शोध आलेख : रामकुमार कृषक की ग़ज़लों में राजनीतिक चेतना / दीपक कुमार

रामकुमार कृषक की ग़ज़लों में राजनीतिक चेतना
- दीपक कुमार

शोध सार : ग़ज़ल को साहित्य में एक विधा के रूप में बहुत ही मनोरंजक और आकर्षक विधा माना जाता रहा है। ग़ज़ल के शाब्दिक अर्थ को अनेक विद्वानों ने माशूक या माशूका से बातचीत के रूप में ग्रहण किया है, लेकिन जिस प्रकार रीतिकालीन हिंदी कविता आधुनिककालीन साहित्यकारों से परिचय के बाद राष्ट्रीय जागरण और सामाजिक पुनरुत्थान का उपकरण बन कर सामने आई, उसी प्रकार ग़ज़ल में शायरों ने अपने समय के यथार्थ को पूरी सच्चाई से बयाँ करना शुरू किया। इसी क्रम में आधुनिक कवियों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, निराला, त्रिलोचन, शमशेर बहादुर ने ग़ज़ल विधा में न सिर्फ हाथ आज़माया बल्कि ग़ज़ल के माध्यम से आधुनिक जीवन की पेचीदगियों को भी अपनी तरह से व्यक्त किया, लेकिन हिंदी ग़ज़ल में सशक्त समकालीन चेतना के स्वर पहले पहल दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में ही सुनाई देते हैं। दुष्यंत कुमार ने तत्कालीन गद्य कविता के जनता से कटते चले जाने और जनता की बोलचाल की भाषा में कविता के मुहावरे के निरंतर निष्प्रभावी होते चले जाने की समस्या को चिन्हते हुए अपनी ग़ज़लों को एक भरोसेमंद हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल परम्परा को आगे बढ़ाते हुए जिन कुछ शायरों ने हिंदी में ग़ज़ल कहने और उनमें अपने समय की हकीक़त को कलमबद्ध करने के साथ-साथ एक जागरूक साहित्यकार के रूप में अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए ग़ज़ल को प्रभावी माध्यम बनाया उनमें ‘रामकुमार कृषक’ का नाम उल्लेखनीय है।

रामकुमार कृषक की ग़ज़लों में भारत के राजनीतिक परिदृश्य में विद्यमान कमज़ोर पहलुओं की बहुत बारीकी से छानबीन की गई है। उन्होंने भारतीय राजनीतिक मूल्यों की पड़ताल के लिए जो पैमाना बनाया है वो भारतीय संविधान से निर्धारित होता है। वे आज़ादी के बाद राजनीतिक सत्ताधारियों द्वारा जनता के शोषण की क्रोनोलोजी को बखूबी समझते हैं और सत्ता में आने से पहले किए गए खोखले वादों, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, क्षेत्र-भाषावाद, भ्रष्टाचार, नौकरशाही के दुरुपयोग, भाई-भतीजावाद, अवसरवादिता जैसी अनेक समस्याओं को न केवल रेखांकित करते हैं, बल्कि उनमें भारतीय जनता की मुफलिसी के बीजों की भी पहचान करते हैं। प्रस्तुत शोध आलेख में रामकुमार कृषक की ग़ज़लों में निहित राजनीतिक चेतना को उभारने का प्रयास किया गया है, साथ ही यह भारतीय राजनीति के विद्रूप को एक सचेत और प्रगतिशील साहित्यकार की दृष्टि से देखने का अवसर प्रदान करता है।

बीज शब्द : समकालीन हिंदी ग़ज़ल, भारतीय राजनीति, संवैधानिक मूल्य, भ्रष्टाचार, लोकतंत्र, अवसरवादिता, साम्प्रदायिकता, राष्ट्रवाद

मूल आलेख :

रामकुमार कृषक की ग़ज़लों में राजनीतिक चेतना -

ग़ज़ल साहित्य की एक अत्यंत कोमल विधा है। ग़ज़ल में शायर अपने जीवन भर के अनुभवों से अर्जित दर्शन को शेर की दो पंक्तियों में इस तरह से ढालकर प्रस्तुत करता है कि उनसे पाठक या श्रोता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अमीर खुसरो से शुरू हुई परम्परा में शुरुआत से ही हिन्दुस्तानी जीवन का हर पहलू बेहद ख़ूबसूरती से पिरोया जाता रहा है। आधुनिककाल में हिन्दी में ग़ज़ल को निराला ने एक दृढ़ आधार प्रदान किया। आपातकालीन परिस्थितियों में दुष्यंत कुमार ने हिन्दी में ग़ज़ल को व्यापक धरातल पर प्रतिष्ठित करते हुए नई कविता की असम्प्रेषणीयता और बौद्धिक आतंक के सामने जन सरोकारों को अभिव्यक्त करने के लिए ग़ज़ल को साहित्यिक की विधा के एक प्रभावशाली विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया।

दुष्यंत कुमार की ही परम्परा में जनपक्षधरता और प्रतिबद्धता को अपना आदर्श मानकर उनके बाद अनेक ग़ज़लकारों का हिन्दी साहित्य के पटल पर उदय होता है। इन ग़ज़लकारों में रामकुमार कृषक की आवाज़ सबसे अलग और सबसे ऊँची सुनाई पड़ती है। रामकुमार कृषक की ग़ज़लों में समकालीन भारत का प्रगतिशील स्वर अपने तल्ख़ अंदाज़ में उपस्थित है। उनकी ग़ज़लों में जन-सामान्य के यथार्थ की पीड़ा और दुश्वारियों की अभिव्यक्ति अपने श्रेष्ठतम रूप में चिह्नित की जा सकती है, तभी हिन्दी ग़ज़ल के समर्थ आलोचक ज्ञानप्रकाश विवेक लिखते हैं- “कृषक ने खुरदुरे यथार्थ को व्यक्त करने के लिए रेशमी लफ़्ज़ों की तलाश नहीं की, यथार्थ को उसी खुरदुरे (और सपाट) लहजे में व्यक्त किया”[1]

रामकुमार कृषक अपनी ग़ज़लों के माध्यम से अपने समय की राजनीतिक विसंगतियों पर न केवल सवाल खड़े करते हैं अपितु उनकी ग़ज़लें पूरी राजनीतिक व्यवस्था को ही सवालों के कटघरे में खड़ा कर उसमें क्रांतिकारी बदलाव की माँग करती हैं। जैसा कि हरेराम समीप कहते हैं- “उनकी ग़ज़लें यथास्थितिवाद के विरुद्ध क्रांतिकारी बदलाव के लिए सजग रहने की माँग करती हैं।”[2]

किसी भी राज्य में रह रहे नागरिकों के हितों की रक्षा करते हुए उसे विकास के सर्वोत्तम अवसर उपलब्ध कराना राजनीति का मूलभूत आदर्श होता है। इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए चुनी हुई सरकारें व्यवस्था निर्माण करती हैं और इस व्यवस्था निर्माण के लिए उठाये गये कदम मनुष्य के जीवन के हर पहलू को प्रभावित करते हैं, इसलिए समाज में रहने वाले साहित्यकार के लिए राजनीतिक स्थितियों से मुँह मोड़ना असंभव है। ग़ज़लकार रामकुमार कृषक की ग़ज़लों में भी राजनीतिक चेतना का प्रसार स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत की आज़ादी के लिए जितने स्वप्न सजाए थे और जनता ने जितने ख़्वाब बुने थे आज़ादी के बाद सब धराशायी हो गए। राजनीतिक सत्ता तो बदल गई पर लोगों के हालात में कोई बदलाव नहीं आया। उनका मानना है कि राजनीतिक नेतृत्व ने अपने स्वार्थ के लिए साम्राज्यवादी और शोषणकारी शक्तियों से हाथ मिला लिया। रामकुमार कृषक ने मोहभंग की इस स्थिति को इन शब्दों में अभिव्यक्त किया है-

इस मुल्क की हालत प’ मेरे दोस्त ज़रा सोच
जब से हुआ स्वतन्त्र तभी से गुलाम है [3]

रामकुमार कृषक एक जागरुक साहित्यकार हैं। वे राजनीति में पर्दे के पीछे चलने वाले खेल को पहचानते हैं। वे राजसत्ता के धोखे से जनता को आगाह करते हुए कहते हैं-

एक छल है गुलाबी फसल देश में
दरअसल हैं असल नीम की पत्तियाँ [4]

‘नीम की पत्तियाँ’ आज़ादी के बाद स्थापित शोषणकारी देशी सत्ता का प्रतीक हैं, जो ग़ज़लकार के अंतर्मन में हालात के प्रति उत्पन्न हुई कड़वाहट की सघन अनुभूति से उपजा है। आज़ादी के बाद जो लोकतंत्र संविधान के प्रावधानों से स्थापित होना चाहिए था, राजनेताओं के नैतिक पतन ने उसे जन्म ही नहीं लेने दिया। जो समस्याएँ आज़ादी से पहले भारतवर्ष में चारों ओर दिखाई देती थीं वही समकालीन भारत में भी मुँह-बाएँ खड़ी हैं। राजनीति केवल सत्ताप्राप्ति का घिनौना खेल बन कर रह गई है और इस खेल में आम-आदमी के सपने दाँव पर लगते रहे हैं, इसलिए कृषक कहते हैं -

टोपियों के दंगलों में तो लँगोटी भी गई
हादसा इससे बड़ा अब और गुज़रेगा नहीं [5]

आज़ादी के बाद भारत में लोकतंत्रात्मक गणराज्य की व्यवस्था की गई थी ताकि भारत के हर वर्ग का व्यक्ति आज़ादी का पूरा लाभ उठाकर अपना विकास कर सके लेकिन राजनेताओं ने राजनीति को व्यवसाय बना दिया है, जिससे अब व्यवस्था के हाशिए पर खड़े लोग लाख चाहते हुए भी आज़ाद स्वर में गीत नहीं गा सकते-

आप गाने की बात करते हैं
किस ज़माने की बात करते हैं [6]

रामकुमार कृषक ने अपनी ग़ज़लों में लोकतंत्र की यथार्थ स्थिति का चित्रण किया है और प्रचलित लोकतांत्रिक व्यवस्था की विकृतियों को उजागर करने का प्रयास किया है। रामकुमार कृषक ने भारत की संसदीय व्यवस्था पर भी तीखे सवाल किए हैं। वे संसद में बैठे हुए जन-प्रतिनिधियों की विलासितापूर्ण जीवन शैली देखकर क्षोभ व्यक्त करते हैं। वोटों की खरीद-फरोख्त और पूंजीपतियों से साँठ-गाँठ करके खुद को सेवक बताकर संसद भवन में स्वामी बन बैठे सांसदों से उन्हें जनता के हित की कोई आशा नहीं है-

संसद में कुर्सियाँ हैं कुर्सियाँ रियासतें
सेवक हैं स्वामियों-सा मगर तामझाम है [7]

रामकुमार कृषक की अनेक ग़ज़लों में उन्होंने स्वार्थ और भ्रष्टाचार में लिप्त रहने और जन-सामान्य की आशा-आकांक्षाओं के साथ खिलवाड़ करने वाली संसद के प्रति आक्रोश व्यक्त किया है और आम-जनता को अपने अधिकारों के प्रति जाग्रत करने का प्रयास किया है। ग़ज़लकार ने संसद के वास्तविक चरित्र का पर्दाफाश करते हुए उसे मासूम पक्षियों का शिकार करने वाले बाज के रूप में चित्रित किया है-

पालतू तोते उड़ानों पर कबूतर भी
गौर से देखा तो निकली बाज की संसद [8]

जब से सत्ता हमारे देश के राजनेताओं के पास आई है तभी से भ्रष्टाचार राजनीति की संस्कृति बन गया है और आए दिन देश में घोटालों का पता चल रहा है। राजनेता जिस विकास के बड़े-बड़े दावे अपने भाषणों में करते हैं, चुनाव के बाद वह विकास केवल उनकी स्वयं की इमारतों तक ही सीमित रह जाता है। रामकुमार कृषक ने अपनी ग़ज़लों में राजनीतिक भ्रष्टाचार पर सीधी चोट की है। उन्होंने राजनीतिक भ्रष्टाचारियों को सेंधमार की संज्ञा देते हुए कहा है-

सेंधमारों का ज़माना है
खिड़कियाँ ही बंद क्या कीजे [9]

रामकुमार कृषक अपने समय की विकट परिस्थितियों से अनजान नहीं हैं। वे एक जागरूक कवि-ग़ज़लकार के रूप में अपने आस-पास हो रहे भ्रष्टाचार के प्रति सजग हैं। उन्हें तब बड़ी पीड़ा होती है जब गरीब आदमी के पास पेट भरने तक की कमाई नहीं है और राजनेता पशुओं तक का चारा हजम कर जाते हैं-

पशुओं का चारा तक तो खुद खा जाएँगे
पेट हमारा भर ही देंगे उनका क्या है [10]

कृषक की ग़ज़लों में ‘दिल्ली’ प्रतीक का सार्थक प्रयोग देखने को मिलता है। दिल्ली भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की वह धुरी है जिस पर पूरा तंत्र घूम रहा है। डॉ. मधु खराटे लिखते हैं- “रामकुमार कृषक ने अपनी ग़ज़लों में ‘दिल्ली’ शहर का प्रयोग कर देश की राजनीति का पर्दाफाश किया है। देश की गरीबी, अनीति, भ्रष्टाचार, अव्यवस्था आदि के लिए वे दिल्ली की राजनीति को ही दोषी मानते हैं।”[11] ‘नीम की पत्तियाँ’ में वे दुष्यंत कुमार की तर्ज पर कहते हैं-

रोटियों का मुद्दआ दिल्ली से सुलझेगा नहीं
और भूखा इस बहस में और उलझेगा नहीं [12]

रामकुमार कृषक अपनी ग़ज़लों में प्रतीकों के माध्यम से राजनीतिक दुर्व्यवस्था पर करारे प्रहार करते हैं। उनकी पीड़ा है कि राजनीति ने भाई-भतीजावाद को इतना अधिक प्रश्रय दिया है कि जनहित के उद्देश्य से बनी हुई योजनाओं का लाभ सत्ता से मधुर संबंध बनाए रखने वाले ऐसे लोगों तक ही सीमित होकर रह जाता है जो किसी प्रकार अभावग्रस्त नहीं हैं-

बतलाये देते हैं यों तो बतलाने की बात नहीं
खलिहानों पर बरस गए वो खेतों पर बरसात नहीं [13]

ग़ज़लकार ने अपनी सम्पूर्ण चेतना से राजनीतिक भ्रष्टाचार का प्रतिवाद किया है और अपने समाज के लोगों को राजनीतिक रूप से जागरूक करने के महान दायित्व का निर्वाह अपनी ग़ज़लों के माध्यम से किया है। ‘कृषक’ ने राजनीति के छल-प्रपंच को बखूबी समझा है। यही कारण है कि राजनेताओं द्वारा अपने स्वार्थ के लिए और वोटों के ध्रुवीकरण के लिए जनता को जाति, धर्म, नस्ल और क्षेत्र के नाम पर बाँटने की मानसिकता का उन्होंने कड़ा विरोध किया करते हुए रामकुमार कृषक मानवता को जाति, संप्रदाय और क्षेत्र से ऊपर मानते हैं और अपनी ग़ज़लों में मनुष्यता का ही संदेश देते दिखाई देते हैं-

क्या हुआ यदि लोग आदमज़ाद से ऊबे हुए
हो गए कुछ नस्ल-मज़हब और कुछ सूबे हुए [14]

रामकुमार कृषक ने राजनीतिक अवसरवादिता पर भी खुलकर व्यंग्य किए हैं। राजनीति ने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए चारित्रिक दृढ़ता का त्याग कर दिया है। चुनावी मौसम में राजनेता मंच पर खड़े होकर अपने भाषणों में खुद को अवाम का सबसे बड़ा हितैषी सिद्ध करने में दिन-रात एक किए रहते हैं। कृषक जी ने ऐसे राजनेताओं पर तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा है-

मंच-माइक-टेप से घुस ज़हन में आवाम के
भौंकने को ही दिली जज़्बात बतलाने लगे [15]

कृषक जी ने राजनेताओं की अवसरवादी मानसिकता के प्रति जनता को सचेत करते हुए उनके झूठे चरित्र के झाँसे में न आने के लिए प्रेरित किया है। राजनेता जिन राजनीतिक पूर्वजों के सिद्धांतों की दुहाई देकर वोट की भीख माँगते दिखाई देते हैं, सत्ता में आने पर उन्हीं आदर्शों की अवहेलना करना आरंभ कर देते हैं। ऐसे अवसरवादी नेताओं पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं-

भीख माँगी बादशाहत मिल गई लायक हुए
बाप-दादों को बुरा बदजात बतलाने लगे [16]

जिस दिन चुनाव की घोषणा होती है उसी दिन से राजनेता जनता के बीच जाकर आकाश को धरती पर उतार लाने के वायदे करने लगते हैं। रातों-रात झूठे घोषणापत्र तैयार हो जाते हैं और चुनाव ख़त्म होते ही घोषणापत्र महज़ एक कागज़ का टुकड़ा बनकर रह जाता है। रामकुमार कृषक ने इस राजनीतिक विसंगति पर प्रहार करते हुए राजनेताओं के वास्तविक चरित्र का पर्दाफ़ाश करते हुए कहा है-

तोंद के गोदाम कर लबरेज पहले
वायदों से पेट खाली भर दिए होंगे [17]

कृषक जी की ग़ज़लें राजनीतिक विद्रूपता पर साहसी कवि की साहसिक प्रतिक्रिया है। वे अपनी ग़ज़लों के माध्यम से आम-जनता को संगठित करते हैं और राजनीति के दुष्चक्र से मुक्त होने का आह्वान करते हैं। उनका मानना है कि धीरे-धीरे कई वर्षों से दिए जाते रहे झूठे आश्वासनों के प्रति जनता में जागरुकता आ रही है, इसी तथ्य को लक्षित करते हुए उन्होंने कहा है-

मुद्दतों से चाँद थाली में परोसा जा रहा
इस निरे बहकाव को अब कौन समझेगा नहीं [18]

समकालीन हिन्दी ग़ज़ल में राजनेताओं के चरित्र का यथार्थ चित्रण हुआ है। सत्ता में आने के लिए नेता सारे पैंतरे अपनाते हैं। कभी वे अपने आकाओं की जी हुज़ूरी करते हैं तो कभी चुनावी समीकरण बैठाने के लिए अपनी आत्मा तक का सौदा करने में हिचकिचाते नहीं हैं। राजनीति में सफलता के लिए भी व्यक्ति में चारित्रिक दुर्गुणों को योग्यता मान लिया गया है। कृषक जी कहते हैं जो इंसानियत की कसौटी पर भी असफल हो जाते हैं वे लोग कुर्सियों पर आसीन हो जाते हैं-

जो इम्तिहाने आदमीयत फेलियर रहे
अक्सर हमारे वे ही फ़रिश्ते रहे हैं लोग [19]

रामकुमार कृषक ने राजनीतिक स्थितियों का सूक्ष्मता से विश्लेषण करते हुए यह अनुभव किया है कि राजनीति में आने वाले कतिपय लोगों का वास्तविक चेहरा अत्यंत घिनौना है। वे कहते हैं कि चुनावों के बाद केवल सत्तासीन पार्टियाँ बदल जाती हैं, लेकिन लोगों के हालात नहीं बदलते-

टोपियाँ बदलेंगी केवल और क्या बदलेगा कल
आपकी फिर आपकी अवधारणाओं के सिवा [20]

इस तरह के अनेक शेरों में रामकुमार कृषक ने राजनेताओं के चारित्रिक विद्रूप को आईना दिखाया है। रामकुमार कृषक जनधर्मी सरोकारों से जुड़े हुए साहित्यकार हैं। वे प्रचलित राजनीतिक व्यवस्था की विसंगतियों में आमूलचूल परिवर्तन चाहते हैं। उनका मानना है कि व्यवस्था कभी परिवर्तन की माँग को स्वीकार नहीं करती, उसमें बदलाव के लिए क्रान्ति की मशाल जलानी पड़ती है। वे स्वीकार करते हैं कि यद्यपि सत्ता से लड़कर लोग राख़ हो जाते हैं फिर भी राख़ होने से पूर्व व्यक्ति को अंगारों की तरह धधकना चाहिए-

राख होने से पहले धधकना हमें
कोई अब और चारा नहीं दोस्तों [21]

कृषक जी की ग़ज़लों में आम-जनता को शोषण के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने की प्रेरणा दी गई है। जो लोग सच्चाई की लड़ाई में सब कुछ हार बैठे हैं, उन्हें भी ग़ज़लकार वज्र बनकर सत्ता के चक्रव्यूह को नष्ट करने का आह्वान करता है -

आज कंकाल हुए जा रहे जो लोग यहाँ
कल वही वज्र-खड्ग तेज़तर भाले होंगे [22]

रामकुमार कृषक ने अपनी ग़ज़लों के माध्यम से शोषण का हथियार बनी हुई सत्ता और राजनीतिक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए आम आदमी में जिजीविषा का संचार करने की प्रेरणा प्रदान की है। राजसत्ता में बने रहने के लिए राजनेता नित नए षड्यंत्र रचते हैं। वे जनता को संगठित नहीं होने देना चाहते इसलिए वे लगातार कोई न कोई नई तरकीब लगाते हैं जिससे जनता में जागरुकता का संचार न हो। जो लोग अपने अधिकारों की माँग करते हैं और सच बोलने का साहस जुटाते हैं, ऐसे लोगों के प्रति राजनीति दमनकारी तंत्र को सक्रिय कर देती है-

हर देश के हर चौंक पे कायम अभी सलीब
सच बोलने का सिर्फ़ यही तो इनाम है [23]

ग़ज़लकार रामकुमार कृषक अपने शेरों में राजनीतिक दमनचक्र के सामने सीना तानकर खड़े रहने वाले लोगों में ही बदलाव की संभावना देखते हैं। कृषक जी की क्रांतिकारी चेतना में गहरी आस्था है। वे मानते हैं कि राजनीतिक विद्रूपता के प्रति एक बार आम-आदमी के सीने में जो आग भड़क उठती है तो वो प्रशासन की दमकलों से निकलने वाली पानी की बौछारों से नहीं बुझती है-

दम नहीं दमकलों में बुझाएँ बुझें
आग पर गोलियाँ दागिए साहबो [24]

समकालीन राजनीति ने राष्ट्रवाद को संकुचित अर्थों में ग्रहण करते हुए उसे चुनाव जीतने का फार्मूला बना लिया है। रामकुमार कृषक राष्ट्रवाद शब्द को उसके व्यापक अर्थ में ग्रहण करते हुए राष्ट्रवाद को राष्ट्र की उन्नति और समृद्धि से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि राष्ट्रध्वज को ऊँचाई पर फहराने मात्र से ही राष्ट्र की गरिमा नहीं बढ़ती है अपितु राष्ट्र तब ऊँचा उठता है जब राष्ट्र अपने पैरों पर खड़ा होता है-

राष्ट्र तो फुटपाथ पर बेदम बिछा
और उनका राष्ट्रध्वज फहरा हुआ[25]

रामकुमार कृषक एक प्रतिबद्ध ग़ज़लकार हैं। उनकी ग़ज़लों के शेर पाठक की जीवन दृष्टि को अधिक उदार और व्यापक बनाते हैं। ख्यातनाम ग़ज़लकार-आलोचक हरेराम समीप ने उनकी ग़ज़लों का अध्ययन करते हुए लिखा है- “उनका प्रत्येक शेर उनके सामाजिक सरोकारों से आबद्ध है और सत्ता के जनविरोधी चरित्र के विरुद्ध प्रतिवाद का स्वर बुलंद करता है।“[26]

निष्कर्ष : हिन्दी में आकर ग़ज़ल को जो नया संस्कार और नया तेवर मिला है, साहित्य संसार ने पहले उसकी बानगी को दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में महसूस किया और वही ग़ज़लें अब सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन में क्रांतिकारी भूमिका निभाने का सशक्त माध्यम बन गई हैं। रामकुमार कृषक की गजलें भी इसी परिवर्तनकामी भावना से पुष्ट हुई हैं। वे उन साहित्यकारों में से हैं जो साहित्य को उपयोगिता की कसौटी पर परखते हैं। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लों में समाज की आशा-आकांक्षा, दुःख-दर्द, तनाव-हताशा आदि का प्रामाणिक रूप में चित्रण किया गया है। उन्होंने अपनी ग़ज़लों में समकालीन राजनीतिक व्यवस्था की बुराइयों पर कठोर प्रहार करते हुए जनता को अपने अधिकारों के हनन के प्रति सजग रहने का आग्रह किया है।

सन्दर्भ :
[1] ज्ञानप्रकाश विवेक :हिन्दी ग़ज़ल की नयी चेतना, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, 2018, पृ. 107
[2] हरेराम नेमा समीप : समकालीन हिन्दी ग़ज़लकार : एक अध्ययन, भावना प्रकाशन, दिल्ली, 2017, पृ. 178
[3] रामकुमार कृषक : नीम की पत्तियाँ, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, दूसरा संस्करण, 2018, पृ. 20
[4] वही, पृ. 56
[5] वही, पृ. 16
[6] रामकुमार कृषक : ‘संकलित ग़ज़लें’, दसख़त (सं. जीवन सिंह), यश पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रीब्यूटर्स, दिल्ली, 2017, पृ. 62
[7] रामकुमार कृषक : नीम की पत्तियाँ, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, दूसरा संस्करण, 2018, पृ. 20
[8] वही, पृ. 54
[9] वही, पृ. 34
[10] रामकुमार कृषक : अपजस अपने नाम, किताबघर, दिल्ली, 2012, पृ. 54
[11] मधु खराटे : हिंदी ग़ज़ल और ग़ज़लकार, विद्या प्रकाशन, कानपुर, 2012, पृ. 22
[12] रामकुमार कृषक : नीम की पत्तियाँ, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, दूसरा संस्करण, 2018, पृ. 16
[13] वही, पृ. 84
[14] वही, पृ. 57
[15] वही, पृ. 31
[16] वही, पृ. 31
[17] वही, पृ. 14
[18] वही, पृ. 16
[19] वही, पृ. 30
[20] रामकुमार कृषक : मुश्किलें कुछ और, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, 2019, पृ. 84
[21] रामकुमार कृषक : नीम की पत्तियाँ, शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली, दूसरा संस्करण, 2018,पृ. 48
[22] वही, पृ. 51
[23] वही, पृ. 20
[24] वही, पृ. 27
[25] वही, पृ. 24
[26] हरेराम नेमा समीप : समकालीन हिन्दी ग़ज़लकार : एक अध्ययन, भावना प्रकाशन, दिल्ली, 2017, पृ. 187

दीपक कुमार
सहायक आचार्य (हिंदी), राजकीय महाविद्यालय खैरथल (राज.) पिन : 301404

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
  चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 64, Issue Nu. 4, जनवरी-मार्च 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनातमक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

1 टिप्पणियाँ

  1. बेनामीमई 11, 2026 7:18 am

    जन ग़ज़लकार रामकुमार कृषक पर एक बेहतरीन शोध आलेख. दीपक जी हमेशा महत्वपूर्ण विषय को उठाते हैं.
    -डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री

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