृष्टि की शुरुआत परिवार और वंश से होती है, जिससे पूर्वज-पूजा और वंश-परंपरा का महत्व स्थापित होता है। यहाँ सामाजिक संबंधों को सृष्टि के मूल आधार के रूप में देखा जाता है।
इसी प्रकार, टोडा समुदाय की कथा, जिसमें भैंस को मनुष्य से पूर्व अस्तित्व में माना गया है, एक ऐसी नैतिक व्यवस्था को जन्म देती है जहाँ पशु-कल्याण और संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती है। यह दृष्टिकोण मानव-केंद्रितता के स्थान पर सह-अस्तित्व और उत्तरदायित्व की भावना को स्थापित करता है।
(iii) लुप्तप्राय परंपराएँ और संरक्षण की चुनौतियाँ -
समकालीन संदर्भ में आदिवासी मौखिक परंपराएँ अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं। आधुनिक शिक्षा, शहरीकरण और वैश्वीकरण के प्रभाव के कारण नई पीढ़ी अपनी पारंपरिक भाषाओं और कथाओं से धीरे-धीरे दूर होती जा रही है। दक्षिण-पश्चिम राजस्थान की भीली और वागरी बोलियों पर किए गए अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि ये भाषाएँ विलुप्ति के कगार पर हैं, क्योंकि उनका प्रयोग सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर लगातार कम हो रहा है।
इसके अतिरिक्त, मौखिक साहित्य के प्रामाणिक अनुवाद का अभाव भी एक गंभीर समस्या है। अधिकांश आदिवासी कथाएँ अभी तक स्थानीय भाषाओं तक सीमित हैं, जिसके कारण वे व्यापक पाठक-वर्ग और अकादमिक विमर्श तक नहीं पहुँच पातीं। साथ ही, अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं के लिए इन भाषाओं और समुदायों तक पहुँच भी सीमित रहती है, जिससे इन परंपराओं का वैश्विक स्तर पर अध्ययन बाधित होता है।
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। मलेशिया के साबाह क्षेत्र की लोटुड दुसुन आदिवासी समुदाय का उदाहरण इस वैश्विक संकट को और स्पष्ट करता है, जहाँ अनुष्ठानिक ज्ञान रखने वाले विशेषज्ञों की संख्या अत्यंत कम रह गई है। इसी प्रकार की स्थिति भारत के अनेक आदिवासी समुदायों में भी देखी जा सकती है, जहाँ पारंपरिक ज्ञान के वाहक धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहे हैं। इस प्रकार, यह आवश्यक हो जाता है कि इन मौखिक परंपराओं के संरक्षण, दस्तावेजीकरण और अनुवाद के लिए ठोस प्रयास किए जाएँ, ताकि यह अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।
निष्कर्ष : अब तक के विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि आदिवासी सृष्टि-कथाएँ केवल मिथकीय आख्यान नहीं हैं, बल्कि वे एक सुसंगठित दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टि का प्रतिनिधित्व करती हैं। सैद्धांतिक स्तर पर ये कथाएँ एक ‘त्रिस्तरीय संतुलन’ की अवधारणा को प्रतिपादित करती हैं, जिसमें मानव और प्रकृति, मानव और मानव, तथा चेतन और अवचेतन के बीच सामंजस्य स्थापित करने पर बल दिया गया है। यह दृष्टिकोण मुख्यधारा के यज्ञ-केंद्रित ब्राह्मणिक मिथकों से भिन्न है, क्योंकि यहाँ सृष्टि को किसी एक केंद्रीय शक्ति के नियंत्रण में न देखकर बहुस्तरीय और सहभागितापूर्ण प्रक्रिया के रूप में समझा गया है।
विषयगत स्तर पर यह पाया गया कि विभिन्न आदिवासी सृष्टि-कथाओं में कुछ प्रतीक निरंतर पुनरावृत्त होते हैं, जैसे जल से भूमि का उद्भव, सृष्टि-प्रक्रिया में किसी मध्यस्थ प्राणी—जैसे मछली, केंचुआ या पक्षी—की भूमिका, तथा पुरुष और स्त्री के द्वंद्व के माध्यम से सृजन का विचार। ये आवर्ती संरचनाएँ इस बात का संकेत देती हैं कि भिन्न-भिन्न भौगोलिक और सांस्कृतिक संदर्भों के बावजूद आदिवासी मिथकों में एक गहरी संरचनात्मक समानता विद्यमान है।
पारिस्थितिकीय दृष्टि से ये कथाएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये मानव और प्रकृति के संबंध को शोषण के बजाय संरक्षण और सह-अस्तित्व के आधार पर स्थापित करती हैं। वर्तमान वैश्विक पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में यह दृष्टिकोण विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है, जहाँ आदिवासी ज्ञान-प्रणालियाँ एक वैकल्पिक और सतत् विकास मॉडल प्रस्तुत करती हैं।
सांस्कृतिक स्तर पर प्रत्येक सृष्टि-कथा अपने संबंधित समुदाय के भूगोल, आजीविका और सामाजिक संरचना का प्रतिबिंब होती है। कोली समुदाय की कथाएँ समुद्र-केंद्रित जीवन को, टोडा मिथक पशुपालन-आधारित संस्कृति को तथा गोंड परंपराएँ संगीत और अनुष्ठान की केंद्रीयता को रेखांकित करती हैं। इस प्रकार, सृष्टि-कथाएँ केवल अतीत का वर्णन नहीं करतीं बल्कि वे वर्तमान सांस्कृतिक जीवन को भी अर्थ और दिशा प्रदान करती हैं।
भविष्य में इस विषय पर शोध की व्यापक संभावनाएँ विद्यमान हैं। विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ अभी तक पर्याप्त कार्य नहीं हुआ है। सबसे पहले प्राथमिक क्षेत्रीय शोध की आवश्यकता है, जिसके अंतर्गत विभिन्न आदिवासी समुदायों में जाकर उनकी स्थानीय भाषाओं में मौखिक परंपराओं का प्रामाणिक दस्तावेज़ीकरण किया जाए। इससे न केवल मूल स्वरूप में कथाओं का संरक्षण संभव होगा बल्कि उनके संदर्भ और अर्थ भी अधिक स्पष्ट रूप में सामने आ सकेंगे।
इसके अतिरिक्त, तुलनात्मक अध्ययन की दिशा में भी महत्वपूर्ण कार्य किया जा सकता है, जहाँ भारतीय आदिवासी सृष्टि-कथाओं की तुलना अन्य वैश्विक आदिवासी परंपराओं—जैसे ऑस्ट्रेलियाई, अफ्रीकी और अमेरिंडियन समुदायों—की कथाओं से की जाए। इससे मिथकीय संरचनाओं की सार्वभौमिकता और विविधता दोनों को समझने में सहायता मिलेगी।
पारिस्थितिकीय चित्रण भी एक उभरता हुआ शोध-क्षेत्र हो सकता है, जिसमें आदिवासी मिथकों में वर्णित जैव-विविधता और उसके संरक्षण की वर्तमान स्थिति का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए। यह अध्ययन पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच एक सेतु का कार्य कर सकता है।
डिजिटल युग में मौखिक परंपराओं के संरक्षण के लिए ऑडियो-विजुअल दस्तावेज़ीकरण और डिजिटल अभिलेखागार का निर्माण अत्यंत आवश्यक है। इससे लुप्तप्राय भाषाओं और कथाओं को दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित रखा जा सकता है।
निष्कर्षत:, शिक्षा के क्षेत्र में भी इस दिशा में कार्य किया जा सकता है, जहाँ आदिवासी सृष्टि-कथाओं को स्कूली और उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में समाविष्ट करने के तरीकों पर शोध किया जाए। इससे न केवल सांस्कृतिक विविधता के प्रति संवेदनशीलता बढ़ेगी, बल्कि छात्रों को एक वैकल्पिक और समावेशी ज्ञान-दृष्टि से भी परिचित कराया जा सकेगा।
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गंगा सहाय मीणा
एसोसिएट प्रोफेसर, भारतीय भाषा केन्द्र, जेएनयू, नई दिल्ली
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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