शोध आलेख : स्वातंत्र्योत्तर भारतीय यथार्थ के कथाकार अमरकांत / पंकज यादव

स्वातंत्र्योत्तर भारतीय यथार्थ के कथाकार अमरकांत
- पंकज यादव

शोध सार : अमरकांत हिन्दी के ऐसे लेखकों में से हैं हैं जिनकी निर्मिति में राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि थी। सामंतवाद से सीधी लड़ाई से पैदा लेखक। जमींदार परिवार और फिर उसके संस्कार से मुक्ति की वैचारिक लड़ाई से निकले लेखक। वे साहित्य में प्रेमचंद के बाद की कथा-परंपरा के महत्वपूर्ण लेखक माने जाते हैं; जिन्होंने प्रेमचंद की परंपरा को अपने ढंग से आगे भी बढ़ाया और उसे विकसित भी किया। प्रेमचंद यदि आजादी के पहले के भारतीय समाज का यथार्थ रचते हैं, तो अमरकांत स्वातंत्र्योत्तर यथार्थ के महत्वपूर्ण लेखक हैं। अमरकांत ने ग्राम्यबोध के साथ विशेषरूप से कस्बाई यथार्थ को अपने लेखन में शामिल किया। वे कस्बाई मध्यवर्ग के विश्वसनीय लेखक थे। अमरकांत के समय का यथार्थ जाहिर है जटिलतर होता गया है किंतु भाषा में उसे बरतने की वही प्रेमचंदी सादगी और सहजता अमरकांत को बड़ा कथाकार बनाती है। अमरकांत का पूरा लेखन अपनी जनवादी वैचारिक प्रतिबद्धता में सुगठित होने के बावजूद मार्क्सवाद के भारतीय स्वरूप के लिए संघर्ष करता है और गांधी आदि की वैचारिक रोशनी से उसे मॉंजता चलता है। बलिया और इलाहाबाद के आंदोलनधर्मी पृष्ठभूमि ने अमरकांत की लेखकीय ईमानदारी और वैचारिक परिपक्वता को एक आकार दिया।अमरकांत का कथासाहित्य पुरानी और नई व्यवस्था से उत्पन्न तनाव का साहित्य है जिसमें उन्होंने आजादी के बाद भारतीय समाज में संघर्षशील जनता की आवाज को दर्ज करने की कोशिश की। 'दोपहर का भोजन', 'डिप्टी कलेक्टरी', 'जिंदगी और जोंक' जैसी कहानियाँ व 'सूखा पत्ता' व 'इन्ही हथियारों से' जैसा उपन्यास उन्होंने भोजपुरी समाज में व्याप्त जीवन स्थितियों के भीतर से लिखा। वे संघर्ष व संगठन को महत्वपूर्ण मानते हुए छोटे छोटे लोगों की जीवन स्थितियों को बदलने की कोशिश करते थे। अमरकांत ने छोटे लोगों के संघर्ष को दर्ज कर खुद के संघर्ष का अन्वेषण किया। अमरकांत का कथासाहित्य भोजपुरी समाज, 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन और प्रगतिशील जीवन दर्शन से निर्मित साहित्य है। अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने गुलामी की मानसिकता से हमेशा संघर्ष किया और एक जनतांत्रिक समाज के पक्ष में अपना लेखन किया।

बीज शब्द : यथार्थवाद, आदर्शवाद, अनुभववाद, व्यक्तिवाद, स्वातंत्र्योत्तर यथार्थ, जनवाद, गांधीवाद, मध्यवर्ग, इतिहासबोध, नेहरूवियन यथार्थ, समकालीनता और परंपरा।

मूल आलेख : प्रेमचंद ने हिन्दी कथा साहित्य को एक दीर्घ यात्रा सम्पन्न कराई है, उसी यात्रा को अमरकांत ने आगे बढ़ाया। जिसके चलते इनको प्रेमचंद की परंपरा का कथाकार माना जाता है। प्रेमचंद ने प्रधानतः आदर्शोन्मुख यथार्थवादी कहानियाँ लिखीं हैं, प्रेमचंद की अधिकांश कहानियों में स्वाधीनता आन्दोलन की दीप्ति और आदर्शवाद विद्यमान है। अमरकांत ने अपने कथा साहित्य का सूत्रपात प्रेमचंद की इन्हीं परवर्ती कहानियों से पकड़ा है। यानी पहले कहानी के लिए एक बड़ी घटना, बड़ा चरित्र या कुल मिलाकर कहें कि एक कथानक की जरूरत होती थी परन्तु अब जीवन का एक लघु प्रसंग, प्रसंग-खंड, मूड, विचार अथवा विशिष्ट व्यक्ति-चरित्र ही कथानक बन गया है, अथवा उसमें कथानक की क्षमता मान ली गयी है। अपने लेखन के प्रारम्भिक दिनों में अमरकांत, प्रेमचंद की ऐतिहासिक दृष्टि सम्पन्नता एवं प्रगतिशीलता से प्रभावित हुए। प्रेमचंद ने जिस भूमि पर लाकर कथा साहित्य को छोड़ा, अमरकांत ने वहीं से कथा साहित्य को उठाया है। अमरकांत का कथा साहित्य कहीं आस-पास की दुनिया का अर्थ खोलती है। कहीं छोटी-छोटी परिस्थितियों की पीड़ा उभारती है, तो कहीं आदर्शवादी नुस्खों के खोखलेपन, ढोंग भरी अक्षमता, व्यक्तिवादी, स्वार्थ एवं धूर्तता पर से पर्दा उठाती हैं। घटना और दृष्टिकोण के सामंजस्य से रची ये दिलचस्प, सार्थक और कलात्मक रचनाएँ भारतीय समाज एवं जीवन की सम्भावनाओं के संघर्ष को आगे बढ़ाती है। उमाशंकर चौधरी लिखते हैं कि “अमरकांत नयी कहानी की परम्परा को आगे लेकर चलने वाले नयी कहानी आन्दोलन के प्रमुख लेखक हैं। यानी अमरकान्त के यहाँ प्रेमचन्द का यथार्थवाद भी है, प्रेमचन्द वाली कहन शैली भी है और नयी कहानी आन्दोलन वाली छोटे से छोटे विषय पर कहानी लिखने की कला भी। अमरकांत कहानी के लिए कहीं बहुत दूर नहीं जाते हैं और ना ही वह उसके लिए बहुत प्रयास करते हैं। वे जीवन को अपने प्रवाह में बहने देते हैं। बस एक बौद्धिक की निगाह से जीवन पर अपनी निगाह बनाए रखते हैं।”¹

अमरकांत का कथा साहित्य अपने समय और समाज की जीवंत सार्थक अभिव्यक्ति है। उसके भीतर से जीवन-यथार्थ की घड़कनों को सुना और महसूस किया जा सकता है। उन्होंने अपने कथा साहित्य में जीवन यथार्थ को पूरी गहराई, जटिलता और सूक्ष्मता से अभिव्यक्त किया है। उनके कथा साहित्य की मुख्य शक्ति है उनकी अपने आस-पास के रोजमर्रा के यथार्थ को जानने-समझाने की संवेदनीय दृष्टि। जनसमुदाय के निकट सम्पर्क से वे बराबर शक्ति ग्रहण करते रहे। यही वजह है कि वे बहुत सहजता के साथ जीवनगत यथार्थ के पेचीदा सम्बन्धों को बारीकी से पकड़ने और रचनाशीलता में ढालने में समर्थ रहे हैं। मानव मूल्यों में उनकी गहरी आस्था कभी डाँवाडोल नहीं हुई यह उनके बहुविध वृहद् कथा संसार का बड़ा सच है। अमरकांत के यहाँ जीवन निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। जीवन की यह निरंतरता संघर्ष की निरंतरता भी है और संघर्ष की निरंतरता महनीय मूल्यों को सहेजे रखने की निरंतरता को संकेतित करती है। महनीय मूल्यों के साथ कथाकार की गहरी सम्बद्धता ही है कि आज तक उनकी रचनाशीलता की ऊर्जा बरकरार है। अमरकांत मध्यवर्गीय कस्बाई समाज के ऐसे समृद्ध और सशक्त कथाकार हैं जिन्होंने इस समाज के सामने उनकी समस्त समस्याओं, आशा व आकांक्षाओं, अच्छाइयों बुराईयों को परत-दर-परत उकेर दिया है। हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचंद के बाद उनकी ही पृष्ठभूमि में रचना करने का श्रेय नि:संकोच कथाकार अमरकांत को जाता है। जिन्होंने उनकी परम्परा का बखूबी निर्वाह किया है। ज्ञानोदय में रवीन्द्र कालिया ने लिखा है कि "प्रेमचंद की विडम्बना थी सवर्ण वर्ण की थोपी हुई बैकुण्ठ की कल्पना। यह वर्ग माया की ठगनी रूप में जीता है। अमरकांत की विडम्बना यह है, उच्च वर्ण की हँसी ईमानदारी और रूलाई के बाद का क्रूर यथार्थ।"² अमरकांत ने अपने कथा साहित्य में निम्न मध्यवर्गीय पात्रों के जिस करूण स्थिति का चित्रण किया है उतना समकालीन कथाकारों में अन्यत्र दुर्लभ है। अमरकांत की संवेदना अत्यन्त व्यापक तथा दृष्टिफलक अत्यन्त तीव्र है जिसका परिणाम हमारी आँखों के सामने उनके कथा साहित्य के रूप में प्रस्तुत है। उनके कथा साहित्य को पढ़ने से प्रतीत होता है कि उनके कथा के पात्र और कथा की समस्त घटनाएँ एक तस्वीर की भाँति हमारी आँखों के सामने से गुजर रहें हों। अमरकांत के लेखन ने मानवीय अनुभव की व्यापकता और मानवीय मन की संकीर्णता को पूरी तरह से पहचाना है।

अमरकांत ने अपनी कहानियों में अभिव्यक्त जीवन-यथार्थ को अपनी पूरी संवेदना से संवर्द्धित किया है। यही कारण है कि 'इन्टरव्यू से शुरू हुई अपनी लम्बी कथायात्रा में अन्त तक मानव जीवन के प्रति जन्मा गहरा संवेदनात्मक लगाव कम नहीं होता। संवेदनाओं का श्रृंखलाबद्ध रूप जीवन-प्रक्रिया की जटिलताओं को एहसास कराता है। जनसामान्य की जीवन प्रक्रिया में उनकी रचनात्मक आस्था घुल-मिल गयी है। यही कारण है कि अमरकांत की कथा-संवेदना का स्वरूप वर्णनात्मक कला में ढलकर मात्र कथात्मक ही नहीं रह जाता वरन् उसमें अद्‌भूत रूप से समोयी गयी लयात्मकता है। जीवनराग है। मानीवय गरिमा का बोध है, जो उनके वैयक्तिक अनुताप से पगा है। “अमरकान्त की कहानियों के अंत में आदर्श या सुखांत का भले अभाव हो पर ऐसा दुखांत भी नहीं जो संघर्षशील तत्त्वों का विरेचन कर दे और उस संत्रास में धकेल दे जहाँ से निकलना असंभव जैसा हो। कहानियों को ऐसी जगह पर ठहरा दिया जाता है जहाँ पाठकों की संवेदनशीलता स्पंदित होती है।”³ अमरकांत बराबर आम आदमी की जिंदगी में स्वयं को रचा बसा महसूस करते हैं। उनके जीवन स्तर को बेहतर बनाने की लड़ाई में शामिल होते हैं और बिना किसी शोर-शराबे के ‘नेचुरल ट्रेक' पर चलती कहानियों में चेतना में उबल रही सामाजिक चिन्ता व्यथा संभावनाओं को मूर्त कर देते हैं। अमरकांत को अपने समय और समाज की बुनियादी विसंगतियों का तीखा एहसास है, जिसके कारण वह रचना के भीतर एक संघर्ष खड़ा करते हैं। सामाजिक रूपान्तरण की प्रक्रिया के प्रति वे कोई आग्रही दृष्टि को नहीं जीते, लेकिन कहानियों में उभरी विसंगत परिवेशजन्य विडम्बनायें गहरा उद्वेलन पैदा करती हैं। कठिन परिस्थितियों में जद्दोजहद करते हुए 'जीवनेच्छा' को सहेजे रखना ही अमरकांत की समूची रचनाशीलता का मूल उत्स है। उनकी जिजीविषा का मानवीय आस्था और गौरवभाव का अत्यन्त दीप्त रूप में घिनौनी और भयावह श्मशानी जिंदगी जीते 'जिंदगी और जोक' के 'रजुआ में दिखायी पडता है। निश्चित ही रजुआ में मृत्यु के बीच भी उत्कृष्ट जिजीविषाभाव का बने रहना मानवीय गरिमा से भी ऊपर की संवेदना है। इसमें “ज़िंदगी” को एक जोंक के रूप में दिखाया गया है। जो इंसान से उसकी ताकत, खुशी और उम्मीदें धीरे-धीरे चूस लेती है, लेकिन फिर भी इंसान उसे छोड़ नहीं पाता। चाहे ज़िंदगी कितनी ही दर्द क्यों न दे, जीने की चाह इंसान में उतनी ही गहरी रहती है। कहानी में रजुआ ऐसा ही पात्र है। जिसको देख ये नहीं कह सकते जोंक वह था या जिंदगी। लेखक कहानी के अंत में यह लिखते हैं कि “पोस्टकार्ड लौटाते समय मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा। उसके मुख पर मौत की भीषण छाया नाच रही थी और वह जिन्दगी से जोंक की तरह चिपटा था-लेकिन जोंक वह था या जिन्दगी? वह जिन्दगी का खून चूस रहा था या जिन्दगी उसका ? ... मैं तय न कर पाया।”⁴

अमरकांत की कहानी 'डिप्टी कलक्टरी’ में भी भविष्यहीनता से जन्मी भयावह गंभीर स्थितियों चरित्रों को निराश हताश नहीं बनाती। पुत्र के डिप्टी कलक्टर बनने के सपने के धराशायी हो जाने पर टूट-टूटकर जुड़ते पिता शकलदीप बाबू का सोये हुए बेटे नारायण को छूकर बबुआ सो रहे हैं, सांस चल रही है, यह कहना जैसे कि गहरी निराशा के क्षणों में किसी अनहोनी की आंशका के बीच से जिंदगी का बोल उठना है। सांस चलती जानकर पिता अपने भीतर नयी सम्पृक्ति महसूस करते हैं। यह अमरकांत ही हैं कि भविष्यहीनता में भविष्य की तलाश कर रहे हैं।

'दोपहर का भोजन', 'मूस', 'मकान, 'छिपकली', 'असमर्थ हिलता हाथ' 'हत्यारे, 'बउरैया कोदो', 'तूफान', 'सप्ताहांत' आदि अनेक कहानियों में बहुविध जिन्दगी के यथार्थ से जन्मी पीड़ा, व्यंग्य, करूणा, हास्यपरकता, मानवीय जीवन संघर्ष, बेबसी, रागरंग, जनतांत्रिक दायित्व आदि का समांजित रूप देखने को मिलता है। नामवर सिंह ने अमरकांत की कहानियों के बारे में लिखा है कि "अमरकांत ने अपनी कहानियाँ मध्यवर्गीय परिवारों से उठायी है और इस तरह हमारी आँखों में जिंदगी के जाने कितने पर्दे उठ गये हैं। इस क्षेत्र में अमरकांत की कहानियाँ किसी भी नये लेखक के लिए चुनौती है।"⁵ कथाकार उपेन्द्रनाथ अश्क का अमरकांत की कहानियों के बारे में मत है कि जिन्दगी की पकड़ अमरकांत की अचूक है और अभिव्यंजना अत्यन्त सरल और उनकी कहानियाँ 'सरल, सोद्देश्य व प्रगतिशील उच्च कोटि की है। डॉ० इन्द्रनाथ मदान का मत है कि इनके करारे और चुमते व्यंग्य और इनकी मीठी-मीठी चुटकियों इनकी कहानी-कला को विशेष बनाती हैं। भैरवप्रसाद गुप्त का मत है कि अमरकांत के बिना आज की नई कहानी की कोई भी चर्चा अधूरी है अमरकांत की कहानियों का निर्माण जीवन्त वस्तु-शिला पर होता है। इसलिए वे पत्थर की तरह ठोस व कंक्रीट की तरह शक्ति सम्पन्न होती हैं। ‘दोपहर का भोजन’ कहानी में आर्थिक अभावों की मौन पीड़ा के बीच पारिवारिक मूल्यों के भी जिस सौंदर्य की रक्षा की गई है, वह अमरकांत के संस्कारों का संकेत देता है। मूल्यों का सौंदर्य व्यक्ति की प्रवृत्तियों में निहित होता है और इसमें कोई दो मत नहीं है कि यह परिवार से होता हुआ समाज और राष्ट्र तक पहुँचता है। रवीन्द्र कालिया का कथन है, “बचपन से ही अमरकान्त सहानुभूति और सहृदयता के उदात्त व्यक्ति थे। दूसरों के दुःखों को देखकर वे भी दुःखी होते। दरवाजे पर रोज दुखिया, दरिद्र, अपाहिज, बेसहारा लोग आते थे, मुँह खोल गिड़गिड़ाते थे और लोगों की डॉट-डपट खाते रहते थे।”⁶ रवीन्द्र कालिया का यह कथन हमारे समाज का एक भयावह सच है। आज भी हमारे देश में लाखों लोग ऐसे हैं, जो बेसहारा और दरिद्र हैं और जिन्हें तथाकथित सभ्य समाज के द्वारा झिड़कियाँ, अपमान, ताने, इल्जाम और गालियाँ मिलती हैं।

डिप्टी कलक्टरी' कहानी में मध्यवर्गीय अभावों के बीच पनपती महत्त्वाकांक्षाओं और टूटते सपनों की जो मार्मिकता है, उसमें भी जीवन के प्रति आस्था का अंत नहीं होता है, आशाएँ बनी रहती हैं। शकलदीप बाबू की आँखों में आँसू हैं लेकिन उनके भीतर आस्था है, यह विश्वास है कि 'सब ठीक होगा। यही विश्वास मनुष्य की ऊर्जा और धैर्य को बनाए और बचाए रखता है। कुछ सपनों के टूटने से जीवन का अंत नहीं होता। अपने रचना कर्म के बारे में अमरकांत का स्वयं मत हैं कि समय परिवर्तनशील है। वह अपने अंदर अनेक विरोधाभासों, अंतर्द्वन्द्वों, संघर्षों और संभावनाओं के लिए आगे बढ़ रहा है। जो रचनाकार इस समय की प्रगतिशील सच्चाइयों को पहचानता है, वही उसे शब्दों में उतार सकता है, जिससे उसकी कृतियाँ उस समय की पहचान बन जाती हैं। यह काम बहुत कठिन है, शायद उतना ही कठिन जितना तलवार की धार पर चलना।

अमरकात का कथा साहित्य निम्नमध्यवर्गीय परिवार की भीतरी तनाव की कथा है। अतीत और भविष्य से निश्चिंत होकर उनके कथा साहित्य में वर्तमान जटिलताओं के प्रति एक समझदार सवाल है। मध्यवर्गीय परिवेश के प्रति आलोचनात्मक रुख ही अमरकांत के कथा साहित्य को समर्थ और सार्थक बनाता है। अमरकांत के उपन्यासों में सामाजिक सांस्कृतिक संघर्ष, निम्न मध्यवर्ग व निम्नमध्यवर्ग के युवाओं का आदर्श व यथार्थ के बीच का द्वंद्व है आकाशपक्षी' उपन्यास में तथाकथित उच्च-वर्ग का मुखौटा ओढ़ें सामंती व्यवस्था के बीच छटपटाती युवा मानसिकता का चित्रण है जो परिस्थितियों से विवश होकर समझौता कर लेता है तथा विद्रोह का साहस नहीं जुटा पाता। इस उपन्यास में बडे सरकार के सगे बड़े भाई राजा साहब द्वारा बेईमानी की जाती है। वह रियासत के चले जाने पर स्वयं दिल्ली जाकर बस जाते हैं और छोटे भाई को लखनऊ में रहने को विवश कर देते हैं। इसके बावजूद बड़े सरकार कोई काम नहीं करते तथा विलासी जीवन बीताते हैं। अमरकांत ने लिखा है कि "उनके जीवन का मूलमंत्र था खाना-पीना मौज उड़ाना। यही दर्शन था, इसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं पड़नी चाहिए। जिंदगी भर उन्होंने यही किया और एक दिन भी ईमानदारी से उस पर पश्चाताप नहीं किया।''⁷

इसी तरह 'सूखापत्ता' में उच्च वर्गीय पात्र शोषक व अय्याश है। सेठ झग्गूराम और बेचूराम दोनों मिलकर गरीब व लाचार जनता का शोषण करते हैं जिसके कारण क्रान्तिकारी युवा पात्र उन लोगों के बारे में कहते हैं कि यह सेठ जनता का शोषण कर बेहिसाब नफा पीट रहा है...... यह नीच सरकार परस्त है और चूँकि हम लोग देशभक्त हैं, इसलिए हमको मजा चखाना चाहिए। 'सूखापत्ता' उपन्यास की पूरी कथा कृष्णकुमार के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है। चूंकि सूखा पत्ता इनका पहला उपन्यास है और यह आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है। इसमें कथाकार ने निम्नमध्यवर्गीय युवाओं की मानसिक स्थितियों और उनकी कुण्ठाओं का वर्णन किया है। उपन्यास के नायक के व्यक्तित्व के विकास की दृष्टि से उपन्यास को तीन भागों में बाँटा गया है, जो अलग-अलग होते हुए भी स्वतंत्र और पूर्ण हैं। मध्य वर्गीय परिवार के इस नवयुवक में बचपन से लेकर युवावस्था तक अनेक आदर्श के बीज अंकुरित होते हैं पर अनुकूल वातावरण एवं परिस्थितियों के अभाव में वे पल्लवित और पुष्पित नहीं होते। कभी उसमें बलिष्ठ व पहलवान बनने की चाह है, कभी देश की आजादी के लिए मर मिटने का जज्बा। इन सभी रास्तों पर आगे बढ़कर निराश होता है, कुंठित होता है, अवसादग्रस्त होता है। वह शादी न करने की प्रतिज्ञा भी करता है जब तक भारत स्वतन्त्र नहीं हो जायेगा, मैं शादी नहीं करूँगा। पर उर्मिला के सम्पर्क में आने पर अपनी इस प्रतिज्ञा को तोड़ने के लिए आतुर हो जाता है। समाज उसे विवाह की स्वीकृति नहीं देता। वह जिंदगी के हर मोड़ पर पराजित होता है। समग्र में यह उपन्यास सामाजिक-राजनीतिक समस्या को संबोधित है। कथा नायक यहाँ दो संघर्षों से निरन्तर जूझ रहा है। राजनीतिक रूप से देश की आजादी का संघर्ष सामने है और सामाजिक रूप से लैंगिक पहचान, जात-पात के संघर्षो से उसका सामना है। यदि यह केवल राजनीतिक समस्या को ही संबोधित होता तो आज इसका सिर्फ ऐतिहासिक महत्त्व ही रह जाता। मेधा नैलवाल ने लिखा है कि ‘सूखा पत्ता’ उस भारतीय मनुष्य की कथा है, जो राजनीतिक और सामाजिक, दोनों तरह से दुविधाग्रस्त रहा आया है। उसने अपने हिस्से के स्वप्न देखने चाहे, समाज बदलना चाहा, जमीन तोड़नी चाही और धीरे-धीरे एक ढर्रे में ढलता गया। कथा एक आशा पर समाप्त होती है। आशा, जो समाज में मनुष्य को बेहतरी की ओर जगाए और जिलाए रखती है।”⁸

'ग्रामसेविका' उपन्यास की युवती सामाजिक बन्धनों को तोड़कर फेंकने का साहसपूर्ण कदम उठाती है। यह उपन्यास स्वतंत्रता के बाद का उपन्यास है जब अमरकांत पूर्णत: गाँधीवादी दर्शन के प्रभाव में थे और मार्क्सवाद से उनका परिचय धीरे-धीरे बढ़ रहा था। उनके इस उपन्यास के पात्र कहीं-कहीं ऐसा भाषण देते हैं, मानों वे गाँधीवाद या मार्क्सवाद का प्रचार कर रहे हैं। वस्तुतः स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने वाले अमरकांत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश की तरक्की एवं आदर्श का सपना देखा था और उस सपने के अनुकूल ही उन्होंने 'ग्रामसेविका' उपन्यास की रचना की। इसी कारण यह उपन्यास यथार्थ को लिए हुए आदर्श की ओर अग्रसर है। इस उपन्यास में प्रेमचंद के उपन्यासों के समान ही आदर्श और सुधार को बखूबी देखा जा सकता है। उपन्यास का समय आजादी के तुरंत बाद का है। आजादी के बाद भारतीय सामाजिक विसंगतियों, जातिगत व पितृसत्ता के दमन के शिकार लोगों की दुर्दशा ऐसी है, जो आजादी के पूर्व की उम्मीदों, आकांक्षाओं व स्वप्नों का दम घोंटती है। भावी आज़ाद भारत की तस्वीर व लोकतंत्र की विद्रूपता का जो अनुमान प्रेमचंद को था उसका वास्तविक रूप ‘ग्रामसेविका’ जैसे उपन्यासों में दिखाई पड़ता है। लम्पट प्रधान दमयन्ती से कहता है कि “मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि जैसी दुनिया हो वैसा ही करना चाहिए। सभी ऐसा कर रहे हैं। बड़े से बड़े महात्मा और आदर्शवादी। देश की तरक्की की बात तो लोग जुबान से करते हैं लेकिन सभी भीतर से गरीबों को चूसकर अपना स्वार्थ साधने को तैयार है।”⁹

‘इन्हीं हथियारो से’ उपन्यास में युवा वर्ग देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं। काले उजले दिन का युवा अपने स्वार्थ के खातिर नैतिक मूल्य गढ़ता है और ‘कटीली राह के फूल' का युवापात्र आदर्श के लिए जीता है। इन्हीं हथियारों से उपन्यास काफी वृहद्‌काय उपन्यास है। इस उपन्यास में कथाकार ने भारत छोड़ों आन्दोलन से लेकर देश के स्वतंत्र होने तक का वर्णन ईमानदारी के साथ किया है। यह उपन्यास बहुत प्रसंशित उपन्यास है। कथाकार का विश्वास है कि सभी जातियों, धर्मों एवं क्षेत्रों की विकाशील एकता में ही हमारे देश का भविष्य सुरक्षित है। इन्हीं मूल्यों को आधार बनाकर हमने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी और ये ही मूल्य हमारे देश को विकास के पथ पर अग्रसर कर सकते हैं। इन्हीं हथियारों से उपन्यास द्वारा अमरकांत ने हिन्दी कथा साहित्य में अपनी लेखनीय क्षमता का लोहा मनवाया। इस उपन्यास में कथाकार ने अहिंसा रूपी हथियार को अपनाकर देश की स्वतंत्रता में भाग लेने वाली बलिया जनपद की यथार्थ कहानी का वर्णन किया है। अमरकांत के उपन्यासों के केन्द्रीय पात्र मुख्यत मध्यवर्ग से हैं परन्तु केन्द्रीय पात्रों के चरित्रों को विकसित करने में उच्चवर्गीय तथा निम्नवर्ग के पात्रों के दर्शन होते है, जो अपनी सामाजिक सांस्कृतिक चेतना से अनुप्राणित होकर ही व्यापार करते हैं। अमरकांत के उपन्यासों की कथावस्तु में सभी वर्गों के पात्र विभिन्न रूपों में देखने को मिलते हैं।

अमरकांत की कहानियों में किसी एक व्यक्ति के दर्द और कुठा की अभिव्यक्ति तक ही सीमित नहीं, उनका फलक बड़ा विस्तृत और व्यापक है। आज हमारे समाज में भयंकर गरीबी, शोषण, अन्याय, भ्रष्टाचार आदि का बोलबाला है। परिस्थितियाँ लेखकों से अपने देश समाज तथा इतिहास के प्रति एक गहरे लगाव की माँग करती हैं। इस दृष्टि से यदि देखा जाय तो अमरकांत की कहानियाँ जिंदगी की खरी और साफ तस्वीर पेश करती हैं। उन्होंने एक नवीन आर्थिक परिस्थितियों से जूझते निम्नवर्ग एव मध्यवर्गीय समाज की पीड़ाओं और प्रवंचनाओं का मर्मस्पर्शी चित्रण किया, तो दूसरी ओर स्वन्तत्रता के पश्चात् मूल्यों के विघटन, मोहभंग एवं मानवीय संकट की भी बात की। इनकी कहानियों में यथार्थ की गहरी पकड़ है। वे अतीत को नकारकर अपने समय और परिवेश को गहराई से पकड़ती हैं। अमरकांत ने कहानियों की कथावस्तु को प्रस्तुत करने के लिए उपर्युक्त रूपों का प्रयोग किया है। हरिशंकर परसाई अमरकांत की कहानियों को आम जनता की कहानियाँ मानते थे। उन्होंने अमरकांत के बारे में बताया है कि अमरकांत एक ऐसे रचनाकार है जो अपनी कहानियों में मध्य तथा निम्न परिवारों की दैनंदिन दिनचर्या को उठाते हैं। इनकी चिंता निम्न मध्यवर्ग की दुर्दशा से मुक्ति हेतु दिखाई देती है। यह निरपेक्ष भाव से समाज की विसंगतियों पर प्रहार करते हैं। ‘मूस', ‘जिंदगी और जोंक’ तथा ‘दोपहर का भोजन’ कहानियों में इन्होंने आजाद भारत की तस्वीर को प्रस्तुत किया है। प्रख्यात समीक्षक डॉ० नामवर सिंह ने अमरकांत की कहानियों पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि "अमरकांत ने अपनी कहानियाँ मध्यवर्गीय परिवारों से उठाई है और इस तरह हमारी आँखों में जिन्दगी के जाने कितने पर्दे उठ गए हैं। इस क्षेत्र में अमरकांत की कहानियाँ किसी भी नये लेखक के लिए चुनौती है।"¹⁰ भैरव प्रसाद गुप्त ने कहा है कि "अमरकांत के बिना आज की नई कहानी की कोई भी चर्चा अधूरी है। अमरकांत की कहानियों का निर्माण जीवन्त वस्तु-शिल्प पर होता है. इसलिए वे पत्थर की तरह ठोस व कंक्रीट की तरह शक्ति-सम्पन्न होती हैं।”¹¹

हिन्दी कथा साहित्य में अमरकांत से पहले शायद ही किसी लेखक ने व्यंग्य को इस तरह सामाजिक धरातल पर प्रतिष्ठित करके उसका ऐसा सार्थक और सर्जनात्मक उपयोग किया हो। मूल्यों में विपर्यय की स्थिति को भी अमरकांत व्यंग्य-धर्मी लहजे से उभारतें हैं जिसमें एक ओर कहानी का इकहरापन, उसकी ऊपरी तौर पर मालूम पड़ने वाली सपाटता भी समाप्त हो जाती है, वहीं वह हमारे समय और परिवेश के अन्तर्विरोधों पर टिप्पणी का काम भी देती है। अंकिता तिवारी ने लिखा है कि “अमरकान्त की कहानियों में व्यंग्यात्मकता अतर्निहित है। सामाजिक प्रचलन और व्यवस्था के मौजूदा संस्करणों को लेकर उनकी व्यंग्य दृष्टि बहुत भेदक है। वह मध्यवर्ग के टुच्चेपन को बख्शते नहीं। उनकी दृष्टि संपन्नता स्त्री-प्रसंगों को साभिप्राय बना देती है। ऐसे अनेक संदर्भों को नत्थी हुए उन्होंने ‘लाखो’ जैसी महत्त्वपूर्ण कहानी लिखी है।”¹² अमरकांत शासन, सरकार और समूची व्यवस्था के कुछ बहुत प्रचलित नारों को इस ढंग से इस्तेमाल करते हैं कि उससे जहाँ एक ओर मूल्यों के क्रम में अत्यान्तिक बदलाव का संकेत मिलता है वहीं व्यवस्था के अनेक अन्तर्विरोध भी स्पष्ट होते नजर आते हैं। अमरकांत अपने समकालीन कथाकारों में धर्मवीर भारती, मार्कण्डेय, शिवप्रसाद सिंह, भीष्म साहनी, शेखर जोशी, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मन्नू भण्डारी, उषा प्रियंवदा, मोहन राकेश, निर्मल वर्मा, भैरवप्रसाद गुप्त के बीच विशेष रूप से इसलिए पहचाने जाते हैं कि उनके पात्रों में अपूर्व जिजीविषा है और सबसे बड़ी बात यह है कि एक ऐसा प्रगतिशील दृष्टिकोण उभरता है जो जीवन से जूझने की एक नई प्रेरणा देता है और विषमताओं से ऊपर उठने का आत्मविश्वास जनमानस के मस्तिष्क में उभरता है। उनकी कोई भी कहानी ले ली जाय-दोपहर का भोजन, डिप्टी कलक्टरी जिंदगी और जोंक, गले की जंजीर, नौकर, असमर्थ हिलता हाथ, देश के लोग, हत्यारे आदि सभी कहानियों में यह भावना परिलक्षित होती है। इसका मूलाधार मध्यवर्ग है जिसमें घुन लग चुका है और लोग प्रत्येक स्थिति में जीवन जीने का बहाना मात्र कर रहे हैं।

अमरकांत की कथा भाषा की बात करें तो कोई भी कथाकार हो उसके साहित्यिक विकास में भाषा का विशेष योगदान होता है। भाषा जितनी ही सशक्त होगी उसका कथा साहित्य उतना ही सशक्त और प्रभावशाली होगा। वस्तुतः भाषा कोई जड़ वस्तु नहीं है, अपितु उसमें अनुभव के जीवन्त संदभों द्वारा ही रूपायित करने की क्षमता है। कोई भी रचना शब्दों के संयोजन द्वारा ही अपना संसार रचती है इसलिए उपयुक्त भाषा-माध्यम के अभाव में वह अपने महत्त्व का एहसास पैदा करना तो दूर अपने अस्तित्व की सार्थकता तक को प्रमाणित नहीं कर पाती है। अमरकांत अपने भाषा-प्रयोग के लिए हिन्दी कथा साहित्य में रेखांकन के योग्य हैं। उनके कथा साहित्य की भाषिक सजगता अत्यन्त सराहनीय है। स्त्री-पुरुष शिक्षित-अशिक्षित तथा ग्रामीण-नारी पात्रों के बौद्धिक, मानसिक पार्थक्य को ये अपने भाषा प्रयोग से बखूबी व्यंजित करते हैं। भाषा में कहीं भी अस्वाभाविकता नहीं है। बल्कि वह स्वाभाविक जीवन्त तथा भावानुकूल है।

अमरकांत में व्यंग्य की प्रधानता है। इस विषय में उनकी तुलना हरिशंकर परसाई और कवि नागार्जुन से की जा सकती है। कथनी और करनी के अन्तर को चित्रित करने वाली निर्मम दृष्टि जब यथार्थ का चित्रण करती है तो व्यंग्य उत्पन्न हो जाता है। इस अमानवीय व्यवस्था में बेईमानों को सफल और ईमानदारों को असफल होते हुए देखकर कथाकार के मन में जो भावना उत्पन्न होती है उस अनुभूति के साथ जब वह यथार्थ का चित्रण करते हैं तो उनके मन की यातना और आक्रोश व्यंग्य का रूप धारण कर लेती है। यह व्यंग्य करूणोन्मुख होता है। उनके मध्यवर्गीय असफल और शोषित पात्र प्राय कार्टून या पशु लगते हैं। थोड़ी सी सफलता मिलने पर वे इतराने लगते हैं तो और भी हास्यास्पद लगते हैं और अंत में हृदयहीन स्थितियों की ऐसी चट्टान उनके सिर पर गिरती है कि वे अपनी सारी हास्यास्पदता के साथ चकनाचूर हो जाते हैं। सप्ताहंस का रामसंजीवन हकलाता है। मूस चार फुट का प्रेमी है। रजुआ सबसे पिटता हुआ भी पगली को भात खिलाता है लेकिन इन सब की 'सुखद स्थितियाँ केवल क्षणिक होती है। इस हास्यास्पदता से विडम्बना निखरती है। उसकी यातना और मार्मिक होती है और वे असमर्थ हास्यास्पद पात्र पाठकों की करूणा के भी आलंबन बनते हैं।

निष्कर्ष : अमरकांत जीवनगत सच्चाईयों से जुड़े समर्थ रचनाकार हैं। यह उनकी दृष्टिगत सजगता ही है कि अनेक कहानियों में आत्मालापों और संवादों के माध्यम से चलती नाटकीयता के बीच शहरी जीवन जीते मध्यवर्ग के भीतर जन्मी नयी-नयी ओढ़ी हुई चेतना का आधुनिकता के अंतर्विरोधग्रस्त स्वरूप का वे उपहास उड़ाते दिखते हैं। अमरकांत के पास जटिल मनोभावों को सूक्ष्म रूप से उकेरने वाली सर्जनात्मक भाषा है। उन्होंने अभिधात्मक भाषा को नया अंजाम और आस्वाद दिया। अत्यन्त सादगी के साथ सूक्ष्मता से जीवन अभिप्रायों के अंतस की जटिलता को कहानियों में उभारा। भाषा में संयत विदग्धता है, वे बिना किसी आक्रोश के अत्यन्त धैर्य के साथ घटित को रचनात्मक रूप देते हैं। जीवनगत यथार्थ के अंतर्विरोधों की सशक्त गहरी पकड़ रचनाकार को है। वह कथ्य पर किसी प्रकार का मुलम्मा नहीं चढाते। भारतीय लोकतंत्र की बारीक आलोचना उन्होंने अपने कथा साहित्य के माध्यम से किया। जमींदारी और पुरानी सामंती मानसिकता के खिलाफ उनका कथा साहित्य लगातार संघर्ष करता है। ‘जिंदगी और जोंक’ के शिवनाथ बाबू और ‘बहादुर’ कहानी का लड़का किशोर ऐसे ही सामंती ढूह के अवशेष हैं। दिलचस्प रूप से अमरकांत की कहानियों में नौकरों का और उनके साथ नवशिक्षित-नवधनाढ्य मध्यवर्ग के निर्मम सुलूक का मर्मांतक चित्रण मिलता है। वे मनुष्य के बढ़ते काईंयेपन, चालाकी और जटिल स्वभाव के अनोखे कथाकार हैं। यद्यपि उन्होंने विमर्शवादी कहानियां कम लिखीं, लेकिन ‘मूस’ और ‘पलाश के फूल’ जैसी कहानियां हैं उनके पास। युवाओं के स्वप्न-संघर्ष और बेकारी पर उन्होंने बहुत जोर देकर लिखा, आखिर आजादी के बाद का भारत गढ़ रहे थे वे; कदाचित इसीलिए युवाओं से उन्हें सबसे अधिक उम्मीद थी।

संदर्भ :
1. संपादक पल्लव, बनास जन, जुलाई- सितंबर 2025, अंक 82, पृष्ठ 39
2. संपादक रवींद्र कलिया, ज्ञानोदय, नवंबर अंक 2006, पृष्ठ 29
3. संपादक पल्लव, बनास जन, जुलाई- सितंबर 2025, अंक 82, पृष्ठ 34
4. अमरकांत, अमरकांत की सम्पूर्ण कहानियाँ, पहला खण्ड, भारतीय ज्ञानपीठ, द्वितीय संस्करण 2016, पृष्ठ 86
5. संपादक रविन्द्र कालिया, ममता कालिया, अमरकांत: कृतित्व और व्यक्तित्व की पड़ताल, प्रथम संकरण 1977, पृष्ठ 224
6. संपादक रवींद्र कलिया, अमरकान्त एक मूल्यांकन, सामयिक प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2012, पृ. 11
7. अमरकांत, आकाशपंछी, कृतिकार प्रकाशन इलाहाबाद, द्वितीय संस्करण 1986, पृष्ठ 64
8. संपादक पल्लव, बनास जन, जुलाई- सितंबर 2025, अंक 82, पृष्ठ 140
9. अमरकांत, ग्रामसेविक, राजकमल प्रकाशन नयी दिल्ली, चौथा संस्करण, 2023, पृष्ठ 75
10. संपादक रविन्द्र कालिया, ममता कालिया,अमरकांत: कृतित्व और व्यक्तित्व की पड़ताल, प्रथम संकरण 1977, पृष्ठ 224
11. वही, पृष्ठ 225
12. संपादक पल्लव, बनास जन, जुलाई- सितंबर 2025, अंक 82, पृष्ठ 125

पंकज यादव शोध-छात्र
हिंदी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
8726058628

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

Post a Comment

और नया पुराने